योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३९२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः ननु स कुत्र दृश्यते ? इत्यत आह— यतोऽपि दृश्यते देवि ! यतोऽपि¹ यत्र क्वापि बहिरन्तर्वा मनः प्रसरति, तत्र तदनुभवरूपेण स एव दृश्यते, तस्य सर्वगतत्वात् । तदुक्तं विज्ञानभैरवभट्टारकैः— यत्र यत्र मनो याति बाह्ये ²वाऽभ्यन्तरे प्रिये । तत्र तत्र शिवावस्था व्यापकत्वात् क्व यास्यति ॥ (श्लो० ११३) इति, ³तत्र तत्राक्षमार्गेण चैतन्यं व्यज्यते प्रभोः ॥ (श्लो० ११४) इति च । ननु किं⁴ सर्वेषामपि तथा दृश्यते ? इत्यत आह— ⁵कथं विद्वान्न चिन्तयेत् ॥२०४॥ सत्यं दृश्यते, तथापि न पश्यन्ति, “न मां पश्यति कश्चन” इत्युपनिषदुक्त- रीत्या, पुनः प्रश्न होता है कि वह हमें कहाँ दिखाई पड़ता है ? शिव इसका उत्तर देते हैं— हे देवि ! उसका दर्शन तो जहाँ कहीं भी हो सकता है ॥ जहाँ कहीं भी बाहर या भीतर मन का प्रसार होता है, वहाँ उस अनुभव के रूप में वह परमशिव ही दिखाई पड़ता है, क्योंकि वह सर्वगत है, सर्वत्र विद्यमान है । विज्ञान- भैरव भट्टारक ने कहा है— हे प्रिये ! बाहर या भीतर जहाँ कहीं भी मन जाता है, सर्वत्र अपनी व्यापकता के कारण शिवरूपता विद्यमान है । वह मन इस तरह से उस शिवस्वरूप को छोड़कर और कहाँ जायगा ? जहां जहां मन जायगा, वहाँ वहाँ इन्द्रियों के माध्यम से स्वात्मचैतन्य की ही अभि- व्यक्ति होगी ॥ प्रश्न उठता है कि क्या सभी को इसकी प्रतीति हो सकती है ? इसका उत्तर देते हैं— इसके लिए विद्वान् प्रयत्न क्यों न करे ॥२०४॥ इसकी प्रतीति तो सबको होती है, इसमें कोई सन्देह नहीं है, किन्तु साधारण मनुष्य ऐसा कर नहीं पाता । उपनिषद् में बताया गया है—"मुझे कोई भी नहीं देख पाता" । तन्त्रान्तर में बताया गया है— १. 'अपि' नास्ति—ख. ने. झ. उ. । २. चाम्यन्तरेऽपि च—ख. ने. ज. झ. उ. । ३. यत्र यत्राक्ष—मु. । ४. कथं तथा—क. ग. झ. । ५. कथञ्चिन्न विचिन्तयेत्— ख. ने. झ. उ. ।