भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 245, कुल 421 में से

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पृष्ठ 245

पूर्वार्ध                       उन्नीसवां अध्याय जो रसीला सोम यहां मौजूद है, जिस सोम को इंद्र देव ने पीया, हम उस कल्याणकारी सोम का मन से भक्षण करते हैं. सोम राजा हैं. ( ३५ ) पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः प्रपितामहेभ्यः स्वाधायिभ्यः स्वधा नमः. अक्षन् पितरोमीमदन्त पितरोतीतृपन्त पितरः पितरः शुन्धध्वम्.. ( ३६) पितरों के लिए स्वधा, स्वधा के लिए नमन. पितामहों के लिए स्वधा, स्वधा के लिए नमन. पितामहों के लिए स्वधा, स्वधा के लिए नमन. पितरों ने हवि के रूप में समर्पित आहार को ग्रहण किया. उस आहार को ग्रहण कर के तृप्ति पाई. पितृगण हमें भी तृप्त करते हैं. पितृगण हमारे जीवन को शुद्ध करने की कृपा करें. ( ३६ ) पुनन्तु मा पितरः सोम्यासः पुनन्तु मा पितामहाः पुनन्तु प्रपितामहाः पवित्रेण शतायुषा. पुनन्तु मा पितामहाः पुनन्तु प्रपितामहाः पवित्रेण शतायुषा विश्वमायुर्व्यश्नवै.. ( ३७) पितृगण हमें पवित्र करने की कृपा करें. पितृगण सौम्य हैं. पितामह हमें पवित्र करने की कृपा करें. प्रपितामह हमें पवित्र करने की कृपा करें. हम पवित्रतापूर्वक सौ वर्ष तक जीएं. अश्विनी देवों की कृपा से हम पूर्णायु पाएं. ( ३७ ) अग्न ऽ आयु १७ षि पवस ऽ आ सुवोर्जमिषं च नः. आरे बाधस्व दुच्छुनाम्.. ( ३८) हे अग्नि! आप आयुदायक व पवित्रताकारी हैं. आप हमें अच्छा अन्न प्रदान करने की कृपा करें. आप हमारी बाधाओं को दूर करने की कृपा करें. आप दुष्टों को दूर करने की कृपा करें. ( ३८ ) पुनन्तु मा देवजनाः पुनन्तु मनसा धियः. पुनन्तु विश्वा भूतानि जातवेदः पुनीहि मा.. ( ३९) देवजन हमें पवित्र बनाने की कृपा करें. वे मन से हमारी बुद्धि को पवित्र बनाने की कृपा करें. अग्नि सभी प्राणियों को पवित्र बनाने की कृपा करें. सर्वज्ञ देव हमें पवित्र बनाने की कृपा करें. ( ३९ ) पवित्रेण पुनीहि मा शुक्रेण देव दीद्यत्. अग्ने क्रत्वा क्रतूँ १ २ नु.. (४०) हे अग्नि! आप अपनी पवित्रता से हमें पवित्र बनाने की कृपा करें. आप अपनी तेजस्विता से हमें पवित्र बनाने की कृपा करें. आप स्वर्गलोक तक दीप्तिमान हैं. आप अपने पवित्र कर्मों से यज्ञ को पवित्र बनाने की कृपा कीजिए. ( ४० ) यत्ते पवित्रमर्चिष्यग्ने विततमन्तरा. ब्रह्म तेन पुनातु मा.. (४१) हे अग्नि! जो आप का पवित्र स्वरूप है, आप बीच में अपने जिस स्वरूप का यजुर्वेद - २४५