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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

DevanagariHindipublished429 पृष्ठ

२७८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्। विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति।।२७।। जो पुरुष विशेष रूप से नष्ट होते हुए चराचर सभी भूतों में नाशरहित परमेश्वर को समभाव से स्थित देखता है, वही यथार्थ देखता है। अर्थात् उस प्रकृति के विशेष रूप से नष्ट होने पर ही वह परमात्मस्वरूप है, इससे पहले नहीं। इसी पर पीछे अध्याय आठ में भी कहा, ‘भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसञ्ज्ञितः।’- भूतों के वे भाव, जो (भले अथवा बुरे) कुछ भी (संस्कार) संरचना करते हैं, उनका मिट जाना ही कर्म की पराकाष्ठा है। उस समय कर्म पूर्ण है। वही यहाँ भी कहते हैं कि जो चराचर भूतों को नष्ट होते हुए और परमेश्वर को समभाव से स्थित देखता है, वही सही देखता है। समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्। न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्।।२८।। क्योंकि वह पुरुष सर्वत्र समभाव से स्थित परमेश्वर को समान (जैसा है, वैसा ही समान) देखता हुआ अपने द्वारा स्वयं को नष्ट नहीं करता। क्योंकि जैसा था, वैसा उसने देखा इसलिये वह परमगति को प्राप्त होता है। प्राप्तिवाले पुरुष के लक्षण बताते हैं- प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः। यः पश्यति तथात्मानमकर्त्तारं स पश्यति।।२९।। जो पुरुष सम्पूर्ण कर्मों को सब प्रकार से प्रकृति के द्वारा ही किया जाता देखता है अर्थात् जब तक प्रकृति है तभी तक कर्मों का होना देखता है तथा आत्मा को अकर्त्ता देखता है, वही यथार्थ देखता है। यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति। तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा।।३०।। जिस काल में मनुष्य भूतों के न्यारे-न्यारे भावों को एक परमात्मा में प्रवाहित, स्थित देखता है तथा उस परमात्मा से ही सम्पूर्ण भूतों का विस्तार

त्रयोदश अध्याय २७९ देखता है, उस समय वह ब्रह्म को प्राप्त होता है। जिस क्षण यह अवस्था आ गयी, उसी क्षण वह ब्रह्म को प्राप्त होता है। यह लक्षण भी स्थितप्रज्ञ महापुरुष का ही है। अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः । शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते।।३१।। कौन्तेय ! अनादि होने से और गुणातीत होने से यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित होते हुए भी वास्तव में न करता है और न लिप्त ही होता है। किस प्रकार?- यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते। सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते।।३२।। जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त हुआ आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता, ठीक वैसे ही सर्वत्र देह में स्थित हुआ भी आत्मा गुणातीत होने के कारण देह के गुणों से लिप्त नहीं होता। आगे कहते हैं- यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः। क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत।।३३।। अर्जुन ! जिस प्रकार एक ही सूर्य सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है। अन्त में निर्णय देते हैं- क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा। भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्।।३४।। इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को तथा विकारसहित प्रकृति से छूटने के उपाय को जो ज्ञानरूपी नेत्रों द्वारा देख लेते हैं, वे महात्माजन परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं। अर्थात् क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ को देखने की आँख ज्ञान है और ज्ञान साक्षात्कार का ही पर्याय है।

२८० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता निष्कर्ष- गीता के आरम्भ में धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र का नाम तो लिया गया; किन्तु वह क्षेत्र वस्तुतः है कहाँ?- वह स्थल बताना शेष था, जिसे स्वयं शास्त्रकार ने प्रस्तुत अध्याय में स्पष्ट किया- कौन्तेय ! यह शरीर ही एक क्षेत्र है। जो इसको जानता है, वह क्षेत्रज्ञ है। वह इसमें फँसा नहीं बल्कि निर्लेप है। इसका संचालक है। "अर्जुन ! सम्पूर्ण क्षेत्रों में मैं भी क्षेत्रज्ञ हूँ।"- अन्य महापुरुषों से अपनी तुलना की। इससे स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण भी एक योगी थे; क्योंकि जो जानता है वह क्षेत्रज्ञ है, ऐसा महापुरुषों ने कहा है। मैं भी क्षेत्रज्ञ हूँ अर्थात् अन्य महापुरुषों की तरह मैं भी हूँ। उन्होंने क्षेत्र जैसा है, जिन विकारोंवाला है तथा क्षेत्रज्ञ जिन प्रभावोंवाला है, उस पर प्रकाश डाला। मैं ही कहता हूँ- ऐसी बात नहीं है, महर्षियों ने भी यही कहा है। वेद के छन्दों में भी उसी को विभाजित करके दर्शाया गया है। ब्रह्मसूत्र में भी वही मिलता है। शरीर (जो क्षेत्र है) क्या इतना ही है, जितना दिखायी देता है? इसके होने के पीछे जिनका बहुत बड़ा हाथ है, उन्हें गिनाते हुए बताया कि अष्टधा मूल प्रकृति, अव्यक्त प्रकृति, दस इन्द्रियाँ और मन, इन्द्रियों के पाँचों विषय, आशा, तृष्णा और वासना- इस प्रकार इन विकारों का सामूहिक मिश्रण यह शरीर है। जब तक ये रहेंगे, तब तक शरीर किसी-न-किसी रूप में रहेगा ही। यही क्षेत्र है, जिसमें बोया भला-बुरा बीज संस्कार रूप में उगता है। जो इसका पार पा लेता है, वह क्षेत्रज्ञ है। क्षेत्रज्ञ का स्वरूप बताते हुए उन्होंने ईश्वरीय गुणधर्मों पर प्रकाश डाला और कहा कि क्षेत्रज्ञ इस क्षेत्र का प्रकाशक है। उन्होंने बताया कि साधना के पूर्तिकाल में परमतत्त्व परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन ही ज्ञान है। ज्ञान का अर्थ है साक्षात्कार। इसके अतिरिक्त जो कुछ भी है, अज्ञान है। जानने योग्य वस्तु है परात्पर ब्रह्म। वह न सत् है, न असत्- इन दोनों से परे है। उसे जानने के लिये लोग हृदय में ध्यान करते हैं, बाहर मूर्ति

