यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
द्वितीय अध्याय ४१ तू शोक करने योग्य नहीं है। अब श्रीकृष्ण अर्जुन के विचारों में विरोधाभास दिखाते हैं, जो सामान्य तर्क है- अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्। तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि।।२६।। यदि तू इसे सदैव जन्मनेवाला और सदा मरनेवाला माने तब भी तुझे शोक नहीं करना चाहिये; क्योंकि- जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।।२७।। ऐसा मान लेने पर भी जन्मनेवाले की निश्चित मृत्यु और मरनेवाले का निश्चित जन्म सिद्ध होता है। इसलिये भी तू बिना उपायवाले इस विषय में शोक करने लायक नहीं है। जिसका कोई इलाज नहीं, उसके लिये शोक करना एक अन्य दुःख को आमन्त्रित करना है। अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत। अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।।२८।। अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले बिना शरीरवाले और मरने के बाद भी बिना शरीरवाले हैं। जन्म के पूर्व और मृत्यु के पश्चात् भी दिखायी नहीं पड़ते, केवल जन्म-मृत्यु के बीच में ही शरीर धारण किये हुए दिखायी देते हैं। अतः इस परिवर्तन के लिये व्यर्थ की चिन्ता क्यों करते हो? इस आत्मा को देखता कौन है? इस पर कहते हैं- आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन- माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः। आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्।।२९।। पहले श्रीकृष्ण ने कहा था कि इस आत्मा को तत्त्वदर्शियों ने देखा है, अब तत्त्वदर्शन की दुर्लभता पर प्रकाश डालते हैं कि कोई विरला महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की तरह देखता है। सुनता नहीं, प्रत्यक्ष देखता है और
४२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही आश्चर्य की तरह इसके तत्त्व को कहता है। जिसने देखा है, वही यथार्थ कह सकता है। दूसरा कोई विरला साधक इसे आश्चर्य की भाँति सुनता है। सब सुनते भी नहीं; क्योंकि यह अधिकारी के लिये ही है। हे अर्जुन ! कोई-कोई तो सुनकर भी इस आत्मा को नहीं जान पाते; क्योंकि साधन पार नहीं लगता। आप लाख ज्ञान की बातें सुनें, समझें- बाल की खाल निकालकर समझें, लालायित भी रहें; किन्तु मोह बड़ा प्रबल है, थोड़ी देर बाद ही आप अपनी सांसारिक व्यवस्थाओं में लिप्त मिलेंगे। अन्त में श्रीकृष्ण निर्णय देते हैं- देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत। तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि।।३०।। अर्जुन ! यह आत्मा सबके शरीर में सदैव अवध्य है, अकाट्य है। इसलिये सम्पूर्ण भूतप्राणियों के लिये तू शोक करने योग्य नहीं है। 'आत्मा ही सनातन है'- इस तथ्य का प्रतिपादन करके, इसका प्रभुतासहित वर्णन करके यह प्रश्न यहीं पूरा हो जाता है। अब प्रश्न खड़ा होता है कि इसकी प्राप्ति कैसे हो? सम्पूर्ण गीता में इसके लिये दो ही मार्ग हैं- पहला निष्काम कर्मयोग और दूसरा ज्ञानयोग। दोनों मार्गों में किया जानेवाला कर्म एक ही है। उस कर्म की अनिवार्यता पर बल देते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ज्ञानयोग के विषय में कहते हैं- स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते।।३१।। अर्जुन ! स्वधर्म देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है; क्योंकि धर्मसंयुक्त युद्ध से बढ़कर अन्य कोई परमकल्याणकारी मार्ग क्षत्रिय के लिये नहीं है। अभी तक तो 'आत्मा शाश्वत है', 'आत्मा सनातन है', 'वही एकमात्र धर्म है' कहा गया है। अब यह स्वधर्म कैसा? धर्म तो एकमात्र आत्मा ही है। वह तो अचल स्थिर है तो धर्माचरण क्या? वस्तुतः इस आत्मपथ में प्रवृत्त होने की क्षमता हर व्यक्ति की अलग-अलग होती है। स्वभाव से उत्पन्न इस क्षमता को स्वधर्म कहा गया है।
द्वितीय अध्याय ४३ इसी एक सनातन आत्मिक पथ पर चलनेवाले साधकों को महापुरुष ने स्वभाव की क्षमता के अनुसार चार श्रेणियों में बाँटा- शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण। साधना की प्रारम्भिक अवस्था में प्रत्येक साधक शूद्र अर्थात् अल्पज्ञ होता है। घण्टों भजन में बैठने पर वह दस मिनट भी अपने पक्ष में नहीं पाता। वह प्रकृति के मायाजाल को काट नहीं पाता। इस अवस्था में महापुरुष की सेवा से उसके स्वभाव में सद्गुण आते हैं। वह वैश्य श्रेणी का साधक बन जाता है। आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है। इसका वह शनैः-शनैः संग्रह और गोपालन अर्थात् इन्द्रियों की सुरक्षा करने में सक्षम हो जाता है। काम, क्रोध इत्यादि से इन्द्रियों की हिंसा होती है तथा विवेक, वैराग्य से इनकी सुरक्षा होती है; किन्तु प्रकृति को निर्बीज करने की क्षमता उसमें नहीं होती। क्रमशः उन्नति करते-करते साधक के अन्तःकरण में तीनों गुणों को काटने की क्षमता अर्थात् क्षत्रियत्व आ जाता है। इसी स्तर पर प्रकृति और उसके विकारों को नाश करने की क्षमता आ जाती है, इसलिये युद्ध यहीं से आरम्भ होता है। क्रमशः साधन करके साधक ब्राह्मणत्व की श्रेणी में बदल जाता है। इस समय मन का शमन, इन्द्रियों का दमन, धारावाही चिन्तन, सरलता, अनुभव, ज्ञान इत्यादि लक्षण साधक में