यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 54, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध तीसरा अध्याय अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया ऽ अधूषत. अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजा न्विन्द्र ते हरी.. (५१) हम ने यज्ञ में जो हवि पितरों के लिए प्रदान की है, उसे पितरों ने स्वीकार कर लिया है. स्वीकार कर के उस हवि का सेवन भी कर लिया है. स्वयं प्रकाशित ब्राह्मणों ने नई ऋचाओं से स्तुति शुरू कर दी. हे इंद्र! अब इस यज्ञ में पधारने के लिए 'हरी' नामक घोड़ों को रथ में जोतने की कृपा कीजिए. (५१) सुसन्दृशं त्वा वयं मघवन्वन्दिषीमहि. प्र नूनं पूर्णबन्धुर स्तुतो यासि वशाँ २ अनु योजा न्विन्द्र ते हरी.. (५२) हे इंद्र! आप धनवान हैं. आप सभी को अच्छी और समान दृष्टि से देखते हैं. हम सब आप की उपासना करते हैं. आप निश्चय ही हम सभी के पूर्ण बंधु हैं. आप स्तुति करने वालों के वश में रहते हैं.आप उन की स्तुतियों का अनुकरण करते हैं. आप उन की इच्छा पूरी करने के लिए रथ में 'हरी' नामक घोड़ों को जोतने की कृपा कीजिए. (५२) मनो न्वाह्वामहे नाराश १७१ सेन स्तोमेन. पितॄणां च मन्मभिः.. (५३) हम वीर पुरुषों की गाथाओं को गाने वाले मंत्रों से पितरों को आमंत्रित करते हैं. हम पितरों को मन से बार-बार आमंत्रित करते हैं. (५३) आ न ऽ एतु मनः पुनः क्रत्वे दक्षाय जीवसे. ज्योक् च सूर्यं दृशे.. (५४) हमारा यह मन (पितृलोक से) पुनः आए. यज्ञ कार्य के लिए जीवलोक में पधारने की कृपा करे. हम बारबार सूर्य का प्रकाश देख सकें. (५४) पुनर्नः पितरो मनो ददातु दैव्यो जनः. जीवं व्रात १७१ सचेमहि.. (५५) पितृगण! पुनः हमारे मन को श्रेष्ठ कार्यों के लिए प्रेरित करने की कृपा करें. ताकि हम जीवों और घर वालों की सेवा कर सकें. (५५) वय १७१ सोम व्रते तव मनस्तनूषु बिभ्रतः. प्रजावन्तः सचेमहि.. (५६) हे पितरो! आप सोम व्रत वाले हैं. हम आप के प्रति पितृकार्यों में मन और तन लगाए हुए हैं. उसे धारण किए हुए हैं. हम संतानवान सचित्त आप की सेवा में लगे रहें. (५६) एष ते रुद्र भागः सह स्वस्राम्बिकया तं जुषस्व स्वाहैष ते रुद्र भाग ऽ आखुस्ते पशुः.. (५७) हे रुद्र! यह आप का भाग है. आप अपनी पत्नी अंबिका के साथ इसे ग्रहण करने की कृपा कीजिए. आप के लिए स्वाहा. हे रुद्र! यह भाग आप के पशु चूहे के लिए अर्पित है. (५७) ५४ - यजुर्वेद