त्रयोदश अध्याय २८१ रखकर नहीं। बहुत से लोग सांख्य-माध्यम से ध्यान करते हैं, तो शेष निष्काम कर्मयोग, समर्पण के साथ उसकी प्राप्ति के लिये उसी निर्धारित कर्म आराधना का आचरण करते हैं। जो उसकी विधि नहीं जानते, वे तत्त्वस्थित महापुरुष के द्वारा सुनकर आचरण करते हैं। वे भी परमकल्याण को प्राप्त हो जाते हैं। अतः कुछ भी समझ में न आये तो उसके ज्ञाता महापुरुष का सत्संग आवश्यक है। स्थितप्रज्ञ महापुरुष के लक्षण बताते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि- जैसे आकाश सर्वत्र सम रहता हुआ भी निर्लेप है, जैसे सूर्य सर्वत्र प्रकाश करते हुए भी निर्लेप है, ठीक इसी प्रकार स्थितप्रज्ञ पुरुष, सर्वत्र सम ईश्वर को जैसा है वैसा ही देखने की क्षमतावाला पुरुष क्षेत्र से अथवा प्रकृति से सर्वथा निर्लेप है। अन्त में उन्होंने निर्णय दिया कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ की जानकारी ज्ञानरूपी नेत्रों द्वारा ही सम्भव है। ज्ञान, जैसा कि पीछे बताया गया, उस परमात्मा के प्रत्यक्ष दर्शन के साथ मिलनेवाली जानकारी है। शास्त्रों को बहुत रटकर दुहराना ज्ञान नहीं बल्कि अध्ययन तथा महापुरुष से उस कर्म को समझकर, उस कर्म पर चलकर मनसहित इन्द्रियों के निरोध और उस निरोध के भी विलयकाल में परमतत्त्व को देखने के साथ जो अनुभूति होती है, उसी अनुभूति का नाम ज्ञान है। क्रिया आवश्यक है। इस अध्याय में मुख्यतः क्षेत्रज्ञ का विस्तार से वर्णन किया गया। वस्तुतः क्षेत्र का स्वरूप व्यापक है। शरीर कहना तो सरल है; किन्तु शरीर का सम्बन्ध कहाँ तक है?, तो समग्र ब्रह्माण्ड मूल प्रकृति का विस्तार है। अनन्त अन्तरिक्षों तक आपके शरीर का विस्तार है। उनसे आपका जीवन ऊर्जस्वी है, उनके बिना आप जी नहीं सकते। यह भूमण्डल, विश्व, जगत्, देश, प्रदेश और आपका यह दिखायी देनेवाला शरीर उस प्रकृति का एक टुकड़ा भी नहीं है। इस प्रकार क्षेत्र का ही इस अध्याय में विस्तार से वर्णन है, अतः- ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगो' नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥१३॥

२८२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्रविषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के सम्वाद में 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग' नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण होता है। इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते श्रीमद्भगवद्गीतायाः 'यथार्थगीता' भाष्ये 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगो' नाम त्रयोदशोऽध्यायः।।१३।। इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत 'श्रीमद्भगवद्गीता' के भाष्य 'यथार्थ गीता' में 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग' नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण होता है। ।। हरिः ॐ तत्सत् ।।

