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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

उत्पत्ति प्रकरण । १६७

चलती है। जहाँ तेरी इच्छा हो वहाँ में तुझको ले जाऊँ। जैसे सुगन्ध को वायु ले जाता है वैसे ही मैं तुझको ले जाऊँगी। हे लीले! जिस संसारमण्डल को तू समीप कहती है सो वह चिदाकाश की अपेक्षा से समीप भासता है और सृष्टि की अपेक्षा से अनन्त कोटि योजनों का भेद है। इनका वपु आकाशरूप है। ऐसी अनन्त सृष्टि पड़ी फुरती है। समुद्र और मन्दराचल पर्वत आदिक अनन्त हैं उनके परमाणु में अनन्त सृष्टि चिदाकाश के आश्रय फुरती है। चिद्अणु में रुचि के अनुसार सृष्टि बड़े आरम्भ से दृष्टि आती है और बड़े स्थूल गिरि पृथ्वी दृष्टि आते हैं पर विचारकर तोलिये तो एक चावल के समान भी नहीं होती। हे लीले! नाना प्रकार के रत्नों से परिपूर्ण पर्वत भी दृष्टि भी आते हैं पर आकाशरूप हैं। जैसे स्वप्न में चैतन्य का किञ्चन नाना प्रकार का जगत् दृष्टि आता है वैसे ही यह जगत् चैतन्य का किञ्चन है। पृथ्वी आदि तत्त्वों से कुछ उपजा नहीं। हे लीले! आत्मसत्ता ज्यों की त्यों अपने आप में स्थित है। जैसे नदी में नाना प्रकार के तरङ्ग उपजते हैं और लीन भी होते हैं वैसे ही आत्मा में जगज्जाल उपजा और नष्ट भी हो जाता है, पर आत्मसत्ता इनके उपजने और लीन होने में एक रस है। यह सब केवल आभासरूप है वास्तव कुछ नहीं। लीला बोली हे माता! अब मुझको पूर्व की सब स्मृति हुई है। प्रथम मैंने ब्रह्मा से राजसी जन्म पाया और उससे आदि लेकर नाना प्रकार के जो अष्टशत जन्म पाये हैं वे सब मुझको प्रत्यक्ष भासते हैं। प्रथम जो चिदाकाश से मेरा जन्म हुआ उसमें मैं विद्याधर की स्त्री भई और उस जन्म के कर्म से भूतल में आकर मैं दुःखी हुई। फिर पद्मिनी भई और जाल में फँसी और उसके अनन्तर भीलनी होकर कदम्ब वन में विचरने लगी। फिर वनलता भई; वहाँ गुच्छे मेरे स्तन और पत्र मेरे हाथ थे। जिसकी पर्ण-कुटी में मैं लता थी वह ऋषीश्वर मुझको हाथ से स्पर्श किया करता था इसमें मैं मृतक होकर उसके गृह में पुत्री हुई। वहाँ जो मुझसे कर्म हो सो पुरुष ही का कर्म हो इसमें में बड़ी लक्ष्मी से सम्पन्न राजा हुई। वहाँ मुझसे दुष्टकर्म हुए इससे मैं कुष्ठरोगग्रसित बन्दरी होकर आठ वर्ष वहाँ

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रही। फिर मैं बैल हुई; मुझको किसी दुष्ट ने खेती के हल में जोड़ा और उससे मैंने दुःख पाया। फिर मैं भ्रमरी भई और कमलों पर जाकर सुगन्ध लेती थी। फिर मृगी होकर चिर पर्यन्त वन में विचरी। फिर एक देश का राजा भई और सौ वर्ष पर्यन्त वहाँ सुख भोगे और फिर कछुये का जन्म लेकर, राजहंस का जन्म लिया। इसी प्रकार मैंने अनेक जन्मों को धारण करके बड़े कष्ट पाये। हे देवि! आठसौ जन्म पाकर में संसारसमुद्र में वासना से घटीयन्त्र की नाईं भ्रमी हूँ। अब मैंने निश्चय किया है कि आत्मज्ञान बिना जन्मों का अन्त कदाचित नहीं होता सो तुम्हारी कृपा से अब मैंने निःसंकल्प पद को पाया।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने जन्मान्तरवर्णन- नाम एकविंशतितमस्सर्गः ॥ २२ ॥

इतनी कथा सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन्! वज्रसार की नाइ वह ब्रह्माण्ड खप्पर जिसका अनन्त कोटि योजन पर्यन्त विस्तार था उसे ये दोनों कैसे लंघती गईं? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! वज्रसार ब्रह्माण्ड खप्पर कहाँ है और वहाँ तक कौन गया है? न कोई वज्रसार ब्रह्माण्ड है और न कोई लाँघ गया है सब आकाशरूप है। उसी पर्वत के ग्राम में जिसमें वशिष्ठ ब्राह्मण का गृह था उसी मण्डप आकाशरूप सृष्टि का वह अनुभव करता भया। हे रामजी! जब वशिष्ठ ब्राह्मण मृतक भया तब उसी मण्डपाकाश के कोने में अपने को चारों ओर समुद्र पर्यन्त पृथ्वी का राजा जानने लगा कि मैं राजा पद्म हूँ और अरुन्धती को लीला करके देखा कि यह मेरी स्त्री है। फिर वह मृतक हुआ तो उसको उसी आकाशमण्डप में और जगत् का अनुभव हुआ और उसने अपने को राजा विदूरथ जाना। इससे तुम देखो कि कहाँ गया और क्या रूप है? उसी मण्डप आकाश में तो उसको सृष्टि का अनुभव हुआ; इससे जो सृष्टि है वह उसी वशिष्ठ के चित्त में स्थित है। तब ज्ञप्तिरूप देवी की कृपा से अपने ही देहाकाश में लीला आन्तवाहक देह से जो आकाशरूप है उड़ी और ब्रह्माण्ड को लाँघ के फिर उसी गृह में आई। जैसे स्वप्न से स्वप्नान्तर को प्राप्त हो वैसे ही देख आई। पर वह गई कहाँ और आई

उत्पत्ति प्रकरण । १६६

कहाँ ? एक ही स्थान में रहकर एक सृष्टि से अन्य सृष्टि को देखा । इनको ब्रह्माण्ड के लंघ जाने में कुछ यत्न नहीं, क्योंकि उनका शरीर अन्तवाहक रूप है । हे रामजी ! जैसे मन से जहाँ लंघना चाहे वहाँ लंघ जाता है वैसे ही प्रत्यक्ष लंधी है । वह सत्यसंकल्परूप है और वस्तु से कहे तो कुछ नहीं । हे रामजी ! जैसे स्वप्न की सृष्टि नाना प्रकार के व्यवहारों सहित बड़ी गम्भीर भासती है पर आभासमात्र है वैसे ही यह जगत् देखते हैं पर न कोई ब्रह्माण्ड है न कोई जगत् है और न कोई भीत है केवल चैतन्यमात्र का किञ्चन है और बना कुछ नहीं । जैसे चित्तसंवेदन फुरता है वैसे ही आभास हो भासता है । केवल वासनामात्र ही जगत् है, पृथ्वी आदिक भूत कोई उपजा नहीं-निवारण ज्ञान आकाश अनन्तरूप स्थित है । जैसे स्पन्द और निस्पन्द दोनों रूप पवन ही है वैसे ही स्फुर और अस्फुररूप आत्मा ही ज्यों का त्यों है और शान्त सर्वरूप चिदाकाश है । जब चित्त किञ्चन होता है तब आपही जगतरूप हो भासता है-दूसरा कुछ नहीं । जिन पुरुषों ने आत्मा को जाना है उनको जगत् आकाश से भी शून्य भासता है और जिन्होंने नहीं जाना उनको जगत् वज्रसार की नाईं दृढ़ भासता है । जैसे स्वप्न में नगर भासते हैं वैसे ही यह जगत् है । जैसे मरुस्थल में जल और सुवर्ण में भूषण भासते हैं वैसे ही आत्मा में जगत् भासता है । हे रामजी ! इस प्रकार देवी और लीला ने संकल्प से नाना प्रकार के स्थानों को देखा जहाँ झरनों से जल चला आता था, बावली और सुन्दर ताल और बगीचे देखे जहाँ पक्षी शब्द करते थे और मेघ पवन संयुक्त देखे मानों स्वर्ग यहीं था ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने गिरिग्राम-वर्णनन्नाम द्वाविंशतितमस्सर्गः ॥ २२ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार देखके वे दोनों शीतलचित्त ग्राम में वास करती भईं और चिरकाल जो आत्मअभ्यास किया था उससे शुद्ध ज्ञानरूप और त्रिकालज्ञान से सम्पन्न हुईं । उससे उन्हें पूर्व की स्मृति हुई और जो कुछ अरुन्धती के शरीर से किया था सो देवी से

