१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
॥ दशमः खण्डः ॥
२९८ शााण्डिल्योपनिषद ॥ दशमः खण्डः ॥ अथ ध्यानम्। तद्विविधं सगुणं निर्गुणं चेति। सगुणं मूर्तिध्यानम्। निर्गुणमात्मया- थात्म्यम्॥ १॥ अब इसके बाद ध्यान को बतलाते हैं-यह दो प्रकार का होता है, प्रथम-निर्गुण एवं द्वितीय-सगुण। मूर्ति का चिन्तन करना सगुण कहलाता है तथा आत्मा के स्वरूप का ध्यान करना निर्गुण कहलाता है॥ १॥ ॥ एकादशः खण्डः ॥ अथ समाधिः। जीवात्मपरमात्मैक्यावस्था त्रिपुटीरहिता परमानन्दस्वरूपा शुद्धचैतन्यात्मिका भवति॥ १॥ अब इसके अनन्तर समाधि का वर्णन करते हैं। जीवात्मा एवं परमात्मा की ऐक्यावस्था, (ज्ञान, ज्ञेय तथा ज्ञाता) की त्रिपुटीविहीन,परमानन्द के रूप से युक्त एवं शुद्ध चैतन्यमय अवस्था ही समाधि कहलाती है॥१॥ ॥ द्वितीयोऽध्यायः॥ अथ ह शाण्डिल्यो ह वै ब्रह्मर्षिश्चतुर्षु वेदेषु ब्रह्मविद्यामलभमानः किं नामेत्यथर्वाणं भगवन्तमुपसन्नः पप्रच्छाधीहि भगवन् ब्रह्मविद्यां येन श्रेयोऽवाप्स्यामीति॥ १॥ तदनन्तर ब्रह्मर्षि शाण्डिल्य ने चारों वेदों में (चारों वेदों का अध्ययन करने पर भी) ब्रह्म विद्या को प्राप्त न कर पाने से भगवान् अथर्वा की शरण में पहुँचकर प्रश्न किया- 'हे भगवन्! आप हमें ब्रह्म विद्या का अध्ययन कराएँ, जिससे कि मुझे कल्याण की प्राप्ति हो'॥ २॥ स होवाचाथर्वा शाण्डिल्य सत्यं विज्ञानमनन्तं ब्रह्म। ॥ २॥ तत्पश्चात् अथर्वा मुनि ने कहना प्रारम्भ किया "हे शाण्डिल्य! ब्रह्म, सत्य, विज्ञान एवं अनन्त रूपों में संव्यास है॥ २॥ यस्मिन्निदमोतं च प्रोतं च। यस्मिन्निदं सं च विचैति सर्वं यस्मिन्विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति। तदपाणिपादमचक्षुःश्रोत्रमजिह्वमशरीरमग्राह्यमनिर्देश्यम्॥ ३॥ जिसमें यह सभी कुछ ओत-प्रोत है। जिसमें यह प्रादुर्भूत होता है तथा अस्त भी होता है,उसी तरह से जिसको समझ लेने से यह सभी कुछ समझ लिया जाता है,वह हाथ-पैर से विहीन,नेत्रों से रहित,कार्य विहीन,जिह्वा रहित, शरीर विहीन, स्वीकार न किये जाने योग्य तथा स्पष्ट रूप से बताये न जा सकने योग्य.है ॥३ यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। यत्केवलं ज्ञानगम्यम्। प्रज्ञा च यस्मात्प्रसृता पुराणी। यदेकमद्वितीयम्। आकाशवत्सर्वगतं सुसूक्ष्मं निरञ्जनं निष्क्रियं सन्मात्रं चिदानन्दैकरसं शिवं प्रशान्तममृतं तत्परं च ब्रह्म। तत्त्वमसि तज्ज्ञानेन हि विजानीहि॥ ४॥ जिसे प्राप्त किये बिना वाणी एवं मन पीछे की ओर वापस हो जाते हैं। जो मात्र ज्ञान से ही पाया जा सकता है, जिससे प्राचीन प्रज्ञा का प्रचार-प्रसार हुआ है, जो अनुपम एवं अद्वितीय है, आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त रहने वाले, अति सूक्ष्म, निरञ्जन, क्रियाविहीन, एकमात्र सत्य स्वरूप, चेतना से सम्पन्न, आनन्द स्वरूप,
अध्याय ३ खण्ड १ मन्त्र ५ २९९
अध्याय ३ खण्ड १ मन्त्र ५ २९९ एकरस से सम्पन्न, मंगलमय, अत्यन्त शांत एवं अमर है, वही परम् अविनाशी ब्रह्म है। वही तुम हो। ज्ञान के द्वारा तुम उसे जानो ॥ ४॥ य एको देव आत्मशक्तिप्रधानः सर्वज्ञः सर्वेश्वरः सर्वभूतान्तरात्मा सर्वभूताधिवासः सर्वभूतनिगूढो भूतयोनिर्यौगैकगम्यः । यश्च विश्वं सृजति विश्वं बिभर्ति विश्वं भुङ्क्ते स आत्मा। आत्मनि तं तं लोकं विजानीहि ॥ ५ ॥ जो एक ही देव आत्मा की शक्ति के रूप में प्रमुख, सब प्रकार से ज्ञान सम्पन्न, सर्वेश्वर, समस्त प्राणियों की अन्तरात्मा, सभी प्राणियों में निवास करने वाले, सब प्राणियों में छिपे हुए, सभी प्राणियों का मूल उत्पत्ति स्थान, केवल योग के द्वारा ही जाने जा सकने योग्य है, जो विश्व की सृष्टि, पालन एवं विलय स्वयं करता है, वही आत्मा है। तुम आत्मा में ही उन सबको स्थित जानो ॥ ५ ॥ मा शोचीरात्मविज्ञानी शोकस्यान्तं गमिष्यसि ॥ ६ ॥ तुम शोक बिल्कुल न करो। आत्मा का विशिष्ट ज्ञान पाकर के तुम शोक का अन्त कर सकोगे ॥ ६ ॥ ॥ तृतीयोऽध्यायः ॥ ॥ प्रथमः खण्डः ॥ अथ हैनं शाण्डिल्योऽथर्वाणं पप्रच्छ यदेकमक्षरं निष्क्रियं शिवं सन्मात्रं परंब्रह्म । तस्मात्कथमिदं विश्वं जायते कथं स्थीयते कथमस्मिंल्लीयते । तन्मे संशयं छेत्तुमर्हसीति ॥१ ॥ इस प्रकार अथर्वा मुनि से जानकारी प्राप्त करने के पश्चात् महात्मा शाण्डिल्य ने पुनः प्रश्न किया- हे भगवन् ! जो परब्रह्म एकाक्षर, क्रिया विहीन, मङ्गलमय, सत्ता मात्र एवं आत्म स्वरूप है, उससे यह जगत् किस प्रकार से प्रादुर्भूत होता है ? किस प्रकार वह प्रतिष्ठित होता है तथा किस तरह से उसमें विलीन हो जाता है ? मेरी यह शंका दूर करना अत्यन्त आवश्यक है ॥ १ ॥ स होवाचाथर्वा सत्यं शाण्डिल्य परब्रह्म निष्क्रियमक्षरमिति । अथाप्यस्यारूपस्य ब्रह्मणस्त्रीणि रूपाणि भवन्ति सकलं निष्कलं सकलनिष्कलं चेति ॥