चतुर्दशोऽध्यायः गुणत्रय विभाग योग

।। ॐ श्री परमात्मने नमः ।। ।। अथ चतुर्दशोऽध्यायः ।। पिछले अनेक अध्यायों में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने ज्ञान का स्वरूप स्पष्ट किया। अध्याय ४/१९ में उन्होंने बताया कि जिस पुरुष द्वारा सम्पूर्णता से आरम्भ किया हुआ नियत कर्म का आचरण क्रमशः उत्थान होते-होते इतना सूक्ष्म हो गया कि कामना और संकल्प का सर्वथा शमन हो गया, उस समय जिसे वह जानना चाहता है उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति हो जाती है, उसी अनुभूति का नाम ज्ञान है। तेरहवें अध्याय में ज्ञान को परिभाषित किया, ‘अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।’- आत्मज्ञान में एकरस स्थिति और तत्त्व के अर्थस्वरूप परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन ज्ञान है। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के भेद को विदित कर लेने के साथ ही ज्ञान है। ज्ञान का अर्थ शास्त्रार्थ नहीं, शास्त्रों को याद कर लेना ही ज्ञान नहीं है। अभ्यास की वह अवस्था ज्ञान है, जहाँ वह तत्त्व विदित होता है। परमात्मा के साक्षात्कार के साथ मिलनेवाली अनुभूति का नाम ज्ञान है, इसके विपरीत सब कुछ अज्ञान है। इस प्रकार सब कुछ बता लेने पर भी प्रस्तुत अध्याय चौदह में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं- अर्जुन ! उन ज्ञानों में भी परम उत्तम ज्ञान को मैं फिर भी तेरे लिये कहूँगा। योगेश्वर उसी की पुनरावृत्ति करने जा रहे हैं; क्योंकि ‘सास्त्र सुचिन्तित पुनि पुनि देखिअ।’ (रामचरितमानस, ३/३६/८)- भली प्रकार चिन्तन किया हुआ शास्त्र भी बार-बार देखना चाहिये। इतना ही नहीं, ज्यों-ज्यों आप साधन-पथ पर अग्रसर होंगे, ज्यों-ज्यों उस इष्ट में प्रवेश पाते जायेंगे, त्यों-त्यों ब्रह्म से नवीन-नवीन अनुभूति मिलेगी। यह जानकारी सद्गुरु महापुरुष ही देते हैं, इसलिये श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं फिर भी कहूँगा।

२८४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता सुरति (स्मृति) ऐसा पटल है, जिस पर संस्कारों का अंकन सदैव होता रहता है। यदि पथिक को इष्ट में प्रवेश दिलानेवाली जानकारी धूमिल पड़ती है तो उस स्मृति-पटल पर प्रकृति अंकित होने लगती है, जो विनाश का कारण है। इसलिये पूर्तिपर्यन्त साधक को इष्ट-सम्बन्धी जानकारी दुहराते रहना चाहिये। आज स्मृति जीवन्त है; किन्तु अग्रेतर अवस्थाओं में प्रवेश मिलने के साथ यह अवस्था नहीं रह जायेगी। इसीलिये 'पूज्य महाराज जी' कहा करते थे कि ब्रह्मविद्या का चिन्तन रोज करो, एक माला रोज घुमाओ- जो चिन्तन से घुमायी जाती है, बाहर की माला नहीं। यह तो साधक के लिये है; किन्तु जो वास्तविक सद्गुरु होते हैं वे सतत उस पथिक के पीछे लगे रहते हैं। भीतर उसकी आत्मा से जागृत होकर तथा बाहर अपने क्रिया-कलापों से उसे भविष्य में घटित होनेवाली परिस्थितियों से अवगत कराते चलते हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण भी महापुरुष थे। अर्जुन शिष्य के स्थान पर है। उसने उनसे सँभालने की प्रार्थना की थी। इसलिये योगेश्वर श्रीकृष्ण का कथन है कि ज्ञानों में भी अति उत्तम ज्ञान को मैं पुनः तेरे लिये कहूँगा। श्रीभगवानुवाच परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्। यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः।।१।। अर्जुन ! ज्ञानों में भी अति उत्तम ज्ञान, परमज्ञान को मैं फिर भी तेरे लिये कहूँगा (जिसे पीछे कह चुके हैं), जिसे जानकर सब मुनिजन इस संसार से मुक्त होकर परमसिद्धि को प्राप्त होते हैं (जिसके बाद कुछ भी पाना शेष नहीं रहता)। इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः। सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च।।२।। इस ज्ञान का 'उपाश्रित्य' - नजदीक से आश्रय लेकर, क्रिया से चलकर, पास पहुँचकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए लोग सृष्टि के आदि में पुनः जन्म नहीं

चतुर्दश अध्याय २८५ लेते और प्रलयकाल में अर्थात् शरीरान्त होते समय व्याकुल नहीं होते; क्योंकि महापुरुष के शरीर का अन्त तो उसी दिन हो जाता है, जब वह स्वरूप को प्राप्त होता है। उसके बाद उसका शरीर रहने का एक मकान मात्र रह जाता है। पुनर्जन्म का स्थान कहाँ है, जहाँ लोग जन्म लेते हैं? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं- मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्। सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥३॥ हे अर्जुन! मेरी 'महद्ब्रह्म' अर्थात् अष्टधा मूल प्रकृति सम्पूर्ण भूतों की योनि है और उसमें मैं चेतनरूपी बीज को स्थापित करता हूँ। उस जड़-चेतन के संयोग से सभी भूतों की उत्पत्ति होती है। सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥४॥ कौन्तेय! सब योनियों में जितने शरीर उत्पन्न होते हैं, उन सबकी 'योनि:'- गर्भधारण करनेवाली माता आठ भेदोंवाली मूल प्रकृति है और मैं ही बीज का स्थापन करनेवाला पिता हूँ। अन्य कोई न माता है, न पिता। जब तक जड़- चेतन का संयोग रहेगा, जन्म होते रहेंगे; निमित्त तो कोई-न-कोई बनता ही रहेगा। चेतन आत्मा जड़ प्रकृति में क्यों बँध जाती है? इस पर कहते हैं- सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः। निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥५॥ महाबाहु अर्जुन! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण प्रकृति से उत्पन्न हुए तीनों गुण ही इस अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं। किस प्रकार?- तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्। सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥६॥ निष्पाप अर्जुन! उन तीनों गुणों में प्रकाश करनेवाला निर्विकार सत्त्वगुण तो 'निर्मलत्वात्'- निर्मल होने के कारण सुख और ज्ञान की आसक्ति से