२००योगवाशिष्ठ ।

कहा कि हे देवि ! तुम्हारी कृपा मे अब मुझको पूर्व की स्मृति हुई जो कुछ इस देश में मैंने किया था सो प्रकट भासता है कि यहाँ एक ब्राह्मणी थी, उसका शरीर वृद्ध था और नाड़ियाँ देखती थीं और भर्त्ता को बहुत प्यारी और पुत्रों की माता थी वह में ही हूँ। हे देवि ! मैं यहाँ देवताओं और ब्राह्मणों की पूजा करती थी, यहाँ दूध रखती, यहाँ अन्नादिकों के बासन रखती थी, यहाँ मेरे पुत्र, पुत्रियाँ, दामाद और दौहित्र बैठते थे; यहाँ में बैठती थी और भृत्यों को कहती थी कि शीघ्र ही कार्य करो । हे देवि ! यहाँ में रसोई करती थी और मेरा बर्त्ता शाक और गोबर ले आता था और सर्व मर्यादा कहता था । ये वृक्ष मेरे लगाये हुए हैं, कुछ फल मैंने इनसे लिये हैं और कुछ रहे हैं वे ये हैं । यहाँ में जलपान करती थी । हे देवि ! मेरा बर्त्ता सब कर्मों में शुद्ध था पर आत्मस्वरूप से शून्य था । सब कर्म मुझको स्मरण होते हैं । यहाँ मेरा पुत्र ज्येष्ठशर्मा गृह में रुदन करता है । यह बेलि मेरे गृह में बिस्तरी है और सुन्दर फूल लगे हैं। इनके गुच्छे छत्रों की नाईं हैं और झरोखे बेलि से आवरे हुए हैं । यह मेरा मण्डप आकाश है, इसमें मेरे बर्त्ता का जीव आकाश है । देवी बोली, हे लीले ! इस शरीर के नाभिकमल से दश अंगुल ऊर्ध्व हृदयाकाश है, सो अंगुष्ठ-मात्र हृदय है, उसमें उसका संवित् आकाश है । उसमें जो राजसी वासना थी उससे उसके चारों समुद्र पर्यन्त पृथ्वी का राज्य फुर आया कि "मैं राजा हूँ" यहाँ उसे आठ दिन मृतक हुए बीते हैं और यहाँ चिरकाल राज्य का अनुभव करता है । हे देवि ! इस प्रकार थोड़े काल में बहुत अनुभव होता है और हमारे ही मण्डप में वह सब पड़ा है । उसकी पुर्यष्टक में जगत् फुरता है उसमें ही राजा विदूरथ है इस राज्य के संकल्प से उसकी संवित् इसी मण्डप आकाश में स्थित है। जैसे आकाश में गन्ध को लेके पवन स्थित हो वैसे ही उसकी चेतन संवित् संकल्प को लेकर इसी मण्डपाकाश में स्थित है उसकी संवित् इस मण्डप आकाश में है उस राजा की सृष्टि मुझको कोटि योजन पर्यन्त भासती है । यदि मैं पर्वत और मेघ अनेक योजन पर्यन्त लंघती जाऊँ तब बर्त्ता के निकट प्राप्त होऊँ और चिदाकाश की अपेक्षा से अपने

उत्पत्ति प्रकरण । २०१

पास ही भासती है । अब व्यवहार दृष्टि से वह कोटि योजन पर्यन्त है इससे चलो जहाँ मेरा भर्त्ता राजा विदूरथ है वह स्थान दूर है तो भी निश्चय से समीप है । इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार कहकर वे दोनों, जैसे खड्ग की धारा श्याम होती है, जैसे विष्णुजी का अङ्ग श्याम है, जैसे काजर श्याम होता और जैसे भ्रमरे की पीठ श्याम होती है वैसे ही श्याम मण्डपाकाश में पखेरू के समान अन्तर्वाहक शरीर से उड़ीं और मेघों और बड़े वायु के स्थान, सूर्य, चन्द्रमा और ब्रह्मलोक पर्यन्त देवताओं के स्थानों को लांघकर इस प्रकार दूर से दूर गईं और शून्य आकाश में ऊर्ध्व जाके ऊर्ध्व को देखती भईं कि सूर्य और चन्द्रमा आदि कोई नहीं भासता । तब लीला ने कहा हे देवि ! इतना सूर्य आदि का प्रकाश था वह कहाँ गया ? यहाँ तो महाअन्धकार है; ऐसा अन्धकार है कि मानों सृष्टि में ग्रहण होता है । देवी बोली, हे लीले ! हम महाआकाश में आई हैं । यहाँ अन्धकार का स्थान है, सूर्य आदि कैसे भासें ? जैसे अन्धकूप में त्रसरेणु नहीं भासते वैसे ही यहाँ सूर्य चन्द्रमा नहीं भासते । हम बहुत ऊर्ध्व को आई हैं । लीला ने पूछा, हे देवि ! बड़ा आश्चर्य है कि हम दूर से दूर आई हैं जहाँ सूर्यादिकों का प्रकाश भी नहीं भासता इससे आगे अब कहाँ जाना है ? देवी बोलीं, हे लीले ! इसके आगे ब्रह्माण्ड कपाट आवेगा । वह बड़ा वज्रसार है और अनन्त कोटि योजन पर्यन्त उसका विस्तार है और उसकी धूलि की कणिका भी इन्द्र के वज्र समान है । इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार देवी कहती ही थी कि आगे महावज्रसार ब्रह्माण्ड कपाट आया और अनन्त कोटि योजन पर्यन्त उसका विस्तार देखकर उसको भी वे लाँघ गई पर उन्हें कुछ भी क्लेश न भया क्योंकि जैसा किसी को निश्चय होता है वैसा ही अनुभव होता है । वह निरावरण आकाशरूप देवियाँ ब्रह्माण्ड कपाट को लाँघ गईं । उसके परे दशगुणा जल का आवरण; उसके परे दशगुणा अग्नितत्त्व; उसके परे दशगुणा वायु; उसके परे दशगुणा आकाश और उसके परे परमाकाश है । उसका आदि मध्य और अन्त कोई नहीं । जैसे बन्ध्या के पुत्र की कथा की चेष्टा