स्वाभाविक प्रवाहित होते हैं। इन्हीं के अनुष्ठान से चलकर क्रमशः वह ब्रह्म में प्रवेश पा जाता है, जहाँ वह ब्राह्मण भी नहीं रह जाता। विदेह राजा जनक की सभा में महर्षि याज्ञवल्क्य ने चाक्रायण, उषस्ति, कहोल, आरुणि, उद्दालक और गार्गी के प्रश्नों का समाधान करते हुए बताया कि आत्मसाक्षात्कार का पूर्णतया सम्पादन करनेवाला ही ब्राह्मण होता है। यह आत्मा ही लोक, परलोक और समस्त प्राणियों को भीतर से नियमित करता है। सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, तारागण, अन्तरिक्ष, आकाश एवं प्रत्येक क्षण इस आत्मा के ही प्रशासन में हैं। यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। आत्मा अक्षर है, इससे भिन्न सब नाशवान् हैं। जो कोई इसी लोक में इस अक्षर को न जानकर हवन करता है, तप करता है, हजारों वर्षों तक यज्ञ करता है, उसका यह सब कर्म नाशवान् है। जो कोई भी इस अक्षर को जाने बिना इस लोक से मरकर जाता है वह दयनीय है, कृपण है और जो इस अक्षर
४४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता को जानकर इस लोक से मरकर जाता है वह ब्राह्मण है। (बृहदारण्यकोपनिषद्, तृतीय अध्याय, अष्टम ब्राह्मण) अर्जुन क्षत्रिय श्रेणी का साधक है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि क्षत्रिय श्रेणी के साधक के लिये युद्ध के अतिरिक्त कोई कल्याणकारी रास्ता है ही नहीं। प्रश्न उठता है कि क्षत्रिय है क्या? प्रायः लोग इसका आशय समाज में जन्मना उत्पन्न ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र जातियों से लेते हैं। इन्हें ही चार वर्ण मान लिया जाता है। किन्तु नहीं, शास्त्रकार ने स्वयं बताया है कि क्षत्रिय क्या है, वर्ण क्या है? यहाँ उन्होंने केवल क्षत्रिय का नाम लिया और आगे अठारहवें अध्याय तक इस प्रश्न का समाधान प्रस्तुत किया कि वस्तुतः ये वर्ण हैं क्या और कैसे इनमें परिवर्तन होता है? श्रीकृष्ण ने कहा, ‘चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम्’ (गीता, ४/१३)- चार वर्णों की सृष्टि मैंने की। तो क्या मनुष्यों को बाँटा? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, ‘गुणकर्मविभागशः।’- गुणों के माध्यम से कर्म को चार भागों में बाँटा। अब यह देखना है कि वह कर्म क्या है, जिसे बाँटा गया? गुण परिवर्तनशील हैं। साधना की उचित प्रक्रिया द्वारा तामसी से राजसी और राजसी से सात्त्विक गुणों में प्रवेश मिलता जाता है। अन्ततः ब्राह्मण स्वभाव बन जाता है। उस समय ब्रह्म में प्रवेश दिला देनेवाली सारी योग्यताएँ उस साधक में रहती हैं। वर्ण-सम्बन्धी प्रश्न यहाँ से आरम्भ होकर अठारहवें अध्याय में जाकर पूर्ण होता है। श्रीकृष्ण की मान्यता है- ‘श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्व- नुष्ठितात्।’ (गीता, १८/४७) स्वभाव से उत्पन्न इस धर्म में प्रवृत्त होने की क्षमता जिस स्तर की हो, भले ही वह गुणरहित शूद्र श्रेणी की हो, तब भी परमकल्याण करती है; क्योंकि आप क्रमशः वहीं से उत्थान करते हैं। उससे ऊपरवालों की नकल करके साधक नष्ट हो जाता है। अर्जुन क्षत्रिय श्रेणी का साधक था, इसलिये श्रीकृष्ण कहते हैं कि- अर्जुन! अपने स्वभाव से उत्पन्न इस युद्ध में प्रवृत्त होने की अपनी क्षमता को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है। इससे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कार्य क्षत्रिय के लिये नहीं है। इसी पर प्रकाश डालते हुए पुनः योगेश्वर कहते हैं-
द्वितीय अध्याय ४५ यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्। सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥३२॥ पार्थिव शरीर को ही रथ बनाकर अचूक लक्ष्यवेधी अर्जुन ! स्वतः प्राप्त स्वर्ग के खुले हुए द्वाररूपी इस युद्ध को भाग्यवान् क्षत्रिय ही प्राप्त करते हैं। क्षत्रिय श्रेणी के साधक में तीनों गुणों को काट देने की क्षमता रहती है। उसके लिये स्वर्ग का द्वार खुला है; क्योंकि उसमें दैवी सम्पद् पूर्णतः अर्जित रहती है, स्वर में विचरने की उसमें क्षमता रहती है। यही खुला हुआ स्वर्ग का द्वार है। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के इस युद्ध को भाग्यवान् क्षत्रिय ही पाते हैं; क्योंकि उनमें ही इस संघर्ष की क्षमता है। दुनिया में लड़ाइयाँ होती हैं। विश्व सिमटकर लड़ता है, प्रत्येक जाति लड़ती है; किन्तु शाश्वत विजय जीतनेवाले को भी नहीं मिलती। ये तो बदले हैं। जो जिसको जितना दबाता है, कालान्तर में उसे भी उतना ही दबना पड़ता है। यह कैसी विजय है, जिसमें इन्द्रियों को सुखानेवाला शोक बना ही रहता है, अन्त में शरीर भी नष्ट हो जाता है? वास्तविक संघर्ष तो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का है, जिसमें एक बार विजय हो जाने पर प्रकृति का सदा के लिये निरोध और परमपुरुष परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है। यह ऐसी विजय है, जिसके पीछे हार नहीं है। अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि। ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ।।३३।। और यदि तू इस 'धर्मयुक्त संग्राम' अर्थात् शाश्वत-सनातन परमधर्म परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाला धर्मयुद्ध नहीं करेगा तो 'स्वधर्म' अर्थात् स्वभाव से उत्पन्न संघर्ष करने की क्षमता, क्रिया में प्रवृत्त होने की क्षमता को खोकर पाप अर्थात् आवागमन और अपकीर्ति को प्राप्त होगा। अपकीर्ति पर प्रकाश डालते हैं- अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्। सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते।।३४।।
