योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३९१ महेश्वरः" इति । ¹परमशिव एव भवेदित्यर्थः ॥२०३॥ ²ननु परमशिवतादात्म्ये³ कः पुरुषार्थ इत्यत आह— सर्वेप्सितफलावाप्तिः सर्वकामफलाश्रयः । यतः सर्वेषां जनानां ⁴काम्यानां काम्यमानानां फलानामाश्रयः परमशिवः, अतः ⁵सर्वेप्सितफलावाप्तिः सर्वेषां यानीप्सितानि स्पृहणीयानि फलानि, तेषां प्राप्तिः परमशिव⁶तादात्म्यपरिज्ञानाद् भवति । स एव परमपुरुषार्थ इत्यर्थः ॥ की किरणात्मक शक्तियाँ योगिनियाँ हैं। इन योगिनियों का प्रिय बन जाता है, साक्षात् शिव हो जाता है, क्योंकि वह परमशिव अनन्त शक्तियों से संपन्न है। जैसा कि ¹तन्त्रा- न्तर में बताया गया है—"यह सारा जगत् इसकी शक्तियाँ हैं, शक्तिमान् अकेला शिव है"। इस तरह से इन तीनों संकेतों को गुरुमुख से जान लेने वाला साधक साक्षात् परमशिव हो जाता है ॥२०३॥ प्रश्न उठता है कि परमशिव बन जाने से साधक को क्या मिलेगा ? इसका उत्तर देते हैं— परमशिव सभी कामनाओं के फल को देने वाला है, अतः ऐसे साधक की सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥ चूँकि सभी मनुष्यों की कामनाओं का, अभिलषित फलों का आश्रय परमशिव है, वही मनुष्यों की सारी कामनाओं को पूरा करने वाला है, अतः सभी मनुष्यों के इच्छित फल की प्राप्ति परमशिव के साथ अपने तादात्म्य को समझ लेने से हो जाती है। इसका अभिप्राय यह है कि परमशिव के साथ तादात्म्य बोध ही सब से बड़ा पुरुषार्थ है। इसके प्राप्त हो जाने पर मनुष्य की सारी इच्छाएँ अपने आप पूरी हो जाती हैं। १. 'परम''''दित्यर्थः' नास्ति-ख. ज. झ. ड. । २. 'ननु''''आह' नास्ति-ख. ज. ड. । ३. त्म्यवपुषा पुरुषार्थः किमित्यत-क. ग. । ४. 'काम्यानां' नास्ति-क. ड. । ५. 'सर्वेप्सितफलावाप्तिः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. ड. । ६. 'तादात्म्य' नास्ति-क.।
- शिवसूत्रविमर्शिनी आदि ग्रन्थों में सर्वमङ्गला शास्त्र के नाम से यह वचन उद्धृत है और स्पन्दप्रदीपिकाकार ने इसको रहस्यशास्त्र का वचन माना जाता है। देखिये— लुप्तागमसंग्रह, प्रथम भाग, पृ० ११६ तथा पृ० १४६-१४७ । रहस्यशास्त्र तन्त्रशास्त्र की ही विशेष शाखा का नाम है। यह किसी ग्रन्थ विशेष का नाम नहीं है । परमार्थसार- विवृति (पृ० १०), स्पन्दकारिका रामकण्ठविवृति (पृ० ९) तथा नेत्रतन्त्रोद्योत (२१।३१) में भी सर्वमङ्गला अथवा पारमेश्वर वचन के रूप में इसको स्मरण किया गया है।