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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

१०० योगवाशिष्ठ ।

जैसे तुम विरक्त हुए हो वैसे ही आगे भी स्वाभाविक विरक्त हुए हैं सो स्वभाव से ही तुम शुद्ध हो इसी कारण तुम श्रेष्ठ हो। जो कोई अनिष्ट दुःख प्राप्त होता है उससे विरक्तता उपजती है सो तुमको नहीं हुई, तुम्हें तो सब इन्द्रियों के विषय विद्यमान होने पर वैराग्य हुआ है, इससे तुम श्रेष्ठ हो। हे रामजी ! मसान आदिक कष्ट के स्थानों को देखके तो मनको वैराग्य उपजता है कि कुछ नहीं, मर जाना है, पर उनमें जो कोई श्रेष्ठ पुरुष होता है सो वैराग्य को दृढ़ रखता है और मूर्ख है सो फिर विषय में आसक्त होता है इससे जिनको अकारण वैराग्य उपजता है सो श्रेष्ठ हैं। हे रामजी ! जो श्रेष्ठ पुरुष हैं सो अपने वैराग्य और अभ्यास के बल से संसारबन्धन से मुक्त हो जाते हैं। जैसे हस्ती बन्धन को तोड़के अपने बल से निकल जाता है और सुखी होता है वैसे ही वैराग्य अभ्यास के बल से बन्धन से ज्ञानी मुक्त होते हैं। हे रामजी ! यह संसार बड़ा अनर्थरूप है। जिस पुरुष ने अपने पुरुषार्थ से इस बन्धन को नहीं तोड़ा उसको तृष्णारूपी अग्नि जलाती है और जिस पुरुष ने अपने पुरुषार्थ से शास्त्र और गुरु के प्रमाण व युक्ति से ज्ञान को सिद्ध किया है वह उस पद को प्राप्त हुआ है। जैसे वर्षाकाल में बहुत वर्षा के होने से वन को दावानल नहीं जला सकता वैसे ही ज्ञानी को आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक ताप कष्ट नहीं दे सकते। हे रामजी ! जिन श्रेष्ठ पुरुषों ने संसार को विषम जानकर त्याग दिया है उनको संसार के पदार्थ गिरा नहीं सकते और जो मूर्ख हैं उनको गिरा देते हैं। जैसे तीक्ष्ण पवन के वेग से वृक्ष गिर जाते हैं परन्तु कल्पवृक्ष नहीं गिरता वैसे ही हे रामजी ! श्रेष्ठ पुरुष वही है जो संसार को विषम जानकर केवल आत्मतत्त्व की इच्छा करके परायण हो। उसी को ब्रह्मविद्या का अधिकार है और वही उत्तम पुरुष है। हे रामजी ! तुम भी वैसे ही उज्ज्वल पात्र हो। जैसे कोमल पृथ्वी में बीज बोते हैं वैसे ही तुमको में उपदेश करता हूँ। जिसको भोग की इच्छा है और संसार की ओर यत्न करता है सो पशुवत् है। श्रेष्ठ पुरुष वही है जिसको संसार तरने का पुरुषार्थ होता है। हे रामजी ! प्रश्न उससे कीजिये जिसमें जानिये कि

मुमुक्षु प्रकरण ।

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यह प्रश्न के उत्तर देने में समर्थ है और जिसको उत्तर देने की सामर्थ्य न हो उससे कदाचित् प्रश्न न करना। उत्तर देने को समर्थ हो और उसके वचन में भावना न हो तब भी प्रश्न न करे, क्योंकि दम्भ से प्रश्न करने में पाप होता है। गुरु भी उन्हीं को उपदेश करता है जो संसार से विरक्त हों और जिनको केवल आत्मपरायण होने की श्रद्धा और आस्तिकभाव हो। हे रामजी! जो गुरु और शिष्य दोनों उत्तम होते हैं तो वचन शोभते हैं। तुम उपदेश के शुद्धपात्र हो। जितने शिष्य के गुण शास्त्र में वर्णन किये हैं, सो सब तुममें पाये जाते हैं और मैं भी उपदेश करने में समर्थ हूँ, इससे कार्य शीघ्र होगा। हे रामजी! शुभ गुणों से तुम्हारी बुद्धि निर्मल हो रही है, इसलिये मेरा सिद्धान्त का सार वचन तुम्हारे हृदय में प्रवेश करेगा। जैसे उज्ज्वल वस्त्र में केसर का रङ्ग शीघ्र चढ़ जाता है वैसे ही तुम्हारे निर्मल चित्त को उपदेश का रङ्ग लगेगा। जैसे सूर्य के उदय से सूर्यमुखी कमल खिलता है वैसे ही तुम्हारी बुद्धि शुभ गुणों से खिल आई है। हे रामजी! जो कुछ शास्त्र का सिद्धान्त आत्मतत्त्व में तुमसे कहता हूँ उसमें तुम्हारी बुद्धि शीघ्र ही प्रवेश करेगी। जैसे निर्मल जल में सूर्य की कान्ति प्रवेश करती है वैसे ही तुम्हारी बुद्धि आत्मतत्त्व में शुद्धता से प्रवेश करेगी। हे रामजी! मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ के प्रार्थना करता हूँ कि जो कुछ मैं तुमको उपदेश करता हूँ उसमें ऐसी आस्तिक भावना कीजियोगा कि इन वचनों से मेरा कल्याण होगा। जो तुमको धारणा न हो तो प्रश्न मत करना। जिस शिष्य की गुरु वचन में आस्तिक भावना होती है उसका शीघ्र ही कल्याण होता है। अब जिससे तुमको आत्मपद प्राप्त हो सो में कहता हूँ। प्रथम जो अज्ञानी जीव में असत्य बुद्धि है उसका संग त्याग करो और मोक्षद्वार के चारों द्वारपालों में मित्र भावना करो। जब उनसे मित्र भाव होगा तब वह मोक्षद्वार में पहुँचा देंगे और तभी तुमको आत्म दर्शन होवेगा। उन द्वारपालों के नाम सुनो— शम, सन्तोष, विचार और सत्सङ्ग यह चारों द्वारपाल हैं। जिस पुरुष ने इनको वश में किया है उसको यह शीघ्र ही मोक्षरूपी द्वार के अन्दर