४६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता सब लोग बहुत काल तक तेरी अपकीर्ति का कथन करेंगे। आज भी पदच्युत होनेवाले महात्माओं में विश्वामित्र, पराशर, निमि, शृङ्गी इत्यादि की गणना होती है। बहुत से साधक अपने धर्म पर विचार करते हैं, सोचते हैं कि लोग हमें क्या कहेंगे? ऐसा भाव भी साधना में सहायक होता है। इससे साधना में लगे रहने की प्रेरणा मिलती है। कुछ दूरी तक यह भाव भी साथ देता है। माननीय पुरुषों के लिये अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर होती है। भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः। येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥३५॥ जिन महारथियों की निगाह में तू बहुत माननीय होकर अब तुच्छता को प्राप्त होगा, वे महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से उपराम हुआ मानेंगे। महारथी कौन? इस पथ पर महान् परिश्रम से आगे बढ़नेवाले साधक महारथी हैं। इसी प्रकार इतने ही परिश्रम से अविद्या की ओर खींचनेवाले काम, क्रोध, लोभ, मोहादि भी महारथी हैं। जो तुझे बहुत सम्मान देते थे कि साधक प्रशंसनीय है, तुम उनकी निगाह से गिर जाओगे। इतना ही नहीं, बल्कि- अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः। निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्॥३६॥ वैरी लोग तेरे पराक्रम की निन्दा करते हुए बहुत से न कहने योग्य वचनों को कहेंगे। एक दोष आता है तो चारों ओर से निन्दा और बुराइयों की झड़ी लग जाती है। न कहने योग्य वचन भी कहे जाते हैं। इससे बड़ा दुःख क्या होगा? अतः- हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्। तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥३७॥ इस युद्ध में मरोगे तो स्वर्ग प्राप्त करोगे- स्वर में विचरने की क्षमता रहेगी। श्वास के बाहर प्रकृति में विचरने की धाराएँ निरुद्ध हो जायेंगी। परमदेव परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाली दैवी सम्पद् हृदय में पूर्णतः प्रवाहित रहेगी अथवा इस संघर्ष में जीतने पर महामहिम स्थिति को प्राप्त करोगे। इसलिये अर्जुन! युद्ध के लिये निश्चय करके खड़ा हो।
द्वितीय अध्याय ४७ प्रायः लोग इस श्लोक के अर्थ में समझते हैं कि इस युद्ध में मरोगे तो स्वर्ग जाओगे और जीतोगे तो पृथ्वी का भोग भोगोगे; किन्तु आपको स्मरण होगा, अर्जुन कह चुका है- “भगवन्! पृथ्वी ही नहीं अपितु त्रैलोक्य के साम्राज्य और देवताओं के स्वामीपन अर्थात् इन्द्रपद प्राप्त होने पर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता, जो इन्द्रियों को सुखानेवाले मेरे शोक को दूर कर सके। यदि इतना ही मिलना है, तो गोविन्द! मैं युद्ध कदापि नहीं करूँगा।” यदि इतने पर भी श्रीकृष्ण कहते कि- अर्जुन! लड़ो। जीतोगे तो पृथ्वी पा जाओगे, हारोगे तो स्वर्ग के नागरिक बन जाओगे, तो श्रीकृष्ण देते ही क्या हैं? अर्जुन इससे आगे का सत्य, श्रेय (परमकल्याण) की कामनावाला शिष्य था, जिसे सद्गुरुदेव श्रीकृष्ण ने बताया कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के इस संघर्ष में यदि शरीर का समय पूरा हो जाता है और लक्ष्य तक नहीं पहुँच सके तो स्वर्ग प्राप्त करोगे अर्थात् स्वर में ही विचरण करने की क्षमता प्राप्त कर लोगे, दैवी सम्पद् हृदय में ढल जायेगी और इस शरीर के रहते-रहते संघर्ष में सफल हो जाते हो तो ‘महीम्’- सबसे महान् ब्रह्म की महिमा का उपभोग करोगे, महामहिम की स्थिति प्राप्त कर लोगे। जीतोगे तो सर्वस्व; क्योंकि महामहिमत्व को पाओगे और हारोगे तो देवत्व- दोनों हाथों में लड्डू रहेंगे। लाभ में भी लाभ और हानि में भी लाभ ही है। पुनः इसी पर बल देते हैं- सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।।३८।। इस प्रकार सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय को समान समझकर तू युद्ध के लिये तैयार हो। युद्ध करने से तू पाप को प्राप्त नहीं होगा। अर्थात् सुख में सर्वस्व और दुःख में भी देवत्व है। लाभ में महीम् की स्थिति अर्थात् सर्वस्व और हानि में देवत्व है। जय में महामहिम स्थिति और पराजय में भी दैवी सम्पद् पर अधिकार है। इस प्रकार अपने लाभ-हानि को भली प्रकार स्वयं समझकर तू युद्ध के लिये तैयार हो। लड़ने में ही दोनों वस्तुएँ हैं। लड़ोगे तो पाप अर्थात् आवागमन को प्राप्त नहीं होओगे। अतः तू युद्ध के लिये तैयार हो।