२०२योगवाशिष्ठ ।

का आदि अन्त कोई नहीं होता वैसे ही परम आकाश है; वह नित्य, शुद्ध और अनन्तरूप है और अपने आपमें स्थित है । उसका अन्त लेने को यदि सदाशिव मनरूपी वेग से और विष्णुजी गरुड़ पर आरूढ़ होके कल्प पर्यन्त धावें तो भी उसका अन्त न पावें और पवन अन्त लिया चाहे तो वह भी न पावे । वह तो आदि, मध्य और अन्त कल्पना से रहित बोधमात्र है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे पुनराकाशवर्णनन्नाम त्रयो- विंशतितमस्सर्गः ॥ २३ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब वे पृथ्वी, अप, तेज आदिक आवरणों को लाँघ गईं तब परम आकाश उनको भासित हुआ । उसमें उनको धूलि की कणिका और सूर्य के त्रसरेणु के समान ब्रह्माण्ड भासे । वह महा-शून्य को धारनेवाला परम आकाश है और चिदणु जिसमें सृष्टि फुरती है वह ऐसा महासमुद्र है कि कोई उसमें अधः को जाता है और कोई ऊर्ध्व को जाता है कोई तिर्यक् गति को पाता है । हे रामजी ! चित् संवित् में जैसा जैसा स्पन्द फुरता है वैसा ही वैसा आकार हो भासता है; वास्तव में कोई अधः है, न कोई ऊर्ध्व है, न कोई आता है और न कोई जाता है केवल आत्मसत्ता अपने आप में ज्यों की त्यों स्थित है । फुरने से जगत् भासता है और उत्पन्न होकर फिर नष्ट होता है । जैसे बालक का संकल्प उपज के नष्ट हो जाता है वैसा ही चैतन्य संवित् में जगत् फुरके नष्ट हो जाता है । रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! अधः और ऊर्ध्व क्या होते हैं; तिर्यक् क्यों भासते हैं और यहाँ क्या स्थित है सो मुझसे कहो ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! परमाकाश-सत्ता आवरण से रहित शुद्ध बोधरूप है । उसमें जगत् ऐसे भासता है जैसे आकाश में भ्रान्ति से तरुवरे भासते हैं, उसमें अधः और ऊर्ध्व कल्पनामात्र है । जैसे हलों के बेंट के चौगिर्द चीटियाँ फिरती हैं और उनको मन में अधः ऊर्ध्व भासता है सो उनके मन में अधः ऊर्ध्व की कल्पना हुई है । हे रामजी ! यह जगत् आत्मा का आभासरूप है । जैसे मन्दराचल पर्वत के ऊपर हस्तियों के समूह विचरते हैं वैसे ही आत्मा में अनेक जगत्

२०४ | योगवाशिष्ठ ।

चलीं और अन्तवाहक शरीर से आकाशमार्ग को उड़ीं। जाते जाते ब्रह्माण्ड की बाट को लाँघ गईं तब विदूरथ के सङ्कल्प में जगत् को देखा। जैसे तालाब में सेवार होती है वैसे ही उन्होंने जगत् को देखा। सप्तद्वीप, नवखण्ड, सुमेरुपर्वत, द्वीपादिक सब रचना देखी और उसमें जम्बूद्वीप और भरतखण्ड और उसमें विदूरथ राजा का मण्डपस्थान देखती भईं। वहीं उन्होंने राजा सिद्ध को भी देखा कि राजा विदूरथ की पृथ्वी की कुछ हद उसके भाइयों ने दबाई थी और उसके लिये सेना भेजी। राजा विदूरथ ने सुन के सेना भेजी और दोनों सेना मिलके युद्ध करने लगीं। फिर उन्होंने देखा कि त्रिलोकी युद्ध का कौतुक देखने को आई है; देवता विमानों पर आरूढ़ और सिद्ध, चारण, गन्धर्व और विद्याधर शस्त्रों को छोड़ देखने को स्थित भये हैं। विद्याधरी और अपसरा भी आई हैं कि जो शूरमा युद्ध में प्राणों को त्यागेंगे हम उनको स्वर्ग में ले जावेंगी। रक्त और मांस भोजन करने को भूत, राक्षस, पिशाच, योगिनियाँ भी आन स्थित भई हैं। हे रामजी! शूर पुरुष तो स्वर्ग के भूषण हैं और अक्षयस्वर्ग को भोगेंगे और जिनका मरना धर्मपक्ष से संग्राम में होगा वह भी स्वर्ग को जावेंगे। इतना सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन्! शूरमा किसको कहते हैं और जो युद्ध करके स्वर्ग को नहीं प्राप्त होते वे कौन हैं? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जो शास्त्रयुक्ति से युद्ध नहीं करते और अनर्थरूपी अर्थ के निमित्त युद्ध करते हैं सो नरक को प्राप्त होते हैं और जो धर्म, गौ, ब्राह्मण, मित्र, शरणागत और प्रजा के पालन के निमित्त युद्ध करते हैं वे स्वर्ग के भूषण हैं। वे ही शूरमा कहाते हैं और मरके स्वर्ग में जाते हैं और स्वर्ग में उनका यश बहुत होता है। जो पुरुष धर्म के अर्थ युद्ध करते हैं वे अवश्य स्वर्गलोक को प्राप्त होते हैं और जो अधर्म से युद्ध करते हैं वे मृतक हो नरक को प्राप्त होते हैं। हे रामजी! जो पुरुष कहते हैं कि संग्राम में मरे सब स्वर्ग को प्राप्त होते हैं वे मूर्ख हैं। स्वर्ग को वही जाते हैं जिनका मरना धर्म के अर्थ हुआ है जो किसी के भोग के अर्थ युद्ध करते हैं सो नरक को ही प्राप्त होते हैं।

इति श्री यो० लीलो० गगननगरयुद्धवर्णनन्नाम पञ्चविंशतितमस्सर्गः ॥२५॥

उत्पत्ति प्रकरण । २०५

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! दोनों देवियों ने रणसंग्राम में क्या देखा कि एक महाशून्य वन है उसमें जैसे दो बड़े समुद्र उछलकर परस्पर मिलने लगें वैसे ही दोनों सेना जुड़ी हैं । तब उन्होंने क्या देखा कि सब योद्धा आन स्थित हुए हैं और मच्छव्यूह और गरुड़व्यूह और चक्रव्यूह भिन्न-भिन्न भाग करके दोनों सेना के योद्धा एक-एक होकर युद्ध करने लगे हैं । प्रथम परस्पर देख एक ने कहा कि यह बाण चलाव और दूसरे ने कहा कि नहीं तू चला, उसने कहा नहीं तू ही प्रथम चला । निदान सब स्थिर हो रहे, मानो चित्र लिखे छोड़े हैं । इसके अनन्तर दोनों सेना के और योद्धा आये मानों प्रलयकाल के मेघ उछले हैं उनके आने से एक-एक योद्धा की मर्यादा दूर हो गई तब इकट्ठे युद्ध करने लगे और बड़े शस्त्रों के प्रवाह के प्रहार करने लगे । कहीं खड्गों के प्रहार चलते थे और कहीं कुल्हाड़े, त्रिशूल, भाले, बरछियाँ, कटारी, छुरी, चक्र, गदादिक शस्त्र बड़े शब्द करके चलने लगे । जैसे मेघ वर्षाकाल में वर्षा करते हैं वैसे ही शस्त्रों की वर्षा होने लगी । हे रामजी ! प्रलयकाल के जितने उपद्रव थे सो सब इकट्ठे हुए । योद्धा युद्ध की ओर आये और कायर भाग गये । निदान ऐसा संग्राम हुआ कि अनेकों योद्धाओं के शिर काटे गये और उनके हस्ती घोड़े मृत्यु को प्राप्त हुए । जैसे कमल के फूल काटे जाते हैं वैसे ही उनके शीश काटे जाते थे । तब दोनों सेनाओं के राजा चिन्ता करने लगे कि क्या होगा । हे रामजी ! इस युद्ध में रुधिर की नदियाँ चलीं, उनमें प्राणी बहते जाते थे और बड़े शब्द करते थे जिनके आगे मेघों के शब्द भी तुच्छ भासते थे । हे रामजी ! दोनों देवियाँ संकल्प के विमान कल्प के आकाश में स्थित हुईं तो क्या देखा कि ऐसा युद्ध हुआ है जैसे महाप्रलय में समुद्र एक रूप हो जाते हैं और बिजली की नाईं शस्त्रों का चमत्कार होता था । जो शूरवीर हैं उनके रक्त की जो बूँदियाँ पृथ्वी पर पड़ती हैं उन बूँदों में जितने मृत्तिका के कणके लगे होते हैं उतने ही वर्ष वे स्वर्ग को भोगेंगे । जो शूरमा युद्ध में मृतक होते थे उनको विद्याधारियाँ स्वर्ग को ले जाती थी और देवगण स्तुति करते थे कि ये शूरमा स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं और अक्षय अर्थात्

