योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
उत्पत्ति प्रकरण । १६३
होते हैं। जैसे संकल्पनगर और स्वप्नपुर होता है वैसे ही यह जगत् है। हे रामजी ! इस जगत् का मूल पञ्चभूत है जिसका बीज संवित् और स्वरूप चिदाकाश है । इसी से सब जगत् चिदाकाश है; द्वैत और कुछ नहीं ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे जगदुत्पत्तिवर्णनन्ना- मकादशस्सर्गः ॥ ११ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! परब्रह्म सम, शान्त, स्वच्छ, अनन्त, चिन्मात्र और सर्वदाकाल अपने आप में स्थित है । उसमें सम-असम-रूप जगत् उत्पन्न हुआ है । सम अर्थात् सजातीयरूप और असम अर्थात् भेदरूप कैसे हुए सो भी सुनिये । प्रथम तो उसमें चेत्य का फुरना हुआ है; उसका नाम जीव हुआ और उसने दृश्य को चेता उससे तन्मात्र, शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध उपजे । उन्हीं से पृथ्वी, अप, तेज, वायु और आकाश पञ्चभूतरूपी वृक्ष हुआ और उस वृक्ष में ब्रह्माण्डरूपी फल लगा । इसमें जगत् का कारण पञ्चतन्मात्रा हुई हैं और तन्मात्रा का बीज आदि संवित् आकाश है और इसी से सर्व जगत् ब्रह्मरूप हुआ । हे रामजी ! जैसे बीज होता है वैसा ही फल होता है । इसका बीज परब्रह्म है तो यह भी परब्रह्म हुआ जो आदि अचेत चिन्मात्र स्वरूप परमाकाश है और जिस चैतन्य संवित् में जगत् भासता है वह जीवाकाश है । वह भी शुद्ध निर्मल है, क्योंकि वह पृथ्वी आदि भूतों से रहित है । हे रामजी ! यह जगत् जो तुमको भासता है सो सब चिदाकाशरूप है और वास्तव में द्वैत कुछ नहीं बना । यह मैंने तुमसे ब्रह्माकाश और जीवाकाश कहा । अब जिससे इसको शरीर ग्रहण हुआ सो सुनिये । हे रामजी ! शुद्ध चिन्मात्र में जो चैत्योन्मुखत्व "अहं अस्मि" हुआ और उस अहंभाव से आपको जीव अणु जानने लगा । अपना वास्तव स्वरूप अन्य भाव की नाईं होकर जीव अणु में जो अहंभाव दृढ़ हुआ उसी का नाम अहंकार हुआ उस अहंकार की दृढ़ता मे निश्चयात्मक बुद्धि हुई और उसमें सङ्कल्परूपी मन हुआ जब मन इसकी ओर संसरने लगा तब सुनने की इच्छा की इससे श्रवण इन्द्रिय प्रकट हुई; जब रूप देखने की इच्छा
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की तब चक्षु इन्द्रिय प्रकट हुई; जब स्पर्श की इच्छा की तो त्वचा इन्द्रिय प्रकट हुई और जब रस लेने की इच्छा की तो जिह्वा इन्द्रिय प्रकट हुई । इसी प्रकार से देह इन्द्रियाँ चैतन्यता से भासीं और उसमें यह जीव अहंप्रतीति करने लगा । हे रामजी ! जैसे दर्पण में पर्वत का प्रतिबिम्ब होता है वह पर्वत से बाह्य है वैसे ही देह और इन्द्रियां बाह्य दृश्य हैं पर अपने में भासी हैं इससे उसमें अहं प्रतीति होती है । जैसे कूप में मनुष्य आपको देखे वैसे ही देह में आपको देखता है जैसे डब्बे में रत्न होता है वैसे ही देह में आपको देखता है । वही चिदअणु देह के साथ मिलकर दृश्य को रचता है । उस अहं से ही क्रिया भासने लगी । जैसे स्वप्न में दौड़े और जैसे स्थित में स्पन्द होती है वैसे ही आत्मा में जो स्पन्द क्रिया हुई वह चित्त-संवित् से ही हुई है और उसी का नाम स्वयम्भू ब्रह्मा हुआ । जैसे संकल्प से दूसरा चन्द्रमा भासता है वैसे ही मनोपम जगत् भासता है । जैसे शश के शृङ्ग होते हैं वैसे ही यह जगत् है । कुछ उपजा नहीं केवल चित्त के स्पन्द में जगत् फुरता है । जैसे-जैसे चित्त फुरता गया वैसे वैसे देश, काल, द्रव्य, स्थावर, जङ्गम, जगत् की मर्यादा हुई । इससे सब जगत् सङ्कल्परूप है, सङ्कल्प से इतर जगत् का आकार कुछ नहीं । जब सङ्कल्प फुरता है तब आगे जगत् दृश्य भासता है और संकल्प निस्पन्द होता है तब दृश्य का अभाव होता है । हे रामजी ! इस प्रकार से यह ब्रह्मा निर्वाण हो फिर और उपजते हैं इससे सब संकल्पमात्र ही है । जैसे नटवा नाना प्रकार के पट के स्वांग करके बाहर निकल आता है वैसे ही देखो यह सब मायामात्र है । हे रामजी ! जब चित्त की ओर संसरता है तब दृश्य का अन्त नहीं आता और जब अन्तर्मुख होता है तब सब जगत् आत्मरूप होता है । चित्त के निस्पन्द होने से एक क्षण में जगत् निवृत्त होता है क्योंकि सङ्कल्परूप ही है । इसमें यह जगत् आकाशरूप है उपजा कुछ नहीं और आत्मसत्ता ज्यों की त्यों अपने आप में स्थित है । जैसे स्वप्न में पर्वत और नदियाँ भ्रम में दीखते हैं वैसे ही यह जगत् भी भ्रम में भासता है । जैसे स्वप्न में आपको मुआ देखता है सो भ्रममात्र है वैसे ही यह जगत्
उत्पत्ति प्रकरण । १६५
भ्रममात्र है । हे रामजी ! यह स्थावर, जङ्गम जगत् सब चिदाकाश है । हमको तो सदा चिदाकाश ही भासता है । आदि विराट् रूप में ब्रह्मा भी वास्तव में कुछ उपजे नहीं तो जगत् कैसे उपजा जैसे स्वप्न में नाना प्रकार के देश काल और व्यवहार दृष्टि आते हैं सो अकारणरूप हैं; उपजे कुछ नहीं और आभासमात्र हैं, वैसे ही यह जगत् आभासमात्र है । कार्य-कारण भासते हैं तो भी अकारण हैं । हे रामजी ! हमको जगत् ऐसा भासता है जैसे स्वप्न में जागे मनुष्य को भासता है । जो वस्तु अकारण भासी है सो भ्रान्तिमात्र है । जो किसी कारण द्वारा जगत् नहीं उपजा तो स्वप्नवत् है । जैसे संकल्पपुर और गन्धर्वनगर भासते हैं वैसे ही यह जगत् भी जानो । आदि विराट् आत्मा अन्नवाहकरूप है और वह पृथ्वी आदि तत्त्वों से रहित आकाशरूप है तो यह जगत् आधि-भौतिक कैसे हो ! सब आकाशरूप है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे स्वयम्भूतस्यचित्तवर्णनोनाम द्वादशस्सर्गः ॥ १२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह दृश्य मिथ्या असतरूप है । जो है सो निरामय ब्रह्म है यह ब्रह्माकाश ही जीव की नाईं हुआ है । जैसे समुद्र द्रवता से तरङ्गरूप होता है वैसे ही ब्रह्म जीवरूप होता है । आदिसंवित् स्पन्दरूप ब्रह्मा हुआ है और उस ब्रह्मा में आगे जीव हुए हैं । जैसे एक दीपक से बहुत दीपक होते हैं और जैसे एक संकल्प से बहुत संकल्प होते हैं वैसे ही एक आदि जीव से बहुत जीव हुए हैं । जैसे थम्भे में शिल्पी पुतलियाँ कल्पता है पर वह पुतलियाँ शिल्पी के मन में होती हैं थम्भा ज्यों का त्यों ही स्थित है वैसे ही सब पदार्थ आत्मा में मन कल्पे हैं वास्तव में आत्मा ज्यों का त्यों ब्रह्म है । उन पुतलियों में बड़ी पुतली ब्रह्म है और छोटी पुतली जीव है । जैसे वास्तव में थम्भा है, पुतली कोई नहीं उपजी; वैसे ही वास्तव में आत्मसत्ता है जगत् कुछ उपजा नहीं; संकल्प से भासता है और संकल्प के मिटने से जगत्कल्पना मिट जाती है । इतना सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! एक जीव में जो बहुत जीव हुए हैं तो क्या वे पर्वत में पाषाण की नाईं उपजते हैं वा
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कोई जीवों की खानि है ? जिससे इस प्रकार इतने जीव उत्पन्न हो आते हैं; अथवा मेघ की बूँदों वा अग्नि से विस्फुलिङ्गों की नाईं उपजते हैं सो कृपाकर कहिये ? और एक जीव कौन है जिससे सम्पूर्ण जीव उपजते हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! न एक जीव है और न अनेक हैं। तेरे ये वचन ऐसे हैं जैसे कोई कहे कि मैंने शश के शृङ्ग उड़ते देखे हैं। एक जीव भी तो नहीं उपजा मैं अनेक कैसे कहूँ ? शुद्ध और अद्वैत आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। वह अनन्त आत्मा है, उसमें भेद की कोई कल्पना नहीं है। हे रामजी ! जो कुछ जगत् तुमको भासता है सो सब आकाशरूप है कोई पदार्थ उपजा नहीं। केवल संकल्प के फुरने से ही जगत् भासता है। जीवशब्द और उसका अर्थ आत्मा में कोई नहीं उपजा, यह कल्पना भ्रम से भासती है आत्म-सत्ता ही जगत् की नाईं भासती है, उसमें न एक जीव है और न अनेक जीव हैं। हे रामजी ! आदि विराट् आत्मा आकाशरूप है, उससे जगत् उपजा है। मैं तुमको क्या कहूँ ? जगत् विराट्रूप है, विराट् जीवरूप है और जीव आकाशरूप है, फिर और जगत् क्या रहा और जीव क्या हुआ ? सब चिदाकाशरूप है। ये जितने जीव भासते हैं वे सब ब्रह्मस्वरूप हैं, द्वैत कुछ नहीं और न इसमें कुछ भेद है। रामजी ने पूछा, हे मुनीश्वर ! आप कहते हैं कि आदि जीव कोई नहीं तो इन जीवों का पालनेवाला कौन है। वह नियामक कौन है जिसकी आज्ञा में ये विचरते हैं ? जो कोई हुआ ही नहीं तो ये सर्वज्ञ और अल्पज्ञ क्योंकर होते हैं और एक में कैसे हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जिसको तुम आदिजीवी कहते हो वह ब्रह्मरूप है ! वह नित्य, शुद्ध और अनन्त शक्तिमान् अपने आपमें स्थित है उसमें जगत् कल्पना कोई नहीं। हे रामजी ! जो शुद्ध चिदाकाश अनन्तशक्ति में आदिचित्त किञ्चन हुआ है वही शुद्ध चिदाकाश ब्रह्मसत्ता जीव की नाईं भासने लगी है। स्पन्दद्वारा हुए की नाईं भासती है। पर अपने स्वरूप से इतर कुछ हुआ नहीं। चैतन्य संवित् आदि स्पन्द से (विराट्) ब्रह्मारूप होकर स्थित हुआ है और उसने संकल्प करके जगत् रचा है। उर्मी ने
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शुभ अशुभ कर्म रचे हैं और उसी से नीति रची है—अर्थात् यह शुभ है और यह अशुभ है; वही आदि नीति महाप्रलय पर्यन्त ज्यों की त्यों चली जाती है । हे रामजी ! यह अनन्त शक्तिमान् देव जिससे आदि फुरना हुआ है वैसे ही स्थित है। जो आदि शक्ति फुरी है वह वैसे ही है जो अल्पज्ञ फुरा है सो अल्पज्ञ ही है । हे रामजी ! संसार के पदार्थों में नीतिशक्ति प्रधान है; उसके लाँघने को कोई भी समर्थ नहीं है । जैसे रचा है वैसे ही महाप्रलय पर्यन्त रहती है । हे रामजी ! आदि नित्य-विराट्पुरुष अन्तवाहक रूप पृथ्वी आदि तत्त्वों से रहित है और यह जगत् भी अन्तवाहक रूप पृथ्वी आदि तत्त्वों से नहीं उपजा—सब संकल्प-रूप है । जैसे मनोराज का नगर शून्य होता है वैसे ही यह जगत् शून्य है । हे रामजी ! इस सर्ग का निमित्त कारण और समवाय कारण कोई नहीं । जो पदार्थ निमित्त कारण और समवाय कारण बिना दृष्टि आवे उसे भ्रममात्र जानिये, वह उपजता नहीं । जो पदार्थ उपजता है वह इन्हीं दोनों कारणों से उपजा है, पर वह जगत् का कारण इनमें से कोई नहीं । ब्रह्मसत्ता नित्य, शुद्ध और अद्वैत सत्ता है उसमें कार्य कारण की कल्पना कैसे हो ? हे रामजी ! यह जगत् अकारण है केवल भ्रान्ति से भासता है । जब तुमको आत्मविचार उपजेगा तब दृश्य भ्रम मिट जावेगा । जैसे दीपक हाथ में लेकर अन्ध-कार को देखिये तो कुछ दृष्टि नहीं आता वैसे ही जो विचार करके देखोगे तो जगत् भ्रम मिट जावेगा । जगत् भ्रम मन के फुरने से ही उदय हुआ है इससे संकल्पमात्र है । इसका अधिष्ठान ब्रह्म है, सब नामरूप उस ब्रह्मसत्ता में कल्पित हैं और षट्विकार भी उसी ब्रह्मसत्ता में फुरे हैं पर सबसे रहित और शुद्ध चिदाकाशरूप है और जगत् भी वह रूप है जैसे समुद्र में द्रवता से तरङ्ग, बुद्बुदे और फेन भासते हैं वैसे ही आत्मसत्ता में चित्त के फुरने से जगत् भासता है । जैसे आदि चित्त में पदार्थसत्ता दृढ़ हुई है वैसे ही स्थित है और आत्मा के साथ अभेद है, इतर कुछ नहीं, सब चिदाकाश है । इच्छा, देवता, समुद्र, पर्वत ये सब आकाशरूप है । हे रामजी ! हमको सदा चिदाकाशरूप ही भासता है