४८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु। बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ।।३९।। पार्थ! यह बुद्धि तेरे लिये ज्ञानयोग के विषय में कही गयी है। कौन-सी बुद्धि? यही कि युद्ध कर। ज्ञानयोग में इतना ही है कि अपनी हस्ती को देखकर, लाभ-हानि का भली प्रकार विचार करके कि जीतेंगे तो महामहिम स्थिति और हारेंगे तो देवत्व, जय में सर्वस्व और पराजय में भी देवत्व- दोनों तरह लाभ है। युद्ध नहीं करेंगे तो सभी हमें बुरा कहेंगे, भय से उपराम हुआ मानेंगे, अपकीर्ति होगी। इस प्रकार अपने अस्तित्व को सामने रखकर स्वयं विचार कर युद्ध में अग्रसर होना ही ज्ञानयोग है। प्रायः लोगों में भ्रान्ति है कि ज्ञानमार्ग में कर्म (युद्ध) नहीं करना पड़ता। वे कहते हैं कि ज्ञानमार्ग में कर्म नहीं है। मैं तो 'शुद्ध हूँ', 'चैतन्य हूँ', 'अहं ब्रह्मास्मि', 'गुण ही गुण में बरतते हैं'- ऐसा मानकर हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाते हैं। योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार यह ज्ञानयोग नहीं है। ज्ञानयोग में भी वही 'कर्म' करना है, जो निष्काम कर्मयोग में किया जाता है। दोनों में केवल बुद्धि का, दृष्टिकोण का अन्तर है। ज्ञानमार्गी अपनी स्थिति समझकर अपने पर निर्भर होकर कर्म करता है, जबकि निष्काम कर्मयोगी इष्ट के आश्रित होकर कर्म करता है। करना दोनों मार्गों में है और वह कर्म भी एक ही है, जिसे दोनों मार्गों में किया जाना है। केवल कर्म करने के दृष्टिकोण दो हैं। अर्जुन! इसी बुद्धि को अब तू निष्काम कर्मयोग के विषय में सुन, जिससे युक्त हुआ तू कर्मों के बन्धन का अच्छी तरह नाश करेगा। यहाँ श्रीकृष्ण ने 'कर्म' का नाम पहली बार लिया, लेकिन यह नहीं बताया कि कर्म है क्या? अब कर्म न बताकर पहले कर्म की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हैं- नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ।।४०।। इस निष्काम कर्मयोग में आरम्भ का अर्थात् बीज का नाश नहीं होता। सीमित फलरूपी दोष नहीं है। इसलिये इस निष्काम कर्म का, इस कर्म से सम्पादित धर्म का थोड़ा भी साधन जन्म-मृत्युरूपी महान् भय से उद्धार कर
द्वितीय अध्याय ४९ देता है। धर्म परिवर्तित नहीं होता। आप इस कर्म को समझें और इस पर दो कदम चल भर दें (जो सद्गृहस्थ आश्रम में रहकर ही चला जा सकता है, साधक तो चलते ही हैं।), बीज भर डाल दें, तो अर्जुन ! बीज का नाश नहीं होता। प्रकृति में कोई क्षमता नहीं, ऐसा कोई अस्त्र नहीं कि उस सत्य को मिटा दे। प्रकृति केवल आवरण डाल सकती है, कुछ देर कर सकती है; किन्तु साधन के आरम्भ को मिटा नहीं सकती। आगे श्रीकृष्ण ने बताया कि सभी पापियों से भी बड़ा पापी ही क्यों न हो, ज्ञानरूपी नौका द्वारा निःसन्देह पार हो जायेगा। ठीक उसी बात को यहाँ कहते हैं कि- अर्जुन ! निष्काम कर्मयोग का बीजारोपण भर कर दें तो उस बीज का कभी नाश नहीं होता। विपरीत फलरूपी दोष भी इसमें नहीं होता कि आपको स्वर्ग, ऋद्धियों या सिद्धियों तक पहुँचा कर छोड़ दे। आप यह साधन भले छोड़ दें; किन्तु यह साधन आपका उद्धार करके ही छोड़ेगा। इस निष्काम कर्मयोग का थोड़ा-सा भी साधन जन्म-मृत्यु के महान् भय से उद्धार कर देता है। 'अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्।' (गीता, ६/४५) कर्म का यह बीजारोपण अनेक जन्मों के पश्चात् वहीं खड़ा कर देगा, जहाँ परमधाम है, परमगति है। इसी क्रम में आगे कहते हैं- व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन। बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्।।४१।। अर्जुन ! इस निष्काम कर्मयोग में क्रियात्मिका बुद्धि एक ही है। क्रिया एक है और परिणाम एक ही है। आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है। इस सम्पत्ति को प्रकृति के द्वन्द्व से शनैः-शनैः अर्जित करना व्यवसाय है। यह व्यवसाय अथवा निश्चयात्मक क्रिया भी एक ही है। तब तो जो लोग बहुत- सी क्रियाएँ बताते हैं, क्या वे भजन नहीं करते? श्रीकृष्ण कहते हैं- "हाँ, वे भजन नहीं करते। उन पुरुषों की बुद्धि अनन्त शाखाओंवाली होती है, इसलिये अनन्त क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं।" यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः। वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः।।४२।।
५० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्। क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति।।४३।। पार्थ! वे ‘कामात्मानः’- कामनाओं से युक्त, ‘वेदवादरताः’- वेद के वाक्यों में अनुरक्त, ‘स्वर्गपराः’- स्वर्ग को ही परम लक्ष्य मानते हैं कि इससे आगे कुछ है ही नहीं-ऐसा कहनेवाले अविवेकीजन जन्म-मृत्युरूपी फल देनेवाली एवं भोग और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये बहुत-सी क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं और दिखावटी शोभायुक्त वाणी में व्यक्त भी करते हैं। अर्थात् अविवेकियों की बुद्धि अनन्त भेदोंवाली होती है। वे फलवाले वाक्य में ही अनुरक्त रहते हैं, वेद के वाक्यों को ही प्रमाण मानते हैं, स्वर्ग को ही श्रेष्ठ मानते हैं। उनकी बुद्धि बहुत-सी भेदोंवाली है, इसलिये अनन्त क्रियाओं की रचना कर लेते हैं। वे नाम तो परमतत्त्व परमात्मा का ही लेते हैं; किन्तु उसकी ओट में अनन्त क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं। तो क्या अनन्त क्रियाएँ कर्म नहीं हैं? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, अनन्त क्रियाएँ कर्म नहीं हैं। तो वह एक निश्चित क्रिया है क्या? श्रीकृष्ण अभी यह नहीं बताते। अभी तो केवल इतना कहते हैं कि अविवेकियों की बुद्धि अनन्त शाखाओंवाली होती है, इसलिये वे अनन्त क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं। वे केवल विस्तार ही नहीं करते अपितु आलंकारिक शैली में उसे व्यक्त भी करते हैं। उसका प्रभाव क्या होता है?- भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्। व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते।।४४।। उनकी वाणी की छाप जिन-जिन के चित्त पर पड़ जाती है, अर्जुन! उनकी भी बुद्धि नष्ट हो जाती है, न कि वे कुछ पाते हैं। उस वाणी द्वारा हरे हुए चित्तवालों के और भोग-ऐश्वर्य में आसक्तिवाले पुरुषों के अन्तःकरण में क्रियात्मिका बुद्धि नहीं रह जाती। इष्ट में समाधिस्थ करनेवाली निश्चयात्मक क्रिया उनमें नहीं होती। ऐसे अविवेकियों की वाणी सुनता कौन है? भोग और ऐश्वर्य में आसक्तिवाले ही सुनते हैं, अधिकारी नहीं सुनता। ऐसे पुरुषों में सम और
द्वितीय अध्याय ५१ आदितत्त्व में प्रवेश दिलानेवाली निश्चयात्मक क्रिया से संयुक्त बुद्धि नहीं होती। प्रश्न उठता है कि 'वेदवादरताः'- जो वेद के वचनों में अनुरक्त हैं, क्या वे भी भूल करते हैं? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं- त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन। निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥४५॥ अर्जुन! 'त्रैगुण्यविषया वेदाः'- वेद तीनों गुणों तक ही प्रकाश करते हैं। इसके आगे का हाल वे नहीं जानते। इसलिये 'निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।'- अर्जुन! तू तीनों गुणों से ऊपर उठ अर्थात् वेदों के कार्यक्षेत्र से आगे बढ़। कैसे बढ़ा जाय? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं- 'निर्द्वन्द्वः'- सुख-दुःख के द्वन्द्वों से रहित, नित्य सत्य वस्तु में स्थित और योगक्षेम को न चाहता हुआ आत्मपरायण हो। इस प्रकार ऊपर उठ। प्रश्न उठता है कि हम ही उठें या कोई वेदों से ऊपर उठा भी है? श्रीकृष्ण बताते हैं कि आगे जो भी उठता है, ब्रह्म को जानता है और जो ब्रह्म को जानता है, वह विप्र है। यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके। तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥४६॥ सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त होने पर मनुष्य का छोटे जलाशय से जितना प्रयोजन रहता है, अच्छी प्रकार ब्रह्म को जाननेवाले ब्राह्मण का वेदों से उतना ही प्रयोजन रहता है। तात्पर्य यह है कि जो वेदों से ऊपर उठता है वह ब्रह्म को जानता है, वही ब्राह्मण है। अर्थात् तू वेदों से ऊपर उठ, ब्राह्मण बन। अर्जुन क्षत्रिय था, श्रीकृष्ण कहते हैं कि ब्राह्मण बन। ब्राह्मण, क्षत्रिय इत्यादि वर्ण स्वभाव की क्षमताओं के नाम हैं। यह कर्मप्रधान है, न कि जन्म से निर्धारित होनेवाली कोई रूढ़ि। जिसे गंगा की धारा प्राप्त है, उसे क्षुद्र जलाशय से क्या प्रयोजन? कोई उसमें शौच लेता है, तो कोई पशुओं को नहला देता है। इसके आगे कोई उपयोग नहीं है। इसी प्रकार ब्रह्म को साक्षात् जाननेवाले उस विप्र महापुरुष का, उस ब्राह्मण का वेदों से उतना ही प्रयोजन रह जाता है। प्रयोजन रहता अवश्य है, वेद रहते हैं; क्योंकि पीछेवालों के लिये
५२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता उनका उपयोग है। वहीं से चर्चा आरम्भ होगी। इसके उपरान्त योगेश्वर श्रीकृष्ण कर्म करते समय बरती जानेवाली सावधानियों का प्रतिपादन करते हैं- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।४७।। कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, फल में कभी नहीं। ऐसा समझ कि फल है ही नहीं। फल की वासनावाला भी मत हो और कर्म करने में तेरी अश्रद्धा भी न हो। अब तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने उनतालीसवें श्लोक में पहली बार कर्म का नाम लिया; किन्तु यह नहीं बताया कि वह कर्म है क्या और उसे करें कैसे? उस कर्म की विशेषताओं पर प्रकाश डाला कि- (१) अर्जुन! इस कर्म द्वारा तू कर्मों के बन्धन से अच्छी प्रकार छूट जायेगा। (२) अर्जुन! इसमें आरम्भ का अर्थात् बीज का नाश नहीं है। आरम्भ कर दें तो प्रकृति के पास कोई उपाय नहीं कि उसे नष्ट कर दे। (३) अर्जुन! इसमें सीमित फलरूपी दोष भी नहीं है कि स्वर्ग या ऋद्धियों-सिद्धियों में फँसाकर खड़ा कर दे। (४) अर्जुन! इस कर्म का थोड़ा भी साधन जन्म-मरण के भय से उद्धार करानेवाला होता है। किन्तु अभी तक उन्होंने यह नहीं बताया कि वह कर्म है क्या? किया कैसे जाय? इसी अध्याय के इकतालीसवें श्लोक में उन्होंने बताया- (५) अर्जुन! इसमें निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही है, क्रिया एक ही है। तो क्या बहुत-सी क्रियावाले भजन नहीं करते? श्रीकृष्ण कहते हैं- वे कर्म नहीं करते। इसका कारण बताते हुए वे कहते हैं कि अविवेकियों की बुद्धि अनन्त शाखाओंवाली होती है, इसलिये वे अनन्त क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं। वे दिखावटी शोभायुक्त वाणी में उन क्रियाओं को व्यक्त भी करते हैं।
