यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 363, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध इकतीसवां अध्याय प्रकट हुआ. परम पुरुष के पैर से भूमि प्रकट हुई. परम पुरुष के कानों से दिशाएं प्रकट हुईं. परम पुरुष ने अनेक लोक रचे हैं. ( १३ ) यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत. वसन्तोस्यासीदाज्यं ग्रीष्म ऽ इध्मः शरद्धविः.. ( १४) देवताओं ने परम पुरुष को हवि माना. परम पुरुष को हवि मान कर यज्ञ की शुरुआत की. उस यज्ञ में घी वसंत ऋतु, ईंधन ग्रीष्म ऋतु एवं हवि शरद ऋतु हो गई. ( १४ ) सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः. देवा यद्यज्ञं तन्वाना ऽ अबध्नन् पुरुषं पशुम्.. ( १५) देवताओं ने जिस यज्ञ का विस्तार किया, उस यज्ञ में परम पुरुष को ही हवि के पशु के रूप में बांधा. उस यज्ञ में सात परिधियां और इक्कीस समिधाएं हुईं. ( १५ ) यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्. ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः.. (१६) देवताओं ने यज्ञ से यज्ञ किया. उस में धर्म को प्रथम आसन प्राप्त हुआ. जो लोग यज्ञ आदि विधिविधान से जीवन जीते हैं, ऐसे जीवन साधक महिमाशाली होते हैं. ऐसे व्यक्ति स्वर्ग प्राप्त करते हैं. ( १६ ) अद्भ्यः सम्भृतः पृथिव्यै रसाच्च विश्वकर्मणः समवर्त्तताग्रे. तस्य त्वष्टा विदधद्रूपमेति तन्मर्त्यस्य देवत्वमाजानमग्रे.. ( १७) परम पुरुष ने सब से पहले जल का निर्माण किया. तत्पश्चात पृथ्वी का निर्माण किया. इस पृथ्वी का निर्माण जल के रस से हुआ. त्वष्टा देव संसार को रूप धारण कराते हैं. त्वष्टा देव मनुष्यों को देवत्व और अमरता प्रदान करते हैं. ( १७ ) वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्. तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेयनाय.. (१८) परम पुरुष को जानने से परम तत्त्व की प्राप्ति होती है. वह अंधकार से परे है. वह आदित्य जैसे वर्ण ( रंग ) का है. उस को जान कर जो मृत्यु के पथ पर जाते हैं, उन्हें उस पथ से मोक्ष की प्राप्ति होती है. इस के अलावा मोक्ष का कोई और मार्ग नहीं है. ( १८ ) प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा वि जायते. तस्य योनिं परि पश्यन्ति धीरास्तस्मिन् ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा.. (१९) प्रजापति गर्भ में संचरण करते हैं. वे अजन्मा हैं. फिर भी बहुत रूपों में प्रकट यजुर्वेद - ३६३