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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

DevanagariHindipublished429 पृष्ठ

नवम अध्याय २०३ तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च। अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन।।१९।। मैं सूर्यरूप से तपता हूँ, वर्षा को आकर्षित करता हूँ और उसे बरसाता हूँ। मृत्यु से परे अमृत-तत्त्व तथा मृत्यु, सत् और असत् सब कुछ मैं ही हूँ। अर्थात् जो परम प्रकाश प्रदान करता है, वह सूर्य मैं ही हूँ। कभी-कभी भजनेवाले मुझे असत् भी मान बैठते हैं, वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं। आगे कहते हैं- त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक- मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्।।२०।। आराधना-विद्या के तीनों अंग-ऋक्, साम और यजुः अर्थात् प्रार्थना, समत्व की प्रक्रिया और यजन का आचरण करनेवाले, सोम अर्थात् चन्द्रमा के क्षीण प्रकाश को पानेवाले पाप से मुक्त होकर पवित्र हुए पुरुष उसी यज्ञ की निर्धारित प्रक्रिया द्वारा मुझे इष्टरूप में पूजकर स्वर्ग के लिये प्रार्थना करते हैं। यही असत् की कामना है, इससे वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उनका पुनर्जन्म होता है; जैसा पिछले श्लोक में योगेश्वर ने बताया। वे पूजते मुझे ही हैं, उसी निर्धारित विधि से पूजते हैं; किन्तु बदले में स्वर्ग की याचना करते हैं। वे पुरुष अपने पुण्य के फलस्वरूप इन्द्रलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में देवताओं के दिव्य भोग भोगते हैं, अर्थात् वह भोग भी मैं ही देता हूँ। ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति। एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते।।२१।। वे उस विशाल स्वर्ग को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक अर्थात् जन्म-मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार 'त्रयीधर्मम्'- प्रार्थना, समत्व एवं यजन की तीनों विधियों से एक ही यज्ञ का अनुष्ठान करनेवाले मेरी शरण हुए

२०१४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता भी कामनावाले पुरुष बारम्बार जाने-आने को अर्थात् पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं किन्तु उनका मूल नाश कभी नहीं होता; क्योंकि इस पथ में बीज का नाश नहीं है। किन्तु जो किसी प्रकार की कामना नहीं करते, उन्हें क्या मिलता है?- अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥२२॥ अनन्य भाव से मुझमें स्थित भक्तजन मुझ परमात्मस्वरूप का निरन्तर चिन्तन करते हैं, 'पर्युपासते'- लेशमात्र भी त्रुटि न रखकर मुझे उपासते हैं। उन नित्य एकीभाव से संयुक्त हुए पुरुषों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ अर्थात् उनके योग की सुरक्षा की सारी जिम्मेदारी मैं अपने हाथ में लेता हूँ। इतना होने पर भी लोग अन्य देवताओं को भजते हैं- येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥२३॥ कौन्तेय ! श्रद्धा से युक्त हुए जो भक्त दूसरे-दूसरे देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझे ही पूजते हैं; क्योंकि वहाँ देवता नाम की कोई वस्तु तो होती नहीं, किन्तु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक है, मेरी प्राप्ति की विधि से रहित है। यहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण ने दूसरी बार देवताओं के प्रकरण को लिया है। सर्वप्रथम अध्याय सात के बीसवें से तेईसवें श्लोक तक उन्होंने कहा- अर्जुन ! कामनाओं द्वारा जिनके ज्ञान का अपहरण कर लिया गया है, ऐसे मूढ़बुद्धि पुरुष अन्य देवताओं की पूजा करते हैं और जहाँ पूजा करते हैं, वहाँ देवता नाम की सक्षम सत्ता तो है ही नहीं। पीपल, पत्थर, भूत, भवानी अथवा अन्यत्र जहाँ उनकी श्रद्धा झुक जाती है, वहाँ कोई देवता नहीं है। मैं ही सर्वत्र हूँ। उस स्थान पर मैं ही खड़ा होकर उनकी देवश्रद्धा को उन स्थानों पर स्थिर करता हूँ। मैं ही फल का विधान करता हूँ, फल देता हूँ। फल निश्चित मिलता है; किन्तु उनका फल नाशवान् है। आज है तो कल भोगने में आ जायेगा, नष्ट हो जायेगा, जबकि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता। अतः वे मूढ़बुद्धि जिनके ज्ञान का अपहरण हो गया है, वही अन्य देवताओं की पूजा करते हैं।

नवम अध्याय २०५ प्रस्तुत अध्याय नौ के तेईस से पचीसवें श्लोक तक योगेश्वर श्रीकृष्ण पुनः दोहराते हैं कि- अर्जुन! जो श्रद्धा से अन्य-अन्य देवताओं को पूजते हैं, वे मुझे ही पूजते हैं; किन्तु वह पूजन अविधिपूर्वक है। वहाँ देवता नाम की सक्षम वस्तु नहीं है। उनकी प्राप्ति की विधि गलत है। अब प्रश्न उठता है कि जब वे भी प्रकारान्तर से आपको ही पूजते हैं और फल भी मिलता ही है, तो दोष क्या है? अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते।।२४।। सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता अर्थात् यज्ञ जिसमें विलय होते हैं, यज्ञ के परिणाम में जो मिलता है वह मैं हूँ और स्वामी भी मैं ही हूँ; परन्तु वे मुझे तत्त्व से भली प्रकार नहीं जानते, इसलिये 'च्यवन्ति'- गिरते हैं। अर्थात् वे कभी अन्य देवताओं में गिरते हैं और तत्त्व से जब तक नहीं जानते तब तक कामनाओं से भी गिरते हैं। उनकी गति क्या है?- यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः। भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।।२५।। अर्जुन! देवताओं को पूजनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं। देवता हैं तो परिवर्तित सत्ता, वे अपने सद्कर्मानुसार जीवन व्यतीत करते हैं। पितरों को पूजनेवाले पितरों को प्राप्त होते हैं अर्थात् अतीत में उलझे रहते हैं, भूतों को पूजनेवाले भूत होते हैं- शरीर धारण करते हैं और मेरा भक्त मुझे प्राप्त होता है। वह मेरा साक्षात् स्वरूप होता है। उसका पतन नहीं होता। इतना ही नहीं, मेरी पूजा का विधान भी सरल है- पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।२६।। भक्ति का आरम्भ यहीं से है कि पत्र, पुष्प, फल, जल इत्यादि जो कोई मुझे भक्तिपूर्वक अर्पित करता है, मन से अर्पण करनेवाले उस भक्त का वह सब मैं खाता हूँ अर्थात् स्वीकार करता हूँ। इसलिये-