द्वितीय अध्याय ५३ उनकी वाणी की छाप जिनके चित्त पर पड़ जाती है, उनकी भी बुद्धि नष्ट हो जाती है। अतः निश्चयात्मक क्रिया एक ही है; लेकिन यह नहीं बताया कि वह क्रिया कौन-सी है? सैंतालीसवें श्लोक में उन्होंने कहा- अर्जुन ! कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, फल में कभी नहीं। फल की वासनावाला भी मत हो और कर्म करने में तेरी अश्रद्धा भी न हो अर्थात् निरन्तर करने के लिये उसी में लीन होकर करें; किन्तु यह नहीं बताया कि वह कर्म है क्या? प्रायः इस श्लोक का उद्धरण देकर लोग कहते हैं कि कुछ भी करो, केवल फल की कामना मत करो, हो गया निष्काम कर्मयोग। किन्तु अभी तक श्रीकृष्ण ने बताया ही नहीं कि वह कर्म है कौन-सा, जिसे करें? यहाँ पर केवल कर्म की विशेषताओं पर प्रकाश डाला कि कर्म देता क्या है और कर्म करते समय बरती जानेवाली सावधानियाँ क्या हैं? प्रश्न ज्यों-का-त्यों बना हुआ है, जिसे योगेश्वर आगे अध्याय तीन-चार में स्पष्ट करेंगे। पुनः इसी पर बल देते हैं- योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।४८।। धनंजय ! आसक्ति और संगदोष को त्यागकर, सिद्धि और असिद्धि में समान भाव रखकर योग में स्थित होकर कर्म कर। कौन-सा कर्म? निष्काम कर्म कर। 'समत्वं योग उच्यते'- यह समत्व भाव ही योग कहलाता है। विषमता जिसमें न हो, ऐसा भाव समत्व कहलाता है। ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ विषम बनाती हैं, आसक्ति हमें विषम बनाती है, फल की इच्छा विषमता पैदा करती है, इसीलिये फल की वासना न हो; फिर भी कर्म करने में अश्रद्धा न हो। देखी-सुनी सभी वस्तुओं में आसक्ति का त्याग करके, प्राप्ति और अप्राप्ति के विषय में न सोचकर केवल योग में स्थित रहते हुए कर्म कर। योग से चित्त चलायमान न हो। योग एक पराकाष्ठा की स्थिति है और एक प्रारम्भ की स्थिति भी होती है। प्रारम्भ में भी हमारी दृष्टि लक्ष्य पर ही रहनी चाहिये। अतः योग पर दृष्टि
५४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता रखते हुए कर्म का आचरण करना चाहिये। समत्व भाव अर्थात् सिद्धि और असिद्धि में समभाव ही योग कहलाता है। जिसको सिद्धि और असिद्धि विचलित नहीं कर पातीं, विषमता जिसमें पैदा नहीं होती, ऐसा भाव होने के कारण यह समत्व योग कहलाता है। यह इष्ट से समत्व दिलाता है, इसलिये इसे समत्व योग कहते हैं। कामनाओं का सर्वथा त्याग है, इसलिये इसे निष्काम कर्मयोग कहते हैं। कर्म करना है, इसलिये इसे कर्मयोग कहते हैं। परमात्मा से मेल कराता है, इसलिये इसका नाम योग अर्थात् मेल है। इसमें बौद्धिक स्तर पर ध्यान रखना पड़ता है कि सिद्धि और असिद्धि में समभाव रहे, आसक्ति न हो, फल की वासना न आने पाये इसलिये यही निष्काम कर्मयोग बुद्धियोग भी कहा जाता है। दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय। बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥४९॥ धनंजय! 'अवरं कर्म'- निकृष्ट कर्म, वासनावाले कर्म बुद्धियोग से अत्यन्त दूर हैं। फल की कामनावाले कृपण हैं। वे आत्मा के साथ उदारता नहीं बरतते, अतः समत्व बुद्धियोग का आश्रय ग्रहण कर। जैसी कामना है वैसा मिल भी जाये तो उसे भोगने के लिये शरीर धारण करना पड़ेगा। आवागमन बना है तो कल्याण कैसा? साधक को तो मोक्ष की भी वासना नहीं रखनी चाहिये; क्योंकि वासनाओं से मुक्त होना ही तो मोक्ष है। फल की प्राप्ति का चिन्तन करने से साधक का समय व्यर्थ नष्ट हो जाता है और फल प्राप्त होने पर वह उसी फल में उलझ जाता है। उसकी साधना समाप्त हो जाती है। आगे वह भजन क्यों करे? वहाँ से वह भटक जाता है। इसलिये समत्व बुद्धि से योग का आचरण करें। ज्ञानमार्ग को भी श्रीकृष्ण ने बुद्धियोग कहा था कि अर्जुन! यह बुद्धि तेरे लिये ज्ञानयोग के विषय में कही गयी और यहाँ निष्काम कर्मयोग को भी बुद्धियोग कहा गया। वस्तुतः दोनों में बुद्धि का, दृष्टिकोण का ही अन्तर है। उसमें लाभ-हानि का रिकार्ड रखकर उसे जाँच कर चलना पड़ता है, इसमें बौद्धिक स्तर पर समत्व बनाये रखना पड़ता है इसलिये इसे समत्व बुद्धियोग
द्वितीय अध्याय ५५ भी कहा जाता है। इसलिये धनंजय ! तू समत्व बुद्धियोग का आश्रय ग्रहण कर; क्योंकि फल की वासनावाले अत्यन्त कृपण हैं। बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥५०॥ समत्व बुद्धियुक्त पुरुष पुण्य-पाप दोनों को ही इसी लोक में त्याग देता है, उनसे लिपायमान नहीं होता। इसलिये समत्व बुद्धियोग के लिये चेष्टा कर। ‘योगः कर्मसु कौशलम्’- समत्व बुद्धि के साथ कर्मों का आचरण-कौशल ही योग है। संसार में कर्म करने के दो दृष्टिकोण प्रचलित हैं। लोग कर्म करते हैं तो उसका फल भी अवश्य चाहते हैं या फल न मिले तो कर्म करना ही नहीं चाहते; किन्तु योगेश्वर श्रीकृष्ण इन कर्मों को बन्धनकारी बताते हुए ‘आराधना’ को एकमात्र कर्म मानते हैं। इस अध्याय में उन्होंने कर्म का नाम मात्र लिया। अध्याय ३ के ९वें श्लोक में उसकी परिभाषा दी और चौथे अध्याय में कर्म के स्वरूप पर विस्तार से प्रकाश डाला। प्रस्तुत श्लोक में श्रीकृष्ण ने सांसारिक परम्परा से हटकर कर्म करने की कला बतायी कि कर्म तो करो, श्रद्धापूर्वक करो; किन्तु फल के अधिकार को स्वेच्छा से छोड़ दो। फल जायेगा कहाँ? यही कर्मों के करने का कौशल है। निष्काम साधक की समग्र शक्ति इस प्रकार कर्म में लगी रहती है। आराधना के लिये ही तो शरीर है। फिर भी जिज्ञासा स्वाभाविक है कि क्या सदैव कर्म ही करते रहना है या इसका कुछ परिणाम भी निकलेगा? इसे देखें- कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः। जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्॥५१॥ बुद्धियोग से युक्त ज्ञानीजन कर्मों से उत्पन्न होनेवाले फल को त्यागकर जन्म और मृत्यु के बन्धन से छूट जाते हैं। वे निर्दोष अमृतमय परमपद को प्राप्त होते हैं। यहाँ तीन बुद्धियों का चित्रण है। (श्लोक ३९) सांख्य बुद्धि में दो फल हैं- स्वर्ग और श्रेय। (श्लोक ५१) कर्मयोग में प्रवृत्त बुद्धि का एक ही फल है