२०६ योगवाशिष्ठ ।

चिरकाल स्वर्ग भोगेंगे । हे रामजी ! स्वर्गलोक के भोग मन में चिन्तन करके शूरमा हर्षवान् होते थे और युद्ध में नाना प्रकार के शस्त्र चलाते और सहन करते थे और फिर युद्ध के सम्मुख धीरज करके स्थित होते थे । जैसे सुमेरु पर्वत धैर्यवान् और अचल स्थित है उससे भी अधिक वे धैर्य-वान् थे । संग्राम में योद्धा ऐसे चूर्ण होते थे जैसे कोई वस्तु ऊखली में चूर्ण होती है परन्तु फिर सम्मुख होते और बड़े हाहाकार शब्द करते थे । हस्ती से हस्ती परस्पर युद्ध करते शब्द करते थे । हे रामजी ! इसी प्रकार अनेक जीव नाश को प्राप्त हुए । जो शूरमा मरते थे उनको विद्याधरियाँ स्वर्ग को ले जाती थीं । निदान परस्पर बड़े युद्ध हुए । खड्गवाले खड्गवाले से और त्रिशूलवाले त्रिशूलवाले से युद्ध करते । जैसा-जैसा शस्त्र किसी के पास हो वैसे ही उसके साथ युद्ध करें और जब शस्त्र पूर्ण हो जावें तो मुष्टि के साथ युद्ध करें । इसी प्रकार दशों दिशाएँ युद्ध से परिपूर्ण हुईं ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे लीलोपाख्याने रणभूमिवर्णन्नाम षड्‌विंशति-तमस्सर्गः ॥ २६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब इस प्रकार बड़ा युद्ध हुआ तो गंगाजी के समान शूरमों के रुधिर का तीक्ष्ण प्रवाह चला और उस प्रवाह में हस्ती, घोड़े, मनुष्य, रथ सब बहे जाते थे और सेना नाश को प्राप्त होती जाती थी । हे रामजी ! उस समय बड़ा क्षोभ उदय हुआ और राक्षस, पिशाचादिक तामसी जीव मांस भोजन करते और रुधिर-पान करते, आनन्दित होते थे । जैसे मन्दराचल पर्वत से क्षीरसमुद्र को क्षोभ हुआ था वैसे ही युद्धसंग्राम में योद्धाओं का क्षोभ हुआ और रुधिर का समुद्र चला । उसमें हस्ती, घोड़े, रथ और शूरमा तरङ्गों की नाईं उछलते दृष्टि आते थे । रथवालों से रथवाले घोड़ेवालों से घोड़ेवाले; हस्तीवाले से हस्तीवाले और प्यादे से प्यादे युद्ध करते थे । हे रामजी ! जैसे प्रलयकाल की अग्नि में जीव जलते हैं वैसे ही जो योद्धा रणभूमि में आवें सो नाश को प्राप्त हों । जैसे दीपक में पतङ्ग प्रवेश करता है, और जैसे समुद्र में नदियाँ प्रवेश करती हैं वैसे ही रणभूमि में दशों दिशाओं के योद्धा प्रवेश करते थे । किसी का शीश काटा जावे

उत्पत्ति प्रकरण । २०७

और धड़ युद्ध करें; किसी की भुजा काटी जावें और किसी के ऊपर रथ चले जावें और हस्ती, घोड़े, उलट-उलट पड़ें और नाश हो जावें। हे रामजी ! दोनों राजाओं की सहायता के निमित्त पूर्वदिशा, काशी, मद्रास, भोंला, मालव, मकला, कवटा, किरात, म्लेच्छ, पारसी, काशमीर, तुरक, पंजाब, हिमालय पर्वत, सुमेरुपर्वत इत्यादि के अनेक देशपाल, जिनके बड़े भुजदण्ड, बड़े केश और बड़े भयानक रूप थे युद्ध के निमित्त आये। बड़ी ग्रीवावाले, एकटँगे, एकाचल, एकाक्ष, घोड़े के मुखवाले, श्वान के मुखवाले और सुमेरु और कैलास के राजा और जितने कुछ पृथ्वी के राजा थे सो सब आये। जैसे महाप्रलय के समुद्र उछलते हैं और दिशा स्थान जल से पूर्ण होते हैं वैसे ही सेना से सब स्थान पूर्ण हुए और दोनों ओर से युद्ध करने लगे। चक्रवाले चक्रवाले से और खड्ग, कुल्हाड़े, त्रिशूल, छुरी, कटारी, बरछी, गदा, वाणादिक शस्त्रों से परस्पर युद्ध करने लगे। एक कहे कि प्रथम में जाता हूँ दूसरा कहे कि में प्रथम आता हूँ। हे रामजी ! उस काल में ऐसा युद्ध होने लगा कि कहने में नहीं आता। दौड़ दौड़ के योद्धा रण में जावें और मृत्यु को प्राप्त हों। जैसे अग्नि में घृत की आहुति भस्म होती है वैसे ही रण में योद्धा नाश को प्राप्त होते थे। ऐसा युद्ध हुआ कि रुधिर का समुद्र चला, उसमें हस्ती, घोड़े, रथ और मनुष्य तृणों की नाईं बहते थे और सम्पूर्ण पृथ्वी रक्तमय हो गई। जैसे आँधी से फल, फूल और वृक्ष गिरते हैं वैसे ही पृथ्वी पर कट-कट शब्द करते शिर गिरते थे। हे रामजी ! जो उस काल में युद्ध हुआ वह कहा नहीं जाता। सहस्रमुख शेषनाग भी उस युद्ध के कर्मों को सम्पूर्ण वर्णन न कर सकेंगे तब और कौन कहेगा। मैंने वह संक्षेप से कुछ सुनाया है।

इति श्रीयोगवाशिष्टे लीलोपाख्याने द्वन्द्वयुद्धवर्णनंनाम सप्तविंशतितमसर्गः ॥ २७ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब इस प्रकार युद्ध हुआ तो सूर्य अस्त हुआ मानों उसकी किरणें भी शस्त्रों के प्रहार से अस्तता को प्राप्त हुईं। तब विदूरथ ने सेनापति और मन्त्री को बुलाकर कहा कि हे मन्त्रियों !