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और आत्मसत्ता ही मन, बुद्धि, पर्वत, कन्दरा, सब जगत् होकर भासती है । जब चैत्योन्मुखत्व होती है सब जगत् भासता है । जैसे वायु स्पन्द-रूप होती है तो भासती है और निस्स्पन्दरूप होती है तो नहीं भासती वैसे ही चित्तसंवेदन स्पन्दरूप होता है तो जगत् भासता है और जब चित्तसंवेदन स्फुरणरूप होता है तो जगत् कल्पना मिट जाती है । हे रामजी ! चिन्मात्र में जो चैत्यभाव हुआ है इसी का नाम जगत् है, जब चैत्य से रहित हुआ तो जगत् मिट जाता है । जब जगत् ही न रहा तो भेदकल्पना कहाँ रही ? इससे न कोई कार्य है, न कारण है, और न जगत् है—सब भ्रममात्र कल्पना है । शुद्ध चिन्मात्र अपने आप में स्थित है । हे रामजी ! शुद्ध चिन्मात्र में चित्त सदा किञ्चन रहता है जैसे मिरचों के बीज में तीक्ष्णता सदा रहती है, परन्तु जब कोई खाता है तब तीक्ष्णता भासती है, अन्यथा नहीं भासता वैसे ही जब चित्त संवेदन चैत्योन्मुखत्व होता है तब जीव को जगत् भासता है और संवेदन से रहित जीव को जगत् कल्पना नहीं भासती । हे रामजी ! जब संवेदनके साथ परिच्छिन्न संकल्प मिलता है तब जीव होता है और जब इससे रहित होता है तो शुद्ध चिदात्मा ब्रह्म होता है । जिस पुरुष की सब कल्पना मिट गई है और जिसको शुद्ध निर्विकार ब्रह्मसत्ता का साक्षात्कार हुआ है वह पुरुष संसार भ्रम से मुक्त हुआ है । हे रामजी ! यह सब जगत् आत्मा का आभासरूप है । वह आत्मा अच्छेद्य, अदाह्य अक्लेद्य नित्य, शुद्ध, सर्वगत स्थाणु की नाईं अचल है अतः जगत् चिदाकाशरूप है । हमको तो सदा ऐसे ही भासता है पर अज्ञानी वाद विवाद किया करते हैं । हमको वाद विवाद कोई नहीं, क्योंकि हमारा सब भ्रम नष्ट हो गया है । हे रामजी ! यह सब जगत् ब्रह्मरूप है और द्वैत कुछ नहीं । जिसको यह निश्चय हो गया है उसको सब अङ्ग अपना स्वरूप ही है तो निराकार और निर्वपुसत्ता के अंग अपना स्वरूप क्यों न हो । यह सब प्रपञ्च चिदाकाशरूप है परन्तु अज्ञानी को भिन्न भिन्न और जन्म मरण आदि विकार भासते हैं और ज्ञानवान को सब आत्मरूप ही भासते हैं । पृथ्वी, अप, तेज, वायु और आकाश सब आत्मा के आश्रय फुरते
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हैं और चित्तशक्ति ही ऐसे होकर भासती है । जैसे वसन्त ऋतु आती है तो रसाशक्ति से वृक्ष और बेलें सब प्रफुल्लित होकर भासती हैं वैसे ही चित्तशक्ति को स्पन्दता ही जगतरूप होकर भासती है । हे रामजी ! जैसे वायु स्पन्दता से भासती है वैसे ही जगत् फुरने से भासता है वैसे ही चित्तसंविद् जगतरूप होकर भासना है फुरने से ही जगत् है और कोई वस्तु नहीं है, इसी से जगत् कुछ नहीं है । जैसे समुद्र तरङ्गरूप होकर भासता है, वैसे ही आत्मा जगतरूप होकर भासता है । इससे जगत् दृश्य-भाव से भासता है पर संवित् से कुछ नहीं । वायु जड़ और आत्मा चैतन्य है और जल भी परिणाम से तरङ्गरूप होता है, आत्मा अच्युत और निराकार है । हे रामजी ! चैतन्यरूप रत्न है और जगत् उसका चमत्कार है अथवा चैतन्यरूपी अग्नि में जगतरूपी उष्णता है । हे रामजी ! चैतन्य प्रकाश ही भौतिक प्रकाशरूप होकर भासता है, इससे जगत् है, और वास्तव से नहीं । चैतन्य सत्ता ही शून्य आकाशरूप होकर भासती है ! इस भाव से जगत् है वास्तव में नहीं हुआ । इससे जगत् कुछ नहीं चेतनसत्ता ही पृथ्वीरूप होकर भासती है, दृष्टि में आता है इससे जगत् है पर आत्मसत्ता से इतर कुछ नहीं हुआ । चैतन्य रूप घन अन्धकार में जगतरूपी कृष्णता है, अथवा चैतन्यरूपी काजल का पहाड़ है और जगतरूपी उसका परमाणु भ्रम है और चैतन्यरूपी सूर्य में जगतरूपी दिन है, आत्मरूपी समुद्र में जगतरूपी तरङ्ग है, आत्मरूपी कुसुम में जगतरूपी सुगन्ध है, आत्मरूपी वरफ में शुक्लता और शीत-लतारूपी जगत् है, आत्मरूपी बेलि में जगतरूपी फूल है, आत्मरूपी स्वर्ण में जगतरूपी भूषण है; आत्मरूपी पर्वत में जगतरूपी जड़ सघनता है, आत्मरूपी अग्नि में जगतरूपी प्रकाश है, आत्मरूपी आकाश में जगतरूपी शून्यता है, आत्मरूपी ईख में जगतरूपी मधुरता है; आत्म-रूपी दूध में जगतरूपी घृत है, आत्मरूपी मधु में जगतरूपी मधुरता है अथवा आत्मरूपी सूर्य में जगतरूपी जलाभास है और नहीं है । हे रामजी ! इस प्रकार देखो कि जो सर्व, ब्रह्म, नित्य, शुद्ध, परमानन्द-स्वरूप है वह सर्वदा अपने आप में स्थित है-भेद कल्पना कोई नहीं ।
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जैसे जल द्रवता से तरङ्गरूप होके भासता है वैसे ही ब्रह्मसत्ता जगतरूप होके भासती है न कोई उपजता है और न कोई नष्ट होता है। हे रामजी ! आदि जो चित्तशक्ति स्पन्दरूप है वह विराड्रूप ब्रह्म वास्तव से चिदाकाशरूप है, आत्मसत्ता से इतरभाव को नहीं प्राप्त हुआ । जैसे पत्र के ऊपर लकीरें होती हैं सो पत्र से भिन्न वस्तु नहीं पत्ररूप ही हैं वैसे ही ब्रह्म में जगत् है कुछ इतर नहीं है, बल्कि पत्र के ऊपर लकीरें तो आकार हैं, पर ब्रह्म में जगत् कोई आकार नहीं। सब आकाशरूप मन से फुरता है, जगत् कुछ हुआ नहीं। जैसे शिला में शिल्पी पुतलियाँ कल्पता है वैसे ही आत्मा में मन ने जगत् कल्पना की है। वास्तव में कुछ हुआ नहीं शिला वज्र की नाईं दृढ़ है और सब जगत् को धरि रही है और आकाश की नाईं विस्ताररूप होकर शान्तरूप है! निदान हुआ कुछ नहीं जो कुछ है सो ब्रह्मरूप है और जो ब्रह्म ही है तो कल्पना कैसे हो? इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब मुनिशार्दूल वशिष्ठजी ने कहा तब सायंकाल का समय हुआ और सब सभा परस्पर नमस्कार करके अपने अपने आश्रम को गई। फिर सूर्य की किरणों के निकलते ही सब अपने-अपने स्थानों पर आ बैठे।