५६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता जन्म-मृत्यु से मुक्ति, निर्मल अविनाशी पद की प्राप्ति। बस ये दो ही योगक्रिया हैं। इसके अतिरिक्त बुद्धि अविवेकजन्य है, अनन्त शाखाओंवाली है, जिसका फल कर्मभोग के लिये बारम्बार जन्म-मृत्यु है। अर्जुन की दृष्टि त्रिलोकी के साम्राज्य तथा देवताओं के स्वामीपन तक ही सीमित थी। इतने तक के लिये भी वह युद्ध में प्रवृत्त नहीं हो रहा था। यहाँ श्रीकृष्ण उसे नवीन तथ्य उद्घाटित करते हैं कि आसक्तिरहित कर्म द्वारा अनामय पद प्राप्त होता है। निष्काम कर्मयोग परमपद को दिलाता है, जहाँ मृत्यु का प्रवेश नहीं है। इस कर्म में प्रवृत्ति कब होगी?- यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति। तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।।५२।। जिस काल में तेरी (प्रत्येक साधक की) बुद्धि मोहरूपी दलदल को पूर्णतः पार कर लेगी, लेशमात्र भी मोह न रह जाय- न पुत्र में, न धन में, न प्रतिष्ठा में- इन सबसे लगाव टूट जायेगा, उस समय जो सुनने योग्य है उसे तू सुन सकेगा और सुने हुए के अनुसार वैराग्य को प्राप्त हो सकेगा अर्थात् उसे आचरण में ढाल सकेगा। अभी तो जो सुनने लायक है, उसे न तो तू सुन पाया है और आचरण का तो प्रश्न ही नहीं खड़ा होता। इसी योग्यता पर पुनः प्रकाश डालते हैं- श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला। समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि।।५३।। अनेक प्रकार के वेदवाक्यों को सुनकर विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मस्वरूप में समाधिस्थ होकर अचल-स्थिर ठहर जायेगी, तब तू समत्व योग को प्राप्त होगा। पूर्ण सम स्थिति को प्राप्त करेगा, जिसे 'अनामय परमपद' कहते हैं। यही योग की पराकाष्ठा है और यही अप्राप्य की प्राप्ति है। वेदों से तो शिक्षा ही मिलती है; किन्तु श्रीकृष्ण कहते हैं, 'श्रुतिविप्रतिपन्ना'- श्रुतियों के अनेक सिद्धान्तों को सुनने से बुद्धि विचलित हो जाती है। सिद्धान्त तो अनेकों सुने, लेकिन जो सुनने योग्य है लोग उससे दूर ही रहते हैं।
द्वितीय अध्याय ५७ यह विचलित बुद्धि जिस समय समाधि में स्थिर हो जायेगी, तब तू योग की पराकाष्ठा अमृत पद को प्राप्त करेगा। इस पर अर्जुन की उत्कण्ठा स्वाभाविक है कि वे महापुरुष कैसे होते हैं जो अनामय परमपद में स्थित हैं, समाधि में जिनकी बुद्धि स्थिर है? उसने प्रश्न किया- अर्जुन उवाच स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव। स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्।।५४।। 'समाधीयते चित्तं यस्मिन् स आत्मा एव समाधिः'- जिसमें चित्त का समाधान किया जाय, वह आत्मा ही समाधि है। अनादि तत्त्व में जो समत्व प्राप्त कर ले, उसे समाधिस्थ कहते हैं। अर्जुन ने पूछा- केशव ! समाधिस्थ स्थिरबुद्धिवाले महापुरुष के क्या लक्षण हैं? स्थितप्रज्ञ पुरुष कैसे बोलता है? वह कैसे बैठता है? वह कैसे चलता है? चार प्रश्न अर्जुन ने किये। इस पर भगवान श्रीकृष्ण ने स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताते हुए कहा- श्रीभगवानुवाच प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।।५५।। पार्थ! जब मनुष्य मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग देता है, तब वह आत्मा से आत्मा में ही सन्तुष्ट हुआ स्थिरबुद्धिवाला कहा जाता है। कामनाओं के त्याग पर ही आत्मा का दिग्दर्शन होता है। ऐसा आत्माराम, आत्मतृप्त महापुरुष ही स्थितप्रज्ञ है। दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।५६।। दैहिक, दैविक तथा भौतिक दुःखों में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में जिसकी स्पृहा दूर हो गयी है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं, मननशीलता की चरम सीमा पर पहुँचा हुआ मुनि स्थितप्रज्ञ कहा जाता है। उसके अन्य लक्षण बताते हैं-
५८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्। नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।५७।। जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ शुभ अथवा अशुभ को प्राप्त होकर न तो प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है। शुभ वह है जो परमात्मस्वरूप में लगाता है, अशुभ वह है जो प्रकृति की ओर ले जानेवाला होता है। स्थितप्रज्ञ पुरुष अनुकूल परिस्थितियों से न प्रसन्न होता है और न प्रतिकूल परिस्थितियों से द्वेष करता है; क्योंकि प्राप्त होने योग्य वस्तु न उससे भिन्न है और न पतित करनेवाले विकार ही उसके लिये हैं अर्थात् अब साधन से उसका अपना कोई प्रयोजन नहीं रहा। यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।