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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

उपशम प्रकरण । ६४७

करंजुये की कुञ्जों में मैं भ्रमता रहा जहाँ कामरूपी कोयल के शब्द होते थे और जन्मरूपी कूप में दुःख पाता था । सुख पाने की आशा में हुया; वासनारूपी जाल में फँसा, दुःखरूपी दावाग्नि में जला और आशारूपी फाँसी में बँधा हुआ मैं कई बार जन्ममरण को प्राप्त हुआ था, क्योंकि अहंकार के वश हुए जन्म मृत्यु को प्राप्त होता है—जैसे रात्रि में पिशाच दिखाई दे और अधीरता को प्राप्त करे तैसे ही मुझको अहंकार ने किया था सो अब परमात्मारूप की मुझको तुमने प्रेरणा की है और अपनी शक्ति विष्णुरूप धारकर विवेक उपदेश किया और जगाया है । हे देव, ईश्वर ! तुम्हारे बोध से अहंकाररूपी राक्षस नष्ट हुआ है । हे विभो ! अब में उसको नहीं देखता जैसे दीपक में तम नहीं भासता । अहंकाररूपी जो यक्ष था और मन में जो वासना थी वह सब नष्ट हुई है । अब में नहीं जानता कि वे कहाँ गये—जैसे दीपक निर्वाण होता है तब नहीं जाना जाता कि प्रकाश कहाँ गया । हे ईश्वर ! तुम्हारे दर्शन से मेरा अहंभाव नष्ट हुआ है । जैसे सूर्य के उदय हुए चोरभय मिट जाता है तैसे ही देहरूपी रात्रि में अहंकाररूपी पिशाच उठा था वह अब नष्ट हुआ है । और अब मैं परम-स्वस्थ हुआ हूँ । जैसे वानरों से रहित वृक्ष स्वस्थ होता है तैसे ही मैं परम निर्वाण को प्राप्त हुआ हूँ । अब मैं सम और शान्त बोध में जागा हूँ और चिरपर्यन्त चोरों से जो घिरा था सो अब छूटा हूँ । अब मेरा हृदय शीतल हुआ है और आशारूपी मृगतृष्णा शान्त हो गई है । जैसे जल से पर्वत की तप्तता मिटे और वर्षा से शीतलता को प्राप्त हो तैसे ही विवेकरूपी विचार से अहंकाररूपी तप्तता दूर हो गई है । अब मोह कहाँ और दुःख कहाँ, आशारूपी स्वर्ग कहाँ और नरक कहाँ, बन्ध कहाँ और मुक्त कहाँ । अहंकार के होने से पदार्थ भासते हैं, अहंकार के गये इनका अभाव हो जाता है । जैसे मूर्ति दीवार पर लिखी जाती है आकाश पर नहीं लिखी जाती तैसे ही अहंकार संयुक्त जो चेतन है वह नहीं शोभता अहंकार से ही सुख दुःखादिक का पात्र होता है । जैसे मलीन वस्त्र पर केशर का रङ्ग नहीं शोभता तैसे ही उसमें ज्ञान नहीं शोभता जब अहं-काररूपी मेघ का अभाव हो तब तृष्णारूपी कुहिरा भी नहीं रहता और

६४= योगवाशिष्ट ।

शरत्काल के आकाशवत स्वच्छ चित्त रहता है। निरहंकाररूपी जल में प्रसन्नतारूपी कमलों से शोभता है। हे आत्मा ! तुझको नमस्कार है। इन्द्रियाँरूपी तेंदुए और चित्तरूपी बड़वाग्नि, दोनों जिससे नष्ट भये हैं ऐसे आत्मारूपी समुद्रआत्मा को नमस्कार है, जिसमे अहंकार मेघ दूर हुआ है और दावाग्नि शान्त हुई है। ऐसे जो आत्मानन्दरूपी पर्वत है उस आनन्द के आश्रय मैंने विश्राम पाया है। हे देव ! तुझको नमस्कार है। जिसमें आनन्दरूपी कमल प्रफुल्लित है और जिसमे चित्तरूपी तरङ्ग शान्त हुआ है ऐसा जो मानसरोवर में आत्मा हूँ उसको नमस्कार है। आत्मारूपी हंस संवित्रूपी पंख हैं और हृदयरूपी कमलों से पूर्ण मानसरोवर, पर विश्राम करनेवाले को नमस्कार है। कालरूपी कल्पना से रहित निष्कलङ्क, सदा उदितरूप, सब ओर से पूर्ण और शान्त आत्मा तुझको नमस्कार है। मैं सदा उदित, शीतल हृदय कर तम दूर करता, और सर्वव्यापक हूँ, परन्तु अज्ञान से अदृष्ट हुआ था सो उस चैतन्य सूर्य को नमस्कार है। मन के मन से जो उपजे थे वह अब शान्त हुए हैं और मन को मन से और अहं को अहं से छेद के जो शेष रहे सो ही मेरी सत्ता है। भावरूप जो दृश्य पदार्थ हैं उनको आत्मभाव में तृष्णा को तृष्णा के छेद से, अनात्मा को आत्मविचार द्वारा नष्ट किये से और ज्ञान से ज्ञेय को जाने से मैं निरहंकारपद को प्राप्त हुआ हूँ और भाव अभाव क्रिया नष्ट हो गई है। मैं अब केवल स्वस्थित हूँ और निर्भय, निरहंकार, निर्मन, निष्पन्द, शुद्धात्मा हूँ। मेरा शरीर शव की नाईं स्थित है, लीला करके मैंने अहंकार को जीता है, परम उपशम को प्राप्त हुआ हूँ और परम शान्ति मुझको प्राप्त हुई है मोहरूपी बेताल और अहंकाररूपी राक्षस नष्ट हुए हैं, वासनारूपी कुत्सित भूमिका से मुक्त और विगतज्वर हुआ हूँ और तृष्णारूपी रस्मी में जो बँधा हुआ देहपिंजर था और उसमें अहंकाररूपी पक्षी फँसा था सो तृष्णारूपी रस्मी विवेक-रूपी करतनी से काटी है। अब जाना नहीं जाता कि शरीररूपी पिंजरे से अहंकाररूपी पक्षी कहाँ निकल गया। अज्ञानरूपी वृक्ष में अहंकार-रूपी पक्षी रहता था आत्मा के जानने से जाना नहीं जाता कि कहाँ

उपशम प्रकरण । ६४६

गया ? दुराशारूपी दुर्मति ने धूसर किया था, भोगरूपी भस्म ने शुद्ध दृष्टि दूर की थी और वासना मे हम मृतक हो गये थे । इतने काल मे में चित्त की भूमिका में मिथ्या अहंकार को प्राप्त हुआ था । अब में आनन्दित हुआ हूँ आज ही मेरी बड़ी शोभा बढ़ी है, अहंकाररूपी महामेघ नष्ट हुआ है और उसमें तृष्णारूपी श्यामता थी वह नष्ट हुई है । अब में निर्मल आकाशवत् शोभता हूँ, अब मैंने आत्म भगवान् देखा है और अपने स्वरूप को प्राप्त हुआ हूँ और अनुभवरूप सदा प्राप्त है । प्रभुता के समूह के आगे अज्ञान अल्परूप है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे आत्मलाभचिन्तन नाम पञ्चत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३५ ॥