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे सर्वब्रह्मप्रतिपादननाम त्रयोदशस्सर्गः ॥ १३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! आत्मा में कुछ उपजा नहीं भ्रम से भास रहा है। जैसे आकाश में भ्रम से तरुवरे और मुक्तमाला भासती हैं वैसे ही अज्ञान से आत्मा में जगत् भासता है। जैसे थम्भे की पुतलियाँ शिल्पी के मन में भासती हैं कि इतनी पुतलियाँ इस थम्भे में हैं सो पुतलियाँ कोई नहीं, क्योंकि किसी कारण से नहीं उपजीं वैसे ही चेतनरूपी थम्भे में मनरूपी शिल्पी त्रिलोकीरूपी पुतलियाँ कल्पता है ! परन्तु किसी कारण से नहीं उपजीं—ब्रह्मसत्ता ज्यों की त्यों ही स्थित है। जैसे सोमजल में त्रिकाल तरङ्गों का अभाव होता है इसी प्रकार जगत् का होना कुछ नहीं, चित् के फुरने से ही जगत् भासता है। जैसे सूर्य की किरणें झरोखों में आती हैं और उसमें सूक्ष्म त्रसरेणु होते हैं उनसे भी
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चिद्अणु सूक्ष्म है जैसे त्रसरेणु से सुमेरु पर्वत स्थूल है वैसे ही चिद्अणु से त्रसरेणु स्थूल हैं। ऐसे सूक्ष्म चिद्अणु से यह जगत् फुरता है सो वह आकाशरूप है, कुछ उपजा नहीं, फुरने से भासता है। हे रामजी! आकाश, पर्वत, समुद्र, पृथ्वी आदि जो कुछ जगत् भासता है सो कुछ उपजा नहीं तो और पदार्थ कहाँ उपजे हों? निदान सब आकाशरूप हैं वास्तव में कुछ उपजा नहीं और जो कुछ अनुभव में होता है वह भी असत् है। जैसे स्वप्नसृष्टि अनुभव में होती है वह उपजी नहीं, असद्रूप है वैसे ही यह जगत् भी असद्रूप है। शुद्ध निर्विकार सत्ता अपने आप में स्थित है। उस सत्ता को त्याग करके जो अवयव अवयवी के विकल्प उठाते हैं उनको धिक्कार है। यह सब आकाशरूप है और आधिभौतिक जगत् जो भासता है सो गन्धर्वनगर और स्वप्नसृष्टिवत् है। हे रामजी! पर्वतों सहित जो यह जगत् भासता है सो रत्तीमात्र भी नहीं। जैसे स्वप्न के पर्वत जाग्रत के रत्ती भर भी नहीं होते, क्योंकि कुछ हुए नहीं, वैसे ही यह जगत् आत्मरूप है और भ्रान्ति करके भासता है। जैसे सङ्कल्प का मेघ सूक्ष्म होता है, वैसे ही यह जगत् आत्मा में तुच्छ है। जैसे शशे के शृङ्ग असत् होते हैं वैसे ही यह जगत् असत् है और जैसे मृगतृष्णा की नदी असत् होती है वैसे ही यह जगत् असत् है। असम्यक् ज्ञान से ही भासती है और विचार करने से शान्त हो जाती है। जब शुद्ध चैतन्यसत्ता में चित्तसंवेदन होता है तब वही संवेदन जगद्रूप होकर भासता है परन्तु जगत् हुआ कुछ नहीं। जैसे समुद्र अपनी द्रवता के स्वभाव से तरङ्गरूप होकर भासता है परन्तु तरङ्ग कुछ और वस्तु नहीं है जलरूप ही है वैसे ही ब्रह्मसत्ता जगद्रूप होकर फुरती है। जो जगत् कोई भिन्न पदार्थ नहीं है ब्रह्मसत्ता ही किञ्चन द्वारा ऐसे भासती है। जैसा बीज होता है वैसा ही अंकुर निकलता है, इसलिए जैसे आत्मसत्ता है वैसे ही जगत् है दूसरी वस्तु कोई नहीं आत्मसत्ता अपने आप में ही स्थित है पर चित्तसंवेदन के स्पन्द से जगत्-रूप होता है। हे रामजी! इसी पर मण्डप आख्यान तुमको सुनाता हूँ, वह श्रवण का भूषण है और उसके समझने में सब संशय मिट जावेंगे
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और विश्राम प्राप्त होगा । इतना सुन रामजी बोले, हे भगवन् ! मेरे बोध की वृत्ति के निमित्त मण्डपाख्यान जिस विधि में हुआ है सो संक्षेप से कहो । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस पृथ्वी में एक महातेजवान् राजा पद्म हुआ था । वह लक्ष्मीवान्, सन्तानवान्, मर्यादा का धारनेवाला अति सतोगुणी और दोषों का नाशकर्त्ता एवं प्रजापालक, शत्रुनाशक और मित्रप्रिय था और सम्पूर्ण राजसी और सात्त्विकी गुणों से सम्पन्न मानो कुल का भूषण था । लीला नाम उसकी स्त्री बहुत सुन्दरी और पतिव्रता थी मानो लक्ष्मी ने अवतार लिया था । उसके साथ राजा कभी बागों और तालों और कभी कदम्बवृक्षों और कल्पवृक्षों में जाया करता था, कभी सुन्दर-सुन्दर स्थानों में जाके क्रीड़ा करता था; कभी बरफ का मन्दिर बनवाके उसमें रहता था और कभी रत्नमणि के जड़े हुए स्थानों में शय्या विछावाके विश्राम करता था । निदान इसी प्रकार दोनों दूर और निकट के ठाकुरद्वारों और तीर्थों में जाके क्रीड़ा करते और राजसी और सात्त्विकी स्थानों में विचरते थे । वे दोनों परस्पर श्लोक भी बनाते थे एक पद कहे दूसरा उसको श्लोक करके उत्तर दे और श्लोक भी ऐसे पढ़ें कि पढ़ने में तो संस्कृत परन्तु समझने में सुगम हो । इसी प्रकार दोनों का परस्पर अति स्नेह था । एक समय रानी ने विचार किया कि राजा मुझको अपने प्राणों की नाईं प्यारे और बहुत सुन्दर हैं इसलिये कोई ऐसा यत्न, यज्ञ वा तप-दान करूँ कि किसी प्रकार इनकी सदा युवावस्था रहे और अजर अमर हो इसका और मेरा कदाचित् वियोग न हो । ऐसा विचार कर उसने ब्राह्मणों, ऋषीश्वरों और मुनीश्वरों से पूछा कि हे विप्रो ! नर किस प्रकार अजर-अमर होता है ? जिस प्रकार होता हो हमसे कहो ? विप्र बोले, हे देवि ! जप, तप आदि से सिद्धता प्राप्त होती है परन्तु अमर नहीं होता । सब जगत् नाशरूप है इस शरीर से कोई स्थिर नहीं रहता । हे रामजी ! इस प्रकार ब्राह्मणों से सुन और भर्त्ता के वियोग से डरकर रानी विचार करने लगी कि भर्त्ता से मैं प्रथम मरूँ तो मेरे बड़े भाग हों और सुखवान् होऊँ और जो यह प्रथम मृतक हो तो वही उपाय करूँ जिससे राजा का जीव मेरे अन्तःपुर में ही रहे-