५८।। जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है, ठीक वैसे ही यह पुरुष जब सब ओर से अपनी इन्द्रियों को समेट लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है। खतरे को देखते ही कछुआ जिस प्रकार अपने सिर और पैर समेट लेता है, ठीक इसी प्रकार जो पुरुष विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों को सब ओर से समेटकर हृदय-देश में निरोध कर लेता है, उस काल में उस पुरुष की बुद्धि स्थिर होती है। किन्तु यह तो एक दृष्टान्त मात्र है। खतरे का अहसास मिटते ही कछुआ तो अपने अंगों को पुनः फैला देता है, क्या इसी प्रकार स्थितप्रज्ञ महापुरुष भी विषयों में रस लेने लगता है? इस पर कहते हैं- विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः। रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।।५९।। इन्द्रियों द्वारा विषयों को न ग्रहण करनेवाले पुरुषों के विषय तो निवृत्त हो जाते हैं क्योंकि वे ग्रहण ही नहीं करते; किन्तु उनका राग निवृत्त नहीं होता, आसक्ति लगी रहती है। सम्पूर्ण इन्द्रियों को विषयों से समेटनेवाले निष्कामकमी का राग भी 'परं दृष्ट्वा'- परमतत्त्व परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाता है।
द्वितीय अध्याय ५९ महापुरुष कछुए की तरह अपनी इन्द्रियों को विषयों में नहीं फैलाता। एक बार जब इन्द्रियाँ सिमट गयीं तो संस्कार ही मिट जाते हैं, पुनः वे नहीं निकलते। निष्काम कर्मयोग के आचरण द्वारा परमात्मा के प्रत्यक्ष दर्शन के साथ उस पुरुष का विषयों से राग भी निवृत्त हो जाता है। प्रायः चिन्तन-पथ में हठ करते हैं। हठ से इन्द्रियों को रोककर वे विषय से तो निवृत्त हो जाते हैं किन्तु मन में उनका चिन्तन, राग लगा रहता है। यह आसक्ति ‘परं दृष्ट्वा’- परमात्मा का साक्षात्कार करने के बाद ही निवृत्त होती है, इसके पूर्व नहीं। ‘पूज्य महाराज जी’ इस सम्बन्ध में अपनी एक घटना बताया करते थे। गृहत्याग से पूर्व उन्हें तीन बार आकाशवाणी हुई थी। हमने पूछा- “महाराज जी ! आपको आकाशवाणी क्यों हुई, हम लोगों को तो नहीं हुई?” तब इस पर महाराज जी ने कहा- ‘हो ! ई शंका मोहूं के भई रही।’ अर्थात् यह सन्देह मुझे भी हुआ था। तब अनुभव में आया कि मैं सात जन्म से लगातार साधु हूँ। चार जन्म तो केवल साधुओं-सा वेश बनाये, तिलक लगाये, कहीं विभूति पोते, कहीं कमण्डल लिये विचरण कर रहा हूँ। योगक्रिया की जानकारी नहीं थी। लेकिन पिछले तीन जन्म से बढ़िया साधु हूँ, जैसा होना चाहिये। मुझमें योगक्रिया जागृत थी। पिछले जन्म में पार लग चला था, निवृत्ति हो चली थी; किन्तु दो इच्छाएँ रह गयी थीं- एक स्त्री और दूसरी गाँजा। अन्तर्मन में इच्छाएँ थीं, किन्तु बाहर से हमने शरीर को दृढ़ रखा। मन में वासना लगी थी इसलिये जन्म लेना पड़ा। जन्म लेते ही भगवान ने थोड़े ही समय में सब दिखा-सुनाकर निवृत्ति दिला दी, दो-तीन चटकना दिया और साधु बना दिया। ठीक यही बात श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन्द्रियों द्वारा विषयों को न ग्रहण करनेवाले पुरुष के भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं; किन्तु साधना द्वारा परमपुरुष परमात्मा का साक्षात्कार कर लेने पर वह विषयों के राग से भी निवृत्त हो जाता है। अतः जब तक साक्षात्कार न हो, कर्म करना है। उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।। ( रामचरितमानस, ५/४८/६ ) इन्द्रियों को विषयों से समेटना कठिन है। इस पर प्रकाश डालते हैं-
६० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता यततो ह्यापि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः। इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः।।६०।। कौन्तेय! प्रयत्न करनेवाले मेधावी पुरुष की प्रमथनशील इन्द्रियाँ उसके मन को बलात् हर लेती हैं, विचलित कर देती हैं। इसलिये- तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः। वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।६१।। उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को संयत करके योग से युक्त और समर्पण के साथ मेरे आश्रित हो; क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर होती है। यहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण साधन के निषेधात्मक अवयवों के साथ उसके विधेयात्मक पहलू पर जोर देते हैं। केवल संयम और निषेध से इन्द्रियाँ वश में नहीं होतीं, समर्पण के साथ इष्ट-चिन्तन अनिवार्य है। इष्ट- चिन्तन के अभाव में विषय-चिन्तन होगा, जिसके कुपरिणाम श्रीकृष्ण के ही शब्दों में देखें- ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।६२।। विषयों का चिन्तन करनेवाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है। कामना-पूर्ति में व्यवधान आने से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध किसे जन्म देता है?- क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।६३।। क्रोध से विशेष मूढ़ता अर्थात् अविवेक उत्पन्न होता है। नित्य-अनित्य वस्तु का विचार नहीं रह जाता। अविवेक से स्मरण-शक्ति भ्रमित हो जाती है (जैसा अर्जुन को हुआ था- ‘भ्रमतीव च मे मनः।’ (१/३०) गीता के समापन पर उसने कहा- ‘नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा।’ (१८/७३) क्या करें, क्या न करें?- इसका निर्णय नहीं हो पाता।), स्मृति भ्रमित होने से योग-