२०८योगवाशिष्ठ ।

अब युद्ध को शान्त करो, क्योंकि सूर्य अस्त हुआ है और योद्धा भी सब युद्ध करके थके हैं। रात्रि को सब आराम करें दिन को फिर युद्ध करेंगे। इससे आज्ञा फेरो कि अब युद्ध शान्त हो । तब मन्त्री ने दोनों सेना के मध्य में ऊँचे चढ़के वस्त्र फेरा कि अब युद्ध को शान्त करो, दिन को फिर युद्ध करेंगे । निदान दोनों सेनाओं ने युद्ध का त्याग किया और अपनी अपनी सेना में नौबत नगारे बजाने लगे और राजा विदूरथ भी अपने गृह में आ स्थित हुआ । जैसे शरत्काल में मेघों से रहित आकाश निर्मल होता है वैसे ही रण में संग्राम शान्त हुआ । रात्रि को राक्षस, पिशाच, गीदड़, भेड़िये और डाकिनी मांस का भोजन करने और रुधिर पान करने लगे । कितनों के शिर और अङ्ग काटे गये, पर जीते थे और पड़े हाय-हाय करते थे । वे निशाचरों को देखके डरने लगे और कितने लोगों ने भाई और मित्रों को देखा । हे रामजी ! तब राजा विदूरथ ने स्वर्ण के मन्दिर में फूलों सहित चन्द्रमा की नाईं शीतल और सुन्दर शय्या पर सब किवाड़ चढ़ा के विश्राम किया और मन्त्रियों के साथ विचार किया कि प्रातःकाल उठके ऐसे करेंगे । ऐसे विचार करके राजा ने शयन किया पर एक मुहूर्त पर्यन्त सोया और फिर चिन्ता से जग उठा । इधर इन दोनों देवियों ने आकाश से उतर जैसे के; सन्ध्या-काल में कमल के मुख मूँदते हैं और उनमें वायु प्रवेश कर जाता है वैसे ही मन्दिरों में सूक्ष्मरूप से प्रवेश किया । इतना सुन रामजी ने पूछा हे भगवन् ! शरीर से परमाणु के रन्ध्र में देवियों ने कैसे प्रवेश किया वह तो कमल के तन्तु और बाल के अग्र से भी सूक्ष्म होते हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! भ्रान्ति से जो आधिभौतिक शरीर हुआ है उस आधिभौतिक शरीर से सूक्ष्मरन्ध्र में प्रवेश कोई नहीं कर सकता परन्तु मनरूपी शरीर को कोई नहीं रोक सकता । हे रामजी ! देवी और लीला का आन्तवाहक शरीर था उससे सूक्ष्म परमाणु के मार्ग से उसको प्रवेश करने में कुछ विचार न हुआ । जो उनका आधिभौतिक शरीर होता तो यत्न भी होता । जहाँ आधिभौतिक न हो वहाँ यत्न की शङ्का कैसे हो ? हे रामजी ! और भी सब शरीर चित्तरूपी हैं पर जैसा निश्चय

उत्पत्ति प्रकरण । २०६

अनुभव संवित् में होता है तैसे ही सिद्धता होती है अन्यथा नहीं होती । जिसके निश्चय में ये शरीरादिक आकाशरूप हैं उनको आधिभौतिकता का अनुभव नहीं होता और जिसके निश्चय में आधिभौतिकता दृढ़ हो रही है उनको अन्तवाहकता का अनुभव नहीं होता । जिस पुरुष को पूर्वार्ध का अनुभव नहीं उनको उत्तरार्ध में गमन नहीं होता-जैसे वायु का चलना ऊर्ध्व नहीं होता, तिरछा स्पर्श होता है, अग्नि का चलना अधः को नहीं होता और जल का ऊर्ध्व को नहीं होता । जैसे आदि चेतन संवित् में प्रवृत्ति हुई है वैसे ही अब तक स्थित है । इससे जिसको अन्त-वाहक शक्ति उदय हुई है उसको आधिभौतिक नहीं रहती और जिसको आधिभौतिकता दृढ़ है उनको अन्तवाहक शक्ति उदय नहीं होती । हे रामजी ! जो पुरुष छाया में बैठा हो उसको धूप का अनुभव नहीं होता और जो धूप में बैठा है उसको छाया का अनुभव नहीं होता । अनुभव उसी का होता है जिसकी चित्त में दृढ़ता होती है अन्यथा किसी को कदाचित् नहीं होता । हे रामजी ! जैसा दृढ़ भाव चित्तसंवित् में होता है तो जब तक और प्रतीत नहीं होती तब तक वैसे ही सिद्धता होती है । जैसे रस्सी में भ्रम से सर्प भासता है और मनुष्य भय से कंपायमान होता है, सो कंपना भी तब तक है जब तक सर्प का अनुभव अन्यथा नहीं होता; जब रस्सी का अनुभव उदय होता है तब सर्पभ्रम नष्ट होता है वैसे ही जैसा अनुभव चित्त संवित् में दृढ़ होता है उसी का अनुभव होता है । यह वार्त्ता बालक भी जानता है कि जैसी जैसी चित्त की भावना होती है वैसा ही रूप भासता है निश्चय और हो और अनुभव और प्रकार हो ऐसा कदाचित् नहीं होता । हे रामजी ! जिनको ये आकार स्वप्न संकल्पपुर की नाईं हुए हैं सो आकाशरूप हैं । जिनको ऐसा निश्चय हो उनको कोई रोक नहीं सकता । औरों का भी चित्तमात्र शरीर है पर जैसा जैसा संवेदन दृढ़ हुआ है वैसा ही वैसा आपको जानता है । हे रामजी ! आदि में सब कुछ आत्मा से स्वाभाविक उपजा है सो अकारणरूप है और पीछे प्रमाद में द्वैतकार्य कारणरूप होके स्थित हुआ है । हे रामजी ! आकाश तीन हैं-एक चिदाकाश, दूसरा चित्ताकाश

२१०योगवाशिष्ठ ।

और तीसरा भूताकाश है । उनमें वास्तव एक चिदाकाश है और भावना करके भिन्न २ कल्पना हुई है । आदि शुद्ध अचेत्, चिन्मात्र चिदाकाश में जो संवेदन फुरा है उसका नाम चित्ताकाश है और उसी में यह सम्पूर्ण जगत् हुआ है । हे रामजी ! चित्तरूपी शरीर सर्वगत होकर स्थित हुआ है जैसा जैसा उसमें स्पन्द होता है वैसा ही वैसा होके भासता है । जितने कुछ पदार्थ हैं उन सबों में व्याप रहा है; त्रसरेणु के अन्तर भी सूक्ष्मभाव से स्थित हुआ और आकाश के अन्तर भी व्याप रहा है । पत्र फल उसी से होते हैं, जल में तरङ्ग होके स्थित हुआ है; पर्वत के भीतर यही फुरता, मेघ होके भी यही वर्षता और जल से वरफ भी यह चित्त ही होता है । अनन्त आकाश परमाणुरूप भीतर बाहर सर्वजगत् में यही है । जितना जगत् है वह चित्तरूप ही है और वास्तव में आत्मा से अनन्त रूप है । जैसे समुद्र और तरङ्ग में कुछ भेद नहीं वैसे ही आत्मा और चित्त में कुछ भेद नहीं । जिस पुरुष को ऐसे अखण्डसत्ता आत्मा का अनुभव हुआ है और जिसका सर्ग के आदि में चित्त ही शरीर है और आधिभौतिकता को नहीं प्राप्त हुआ वह महाआकाशरूप है उसको पूर्व का स्वभाव स्मरण रहा है इस कारण उसका अन्तवाहक शरीर है । हे रामजी ! जिस पुरुष को अन्तवाहकता में अहंप्रत्यय है उसको सब जगत् संकल्पमात्र भासता है वह जहाँ जाने की इच्छा करता है वहाँ जाता है । उसको कोई आवरण नहीं रोक सकता । जिसको आधिभौतिकता में निश्चय है उसको अन्तवाहक शक्ति नहीं होती । हे रामजी ! सबही अन्तवाहकरूप हैं और भ्रम से अनहोता आधिभौतिकता देखते हैं । जैसे मरुस्थल में जल भासता है और जैसे स्वप्न में बन्ध्या के पुत्र का सद्भाव होता है वैसे ही आधिभौतिक जगत् भासता है । जैसे जल शीतलता से वरफ हो जाता है वैसे ही जीव प्रमाद से अन्तवाहक से आधिभौतिक शरीर होता है । इतना सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! चित्त में क्या है; कैसे होता है और कैसे नहीं होता; यह जगत् कैसे चित्तरूप है और क्षण में अन्यथा कैसे हो जाता है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! एक एक जीव प्रति चित्त होता है । जैसा जैसा चित्त है वैसी ही वैसी