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बाह्य न जावे—और मैं दर्शन करती रहूँ। इसमें मैं सरस्वती की सेवा करूँ। हे रामजी! ऐसा विचार शास्त्रानुसार तपरूप सरस्वती का पूजन करने लगी। निदान तीन रात्र और दिनपर्यन्त निराहार रह चतुर्थदिन में व्रतपारण करे और देवताओं, ब्राह्मणों, पण्डितों गुरु और ज्ञानियों की पूजा करके स्नान, दान, तप, ध्यान नित्यप्रति कीर्त्तन करे पर जिस प्रकार आगे रहती थी उसी प्रकार रहे भर्त्ता को न जनावे। इसी प्रकार नेमसंयुक्त क्लेश से रहित तप करने लगी। जब तीन सौ दिन व्यतीत हुए तब प्रीतियुक्त हो सरस्वती की पूजा की और वागीश्वरी ने प्रसन्न होकर दर्शन दिया और कहा, हे पुत्रि! तूने भर्त्ता के निमित्त निरन्तर तप किया है, इससे मैं प्रसन्न हुई, जो वर तुझे अभीष्ट हो सो माँग। लीला बोली, हे देवि! तेरी जय हो। मैं अनाथ तेरी शरण हूँ मेरी रक्षा करो। इस जन्म को जरारूपी अग्नि जो बहुत प्रकार से जलाती है उसके शान्त करने को तुम चन्द्रमा हो और हृदय के तम नाश करने को तुम सूर्य हो। हे माता! मुझको दो वर दो—एक यह कि जब मेरा भर्त्ता मृतक हो तब उसका पुर्यष्टक बाह्य न जावे अन्तःपुर ही में रहे और दूसरा यह कि जब मेरी इच्छा तुम्हारे दर्शन की हो तब तुम दर्शन दो। सरस्वती ने कहा ऐसा ही होगा। हे रामजी! ऐसा वरदान देकर जैसे समुद्र में तरङ्ग उपजके लीन होते हैं वैसे ही देवी अन्तर्धान हो गई और लीला वरदान पाकर बहुत प्रसन्न हुई। कालरूपी चक्र में क्षणरूपी आरे लगे हुए हैं और उसकी तीनसौ साठ कीलें हैं वह चक्र वर्ष पर्यन्त फिरकर फिर उसी ठौर आता है। ऐसे कालचक्र के वर्ग से राजा पद्म रणभूमि में घायल होकर घर में आकर मृतक हो गया। पुर्यष्टक के निकलने से राजा का शरीर कुम्हिला गया और रानी उसके मरने से बहुत शोकवान हुई। जैसे कमलिनी जल बिना कुम्हिला जाती है वैसे ही उसके मुख की कान्ति दूर हो गई और विलाप करने लगी। कभी ऊँचे स्वर में रुदन करे और कभी चुप रह जावे। जैसे चकवे के वियोग से चकवी शोकवान होती है और जैसे सर्प की फुत्कार लगने से कोई मूर्च्छित होता है वैसे ही राजा के वियोग से लीला मूर्च्छित
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हो गई और व्याकुल होके प्राण त्यागने लगी । तब सरस्वतीजी ने दया करके आकाशवाणी की कि हे सुन्दरि ! तेरा भर्त्ता जो मृतक हुआ है इसको तू सब ओर से फूलों से ढाँप कर रख, तुझको फिर भर्त्ता की प्राप्ति होवेगी और यह फूल न कुम्हिलावेंगे । तेरे भर्त्ता की ऐसी अवस्था है जैसे आकाश की निर्मल कान्ति है और वह तेरे ही मन्दिर में है कहीं गया नहीं । हे रामजी ! इस प्रकार कृपा करके जब देवी ने वचन कहे तो जैसे जल बिना मछली तड़पती हुई मेघ की वर्षा से कुछ शान्तिमान् होती है वैसे ही लीला कुछ शान्तिमान् हुई । फिर जैसे धन हो और कृपणता से धन का सुख न होवे वैसे ही वचनों से उसे कुछ शान्ति हुई और भर्त्ता के दर्शन बिना जब पूर्ण शान्ति न हुई तब उसने ऊपर नीचे फूलों से भर्त्ता को ढाँपा और उसके पास आप शोकवान् होकर बैठी रुदन करने लगी । फिर देवी की आराधना की तो अर्द्ध रात्रि के समय देवीजी आ प्राप्त हुई और कहा, हे सुन्दरि ! तैने मेरा स्मरण किस निमित्त किया है और तू शोक किस कारण करती है । यह तो सब जगत् भ्रान्तिमात्र है । जैसे मृगतृष्णा की नदी होती है वैसे ही यह जगत् है । अहं त्वं इदं से ले आदिक जो जगत् भासता है सो सब कल्पनामात्र है और भ्रम करके भासता है । आत्मा में हुआ कुछ नहीं तुम किसका शोक करती हो । लीला बोली, हे परमेश्वरि ! मेरा भर्त्ता कहाँ स्थित है और उसने क्या रूप धारण किया है ? उसको मुझे मिलाओ, उसके बिना मैं अपना जीना नहीं देख सकती । देवी बोली, हे लीले ! आकाश तीन हैं—एक भूताकाश, दूसरा चित्ताकाश और तीसरा चिदाकाश । भूताकाश चित्ताकाश के आश्रय है और चित्ताकाश चिदाकाश के आश्रय है तेरा भर्त्ता अब भूताकाश को त्यागकर चित्ताकाश को गया है । चित्ताकाश चिदाकाश के आश्रय स्थित है इससे जब तू चिदाकाश में स्थित होगी तब सब ब्रह्मांड तुझको भासेगा । सब उसी में प्रतिबिम्बित होते हैं वहाँ तुझको भर्त्ता का और जगत् का दर्शन होगा । हे लीले ! देश से क्षण में संवित् देशान्तर को जाता है उसके मध्य जो अनुभव आकाश है वह चिदाकाश है जब तू संकल्प को त्याग दे
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तो उसमे जो शेष रहेगा सो चिदाकाश है । हे लीले ! यहाँ जो जीव विचरते हैं सो पृथ्वी के आश्रय हैं और पृथ्वी आकाश के आश्रय है, इससे ये सब जीव जो विचरते हैं सो भूताकाश के आश्रय विचरते हैं और चित्त जिसके आश्रय से क्षण में देश देशान्तर भटकता है सो चिदाकाश है । हे लीले ! जब दृश्य का अत्यन्त अभाव होता है तब परमपद की प्राप्ति होती है सो चिरकाल के अभ्यास से होती है और मेरा यह वर है कि तुझको शीघ्र ही प्राप्त हो । हे रामजी ! जब इस प्रकार कहकर ईश्वरी अन्तर्धान हो गई तब लीला रानी निर्विकल्प समाधि में स्थिति हुई और देह का अहङ्कार त्याग कर चित्त सहित पक्षी के समान अपने गृह से उड़ कर एक क्षण आकाश को पहुँची जो नित्य शुद्ध अनन्त आत्मा परमशान्ति और सबका अधिष्ठान है उसमें जाकर भर्त्ता को देखा । गर्नी स्पन्दन कल्पना ले गई थी उसने अपने भर्त्ता को वहाँ देखा और बहुत मण्डलेश्वर भी सिहासनों पर बैठे देखे । एक बड़े सिंहासन पर बैठे अपने भर्त्ता को भी देखा जिसके चारों