२८६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता आत्मा को शरीर में बाँधता है। सत्त्वगुण भी बन्धन ही है। अन्तर इतना ही है कि सुख एकमात्र परमात्मा में है और ज्ञान साक्षात्कार का नाम है। सत्त्वगुणी तब तक बँधा है, जब तक परमात्मा का साक्षात्कार नहीं हो जाता। रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्। तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ।।७।। हे अर्जुन ! राग का जीता-जागता स्वरूप रजोगुण है। उसे तू 'कर्मसङ्गेन'- कामना और आसक्ति से उत्पन्न हुआ जान। वह जीवात्मा को कर्म और उसके फल की आसक्ति में बाँधता है। वह कर्म में प्रवृत्ति देता है। तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्। प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ।।८।। अर्जुन ! समस्त देहधारियों को मोहनेवाले तमोगुण को तू अज्ञान से उत्पन्न हुआ जान। वह इस जीवात्मा को प्रमाद अर्थात् व्यर्थ की चेष्टा, आलस्य (कि कल करेंगे) और निद्रा के द्वारा बाँधता है। निद्रा का अर्थ यह नहीं है कि तमोगुणी अधिक सोता है। शरीर सोता हो ऐसी बात नहीं। 'या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।' जगत् ही रात्रि है। तमोगुणी व्यक्ति इस जगत्रूपी निशा में रात-दिन व्यस्त रहता है, प्रकाश स्वरूप की ओर अचेत रहता है। यही तमोगुणी निद्रा है। जो इसमें फँसा है, सोता है। अब तीनों गुणों के बन्धन का सामूहिक स्वरूप बताते हैं- सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत। ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ।।९।। अर्जुन ! सत्त्वगुण सुख में लगाता है, शाश्वत परमसुख की धारा में लगाता है, रजोगुण कर्म में प्रवृत्त करता है और तमोगुण ज्ञान को आच्छादित करके प्रमाद में अर्थात् अन्तःकरण की व्यर्थ चेष्टाओं में लगाता है। जब गुण एक ही स्थान पर एक ही हृदय में हैं तो अलग-अलग कैसे विभक्त हो जाते हैं? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण बताते हैं-

चतुर्दश अध्याय २८७ रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत। रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा।।१०।। हे अर्जुन! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण बढ़ता है, वैसे ही सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण बढ़ता है तथा इसी प्रकार रजोगुण और सत्त्वगुण को दबाकर तमोगुण बढ़ता है। यह कैसे पहचाना जाय कि कब और कौन-सा गुण कार्य कर रहा है?- सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते। ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत।।११।। जिस काल में इस शरीर तथा अन्तःकरण और सम्पूर्ण इन्द्रियों में ईश्वरीय प्रकाश और बोधशक्ति उत्पन्न होती है, उस समय ऐसा जानना चाहिये कि सत्त्वगुण विशेष वृद्धि को प्राप्त हुआ है। तथा- लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा। रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ।।१२।। हे अर्जुन! रजोगुण की विशेष वृद्धि होने पर लोभ, कार्य में प्रवृत्त होने की चेष्टा, कर्मों का आरम्भ, अशान्ति अर्थात् मन की चंचलता, विषय-भोगों की लालसा- यह सब उत्पन्न होते हैं। अब तमोगुण की वृद्धि में क्या होता है?- अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च। तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन।।१३।। अर्जुन! तमोगुण के बढ़ने पर ‘अप्रकाशः’- (प्रकाश परमात्मा का द्योतक है) ईश्वरीय प्रकाश की ओर न बढ़ने का स्वभाव, ‘कार्यम् कर्म’- जो करने योग्य प्रक्रिया-विशेष है उसमें अप्रवृत्ति, अन्तःकरण में व्यर्थ की चेष्टाओं का प्रवाह और संसार में मुग्ध करनेवाली प्रवृत्तियाँ- यह सभी उत्पन्न होते हैं। इन गुणों की जानकारी से लाभ क्या है?- यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्। तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते।।१४।।