प्रह्लाद बोले, हे महात्मा पुरुष ! तुझको नमस्कार है । तू सर्वपद से अतीत आत्मा चिरकाल में मुझको स्मरण आया है और तेरे मिलने से मेरा कल्याण हुआ है । हे भगवन् ! तुझको देखकर सब ओर से नमस्कार करता हूँ और हृदय से तुझको आलिंगन करूँगा । त्रिलोकी में तुझसे अन्य बान्धव कोई नहीं । तू सबसे सुखदायक है और सबका तू ही संहार करता और रक्षा करता है और देने और लेनेवाला भी तू ही है । अब तू क्या करेगा और कहाँ जावेगा ? तूने अपनी सत्ता से विश्व को पूर्ण किया है और विश्वरूप भी तू ही है । अब सब ओर से में तुझको देखता हूँ और तू ही नित्यरूप सर्वत्र है । तेरे और मेरे से अनेक जन्म का अन्तर पड़ा था पर अब कल्याण हुआ जो तुझको देखा । तू अत्यन्त निकट है और परम बान्धवरूप है—तुझको नमस्कार है । तू सबका कृत कृत्यस्वरूप कर्त्ता हर्त्ता और संसार तेरा नृत्य है । हे नित्य, निर्मल स्वरूप ! तुझको नमस्कार है । शंख, चक्र, गदा और पद्म के धारनेवाले विष्णु और अर्ध चन्द्रमा के धारनेवाले सदाशिवरूप तुझको नमस्कार है । हे सहस्रनेत्र, इन्द्र ! तुझको नमस्कार है । पद्मज ब्रह्मा सब देवविद्या का सम्बन्ध तू ही है । तेरे में कुछ भेद नहीं तो तुम्हारे हमारे में भेद कैसे हो ? जैसे समुद्र और तरंगों का संयोग अभेद है तैसे ही तेरा और मेरा संयोग अभेद है । तू ही अनन्त और विचित्ररूप है और भाव अभावरूप जगत के धरनेवाली नीति है—जो जगत की मर्यादा करती है । हे द्रष्टा-

६५० योगवाशिष्ठ।

रूप! तुझको नमस्कार है। हे सर्वज्ञ! सर्वस्वभावरूप आत्मदेव! जन्म प्रति जन्म में बहुत दुःखमार्ग में विचरा हूँ और तेरी माया से चिरकाल दग्ध हुआ हूँ। हे देवेश! देशलोक मैंने अनन्त देखे हैं और दृश्य द्रष्टा भी अनेक देखे हैं परन्तु किसी से तृप्त न हुआ। जगत् को जिस ओर देखूँ उसी ओर से काष्ठ, पाषाण, जल, मृत्तिका, आकाश दृष्ट आता था अब तुझ बिना कुछ और दृष्ट नहीं आता अब वाञ्छा किसकी करूँ जब तुझको देखा है और उपलब्धस्वरूप प्राप्त हुआ हूँ। तुझको नमस्कार है। नेत्रों की श्यामता में जो पुतलीरूप स्थित है और रूप को देखता है वह साक्षीभूत भीतर कैसे नहीं देखता? जो त्वचा में स्पर्श करता है और शीत उष्ण आदिक को जानता है ऐसा सर्व अङ्गों में व्यापक अनुभवकर्ता है—जैसे तिलों में तेल व्यापक होता है। उसको अनुभव कोई नहीं करता। जो शब्द को श्रवण इन्द्रिय के भीतर ग्रहण करता है उस शब्दशक्ति को जो जाननेवाली सत्ता है और जिसमें शब्दशक्ति का विचार होता है इससे रोम खड़े हो आते हैं सो सत्ता दूर कैसे हो? जो जिह्वा के अग्र में रस स्वाद को ग्रहण करता है उस रस के अनुभव करनेवाली सत्ता दूर कैसे हो? नासा में जो ग्रहणशक्ति है उसको गन्ध आती है उसको अनुभव करनेवाली अलप सत्ता है सो सम्मुख कैसे न हो? वेदवेदान्त, सत्सिद्धान्त, पुराण और गीता में जो जानने योग्य आत्मा है उसको जब जाना तब विश्राम कैसे न हो? वह तो परावर परमात्मा पुरुष है। जिन भोगों की मैं तृष्णा करता था वह भोग विद्यमान रमणीय हैं तो भी तेरे दर्शन से रस नहीं देते। हे स्वच्छरूप निर्मल प्रकाश! तू सूर्यभाव होकर प्रकट हुआ है और तेरी सत्ता से चन्द्रमा शीतल हुआ है, तेरी सत्ता से पृथ्वी स्थित है, तेरी सत्ता से देवता आकाशमार्ग में विचरते हैं और तेरी सत्ता से आकाश में आकाशभाव है। मेरी अहंता तेरे में तत्त्व को प्राप्त हुई है, तेरे और मेरे में भेद कुछ नहीं। तुझे और मुझे नमस्कार है। मैं सम, स्वच्छ, साक्षीरूप, निर्विकार और देश, काल पदार्थ के परिच्छेद से रहित हूँ। मन जब क्षोभ को प्राप्त होता है तब इन्द्रियों की वृत्ति स्फुरणरूप होती है और प्राण, अपानशक्ति जब उल्लास को प्राप्त

उपशम प्रकरण । ६५१

होती है तब देहरूपी यन्त्र बहता है उस यन्त्र में चर्म अस्थि आदिक लकड़ियाँ और रस्मी है, इन्द्रियरूपी घोड़े हैं और मनरूपी सारथी चलानेवाला है । उस देहरूपी रथ में में चेतनरूप स्थित हूँ, परन्तु में किसी में आस्था नहीं करता । देह रहे अथवा गिरे मुझको कुछ इच्छा नहीं, मैं अब आत्मलाभ को प्राप्त हुआ हूँ और चिरकाल से पीछे उपशम को प्राप्त हुआ हूँ । जैसे कल्प के अन्त में जगत् शान्ति को प्राप्त होता है तैसे ही दीर्घ संसार मार्ग में चिर-काल तक भ्रमता भ्रमता अब विश्राम को प्राप्त हुआ हूँ । जैसे कल्प के अन्त में वायु चलता चलता रह जाता है । हे सर्वरूपात्मा ! तुझको नमस्कार है-जो तुझको और मुझको इस प्रकार जानते हैं । हे देव ! सम्पूर्ण जगत्जाल जो विस्तृतरूप है उसका तुमने कदाचित् स्पर्श नहीं किया-तुम्हारी जय है । जैसे पुष्पों में गन्ध और तिलों में तेल रहता है तैसे ही तुम सब देहों में रहते हो । तुम सर्व जगत् के प्रकाशक दीपक हो । उत्पत्ति और प्रलयकर्ता और सदा अकर्तारूप तेरी जय है तेरे परमाणु चिदअणु में यह विस्तार-रूप जगत् स्थित है जैसे वटबीज में वृक्ष होता है, फिर और में और होता है तैसे ही चिदअणु में जगत् है । जैसे आकाश में एक बादल के अनेक आकार दृष्ट आते हैं तैसे ही चित्तकला फुरने से अनेक पदार्थ भ्रमरूप भासते हैं इस संसार के जो क्षणभंगुररूप पदार्थ हैं इनकी अभावना किये से अब भाव अभाव से रहित भाव को देखता हूँ, मुझे अब यह निश्चय हुआ है कि मान, मद, क्रोध और कलुषता, कठोरता आदिक विकारों में महापुरुष नहीं डूबते पर जिनकी नीच प्रवृत्ति है वे इन दोनों और अवगुणों में डूबते हैं । पूर्व जो मेरी महादुरात्मा नीच अवस्था थी उसको स्मरण करके अब मैं हँसता हूँ कि कौन था और क्या जानता था । हे मेरे आत्मा ! मैं उस पद को प्राप्त हुआ था जहाँ चिन्तारूपी अग्नि की ज्वाला थी और दग्ध हुए जीर्ण संसार के आरम्भ थे पर अब देहरूपी नगर में स्फाररूपी परमार्थ की जय है और अब दुःख ग्रहण कर नहीं सकते । जहाँ दुष्ट इन्द्रियाँरूपी घोड़े और मनरूपी हाथी जाता था उस भोगरूपी शत्रु को अब चारों ओर से भक्षण किया है और निष्कण्टक राजा चक्रवर्ती हुआ हूँ । तू परम सूर्य है और परम आकाश में तेरा मार्ग