ओर जय जय शब्द होता था । उसने वहाँ बड़े सुन्दर मन्दिर देखे और देखा कि राजा के पूर्व दिशा में अनेक ब्राह्मण ऋषीश्वर और मुनीश्वर बैठे हैं और बड़ी ध्वनि से पाठ करते हैं । दक्षिण दिशा में अनेक सुन्दरी स्त्रियाँ नाना प्रकार के भूषणों सहित बैठी हुई हैं । उत्तरदिशा में हस्ती, घोड़े, रथ प्यादे और चारों प्रकार की अनन्त सेना देखी और पश्चिम में मण्डलेश्वर देखे । चारों दिशा में मण्डलेश्वर आदि उस जीव के आश्रय विराजते देखके आश्चर्य में हुई । फिर नगर और प्रजा देखी कि सब अपने व्यवहार में स्थित हैं और राजा की सभा में जा बैठी पर रानी सबको देखती थी और रानी को कोई न देखता था । जैसे और के सङ्कल्पपुर को और नहीं देखता वैसे ही रानी को कोई देख न सके । तब रानी ने उसका अन्तःपुर देखा जहाँ ठाकुरद्वारे बने हुए देवताओं की पूजा होती थी । वहाँ की गन्ध, धूप और पवन त्रिलोकी को मग्न करती थी और राजा का यश चन्द्रमा की नाईं प्रकाशित था ! इतने में पूर्व दिशा से हरकारे ने आके कहा कि हे राजन् ! पूर्व दिशा में और किसी राजा को क्षोभ हुआ । फिर उत्तर दिशा से हर-
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कारे ने आ कहा कि हे राजन् ! उत्तरदिशा में और राजा का क्षोभ हुआ है और तुम्हारे मण्डलेश्वर युद्ध करते हैं । इसी प्रकार दक्षिण दिशा की ओर से भी हरकारा आया और उसने भी कहा कि और राजा का क्षोभ हुआ है और पश्चिम दिशा से हरकारा आया उसने कहा कि पश्चिम दिशा में भी क्षोभ हुआ है । एक और हरकारा आया उसने कहा कि सुमेरु पर्वत पर जो देवताओं और सिद्धों के रहने के स्थान हैं वहाँ क्षोभ हुआ है और अस्ताचल पर्वत क्षोभ हुआ है । तब जैसे बड़े मेघ आवें वैसे ही राजा की आज्ञा से बहुत सी सेना आई । रानी ने बहुत से मन्त्री, नन्द आदिक टहलुये, ऋषीश्वर और मुनीश्वर वहाँ देखे । जितने भृत्य थे वे सब सुन्दर और वर्षा से रहित श्वेत बादरों की नाईं श्वेत वस्त्र पहिने देखे और बड़े वेदपाठी ब्राह्मण देखे जिनके शब्द से नगारे के शब्द भी सूक्ष्म भासते थे ! हे रामजी ! इस प्रकार ऋषीश्वर, मन्त्री, टहलुये और बालक उसने देखे, सो पूर्व और अपूर्व दोनों देखती भई और आश्चर्यवान् हो चित्त में यह शङ्का उपजी कि मेरा भर्त्ता ही मुआ है वा सम्पूर्ण नगर मृतक हुआ है जो ये सब परलोक में आये हैं । तब क्या देखा कि मध्याह्न का सूर्य शीश पर उदित है और राजा सुन्दर षोडश वर्ष का प्रथम की जरावस्था को त्याग कर नूतन शरीर को धारे बैठा है । ऐसे आश्चर्य को देखे के रानी फिर अपने गृह में आई । उस समय आधीरात्रि का समय था अपनी सहेलियों को सोई हुई देख जगाया और कहा जिस सिंहासन पर मेरा भर्त्ता बैठता था उसको साफ करो में उसके ऊपर बैठूँगी और जिस प्रकार उसके निकट मन्त्री और भृत्य आन बैठते थे उसी प्रकार आवें । इतना सुनकर सहेलियों ने जा बड़े मन्त्री से कहा और मन्त्री ने सबको जगाया और सिंहासन झाड़वाकर मेघ की नाईं जल की वर्षा की । सिंहासन पर और उसके आसपास वस्त्र बिछाये और मसालें जलाकर बड़ा प्रकाश किया । जैसे अगस्त्यमुनि ने समुद्र को पान किया था वैसे ही अन्धकार को प्रकाश ने जब पान कर लिया तब मन्त्री, टहलुये, पण्डित, ऋषीश्वर ज्ञानवान् जितने कुछ राजा के पास आते थे वे सब सिंहासन के निकट बैठे और इतने लोग
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आये मानों प्रलयकाल में समुद्र का क्षोभ हुआ है जल से पूर्ण प्रलय हुई सृष्टि मानों पुनः उत्पन्न हुई है। लीला इस प्रकार मन्त्री, टहलुये, पण्डित और बालकों को भर्त्ता बिना देखे बड़े आश्चर्य को प्राप्त हुई कि एक आदर्श को अन्तर बाहर दोनों ओर देखती है। इस प्रकार देखके हृदय की वार्त्ता किसी को न बताई और भीतर आकर कहने लगी कि बड़ा आश्चर्य है, ईश्वर की माया जानी नहीं जाती कि यह क्या है। इस प्रकार आश्चर्यमान होकर उसने सरस्वतीजी की आराधना की और सरस्वती कुमारी कन्या का रूप धरके आन प्राप्त हुई । तब लीला ने कहा, हे भगवति ! में बारम्बार पूछती हूँ तुम उद्वेगवान् न होना, बड़ों का यह स्वभाव होता है कि जो शिष्य बारम्बार पूछे तो भी खेदवान् नहीं होते । अब में पूछती हूँ कि यह जगत् क्या है और वह जगत् क्या है ? दोनों में कृत्रिम कौन है और अकृत्रिम कौन है ? देवी बोली, हे लीले ! तूने पूछा कि कृत्रिम कौन है और अकृत्रिम कौन है सो में पीछे तुझसे कहूँगी । लीला बोली, हे देवि ! जहाँ तुम हम बैठे हैं वह अकृत्रिम है और वह जो मेरे भर्त्ता का स्वर्ग है सो कृत्रिम है, क्योंकि सूर्यस्थान में वह सृष्टि हुई है । देवी बोली, हे लीले ! जैसा कारण होता है वैसा ही कार्य होता है। जो कारण सत् होता है तो कार्य भी सत् होता है और सत् से असत् नहीं होता और असत् से सत् भी नहीं होता और न कारण से अन्य कार्य होता है। इससे जैसे यह जगत् है वैसा ही वह जगत् भी है । इतना सुन फिर लीला ने पूछा, हे देवि ! कारण से अन्य कार्यसत्ता होती है, क्योंकि मृत्तिका जल के उठाने में समर्थ नहीं और जब मृत्तिका का घट बनता है तब जल को उठाता है तो कारण से अन्य कार्य की भी सत्ता हुई । देवी बोली, हे लीले ! कारण से अन्य कार्य की सत्ता तब होती है जब सहायककारी भिन्न होता है । जहाँ सहायककारी नहीं होता वहाँ कारण से अन्य कार्य की सत्ता नहीं होती । तेरे भर्त्ता की सृष्टि भी कारण बिना भासी है। उसका जीवपुर्यष्टक आकाशरूप था, वहाँ न कोई समवायकारण था, और न निमित्त कारण था इससे उसको कृत्रिम कैसे कहिये ? जो किसी