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कर देते हैं। हे रामजी ! जो चारों वश में न हों तो तीन को ही वश में करो, अथवा दो ही को वश कर लो अथवा एक वश करो। जो एक भी वश में होगा तो चारों ही वश में हो जायँगे। इन चारों का परस्पर स्नेह है। जहाँ एक आता है वहाँ चारों आते रहते हैं। जिन पुरुषों ने इनसे स्नेह किया है सो सुखी हुए हैं और जिसने इसका त्याग किया है सो दुःखी हैं। हे रामजी ! यदि प्राण का त्याग हो तो भी एक साधन को तो बल से वश करना चाहिये। एक के वश करने में चारों ही वशीभूत होंग। तुम्हारी बुद्धि में शुभ गुणों ने आके निवास किया है। जैसे सूर्य में सब प्रकाश आ जाते हैं वैसे ही सन्तों और शास्त्रों ने जो निर्मल गुण कहे हैं सो सब तुम में पाये जाते हैं। हे रामजी ! तुम मेरे वचनों के वैसे अधिकारी हुए जैसे तन्द्री के सुनने की अंदौरा ( स्पष्ट सुननेवाला ) अधिकारी होता है। चन्द्रमा के उदय से जैसे चन्द्रविकाशी कमल खिल आते हैं वैसे ही शुभ गुणों से तुम्हारी बुद्धि खिल आई है। हे रामजी ! सत्संग और सतशास्त्रों द्वारा बुद्धि को तीक्ष्ण करने से शीघ्र ही आत्मतत्त्व में प्रवेश होता है। इससे श्रेष्ठ पुरुष वही है जिसने संसार को विरस जान के त्याग दिया है और सन्तों और सतशास्त्रों के वचनों द्वारा आत्मपद पाने का यत्न करता है। वह अविनाशी पद को प्राप्त होता है। जो शुभ मार्ग त्याग करके संसार की ओर लगा है वह महामूर्ख जड़ है जैसे शीतलता से जल बर्फ हो जाता है वैसे ही अज्ञानी मूर्खता में दृढ़ आत्म मार्ग से जड़ हो जाता है। हे रामजी ! अज्ञानी के हृदयरूपी बिल में दुराशारूपी सर्प रहता है, इससे वह कदाचित् शान्ति नहीं पाता और कभी आनन्द से प्रफुल्लित नहीं होता। वह वैसे ही आशा से सदा संकुचित रहता है जैसे अग्नि में मांस सकुच जाता है। हे रामजी ! आत्मपद के साक्षात्कार में विशेष आवरण आशा ही है। जैसे सूर्य के आगे मेघ का आवरण होता है वैसे ही आत्मतत्त्व के आगे दुराशा आवरण है। जब आशारूपी आवरण दूर हो तब आत्मपद का साक्षात्कार होवे। हे रामजी ! आशा तब दूर हो जब सन्तों की संगति और सतशास्त्रों का विचार हो। हे रामजी ! संसाररूपी एक बड़ा वृक्ष है सो बाँध

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उपशम करके आत्मपद को प्राप्त होगे । हे रामजी ! जिन्होंने सत्सङ्ग और सतशास्त्रों द्वारा आत्मपद पाया है सो सुखी हुए हैं, फिर उनको दुःख नहीं लगा, क्योंकि दुःख देहाभिमान से होता है सो देह का अभि- मान तो तुमने त्याग ही दिया है । जिसने देह का अभिमान त्याग दिया है और देह को आत्मा से फिर ग्रहण नहीं करता सो सुखी रहता है । हे रामजी ! जिसने आत्मिक बल (विचार) द्वारा आत्मपद प्राप्त किया है वह अकृत्रिम आनन्द से सदा पूर्ण है और सब जगत् उसको आनन्दरूप भासता है । जो असम्यग्दर्शी हैं उनको जगत् अनर्थरूप भासता है । हे रामजी ! यह संसाररूप सर्प अज्ञानियों के हृदय में दृढ़ हो गया है वह योगरूपी गारुड़ी मन्त्र करके नष्ट हो जाता है, अन्यथा नहीं नष्ट होता । सर्प के विष से एक जन्म में मरता है और संसरणरूपी विष से अनेक जन्म पाकर मरता चला जाता है—कदाचित् शान्तिमान् नहीं होता । हे रामजी ! जिस पुरुष ने सत्संग और सतशास्त्र के वचन द्वारा आत्मपद को पाया है वह आनन्दित हुआ है उसको भीतर बाहर सब जगत् आनन्दरूप भासता है और सब क्रिया करने में उसे आनन्द विलास है । जिसने सत्सङ्ग और सतशास्त्रों का विचार त्यागा है और संसार के सम्मुख है उसको अनर्थरूप संसार दुःख देता है । कोई सर्प के दंश से दुःखी होते हैं कोई शस्त्र से घायल होते हैं, कितने अग्नि में पड़े की नाईं जलते हैं, कितने रस्सी के साथ बँधे होते हैं और कितने अन्धकूप में गिर के कष्ट पाते हैं । हे रामजी ! जिन पुरुषों ने सत्सङ्ग और सतशास्त्रों द्वारा आत्मपद को नहीं पाया उनको नरकरूप अग्नि में जलना, चक्की में पीसा जाना, पाषाण की वर्षा से चूर्ण होना, कोल्हू में पेरा जाना और शस्त्र से काटा जाना इत्यादि जो बड़े बड़े कष्ट हैं प्राप्त होते हैं । हे रामजी ! ऐसा दुःख कोई नहीं जो इस जीव को प्राप्त नहीं होता; आत्मा के प्रमाद से सब दुःख होते हैं जिन पदार्थों को यह रमणीय जानता है सो चक्र की नाईं चञ्चल हैं, कभी स्थिर नहीं रहते । सन्मार्ग को त्यागकर जो इनकी इच्छा करते हैं सो महादुःख को प्राप्त होते हैं और उनका दुःख इसलिए नष्ट नहीं होता कि वह ज्ञान के निमित्त

मुमुक्षु प्रकरण । १०५

पुरुषार्थ नहीं करते । जो पुरुष संसार को निरस जानकर पुरुषार्थ की ओर दृढ़ हुआ है उसको आत्मपद की प्राप्ति होती है । हे रामजी ! जिस पुरुष को आत्मपद की प्राप्ति हुई है उसको फिर दुःख नहीं होता । अज्ञानी को संसार दुःखरूप है और ज्ञानी को सब जगत आनन्दरूप है-उसको कुछ भ्रम नहीं रहता । हे रामजी ! ज्ञानवान् में नाना प्रकार की चेष्टा भी दृष्टि आती हैं तो भी वह सदा शान्त और आनन्दरूप है । संसार का दुःख उसको स्पर्श नहीं कर सकता, क्योंकि उसने ज्ञानरूपी कवच पहिना है । हे रामजी ! ज्ञानवान् को भी दुःख होता है बड़े बड़े महर्षि और राजर्षि बहुत ज्ञानवान् हुए हैं । वे भी दुःख को प्राप्त होते रहे हैं परन्तु वे दुःख से आतुर नहीं होते थे वे सदा आनन्द-रूप हैं । जैसे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि नाना प्रकार की चेष्टा करते जीवों को दृष्टि आते हैं पर अन्तर से वे सदा शान्तरूप हैं, उनको कर्त्ता का कुछ अभिमान नहीं । हे रामजी ! अज्ञानरूपी मेघ में उत्पन्न मोहरूपी कुहड़ों का वृक्ष ज्ञानरूपी शरत्काल में नष्ट हो जाता है । इससे समता को प्राप्त होता है और सदा आनन्द में पूर्ण रहता है । वह जो कुछ क्रिया करता है सो उसका विलासरूप है, सब जगत आनन्दरूप है । शरीररूपी रथ और इन्द्रियरूपी अश्व हैं । मनरूपी रास से उन अश्वों को खींचते हैं । बुद्धिरूपी रथ भी वही है जिस रथ में वह पुरुष बैठा है और इन्द्रियरूपी अश्व उसको खोटे मार्ग में डालते हैं । ज्ञानवान् के इन्द्रियरूपी अश्व ऐसे हैं कि जहाँ जाते हैं वहाँ आनन्दरूप हैं किसी ठौर में खेद नहीं पाते, सब क्रिया में उनको विलास है और सर्वदा आनन्द से तृप्त रहते हैं।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे तत्त्वमाहात्म्यं नाम द्वादशस्सर्गः ॥ १२ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इसी दृष्टि का आश्रय करो कि तुम्हारा हृदय पुष्ट हो, फिर संसार के इष्ट अनिष्ट में चलायमान न होगा । जिस पुरुष को इस प्रकार आत्मपद की प्राप्ति हुई है सो आनन्दित हुआ है । वह न शोक करता है न याचना करता है और हेयोपादेय से भी रहित परम शान्तिरूप, अमृत में पूर्ण हो रहा है । वह पुरुष नाना प्रकार की