६५२ | योगवाशिष्ठ ।

हे, उदय-अस्त से रहित तू नित्य प्रकाशरूप है और सबके भीतर बाहर प्रकाशता है । अब मैं भोगों को लीलारूप देखता हूँ-जैसे कामी कामिनी को देखे परन्तु इच्छा से रहित हो तैसे ही तू ग्रहण करता है । नेत्ररूपी झरोखे में बैठकर तू रूप विषय को ग्रहण करता है और अपनी शक्ति से इसी प्रकार सब इन्द्रियों में वही रूप धारकर शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध विषयों को ग्रहण करता है । ब्रह्माकोटर में जो देश है उनमें प्राण अपान शक्ति से तू ही विचरता है, ब्रह्मपुरी में जाता है और क्षण में फिर आता है और सब जगत देहों में तू ही विचरता है । देहरूपी पुष्पों में तू सुगन्ध है, देहरूपी चन्द्रमा में तू अमृत है, देहरूपी वृक्ष में तू रस है और देहरूपी बरफ में तू शीतलता है । दूध में घृत, काष्ठ में अग्नि, उत्तम स्वादों में स्वाद, तेज में प्रकाश और सर्व असर्व की सिद्धकला पूर्ण तू ही है और सर्व जगत का प्रकाश भी तू ही है । वायु में स्पन्द, मन में मुदिता और अग्नि में तेज तुभी से सिद्ध है, प्रकाश में प्रकाश तू है और सब पदार्थों को सिद्धकर्त्ता दीपक तू है पर लीन हुए से जाना नहीं जाता कि कहाँ गया । संसार में जितने पदार्थ और अहं त्वं आदिक शब्द हैं वे ऐसे हैं जैसे सुवर्ण में भूषण होते हैं सो तूने अपनी लीला के निमित्त किये हैं और आपही प्रसन्न होता है । जैसे मन्द वायु से स्वगण्ड-स्वगण्ड हुए बादल के हाथी आदिक आकार हो भासते हैं तैसे ही तू भौतिक दृष्टि से भिन्न-भिन्न रूप भासता है । हे देव ! ब्रह्माण्डरूपी मोती में तू निरीच्छित व्यापक है । भूतोंरूपी जो अन्न का तू खेत है और चेतनरूपी रस से बढनेवाला है । तू अस्त की नाईं स्थित है अर्थात् इन्द्रियों के विषयों से रहित अव्यक्त-रूप है और सब पदार्थों का प्रकाशक है । जो पदार्थ शोभा संयुक्त विद्यमान होता है पर यदि तेरी सत्ता उसमें नहीं होती तो वह अस्त होता है-जैसे सुन्दर स्त्री भूषणों सहित अन्धे के आगे स्थित हो तो वह अस्त-रूपी होता है तैसे ही विद्यमान पदार्थ हो और तू न कल्पे तो अस्त हो जाता है । जैसे दर्पण में मुख का प्रतिबिम्ब होता है उसको देखकर अपनी सुन्दरता बिना कोई प्रसन्न नहीं होता । हे आत्मा ! तेरे संकल्प बिना देह काष्ठलोष्ठवत् होती है । जब पुर्यष्टक शरीर से अदृष्ट होती है तब सुख

उपशम प्रकरण । ६५३

दुःख आदिक क्रम नष्ट हो जाता है और किसी का ज्ञान नहीं होता—जैसे तम में कोई पदार्थ दृष्टि नहीं आता । तेरे देखने से सुख-दुःख आदिक स्थित होते हैं--जैसे सूर्य की दृष्टि से प्रातःकाल शुक्लवर्ण से प्रकाश आता है । जब अपने स्वरूप को प्राप्त होता है तब अज्ञानरूप सर्वविकार नष्ट हो जाते हैं--जैसे प्रकाश से अन्धकार नष्ट होता है तो पदार्थ ज्यों का त्यौं भासता है तैसे ही अज्ञान के नष्ट हुए से आत्मा ज्यों का त्यों भासता है । यह जो मनरूप तू है तेरे उपजने में सुख-दुःख की लक्ष्मी उपज आती है और तेरे अभाव हुए से सब नष्ट हो जाते हैं । स्वरूप से तू अनामयरूप है और क्षणभंगुर देह में जो मन ने आस्था की है सो महासूक्ष्म अणु निमेष के लक्ष भाग ऐसा सूक्ष्म है सुख दुःखआदिक की भावना करके अनीश्वरता को प्राप्त हुआ है तेरे प्रमाद से फुरनरूप होता है और तेरे देखने में सर्व लीन हो जाते हैं । यह जो पुर्यष्टक तेरा रूप है उसके देखने में क्षीण पदार्थ जाति भासि आते हैं--जैसे नेत्रों के खोलने से रूप भासता है और मन के अन्तर्धान होने से सर्व नष्ट हो जाता है और फिर किसी से ग्रहण नहीं होता । जो वस्तु क्षणभंगुर है उससे कुछ कार्य सिद्ध नहीं होता--जैसे बिजली के चमकने से कोई कार्य सिद्ध नहीं होता तैसे ही अन्तर्धान होने से देह में कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता । जो उपजकर तत्काल नष्ट हो जाता है उससे क्या कार्य सिद्ध हो ? देहादिक जड़ और नाशवन्त हैं और सबको प्रकाशता है वह सदा निर्विकार सच्चिदानन्दरूप है । सुख दुःख आदिक अज्ञानी के चित्त को स्पर्श करते हैं और जिसका समचित्त है उसको स्पर्श नहीं करते । हे देव ! ये जो सुख दुःख आदिक अविवेक के आश्रय हैं सो अविवेक नष्ट हो गया । तू निरीह निरंश निराकार है और सत्य असत्य से परे भैरवरूप परमात्मा तेरी सदा जय है । तू सर्वशास्त्रों का असि पद है । जात अज्ञातरूप सदा तेरी जय है, तेरे नाश और अविनाशरूप की जय है और तेरे भाव और अभावरूप की जय है और जीतने और न जीतने योग्य तेरी जय है । माया हुलाम और उपशान्ति को प्राप्त हुआ है तुझको नमस्कार है । हे निर्दोष ! तेरे में स्थित होने से मेरे राग द्वेष मिट गये हैं । अब बन्ध

