भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] | दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३९३ प्रत्यक्षगोचरं देवं लोकं १चाब्धिप्रमाथिनम् । दृष्ट्वा २श्रुतिशिरः सान्द्रमनुक्रोशति दुःखितः ॥ इति तन्त्रान्तरोक्तरीत्या दृश्यमानमप्युपदेशहीना न पश्यन्ति । "निष्कलत्वं शिवे बुद्ध्वा" (२।५०) इति निष्कलपरशिवतादात्म्यापरोक्षानुभवशाली गुरुकटाक्ष- वोक्षणात् त्रुटित३समस्त४पाशजालः परिस्फुरत्परमशिवाहन्ताविज्ञान इदं ५कथं न चिन्तयेत्, सर्वत्र समभावं कथं न पश्येदित्यर्थः ॥२०४॥ शिवेनाम्ब६ ! रहस्यत्वादविस्पष्टतयोदितम् । त्वद्रूपं नाथवचनाद् विवृतं ७नो क्षमस्व तत् ॥ इति श्रीमत्परमयोगीन्द्रपुण्यानन्दशिष्यामृतानन्दयोगिप्रवरविरचितायां योगिनीहृदयदीपिकायां पूजासंकेतस्तृतीयः ॥ ॥ समाप्तश्चायं ग्रन्थः ॥ भगवान् तो प्रत्यक्ष दिखाई पड़ते हैं, किन्तु अज्ञ जन उनको देख नहीं पाते । मनुष्य समुद्र को मथ डालता है, समस्त वेदान्तशास्त्र को पढ़ डालता है, तब भी उसके स्वरूप को जान नहीं पाता और लाचार होकर दुःखसागर में पड़ा विलाप करता रहता है१ ॥ इस तरह से परम तत्त्व का स्वरूप सबके सामने है, किन्तु जिनको गुरु का उपदेश नहीं प्राप्त हुआ है, उनको यह दिखाई नहीं पड़ता । शिव में, गुरु में और अपने में भी निष्कल शिवरूपता के दर्शन की चर्चा पहले (२।५०) आ चुकी है । तदनुसार निष्कल परमशिव के साथ तादात्म्य की प्रत्यक्ष अनुभूति जिसको होने लगी है, गुरु की कृपादृष्टि के पड़ने से जिसके सारे पाशजाल छिन्न-भिन्न हो गये हैं और जिसकी 'परमशिव मैं ही हूं' ऐसी प्रत्यभिज्ञा जाग उठी है, वह साधक अपने स्वरूप के साक्षात्कार के लिये प्रयत्न क्यों न करे, अर्थात् सर्वत्र समभाव का दर्शन क्यों न करे ? इसका अभिप्राय यह है कि ऐसे साधक में अवश्य ही समतादृष्टि जाग उठेगी ॥२०४॥ १. चाधि-क. ग., चाति-ख. ने. ज. । २. स्मृति-क. ग. उ. । ३. 'समस्त' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. माया-ने. ज. झ., प्रभा-उ. । ५. कथञ्चिन्न विचि- न्तयेत्-ख. ने. ज. उ. । ६. नातिर-ख. ने. ज. उ. । ७. मोक्षमच्युतम्-ख. ने. ज. उ. । १. भट्ट गंगाधर के स्तोत्र तथा क्षेमेन्द्र के गीतानिष्यन्द के नाम से इस तरह के श्लोक उद्धृत मिलते हैं । इन ग्रन्थों की उपलब्धि के अभाव में यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि ये श्लोक वहीं के हैं।

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