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चेष्टा करता दृष्टि आता है, परन्तु वास्तव में कुछ नहीं करता। जहाँ उसके मन की वृत्ति जाती है वहाँ आत्मसत्ता भासती है जैसे पूर्ण-मासी का चन्द्रमा अमृत से पूर्ण रहता है वैसे ही ज्ञानवान् परमानन्द से पूर्ण रहता है। हे रामजी ! यह जो मैंने तुमसे अमृतरूपी वृत्ति कही है इसको तब जानोगे जब तुमको ब्रह्म का साक्षात्कार होगा। जैसे चन्द्रमा के मण्डल में ताप नहीं होता वैसे ही आत्मज्ञान की प्राप्ति होने से सब दुःख नष्ट हो जाते हैं। अज्ञानी को कभी शान्ति नहीं होती वह जो कुछ किया करता है उसमें दुःख पाता है। जैसे कीकर के वृक्ष में कण्टकों की ही उत्पत्ति होती है वैसे ही अज्ञानी को दुःखों की ही उत्पत्ति होती है। हे रामजी ! इस जीव को मूर्खता और अज्ञानता से बड़े दुःख प्राप्त होते हैं जिनके समान और दुःख नहीं। यदि आत्मतत्त्व की जिज्ञासा में हाथ में ठीकरा ले चाण्डाल के घर से भिक्षा ग्रहण करे वह भी श्रेष्ठ है पर मूर्खता से जीना व्यर्थ है। उस मूर्खता के दूर करने को में मोक्ष उपाय कहता हूँ। यह मोक्ष उपाय परमबोध का कारण है। इसके लिये कुछ संस्कृत बुद्धि भी होनी चाहिए जिसमें पद पदार्थ का बोध हो और मोक्ष उपाय शास्त्र को विचारे तो उसकी मूर्खता नष्ट होकर आत्मपद की प्राप्ति होगी। नाना प्रकार के दृष्टान्तों सहित जैसे आत्मबोध का कारण यह शास्त्र है वैसा कोई शास्त्र त्रिलोकी में नहीं। इसे जब विचारोगे तब परमानन्द को पाओगे। यह शास्त्र अज्ञानतिमिर के नाश करने को ज्ञानरूपी शलाका है। जैसे अन्धकार को सूर्य नष्ट करता है वैसे ही अज्ञान को इस शास्त्र का विचार नष्ट करता है। हे रामजी ! जिस प्रकार इस जीव को कल्याण है सो सुनिये। जब ज्ञानवान् गुरु महाशास्त्रों का उपदेश करे और शिष्य अपने अनुभव से ज्ञान पावे अर्थात् गुरु अपना अनुभव और शास्त्र जब ये तीनों इकट्ठे मिलें तब कल्याण होता है। जब तक अकृत्रिम आनन्द न मिले तब तक दृढ़ अभ्यास करे। उस अकृत्रिम आनन्द को प्राप्त करानेवाला मैं गुरु हूँ। जीवमात्र का मैं परम मित्र हूँ। हमारी संगति जीव को आनन्द प्राप्त करानेवाली है। इसलिए जो कुछ मैं चाहता हूँ सो तुम करो। संसार के क्षणमात्र के भोगों को त्याग करो।

# मुमुक्षु प्रकरण ।

१०८ योगवाशिष्ठ ।

जैसे हाथ में दीपक हो और अन्धा होकर कूप में गिरे सो मूर्खता है वैसे ही संसार भ्रम के निवारणवाले गुरु और शास्त्र विद्यमान् है जो उनकी शरण न आवै वह मूर्ख है। हे रामजी ! जिस पुरुष ने सन्त की संगति और सत्शास्त्र के विचार द्वारा आत्मपद को पाया है सो पुरुष केवल कैवल्यभाव को प्राप्त हुआ है अर्थात शुद्ध चैतन्य को प्राप्त हुआ है और संसार भ्रम उसका निवृत्त हो गया है। हे रामजी ! यह संसार मन के संसरने से उपजा है। जीव का कल्याण बान्धव, धन, प्रजा, तीर्थ देव द्वारा और ऐश्वर्य्य से नहीं होता, केवल एक मन के जीतने से कल्याण होता है। हे रामजी ! जिसको ज्ञान परमपद रसायन कहते हैं, जिसके पाने में जीव का नाश न हो और जिसमें सर्वसुख की पूर्णता हो इसका साधन समता और सन्तोष है। इनसे ज्ञान उत्पन्न होता है। आत्मज्ञान-रूपी एक वृक्ष है सो उसका फूल शान्ति है और स्थिति फल है, जिस पुरुष को यह ज्ञान प्राप्त हुआ है शान्तिमान् होकर निर्लेप रहता है। उसको संसार का भावाभावरूप स्पर्श नहीं होता जैसे आकाश में सूर्य उदय होने से जगत् की क्रिया होती है और जब वह अदृश्य होता है तब जगत् की क्रिया भी लीन हो जाती है; और जैसे उस क्रिया के होने और न होने में आकाश ज्यों का त्यों है वैसे ही ज्ञानवान् सदा निर्लेप है उस आत्मज्ञान की उत्पत्ति का उपाय यह मेरा श्रेष्ठ शास्त्र है। हे रामजी ! जो पुरुष इस मोक्षोपाय शास्त्र को श्रद्धासंयुक्त पढ़े अथवा सुने तो उसी दिन से वह मोक्ष का मार्गी हो। मोक्ष के चार द्वारपाल हैं सो में तुमसे कहता हूँ। जब इनमें से एक भी अपने वश हो तब मोक्षद्वार में शीघ्र ही प्रवेश होगा। उन चारों के नाम सुनिये। हे रामजी ! शम जीव के परम विश्राम का कारण है। यह संसार जो दीखता है सो मरुस्थल की नदीवत है इसको देखकर मूर्ख अज्ञानी सुखरूप जल जानकर मृग के समान दौड़ता है। शान्ति को नहीं प्राप्त होता। जब शमरूपी मेघ की वर्षा हो तब सुखी हो। हे रामजी ! शम ही परमानन्द परमपद और शिवपद है। जिस पुरुष ने शम पाया है सो संसारसमुद्र से पार हुआ है। उसके शत्रु भी मित्र हो जाते हैं। हे रामजी ! जैसे चन्द्र उदय होता