२-३॥ ऐसा सुनकर अथर्वा मुनि ने कहा- हे शाण्डिल्य ! यह सत्य है कि परब्रह्म निष्क्रिय एवं अक्षर रूप है, तब भी इस अविनाशी परब्रह्म के तीन स्वरूप-सकल, निष्कल एवं सकल-निष्कल हैं ॥ २-३ ॥ यत्तत्सत्यं विज्ञानमानन्दं निष्क्रियं निरञ्जनं सर्वगतं सुसूक्ष्मं सर्वतोमुखमनिर्देश्य-ममृतमस्ति तदिदं निष्कलं रूपम् ॥ ४॥ जो सत्यरूप, विज्ञानयुक्त, आनन्दस्वरूप, क्रियारहित, निरञ्जन, सर्वव्यापी, सूक्ष्मातिसूक्ष्म, चतुर्दिक मुखवाला, अनिर्वचनीय और अमर है, यह ब्रह्म का निष्कल रूप है ॥ ४ ॥ अथास्य या सहजास्त्यविद्या मूलप्रकृतिर्माया लोहितशुक्लकृष्णा । तया सहायवान् देवः कृष्णपिङ्गलो महेश्वर ईष्टे । तदिदमस्य सकलं रूपम् ॥ ५ ॥ इसके पश्चात् अब इस परब्रह्म की जो सहज अविद्या, मूल प्रकृति और माया शक्ति है, वह लाल, श्वेत एवं कृष्ण रंग से युक्त है। उस (माया) की सहायता प्राप्त करके यह देव कृष्ण एवं पीत रंग से युक्त होकर सभी का ईश्वर और नियन्ता होता है। यह इस ब्रह्म का 'सकल' रूप है ॥ ५ ॥
३०० शाण्डिल्योपनिषद् अथैष ज्ञानमयेन तपसा चीयमानोऽकामयत बहुस्यां प्रजायेयेति। अथैतस्मात्तप्यमा- नात्सत्यकामात्रीण्यक्षराण्यजायन्त। तिस्रो व्याहृतयस्त्रिपदा गायत्री त्रयो वेदास्त्रयो देवास्त्रयो वर्णास्त्रयोऽग्नयश्च जायन्ते। योऽसौ देवो भगवान्सर्वैश्वर्यसंपन्नः सर्वव्यापी सर्वभूतानां हृदये संनिविष्टो मायावी मायया क्रीडति स ब्रह्मा स विष्णुः स रुद्रः स इन्द्रः स सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि स एव पुरस्तात्स एव पश्चात्स एवोत्तरतः स एव दक्षिणतः स एवाधस्तात्स एवोप- रिष्टात्स एव सर्वम्। अथास्य देवस्यात्मशक्तेरात्मक्रीडस्य भक्तानुकम्पिनो दत्तात्रेयरूपा सुरूपा तनूरवासा इन्दीवरदलप्रख्या चतुर्बाहुरघोरापापकाशिनी। तदिदमस्य सकलनिष्कलं रूपम् ॥६॥ तत्पश्चात् इस परब्रह्म ने ज्ञानमय तप से वृद्धि प्राप्त कर इच्छा की कि "मैं विभिन्न रूपों में प्रकट (प्रादुर्भूत) हो जाऊँ।" तदनन्तर तप प्रारम्भ किया। तभी समस्त कामनाओं से सम्पन्न तीन अक्षर प्रादुर्भूत हुए, वैसे ही तीन व्याहृतियाँ, तीन पदों वाली गायत्री, तीन वेद, तीन देव, तीन वर्ण एवं तीन अग्नियां उत्पन्न हुईं। जो यह देव भगवान् होकर समस्त ऐश्वर्यों से सम्पन्न, सर्वत्र व्याप्त रहने वाला, समस्त प्राणियों के हृदय में रहने वाला, मायावी एवं माया के साथ क्रीड़ा- कल्लोल करता है, वही ब्रह्मा, वही विष्णु, वही रुद्र, वही इन्द्र, वही समस्त देवताओं एवं सभी भूत-प्राणियों के रूप में है। वही अग्रभाग में, वही पृष्ठभाग में, वही उत्तर की ओर, वही दक्षिण की ओर, वही नीचे की ओर तथा वही ऊर्ध्व की ओर प्रतिष्ठित है। इस तरह से वही सब कुछ है। यह देव अपनी शक्ति से क्रीड़ा करने वाला तथा अपने भक्तों के प्रति अनुकम्पा बनाये रखने वाला है। इसका शरीर दत्तात्रेय रूप, सुन्दर, वस्त्र रहित, कमल की पंखुड़ी के सदृश कोमल, चार भुजाओं से सम्पन्न, भयंकरता से रहित एवं पापरहित होकर प्रकाश से युक्त है। यही उसका 'सकल-निष्कल' रूप है ॥ ६ ॥ ॥ द्वितीयः खण्डः ॥ अथ हैनमथर्वाणं शाण्डिल्यः पप्रच्छ भगवन्सन्मात्रं चिदानन्दैकरसं कस्मादुच्यते परं ब्रह्मेति। स होवाचाथर्वा यस्माच्च बृहति बृंहयति च सर्वं तस्मादुच्यते परंब्रह्मेति ॥ १-२ ॥ इसके पश्चात् महर्षि शाण्डिल्य ने अथर्वा मुनि से पुनः प्रश्न किया- "हे भगवन् ! मात्र सत्य स्वरूप, चैतन्य युक्त एवं आनन्दस्वरूप एकरस सम्पन्न यह परब्रह्म क्यों कहा जाता है ?" तब अथर्वा मुनि ने उत्तर दिया- "हे शाण्डिल्य ! वह ब्रह्म स्वयं वृद्धि को प्राप्त होता है तथा अन्य दूसरों को वृद्धि प्रदान करता है, अतः इस कारण से वह अविनाशी शाश्वत ब्रह्म कहलाता है ॥ १-२ ॥ अथ कस्मादुच्यते आत्मेति। यस्मात्सर्वमाप्नोति सर्वमादत्ते सर्वमत्ति च तस्मादुच्यते आत्मेति ॥ ३-४ ॥ इसके अनन्तर 'वह आत्मा क्यों कहा जाता है?' (ऐसा पूछने पर अथर्वा मुनि ने कहा-) वह (ब्रह्म) सर्वत्र सभी में विद्यमान रहता है, सभी को स्वीकार करता है तथा सभी का भक्षण कर लेता है अर्थात् अपने में मिला लेता है, इस कारण वह आत्मा कहलाता है ॥ ३-४॥ अथ कस्मादुच्यते महेश्वर इति। यस्मान्महत ईशः शब्दध्वन्या चात्मशक्त्या च महत ईशते तस्मादुच्यते महेश्वर इति ॥ ५-६ ॥ वह महेश्वर क्यों कहा जाता है? (अथर्वा मुनि ने कहा-) क्योंकि वह शब्द ध्वनि एवं आत्मशक्ति से बड़ों-बड़ों का नियंत्रण करता है तथा बड़ों-बड़ों का ईश्वर है, इसलिए वह महेश्वर कहलाता है ॥ ५-६॥
अध्याय ३ खण्ड २ मन्त्र १५ ३०१