२०६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ।।२७।। अर्जुन! तू जो कर्म (यथार्थ कर्म) करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, समर्पण करता है, दान देता है, मनसहित इन्द्रियों को जो मेरे अनुरूप तपाता है, वह सब मुझे अर्पण कर अर्थात् मेरे प्रति समर्पित होकर यह सब कर। समर्पण करने से योग के क्षेम की जिम्मेदारी मैं ले लूँगा। शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः। संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ।।२८।। इस प्रकार सर्वस्व के न्यास संन्यास योग से युक्त हुआ तू शुभाशुभ फलदाता कर्मों के बन्धन से मुक्त होकर मुझे प्राप्त होगा। उपर्युक्त तीन श्लोकों में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने क्रमबद्ध साधन और उसके परिणाम का चित्रण किया है- पहले पत्र-पुष्प, फल-जल का पूर्ण श्रद्धा से अर्पण, दूसरे समर्पित होकर कर्म का आचरण और तीसरे पूर्ण समर्पण के साथ सर्वस्व का त्याग। इनके द्वारा कर्मबन्धन से विमुक्त (विशेष रूप से मुक्त) हो जायेगा। मुक्ति से मिलेगा क्या? तो बताया, मुझे प्राप्त होगा। यहाँ मुक्ति और प्राप्ति एक दूसरे के पूरक हैं। आपकी प्राप्ति ही मुक्ति है, तो उससे लाभ? इस पर कहते हैं- समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः। ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ।।२९।। मैं सब भूतों में सम हूँ। सृष्टि में न मेरा कोई प्रिय है और न अप्रिय है; किन्तु जो अनन्य भक्त है, वह मुझमें है और मैं उसमें हूँ। यही मेरा एकमात्र रिश्ता है। मैं उसमें परिपूर्ण हो जाता हूँ। मुझमें और उसमें कोई अन्तर नहीं रह जाता। तब तो बहुत भाग्यशाली लोग ही भजन करते होंगे? भजन करने का अधिकार किसे है? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ।।३०।।

नवम अध्याय २०७ यदि अत्यन्त दुराचारी भी अनन्य भाव से अर्थात् (अन्य न) मेरे सिवाय किसी अन्य वस्तु या देवता को न भजकर केवल मुझे ही निरन्तर भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है। अभी वह साधु हुआ नहीं है किन्तु उसके हो जाने में सन्देह भी नहीं है; क्योंकि वह यथार्थ निश्चय से लग गया है। अतः भजन आप भी कर सकते हैं बशर्ते कि आप मनुष्य हों; क्योंकि मनुष्य ही यथार्थ निश्चयवाला है। गीता पापियों का उद्धार करती है और वह पथिक- क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥३१॥ इस भजन के प्रभाव से वह दुराचारी भी शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है, परमधर्म परमात्मा से संयुक्त हो जाता है तथा सदैव रहनेवाली परमशान्ति को प्राप्त होता है। कौन्तेय ! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता। यदि एक जन्म में पार नहीं लगा तो अगले जन्मों में भी वही साधन करके शीघ्र ही परमशान्ति को प्राप्त होता है। अतः सदाचारी, दुराचारी सभी को भजन करने का अधिकार है। इतना ही नहीं, अपितु- मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥३२॥ पार्थ! स्त्री, वैश्य, शूद्रादि तथा जो कोई पापयोनिवाले भी हों, वे सभी मेरे आश्रित होकर परमगति को प्राप्त होते हैं। अतः यह गीता मनुष्यमात्र के लिये है, चाहे वह कुछ भी करता हो, कहीं भी पैदा हुआ हो। सबके लिये यह एक समान कल्याण का उपदेश करती है। गीता सार्वभौम है। पापयोनि- अध्याय १६/७-२१ में आसुरी वृत्ति के लक्षणों के अन्तर्गत भगवान ने बताया कि जो शास्त्रविधि को त्यागकर नाममात्र के यज्ञों द्वारा दम्भ से यजन करते हैं, वे नरों में अधम हैं। यज्ञ है नहीं किन्तु नाम दे रखा है और दम्भ से यजन करता है वह क्रूरकर्मी और पापाचारी (पापयोनि) है। जो मुझ परमात्मा से द्वेष करनेवाले हैं वही पापी हैं। वैश्य और शूद्र भगवत्पथ की