मुमुक्षु प्रकरण । १०६

है तब अमृत की कला फूटती है और शीतलता होती है वैसे ही जिसके हृदय में शमरूपी चन्द्रमा उदय होता है उसके सब ताप मिट जाते हैं और परम शान्तिमान होता है । हे रामजी ! शम देवता के अमृत समान कोई अमृत नहीं, शम से परम शोभा की प्राप्ति होती है । जैसे पूर्णमासी के चन्द्रमा की कान्ति परम उज्ज्वल होती है वैसे ही शम को पाके जीव की उज्ज्वल कान्ति होती है । जैसे विष्णु के दो हृदय हैं-एक तो अपने शरीर में और दूसरा सन्तों में है वैसे ही जीव के भी दो हृदय होते हैं एक अपने शरीर में और दूसरा शम में । जैसा आनन्द शमवान् को होता है वैसा अमृत पीने से भी नहीं होता । हे रामजी ! कोई कोई प्राण मे प्रिय अन्तर्धान होकर फिर प्राप्त हो तो जैसा आनन्द होता है उस आनन्द से भी अधिक आनन्द शमवान् को होता है । उसके दर्शन से जैसा आनन्द होता है ऐसा आनन्द राजा, मन्त्री और सुन्दर स्त्री को भी नहीं । हे रामजी ! जिस पुरुष को शम की प्राप्ति हुई है वह वन्दना करने और पूजने योग्य है । जिसको शम की प्राप्ति हुई है उसको उद्वेग नहीं होता और अन्य लोगों से उद्वेग नहीं पाता । उसकी क्रिया और वचन अमृत की नाईं मीठे और चन्द्रमा की किरण के समान शीतल और सबको हृदयाराम है । हे रामजी ! जैसे बालक माता को पाके आनन्दित होता है वैसे ही जिसको शम की प्राप्ति हुई है उसके संग से जीव अधिक आनन्दवान् होता है । जैसे किसी का बान्धव मुवा हुआ फिर आवे और उसको आनन्द प्राप्त हो उससे भी अधिक आनन्द शमसम्पन्न पुरुष को होता है । हे रामजी ! ऐसा आनन्द चक्रवर्ती और त्रिलोकी का राज्य पाने से भी नहीं होता । जिसको शम की प्राप्ति हुई है उसके शत्रु भी मित्र हो जाते हैं; उसको सर्प और सिंह का भय नहीं रहता बल्कि किसी का भी भय नहीं रहता, वह सदा निर्भय शान्तरूप रहता है । हे रामजी ! जो कोई कष्ट प्राप्त हो और काल की अग्नि भी आ लगे तो भी वह चलायमान नहीं होता-सदा शान्तरूप रहता है । जैसे शीतल चाँदनी चन्द्रमा में स्थिर है वैसे ही जो कुछ शुभ गुण और संपदा है सब शमवान् के हृदय में आ स्थित

१२० योगवाशिष्ठ ।

होती है। हे रामजी ! जो पुरुष आध्यात्मिकादि ताप से जलता है उसके हृदय में कदाचित् शम की प्राप्ति हो तो सब ताप मिट जाते हैं। जैसे तप्त पृथ्वी वर्षा से शीतल हो जाती है वैसे ही उसका हृदय शीतल हो जाता है। जिसको शम की प्राप्ति हुई है सो सब क्रिया में आनन्दरूप है-उसको कोई दुःख नहीं स्पर्श करता। जैसे वज्र और शिला को बाण नहीं वेध सकता वैसे ही जिस पुरुष ने शमरूपी कवच पहिना है उसको आध्यात्मिकादि ताप वेध नहीं सकते-वह सर्वदा शीतलरूप रहता है। हे रामजी ! तपस्वी, पण्डित, याज्ञिक और धनाढ्य पूजा में मान करने योग्य हैं, परन्तु जिसको शम की प्राप्ति हुई है सो सबसे उत्तम और सबके पूजने योग्य है। उसके मन की वृत्ति आत्मतत्त्व को ग्रहण करती है और सब क्रिया में सोहती है। जिस पुरुष को शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध क्रिया के विषयों के इष्ट अनिष्ट में राग द्वेष नहीं होता उसको शान्तात्मा कहते हैं। हे रामजी ! जो संसार के रमणीय पदार्थ में बध्यमान नहीं होता और आत्मानन्द से पूर्ण है उसको शान्तिमान कहते हैं। उनको संसार के शुभ अशुभ का मलिनपना नहीं लगता वह तो सदा निर्लेप रहता है जैसे आकाश सब पदार्थों से निर्लेप है। वैसे ही शान्तिमान् सदा निर्लेप रहता है। हे रामजी ! ऐसा पुरुष इष्ट विषय की प्राप्ति में हर्षवान् नहीं होता और अनिष्ट की प्राप्ति में शोकवान नहीं होता। वह अन्तःकरण से सदा शान्त रहता है और उसको कोई दुःख स्पर्श नहीं करता; वह अपने आपमें सदा परमानन्दरूप रहता है। जैसे सूर्य के उदय होते ही अन्धकार नष्ट हो जाता है वैसे ही शान्ति के पाने से सब दुःख नष्ट होकर सदा निर्विकार रहता है। हे रामजी ! वह पुरुष सब चेष्टा करते दृष्टि आता है परन्तु सदा निर्गुणरूप है, कोई क्रिया उसको स्पर्श नहीं करती। जैसे जल में कमल निर्लेप रहता है वैसे ही शान्तिमान् सदा निर्लेप रहता है। हे रामजी ! जो पुरुष बड़ी राज्य-सम्पदा और बड़ी आपदा को पाकर ज्यों का त्यों अलग रहता है उसे शान्तिमान कहिये। हे रामजी ! जो पुरुष शान्ति से रहित है उसका चित्त क्षण-क्षण राग-द्वेष से तपता है और जिसको शान्ति की