६५४ | योगवाशिष्ठ ।

कहाँ और मोक्ष कहाँ और और आपदा, सम्पदा भाव-अभाव कहाँ । अब मेरे सर्वविकार शान्त हुए हैं और सम समाधि में स्थित हुआ हूँ । इति श्रीयोग० उप० प्रह्लादोपाख्याने संस्तवननाम षट्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥३६॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार चिन्तनकर महाधैर्यवान् प्रह्लाद निर्विकार निरानन्द समाधि में ऐसे स्थित हुआ जैसे मूर्ति का पर्वत हो । जब बहुत काल अपने भुवन में सुमेरुवत् समाधि में स्थित रहा तब दैत्य उसको जगाने लगे परन्तु वह न जागा—जैसे समय बिना बीज अंकुर नहीं लेता—और पाँच सहस्र वर्ष समाधि में व्यतीत भये पर शरीर उसी प्रकार पुष्ट रहा । दैत्यों के नगर में शान्ति हो गई और वह परम आत्मा को प्राप्त हुआ, निरानन्द जो प्रकाश है सो प्रकाशमात्र रह गया और कलना सब मिट गई । इतना काल जब इस प्रकार व्यतीत हुआ तब रसातलमण्डल में राजभय दूर हो गया और छोटे को बड़ा भक्षण करने लगा । निदान दैत्यमण्डली की विपर्यय दशा हो गई और निर्बल को बलवान् मारके लूट ले गये । तब अनेक मल्ल मिलकर प्रह्लाद को जगाने लगे पर तो भी वह न जागा—जैसे सूर्यमुखी कमल को रात्रि में भँवरे गुञ्जार करें और तो भी वह प्रफुल्लित नहीं होता, मुँदा ही रहता है । संवित्कला जो चित्त धातु है सो उसके भीतर फुर्ती न भासती थी जैसे मूर्त्तिका लीला सूर्यप्रकाश में रहित होता है तैसे ही उसे देखकर दैत्य उद्वेगवान् हुए और जहाँ किसी को सुखदायक देश स्थान मिला वहाँ जा रहे, मर्यादा सब दूर हो गई मत्सर होने लगा और पुरुष स्त्रियाँ रुदन करने और शोकवान् होने लगे । कोई मारे जावें, कोई लूटे जावें और व्यर्थ अनर्थ कदर्थ करनेवाले हो गये । सब दैत्यतापपरायण हुए बान्धव नष्ट हो गये और उपद्रव उत्पन्न होने लगे । दिशा के मुख अग्नि रूप हो गये, देवता आन दिखाई देने लगे और दैत्य निर्बल को बाँध ले जाने लगे । दैत्य मूलभूमि से रहित निर्लक्ष्मी उजाड़ से हो गये और दैत्यपुर में अनीति अकारण उपद्रव हुआ जैसे कल्प के अन्त में जीव दुःख पाते हैं तैसे ही दैत्य दुःख पाने लगे । इति श्रीयोग० उप० दैत्यपुरी प्रभञ्जनवर्णननाम सप्तत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥३७॥

उपशम प्रकरण। ६५५

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार जब दैत्यपुरी की दशा हुई तब सम्पूर्ण जगत्जाल के क्रम पानेवाले विष्णुदेव, जो क्षीरसमुद्र में शेषनाग की शय्या पर शयन करनेवाले हैं, चतुर्मास वर्षाकाल की निद्रा से जागे और बुद्धि के नेत्रों से जगत् की मर्यादा विचारी तो देखा कि पाताल में प्रह्लाद दैत्य समाधि में पद्मासन बाँधकर स्थित हुआ है और सृष्टि दैत्यों से रहित हुई है। बड़ा कष्ट है कि अब देवता जीतने की इच्छा से रहित होकर आत्मपद में स्थित हो जावेंगे और जब देवता और दैत्यों का विरोध रहता है तब जीतने के निमित्त याचना करते हैं कि दैत्य नष्ट होवें। अब सब देवता निर्द्वन्द्वरूप होकर परमपद को प्राप्त होवेंगे। जैसे रस से रहित बेलि सूख जाती है तैसे ही अभिमान और इच्छा से रहित देवता जगत् की ओर सूखकर आत्मपद को प्राप्त होंगे। जब देवताओं के समूह शान्त को प्राप्त होंगे तब पृथ्वी में यज्ञ तपादिक उत्तम क्रिया निष्फल हो जावेगी न कोई करेगा, न किसी को प्राप्त होगा, और जब पृथ्वीलोक से शुभक्रिया नष्ट हुई तब लोक भी नष्ट हो जावेंगे, अकारण प्रलय प्रसंग होगा और सब मर्यादा क्रम जगत् का नष्ट हो जावेगा। जैसे धूप से बरफ नष्ट होती है तैसे ही जगत् क्रम सब नष्ट होवेगा। इसके नष्ट हुए भी मुझको कुछ नहीं, परन्तु मैंने अपनी लीला रची है सो सब नष्ट हो जावेगी। तब मैं भी इस शरीर को त्यागकर परमपद में स्थित हूँगा और अकारण ही जगत् उपशम को प्राप्त होगा, इसमें मैं कल्याण नहीं देखता। जो दैत्यों के उद्वेग से रहित देवता भी शान्ति हो जावेंगे तो तपक्रिया नष्ट हो जावेगी और जीव दुःखी होकर नष्ट हो जावेंगे। इससे मैं जगत्कर्म को स्थापन करूँ कि परमेश्वर की नीति इसी प्रकार है। अब रसातल को जाऊँ और जगत् की मर्यादा ज्यों की त्यों स्थापन करूँ पर जो मैं प्रह्लाद से भिन्न पाताल का राज्य करूँगा तो वह देवताओं का शत्रु होगा इससे ऐसे भी न करूँगा। प्रह्लाद का यह अन्त का जन्म है और परम पावन देह है और कल्प पर्यन्त रहेगी। यह ईश्वर की नीति है सो ज्यों की त्यों है, इसमें मैं जाकर दैत्येन्द्र प्रह्लाद को जगाऊँ कि अब वह जागकर जीवन्मुक्त

६५६ योगवाशिष्ठ ।

हुआ है दैत्यों का राज्य करे। जैसे मणि मल से रहित प्रतिबिम्ब को ग्रहण करती है तैसे ही प्रह्लाद भी इच्छा से रहित होकर प्रवर्त्ते। इस प्रकार सृष्टि देवता दैत्यों से संयुक्त रहेगी और परस्पर इनका द्वेष न होगा और मेरी क्रीड़ा (लीला) अच्छी होगी। यद्यपि सृष्टि का होना न होना मुझको तुल्य है तो भी जो नीति है वह जैसे स्थित है तैसे ही कहे। जो वस्तु भाव में तुल्य हो उसका नाश और स्थित में प्रयत्न करना कुबुद्धि है, आकाश के हनन के यत्न के तुल्य है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे भगवान्चित्तविवेको नामाष्टत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३८ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! इस प्रकार चिन्तन कर सर्वात्मा विष्णुदेव अपने परिवार सहित क्षीरसमुद्र से चले—जैसे मेघघटा एकत्र होकर चले—और आकर प्रह्लाद के नगर को प्राप्त हुए। वह नगर मानो दूसरा इन्द्रलोक था और प्रह्लाद के मन्दिर में देखा कि निकट दैत्य थे वे विष्णुजी को दूर से देखकर भाग गये—जैसे सूर्य से उलूकादिक भाग जावें। तब जो मुख्य दैत्य थे उनके साथ विष्णुजी ने दैत्यपुरी में प्रवेश किया—जैसे तारासंयुक्त चन्द्रमा आकाश में प्रवेश करता है तैसे ही विष्णुजी गरुड़ पर आरूढ़ लक्ष्मी साथ चमर करतीं और अनेक ऋषि, देव सहित प्रह्लाद के गृह आये। आते ही विष्णुजी ने कहा, हे महात्मा पुरुष! जाग! जाग! ऐसे कहकर पाञ्चजन्य शंख बजाया जिससे महाशब्द हुआ। फिर उसे प्रह्लाद के कानों के साथ लगाया और जैसे प्रलयकाल में इकट्ठा मेघ का शब्द हो तैसे ही बड़े शब्द को सुनकर दैत्य पृथ्वी पर गिर पड़े। निदान शनैः शनैः दैत्येन्द्र को जगाया और प्राणशक्ति जो ब्रह्मरन्ध्र में थी वहाँ से विष्णुजी ने उठाई और वह शरीर में प्रवेश कर गई। जैसे सूर्य के उदय हुए सूर्य की प्रभा वन में प्रवेश कर जाती है तैसे नवद्वारों में प्रवेश कर गई। तब प्राणरूपी दर्पण में चित्तसंवित् प्रतिबिम्बित होकर चैतन्य मुखत्व हुई और मनभाव को प्राप्त हुई और तब जैसे प्रातःकाल में कमल खिल आते हैं तैसे ही उसके नेत्र प्रफुल्लित हो आये और प्राण और अपान नाड़ी में छिद्रों के मार्ग विचरने लगे। जैसे वायु