२०८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता सीढ़ियाँ हैं। स्त्रियों के प्रति कभी सम्मान, कभी हीनता की भावना समाज में रही है, इसीलिये श्रीकृष्ण ने इनका नाम लिया। योग-प्रक्रिया में स्त्री और पुरुष दोनों का समान ही प्रवेश है। किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा। अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ।।३३।। फिर तो ब्राह्मण तथा राजर्षि क्षत्रिय श्रेणीप्राप्त भक्तों के लिये कहना ही क्या है? ब्राह्मण एक अवस्था-विशेष है, जिसमें ब्रह्म में प्रवेश दिला देनेवाली सारी योग्यताएँ विद्यमान हैं। शान्ति, आर्जव, अनुभवी उपलब्धि, ध्यान और इष्ट के निर्देशन पर जिसमें चलने की क्षमता है, वही ब्राह्मण की अवस्था है। राजर्षि क्षत्रिय में ऋद्धियों-सिद्धियों का संचार, शौर्य, स्वामीभाव, पीछे न हटने का स्वभाव रहता है। इस योगस्तर पर पहुँचे हुए योगी तो पार होते ही हैं, उनके लिये क्या कहना है? अतः अर्जुन ! तू सुखरहित, क्षणभंगुर इस मनुष्य- शरीर को प्राप्त होकर मेरा ही भजन कर। इस नश्वर शरीर के ममत्व, पोषण में समय नष्ट न कर। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने यहाँ चौथी बार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की चर्चा की। अध्याय दो में उन्होंने कहा कि क्षत्रिय के लिये युद्ध से बढ़कर कल्याण का कोई रास्ता नहीं है। अध्याय तीन में उन्होंने कहा कि स्वधर्म में निधन भी श्रेयतर है। अध्याय चार में उन्होंने संक्षेप में बताया कि चार वर्णों की रचना मैंने की। तो क्या मनुष्यों को चार जातियों में बाँटा? बोले, नहीं 'गुणकर्म विभागशः'- गुण के पैमाने से कर्म को चार श्रेणियों में रखा। श्रीकृष्ण के अनुसार, कर्म एकमात्र यज्ञ की प्रक्रिया है। अतः इस यज्ञ को करनेवाले चार प्रकार के हैं। प्रवेशकाल में वह यज्ञकर्त्ता शूद्र है, अल्पज्ञ है। कुछ करने की क्षमता आयी, आत्मिक सम्पत्ति का संग्रह हुआ तो वही यज्ञकर्त्ता वैश्य बन गया। इससे उन्नत होने पर प्रकृति के तीनों गुणों को काटने की क्षमता आ जाने पर वही साधक क्षत्रिय श्रेणी का है और जब इसी साधक के स्वभाव में ब्रह्म में प्रवेश दिलानेवाली योग्यताएँ ढल जाती हैं तो वही ब्राह्मण है। वैश्य एवं शूद्र की अपेक्षा क्षत्रिय और ब्राह्मण श्रेणी के साधक प्राप्ति के अधिक समीप हैं।

नवम अध्याय २०९ शूद्र और वैश्य भी उसी ब्रह्म में प्रवेश पाकर शान्त होंगे, फिर इसके आगे की अवस्थावालों के लिये तो कहना ही क्या है। उनके लिये तो निश्चित ही है। गीता, जिसका विस्तार वेद और अन्य उपनिषद् जिनमें ब्रह्मविदुषी महिलाओं के आख्यान भरे पड़े हैं, तथाकथित धर्मभीरु, रूढ़िवादी वेदाध्ययन के अधिकार-अनधिकार की व्यवस्था देने में माथापच्ची करते रहें लेकिन योगेश्वर श्रीकृष्ण का स्पष्ट उद्घोष है कि यज्ञार्थ कर्म की निर्धारित क्रिया में स्त्री-पुरुष सभी प्रवेश ले सकते हैं। अब वे भजन की धारणा पर प्रोत्साहन देते हैं- मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः।।३४।। अर्जुन! मेरे में ही मनवाला हो। सिवाय मेरे दूसरे भाव मन में न आने पायें। मेरा अनन्य भक्त हो, अनवरत चिन्तन में लग। श्रद्धासहित मेरा ही निरन्तर पूजन कर और मेरे को ही नमस्कार कर। इस प्रकार मेरी शरण हुआ, आत्मा को मुझमें एकीभाव से स्थित कर तू मुझे ही प्राप्त होगा अर्थात् मेरे साथ एकता प्राप्त करेगा। निष्कर्ष- इस अध्याय के आरम्भ में श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! तुझ दोषरहित भक्त के लिए मैं इस ज्ञान को विज्ञानसहित कहूँगा, जिसे जानकर कुछ भी जानना शेष नहीं रहेगा। इसे जानकर तू संसार-बन्धन से छूट जायेगा। यह ज्ञान सम्पूर्ण विद्याओं का राजा है। विद्या वह है जो परब्रह्म में प्रवेश दिलाये। यह ज्ञान उसका भी राजा है अर्थात् निश्चित कल्याण करनेवाला है। यह सम्पूर्ण गोपनीयों का भी राजा है, गोपनीय वस्तु को भी प्रत्यक्ष करनेवाला है। यह प्रत्यक्ष फलवाला, साधन करने में सुगम और अविनाशी है। इसका थोड़ा भी साधन आप से पार लग जाय तो इसका कभी नाश नहीं होता वरन् इसके प्रभाव से वह परमश्रेय तक पहुँच जाता है; किन्तु इसमें एक शर्त है। श्रद्धाविहीन पुरुष परमगति को प्राप्त न होकर संसार-चक्र में भटकता है।