मुमुक्षु प्रकरण । १११

प्राप्ति हुई है सो भीतर बाहर शीतल और सदा एक रस है । जैसे हिमा- लय सदा शीतल रहता है वैसे ही वह सदा शीतल रहता है । उसके मुख की कान्ति बहुत सुन्दर हो जाती है । जैसे निष्कलङ्क चन्द्रमा है वैसे ही शान्तिमान् निष्कलङ्क रहता है । हे रामजी ! जिसको शान्ति प्राप्त हुई है सो परम आनन्दित हुआ है और उसी को परम लाभ प्राप्त होता है ज्ञानी इसी को परमपद कहते हैं । जिसको पुरुषार्थ करना है उसको शान्ति की प्राप्ति करनी चाहिए । हे रामजी ! जैसे मैंने कहा है उस क्रम से शान्ति का ग्रहण करो तब संसार समुद्र के पार पहुँचोगे । इति श्रीयोगवाशिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे शमनिरूपणन्नाम त्रयोदशस्सर्गः ॥ १३ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! अब विचार का निरूपण सुनिये । जब हृदय शुद्ध होता है तब विचार होता है और शास्त्रार्थ के विचार द्वारा बुद्धि तीक्ष्ण होती है । हे रामजी ! अज्ञानवन में आपदारूपी बेलि की उत्पत्ति होती है उसको विचाररूपी खड्ग से जब काटोगे तब शान्त- आत्मा होगे । मोहरूपी हस्ती जीव के हृदयकमल का खण्ड-खण्ड कर डालता है—अभिप्राय यह है कि इष्ट अनिष्ट पदार्थ में राग द्वेष से वेदा जाता है । जब विचाररूपी सिंह प्रकटे तब मोहरूपी हस्ती का नाश कर शान्तात्मा होगे । हे रामजी ! जिसको कुछ सिद्धता प्राप्त हुई है उसे विचार और पुरुषार्थ से ही हुई है । जब प्रथम राजा विचारकर पुरुषार्थ करता है तब उसी से राज्य को प्राप्त होता है । प्रथम बल, दूसरे बुद्धि, तीसरे तेज, चतुर्थ पदार्थ आगमन और पञ्चम पदार्थ की प्राप्ति इन पाँचों की प्राप्ति विचार से होती है अर्थात् इन्द्रियों का जीतना, बुद्धि आत्मव्यापिनी और तेज, पदार्थ का आगमन इनकी प्राप्ति विचार में होती है । हे रामजी ! जिस पुरुष ने विचार का आश्रय लिया है वह विचार की दृढ़ता से जिसकी वाञ्छा करता है उसको पाता है । इसमें विचार इसका परम मित्र है । विचारवान् पुरुष आपदा में नहीं फँसता । जैसे तुम्बी जल में नहीं डूबती वैसे ही वह आपदा में नहीं डूबता । हे रामजी ! वह जो कुछ करता है विचार संयुक्त करता है और विचार संयुक्त ही देता लेता है । उसकी सब क्रिया सिद्धता का कारण होती है और

११२ योगवाशिष्ठ ।

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष विचार की दृढ़ता से ही सिद्ध होते हैं। विचार-रूपी कल्पवृक्ष में जिसका अभ्यास होता है सोई पदार्थों की सिद्धि को पाता है। हे रामजी! शुद्ध ब्रह्म का विचार ग्रहण करके आत्मज्ञान को प्राप्त हो जाओ। जैसे दीपक से पदार्थ का ज्ञान होता है वैसे ही पुरुष विचार से सत्य असत्य को जानता है। जो असत्य को त्यागकर सत्य की ओर यत्न करता है उसी को विचारवान् कहते हैं। हे रामजी! संसाररूपी समुद्र में आपदा की तरंगें उठती हैं। विचारवान् पुरुष उनके भाव अभाव में कष्टवान् नहीं होता। जो कुछ क्रिया विचार संयुक्त होती है उसका परिणाम सुख है और जो विचार बिना चेष्टा होती है उससे दुःख प्राप्त होता है। हे रामजी! अविचाररूप कण्टक के वृक्ष में दुःख के बड़े कण्टक उत्पन्न होते हैं। अविचाररूपी रात्रि में तृष्णारूपी पिशाचिनी विचरती है और जब विचाररूपी सूर्य उदय होता है तब अविचाररूपी रात्रि और तृष्णारूपी पिशाचिनी नष्ट हो जाती है। हे रामजी! हमारा यही आशीर्वाद है कि तुम्हारे हृदय से अविचाररूपी रात्रि नष्ट हो जाय। विचाररूपी सूर्य से अविचारित संसार दुःख का नाश होता है। जैसे बालक अविचार से अपनी परछाहीं को वैताल कल्प के भय पाता है और विचार करने से भय नष्ट होता जाता है वैसे ही अविचार से संसार दुःख देता है और सत्शास्त्र द्वारा युक्तिकर विचार करने से संसार का भय नष्ट हो जाता है। हे रामजी! जहाँ विचार है वहाँ दुःख नहीं है। जैसे जहाँ प्रकाश है वहाँ अन्धकार नहीं होता और जहाँ प्रकाश नहीं वहाँ अन्धकार रहता है वैसे ही जहाँ विचार है वहाँ संसारभय नहीं है और जहाँ विचार नहीं वहाँ संसारभय रहता है। जहाँ आत्म विचार उत्पन्न होता है वहाँ सुख देनेवाले शुभगुण स्थित होते हैं। जैसे मणिसरोवर में कमल की उत्पत्ति होती है वैसे विचार में शुभ गुणों की उत्पत्ति होती है। जहाँ विचार नहीं है वहाँ ही दुःख का आगमन होता है। हे रामजी! जो कुछ अविचार से क्रिया करते हैं सो दुःख का कारण होती है। जैसे चूहा बिल को खोद के मृत्तिका निकालता है वह जहाँ इकट्ठी होती है वहाँ वेलि की उत्पत्ति होती वैसे ही अविचार में जो मृतिकारूपी पाप क्रिया को इकट्ठी

मुमुक्षु प्रकरण । ११३

करता है और उससे आपदारूपी बेलि उत्पन्न होती है। अविचाररूपी घुन के खाये सूखे वृक्ष में सुखरूपी फल नहीं निकलते । अविचार उसका नाम है जिसमें शुभ और शास्त्रानुसार किया न हो। हे रामजी ! विवेक-रूपी राजा है और विचाररूपी उसकी ध्वजा है जहाँ विवेकरूपी राजा आता है वहाँ विचाररूपी ध्वजा भी उसके साथ फिरती है और जहाँ विचार रूपी ध्वजा आती है वहाँ विवेकरूपी राजा भी आता है। जो पुरुष विचार से सम्पन्न है सो पूजने योग्य है। जैसे द्वितीया के चन्द्रमा को सब नमस्कार करते हैं वैसे ही विचारवान् को सब नमस्कार करते हैं। हे रामजी ! हमारे देखते देखते अल्पबुद्धि भी विचार की दृढ़ता से मोक्षपद को प्राप्त हुए हैं। इसमें विचार सब का परममित्र है। जैसे हिमालय पर्वत भीतर बाहर से शीतल रहता है वैसे ही वह भी शीतल रहता है। देखो, विचार से जीव ऐसे पद को प्राप्त होता है जो नित्य, स्वच्छ, अनन्त और परमानन्दरूप है। उसको पाकर फिर उसके त्याग की इच्छा नहीं होती और न और ग्रहण की ही इच्छा होती है। उसको इष्ट अनिष्ट सब समान हैं। जैसे तरङ्ग के होने और लीन होने में समुद्र समान रहता है वैसे ही विवेकी पुरुष को इष्ट अनिष्ट में समता रहती है और संभ्रम मिट जाता है। आधाराधेय से रहित केवल अद्वैत तत्त्व उसको प्राप्त होता है। हे रामजी ! यह जगत् अपने मन के मोह से उपजता है और अविचार से दुःखदायी दीखता है। जैसे अविचार से बालक को वैताल भासता है वैसे ही इसको जगत् भासता है। जब ब्रह्मविचार की प्राप्ति हो तब जगत् का भ्रम नष्ट हो जावे। हे रामजी ! जिसके हृदय में विचार होता है उसको समता की उत्पत्ति होती है जैसे बीज से अंकुर निकल आता है वैसे ही विचार से समता हो आती है और विचारवान् पुरुष जिसकी ओर देखता है उस ओर आनन्द दृष्टि आता है, दुःख नहीं भासता । जैसे सूर्य को अन्धकार नहीं दृष्टि आता वैसे ही विचारवान् को दुःख नहीं दृष्टि आता। जहाँ अविचार है वहाँ दुःख है, जहाँ विचार है वहाँ सुख है। जैसे अन्धकार के अभाव से वैताल के भय का अभाव हो जाता है वैसे ही विचार से दुःख का अभाव हो जाता है। हे