उपशम प्रकरण । ६१७

से कमल स्फुरने लगते हैं तैसे ही मन और प्राणशक्ति से अङ्ग स्फुरने लगे और जाग जाग शब्द जो भगवान् कहते थे उससे वह जगा और उसने जाना कि मुझको विष्णु भगवान् ने जगाया है और जैसे मेघ का शब्द सुनकर मोर प्रसन्न होता है तैसे वह प्रसन्न हुआ और मन में दृढ़ स्मृति हो आई । तब त्रिलोकी के ईश्वर विष्णुदेव ने, जैसे पूर्व कमलो- द्भव ब्रह्मा से कहा था कि हे साधु ! तू अपनी महालक्ष्मी को स्मरण कर कि तू कौन है । समय बिना देह के त्यागने की इच्छा क्यों की थी । जो ग्रहण त्याग के संकल्प से रहित पुरुष हैं उनको भाव अभाव के होने में क्या प्रयोजन है ? उठकर अपने आचार में सावधान हो, तेरा यह शरीर कल्पपर्यन्त रहेगा और नष्ट नहीं होगा । इस नीति को ज्यों की त्यों मैं जानता हूँ । हे आनन्दित ! तू जीवन्मुक्त हुआ राज्य में स्थित हो । हे जीर्णमन ! गतउद्वेग तेरा देह कल्पपर्यन्त रहेगा और फिर कल्प के अन्त में तू शरीर त्यागकर अपनी महिमा में स्थित होगा— जैसे घट के फूटे से घटाकाश महाकाश को प्राप्त होता है । अब तू निर्मल दृष्टि को प्राप्त हुआ है; लोकों का परावर तूने देखा है और अब तू जीवन्मुक्त विलासी हुआ है । हे साधु ! द्वादश सूर्य जो प्रलयकाल में तपते हैं उदय नहीं हुए तो तू क्यों शरीर त्यागता है; उन्मत्त पवन जो त्रिलोकी की भस्म उड़ानेवाला वह तो नहीं चला है और देवताओं के विमान उससे नहीं गिरे तू क्यों व्यर्थ शरीर त्यागता है ? सब लोगों के शरीर मूर्ख वृक्ष की मञ्जरीवत नहीं सूखे; पुष्कर मेघ और वह बिजली स्फुरने नहीं लगीं पर्वत तो युद्ध करके परस्पर नहीं गिरने लगे अब तक मैं भूतों को खींचने नहीं लगा लोकों में विचरता हूँ । यह अर्थ है, यह मैं हूँ, यह पर्वत है, ये भूतप्राणी हैं, यह जगत् है, यह आकाश है, तू देह मन त्याग; देह को धारे रह । हे साधो ! जो जीव अज्ञानयोग से शिथिल हुआ है अर्थात् जिसकी देह में आत्मा अभिमान है कि मैं और मम से व्याकुल रहता है और दुःखों में जीर्ण होता है उसको मरना शोभता है जिसको तृष्णा जलाती है और हृदय में संसारभावना जीर्ण करता है और जिसके मनरूपी वन में चित्तरूपी लता दुःख सुखरूपा

६५८योगवाशिष्ट ।

पुष्पों से प्रफुल्लित है और उदय होता है उसको मरना श्रेष्ठ है। जो पुरुष अपनी देह में आधि व्याधि दुःखों से जलता है और जिसके हृदय में कामक्रोधरूपी सर्प फुरते हैं और देहरूपी सूखा वृक्ष निष्फल है और चित्त चञ्चल है ऐसी देह के त्यागने को लोक में मरना कहते हैं; स्वरूप से नाश किसी का नहीं होता । क्या ज्ञानी का ही क्या अज्ञानी का हो । हे साधो ! जिसकी बुद्धि आत्मतत्त्व के अवलोकन से उपराम नहीं होती ऐसा जो यथार्थदर्शी ज्ञानवान् है और जिसका हृदय राग द्वेष से रहित शीतल हुआ है और दृश्यवर्ग को साक्षीभूत होकर देखता है उसका जीना श्रेष्ठ है । जो पुरुष सम्यक् ज्ञान द्वारा हेयोपादेय से रहित है और चेतनतत्त्व में तद्रूप चित्त हुआ है, जिसने संकल्प मल से रहित चित्त को आत्मपद में लगाया है और जिस पुरुष को जगत् के इष्ट-अनिष्ट पदार्थ समान भासते हैं और शान्तचित्त हुआ लीलावत् जगत् के कार्य करता है, जो इष्ट अनिष्ट की प्राप्ति में राग द्वेष नहीं करता, जिसे ग्रहण त्याग की बुद्धि उदय नहीं होती और जिसके श्रवण और दर्शन किये से औरों को आनन्द उपजता है उसका जीना शोभता है जिसके उदय हुए से जीवों के हृदयकमल प्रफुल्लित होते हैं उसका चिरजीना प्रकाश-वान् शोभता है और वही पूर्णमासी के चन्द्रमावत् सफल प्रकाशता है-नीच नहीं शोभते ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे उपशमप्रकरणे प्रह्लादोपाख्याने नारायणवनो- पन्यासयोगोनामैकोनचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३६ ॥

श्रीभगवान् बोले, हे साधो ! यह जो देहसंग दृष्टि आती है उसका नाम जीना कहते हैं और इस देह को त्यागकर और देह में प्राप्त होने का नाम मरना है । हे बुद्धिमान् ! इन दोनों पक्षों से अब तू मुक्त है, तुझको मरना क्या है जीना क्या है-दोनों सममात्र हैं । इस अर्थ के दिखाने के निमित्त मैंने तुझसे मरना और जीना कहा है कि गुणवानों का जीना श्रेष्ठ है और मूढों का मरना श्रेष्ठ है पर तू न जीता है, न मरेगा । देह के होते भी तू विदेह है और तेरे आकाश की नाईं अङ्ग हैं । जैसे आकाश में वायु नित्य चलता है परन्तु उससे आकाश निर्लेप रहता है

