योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
DevanagariHindipublished485 पृष्ठ
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३९० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः १अतस्तदतिक्रमे महदनिष्टं स्यादित्याह— २अन्यायेन तु यो दद्यात् स परेतो भविष्यति । अतस्त्वदाज्ञाविधिमुल्लङ्घ्य चुम्बकादिभ्यो य एतज्ज्ञानं दद्यात् स परेतो भविष्यति ॥ एतत्परिज्ञानफलमाह— संकेतं यो३ विजानाति योगिनीनां भवेत् प्रियः ॥२०३॥ एतत् संकेतत्रयम् । गुरुमुखादेव यो४ विजानाति, स योगिनीनाम्, योगः परम- शिवसमवायः, तद्गत्यः परमचिन्मरीचिभूताः शक्तयस्तासाम्, प्रियः परमशिव , तस्यानन्त५शक्तिमत्त्वात् । तदुक्तं तन्त्रान्तरे—' शक्तयोऽस्य जगत्सर्वं शक्तिमांस्तु
भाव यह है कि यद्यपि मैं इस सारे जगत् का स्वामी हूँ और समस्त शास्त्रों का उपदेश भी मैं ही करता हूँ, तो भी मुझ शिव की इच्छाशक्तिरूपिणी विवक्षा रूप अनाश्रित कला से अनुमति प्राप्त करके ही मैंने इस ज्ञान का उपदेश किया है । इस तरह से तुम्हारी आज्ञा ही यहाँ १विधिवाक्य है । इस लिये उस विधिवाक्य को न मानने पर बहुत अनिष्ट हो सकता है, यही बात अब कही जा रही है— जो व्यक्ति अन्यायपूर्वक इस ज्ञान का उपदेश करेगा, उसकी मृत्यु हो जायगी ॥ इसलिये तुम्हारी आज्ञा का, आदेशात्मक विधिवाक्य का उल्लंघन कर चुम्बक प्रभृति को जो व्यक्ति इस ज्ञान का उपदेश करेगा, वह अवश्य ही मर जायेगा ॥ अब इस ज्ञान को जानने का फल बताते हैं— जो व्यक्ति संकेतों को जानता है, वह योगिनियों का प्रिय बन जाता है ॥२०३॥ यहाँ उपदिष्ट तीनों संकेतों को जो व्यक्ति गुरुमुख से जान लेता है, वह साधक योगिनियों का प्रिय बन जाता है । परमशिव के साथ समवाय, अर्थात् अविनाभाव संबन्ध को योग कहते हैं । शिव के साथ नित्य समवाय संबन्ध से रहने वाली परम चितिशक्ति
१. 'अत····दित्याह' नास्ति—ख. ने. ज. उ. । २. अज्ञानेन—क. ग., नास्त्येषा पङ्क्तिः—ख. च. छ. । ३. योऽभि—ख. ने. च. छ. ज. झ. । ४. योऽभि—ख. ज. झ. उ । ५. शक्तिमत्वात्—ख. ने. ज. झ. उ. । १. वैदिक वाङ्मय और मीमांसाशास्त्र में विधि और निषेध वाक्यों को प्रवृत्ति और निवृत्ति का कारण माना गया है । लिङ् लकार और तव्य आदि प्रत्ययों से विधिवाक्य का बोध होता है । प्रस्तुत स्थल में विधि शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में हुआ है ।