२१० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता योगेश्वर श्रीकृष्ण ने योग के ऐश्वर्य पर भी प्रकाश डाला। दुःख के संयोग का वियोग ही योग है अर्थात् जो संसार के संयोग-वियोग से सर्वथा रहित है, उसका नाम योग है। परमतत्त्व परमात्मा के मिलन का नाम योग है। परमात्मा की प्राप्ति ही योग की पराकाष्ठा है। जो इसमें प्रवेश पा गया, उस योगी के प्रभाव को देख कि सम्पूर्ण भूतों का स्वामी और जीवधारियों का पोषण करनेवाला होने पर भी मेरा आत्मा उन भूतों में स्थित नहीं है। मैं आत्मस्वरूप में स्थित हूँ। वही हूँ। जैसे आकाश से उत्पन्न सर्वत्र विचरनेवाला वायु आकाश में ही स्थित है किन्तु उसे मलिन नहीं कर पाता, उसी प्रकार सम्पूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं लेकिन मैं उनमें लिप्त नहीं हूँ। अर्जुन ! कल्प के आदि में मैं भूतों को विशेष प्रकार से रचता हूँ, सजाता हूँ और कल्प के पूर्तिकाल में सम्पूर्ण भूत मेरी प्रकृति को अर्थात् योगारूढ़ महापुरुष की रहनी को, उनके अव्यक्त भाव को प्राप्त होते हैं। यद्यपि महापुरुष प्रकृति से परे है; किन्तु प्राप्ति के पश्चात् स्वभाव अर्थात् स्वयं में स्थित रहते हुए लोकसंग्रह के लिए जो कार्य करता है, वह उसकी एक रहनी है। इसी रहनी के कार्य-कलाप को उस महापुरुष की प्रकृति कहकर सम्बोधित किया गया है। एक रचयिता तो मैं हूँ, जो भूतों को कल्प के लिये प्रेरित करता हूँ और दूसरी रचयिता त्रिगुणमयी प्रकृति है, जो मेरे अध्यास से चराचरसहित भूतों को रचती है। यह भी एक कल्प है, जिसमें शरीर-परिवर्तन, स्वभाव-परिवर्तन और काल-परिवर्तन निहित है। गोस्वामी तुलसीदास जी भी यही कहते हैं- एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा।। ( रामचरितमानस, ३/१४/५ ) प्रकृति के दो भेद विद्या और अविद्या हैं। इनमें अविद्या दुष्ट है, दुःखरूप है जिससे विवश जीव भवकूप में पड़ा है, जिससे प्रेरित होकर जीव काल, कर्म, स्वभाव और गुण के घेरे में आ जाता है। दूसरी है विद्यामाया, जिसे श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं रचता हूँ। गोस्वामी जी के अनुसार प्रभु रचते हैं-

नवम अध्याय २११ एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें।। ( रामचरितमानस, ३/१४/६ ) यह जगत् की रचना करती है, जिसके आश्रित गुण हैं। कल्याणकारी गुण एकमात्र ईश्वर में है। प्रकृति में गुण हैं ही नहीं, वह तो नश्वर है; लेकिन विद्या में प्रभु ही प्रेरक बनकर करते हैं। इस प्रकार कल्प दो प्रकार के हैं। एक तो वस्तु का, शरीर और काल का परिवर्तन कल्प है। यह परिवर्तन प्रकृति ही मेरे आभास से करती है। किन्तु इससे महान् कल्प जो आत्मा को निर्मल स्वरूप प्रदान करता है, उसका श्रृंगार महापुरुष करते हैं। वे अचेत भूतों को सचेत करते हैं। भजन का आदि ही इस कल्प का आरम्भ है और भजन की पराकाष्ठा कल्प का अन्त है। जब यह कल्प भवरोग से पूर्ण नीरोग बनाकर शाश्वत ब्रह्म में प्रवेश (स्थिति) दिला देता है, उस प्रवेशकाल में योगी मेरी रहनी और मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है। प्राप्ति के पश्चात् महापुरुष की रहनी ही उसकी प्रकृति है। धर्मग्रन्थों में कथानक मिलते हैं कि चारों युग बीतने पर ही कल्प पूर्ण होता है, महाप्रलय होता है। प्रायः लोग इसे यथार्थ नहीं समझते। युग का अर्थ है दो। आप अलग हैं, आराध्य अलग है तब तक युगधर्म रहेंगे। गोस्वामी जी ने रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में इसकी चर्चा की है। जब तामसी गुण कार्य करते हैं, रजोगुण अल्प मात्रा में है, चारों ओर वैर-विरोध है, ऐसा व्यक्ति कलियुगीन है। वह भजन नहीं कर पाता; किन्तु साधन प्रारम्भ होने पर युग- परिवर्तन हो जाता है। रजोगुण बढ़ने लगता है, तमोगुण क्षीण हो चलता है, कुछ सत्त्वगुण भी स्वभाव में आ जाते हैं, हर्ष और भय की दुविधा लगी रहती है तो वही साधक द्वापर की अवस्था में आ जाता है। क्रमशः सत्त्वगुण का बाहुल्य होने पर रजोगुण स्वल्प रह जाता है, आराधना-कर्म में रति हो जाती है, ऐसे त्रेतायुग में त्याग की स्थितिवाला साधक अनेकों यज्ञ करता है। ‘यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि’- यज्ञ-श्रेणीवाला जप, जिसका उतार-चढ़ाव श्वास- प्रश्वास पर है, उसे करने की क्षमता रहती है। जब मात्र सत्त्वगुण शेष रहा, विषमता खो गयी, समता आ गयी, यह कृतयुग अर्थात् कृतार्थ युग अथवा

