यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 338, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध अट्ठाईसवां अध्याय देव ऽ इन्द्रो नराश १४ सस्त्रिवरूथस्त्रिबन्धुरो देवमिन्द्रमवर्धयत्. शतेन शितिपृष्ठानामाहितः सहस्रेण प्रवर्त्तते मित्रावरुणेदस्य होत्रमर्हतो बृहस्पतिः स्तोत्रमश्विनाध्वर्यवं वसुवने वसुधेयस्य वेतु यज.. (१९) इंद्र बहुप्रशंसित हैं. तीनों लोकों के बंधु हैं. यज्ञ देव इंद्र देव की बढ़ोतरी की कृपा करें. इंद्र देव सैकड़ों काली पीठ वाली गायों से शोभते हैं. कर्मनिष्ठ वरुण, स्तोता बृहस्पति एवं अध्वर्यु अश्विनीकुमारद्वय इस यज्ञ के होता हैं. देवगण यजमानों को वैभव दें. देवगण यजमानों के लिए धन धारने की कृपा करें. होता इस के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (१९) देवो देवैर्वनस्पतिर्हिरण्यपर्णो मधुशाखः सुपिप्पलो देवमिन्द्रमवर्धयत्. दिवमग्रेणास्पृक्षदान्तरिक्षं पृथिवीमदृ १४ हीद्वसुवने वसुधेयस्य वेतु यज.. (२०) वनस्पति देव सोने के पत्तों से युक्त, मधुर शाखाओं वाले और उत्तम फलों वाले हैं. वनस्पति इंद्र देव की बढ़ोतरी करने की कृपा करें. वनस्पति देव अपने उग्र त्याग से स्वर्गलोक व अंतरिक्षलोक का स्पर्श करते हैं. वनस्पति देव पृथ्वीलोक में व्याप्त हैं. वनस्पति देव यजमानों को धन देने व धन धारने की कृपा करें. होता इस के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (२०) देवं बर्हिर्वारितीनां देवमिन्द्रमवर्धयत्. स्वासस्थमिन्द्रेणासनमन्या बर्ही १४ ष्यभ्यभूद्वसुवने वसुधेयस्य वेतु यज.. (२१) हे देवगण! इंद्र देव कुश के आसन पर विराजते हैं. हे देवगण! उन की बढ़ोतरी करने की कृपा करें. वे आकाश में स्थित वस्तुओं को अभिभूत करने व यजमान को ऐश्वर्य देने की कृपा करें. उस वैभव को स्थिर करने की कृपा करें. यजमान उस वैभव को पाने के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (२१) देवो अग्निः स्विष्टकृद्देवमिन्द्रमवर्धयत्. स्विष्टं कुर्वन्त्स्विष्टकृत्स्विष्टमद्य करोतु नो वसुवने वसुधेयस्य वेतु यज.. (२२) अग्नि इष्ट कार्य की पूर्ति करते हैं. इंद्र देव की बढ़ोतरी करते हैं. इंद्र देव आज हमारे इष्ट कार्य की पूर्ति करने की कृपा करें. (सदैव) इष्ट कार्य की पूर्ति करने की कृपा करें. वे यजमान को वैभव प्रदान करने की कृपा करें. आप यजमान के लिए वैभव धारण करने की कृपा करें. यजमान उन के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (२२) अग्निमद्य होतारमवृणीतायं यजमानः पचन्पक्तीः पचन्पुरोडाशं बध्नन्निन्द्राय छागम्. सूपस्था ऽ अद्य देवो वनस्पतिरभवदिन्द्राय छागेन. अघतं मेदस्तः प्रति पचताग्रभीदवी वृधत्पुरोडाशेन. त्वामद्य ऋषे.. (२३) ३३८ - यजुर्वेद