अध्याय ३ खण्ड २ मन्त्र १५ ३०१ अथ कस्मादुच्यते दत्तात्रेय इति। यस्मात्सुदुश्चरं तपस्तप्यमानायात्रये पुत्रकामायतितरां तुष्टेन भगवता ज्योतिर्मयेनात्मैव दत्तो यस्माच्चानसूयायामत्रेस्तनयो ऽभवत्तस्मादुच्यते दत्तात्रेय इति ॥ वह दत्तात्रेय क्यों कहा जाता है ? (अथर्वा मुनि ने उत्तर दिया-) क्योंकि अत्यन्त उग्र तपश्चर्या करने के उपरान्त अत्रि ऋषि ने पुत्र प्राप्ति की कामना की। तदनन्तर उनके ऊपर अत्यधिक प्रसन्न होते हुए ज्योतिष्मान् भगवान् (शिव) ने स्वयं को ही उन अत्रि ऋषि को पुत्र रूप में प्रदत्त किया और वे स्वयं अत्रि एवं अनसूया के द्वारा प्रादुर्भूत हुए । इस प्रकार से वे दत्तात्रेय के नाम से प्रसिद्ध हुए ॥ ७-८॥ अथ योऽस्य निरुक्तानि वेद स सर्वं वेद। अथ यो ह वै विद्ययैनं परमुपास्ते सोऽहमिति स ब्रह्मविद्भवति ॥ ९-१० ॥ इन समस्त अर्थ सहित नामों को जो व्युत्पत्ति सहित समझता है, वह सभी कुछ जानने में समर्थ हो जाता है। इसके अनन्तर जो (इस आत्म) विद्या के द्वारा इस परमात्म तत्त्व की उपासना करता है, वह "मैं ही परमात्मा हूँ" इस प्रकार के भाव से ब्रह्म का वर्णन करने वाला (ब्रह्मवेत्ता) बन जाता है ॥ ९-१० ॥ अत्रैते श्लोका भवन्ति। दत्तात्रेयं शिवं शान्तमिन्द्रनीलनिभं प्रभुम्। आत्ममायारतं देवमवधूतं दिगम्बरम् ॥ ११ ॥ भस्मोद्धूलितसर्वाङ्गं जटाजूटधरं विभुम्। चतुर्बाहुमुदाराङ्गं प्रफुल्लकमलेक्षणम् ॥ १२ ॥ ज्ञानयोगनिधिं विश्वगुरुं योगिजनप्रियम्। भक्तानुकम्पिनं सर्वसाक्षिणं सिद्धसेवितम् ॥ १३ ॥ एवं यः सततं ध्यायेद्देवदेवं सनातनम् । स मुक्तः सर्वपापेभ्यो निःश्रेयसमवाप्नुयात् ॥ १४ ॥ इत्यों सत्यमित्युपनिषद् ॥ १५ ॥ यहाँ पर ये निम्न श्लोक कहे गये हैं— "मंगल स्वरूप वाले, शान्तरूप वाले, इन्द्रनीलमणि के समान श्याम, आत्ममाया के साथ रमण करने वाले, अवधूत, नग्न शरीर वाले, भस्म लगे हुए शरीर वाले, जटाजूट धारण किये हुए, सर्वत्र व्याप्त रहने वाले, चार भुजाओं से युक्त, उदार अंग वाले, प्रफुल्ल कमल के समान नेत्र वाले, ज्ञानयोग के भण्डार, सम्पूर्ण विश्व के गुरु, योगी जनों के प्रिय, अपने भक्तजनों पर दया करने वाले, सबके साक्षी एवं सिद्धजनों द्वारा सेवित प्रभु दत्तात्रेय देव शाश्वत, सनातन पुरुष हैं तथा देवों के भी देव अर्थात् आदिदेव हैं। इस तरह से जो पुरुष निरन्तर सदा ही उन (देवपुरुष) का ध्यान करता रहता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। इति ॐ सत्यम् अर्थात् यही सत्य है। इस प्रकार से यह उपनिषद् (रहस्यमयी विद्या) पूर्ण हुई ॥ ११-१५ ॥" ॐ भद्रं कर्णेभिः ............. इति शान्तिः ॥ ॥ इति शाण्डिल्योपनिषत्समाप्ता ॥
॥ शारारकापानषद् ॥ यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसमें कुल २० मन्त्र हैं, जिसमें सृष्टि प्रक्रिया का विशद वर्णन है। सर्वप्रथम शरीर में विद्यमान पंचतत्त्वों का परिचय कराया गया है। इसके बाद पंच ज्ञानेन्द्रियों, पंचकर्मेन्द्रियों, पंच तन्मात्राओं आदि का उत्पत्ति-क्रम वर्णित है। अन्तःकरण चतुष्टय तथा उनका शरीर में स्थान कहाँ है? इसका भी उल्लेख है। इसी प्रकार अन्य अनेक तत्त्वों का क्रमशः उद्भव और विकास वर्णित है। आगे चल कर सत, रज, तम-तीनों गुणों का स्वरूप और विभाग का वर्णन किया गया है। अन्त में १७ तत्त्वों वाले सूक्ष्म शरीर, २४ तत्त्वों वाली प्रकृति तथा पुरुष को लेकर २५ तत्त्व वाले पूरे विश्वब्रह्मांड का स्वरूप प्रतिपादित हुआ है। तत्त्वबोध की दृष्टि से इस उपनिषद् का विशेष महत्त्वपूर्ण स्थान कहा जा सकता है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ सह नाववतु ............ इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अवधूतोपनिषद) ॐ अथातः पृथिव्यादिमहाभूतानां समवायं शरीरम्। यत्कठिनं सा पृथिवी यद्द्रवं तदापो यदुष्णं तत्तेजो यत्संचरति स वायुर्यत्सुषिरं तदाकाशम्॥ १ ॥ पृथ्वी आदि पंचमहाभूतों का समुच्चय ही यह शरीर है। इस शरीर में जो ठोस पदार्थ हैं, वह पृथ्वी तत्त्व है। जो द्रव पदार्थ हैं, वह जल तत्त्व है। जो ऊष्मा है, वही अग्नि तत्त्व है। जो सतत गतिशील है, वह वायु तत्त्व है और जो सुषिर (पोला-छिद्रयुक्त) है, वह ही आकाश तत्त्व है ॥ १ ॥ श्रोत्रादीनि ज्ञानेन्द्रियाणि। श्रोत्रमाकाशे वायौ त्वगग्नौ चक्षुरप्सु जिह्वा पृथिव्यां घ्राणमिति। एवमिन्द्रियाणां यथाक्रमेण शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाश्चेति विषयाः पृथिव्यादिमहाभूतेषु क्रमेणोत्पन्नाः ॥ २ ॥ श्रोत्रादि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। आकाश तत्त्व में श्रोत्र, वायु तत्त्व में त्वचा, अग्नि (तेज) तत्त्व में नेत्र, जल तत्त्व में जिह्वा तथा पृथिवी तत्त्व में घ्राणेन्द्रिय विद्यमान है। इन सभी इन्द्रियों के विषय क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध हैं, वे सभी पृथिवी आदि महाभूतों से प्रादुर्भूत हुए हैं ॥ २ ॥ वाक्पाणिपादपायूपस्थाख्यानि कर्मेन्द्रियाणि। तेषां क्रमेण वचनादानगमनविस- र्गानन्दाश्चैते विषयाः पृथिव्यादिमहाभूतेषु क्रमेणोत्पन्नाः ॥ ३ ॥ वाक्, हस्त, पाद, गुदा एवं उपस्थ (जननेन्द्रिय)-कर्मेन्द्रियाँ कही गयी हैं। इन सभी इन्द्रियों के विषय क्रम से वचन, आदान-प्रदान, गमन, विसर्जन और आनन्द हैं, जो पृथ्वी आदि महाभूतों से ही प्रकट होते हैं ॥ मनोबुद्धिरहंकारश्चित्तमित्यन्तःकरणचतुष्टयम्। तेषां क्रमेण संकल्पविकल्पाध्यव- सायाभिमानावधारणास्वरूपाश्चैते विषयाः। मनःस्थानं गलान्तं बुद्धेर्वदनमहंकारस्य हृदयं चित्तस्य नाभिरिति ॥ ४ ॥ मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार- इन चारों को अन्तःकरण (चतुष्टय) कहा गया है। इनके विषय क्रमशः इस प्रकार हैं-१. संकल्प-विकल्प, २. निश्चय, ३. अवधारणा और ४. अभिमान। मन का क्षेत्र गले का अन्तिम भाग, बुद्धि का स्थान मुख, चित्त का क्षेत्र नाभि और अहंकार का क्षेत्र हृदय बताया गया है ॥ ४ ॥
३०३ शारीरकोपनिषद अस्थिचर्मनाडीरोममांसाश्चेति पृथिव्यंशाः। मूत्रश्लेष्मरक्तशुक्रस्वेदा अबंशाः। क्षुत्तृष्णा- लस्यमोहमैथुनान्यग्नेः। प्रचारणविलेखनस्थूलाक्ष्यन्मेषनिमेषादि वायोः। कामक्रोधलोभमोह- भयान्यॉकाशस्य॥५॥ अस्थि, त्वचा, नाड़ी, रोमकूप तथा मांस- ये सभी पृथ्वी तत्त्व के अंश हैं। मूत्र, कफ, रक्त, शुक्र तथा स्वेद (पसीना) —जल तत्त्व के अंश हैं। क्षुधा, पिपासा, आलस्य, मोह और मैथुन-अग्नि तत्त्व के अंश हैं। फैलाना, दौड़ना, गति करना (चलना), उड़ना, पलकों को संचालित करना आदि वायु तत्त्व के अंश हैं और काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय आदि आकाश तत्त्व के अंश हैं॥ ५॥ शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः पृथिवीगुणाः। शब्दस्पर्शरूपरसाश्चापां गुणाः। शब्दस्पर्शरूपा- ण्यग्निगुणाः। शब्दस्पर्शाविति वायुगुणौ। शब्द एक आकाशस्य ॥ ६॥ शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध- ये सभी पृथिवी तत्त्व के गुण कहे गये हैं। शब्द, स्पर्श, रूप और रस- ये सभी जल तत्त्व के गुण बताए गये हैं। शब्द, स्पर्श और रूप-ये तीनों अग्नि तत्त्व के गुण कहे गये हैं। शब्द तथा स्पर्श वायु तत्त्व के गुण बताये गये हैं और आकाश तत्त्व का मात्र एक ही गुण शब्द कहा गया है ॥ ६॥ सात्त्विकराजसतामसलक्षणानि त्रयो गुणाः ॥७॥ सात्त्विक, राजस और तामस इन तीन लक्षणों से युक्त ये तीन गुण कहे गये हैं॥७॥ अहिंसा सत्यमस्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहाः। अक्रोधो गुरुशुश्रूषा शौचं संतोष आर्जवम् ॥ ८॥ अमानित्वमदम्भित्वमास्तिकत्वमहिंस्रता । एते सर्वे गुणाः ज्ञेयाः सात्त्विकस्य विशेषतः ॥ ९ ॥ अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, क्रोध न करना, गुरु की सेवा करना, शुचिता (पवित्रता), संतोष, सरलता, अमानिता का भाव, दम्भ न करना, आस्तिकता, हिंसा न करना आदि ये सभी गुण विशेषतया सात्त्विक स्वभाव वाले मनुष्यों के कहे गये हैं॥ ८-९॥ अहं कर्ताऽस्म्यहं भोक्ताऽस्म्यहं वक्ताऽभिमानवान्। एते गुणा राजसस्य प्रोच्यन्ते ब्रह्मवित्तमैः ॥ मैं कर्त्ता हूँ, मैं भोक्ता अर्थात् भोग करने वाला हूँ, मैं वक्ता (बोलने वाला) हूँ-इस तरह के अभिमान युक्त गुण, राजस स्वभाव वाले मनुष्यों के बताए गए हैं ॥ १०॥ निद्रालस्ये मोहरागौ मैथुनं चौर्यमेव च । एते गुणास्तामसस्य प्रोच्यन्ते ब्रह्मवादिभिः ॥ ११ ॥ निद्रा, आलस्य, मोह, आसक्ति, मैथुन और चौर कृत्य- ये समस्त गुण तामस वृत्ति से युक्त मनुष्यों के कहे गये हैं॥ ११॥ ऊर्ध्वे सात्त्विको मध्ये राजसोऽधस्तामस इति ॥ १२॥ सर्वश्रेष्ठ ऊर्ध्व पद सात्त्विक गुण को कहा गया है, राजस गुण को मध्यम तथा तामस गुण को अधम बताया गया है ॥ १२ ॥ सत्यज्ञानं सात्त्विकम् । धर्मज्ञानं राजसम् । तिमिरान्धं तामसमिति ॥ १३ ॥ पूर्णसत्य (ब्रह्म) ज्ञान सात्त्विक है। धर्मज्ञान राजस है और अन्धकार से युक्त अर्थात् तिमिरान्ध (अधर्ममूढ़ता) ही तामस है ॥ १३॥