२१२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता सत्ययुग का प्रभाव है। उस समय सब योगी विज्ञानी होते हैं, ईश्वर से मिलनेवाले होते हैं, स्वाभाविक ध्यान पकड़ने की उनमें क्षमता रहती है। विवेकीजन युगधर्मों का उतार-चढ़ाव मन में समझते हैं। मन के निरोध के लिये अधर्म का परित्याग कर धर्म में प्रवृत्त हो जाते हैं। निरुद्ध मन का भी विलय हो जाने पर युगों के साथ-साथ कल्प का भी अन्त हो जाता है। पूर्णता में प्रवेश दिलाकर कल्प भी शान्त हो जाता है। यही प्रलय है, जब प्रकृति पुरुष में विलीन हो जाती है। इसके पश्चात् महापुरुष की जो रहनी है वही उसकी प्रकृति है, उसका स्वभाव है। योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- अर्जुन! मूढ़लोग मुझे नहीं जानते। मुझ ईश्वरों के ईश्वर को भी तुच्छ समझते हैं, साधारण मनुष्य मानते हैं। प्रत्येक महापुरुष के साथ यह विडम्बना रही है कि तत्कालीन समाज ने उनकी उपेक्षा की, उनका डटकर विरोध हुआ। श्रीकृष्ण भी इसके अपवाद नहीं थे। वे कहते हैं- मैं परमभाव में स्थित हूँ; किन्तु शरीर मेरा भी मनुष्य का ही है, अतः मूढ़ पुरुष मुझे तुच्छ कहकर, मनुष्य कहकर सम्बोधित करते हैं। ऐसे लोग व्यर्थ आशावाले हैं, व्यर्थ कर्मवाले हैं, व्यर्थ ज्ञानवाले हैं कि कुछ भी करें और कह दें कि हम तो कामना नहीं करते, हो गये निष्काम कर्मयोगी। वे आसुरी स्वभाववाले मुझे नहीं परख पाते; किन्तु दैवी सम्पद् को प्राप्त जन अनन्य भाव से मेरा ध्यान करते हैं, मेरे गुणों का निरन्तर चिन्तन करते हैं। अनन्य उपासना अर्थात् यज्ञार्थ कर्म के दो ही मार्ग हैं। पहला है ज्ञानमार्ग अर्थात् अपने भरोसे, अपनी शक्ति को समझकर उसी नियत कर्म में प्रवृत्त होना और दूसरी विधि स्वामी-सेवक भावना की है, जिसमें सद्गुरु के प्रति समर्पित होकर वही कर्म किया जाता है। इन्हीं दो दृष्टियों से लोग मुझे उपासते हैं; किन्तु उनके द्वारा जो पार लगता है वह यज्ञ, वह हवन, वह कर्त्ता, श्रद्धा और औषधि- जिससे भवरोग की चिकित्सा होती है, मैं ही हूँ। अन्त में जो गति प्राप्त होती है, वह गति भी मैं ही हूँ। इसी यज्ञ को लोग ‘त्रैविद्या:’- प्रार्थना, यजन और समत्व दिलानेवाली विधियों से सम्पादित करते हैं; किन्तु बदले में स्वर्ग की कामना करते हैं तो मैं

नवम अध्याय २१३ स्वर्ग भी देता हूँ। उसके प्रभाव से वे इन्द्रपद प्राप्त कर लेते हैं, दीर्घकाल तक उसे भोगते हैं; किन्तु पुण्य क्षीण होने पर वे पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं। उनकी क्रिया सही थी; किन्तु भोगों की कामना रहने पर पुनर्जन्म पाते हैं। अतः भोगों की कामना नहीं करनी चाहिये। जो अनन्य भाव से अर्थात् ‘मेरे सिवाय दूसरा है ही नहीं’- ऐसे भाव से जो निरन्तर मेरा चिन्तन करते हैं, लेशमात्र भी त्रुटि न रह जाय- ऐसे जो भजते हैं, उनके योग की सुरक्षा का भार मैं अपने हाथ में ले लेता हूँ। इतना होने पर भी कुछ लोग अन्य देवताओं की पूजा करते हैं। वे भी मेरी ही पूजा करते हैं; किन्तु वह मेरी प्राप्ति की विधि नहीं है। वे सम्पूर्ण यज्ञों के भोक्ता के रूप में मुझे नहीं जानते अर्थात् उनकी पूजा के परिणाम में मैं नहीं मिलता, इसीलिये उनका पतन हो जाता है। वे देवता, भूत अथवा पितरों के कल्पित रूप में निवास करते हैं, जबकि मेरा भक्त साक्षात् मुझमें निवास करता है, मेरा ही स्वरूप हो जाता है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इस यज्ञार्थ कर्म को अत्यन्त सुगम बताया कि कोई फल-फूल या जो भी श्रद्धा से देता है, उसे मैं स्वीकार करता हूँ। अतः अर्जुन ! तू जो कुछ आराधना करता है, मुझे समर्पित कर। जब सर्वस्व का न्यास हो जायेगा, तब योग से युक्त हुआ तू कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जायेगा और वह मुक्ति मेरा ही स्वरूप है। दुनिया में सब प्राणी मेरे ही हैं। किसी भी प्राणी से न मुझे प्रेम है न द्वेष, मैं तटस्थ हूँ; किन्तु जो मेरा अनन्य भक्त है, मैं उसमें हूँ और वह मुझमें है। अत्यन्त दुराचारी, जघन्यतम पापी ही कोई क्यों न हो, फिर भी अनन्य श्रद्धा- भक्ति से मुझे भजता है तो वह साधु मानने योग्य है। उसका निश्चय स्थिर है तो वह शीघ्र ही परम से संयुक्त हो जाता है और सदा रहनेवाली परमशान्ति को प्राप्त होता है। यहाँ श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि धार्मिक कौन है। सृष्टि में जन्म लेनेवाला कोई भी प्राणी अनन्य भाव से एक परमात्मा को भजता है, उसका चिन्तन करता है तो वह शीघ्र ही धार्मिक हो जाता है। अतः धार्मिक वह है, जो एक परमात्मा का सुमिरन करता है। अन्त में आश्वासन देते हैं- अर्जुन ! मेरा