११४योगवाशिष्ठ ।

रामजी ! संसाररूपी दीर्घरोग के नष्ट करने को विचार बड़ी औषधि है जैसी पूर्णमासी के चन्द्रमा की उज्ज्वल कान्ति होती है वैसे ही विचारवान् के मुख की उज्ज्वल कान्ति होती है । हे रामजी ! विचार से ही परम पद की प्राप्ति होती है । जिससे अर्थ सिद्ध हो उसका नाम विचार है और जिससे अनर्थ सिद्ध हो उसका नाम अविचार है । जो अविचाररूपी मदिरा पान करता है वह उन्मत्त हो जाता है । उससे शुभ विचार कोई नहीं होता और शास्त्र के अनुसार क्रिया भी उससे नहीं होती । हे रामजी ! इच्छारूपी रोग विचाररूपी औषधि से निवृत्त होता है । जिस पुरुष ने विचार द्वारा परमार्थसत्ता का आश्रय लिया है सो परम शान्त हो जाता है और हेयोपादेयबुद्धि उसकी नहीं रहती वह सब दृश्य को साक्षीभूत होकर देखता है और संसार के भाव अभाव में ज्यों का त्यों रहता है । वह उदय अस्त से रहित निसंगरूप है । जैसे समुद्र जल से पूर्ण है वैसे ही विचारवान् आत्मतत्त्व में पूर्ण है । जैसे अन्धकूप में पड़ा हुआ हाथ के बल से निकलता है वैसे ही संसार रूपी अन्धकूप में गिरा हुआ विचार के आश्रय होकर विचारवान् हो निकलने को समर्थ होता है । हे रामजी ! राजा को जो कोई कष्ट प्राप्त होता है तो वह विचार करके यत्न करता है तब कष्ट निवृत्त हो जाता है । इससे तुम विचार कर देखो कि जो किसी को कष्ट प्राप्त होता है सो विचार से ही मिटता है । तुम भी विचार का आश्रय करके सिद्धि को प्राप्त हो । वह विचार इस प्रकार प्राप्त होता है कि वेद और वेदान्त के सिद्धान्त को श्रवण कर पाठ करे और भले प्रकार विचारे तब विचार की दृढ़ता से आत्मतत्त्व को प्राप्त होगा । जैसे प्रकाश से पदार्थ का ज्ञान होता है वैसे ही गुरु और शास्त्र के वचनों से तत्त्वज्ञान होता है । जैसे प्रकाश में अन्धे को पदार्थ की प्राप्ति नहीं होती वैसे ही गुरु, शास्त्र और विचार से जो शून्य हो उसको आत्मपद की प्राप्ति नहीं होती । हे रामजी ! जो विचाररूपी नेत्र से सम्पन्न हैं सोई देखते हैं और जो विचार-रूपी नेत्र से रहित हैं वे अन्धे हैं । हे रामजी ! ऐसा विचार करे कि "मैं कौन हूँ ?" "यह जगत् क्या है ?" "इसकी उत्पत्ति कैसे हुई"

मुमुक्षु प्रकरण । ११५

और "लीन कैसे होता है?" इस प्रकार सन्तों और शास्त्रों के अनुसार विचार करके सत्य को सत्य और असत्य को असत्य जान जिसको असत्य जाने उसका त्याग करे और सत्य में स्थित हो। इसी का नाम विचार है। इस विचार से आत्मपद की प्राप्ति होती है। हे रामजी! विचाररूपी दिव्यदृष्टि जिसको प्राप्त हुई है उसको सब पदार्थों का ज्ञान होता है और विचार से ही आत्मपद की प्राप्ति होती है, जिसके पाने से परिपूर्ण हो जाता है और फिर शुभ अशुभ संसार में चलायमान नहीं होता—ज्यों का त्यों रहता है। जब तक प्रारब्ध का वेग होता है तब तक शरीर की चेष्टा होती है और जब तक अपनी इच्छा होती है, तब तक शरीर की चेष्टा करता है, फिर शरीर को त्याग कर केवल शुद्धरूप हो जाता है। इससे हे रामजी! ब्रह्मविचार का आश्रय करके संसारसमुद्र को तर जाओ। इतना रुदन रोगी और कष्टवान् पुरुष भी नहीं करता जितना विचार-रहित पुरुष करता है। हे रामजी! जो पुरुष विचार से शून्य है उसको सब आपदाएँ आ प्राप्त होती हैं जैसे सब नदी स्वभाव से ही समुद्र में प्रवेश करती हैं वैसे अविचार से सब आपदायें प्रवेश करती हैं। हे रामजी! कीच का कीड़, गढ़े का कण्टक और अंधेरे बिल में सर्प होना भला है परन्तु विचार से रहित होना तुच्छ है। जो पुरुष विचार से रहित होकर भोग में दौड़ता है वह श्वान है। हे रामजी! विचार से रहित पुरुष बड़ा कष्ट पाता है। इससे एकक्षण भी विचार रहित नहीं रहना। विचार से दृढ़ होकर निर्भय रहना। "मैं कौन हूँ" और "दृश्य क्या है?" ऐसा विचार करके और सत्यरूप आत्मा को जानकर दृश्य का त्याग करना। हे रामजी! जो पुरुष विचारवान् है सो संसार के भोग में नहीं गिरता, सत्य में ही स्थित होता है। जब विचार स्थित होता है तब तत्त्वज्ञान होता है और जब तत्त्वज्ञान में विश्राम होता है तब विश्राम में चित्त का उपशम होकर दुःख नष्ट होता है।

इति श्रीयोगवासिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणेविचारनिरूपणन्नामचतुर्दशस्सर्गः ॥१४॥

वशिष्ठजी बोले, हे अविचार शत्रु के नाशकर्ता, रामजी! जिस पुरुष को सन्तोष प्राप्त हुआ वह परमानन्दित होकर त्रिलोकी के ऐश्वर्य को