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मन्त्र २० ३०४ जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तितुरीयमिति चतुर्विधा अवस्थाः। ज्ञानेन्द्रियकर्मेन्द्रियान्तःकरणचतुष्टयं चतुर्दशकरणयुक्तं जाग्रत्। अन्तःकरणचतुष्टयैरेव संयुक्तः स्वप्नः। चित्तैककरणा सुषुप्तिः। केवलजीवयुक्तमेव तुरीयमिति ॥ १४॥ जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय- ये चार अवस्थाएँ हैं। जाग्रत् अवस्था में ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय तथा चार अन्तःकरण मिलकर के चौदह करण (सक्रिय) रहते हैं। स्वप्नावस्था में चार अन्तःकरण संयुक्त रूप से (सक्रिय) रहते हैं। सुषुप्ति अवस्था में केवल चित्त ही एक करण (सक्रिय) रहता है तथा तुरीयावस्था में केवल जीवात्मा ही रह जाता है॥ १४॥ उन्मीलितनिमीलितमध्यस्थजीवपरमात्मनोर्मध्ये जीवात्मा क्षेत्रज्ञ इति विज्ञायते ॥१५॥ उन्मीलित (अर्थात् खुले हुए) तथा निमीलित (अर्थात् बन्द नेत्रों) की मध्य स्थिति में जीव और परमात्मा के बीच में जीवात्मा क्षेत्रज्ञ होता है॥ १५॥ बुद्धिकर्मेन्द्रियप्राणपञ्चकैर्मनसा धिया। शरीरं सप्तदशभिः सुसूक्ष्मं लिङ्गमुच्यते ॥ १६॥ ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राण, मन एवं बुद्धि-इन सत्रह का सूक्ष्म स्वरूप लिङ्ग शरीर कहा गया है, ऐसा जानना चाहिए॥ १६॥ मनो बुद्धिरहंकार खानिलाग्निजलानि भूः। एताः प्रकृतयस्त्वष्टौ विकाराः षोडशापरे ॥ १७॥ मन, बुद्धि, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथिवी ये आठ प्रकृति के विकार कहे गये हैं। इनके अतिरिक्त सोलह विकार और बताये गये हैं॥ १७॥ श्रोत्रं त्वक्चक्षुषी जिह्वा घ्राणं चैव तु पंचमम्। पायूपस्थौ करौ पादौ वाक्चैव दशमी मता ॥ शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च। त्रयोविंशतिरेतानि तत्त्वानि प्रकृतानि तु ॥ १९॥ चतुर्विंशतिरव्यक्तं प्रधानं पुरुषः परः इत्युपनिषत् ॥ २०॥ श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा तथा घ्राणेन्द्रिय-ये पाँच विकार तथा गुदा, उपस्थ (जननेन्द्रिय), हाथ, पैर, तथा वाक्-ये पाँच और शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्ध-ये पाँच, ये सभी तथा उपर्युक्त मन आदि अष्टविकार मिलकर प्रकृति के (८+५+५+५ = २३) तेईस तत्त्व हुए। चौबीसवाँ अव्यक्त प्रधान (प्रकृति) है, पुरुष उससे भी परे (कहा गया) है, (इस प्रकार कुल पच्चीस तत्त्वों के समुच्चय वाला यह विश्वब्रह्माण्ड है) यही (शारीरक) उपनिषद् है ॥१८-२०॥ ॐ सह नाववतु ................ इति शान्तिः ॥ ॥ इति शारीरकोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ संन्यासोपनिषद् ॥ यह उपनिषद् सामवेद से सम्बद्ध है। इसमें कुल दो अध्याय हैं। प्रथम अध्याय में संन्यास क्या है? कैसे ग्रहण किया जाता है? उसके लिए कैसा आचार-व्यवहार होना चाहिए आदि का विशद वर्णन है। दूसरा अध्याय काफी बड़ा है। इसकी शुरुआत साधन चतुष्टय (विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति, मुमुक्षुत्व) से की गई है। संन्यास का अधिकारी कौन है? इसकी विस्तृत गवेषणा की गई है। संन्यासी का भेद बताते हुए १. वैराग्य संन्यासी २. ज्ञान संन्यासी ३. ज्ञान-वैराग्य संन्यासी और ४. कर्म संन्यासी की विस्तृत व्याख्या की गई है। आगे चलकर छः प्रकार के संन्यास का क्रम उल्लिखित हुआ है-कुटीचक, बहूदक, हंस, परमहंस, तुरीयातीत और अवधूत। इसी क्रम में आत्मज्ञान की स्थिति और स्वरूप का भी वर्णन उपनिषद्कार ने कर दिया है। संन्यासी के लिए आचरण की पवित्रता और भिक्षा में मिले स्वल्प भोजन में ही संतुष्ट होने का विधान बताया गया है। उसे स्त्री, भोग आदि शारीरिक आनन्द प्राप्ति से दूर रहने का निर्देश है। इस प्रकार आहार-विहार का संयम बरतते हुए नित्य प्रति आत्म चिन्तन में तल्लीन रहना चाहिए। ॐकार का जप करते रहना चाहिए-इसी से उसके अन्तःकरण में ब्रह्म का प्रकाश प्रकट होता है और वह मोक्ष प्राप्ति का अधिकारी बनता है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ आप्यायन्तु ............इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-आरुण्युपनिषद् ) ॥ प्रथमोऽध्यायः ॥ अथातः संन्यासोपनिषदं व्याख्यास्यामो योऽनुक्रमेण संन्यस्यति स संन्यस्तो भवति। कोऽयं संन्यास उच्यते। कथं संन्यस्तो भवति। य आत्मानं क्रियाभिर्गुप्तं करोति मातरं पितरं भार्यां पुत्रान्बन्धूननुमोदयित्वा ये चास्यर्त्विजस्तान्सर्वांश्र्च पूर्ववद्वृणीत्वा वैश्वानरेष्टिं निर्वपेत्स- र्वस्वं दद्याद्यजमानस्य गा ऋत्विजः सर्वैः पात्रैः समारोप्य यदाहवनीये गार्हपत्ये वान्वाहार्यपचने सभ्यावसथ्ययोश्च प्राणापानव्यानोदानसमानान्सर्वान्सर्वेषु समारोपयेत्। सशिखान्केशान्विसृज्य यज्ञोपवीतं छित्त्वा पुत्रं दृष्ट्वा त्वं यज्ञस्त्वं सर्वमित्यनुमन्त्रयेत्। यद्यपुत्रो भवत्यात्मानमेवेमं ध्यात्वा- ऽनवेक्षमाणः प्राचीमुदीचीं वा दिशं प्रव्रजेच्च। चतुर्षु वर्णेषु भिक्षाचर्यं चरेत्। पाणिपात्रेणाशनं कुर्यात् औषधवदशनमाचरेत्। औषधवदशनं प्राश्नीयात्। यथालाभमश्रीयात्प्राणसंधारणार्थं यथा मेदोवृद्धिर्न जायते। कृशो भूत्वा ग्राम एकरात्रं नगरे पञ्चरात्रं चतुरो मासान्वार्षिकान्ग्रामे वा नगरे वापि वसेत्। पक्षा वै मासो इति द्वौ मासौ वा वसेत् । विशीर्णवस्त्रं वल्कलं वा प्रतिगृह्णीयान्नान्यत्प्रतिगृह्णीयाद्यद्यशक्तो भवति क्लेशस्तस्तप्यते तप इति। यो वा एवं क्रमेण संन्यस्यति यो वा एवं पश्यति किमस्य यज्ञोपवीतं कास्य शिखा कथं वास्योपस्पर्शनमिति। तं होवाचेदमेवास्य तद्यज्ञोपवीतं यदात्मध्यानं विद्या शिखा नीरैः सर्वत्रावस्थितैः कार्यं निर्वर्तयन्नुदरपात्रेण जलतीरे निकेतनम्। ब्रह्मवादिनो वदन्त्यस्तमित आदित्ये कथं वास्योपस्पर्शनमिति। तान्होवाच यथाहनि तथा रात्रौ नास्य नक्तं न दिवा तदप्येतदृषिणोक्तम्। सकृद्दिवा हैवास्मै भवति य एवं विद्वानेतेनात्मानं संधत्ते ॥ १ ॥