उपशम प्रकरण । ५७३

तैसे ही तू देह में निर्लेप रहेगा। देह, इन्द्रियाँ, मन आदिक की क्रिया सब तुझसे होती हैं, सबका कर्त्ता और सत्ता देनेवाला तू ही है और स्वरूप से सदा अकर्त्ता है। जैसे वृक्ष की ऊँचाई का कारण आकाश है तैसे ही तेरे में कर्त्तव्य है। तू अब जाना है, सब वस्तु ज्यों की त्यों जानी है और तू अस्ति नास्ति मन का आत्मा है यह परिच्छिन्नरूप जो देह है सो अज्ञानी का निश्चय है और यह केवल दुःखों का कारण है। तू तो सर्व प्रकार सर्वात्मा चेतन प्रकाश है, तेरी बुद्धि आत्मपरायण है और तुझको देह अदेह क्या और ग्रहण और त्याग क्या। जो तत्त्वदर्शी पुरुष हैं उनका भावपदार्थ उदय हो अथवा लीन हो और प्रलयकाल का पवन चले तो भी उसको चला नहीं सकता और जिसका मन भाव अभाव से रहित है यह जो पर्वत के ऊपर पर्वत पड़े और चूर्ण हों और कल्प की अग्नि में जलने लगे तो भी अपने आपमें स्थित है--चलायमान नहीं होता। सब भूत स्थित होवें, इकट्ठे नष्ट हो जावें अथवा वृद्ध होवें वह सदा अपने आपमें स्थित है, इस देह के नष्ट हुए नाश नहीं होता और विक्षेप दुःख प्राप्त नहीं होता। इस देह में जो परमेश्वर आत्मा स्थित है वह मैं हूँ। मेरा अनात्मा भ्रम नष्ट हो गया है और ग्रहण त्याग मिथ्या कल्पना उदय नहीं होती। जो विवेकी तत्त्ववेत्ता हैं उनका संकल्पमन नष्ट हो जाता है और जो प्रबुद्ध पुरुष है वह सब क्रिया करता भी अकर्त्तापद को प्राप्त होता है। वह सर्व अर्थों में अकर्त्ता, अभोक्ता रहता है और जगत् के किसी पदार्थ की इच्छा नहीं करता। जब कर्तृत्व भोक्तृत्व शान्त होता है तब आत्मपद शेष रहता है। इस निश्चय की दृढ़ता को बुद्धिमान् और मुक्त कहते हैं। प्रबुद्ध पुरुष चिन्मात्रस्वरूप है और सबको अपने वश करके स्थित है, वह ग्रहण किसका करे और त्याग किसका करे। ग्राह्य और ग्राहक शब्द मात्र अविद्या है और देह इन्द्रियों से होता है सो ग्रहण करना क्या और त्याग करना क्या ? जब ग्राह्य ग्राहक भाव हृदय से दूर हुआ उसी का नाम मुक्त है। जिसकी ऐसी स्थिति उदय होती है वह परमार्थसत्ता में सदा स्थिति रहता है और वह पुरुषों में पुरुषोत्तम सुषुप्ति की नाईं स्थित है, उसके अङ्गों की चेष्टा बोध को प्राप्त हुई है।

६६० | योगवाशिष्ठ ।

विश्रान्तिमान् निरवासनिक पुरुषों की वासना भी जगत् में स्थित दृष्टि आती है और अर्द्ध सुषुप्त की नाईं चेष्टा करते हैं पर वे सब जगत् में आत्मा देखते हैं। वे आत्मविषयिणी बुद्धि में सुख में हर्षवान् नहीं होते और दुःख में भी शोकवान् नहीं होते एकरस आत्मपद में स्थित रहते हैं। नित्य प्रबुद्ध पुरुष कार्यभाव को ग्रहण करता है पर जैसे इच्छा से रहित दर्पण प्रतिबिम्ब को ग्रहण करता है तैसे ही भली बुरी भावना उसको स्पर्श नहीं करती। वह आत्मपद में जाग्रत् है और संसार की ओर से सोया है और सुषुप्तिरूप है। जैसे पालने में सोया हुआ बालक स्वाभाविक अङ्ग हिलाता है तैसे ही उसका हृदय सुषुप्तिरूप है और व्यवहार करता है। हे पुत्र ! तू अज्ञात परमपद को प्राप्त हुआ है। तू इस देह से ब्रह्मा का एक दिन भोगेगा और इस राजलक्ष्मी को भोगकर फिर अच्युत परमपद को प्राप्त होगा।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे प्रह्लादबोधो नाम चत्वारिंशच- मस्सर्गः ॥ ४० ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! अद्भुत जिसका दर्शन है ऐसे जगतरूपी रत्नों के डब्बे विष्णुदेव ने जब शीतलवाणी से इस प्रकार कहा तब प्रह्लाद ने नेत्रों को खोलकर धैर्य सहित कोमल वचन और मननभाव को ग्रहण करके देखा और नर्मदृष्टि से बाहर देखा कि बड़ा कल्याण हुआ है। परमेश्वर अपना आपस्वरूप अनन्त आत्मा है और सर्वसंकल्प से रहित आकाशवत् निर्मल है। अब मुझको शोक है, न मोह है और न वैराग से देहत्याग की चिन्ता है जो कुछ कार्य भयदायक होता है सो एक आत्मा के विद्यमान रहते शोक कहाँ, नाश कहाँ, देहरूपी संसार कहाँ, संसार की स्थिति कहाँ, भय कहाँ और अभयता कहाँ, मैं यथेच्छित अपने आपमें स्थित हूँ। इस प्रकार मैं निर्मल विस्तृतरूप केवल पावन में स्थित हूँ और संसारबन्धन को त्यागकर विरक्त हुआ हूँ। जो अप्रबुद्ध मूढ़ हैं उनकी बुद्धि में हर्ष शोक चिन्ता विकार सदा रहता है। वे देह के भाव में सुख मानते हैं और अभाव में दुःखी होते हैं। यह चिन्तारूपी विष की पंक्ति मूढ़ों को लिपायमान होती है। यह इष्ट है, यह अनिष्ट है, यह

उपशम प्रकरण । ६६१

ग्रहण करने योग्य है; यह त्यागने योग्य है; इस प्रकार मूर्खों के चित्त की अवस्था डोलायमान होती है पण्डितों की नहीं होती । में भिन्न हूँ और वह भिन्न है यह अज्ञान से अन्धवासना है, शुद्ध बुद्धि के विद्यमान नहीं रहती जैसे सूर्य की किरणों से रात्रि दूर रहती है तैसे ही यह वासना दूर रहती है । यह त्याग और यह ग्रहण कीजिये सो मिथ्या चित्त का भ्रम है और उन्मत्त अज्ञानी के हृदय में होता है, ज्ञानवान् के हृदय में यह भ्रम उदय नहीं होता । हे कमलनयन ! सर्व तू ही है और विस्तृत आत्मरूप है । हेयोपादेय और द्वैतभाव कल्पना कहाँ है ? यह सम्पूर्ण जगत् विज्ञानरूप सत्ता का आभास है । सत्य असत्यरूप जगत् में ग्रहण त्याग किसका कीजिये ! केवल अपने स्वभाव में द्रष्टा और दृश्य का विचार किया है उसमें में प्रथम क्षीण विश्रान्तवान् हुआ था अब भाव अभाव-जगत् के पदार्थों से मुक्त हुआ हूँ और हेयोपादेय से रहित आत्मतत्त्व मुझको भासता है और समभाव को प्राप्त हुआ हूँ । अब मुझको संशय कुछ नहीं रहा, जो कुछ करता हूँ वह आत्मा में करता हूँ । त्रिलोकी में तबतक तू पूजने योग्य है जबतक प्रलय नहीं हुआ इसमें में आदरसंयुक्त पूजन करता हूँ, तुम ग्रहण करो । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार दैत्यराज ने कहकर क्षीरसमुद्र में शयन करनेवाले विष्णु को श्रेष्ठ सुमेरु की मणियों से पूजा और फिर शंख, चक्र, गदा, पद्म आदिक शस्त्रों का पूजन करके गरुड़ की पूजा की और फिर देवता और विद्याधरों की पूजा की । इस प्रकार भगवान् के आत्मस्वरूप का हृदय में ध्यान करके परिवार संयुक्त पूजन किया, तब लक्ष्मीपति बोले, हे दैत्येश्वर ! तू उठकर सिंहासन पर बैठ, में तुझको अपने हाथ से अभिषेक करता हूँ और पाञ्चजन्य शंख बजाता हूँ उसका शब्द सुनकर सब सिद्ध और देवता आकर तेरा मङ्गल करेंगे । इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार कहकर विष्णुजी ने दैत्य को इस भाँति सिंहासन पर बैठाया जैसे सुमेरु पर मेघ आ बैठे और फिर क्षीरसमुद्र और गङ्गादि तीर्थों का जल मँगाके पाञ्चजन्य शंख बजाया जिसके शब्द से सब सिद्धगण, ऋषि, ब्राह्मण, विद्याधर, देवता और मुनियों के समूह आये और सबने