२१४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता भक्त कभी नष्ट नहीं होता। कोई शूद्र हो, नीच हो, आदिवासी हो या अनादिवासी या कुछ भी नामधारी हो, पुरुष अथवा स्त्री हो अथवा पापयोनि, तिर्यक् योनिवाला भी जो हो, मेरी शरण होकर परमश्रेय को प्राप्त होता है। इसलिये अर्जुन! सुखरहित, क्षणभंगुर किन्तु दुर्लभ मनुष्य-शरीर को पाकर मेरा भजन कर। फिर तो जो ब्रह्म में प्रवेश दिलानेवाली अर्हताओं से युक्त है, उस ब्राह्मण तथा जो राजर्षित्व के स्तर से भजनेवाला है, ऐसे योगी के लिये कहना ही क्या है? वह तो पार ही है। अतः अर्जुन! निरन्तर मुझमें मनवाला हो, निरन्तर नमस्कार कर। इस प्रकार मेरी शरण हुआ तू मुझे ही प्राप्त होगा, जहाँ से पीछे लौटकर नहीं आना पड़ता। प्रस्तुत अध्याय में उस विद्या पर प्रकाश डाला गया, जिसे श्रीकृष्ण स्वयं जागृत करते हैं। यह राजविद्या है, जो एक बार जागृत होने पर निश्चित कल्याण करती है। अतः- ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे 'राजविद्याजागृति' नाम नवमोऽध्यायः॥९॥ इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के सम्वाद में 'राजविद्या-जागृति' नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण होता है। इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते श्रीमद्भगवद्गीतायाः 'यथार्थगीता' भाष्ये 'राजविद्याजागृति' नाम नवमोऽध्यायः॥९॥ इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत 'श्रीमद्भगवद्गीता' के भाष्य 'यथार्थ गीता' में 'राजविद्या-जागृति' नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण होता है। ॥हरिः ॐ तत्सत्॥

दशमोऽध्यायः विभूति वर्णन

॥ ॐ श्री परमात्मने नमः॥ ॥ अथ दशमोऽध्यायः ॥ गत अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गुप्त राजविद्या का चित्रण किया, जो निश्चित ही कल्याण करती है। इस अध्याय में उनका कथन है- महाबाहु अर्जुन! मेरे परम रहस्ययुक्त वचन को फिर भी सुन। यहाँ उसी को दूसरी बार कहने की आवश्यकता क्या है? वस्तुतः साधक को पूर्तिपर्यन्त खतरा है। ज्यों-ज्यों वह स्वरूप में ढलता जाता है, प्रकृति के आवरण सूक्ष्म होते जाते हैं, नये-नये दृश्य आते हैं। उसकी जानकारी महापुरुष ही देते रहते हैं। वह नहीं जानता। यदि वे मार्गदर्शन करना बन्द कर दें तो साधक स्वरूप की उपलब्धि से वंचित रहेगा। जब तक वह स्वरूप से दूर है, तब तक सिद्ध है कि प्रकृति का कोई-न-कोई आवरण बना है। फिसलने-लड़खड़ाने की सम्भावना बनी रहती है। अर्जुन शरणागत शिष्य है। उसने कहा- 'शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।'- भगवन्! मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण हूँ, मुझे सँभालिये। अतः उसके हित की कामना से योगेश्वर श्रीकृष्ण पुनः बोले- श्रीभगवानुवाच भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः। यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया।।१।। महाबाहु अर्जुन! मेरे परम प्रभावयुक्त वचन को पुनः सुन, जो मैं तुझ अतिशय प्रेम रखनेवाले के हित की इच्छा से कहूँगा। न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः। अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः।।२।। अर्जुन! मेरी उत्पत्ति को न देवता लोग जानते हैं और न महर्षिगण ही जानते हैं। श्रीकृष्ण ने कहा था, 'जन्म कर्म च मे दिव्यम्'- मेरा वह जन्म और कर्म अलौकिक है, इन चर्मचक्षुओं से देखा नहीं जा सकता। इसलिये मेरे

२१६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता उस प्रकट होने को देव और महर्षि स्तर तक पहुँचे हुए लोग भी नहीं जानते। मैं सब प्रकार से देवताओं और महर्षियों का आदि कारण हूँ। यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्। असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते।।३।। जो मुझ जन्म-मृत्यु से रहित, आदि-अन्त से रहित सब लोकों के महान् ईश्वर को साक्षात्कारसहित विदित कर लेता है, वह पुरुष मरणधर्मा मनुष्यों में ज्ञानवान् है अर्थात् अज, अनादि और सर्वलोक महेश्वर को भली प्रकार जानना ही ज्ञान है और ऐसा जाननेवाला सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है, पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह उपलब्धि भी मेरी ही देन है। बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः। सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च।।४।। अर्जुन! निश्चयात्मिका बुद्धि, साक्षात्कारसहित जानकारी, लक्ष्य में विवेकपूर्वक प्रवृत्ति, क्षमा, शाश्वत सत्य, इन्द्रियों का दमन, मन का शमन, अन्तःकरण की प्रसन्नता, चिन्तन-पथ के कष्ट, परमात्मा की जागृति, स्वरूप के प्राप्तिकाल में सर्वस्व का विलय, इष्ट के प्रति अनुशासनात्मक भय और प्रकृति से निर्भयता तथा- अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः। भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः।।५।। अहिंसा अर्थात् अपने आत्मा को अधोगति में न पहुँचाने का आचरण, समता- जिसमें विषमता न हो, सन्तोष, तप- मनसहित इन्द्रियों को लक्ष्य के अनुरूप तपाना, दान अर्थात् सर्वस्व का समर्पण, भगवत्पथ में मान-अपमान का सहन- इस प्रकार प्राणियों के उपर्युक्त भाव मुझसे ही होते हैं। ये सभी भाव दैवी चिन्तन-पद्धति के लक्षण हैं। इनका अभाव ही आसुरी सम्पद् है। महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा। मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः।।६।।