३०६ संन्यासोपनिषद् अब संन्यास उपनिषद् का वर्णन करते हैं। क्रमानुसार नश्वर जगत् का परित्याग कर देने वाला विरक्त ही संन्यासी होता है। (प्रश्न) संन्यास किसे कहते हैं ? संन्यासी किस तरह का होता है ? (उत्तर) संन्यासी वह है, जो आत्मा के उत्थान हेतु माता-पिता, स्त्री-पुत्र, बान्धव आदि के द्वारा अनुमोदित पूर्व में कही क्रियाओं का परित्याग कर देता है; जो हमेशा की तरह ऋत्विजों को नमन-वंदन करने के पश्चात् वैश्वानर यज्ञ सम्पन्न करता है। इस पुनीत अवसर पर यजमान अपना सभी कुछ दान कर दे तथा ऋत्विज् सम्पूर्ण सामग्री को पात्रों समेत हवन कर दे। संन्यासी द्वारा आहवनीय, गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि इन तीनों अग्नियों तथा सभ्य (वैदिक कालीन अग्नि) एवं आवसथ्य (स्मृतिकालीन अग्नि) को प्राण, अपान, व्यान, उदान एवं समान पाँचों वायुओं में आरोपित करना चाहिए। शिखा (चोटी) सहित सभी केशों का मुण्डन करा देना चाहिए। यज्ञोपवीत को त्याग दे एवं पुत्र को देखकर इस तरह कहे कि तुम यज्ञ रूप हो, सर्वस्वरूप हो। यदि पुत्र न हो, तो वह अपनी आत्मा को ही लक्ष्य करके उपदेश देकर पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर गमन कर जाए। चारों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र) से भिक्षा स्वीकार करनी चाहिए। हाथ रूपी पात्र में भिक्षा ग्रहण कर भोजन करना चाहिए। भोजन को औषधि के समान ग्रहण करना चाहिए अर्थात् मात्र प्राण रक्षा की दृष्टि से आहार लेना चाहिए और जो कुछ प्राप्त हो जाए, वही ग्रहण करना चाहिए, जिससे चर्बी की वृद्धि न हो। इस प्रकार क्षीणकाय होकर गाँव में एक रात्रि एवं नगर में पाँच रात्रि तक निवास करना चाहिए। चातुर्मास (वर्षा के मास) में एक ही गाँव अथवा नगर में रुक जाना चाहिए या फिर पक्ष (पखवारा) को ही मास समझकर दो महीने तक निवास करना चाहिए। फटे वस्त्र अथवा वल्कल वस्त्र ही धारण करना चाहिए, अन्य वस्त्रों को ग्रहण न करे। इस तरह क्लेश सहना ही तप-तितिक्षा है। जो इस क्रम से संन्यास धारण करता है, उसके लिए यज्ञोपवीत क्या है ? शिखा क्या है ? आचमन किस तरह का है ? इन सभी का उत्तर इस प्रकार है- आत्मा का ध्यान ही संन्यासी का यज्ञोपवीत है। विद्या ही उसकी शिखा (चोटी) है। सर्वत्र स्थित जल के लिए उदर (पेट) ही संन्यासी का पात्र है तथा जलाशय का तट ही उसका आश्रय-स्थल है। इसी प्रकार का ब्रह्मवादी भी होता है। उसके लिए सूर्य के अस्ताचल की ओर गमन करने पर आचमन किस तरह का है ? इस प्रश्न का उत्तर इस प्रकार है-उस (संन्यासी) के लिए रात्रि एवं दिन दोनों ही एक जैसे हैं। उसके लिए न रात्रि होती है, न दिन होता है। जो (संन्यासी अथवा साधक) अपनी आत्मा के अनुसंधान में सतत लगा रहता है, विद्वज्जनों के अनुसार उसके लिए सदैव दिन ही है ॥ १ ॥ ॥ द्वितीयोऽध्यायः ॥ चत्वारिंशत्संस्कारसंपन्नः सर्वतो विरक्तश्चित्तशुद्धिमेत्याशासूयेर्ष्याहंकारं दग्ध्वा साधनचतुष्टयसंपन्न एव संन्यस्तुमर्हति ॥ १ ॥ चालीस तरह के संस्कारों से सम्पन्न, सभी से पूर्ण रूप से विरक्त, चित्त को परिष्कृत रखने वाला, आशा, असूया, ईर्ष्या, अहंकार को भस्मीभूत करके चारों साधनों (१) विवेक (नित्यानित्य वस्तु का ज्ञान), (२) वैराग्य (लौकिक एवं पारलौकिक भोगों की इच्छा का न होना), (३) षट्सम्पत्ति (शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान एवं श्रद्धा), (४) मुमुक्षुत्व (मोक्ष की प्रबल इच्छा) से सम्पन्न ही संन्यास ग्रहण करने का अधिकारी होता है ॥ १ ॥
अध्याय २ मन्त्र ९ ३०७