६६२ योगवाशिष्ट ।

स्तुति की। इस प्रकार अभिषेक देकर मधुसूदन बोले, हे निष्पाप! जब तक सुमेरु के धरनेवाली पृथ्वी और सूर्य चन्द्रमा का मण्डल है तब तक तू इष्ट अनिष्ट में समबुद्धि, वीतराग और क्रोध से रहित होकर राज्यभोग और राज्य की पालना कर । तुमको पूर्ण भूमिका प्राप्त हुई है उसमें स्थित होकर जैसे प्राप्त हो तैसे ही, हर्ष, शोक और उद्वेग से रहित होकर विचर। ईर्ष्याद्वेष से रहित हो तू बन्धनवान न होगा । संसार की स्थिति तूने सब देखी है और सबको जानता है अब मैं तुझको क्या उपदेश करूँ । तू राग द्वेष से रहित होकर राज्य भोग, अब दैत्यों का रुधिर धरती पर न पड़ेगा अर्थात देवताओं के साथ विरोध न होगा । आज से देवता और दैत्यों का संग्राम गया। जैसे मन्दराचल से रहित क्षीरसमुद्र शान्तिमान हुआ था तैसे ही सब जगत् स्वस्थ रहेगा । मोहरूपी तम तेरे हृदय से दूर हुआ है और सदा प्रकाशस्वरूप लक्ष्मी हुई है और अनन्त विलासों को निष्कामी से भोगता आत्मपद में स्थित रह ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे उपशमप्रकरणे प्रह्लादाभिषेकोनाम षट्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार कहकर पुण्डरीकाक्ष परिवार संयुक्त चले मानो दूसरी संसार की रचना दैत्य के मन्दिर से चला है । तिस पीछे प्रह्लाद ने पुष्पाञ्जलि दी और क्रम से क्षीरसमुद्र में पहुँचे और देवताओं को विदा करके आप शेषनाग के आसन पर जैसे श्वेतकमल पर भँवरा बैठे तैसे स्वस्थ होकर बैठे । हे रामजी ! यह दृष्टि अज्ञान के सम्पूर्ण मल के नाश करनेवाली है । प्रह्लाद को बोध की प्राप्ति की जो अवस्था मैंने तुमसे कही है वह चन्द्रमा के मण्डलवत् शीतल है । जो मनुष्य बड़ा पापी हो और इसको विचारे तो वह भी शीघ्र ही परमपद को प्राप्त हो और जो पाप से रहित है उसकी क्या वार्ता कहिये केवल सम्यक् विचार करके पाप नष्ट हो जाता है । वह कौन है जो इन वाक्यों को विचार के परमपद को न प्राप्त हो । हे रामजी ! अज्ञानरूप पाप इसके विचार से नष्ट हो जाते हैं और पापों का कारण जो अज्ञान है उसका नाश करनेवाला यह विचार है-इससे विचार का त्याग कदाचित न करे । यह तो प्रह्लाद

उपशम प्रकरण ।

६६३

की सिद्धता कही है इसको जो मनुष्य विचारे उसके अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जावें इसमें कुछ संशय नहीं। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! प्रह्लाद का मन तो परमपद में लग गया था पाञ्चजन्य शब्द से उसको विष्णुजी ने कैसे जगाया ? वशिष्ठजी बोले, हे निष्पाप, हे रामजी ! लोक में मुक्ति दो प्रकार की है एक सदेह और दूसरी विदेह, उनका भिन्न-भिन्न विभाग सुन। जिस पुरुष की बुद्धि देहादिकों से असंसक्त है और जिसको ग्रहण त्याग की इच्छा नहीं और निरहंकार हुआ चेष्टा करता है उसको तुम सदेह मुक्त जानो और देहादिक सब नष्ट हो जावें फिर न जन्म मरण करे उसको विदेह मुक्त जानो। वह उस पद को प्राप्त होता है जो अदृश्य-रूप है। अज्ञानी की वासना कच्चे बीज की नाईं है जो जन्मरूपी अंकुर को प्राप्त करती है और ज्ञानवान् मुक्त की वासना भुने बीज की नाईं जो जन्मरूपी अंकुर से रहित होती है। विदेह मुक्त की वासना का अंकुर दृष्टि नहीं आता जीवन्मुक्त पुरुष के हृदय में शुद्ध वासना होती है और पावनरूप परम उदारता सत्तामात्र नित्य आत्मध्यान में है और संसार की ओर से सुषुप्ति की नाईं शान्तरूप है। सहस्र वर्ष का अन्त हो जावे और शुद्ध वासना का बीज हृदय में हो तो वह पुरुष समाधि से जागेगा—वह जीवन्मुक्त है। इससे प्रह्लाद के हृदय में शुद्ध वासना थी उससे पाञ्च-जन्य शंख के शब्द से वह जागा। विष्णुजी सब भूतों के आत्मा हैं जैसे जिसकी इच्छा फुरती है तैसे ही तत्काल होता है और वे सर्वज्ञ और सबके कारण हैं। जब विष्णु ने चिन्तना की तब प्रह्लाद जागा। आप अकारण हैं कोई इसका कारण नहीं यही सब भूतों का कारण है सृष्टि की स्थिति निमित्त आत्मापुरुष ने विष्णुवपु धारा है और आत्मा के देखने ही से विष्णुजी का दर्शन होता है और विष्णु की आराधना से शीघ्र ही आत्मा का दर्शन होता है। आत्मा के देखने के निमित्त तुम भी इसी दृष्टि का आश्रय करो। तुम विराड्रूप हो, इसी दृष्टि से शीघ्र ही आत्मपद की प्राप्ति होगी। यह वर्षाकाल की नदीवत् संसार असार बादल है सो विचाररूपी सूर्य के देखे बिना जड़ता दिखाता है। विष्णुरूप जो आत्मा है उसकी प्रसन्नता से बुद्धिमान् की यह भावस्वरूप

६६४ योगवाशिष्ठ ।

माया नहीं बेधती। जैसे यन्त्रमाया यन्त्रमन्त्रवाले को नहीं बेध सकती तैसे ही आत्मा की इच्छा से यह संसार माया घनता को प्राप्त होती है और आत्मा की इच्छा से निवृत्त होती है। यह संसारमाया ईश्वर की इच्छा से वृद्ध होती है-जैसे अग्नि की ज्वाला वायु से वृद्ध होती है और वायु ही से नष्ट होती है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे प्रह्लादव्यवस्थानवर्णनंनाम द्विचत्वा- रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४२ ॥