उत्पत्ति प्रकरण । २११

शक्ति है । चित् में जगत् भ्रम होता है, क्षण में कल्प और सम्पूर्ण जगत् उदय हो आता है और क्षण में सम्पूर्ण लय होता है । किसी को निमेष में कल्प हो आता है और किसी को क्रम भासता है सो मन लगाकर सुनिये । हे रामजी ! जब मरने की मूर्च्छा होती है तो उस महाप्रलय-रूप मृत्यु मूर्च्छा के अनन्तर नाना प्रकार का जगत् फुर आता है जैसे स्वप्न में सृष्टि फुर आती है और जैसे संकल्प का पुर भासता है वैसे ही मृत्यु मूर्च्छा के अनन्तर सृष्टि भासती है । जैसे महाप्रलय के अनन्तर आदि विराटरूप ब्रह्मा होता है वैसे ही मृत्यु के अनन्तर इसका अनुभव होता है । यह भी विराट् होता है, क्योंकि इसका मनरूपी शरीर होता है । रामजी बोले, हे भगवन् ! मृत्यु के अनन्तर जो सृष्टि होती है वह स्मृति से होती है, स्मृति बिना नहीं होती, इसलिये मृत्यु के अनन्तर जो सृष्टि हुई तो सकारणरूप हुई ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब महाप्रलय होता है तब हरि हरादिक सबही विदेहमुक्त होते हैं । फिर स्मृति का सम्भव कैसे हो ? हमसे आदि ले जो बोध आत्मा है जब विदेह मुक्त हुए हैं तब स्मृति कैसे सम्भव हो ? अब के जो जीव हैं उनका जन्म-मरण स्मृति कारण से होता है, क्योंकि मोक्ष नहीं होता-मोक्ष का उनको अभाव है । हे रामजी ! जब जीव मरते हैं तब उन्हें मृत्यु-मूर्च्छा होती है, पर कैवल्यभाव में स्थित नहीं होते; मूर्च्छा से उनका संवित् आकाशरूप होता है उससे फिर चित्तसंवेदन फुर आता है । तब उन्हें क्रम करके जगत् फुर आता है, पर जब बोध होता है तब तन्मात्रा और काल, क्रिया, भाव, अभाव, स्थावर-जङ्गम जगत् सब आकाशरूप हो जाता है । जिनका संवेदन दृश्य की ओर धावता है उनको मृत्यु-मूर्च्छा के अनन्तर अज्ञान संवेदन फुरता है, उससे उन्हें शरीर और इन्द्रियाँ भास आती हैं । वह आन्त-वाहिक शरीर है परन्तु चिरकाल की प्राप्ति करके आधिभौतिक होता भासता है । तब देश, काल, क्रिया, आधार, आधेय उदय होकर स्थित होते हैं । जैसे वायु मन्द और निस्पन्दरूप है, पर जब स्पन्द होता है तब भासता है और निस्पन्द होने से नहीं भासता वैसे ही संवेदन

२१२योगवाशिष्ठ ।

से जब जगत् भासता है तब जानता है कि मैं यहाँ उपजा हूँ। जैसे स्वप्न में अङ्गना के स्पर्श का अनुभव होता है वह मिथ्या है वैसे ही भ्रम से जो आपको उपजा देखता है वह भी मिथ्या है। हे रामजी! जहाँ यह जीव मृतक होता है वहीं जगतभ्रम देखता है। वास्तव में जीव भी आकाशरूप है और जगत् भी आकाशरूप है। अज्ञान से जीव आपको उपजा मानता है और नाना जगतभ्रम देखता है कि यह नगर है, यह पर्वत है, ये सूर्य और चन्द्रमा हैं, ये तारागण हैं और जरा-मरण, आधि-व्याधि सङ्कट से व्याकुल होता है। वह भाव-अभाव, भय, स्थूल, सूक्ष्म, चर-अचर, पृथ्वी, नदियाँ, भूत-भविष्य-वर्त्तमान; क्षय-अक्षय और भूमि को भी देखता है और समझता है कि में उपजा हूँ, अमुक का पुत्र हूँ, यह मेरा कुल है, यह मेरी माता है, ये मेरे बांधव हैं, इतना धन हमको प्राप्त हुआ है इत्यादि अनेक वासना-जालों में दुःखी होता है और कहता है कि यह सुकृत है और यह दुष्कृत है; प्रथम में बालक था; अब मेरा यह अवस्था हुई और यह मेरा वर्ण है इत्यादि अनेक जगत् कल्पना हरएक जीव को उदय होती है। हे रामजी! संसाररूपी एक वृक्ष उगा है; चित्तरूपी उसका बीज है; तारागण उसके फूल हैं और चञ्चल मेघ पत्र हैं। जङ्गम, जीव, मनुष्य, देवता, दैत्यादिक पक्षी उस पर बैठनेवाले हैं और रात्रि उसके ऊपर धूलि है; समुद्र उसकी तलावड़ी है; पर्वत उसमें सिलबट्टे हैं और अनुभवरूप अंकुर हैं। जहाँ जीव मरता है वहीं क्षण में ये सब देखता है। इसी प्रकार एक २ जीव को अनेक जगत् भासते हैं। हे रामजी! कितने कोटि ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, पवन और सूर्यादिक हुए हैं। जहाँ सृष्टि है वहीं ये होते हैं इससे चिद्अणु में अनेक सृष्टि हैं, जीव भी अनन्त हुए हैं और उन्हीं में सुमेरु, मण्डल, द्वीप और लोक भी बहुतेरे हुए हैं। जो चिद्अणु में ही सृष्टि का अन्त नहीं तो परब्रह्म में अन्त कहाँ से आवे? वास्तव में है नहीं; जैसे पर्वत की दीवार में शिल्पी पुतलियाँ कल्पे तो कुछ है नहीं वैसे ही जगत् चिदाकाश में नहीं है केवल मनो-मात्र ही है। हे रामजी! मनन और स्मरण भी चिदाकाशरूप है और