२८८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता जब यह जीवात्मा सत्त्वगुण के वृद्धिकाल में मृत्यु को प्राप्त होता है, शरीर-त्याग करता है, तब उत्तम कर्म करनेवालों के मलरहित दिव्य लोकों को प्राप्त होता है। तथा- रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते। तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते।।१५।। रजोगुण की वृद्धि होने पर मृत्यु को प्राप्त होनेवाला कर्मों की आसक्तिवाले मनुष्यों में जन्म लेता है तथा तमोगुण की वृद्धि में मरा हुआ पुरुष मूढ़ योनियों में जन्म लेता है, जिसमें कीट-पतंगादिपर्यन्त योनियों का विस्तार है। अतः गुणों में भी मनुष्यों को सात्त्विक गुणोंवाला होना चाहिये। प्रकृति का यह बैंक आपके अर्जित गुणों को मृत्यु के उपरान्त भी उन्हें आपको सुरक्षित लौटाता है। अब देखें इसका परिणाम- कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्। रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्।।१६।। सात्त्विक कर्म का फल सात्त्विक, निर्मल, सुख, ज्ञान और वैराग्यादि कहा गया है। राजस कर्म का फल दुःख और तामस कर्म का फल अज्ञान है। तथा- सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च। प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च।।१७।। सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है (ईश्वरीय अनुभूति का नाम ज्ञान है), ईश्वरीय अनुभूति का प्रवाह होता है। रजोगुण से निःसन्देह लोभ उत्पन्न होता है तथा तमोगुण से प्रमाद, मोह, आलस्य (अज्ञान) ही उत्पन्न होता है। ये उत्पन्न होकर कौन-सी गति देते हैं?- ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः। जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः।।१८।। सत्त्वगुण में स्थित हुआ पुरुष 'ऊर्ध्वमूलम्'- उस मूल परमात्मा की

चतुर्दश अध्याय २८९ ओर प्रवाहित होता है, निर्मल लोकों को जाता है। रजोगुण में स्थित राजस पुरुष मध्यम श्रेणी के मनुष्य होते हैं, जिनके पास न 'सात्त्विकं'- विवेक- वैराग्य ही होता है और न अधम कीट-पतंग योनियों में जाते हैं बल्कि पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं और निन्दित तमोगुण में प्रवृत्त हुए तामस पुरुष 'अधोगतिः' अर्थात् पशु-पक्षी, कीट-पतंगादि अधम योनियों को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार तीनों गुण किसी-न-किसी रूप में योनि के ही कारण हैं। जो पुरुष गुणों को पार कर लेते हैं, वे जन्म-बन्धन से छूट जाते हैं और मेरे स्वरूप को प्राप्त होते हैं। इस पर कहते हैं- नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति। गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति।।१९।। जिस काल में द्रष्टा आत्मा तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्त्ता नहीं देखता और तीनों गुणों से अत्यन्त परे परमतत्त्व को 'वेत्ति'- विदित कर लेता है, उस समय वह पुरुष मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है। यह बौद्धिक मान्यता नहीं है कि गुण गुण में बरतते हैं। साधन करते-करते एक ऐसी अवस्था आती है, जहाँ उस परम से अनुभूति होती है कि गुणों के सिवाय कोई कर्त्ता नहीं दिखता, उस समय पुरुष तीनों गुणों से अतीत हो जाता है। यह कल्पित मान्यता नहीं है। इसी पर आगे कहते हैं- गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्। जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते।।२०।। पुरुष इन स्थूल शरीरों की उत्पत्ति के कारणरूप तीनों गुणों से अतीत होकर जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और सब प्रकार के दुःखों से विशेष रूप से मुक्त होकर अमृत-तत्त्व का पान करता है। इस पर अर्जुन ने प्रश्न किये- अर्जुन उवाच कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो। किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते।।२१।।

२९० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता प्रभो! इन तीनों गुणों से अतीत हुआ पुरुष किन-किन लक्षणों से युक्त होता है और किन प्रकार के आचरणोंवाला होता है तथा मनुष्य किस उपाय से इन तीनों गुणों से अतीत होता है? श्रीभगवानुवाच प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव। न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥२२॥ अर्जुन के उपर्युक्त तीनों प्रश्नों का उत्तर देते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! जो पुरुष सत्त्वगुण के कार्यरूप ईश्वरीय प्रकाश, रजोगुण के कार्यरूप प्रवृत्ति और तमोगुण के कार्यरूप मोह को न तो प्रवृत्त होने पर बुरा समझता है और न निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा ही करता है। तथा- उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते। गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥२३॥ जो इस प्रकार उदासीन के सदृश स्थित हुआ गुणों द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता, गुण गुण में ही बरतते हैं- ऐसा यथार्थतः जानकर उस स्थिति से चलायमान नहीं होता, तभी वह गुणों से अतीत होता है। समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः। तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥२४॥ जो निरन्तर स्वयं में अर्थात् आत्मभाव में स्थित है, सुख और दुःख में सम है, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में भी समान भाववाला है, धैर्यवान् है, जो प्रिय और अप्रिय को बराबर समझता है, अपनी निन्दा तथा स्तुति में भी समान भाववाला है और- मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः। सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते॥२५॥ जो मान और अपमान में सम है, मित्र और शत्रु-पक्ष में भी सम है, वह सम्पूर्ण आरम्भों से रहित हुआ पुरुष गुणातीत कहा जाता है।