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का किया हो तो कृत्रिम हो पर वह तो आकाशरूप पृथ्वी आदिक तत्त्वों से रहित है । जो समवाय कारण ही न हो तो उसका निमित्तकारण कैसे हो । इससे तेरे भर्त्ता का सर्ग अकारण है । लीला ने पूछा हे देवि ! उस सर्ग की जो संस्काररूप स्मृति है सो कारण क्यों न हो ? देवी बोली, हे लीले ! स्मृति तो कोई वस्तु नहीं है । स्मृति आकाशरूप है । स्मृति संकल्प का नाम है सो वह भी संकल्प आकाशरूप है और कोई वस्तु नहीं वह मनोराजरूप है इससे उसकी सत्ता भी कुछ नहीं है केवल आभासरूप है । लीला बोली, हे महेश्वरि ! यदि वह संकल्पमात्र आकाशरूप है तो जहाँ हम तुम बैठे हैं वह भी वहीं है तो दोनों तुल्य हैं। देवी बोली, हे लीले ! जैसा तुम कहती हो वैसा ही है । अहं, त्वं, इदं, यह, वह सम्पूर्ण जगत् आकाशरूप है और भ्रान्तिमात्र भासता है । उपजा कुछ नहीं सब आकाशमात्र है और स्वरूप से इनका कुछ सद्भाव नहीं होता । जो पदार्थ सत्य न हो उसकी स्मृति कैसे सत् हो ? लीला बोली हे देवि ! अमूर्त्त मेरा भर्त्ता था सो मूर्तिवत् हुआ और उसको जगत् भासने लगा सो कैसे भासा ? उसका स्मृति कारण है वा किसी और प्रकार से, यह मेरे दृश्यभ्रम निवृत्ति के निमित्त मुझको वही रूप कहो । देवी बोली, हे लीले ! यह और वह सर्ग दोनों भ्रमरूप हैं । जो यह सत् हो तो इसकी स्मृति भी सत् हो पर यह जगत् असतरूप । जैसे यह भ्रम तुमको भासा है सो सुनो । एक महाचिदाकाश है जिसका किञ्चन चिदअणु है और उसके किसी अंश में जगतरूपी वृक्ष है । सुमेरु उस वृक्ष का थम्भ है, सप्तलोक डाली हैं, आकाश शाखाएं हैं, सप्तसमुद्र उसमें रस है और तीनों लोक फल हैं । सिद्ध, गन्धर्व, देवता, मनुष्य और दैत्यरूप मच्छर उसमें रहते हैं और तारागण उसके फूल हैं । उसी वृक्ष के किसी छिद्र में एक देश है और उसमें एक पर्वत है जिसके नीचे एक नगर बसता है । वहाँ एक नदी का प्रवाह चलता है, और वशिष्ठ नाम एक ब्राह्मण जो बड़ा धार्मिक था वहाँ सदा अग्निहोत्र करता था । धन, विद्या, पराक्रम और कर्मों में वशिष्ठजी ऋषीश्वरों के समान था परन्तु ज्ञान में भेद था । जैसा खेचर वशिष्ठ का ज्ञान है वैसा भूचर वशिष्ठ का
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ज्ञान न था। उसकी स्त्री का नाम अरुन्धती था। वह पतिव्रता और चन्द्रमा के समान सुन्दरी थी और उसी अरुन्धती के समान विद्या, कर्म, कान्ति, धन, चेष्टा और पराक्रम उसका भी था और चैतन्यता अर्थात् ज्ञान और सब लक्षण एक समान थे। वह आकाश की अरुन्धती थी और यह भूमि की अरुन्धती थी ! एक काल में वशिष्ठ ब्राह्मण पर्वत के शिखर पर बैठा था। वह स्थान सुन्दर हरे तृणों से शोभायमान था। एक दिन एक अति सुन्दर राजा नाना प्रकार के भूषणों से भूषित परिवार सहित उस पर्वत के निकट शिकार खेलने के निमित्त चला जाता था। उसके शीश पर दिव्य चमर होता ऐसा शोभा देता था मानो चन्द्रमा की किरणें प्रसर रही हैं और शिर पर अनेक प्रकार के छत्रों की छाया मानों रूपे का आकाश विदित होता था। रत्नमणि के भूषण पहिरे हुए मण्डलेश्वर उसके साथ थे और हस्ती, घोड़े, रथ और पैदल चारों प्रकार की सेना जो आगे चली जाती थी उनकी धूलि बादल होकर स्थित हुई निदान नौबत नगारे बजते हुए राजा की सवारी जाती देख के वशिष्ठ ब्राह्मण मन में चिन्तवन करने लगा कि राजा को बड़ा सुख प्राप्त होता है, क्योंकि सब सौभाग्य से राजा सम्पन्न होता है। इस प्रकार राज्य मुझको भी प्राप्त हो। तब तो वह यह इच्छा करने लगा कि मैं कब दिशाओं को जीतूँगा और मेरे यश से कब दशों दिशा पूर्ण होंगी ऐसे छत्र मेरे शिर पर कब ढुरेंगे चारों प्रकार की सेना मेरे आगे कब चलेगी। सुन्दर मन्दिरों में सुन्दरी स्त्रियों के साथ मैं कब विलास करूँगा और मन्द मन्द शीतल पवन सुगन्धता के साथ कब स्पर्श होगा। हे लीले! जब इस प्रकार ब्राह्मण ने संकल्प को धारण किया और जो अपने स्वकर्म थे सो भी करता रहा कि इतने ही में उसको जरावस्था प्राप्त हुई। जैसे कमल के ऊपर वरफ़ पड़ता है तो कुम्हिला जाता है वैसे ही ब्राह्मण का शरीर कुम्हिला गया और मृत्यु का समय निकट आया। जब उसकी स्त्री भर्त्ता की मृत्यु निकट देखके कष्टवान् हुई तो उसने मेरी आराधना, जैसे तूने की है, की और भर्त्ता की अजर अमरता को दुर्लभ जानके मुझसे वर माँगा कि हे देवि! मुझको यह वर दे कि
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जब मेरा भर्त्ता मृतक हो तब इसका जीव बाह्य न जावे। तब मैंने कहा ऐसा ही होगा। हे लीले! जब बहुत काल व्यतीत हुआ तो ब्राह्मण मृतक हुआ पर उसका जीव मन्दिर में ही रहा। जैसे मन्दिर में आकाश रहता है वैसे ही मन्दिर में रहा। हे लीले! जब वह आकाश-रूप हो गया तब उसकी पुर्यष्टक में जो राजा का दृढ़ संकल्प था इसलिये जैसे बीज से अंकुर निकल आता है वैसे ही वह संकल्प आन फुरा और उससे वह अपने को त्रिलोकी का राजा और परम सौभाग्य सम्पन्न देखने लगा कि दशों दिशा मेरे यश से पूर्ण हो रही हैं; मानों यशरूपी चन्द्रमा की यह पूर्णमासी है। जैसे प्रकाश अन्धकार को नाश करता है वैसे ही वह शत्रुरूपी अन्धकार का नाशकर्त्ता प्रकाश हुआ और ब्राह्मणों के चरणों का सिंहासन हुआ अर्थात् ब्राह्मणों को बहुत पूजने लगा। निदान अर्थियों को कल्पवृक्ष और स्त्रियों को कामदेव इत्यादिक जो सात्त्विक और राजसी गुण हैं उनसे सम्पन्न हुआ। पर उसकी स्त्री उसको मृतक देखके बहुत शोकवान् हुई। जैसे जेठ आषाढ़ की मञ्जरी सूख जाती है वैसे ही वह सूख गई और