११६योगवाशिष्ठ ।

तृण की नांईं तुच्छ जानता है । हे रामजी ! जो आनन्द अमृत के पान में और त्रिलोक के राज्य में नहीं होता वह आनन्द मन्तोषवान् को होता है । हे रामजी ! इच्छारूपी रात्रि हृदयरूपी कमल को सकुचा देती है; जब सन्तोषरूपी सूर्य उदय होता है तब इच्छारूपी रात्रि का अभाव हो जाता है । जैसे क्षीरसमुद्र उज्जवलता से शोभायमान है वैसे ही मन्तोषवान् की कान्ति सुशोभित होती है । हे रामजी ! त्रिलोकी के राजा की भी इच्छा निवृत्त न हुई तो वह दरिद्री है और जो निर्धन सन्तोषवान् है सो सब का ईश्वर है । सन्तोष उसी का नाम है जो अप्राप्त वस्तु की इच्छा न करे और प्राप्त भी हो तो इष्ट अनिष्ट में राग-द्वेष न करे । सन्तोषवान् सदा आनन्दपुरुष है और आत्मस्थिति में तृप्त हुआ है उसको और इच्छा कुछ नहीं । सन्तोष से उसका हृदय प्रफुल्लित हुआ है । जैसे सूर्य के उदय होने से सूर्यमुखी कमल प्रफुल्लित होता है वैसे ही सन्तोषवान् प्रफुल्लित हो जाता है । जो अप्राप्त वस्तु की इच्छा नहीं करता और जो अनिच्छित प्राप्त हुई को यथाशास्त्र क्रम से ग्रहण करता है उसका नाम सन्तोषवान् है जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा अमृत से पूर्ण होता है वैसे ही सन्तोषवान् का हृदय संतोष से पूर्ण होता है जो सन्तोष से रहित है उसके हृदयरूपी बन में सदा दुःख और चिन्तारूपी फूल फल उत्पन्न होते हैं । हे रामजी ! जिसका चित्त सन्तोष से रहित है उसको नाना प्रकार की इच्छा समुद्र की नाना प्रकार की तरंगों के समान उप-जती हैं । सन्तुष्टात्मा परम आनन्दित है । उसका जगत के पदार्थों में हेयोपादेय बुद्धि नहीं होती । हे रामजी ! जैसा आनन्द सन्तोषवान् को होता है वैसा आनन्द अष्टसिद्धि के ऐश्वर्य और अमृत पान करने से भी नहीं होता । सन्तोषवान सदा शान्त रूप और निर्मल रहता है । इच्छारूपी धूल सर्वदा उड़ती रहती है सो सन्तोषरूपी वर्षा से शान्त हो जाती है, इस कारण सन्तोषवान निर्मल है । हे रामजी ! जैसे आम का परिपक्व फल सुन्दर होता है और सबको प्यारा लगता है वैसे ही सन्तोषवान पुरुष सबको प्यारा लगता है और स्तुति करने के योग्य है । जिस पुरुष को संतोष प्राप्त हुआ है उसको परम लाभ हुआ है । हे रामजी ! जहाँ संतोष है

मुमुक्षु प्रकरण । ११७

वहाँ इच्छा नहीं रहती और सन्तोषवान् भोगों से दीन नहीं होता । वह उदारात्मा सर्वदा आनन्द से तृप्त रहता है । जैसे मेघ पवन के आने से नष्ट हो जाता है वैसे ही सन्तोष के आने से इच्छा नष्ट हो जाती है । जो सन्तोषवान् पुरुष है उसको देवता और ऋषीश्वर सब नमस्कार करते और धन्य धन्य कहते हैं । हे रामजी ! जब सन्तोष करोगे तब परम शोभा पावोगे ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे मुमुक्षु प्रकरणे सन्तोषनिरूपणन्नाम पञ्चदशस्सर्गः ॥ १५ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जितने दान और तीर्थादिक साधन हैं उनसे आत्मपद की प्राप्ति नहीं होती. आत्मपद की प्राप्ति साधुसङ्ग से ही होती है । साधुसङ्गरूपी एक वृक्ष है और उसका फल आत्मज्ञान है । जिस पुरुष ने फल की इच्छा की है सो अनुभवरूपी फल को पाता है । जो पुरुष आत्मानन्द से रहित है सो सत्सङ्ग करके आत्मानन्द से पूर्ण होता है जो अज्ञान से मृत्यु पाता है सो सन्त के सङ्ग से ज्ञान पाकर अमर होता है और जो आपदा से दुःखी है सो सन्त के सङ्ग सम्पदा पाता है । आपदारूपी कमल का नाश करनेवाली सत्सङ्गरूपी वरफ की वर्षा है । सत्सङ्ग से ही आत्मबुद्धि प्राप्त होती है जिससे मृत्यु नहीं होती और सब दुःखों से छूटकर परमानन्द को प्राप्त होता है । हे रामजी ! सन्त की संगति से हृदय में ज्ञानरूपी दीपक जलता है जिससे अज्ञान-रूपी तम नष्ट हो जाता है और बड़े बड़े ऐश्वर्य की प्राप्त होता है । फिर उसे किसी भोग्य पदार्थ की इच्छा नहीं रहती और बोधवान् होके सबसे उत्तम पद में विराजता है जैसे कल्पवृक्ष के निकट जाने से वाञ्छित फल की प्राप्ति होती है वैसे ही संसारसमुद्र के पार उतारनेवाले सन्तजन हैं । जैसे धीवर नौका से पार लगाता है वैसे ही सन्तजन युक्ति से संसारसमुद्र से पार करते हैं । हे रामजी ! मोहरूपी मेघ का नाश करनेवाला सन्त का सङ्ग पवन है । जिसको अनात्म देहादिक में स्नेह नष्ट हुआ है और शुद्ध आत्मा में जिसकी स्थिति है वह उसमें तृप्त हुआ है । फिर संसार के इष्ट अनिष्ट में उसकी बुद्धि चलायमान नहीं होती, वह सदा समताभाव में स्थित रहता है । सन्तजन संसारसमुद्र के पार उतारने में पुल के समान

११८ | योगवाशिष्ठ ।

है और आपदारूपी बेलि को जड़ समेत नष्ट करनेवाले हैं। हे रामजी ! सन्तजन प्रकाशरूप हैं, उनके सङ्ग से पदार्थों की प्राप्ति होती है। जो अपने पुरुषार्थरूपी नेत्र से हीन है उनको पदार्थ की प्राप्ति नहीं होती। जिस पुरुष ने सत्सङ्ग का त्याग किया है वह नरकरूपी अग्नि में लकड़ी की नाईं जरेगा और जिस पुरुष ने सत्सङ्ग किया है उसको नरक की अग्नि का नाश करनेवाला सत्सङ्गरूपी मेघ है। हे रामजी ! जिसने सत्सङ्गरूपी गङ्गा का स्नान किया है उसको फिर तप दान आदिक साधनों से प्रयोजन नहीं रहता। वह सत्सङ्ग से ही परम गति को प्राप्त होगा इससे और सब उपायों को त्यागकर सत्सङ्ग को ही खोजना चाहिये। जैसे निर्धन मनुष्य चिन्तामणि आदिक धन को खोजता है वैसे ही मुमुक्षु सत्सङ्ग को खोजता है। जो आध्यात्मिकादि तीनों तापों से जलता है उसको शीतल करनेवाला सत्सङ्ग ही है जैसे तपी हुई पृथ्वी मेघ से शीतल होती है वैसे ही हृदय सत्सङ्ग से शीतल होता है। हे रामजी ! मोहरूपी वृक्ष का नाश करनेवाला सत्सङ्गरूपी कुल्हाड़ा है। सत्सङ्ग से ही मनुष्य अविनाशी पद को प्राप्त होता है। जिस पद के पाने से और कुछ पाने की इच्छा नहीं रहती। इसमें सबसे उत्तम सत्सङ्ग ही है। जैसे सब अप्सराओं में लक्ष्मी उत्तम हैं, वैसे ही सत्सङ्गकर्ता सबसे उत्तम है। इससे अपने कल्याण के निमित्त सत्सङ्ग करना ही तुमको योग्य है। हे रामजी ! ये जो चारों मोक्ष के द्वारपाल हैं उनका वृत्तान्त तुमसे कहा। जिस पुरुष ने इनके साथ प्रीति की है, वह शीघ्र आत्मपद को प्राप्त होगा और जो इनकी सेवा नहीं करते सो मोक्ष को न प्राप्त होंगे। हे रामजी ! इन चारों में से एक भी जहाँ आता है, वहाँ तीनों और भी आ जाते हैं। जैसे जहाँ समुद्र रहता है वहाँ सब नदी आ जाती हैं वैसे ही जहाँ शम आता है वहाँ सन्तोष, विचार और सत्सङ्ग ये तीनों भी आ जाते हैं और जहाँ साधुसङ्गम होता है वहाँ सन्तोष, विचार और शम ये तीनों आ जाते हैं। जहाँ कल्पवृक्ष रहता है वहाँ सब पदार्थ स्थित होते हैं। जैसे पूर्णमासी के चन्द्रमा में गुण कला सब इकट्ठी हो जाती हैं वैसे ही जहाँ सन्तोष आता है वहाँ और तीनों भी आते हैं और जहाँ तक विचार