दशम अध्याय २१७ सप्तर्षि अर्थात् योग की सात क्रमिक भूमिकाएँ (शुभेच्छा, सुविचारणा, तनुमानसी, सत्त्वापत्ति, असंसक्ति, पदार्थभावना और तुर्यगा) तथा इनके अनुरूप अन्तःकरण चतुष्टय (मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार), इसके अनुरूप मन जो मेरे में भाववाला है- यह सब मेरे ही संकल्प से (मेरी प्राप्ति के संकल्प से तथा जो मेरी ही प्रेरणा से होते हैं। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं) उत्पन्न होते हैं। इस संसार में ये (सम्पूर्ण दैवी सम्पद्) इन्हीं की प्रजा है। क्योंकि सप्त भूमिकाओं के संचार में 'दैवी सम्पद्' ही है, अन्य नहीं। एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः। सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः॥७॥ जो पुरुष योग की और मेरी उपर्युक्त विभूतियों को साक्षात्कार के साथ जानता है, वह स्थिर ध्यानयोग द्वारा मुझमें एकीभाव से स्थित होता है। इसमें कुछ भी संशय नहीं है। जिस प्रकार वायुरहित स्थान में रखे दीपक की लौ सीधी जाती है, कम्पन नहीं होता, योगी के जीते हुए चित्त की यही परिभाषा है। प्रस्तुत श्लोक में 'अविकम्पेन' शब्द इसी आशय की ओर संकेत करता है। अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते। इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥८॥ मैं सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति का कारण हूँ, मुझसे ही सम्पूर्ण जगत् चेष्टा करता है- इस प्रकार मानकर श्रद्धा और भक्ति से युक्त विवेकीजन मेरा निरन्तर भजन करते हैं। तात्पर्य यह है कि योगी द्वारा मेरे अनुरूप जो प्रवृत्ति होती है, उसे मैं ही किया करता हूँ। वह मेरा ही प्रसाद है। (कैसे है? इसे पीछे स्थान-स्थान पर बताया जा चुका है।) वे निरन्तर भजन किस प्रकार करते हैं? इस पर कहते हैं- मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्। कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥९॥ अन्य किसी को स्थान न देकर मुझमें ही निरन्तर चित्त को लगानेवाले, मुझमें ही प्राणों को लगानेवाले सदैव परस्पर मेरी प्रक्रियाओं का बोध करते हैं। मेरा गुणगान करते हुए ही सन्तुष्ट होते हैं तथा निरन्तर मुझमें ही रमण करते हैं।

२१८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥१०॥ निरन्तर मेरे ध्यान में लगे हुए तथा प्रेमपूर्वक भजनेवाले उन भक्तों को मैं वह बुद्धियोग अर्थात् योग में प्रवेशवाली बुद्धि देता हूँ, जिससे वे मुझे प्राप्त होते हैं अर्थात् योग की जागृति ईश्वर की देन है। वह अव्यक्त पुरुष ‘महापुरुष’ योग में प्रवेश दिलानेवाली बुद्धि कैसे देता है?– तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥११॥ उनके ऊपर पूर्ण अनुग्रह करने के लिये मैं उनकी आत्मा से अभिन्न खड़ा होकर, रथी होकर अज्ञान से उत्पन्न हुए अन्धकार को ज्ञानरूपी दीपक के द्वारा प्रकाशित कर नष्ट करता हूँ। वस्तुतः किसी स्थितप्रज्ञ योगी द्वारा जब तक वह परमात्मा आपके आत्मा से ही जाग्रत होकर पल-पल पर संचालन नहीं करता, रोकथाम नहीं करता, इस प्रकृति के द्वन्द्व से निकालते हुए स्वयं आगे नहीं ले चलता, तब तक वास्तव में यथार्थ भजन आरम्भ ही नहीं होता। वैसे तो भगवान् सर्वत्र से बोलने लगते हैं, लेकिन प्रारम्भ में वे स्वरूपस्थ महापुरुष द्वारा ही बोलते हैं। यदि ऐसा महापुरुष आपको प्राप्त नहीं है तो वे स्पष्ट नहीं बोलेंगे। इष्ट, सद्गुरु अथवा परमात्मा का रथी होना एक ही बात है। साधक की आत्मा से जागृत हो जाने पर उनके निर्देश चार प्रकार से मिलते हैं। पहले स्थूलसुरा-सम्बन्धी अनुभव होता है। आप चिन्तन में बैठे हैं। कब आपका मन लगनेवाला है? कितनी सीमा तक लग गया है? कब मन भागना चाहता है और कब भाग गया? इसको हर मिनट-सेकेण्ड पर इष्ट अंग-स्पंदन से संकेत करते हैं। अंगों का फड़कना स्थूलसुरा-सम्बन्धी अनुभव है, जो एक पल में दो-चार स्थानों पर एक साथ आता है और विचारों के विकृत हो जाने पर मिनट-मिनट पर आने लगेगा। यह संकेत तभी आता है, जब इष्ट के स्वरूप को आप अनन्य भाव से पकड़ें अन्यथा साधारण जीवों में संस्कार के टकराव से अंग-स्पन्दन होते रहते हैं, जिनका इष्टवालों से कोई सम्पर्क नहीं है।

दशम अध्याय २१९ दूसरा अनुभव स्वप्नसुरा-सम्बन्धी होता है। साधारण मनुष्य अपनी वासनाओं से सम्बन्धित स्वप्न देखता है; किन्तु जब आप इष्ट को पकड़ लेंगे तो यह सपना भी निर्देश में बदल जाता है। योगी सपना नहीं देखता, होनी देखता है। उपर्युक्त दोनों अनुभव प्रारम्भिक हैं, किसी तत्त्वस्थित महापुरुष के सान्निध्य से, मन में उनके प्रति श्रद्धा रखने मात्र से, उनकी टूटी-फूटी सेवा से भी जागृत हो जाते हैं; किन्तु इन दोनों से भी सूक्ष्म शेष दो अनुभव क्रियात्मक हैं, जिन्हें चलकर ही देखा जा सकता है। तीसरा अनुभव सुषुप्ति सुरा-सम्बन्धी होता है। संसार में सब सोते ही तो हैं। मोहनिशा में सभी अचेत पड़े हैं। रात-दिन जो कुछ करते हैं, स्वप्न ही तो है। यहाँ सुषुप्ति का शुद्ध अर्थ है, जब परमात्मा के चिन्तन की ऐसी डोरी लग जाय कि सुरत (ख्याल) एकदम स्थिर हो जाय, शरीर जागता रहे और मन सुप्त हो जाय। ऐसी अवस्था में वह इष्टदेव फिर अपना एक संकेत देंगे। योग की अवस्था के अनुरूप एक रूपक (दृश्य) आता है जो सही दिशा प्रदान करता है, भूत-भविष्य से अवगत कराता है। ‘पूज्य महाराज जी’ कहा करते थे कि डाक्टर जैसे बेहोशी की दवा देकर, उचित उपचार देकर होश में लाता है ऐसे ही भगवान बता देते हैं। चौथा और अन्तिम अनुभव समसुरा-सम्बन्धी है। जिसमें सुरत लगायी थी, उस परमात्मा से समत्व प्राप्त हो गया। उसके बाद उठते-बैठते, चलते- फिरते सर्वत्र से उसे अनुभूति होने लगती है। ऐसा योगी त्रिकालज्ञ होता है। यह अनुभव तीनों कालों से परे अव्यक्त स्थितिवाले महापुरुष आत्मा से जागृत होकर अज्ञानजनित अन्धकार को ज्ञानदीप से नष्ट करके करते हैं। इस पर अर्जुन ने प्रश्न किया- अर्जुन उवाच परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्। पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्॥१२॥ आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा। असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे॥१३॥