चतुर्दश अध्याय २९१ श्लोक बाईस से पचीस तक गुणों से अतीत पुरुष के लक्षण और आचरण बताये गये कि वह चलायमान नहीं होता, गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता, स्थिर रहता है। अब प्रस्तुत है गुणों से अतीत होने की विधि- मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥२६॥ जो पुरुष अव्यभिचारिणी भक्ति द्वारा अर्थात् इष्ट के अतिरिक्त अन्य सांसारिक स्मरणों से सर्वथा रहित होकर योग द्वारा अर्थात् उसी नियत कर्म द्वारा मुझे निरन्तर भजता है, वह इन तीनों गुणों का अच्छी प्रकार उल्लंघन करके परब्रह्म के साथ एक होने के योग्य होता है, जिसका नाम कल्प है। ब्रह्म के साथ एकीभाव हो जाना ही वास्तविक कल्प है। अनन्य भाव से नियत कर्म का आचरण किये बिना कोई भी गुणों से अतीत नहीं होता। अन्त में योगेश्वर निर्णय देते हैं- ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च। शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥२७॥ हे अर्जुन! उस अविनाशी ब्रह्म का (जिसके साथ वह कल्प करता है, जिसमें वह गुणातीत एकीभाव से प्रवेश करता है), अमृत का, शाश्वत-धर्म का और उस अखण्ड एकरस आनन्द का मैं ही आश्रय हूँ अर्थात् परमात्मस्थित सद्गुरु ही इन सबका आश्रय है। श्रीकृष्ण एक योगेश्वर थे। अब यदि आपको अव्यक्त-अविनाशी ब्रह्म, शाश्वत-धर्म, अखण्ड एकरस आनन्द की आवश्यकता है तो किसी तत्त्वस्थित, अव्यक्तस्थित महापुरुष की शरण लें। उनके द्वारा ही यह सम्भव है। निष्कर्ष- इस अध्याय के आरम्भ में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि- अर्जुन! ज्ञानों में भी अति उत्तम परमज्ञान को मैं फिर भी तेरे लिए कहूँगा, जिसे जानकर मुनिजन उपासना के द्वारा मेरे स्वरूप को प्राप्त होते हैं, फिर सृष्टि के आदि में

२९२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता वे जन्म नहीं लेते; किन्तु शरीर का निधन तो होना ही है, उस समय वे व्यथित नहीं होते। वे वास्तव में शरीर तो उसी दिन त्याग देते हैं, जिस दिन स्वरूप को प्राप्त होते हैं। प्राप्ति जीते-जी होती है, किन्तु शरीर का अन्त होते समय भी वे व्यथित नहीं होते। प्रकृति से ही उत्पन्न हुए रज, सत्त्व और तम तीनों गुण ही इस जीवात्मा को शरीरों में बाँधते हैं। दो गुणों को दबाकर तीसरा गुण बढ़ाया जा सकता है। गुण परिवर्तनशील हैं। प्रकृति, जो अनादि है, नष्ट नहीं होती; बल्कि गुणों का प्रभाव टाला जा सकता है। गुण मन पर प्रभाव डालते हैं। जब सत्त्वगुण की वृद्धि रहती है तो ईश्वरीय प्रकाश और बोधशक्ति रहती है। रजोगुण रागात्मक है। उस समय कर्म का लोभ रहता है, आसक्ति रहती है और अन्तःकरण में तमोगुण कार्यरूप लेने पर आलस्य-प्रमाद घेर लेता है। सत्त्व की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त पुरुष ऊपर के निर्मल लोकों में जन्म लेता है। रजोगुण की वृद्धि को प्राप्त हुआ मनुष्य मानवयोनि में ही लौटकर आता है और तमोगुण की वृद्धिकाल में मनुष्य शरीर त्यागकर अधम (पशु, कीट, पतंग इत्यादि) योनि को प्राप्त होता है। इसलिये मनुष्यों को क्रमशः उन्नत गुण सात्त्विक की ओर ही बढ़ना चाहिये। वस्तुतः तीनों गुण किसी-न-किसी योनि के ही कारण हैं। गुण ही आत्मा को शरीरों में बाँधते हैं, इसलिये गुणों से अतीत होना चाहिये। वे जिससे मुक्त होते हैं, उसका स्वरूप बताते हुए योगेश्वर ने कहा- अष्टधा मूल प्रकृति गर्भ को धारण करनेवाली माता है और मैं ही बीजरूप पिता हूँ। अन्य न कोई माता है, न पिता। जब तक यह क्रम रहेगा, तब तक चराचर जगत् में निमित्त रूप से कोई-न-कोई माता-पिता बनते रहेंगे; किन्तु वस्तुतः प्रकृति ही माता है, मैं ही पिता हूँ। अर्जुन ने तीन प्रश्न किये- गुणातीत पुरुष के क्या लक्षण हैं? क्या आचरण हैं? और किस उपाय से मनुष्य इन तीनों गुणों से अतीत होता है? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गुणातीत पुरुष के लक्षण और आचरण बताये और अन्त में गुणातीत होने का उपाय बताया कि जो पुरुष अव्यभिचारिणी भक्ति