मुमुक्षु प्रकरण । १२६

आता है वहाँ सन्तोष, उपशम और सत्संग भी आ रहते हैं। जैसे श्रेष्ठ मन्त्री से राज्य लक्ष्मी आ स्थित होती है वैसे ही जहाँ विचार होता है वहाँ और भी तीनों आते हैं। इससे हे रामजी! जहाँ ये चारों इकट्ठे होते हैं उसे परम श्रेष्ठ जानना। हे रामजी! यदि ये चारों न हों तो एक का तो अवश्य आश्रय करना। जब एक आवेगा तब चारों आ स्थित होंगे। मोक्ष की प्राप्ति के ये चार परम साधन हैं और किसी उपाय से मुक्ति न होगी। श्लोक—"सन्तोषः परमो लाभः सत्सङ्गः परम धनम् । विचारः परमं ज्ञानं शमं च परमं सुखम् ॥" हे रामजी! ये परम कल्याणकर्ता हैं। जो इन चारों से सम्पन्न है उसकी ब्रह्मादिक स्तुति करते हैं। इससे दन्त को दन्त लगा इनका आश्रय करके मन को वश करे। हे रामजी! मनरूपी हस्ती विचाररूपी अंकुश से वश होता है। मनरूपी बन में वासनारूपी नदी चलती है उसके शुभ अशुभ दो किनारे हैं। पुरुषार्थ करना यह है कि अशुभ की ओर से मन को रोक के शुभ की ओर चलाना। जब अन्तर्मुख आत्मा के सम्मुख वृत्ति का प्रवाह होगा तब तुम परमपद को प्राप्त होगे। हे रामजी! प्रथम तो पुरुषार्थ करना यही है कि अविचाररूपी ऊँचाई को दूर करे। जब अविचाररूपी बेंट दूर होगा तब आप ही प्रवाह चलेगा। हे रामजी! दृश्य की ओर जो प्रवाह चलता है सो बन्धन का कारण है। जब आत्मा की ओर अन्तर्मुख प्रवाह हो तब मोक्ष का कारण हो जाय। आगे जो तुम्हारी इच्छा हो सो करो।

इति श्रीयोगवासिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे साधुसङ्गनिरूपणन्नाम षोडशस्सर्गः ॥ १६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! ये मेरे वचन परम पावन हैं। विचारवान् शुद्ध अधिकारी को ये परम बोध के कारण हैं। शुद्ध पात्र पुरुष इन वचनों को पाके सोहते हैं और वचन भी उनको पाके शोभा पाते हैं। जैसे शरद काल में मेघ के अभाव में चन्द्रमा और आकाश शोभा देते हैं वैसे ही शुद्धपात्र में ये वचन शोभते हैं और जिज्ञासु निर्मल वचनों की महिमा सुनके प्रसन्न होता है। हे रामजी! तुम परम पात्र हो और मेरे वचन अति उत्तम हैं। यह महारामायण मोक्षोपायक शास्त्र आत्म-

१२०योगवाशिष्ठ ।

बोध का परम कारण है। इसमें परम पावन वाक्य की सिद्धता और युक्तार्थवाक्य है और नाना प्रकार के दृष्टान्त कहे है। जिसके बहुत जन्म के पुण्य इकट्ठे होते है उसको कल्पवृक्ष मिलता है और फल से झुक पड़ता है तब उसको यह शास्त्र श्रवण होता है। नीच को इसका श्रवण प्राप्त नहीं होता और न उसकी वृत्ति इसके श्रवण में आती है। जैसे धर्मात्मा राजा की इच्छा न्यायशास्त्र के सुनने में होती है और पापात्मा की नहीं होती वैसे ही पुण्यवान की इच्छा इसके सुनने में होती है और अधर्मी को इच्छा नहीं होती। जो कोई इस मोक्षोपायक रामायण का आदि से अन्त पर्यन्त अध्ययन करेगा अथवा निष्काम सन्त के मुख से श्रद्धायुक्त सुनकर एकाग्र भाव होकर विचारेगा उसका संसारभ्रम निवृत्त हो जावेगा। जैसे रस्सी के जानने से सर्प का भ्रम दूर हो जाता है वैसे ही अद्वैतात्मा तत्त्व के जानने से उसका संसारभ्रम नष्ट हो जावेगा। इस मोक्षोपायक शास्त्र के बत्तीस सहस्र श्लोक और षट्प्रकरण हैं। पहिला वैराग्य प्रकरण वैराग्य का परम कारण है। हे रामजी ! जैसे मरुस्थल में वृक्ष नहीं होता और कदाचित् बड़ी वर्षा हो तो वहाँ भी वृक्ष होता है वैसे ही अज्ञानी का हृदय मरुस्थल की नाईं है उसमें वैराग्य वृक्ष नहीं होता, पर जो इस शास्त्र की बड़ी वर्षा हो तो वैराग्य वृक्ष उसमें उत्पन्न होता है। इस वैराग्य प्रकरण के एक सहस्र पाँच सौ श्लोक हैं। इसके अनन्तर मुमुक्षु व्यवहार प्रकरण है, उसके परम निर्मल वचन हैं। जैसे मलीन मणि मार्जन करने से उज्ज्वल हो जाती है वैसे ही इन वचनों से मुमुक्षु का हृदय निर्मल होता है और विचार के बल से आत्मपद पाने को समर्थ होता है। इसके एक सहस्र श्लोक हैं। इसके अनन्तर उत्पत्ति प्रकरण के पाँच सहस्र श्लोक हैं। उसमें बड़ी सुन्दर कथा दृष्टान्तों सहित कही हैं जिनके विचार से जगत् की उत्पत्ति का भाव मन से चला जाता है—अर्थात् इस जगत् का अत्यन्त अभाव जान पड़ता है। हे रामजी ! इस जगत् में जो मनुष्य, देवता, दैत्य, पर्वत, नदी आदि और स्वर्गलोक, पृथ्वी, अप, तेज, वायु, आकाश आदि स्थावर जंगम अज्ञान से भासते हैं इनकी उत्पत्ति