उत्पत्ति प्रकरण ।

चिदाकाश में मनन और स्मरण है। जैसे तरङ्ग भी जलरूप हैं और जल ही में होते हैं; जल से इतर तरङ्ग कुछ वस्तु नहीं हैं; वैसे ही मनन और स्मरण भी चिदाकाशरूप जानों। हे रामजी! दृश्य कुछ भिन्न वस्तु नहीं है; द्रष्टा ही दृश्य की नाईं होकर भासता है। जैसे मनाकाश नाना प्रकार हो भासता है वैसे ही चिदाकाश का प्रकाश नाना प्रकार जगत् होकर भासता है। यह विश्व सब चिदाकाशरूप है। हमको तो ऐसे ही भासता है पर तुमको अर्थाकाशरूप भासता है, इसी कारण कहा कि लीला और सरस्वती आकाशरूप, सर्वज्ञ स्वच्छरूप और निराकार थीं। वे जहाँ चाहती थीं वहाँ जाय प्राप्त होती थीं और जैसी इच्छा करती थीं वैसी सिद्धि होती थी, क्योंकि जिसको चिदाकाश का अनुभव हुआ है उसको कोई रोक नहीं सकता। सर्वरूप होकर जो स्थित हुआ उसे गृह में प्रवेश करना क्या आश्चर्य है। वह तो अन्तवाहक रूप है।

इति श्रीयोगवासिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने स्मृत्यनुभववर्णनन्नामा- ष्टाविंशतितमस्सर्गः ॥ २८ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जब दोनों देवियाँ जिनकी चन्द्रमा के समान कान्ति थी राजा के अन्तःपुर में संकल्प मे प्रवेशकर सिंहासन पर स्थित हुईं तो बड़ा प्रकाश अन्तःपुर में हुआ और शीतलता से व्याधि ताप शान्त हुआ। जैसे नन्दनवन होता है वैसे ही अन्तःपुर हो गया और जैसे प्रातःकाल में सूर्य का प्रकाश होता है वैसे ही देवियों के प्रकाश से अन्तःपुर पूर्ण हुआ, मानों देवियों के प्रकाश से राजा पर अमृत की सींचना हुई। तब राजा ने देखा कि मानों सुमेरु के शृङ्ग से दो चन्द्रमा उदय हुए हैं। ऐसे देख के वह विस्मय को प्राप्त हुआ और चिन्तना की कि ये देवियाँ हैं। इसलिये जैसे शेषनाग की शय्या मे विष्णु भगवान् उठते हैं वैसे ही उसने उठके और वस्त्रों को एक ओर करके हाथों में पुष्प लिये और हाथ जोड़ के देवियों के चरणों पर चढ़ाये और माथा टेक के पद्मासन बाँध पृथ्वी पर बैठ गया और कहने लगा, हे देवियो! तुम्हारी जय हो। तुम जन्म दुःख ताप के शान्त करनेवाले चन्द्रमा हो और अपूर्व सूर्य हो-अर्थात् पूर्व सूर्य के प्रकाश से बाह्यतम नष्ट

२१४योगवाशिष्ठ ।

होता है और तुम्हारे प्रकाश से अन्तर अज्ञानतम भी नष्ट होता है, इससे अपूर्व सूर्य हो। इसके अनन्तर देवी मन्त्री को जो राजा के पास नदी के तट के फलों के वृक्षों के समान सोया था जन्म और कुल के कहावने के निमित्त संकल्प से जगाया और मन्त्री उठके फूलों से देवियों का पूजन कर राजा के समीप जा बैठ गया। तब सरस्वती कहने लगी, हे राजन्! तू कौन है, किसका पुत्र है और कब तूने जन्म लिया है? हे रामजी! जब इस प्रकार देवी ने पूछा तब मन्त्री, जो निकट बैठा था, बोला हे देवी! तुम्हारी कृपा से राजा का जन्म और कुल में कहता हूँ। इक्ष्वाकुकुल में एक राजा हुआ था जिसके कमल की नाईं नेत्र थे और वह श्रीमान् था, उसका नाम कुन्दरथ था। निदान उसका पुत्र बुधरथ हुआ, बुधरथ के सिंधुरथ हुआ; उसका पुत्र महारथ हुआ; महारथ का पुत्र विष्णुरथ हुआ; उसका पुत्र कलारथ हुआ; कलारथ का पुत्र सयरथ हुआ; सयरथ का पुत्र नभरथ हुआ और उस नभरथ के बड़े पुण्य करके यह विदूरथ पुत्र हुआ। जैसे क्षीरसमुद्र से चन्द्रमा निकला है वैसे ही सुमित्रा माता से यह उपजा है। जैसे गौरीज से स्वामिकार्तिक उत्पन्न हुए हैं वैसे ही यह सुमित्रा से उत्पन्न हुए हैं। हे देवि! इस प्रकार तो हमारे राजा का जन्म हुआ है। जब यह दश वर्ष का हुआ तब पिता इसको राज्य देकर आप वन को चला गया और उस दिन से इसने धर्म की मर्यादा से पृथ्वी की पालना की और बड़े पुण्य किये हैं। उन्हीं पुण्यों का फल तुम्हारा दर्शन अब इसको हुआ है। हे देवि! जो तुम्हारे दर्शन के निमित्त बहुत वर्षों तप करते हैं उनको भी तुम्हारा दर्शन पाना कठिन है, इससे इसके बड़े पुण्य हैं कि तुम्हारा दर्शन प्राप्त हुआ। हे रामजी! इस प्रकार कहके जब मन्त्री तूष्णीम् हुआ तब देवीजी ने कृपा करके राजा विदूरथ के शीश पर हाथ रखकर कहा, हे राजन्! तुम अपने पूर्वजन्म को विवेकदृष्टि करके देखो कि तुम कौन हो? देवी के हाथ रखने से राजा के हृदय का अज्ञानतम निवृत्त हो गया; हृदय प्रफुल्लित हुआ और देवी के प्रसाद से राजा को पूर्व की स्मृति फुर आई। लीला और पद्म का सम्पूर्ण वृत्तान्त स्मरण करके कहने लगा हे देवि

उत्पत्ति प्रकरण । २१५

बड़ा अचरज है कि यह जगत् मन से रचा है। यह मैंने तुम्हारे प्रसाद से जाना कि मैं राजा पद्म था और लीला मेरी स्त्री थी। मुझको मृतक हुए एक दिन ऐसे में भासा और यहाँ में सो वर्ष का हुआ हूँ सो अब तक भ्रम से मैंने नहीं जाना; अब प्रत्यक्ष जानता हूँ। सौ वर्षों में जो अनेक कार्य मैंने किये हैं वह सब मुझको स्मरण होते हैं और अपने प्रपितामह और अपनी बाल्यावस्था व यौवन अवस्था मित्र और बान्धव भी स्मरण आते हैं—यह बड़ा आश्चर्य हुआ है। सरस्वती बोली, हे राजन्! जब जीव मृतक होते हैं तब उनको बड़ी मूर्च्छा होती है। उस मूर्च्छा के अनन्तर और-और लोक भास आते हैं और एक मुहूर्त में वर्षों का अनुभव होता है। जैसे स्वप्न में एक मुहूर्त में अनेक वर्षों का अनुभव होता है, वैसे ही तुझको मृत्यु-मूर्च्छा के अनन्तर यह लोकभ्रम भासता है। हे राजन्! जहाँ तुम पद्म राजा थे उस गृह में मृतक हुए तुमको एक मुहूर्त बीता है और यहाँ तुमको बहुतेरे वर्षों का अनुभव हुआ है। इससे भी जो पिछला वृत्तान्त है वह सुनिये। हे राजन्! पहाड़ के ऊपर एक ग्राम था उसमें एक वशिष्ठ ब्राह्मण रहता था और अरुन्धती उसकी स्त्री थी। वह दोनों मन्दिर में रहते थे। अरुन्धती ने मुझसे वर लिया कि जब मेरा भर्त्ता मृतक हो तब उसका जीव इसी मण्डपाकाश में रहे। निदान जब वह मृतक हुआ तब उसकी पुर्यष्टक उसी मन्दिर में रही पर उसके संवित् में राजा की दृढ़ वासना थी इसलिये उस मण्डपाकाश में उसको पद्म राजा की सृष्टि फुर आई और अरुन्धती उसकी स्त्री लीला होकर उसको प्राप्त हुई राजा पद्म का मण्डप उस ब्राह्मण के मण्डपाकाश में स्थित हुआ और फिर उस मण्डप में जब तू राजा पद्म मृतक हुआ तब तेरे संवित् में नाना प्रकार के आरम्भसंयुक्त यह जगत् फुर आया। हे राजन्! यह तेरा जगत् पद्म राजा के हृदय में फुर आया है और पद्म राजा के मण्डपाकाश में स्थित है। पद्म राजा का जगत् उस वशिष्ठ ब्राह्मण के मण्डपाकाश में स्थित है और वही वशिष्ठ ब्राह्मण तुम विदूरथ राजा हुए हो। हे राजन्! यह सब जगत् प्रतिभामात्र है और मन की कल्पना से भासता है—उपजा कुछ नहीं। इतना सुन विदूरथ बोले, बड़ा आश्चर्य