इतना सुनकर रामजी ने पूछा, हे भगवन्, सब धर्मों के वेत्ता ! आपके वचन परम शुद्ध और कल्याणस्वरूप हैं जिनको सुनकर में आनन्दवान् हुआ हूँ-जैसे चन्द्रमा की किरणों से ओषध पुष्ट होती है-और आपके वचनों को सुनने को, जो पावन और कोमल हैं, जिसकी वाञ्छा है वह पुरुष जैसे पुष्पों की माला से सुन्दर छाती शोभती है तैसे ही शोभता है। हे गुरुजी ! आप कहते हैं कि सब कार्य अपने पुरुष प्रयत्न से सिद्ध होते हैं, जो ऐसा है तो प्रह्लाद माधव के वर बिना क्यों न जागा-जब विष्णु ने वर दिया तब उसको ज्ञान प्राप्त हुआ ? वशिष्ठजी बोले, हे राघव ! प्रह्लाद को जो कुछ प्राप्त हुआ वह पुरुषार्थ से प्राप्त हुआ, पुरुषार्थ बिना कुछ प्राप्त नहीं होता। जैसे तिलों और तेल में कुछ भेद नहीं तैसे ही विष्णु भगवान् और आत्मा में कुछ भेद नहीं। जो विष्णु है वह आत्मा है और जो आत्मा है वह विष्णु है, विष्णु और आत्मा दोनों एक वस्तु के नाम हैं, जैसे विटप और पादप दोनों एक वृक्ष के नाम हैं प्रह्लाद ने जो प्रथम अपने आपमे अपनी प्रेमशक्ति विष्णुभक्ति में लगाई सो आत्मशक्ति से लगाई, आत्मा से आप ही वर पाया और आप ही विचारकर अपने मन को जीता। कदाचित् आत्मा में आप ही अपनी शक्ति से जागता है अथवा विष्णुशक्ति से जागता है। हे रामजी ! प्रह्लाद चिरपर्यन्त आराधना करता प्रतापवान् हुआ। विचार से रहित को विष्णु भी ज्ञान नहीं दे सकता। आत्मा के साक्षात्कार में मुख्य कारण अपने पुरुषार्थ से उपजा विचार है और गौण कारण वर आदिक है, इससे तू मुख्य कारण का आश्रय कर। प्रथम पाँचों इन्द्रियों को वश कर

उपशम प्रकरण । ६६५

और चित्त को आत्मविचार में लगा जो कुछ किसी को प्राप्त होता है वह अपने पुरुषार्थ से होता है, पुरुषार्थ बिना नहीं होता । अपने पुरुषार्थ प्रयत्न से इन्द्रियरूपी पर्वत को लाँघे तो फिर संसारसमुद्र से तर जावे और तब परमपद की प्राप्ति हो । जो पुरुष के प्रयत्न बिना जनार्दन मुक्ति दें तो मृगपक्षियों को क्यों दर्शन देकर उद्धार नहीं करते। जो गुरु अपने पुरुषार्थ बिना उद्धार करते तो अज्ञानी अविचारी ऊँट, बैल आदिक पशुओं को क्यों नहीं कर जाते । इससे विष्णु, गुरु इत्यादि और किसी के पाने की इच्छा बुद्धिमान् नहीं करते हैं । अपने मन के स्वस्थ किये बिना परम सिद्धता की प्राप्ति महात्मा पुरुष नहीं जानते । जिन्होंने वैराग्य और अभ्यास से इन्द्रियरूपी शत्रु वश किये हैं वे अपने आपसे उसको पाते हैं और किसी से नहीं पाते । हे रामजी ! आपसे अपनी आराधना और अर्चना करो, आपसे आपको देखो और आपसे आपमें स्थित रहो । शास्त्र विचार से रहित मूढ़ों की प्रकृति के स्थिति के निमित्त वैष्णव भक्ति कल्पी है प्रथम जो अभ्यास यत्न का सुख कहा है उसमें जो रहित पुरुष है उसको गौणपूजा का क्रम कहा है, क्योंकि उसने इन्द्रियों को वश नहीं किया और जिसने इन्द्रियों को वश किया उसको भेदपूजा से क्या प्रयोजन है । विचार और उपशम बिना भी विष्णुभक्ति सिद्ध नहीं होती और जब विचार और उपशम संयुक्त हुआ तब कमल और पाषाण में क्या प्रयोजन है । इससे विचार संयुक्त होकर आत्मा का आराधना करो, उसकी सिद्धता से तुम सिद्ध होगे जिसने उसको सिद्ध नहीं किया वह बन गर्दभ है जो प्राणी विष्णु के आगे प्रार्थना करते हैं वे अपने चित्त के आगे क्यों नहीं करते ? सब जीवों के भीतर विष्णुजी स्थित हैं उनको त्यागकर जो बाहर के विष्णुपरायण हो जाते हैं वे बुद्धिमान् नहीं । हृदयगुफा में जो चेतनतत्त्व स्थित है वह ईश्वर का मुख्य मना-तन वपु है और शंख, चक्र, गदा, पद्म जिसके हाथ में है वह आत्मा का गौणवपु है । जो मुख्य को त्यागकर गौण की ओर धावते हैं वे विद्यमान अमृत को त्यागकर जो साधन से सिद्ध हो उसकी प्राप्ति निमित्त यत्न करते हैं । हे रामजी ! मनरूपी हाथी को जिस पुरुष ने आत्मविवेक

६६६ योगवाशिष्ठ ।

से वश नहीं किया उस अविवेकी चित्त को राग द्वेष ठहरने नहीं देते । जिसके हाथों में शंख, चक्र, गदा, पद्म है उस ईश्वर की जो अर्चना करते हैं व कष्ट तपस्या से पूजन करते हैं, उनका चित्त समय पाकर निर्मलभाव, अभ्यास और वैराग्य को प्राप्त होता है। नित्य अभ्यास से भी चित्त निर्मल होता है तो आत्मफल को प्राप्त होता है, चित्त निर्मल बिना आत्मफल को प्राप्त नहीं होता और जब चित्त निर्मल हुआ तब वैराग्य और अभ्यासवान् होकर आत्मफल का भोगी होता है—जैसे बोया बीज समय पाकर फल देता है तैसे ही क्रम करके फल होता है । हे रामजी ! विष्णुपूजा का क्रम भी निमित्तमात्र है । आत्मतत्त्व के अभ्यासरूपी शाखा से फल प्राप्त होता है और जो सबमे उत्तम परम संपदा का अर्थ है वह अपने मन के निग्रह से सिद्ध होता है । अपने मन का निग्रह करना ही बीज है जो चेतनरूपी क्षेत्र में प्रफुल्लित होकर फलदायक होता है । संपूर्ण पृथ्वी की निधि और शिलामात्र बड़ी-बड़ी मणि की होवें तो भी मन के निग्रह के समान नहीं । जैसा दुःख का नाशकर्ता और बड़ा पदार्थ मन का निग्रह है वैसा और कोई नहीं । तब तक जीव अनेक जन्म पाता है तब तक अनउपशम मनरूपी मत्स्य संसारसमुद्र में भ्रमाता है । हे रामजी ! ब्रह्मा, विष्णु और महेश को चिरकालपर्यन्त पूजता रहे पर यदि मन उपशम और विचार संयुक्त न हुआ तो देवता कृपालु हों तो भी उसको संसारसमुद्र से नहीं तार सकते । यह जो भास्वर आकार जगत् के पदार्थ भासते हैं उनको इन्द्रियों से त्याग कीजिये तब जन्म के अभाव का कारण जानिये । विषयों की चिन्तना से रहित होकर, निरामय और सब दुःखों से रहित आत्मसुख में स्थित हो और जो सन्मात्र तत्त्व और सबका साररूप है उसका स्वाद लेकर मनरूपी के पार हो ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे प्रह्लादविश्रान्तिवर्णन- नाम त्रिचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४३ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह संसारनाम्नी माया अनन्त है और किसी प्रकार इसका अन्त नहीं आता । जब चित्त वश हो तब यह निवृत्त हो जाती है, अन्यथा नहीं निवृत्त होती । जितना जगत् देखने और