चतुर्दश अध्याय २९३ और योग के द्वारा निरन्तर मुझे भजता है, वह तीनों गुणों से अतीत हो जाता है। अन्य किसी का चिन्तन न करते हुए निरन्तर इष्ट का चिन्तन करना अव्यभिचारिणी भक्ति है। जो संसार के संयोग-वियोग से सर्वथा रहित है, उसी का नाम योग है। उसको कार्यरूप देने की प्रणाली का नाम कर्म है। यज्ञ जिससे सम्पन्न होता है, वह हरकत कर्म है। अव्यभिचारिणी भक्ति द्वारा उस नियत कर्म के आचरण से ही पुरुष तीनों गुणों से अतीत होता है और अतीत होकर ब्रह्म के साथ एकीभाव के लिये, पूर्ण कल्प को प्राप्त होने के लिये योग्य होता है। गुण जिस मन पर प्रभाव डालते हैं, उसके विलय होते ही ब्रह्म के साथ एकीभाव हो जाता है, यही वास्तविक कल्प है। अतः बिना भजन किये कोई गुणों से अतीत नहीं होता। अन्त में योगेश्वर श्रीकृष्ण निर्णय देते हैं- वह गुणातीत पुरुष जिस ब्रह्म के साथ एकीभाव में स्थित होता है उस ब्रह्म का, अमृत-तत्त्व का, शाश्वत- धर्म का और अखण्ड एकरस आनन्द का मैं ही आश्रय हूँ अर्थात् प्रधान कर्त्ता हूँ। अब तो श्रीकृष्ण चले गये, अब वह आश्रय तो चला गया, तब तो बड़े संशय की बात है। वह आश्रय अब कहाँ मिलेगा? लेकिन नहीं, श्रीकृष्ण ने अपना परिचय दिया है कि वे एक योगी थे, स्वरूपस्थ महापुरुष थे। ‘शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।’ अर्जुन ने कहा- मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण हूँ, मुझे संभालिये। स्थान-स्थान पर श्रीकृष्ण ने अपना परिचय दिया, स्थितप्रज्ञ महापुरुष के लक्षण बताये और उनसे अपनी तुलना की। अतः स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण एक महात्मा, योगी थे। अब यदि आपको अखण्ड एकरस आनन्द, शाश्वत-धर्म अथवा अमृत-तत्त्व की आवश्यकता है तो इन सबकी प्राप्ति के स्रोत एकमात्र सद्गुरु हैं। सीधे पुस्तक पढ़कर इसे कोई नहीं पा सकता। जब वही महापुरुष आत्मा से अभिन्न होकर रथी हो जाते हैं, तो शनैः-शनैः अनुरागी को संचालित करते हुए उसके स्वरूप तक, जिनमें वे स्वयं प्रतिष्ठित हैं, पहुँचा देते हैं। वही एकमात्र माध्यम हैं। इस प्रकार योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अपने को सबका आश्रय बताते हुए इस चौदहवें अध्याय का समापन किया, जिसमें गुणों का विस्तार से वर्णन है। अतः-

२९४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे 'गुणत्रयविभागयोगो' नाम चतुर्दशोऽध्यायः ।।१४।। इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में 'गुणत्रय विभाग योग' नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण होता है। इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते श्रीमद्भगवद्गीतायाः 'यथार्थगीता' भाष्ये 'गुणत्रयविभागयोगो' नाम चतुर्दशोऽध्यायः ।।१४।। इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत 'श्रीमद्भगवद्गीता' के भाष्य 'यथार्थ गीता' में 'गुणत्रय विभाग योग' नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण होता है। ।। हरिः ॐ तत्सत् ।।

पञ्चदशोऽध्यायः पुरुषोत्तम योग

।। ॐ श्री परमात्मने नमः।। ।।अथ पञ्चदशोऽध्यायः।। महापुरुषों ने संसार को विभिन्न दृष्टान्तों से समझाने का प्रयास किया है। किसी ने इसी को भवाटवी कहा, तो किसी ने संसार-सागर कहा। अवस्था- भेद से इसी को भवनदी और भवकूप भी कहा गया और कभी इसकी तुलना गोपद से की गयी अर्थात् जितना इन्द्रियों का आयतन है, उतना ही संसार है और अन्त में ऐसी भी अवस्था आयी कि 'नामु लेत भवसिन्धु सुखाहीं।' (रामचरितमानस, १/२४/४)- भवसिन्धु भी सूख गया। क्या संसार में ऐसे समुद्र हैं? योगेश्वर श्रीकृष्ण ने भी संसार को समुद्र और वृक्ष की संज्ञा दी। अध्याय बारह में उन्होंने कहा- जो मेरे अनन्य भक्त हैं, उनका संसार-समुद्र से शीघ्र ही उद्धार करनेवाला होता हूँ। यहाँ प्रस्तुत अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि संसार एक वृक्ष है, उसको काटते हुए ही योगीजन उस परमपद को खोजते हैं। देखें- श्रीभगवानुवाच ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।।१।। अर्जुन! 'ऊर्ध्वमूलम्'- ऊपर को परमात्मा ही जिसका मूल है, 'अधःशाखम्'-नीचे प्रकृति ही जिसकी शाखाएँ हैं, ऐसे संसाररूपी पीपल के वृक्ष को अविनाशी कहते हैं। (वृक्ष तो अ-श्वः अर्थात् कल तक भी रहनेवाला नहीं, जब चाहे कट जाय; किन्तु है अविनाशी।) श्रीकृष्ण के अनुसार अविनाशी दो हैं- एक संसाररूपी वृक्ष अविनाशी और दूसरा उससे भी परे परम अविनाशी। वेद इस अविनाशी संसार-विटप के पत्ते कहे गये हैं। जो पुरुष इस संसाररूपी वृक्ष को देखते हुए विदित कर लेता है, वह वेद का ज्ञाता है। जिसने उस संसार-वृक्ष को जाना है, उसने वेद को जाना है, न कि ग्रन्थ पढ़नेवाला। पुस्तक पढ़ने से तो उधर बढ़ने की प्रेरणा मात्र मिलती है। पत्तों के