शरीर को छोड़के अन्तवाहक शरीर से अपने भर्त्ता को वैसे ही जा मिली जैसे नदी समुद्र को जा मिलती है और ब्राह्मण के पुत्र धन संयुक्त अपने गृह में रहे। उस ब्राह्मण को मृतक हुए अब आठ दिन हुए हैं कि वही वशिष्ठ ब्राह्मण तेरा भर्त्ता राजा पद्म हुआ। अरुन्धती उसकी स्त्री तू लीला हुई। जितना कुछ आकाश, पर्वत, समुद्र, पृथ्वी और त्रिलोकी है सो वशिष्ठ ब्राह्मण के अन्तःपुर में एक कोने में स्थित है। वहाँ तुमको आठ दिन व्यतीत हुए हैं और अभी सूतक भी नहीं गया पर यहाँ तुमने साठ सहस्र वर्ष राज्य करके नाना प्रकार के सुन्दर भोग भोगे हैं। हे लीले! जिस प्रकार तूने जन्म लिया है सो मैंने सब कहा है। पर वह क्या है? सब भ्रममात्र है। जितना कुछ जगत् तुमको भासता है सो आभासमात्र है संकल्प से फुरता है वास्तव से कुछ नहीं है। हे लीले! जो यह जगत् सत् न हुआ तो इसकी स्मृति कैसे सत्य हो। तुम हम और सब उसी ब्राह्मण के मन्दिर में स्थित हैं। लीला बोली, हे देवि! तुम्हारे वचन को मैं असत् कैसे कहूँ? पर जो तुम कहती हो कि उस ब्राह्मण
उत्पत्ति प्रकरण ।१८१
का जीव अपने गृह में ही रहा; वहाँ हम तुम बैठे हैं और देश देशान्तर, पर्वत, समुद्र, लोक और लोकपालक सब जगत् उसी ही गृह में है तो वह उसमें समाते कैसे हैं ? ये वचन तुम्हारे ऐसे हैं जैसे कोई कहे कि सरसों के दाने में उन्मत्त हाथी बाँधे हुए हैं; सिंहों के साथ मच्छर युद्ध करते हैं, कमल के डोड़े में सुमेरु पर्वत आया है; कमल पर बैठकर भ्रमर रस पान कर गया और स्वप्न में मेघ गर्जता है, चित्रामणि के मोर नाचते हैं और जाग्रत की मूर्ति के ऊपर लिखा हुआ मोर मेघ को गर्जता देखके नृत्य करता है । जैसे ये सब असम्भव वार्त्ता हैं वैसे ही तुम्हारा कहना मुझको असम्भव भासता है । देवी बोली, हे लीले ! यह मैंने तुझसे झूठ नहीं कहा । हमारा कहना कदाचित् असत् नहीं, क्योंकि यह आदि परमात्मा की नीति है कि महापुरुष असत् नहीं कहते । हम तो धर्म के प्रतिपादन करनेवाली हैं; जहाँ धर्म की हानि होती है वहाँ हम धर्म प्रतिपादन करती हैं और जो हम धर्म का प्रतिपादन न करें तो धर्म को और कैसे मानें । हे लीले ! जैसे सोये हुए को स्वप्न में त्रिलोकी भास आती है सो अन्तःकरण में ही होता है और स्वप्न से जाग्रत होती है वैसे ही मरना भी जान । जब जहाँ मृतक होता है वही जीव पुर्यष्टक आकाश रूप हो जाता है और फिर वासना के अनुसार उसको जगत् भास आता है । जैसे स्वप्न में जगत् भास आता है वह क्या रूप है ? आकाश रूप ही है वैसे ही इसको भी जान । हे लीले ! यह सब जगत् तेरे उसी अन्तःपुर में है, क्योंकि जगत् चित्ताकाश में स्थित है । जैसे आदर्श में प्रतिबिम्ब होता है वैसे ही चित् में जगत् है और आकाश रूप है, इससे जो चित्त अन्तःपुर में हुआ तो जगत् भी हुआ । हे लीले ! यह जगत् जो तुझको भासता है सो आकाश- रूप है जैसे स्वप्न और संकल्प नगर और कथा के अर्थ भासते हैं वैसे ही यह जगत् भी है और जैसे मृगतृष्णा का जल भासता वैसे ही यह जगत् भी जान । हे लीले ! वास्तव में कोई पदार्थ उपजता नहीं भ्रम से सब भासते हैं । जैसे स्वप्न में स्वप्नान्तर फिर उससे और स्वप्न दीखता है वैसे ही तुमको भी यह सृष्टि भ्रम से भासी है हे लीले ! यह जगत् का आत्मरूप
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है । जहाँ चिद्अणु है वहाँ जगत् भी है परन्तु क्या रूप है, आभासरूप है । जैसे वह आकाशरूप है वैसे ही यह जगत् भी आकाशरूप है । जिस प्रकार यह चेतता है उस प्रकार हो भासता है इससे सङ्कल्पमात्र है । जैसे स्वप्नपुर भासता है और जैसे सङ्कल्पनगर होता है वैसे ही यह जगत् है । जैसे मरुस्थल की नदी के तरङ्ग भासते हैं वैसे ही यह जगत् भासता है । इससे इसकी कल्पना त्याग दो । इतना सुन फिर लीला ने पूछा, हे देवि ! उस वशिष्ठ ब्राह्मण को मरे आठ दिन बीते हैं और हमको यहाँ साठ सहस्र वर्ष बीते हैं यह वार्त्ता कैसे सत् जानिये ? थोड़े काल में बड़ा काल कैसे हुआ ? देवी बोली, हे लीले ! जैसे थोड़े देश में बहुत देश आते हैं वैसे ही काल में बहुत काल भी आता है । अहन्ता ममता आदिक जितना कुछ जगत् है सो आभासमात्र है उसे क्रम से सुन । जब जीव मृतक होता है तब मूर्च्छा होती है और फिर मूर्च्छा से चैतन्यता फुर आती है, उसमें यह भासता है कि यह आधार है तो यह आधेय है; यह मेरा हाथ है; यह मेरा शरीर है; यह मेरा पिता है; इसका मैं पुत्र हूँ; अब इतने वर्ष का मैं हुआ; ये मेरे बान्धव हैं; इनके साथ मैं स्नेह करता हूँ; यह मेरा गृह है और यह मेरा कुल चिरकाल का चला आता है । मरने के अनन्तर इतने क्रम को देखता है । हे लीले ! जिस प्रकार वह देखता है वैसे ही यह भी जान । एक क्षण में और का और भासने लगता है । यह जगत् चैतन्य का किञ्चन है । जैसे चैतन्य संवित् में चैत्यता होती है वैसे ही यह जगत् भी भासता है और जैसे स्वप्न में द्रष्टा, दर्शन, दृश्य तीनों भासते हैं वैसे ही आत्मसत्ता में यह जगत् किञ्चन होता है और भ्रम से भासता है, वास्तव में नानात्व कुछ हुआ नहीं । जैसे स्वप्न में कारण बिना नाना प्रकार का जगत् भासता है वैसे ही पर- लोक में नाना प्रकार का जगत् कारण बिना ही भासता है सो आकाश- रूप है और मन के भ्रम से भासता है वैसे ही यह जगत् भी मन के भ्रम से भासता है । स्वप्न जगत्, परलोक जगत् और जाग्रत जगत् में भेद कुछ नहीं । जैसे वह भ्रममात्र है वैसे ही यह भ्रममात्र है-वास्तव में कुछ उपजा नहीं । जैसे समुद्र में तरङ्ग कुछ वास्तव नहीं वैसे ही आत्मा