भारतकोश
युक्तिकल्पतरु (महाराज भोज - नौका-निर्माण, जलयान-विज्ञान, शस्त्र, दुर्ग एवं राजधर्म सटीक)

युक्तिकल्पतरु (महाराज भोज - नौका-निर्माण, जलयान-विज्ञान, शस्त्र, दुर्ग एवं राजधर्म सटीक)

Yuktikalpataru of Maharaja Bhoja with Commentary

महाराज भोज (सम्पादक: पण्डित ईश्वरचन्द्र शास्त्री) द्वारा

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अतः सार्द्धमितायामा तदर्द्ध-परिणाहिनी । त्रिभागेणोत्थिता नौका मध्यमेति प्रचक्षते ॥ ६१ ॥ क्षुद्राथ मध्यमा भीमा चपला पटलाऽभया (१)। दीर्घा पत्रपुटा चैव गर्भरा मन्थरा तथा ॥ ६२ ॥ नौकादशकमित्युक्तं राजहस्तैरनुक्रमम् । एकैकवृद्धैः(वृद्धेः) सार्द्धैश्च विजानीयाद् द्वयं द्वयम् ॥ ६३ ॥ उन्नतिश्च प्रवीणा च हस्तादर्द्धांश-सम्मिता । अत्र भीमाऽभया चैव गर्भरा (२) चाशुभप्रदा ॥ ६४ ॥ मन्थरा परतो यास्तु तासामेवाम्बुधौ गतिः । तासां गुणस्तु संक्षेपात् दृढता च प्रकीर्त्तिता ॥ ६५ ॥ अथ विशेषः । लौहताम्रादिपत्रेण कान्तलोहेन वा तथा । दीर्घा चैवोन्नता चेति विशेषे द्विविधा भिदा ॥ ६६ ॥ तत्र दीर्घा यथा,— राजहस्तद्व

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