२९६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता स्थान पर वेद की क्या आवश्यकता है? वस्तुतः पुरुष भटकते-भटकते जिस अन्तिम कोपल अर्थात् अन्तिम जन्म को लेता है, वहीं से वेद के वे छन्द (जो कल्याण का सृजन करते हैं) प्रेरणा देते हैं, वहीं से उनका उपयोग है। वहीं से भटकाव समाप्त हो जाता है। वह स्वरूप की ओर घूम जाता है। तथा- अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः। अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके।।२।। इस संसार-वृक्ष की तीनों गुणों के द्वारा बढ़ी हुई विषय और भोगरूप कोपलोंवाली शाखाएँ नीचे और ऊपर सर्वत्र फैली हुई हैं। नीचे की ओर कीट-पतंगपर्यन्त और ऊपर देवभाव से लेकर ब्रह्मापर्यन्त सर्वत्र फैली हुई हैं तथा केवल मनुष्य-योनि में कर्मों के अनुसार बाँधनेवाली हैं, अन्य सभी योनियाँ भोग भोगने के लिये हैं। मनुष्य-योनि ही कर्मों के अनुसार बन्धन तैयार करती है। न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा। अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल- मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा।।३।। परन्तु इस संसार-वृक्ष का रूप जैसा कहा गया है, वैसा यहाँ नहीं पाया जाता; क्योंकि न तो इसका आदि है, न अन्त है और न अच्छी प्रकार से इसकी स्थिति ही है (क्योंकि यह परिवर्तनशील है)। इस सुदृढ़ मूलवाले संसाररूपी वृक्ष को दृढ़ ‘असङ्गशस्त्रेण’- असंग अर्थात् वैराग्यरूपी शस्त्र द्वारा काटकर, (संसाररूपी वृक्ष को काटना है। ऐसा नहीं कि पीपल की जड़ में परमात्मा रहते हैं या पीपल का पत्ता वेद है और आरती करने लगे पेड़ की।) इस संसार-वृक्ष का मूल तो स्वयं परमात्मा ही बीजरूप से प्रसारित है, तो क्या वह भी कट जायेगा? दृढ़ वैराग्य द्वारा इस प्रकृति का सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, यही काटना है। काटकर करें क्या?-

पञ्चदश अध्याय २९७ ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः। तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥४॥ दृढ़ वैराग्य द्वारा संसार-विटप को काटने के उपरान्त उस परमपद परमेश्वर को अच्छी प्रकार खोजना चाहिये, जिसमें गये हुए पुरुष फिर पीछे संसार में नहीं आते अर्थात् पूर्ण निवृत्ति प्राप्त कर लेते हैं। किन्तु उसकी खोज किस प्रकार सम्भव है? योगेश्वर कहते हैं, इसके लिये समर्पण आवश्यक है। जिस परमेश्वर से पुरातन संसार-वृक्ष की प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है, उसी आदिपुरुष परमात्मा की मैं शरण हूँ (उनकी शरण गये बिना वृक्ष मिटेगा नहीं)। अब शरण में गया हुआ वैराग्य में स्थित पुरुष कैसे समझे कि वृक्ष कट गया? उसकी पहचान क्या है? इस पर कहते हैं- निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः। द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञै- र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥५॥ उपर्युक्त प्रकार के समर्पण से जिनका मोह और मान नष्ट हो गया है, आसक्तिरूपी संगदोष जिन्होंने जीत लिया है, 'अध्यात्मनित्या'- परमात्मा के स्वरूप में जिनकी निरन्तर स्थिति है, जिनकी कामनाएँ विशेष रूप से निवृत्त हो गयी हैं और सुख-दुःख के द्वन्द्वों से विमुक्त हुए ज्ञानीजन उस अविनाशी परमपद को प्राप्त होते हैं। जब तक यह अवस्था नहीं आती, तब तक संसार- वृक्ष नहीं कटता। यहाँ तक वैराग्य की आवश्यकता रहती है। उस परमपद का क्या स्वरूप है, जिसे पाते हैं?- न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः। यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥६॥ उस परमपद को न सूर्य, न चन्द्रमा और न अग्नि ही प्रकाशित कर पाते हैं। जिस परमपद को प्राप्त कर मनुष्य पीछे संसार में नहीं आते हैं, वही मेरा