२२० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता भगवन्! आप परमब्रह्म, परमधाम तथा परमपवित्र हैं; क्योंकि आपको सभी ऋषिगण सनातन, दिव्यपुरुष, देवों का भी आदिदेव, अजन्मा और सर्वव्यापी कहते हैं। परमपुरुष, परमधाम का ही पर्याय दिव्यपुरुष, अजन्मा आदि शब्द हैं। देवर्षि नारद, असित, देवल, व्यास तथा स्वयं आप भी मुझसे वही कहते हैं। अर्थात् पहले भूतकालीन महर्षि कहते हैं, अब वर्तमान में जिनकी संगत उपलब्ध है- नारद, देवल, असित और व्यास का नाम लिया, जो अर्जुन के समकालीन थे (सत्पुरुषों की संगति अर्जुन को प्राप्त थी), आप भी वही कहते हैं। अतः- सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव। न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः॥१४॥ हे केशव! जो कुछ भी आप मेरे लिये कह रहे हैं, वह सब मैं सत्य मानता हूँ। आपके व्यक्तित्व को न देवता और न दानव ही जानते हैं। स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम। भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते॥१५॥ हे भूतों को उत्पन्न करनेवाले! हे भूतों के ईश्वर! हे देवदेव! हे जगत् के स्वामी! हे पुरुषों में उत्तम! स्वयं आप ही अपने को जानते हैं अथवा जिसकी आत्मा में जागृत होकर आप जना देते हैं, वही जानता है। यह भी आपके द्वारा आपका जानना हुआ। इसलिये- वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः। याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि॥१६॥ आप ही अपनी उन दिव्य विभूतियों को सम्पूर्ण रूप से, लेशमात्र भी शेष न रखकर कहने में सक्षम हैं, जिन विभूतियों द्वारा आप इन सब लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं। कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्। केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया॥१७॥ हे योगिन्! (श्रीकृष्ण एक योगी थे) मैं किस प्रकार निरन्तर चिन्तन करता हुआ आपको जानूँ और हे भगवन्! मैं किन-किन भावों द्वारा आपका स्मरण करूँ?

दशम अध्याय २२१ विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन। भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्॥१८॥ हे जनार्दन! अपनी योगशक्ति को और योग की विभूति को फिर भी विस्तारपूर्वक कहिये। संक्षेप में तो इसी अध्याय के आरम्भ में कहा ही है पुनः कहिये; क्योंकि अमृत-तत्त्व को दिलानेवाले इन वचनों को सुनने से मेरी तृप्ति नहीं होती। रामचरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं।। (रामचरितमानस, ७/५२/१) जब तक प्रवेश नहीं मिल जाता तब तक उस अमृत-तत्त्व को जानने की पिपासा बनी रहती है। प्रवेश से पूर्व रास्ते में ही यह सोचकर कोई बैठ गया कि बहुत जान लिया तो उसने नहीं जाना। सिद्ध है कि उसका मार्ग अवरुद्ध होना चाहता है। इसलिये साधक को पूर्तिपर्यन्त इष्ट के निर्देशन को पकड़ते रहना चाहिये और उसे आचरण में ढालना चाहिये। अर्जुन की उक्त जिज्ञासा पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- श्रीभगवानुवाच हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः। प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे।।१९।। कुरुश्रेष्ठ अर्जुन! अब मैं अपनी दिव्य विभूतियों को, उनमें से प्रमुख विभूतियों को तुझसे कहूँगा; क्योंकि मेरी विभूतियों के विस्तार का अन्त नहीं है। अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च।।२०।। अर्जुन! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ तथा सम्पूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अन्त भी मैं ही हूँ अर्थात् जन्म, मृत्यु और जीवन भी मैं ही हूँ।

२२२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्। मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥२१॥ मैं अदिति के बारह पुत्रों में विष्णु और ज्योतियों में प्रकाशमान सूर्य हूँ। वायु के भेदों में मैं मरीचि नामक वायु और नक्षत्रों में चन्द्रमा हूँ। वेदानां सामवेदोऽस्मि देवाना मस्मि वासवः। इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥२२॥ वेदों में मैं सामवेद अर्थात् पूर्ण समत्व दिलानेवाला गायन हूँ। देवों में मैं उनका अधिपति इन्द्र हूँ और इन्द्रियों में मन हूँ; क्योंकि मन के निग्रह से ही मैं जाना जाता हूँ तथा प्राणियों में मैं उनकी चेतना हूँ। रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्। वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्॥२३॥ एकादश रुद्रों में मैं शंकर हूँ। शङ्क अरः स शंकरः अर्थात् शंकाओं से उपराम