२१६योगवाशिष्ठ ।

है कि जैसे मेरा यह जन्म भ्रमरूप हुआ वैसे ही इक्ष्वाकु का कुल और मेरे माता पिता सब भ्रमरूप हुए हैं। उसमें मैं जन्म लेके बालक हुआ और जब दश वर्ष का था तब पिता ने मुझको राज्य देके वनवास लिया। फिर मैंने दिग्विजय करके प्रजा की पालना की और शत वर्षों का मुझको अनुभव होता है। फिर मुझको दारुण अवस्था युद्ध की इच्छा हुई है और युद्ध करके रात्रि को में गृह में आया। अब तुम दोनों देवियाँ मेरे गृह में आई और मैंने तुम्हारी पूजा की। तब तुम दोनों में से एक देवी ने कृपा करके मेरे शीश पर हाथ रक्खा है उसी से मुझको ज्ञान प्रकाश हुआ है जैसे सूर्य के प्रकाश से कमल प्रफुल्लित होता है वैसे ही मेरा हृदय देवी के प्रकाश से प्रफुल्लित हुआ है। इनकी कृपा से में कृतकृत्य हुआ और अब मेरा सब संताप नष्ट होकर निर्वाण, समता, सुख और निर्मल पद को प्राप्त हुआ हूँ। सरस्वती बोलीं, हे राजन् ! जो कुछ तुझको भासा है वह भ्रममात्र है और नाना प्रकार के व्यवहार और लोकान्तर भी भ्रममात्र हैं, क्योंकि वहाँ मुझको मृतक हुए अभी एक मुहूर्त व्यतीत हुआ है और इसी अनन्तर में उसी मण्डपाकाश में तुझको यह जगत् भासा। पद्म राजा की वह सृष्टि ब्राह्मण के मण्डप में स्थित है और यहाँ तुझको नदियाँ, पर्वत, समुद्र, पृथ्वी आदिक भूत सम्पूर्ण जगत् भासि आये हैं। हे राजन् ! मृत्यु-मूर्च्छा के अनन्तर कभी वही जगत् भासता है, कभी और प्रकार भासता है और कभी पूर्व-अपूर्व भी भासता है। यह केवल मन की कल्पना है, पर वास्तव में असद्रूप है और अज्ञान से सत् की नाईं भासता है। जैसे एक मुहूर्त शयन करके स्वप्न में बहु-तेरे वर्षों का क्रम देखता है वैसे ही जगत् का अनुभव होता है। जैसे संकल्पपुर में अपना जीना, मरना और गन्धर्वनगर भ्रममात्र होता है; जैसे नौका में बैठे हुए मनुष्य को तट के वृक्ष चलते हुए भासते हैं। भ्रमण करने से पर्वत, पृथ्वी और मन्दिर भ्रमते भासते हैं और स्वप्न में अपना शिर कटा भासता है वैसे ही यह जगत् भ्रम से भासता है। हे राजन् ! अज्ञान से तुझको मिथ्या कल्पना उपजी है; वास्तव में न तू मृतक हुआ और न तूने जन्म लिया, तेरा अपना आप जो शुद्ध विज्ञान

उत्पत्ति प्रकरण । २१७

शान्तिरूप आत्मपद है उसी में स्थित है । नाना प्रकार का जगत् अज्ञान से भासता है और सम्यक् ज्ञान से सर्वात्मसत्ता भासती है । आत्मसत्ता ही जगत् की नाईं भासती है । जैसे बड़ी मणि की किरणें नाना प्रकार हो भासती हैं सो वह मणि से भिन्न नहीं; वैसे ही आत्मसत्ता का किञ्चन आकाशरूप जगत् भासता है । गिरि और ग्राम किञ्चनरूप हो जितना जगत् विस्तार तुमको भासता है वह लीला और पद्म राजा के मण्डपाकाश में स्थित है और लीला और पद्म की राजधानी उस वशिष्ठ ब्राह्मण के मण्डपाकाश में स्थित है । हे राजन् ! यह जगत् वशिष्ठ ब्राह्मण के हृदय मण्डपाकाश में फुरता है । वह मण्डपाकाश जो आकाश में स्थित है उसमें न पृथ्वी है, न पर्वत हैं, न मेघ हैं, न समुद्र है और न कोई मुमुक्षु है । केवल शून्य शून्य स्थित है और न कोई जगत् है, न कोई देखनेवाला है—यह सब भ्रान्तिमात्र है । हे राजन् ! यह सब तेरे उस मण्डपाकाश में फुरते हैं । विदूरथ बोले, हे देवि ! जो ऐसा ही है तो यह मेरे भृत्य भी अपने आत्म में सत् हैं वा असत् हैं कृपा कर कहिये ? देवी बोलीं, हे राजन् ! विदित वेद जो पुरुष है वह शुद्ध बोधरूप है । उसको कुछ भी जगत् सत्यरूप नहीं भासता, सब चिदाकाश रूप ही भासता है । जैसे भ्रम निवृत्त होने पर रस्सी में सर्प नहीं भासता वैसे ही जिन पुरुषों को आत्मबोध हुआ है और जिनका जगद्भ्रम निवृत्त हुआ है उनको जगत् सत् नहीं भासता । जैसे सूर्य की किरणों में जल को असत् जाने तो फिर जल सत्ता नहीं भासता वैसे ही जिनको आत्मबोध हुआ है और जगत् को असत् जानते हैं उनको सत् नहीं भासता । हे राजन् ! जैसे स्वप्न में कोई भ्रम से अपना कटा शीश देखे और जागने पर स्वप्न का मरना नहीं देखता वैसे ही ज्ञानवान् को जगत् सत् नहीं भासता । जैसे स्वप्न का मरना भ्रम से देखता है वैसे ही अज्ञानी को जगत् सत् भासता है । परन्तु वास्तव में कुछ नहीं, शुद्धबोध में जगत् भ्रम भासता है । जैसे शरत्काल में मेघ से रहित शुद्ध आकाश होता है वैसे ही शुद्धबोधवालों को अहं त्वं आदि व्यर्थ शब्द का अभाव होता है । हे राजन् ! तुम और तुम्हारे भृत्य इत्यादि जो यह सृष्टि है वह सब