अध्याय २ मन्त्र ९ ३०७ संन्यासे निश्चयं कृत्वा पुनर्न च करोति यः । स कुर्यात्कृच्छ्रमात्रं तु पुनः संन्यस्तुमर्हति ॥ २ ॥ जो (साधक) संन्यास का निश्चय कर ले और फिर उसे स्वीकार न करे, तो वह कृच्छ्र (कठोर-तप) व्रत करने पर ही दोबारा संन्यास धर्म ग्रहण कर सकता है ॥ २ ॥ संन्यासं पातयेद्यस्तु पतितं न्यासयेत्तु यः । संन्यासविघ्नकर्ता च त्रीनेतान्पति-तान्विदुः ॥ ३ ॥ जो (व्यक्ति) संन्यास से पतित (गिर) हो जाते हैं, जो पतित को संन्यास की दीक्षा प्रदान करते हैं अथवा जो संन्यास धर्म ग्रहण करने में बाधा उत्पन्न करते हैं, वे तीनों ही (महा) पतित कहे गये हैं ॥ ३ ॥ अथ षण्डः पतितोऽङ्गविकलः स्त्रैणो बधिरोऽर्भको मूकः पाषण्डश्चक्री लिङ्गी कुष्ठी वैखानसहरद्विजौ भृतकाध्यापकः शिपिविष्टोऽनग्निको नास्तिको वैराग्यवन्तोऽप्येते न संन्यासार्हाः । संन्यस्ता यद्यपि महावाक्योपदेशे नाधिकारिणः ॥ ४ ॥ नपुंसक, पतित, अङ्गहीन, स्त्रैण (नारी स्वभाव वाला), बधिर, बालक, वाचाल, पाखण्डी, चक्री (चक्र चिह्न से अंकित अपराधी या कुचक्र रचने वाला), कुष्ठी, वैखानस एवं ब्राह्मण पद से भ्रष्ट, वेतनभोगी अध्यापक, अजितेन्द्रिय, अग्निहोत्र से रहित, नास्तिक विरक्त होते हुए भी संन्यास-दीक्षा के उपयुक्त नहीं होते। यदि कहीं वे संन्यासी हो भी जाएँ, तब भी वे महावाक्य के उपदेश में पूर्ण सक्षम अधिकारी नहीं होते ॥ ४ ॥ आरूढपतितापत्यं कुनखी श्यावदन्तकः । क्षयीतथाङ्गविकलो नैव संन्यस्तुमर्हति ॥ ५ ॥ पतित की सन्तान, निकृष्ट नख से युक्त, मैले-दुर्गन्धयुक्त दाँत वाले, क्षयरोग ग्रस्त, विकलांग आदि संन्यास-धर्म की दीक्षा ग्रहण करने योग्य नहीं होते ॥ ५ ॥ संप्रत्यवसितानां च महापातकिनां तथा । व्रात्यानामभिशस्तानां संन्यासं नैव कारयेत् ॥ ६ ॥ जिन्हें अकस्मात् वैराग्य हो गया हो, महापातकी, व्रात्य (संस्कारहीन) एवं लोक में निंदित व्यक्तियों को संन्यास की दीक्षा नहीं देनी चाहिए ॥ ६ ॥ व्रतयज्ञतपोदानहोमस्वाध्यायवर्जितम् । सत्यशौचपरिभ्रष्टं संन्यासं नैव कारयेत् । एते नार्हन्ति संन्यासमात्रेण विना क्रमम् ॥ ७ ॥ जो (मनुष्य) व्रत, यज्ञ, तप, दान, होम और स्वाध्याय-रहित हैं, सत्य एवं शुचिता से विहीन हैं, उन्हें संन्यास की दीक्षा नहीं देनी चाहिए। इस तरह के लोग चाहें तो 'आतुर संन्यासी' हो सकते हैं; किन्तु ऐसे लोग संन्यास के नियमानुसार अधिकारी नहीं हो सकते ॥ ७ ॥ ॐ भूः स्वाहेति शिखामुत्पाट्य यज्ञोपवीतं बहिर्न निवसेत् । यशो बलं ज्ञानं वैराग्यं मेधां प्रयच्छेति यज्ञोपवीतं छित्त्वा ॐ भूः स्वाहेत्यप्सु वस्त्रं कटिसूत्रं च विसृज्य संन्यस्तं मयेति त्रिवारमभिमन्त्रयेत् ॥ ८ ॥ 'ॐ भूः स्वाहा' मन्त्र पढ़कर शिखा (चोटी) को दूर कर दे अर्थात् काट दे; किन्तु यज्ञोपवीत को रहने दे। 'हे यज्ञ ! (आप हमें) बल, ज्ञान, वैराग्य एवं मेधा को प्रदान करें, इस प्रकार कहकर यज्ञोपवीत को छिन्न- भिन्न कर दे। 'ॐ भूः स्वाहा' मंत्र पढ़कर वस्त्र एवं कटि-सूत्र को जलाशय में विसर्जित करके 'संन्यस्तं मया' (मैंने संन्यास ग्रहण कर लिया), इस मंत्र का उच्चारण तीन बार करना चाहिए ॥ ८ ॥ संन्यासिनं द्विजं दृष्ट्वा स्थानाच्चलति भास्करः । एष मे मण्डलं भित्त्वा परं ब्रह्माधिगच्छति ॥९ ॥ संन्यासी एवं द्विज को देखकर भास्कर अपने स्थल से चलायमान होने लगता है कि कहीं यह हमारे मण्डल को भेद करके परब्रह्म में न समा जाए ॥ ९ ॥
३०८ संन्यासोपनिषद् षष्टिं कुलान्यतीतानि षष्टिमागामिकानि च। कुलान्युद्धरते प्राज्ञः संन्यस्तमिति यो वदेत् ॥ १० ॥ जो ज्ञानी मनुष्य 'मैं संन्यासी हो गया' ऐसा स्वीकार वचन बोलता है, वह अपने जन्म के पूर्व की साठ पीढ़ियों तथा आगे आने वाली साठ पीढ़ियों को भवसागर से मुक्त कर देता है ॥ १० ॥ ये च संतानजा दोषा ये दोषा देहसंभवाः। प्रैषाग्निर्निर्दहेत्सर्वंस्तुषाग्निरिव काञ्चनम् ॥ ११॥ संन्यासी के जो पैतृक दोष हैं तथा जो स्वयं के अपने शारीरिक दोष हैं, उन सभी को वह उसी तरह से भस्म कर देता है, जिस तरह तुषाग्नि सुवर्ण की गन्दगी को जला डालती है ॥ ११ ॥ सखा मा गोपायेति दण्डं परिग्रहेत् ॥ १२ ॥ हे सखा ! आप हमारी रक्षा करें, इस प्रकार कहकर दण्ड को धारण करना चाहिए ॥ १२ ॥ दण्डं तु वैणवं सौम्यं सत्वचं समपर्वकम्। पुण्यस्थलसमुत्पन्नं नानाकल्मषशोधितम् ॥ १३ ॥ अदग्धमहतं कीटैः पर्वग्रन्थिविराजितम्। नासादघ्नं शिरस्तुल्यं भ्रुवोर्वा बिभृयाद्यतिः ॥ १४॥ दण्ड उत्तम-श्रेष्ठ बाँस का सीधा, छाल सहित, समान (संख्या युक्त) गाँठ वाला होना चाहिए। उसका आविर्भाव श्रेष्ठ स्थान में हुआ हो, किसी भी तरह का दाग-धब्बा आदि न हो, जला हुआ भी न हो तथा कृमि- कीटक आदि के द्वारा खाया भी न गया हो पर्व ग्रन्थि-युक्त (गाँठ सहित) वह (दण्ड) लम्बाई में नासिका, शिखा (चोटी) अथवा भ्रुकुटी तक का होना चाहिए ॥ १३-१४ ॥ दण्डात्मनोस्तु संयोगः सर्वथा तु विधीयते। न दण्डेन विना गच्छेदिक्षुक्षेपत्रयं बुधः ॥ १५ ॥ दण्ड एवं आत्मा का संयोग सदा ही श्रेयस्कर है। इस कारण संन्यासी को दण्ड के अभाव में तीन बार बाण फेंकने की दूरी से बाहर न जाना चाहिए ॥ १५ ॥ जगज्जीवनं जीवनाधारभूतं मा ते मा मन्त्रयस्व सर्वदा सर्वसौम्येति कमण्डलुं परिगृह्य योगपट्टाभिषिक्तो भूत्वा यथासुखं विहरेत् ॥ १६ ॥ हे सर्वसौम्य ! आप जीवन के आधारभूत जल को धारण करने वाले हैं, मुझसे मन्त्रणा करते रहें- इस प्रकार से कहकर संन्यासी कमण्डलु को हाथ में ग्रहण कर योग पट्ट से सुशोभित होकर सुखानुभूतिपूर्वक यत्र- तत्र भ्रमण करे ॥ १६ ॥ त्यज धर्ममधर्मं च उभे सत्यानृते त्यज। उभे सत्यानृते त्यक्त्वा येन त्यजसि तत्तयज ॥ १७ ॥ (संन्यासी को) सभी तरह के धर्म-अधर्म तथा सत्य-असत्य दोनों का ही परित्याग कर देना चाहिए। तदनन्तर जिसके द्वारा इस प्रकार सत्य-असत्य का परित्याग किया जाता है, उसका भी त्याग कर देना चाहिए ॥ १७ ॥ वैराग्यसंन्यासी ज्ञानसंन्यासी ज्ञानवैराग्यसंन्यासी। कर्मसंन्यासीति चातुर्विध्यमुपागतः ॥ १८ ॥ संन्यासी के चार भेद बतलाये गये हैं- (१) वैराग्य संन्यासी (२) ज्ञान संन्यासी (३) ज्ञान-वैराग्य संन्यासी (४) कर्म संन्यासी ॥१८॥ तद्यथेति। दृष्टानुश्रविकविषयवैतृष्ण्यमेत्य। प्राक्पुण्यकर्मविशेषात्संन्यस्तः स वैराग्यसंन्यासी ॥ दृष्ट एवं आनुश्रविक विषयों के प्रति तृष्णारहित होकर तथा पूर्व-जन्म के पुण्यों के फलस्वरूप वैराग्य उत्पन्न होने के कारण जिस मनुष्य ने संन्यास-धर्म ग्रहण किया है, वह 'वैराग्य संन्यासी' है ॥ १९ ॥ [ सांख्य-योग की मान्यतानुसार 'दृष्ट' विषय वे हैं, जो इस लोक में 'दृष्टिगोचर' होते हैं, जैसे-रूप, रस, गन्ध आदि, धन-सम्पत्ति, स्त्री, राज-ऐश्वर्य इत्यादि। 'आनुश्रविक' विषय वे हैं, जो वेद और शास्त्रों द्वारा सुने गए हैं, ये भी
अध्याय २ मन्त्र २६ ३०९
अध्याय २ मन्त्र २६ ३०९ दो प्रकार के होते हैं-(क) देवलोक, स्वर्ग, विदेह और प्रकृतिलय का आनन्द (ख) दिव्य गन्ध-रस आदि, अणिमा- गरिमा-महिमा आदि सिद्धियाँ। वैराग्य संन्यासी उक्त दोनों प्रकार के विषयों से विरक्त होता है।] शास्त्रज्ञानात्यापपुण्यलोकानुभवश्रवणात्प्रपञ्चोपरतो देहवासनां शास्त्रवासनां लोकवासनां त्यक्त्वा वमनान्नमिव प्रवृत्तिं सर्वं हेयं मत्वा साधनचतुष्टयसंपन्नो यः संन्यस्यति स एव ज्ञानसंन्यासी ॥ २० ॥ शास्त्रों का ज्ञान पाकर, पाप-पुण्य और सांसारिक अनुभवों को सुनकर, प्रपञ्च से परे (उपराम) होकर, शरीर वासना (पुत्रैषणा, वित्तैषणा, लोकैषणा), शास्त्र वासना (शास्त्रों पर अत्यधिक निर्भर करना), लोक वासना (लौकिक व्यवहारों की प्रमुखता) का परित्याग करके, समस्त प्रकार की सांसारिक प्रवृत्तियों को वमन किये हुए अन्न की भाँति मान करके, साधन चतुष्टय (विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति और मुमुक्षुत्व) से सम्पन्न होकर जो संन्यास धर्म को स्वीकार करता है, 'उसे ज्ञान संन्यासी' कहा गया है ॥ २० ॥ क्रमेण सर्वमभ्यस्य सर्वमनुभूय ज्ञानवैराग्याभ्यां स्वरूपानुसंधानेन देहमात्रावशिष्टः संन्यस्य जातरूपधरो भवति स ज्ञानवैराग्यसंन्यासी ॥ २१ ॥ क्रमानुसार सभी का अभ्यास करके, सभी अनुभव लेकर, ज्ञान एवं वैराग्य के तत्त्व को अच्छी तरह से जान करके, देह मात्र अवशिष्ट मानकर जो संन्यास-धर्म को ग्रहण करता है, 'वह ज्ञान वैराग्य संन्यासी' कहलाता है ॥ २१ ॥ ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भूत्वा वानप्रस्थाश्रममेत्य वैराग्याभावेऽप्याश्रमक्रमानुसारेण यः संन्यस्यति स कर्मसंन्यासी ॥ २२ ॥ ब्रह्मचर्य, गृहस्थ एवं वानप्रस्थ- इन तीनों आश्रमों का पालन करने के पश्चात् वैराग्य (की दृढ़ स्थिति) न होने पर भी नियमानुसार संन्यास ग्रहण करना चाहिए, यह लक्षण 'कर्म-संन्यासी' के कहे गये हैं ॥ २२ ॥ स संन्यासः षड्विधो भवति कुटीचकबहूदकहंस। परमहंसतुरीयातीतावधूताश्चेति ॥ २३ ॥ इस संन्यास के छः भेद हैं- कुटीचक, बहूदक, हंस, परमहंस, तुरीयातीत तथा अवधूत ॥ २३ ॥ कुटीचकः शिखायज्ञोपवीती दण्डकमण्डलुधरः कौपीनशाटीकन्थाधरः पितृमातृगुर्वारा- धनपरः पिठरखनित्रशिक्यादिमात्रसाधनपर एकत्रान्नादनपरः श्वेतोर्ध्वपुण्ड्रधारी त्रिदण्डः ॥ २४ ॥ कुटीचक संन्यासी शिखा (चोटी) एवं यज्ञोपवीत को अपने शरीर में धारण किये रहता है। इसके अतिरिक्त वह दण्ड, कमण्डलु, कौपीन (लँगोटी), चादर, कंथा (कथरी) को ग्रहण करने वाला, माता-पिता तथा गुरु की आराधना करने वाला; बटलोई, कुदाली और छीका मात्र अपने पास रखने वाला तथा एक ही जगह पर भोजन करने वाला, ऊपर की ओर श्वेत त्रिपुण्ड्र मस्तक में धारण करने वाला और त्रिदण्ड भी धारण करने वाला होता है ॥ २४ ॥ बहूदकः शिखादिकन्थाधरस्त्रिपुण्ड्रधारी । कुटीचकवत्सर्वसमो इ मधुकरवृत्त्याष्टकवलाशी ॥ २५ बहूदक संन्यासी शिखा आदि, कंथा (कथरी) त्रिपुण्ड्र को धारण करने वाला तथा सभी तरह से कुटी- चक की भाँति मधुकरी (भिक्षा) की वृत्ति वाला होता है, वह केवल आठ ग्रास भोजन ग्रहण करता है ॥ २५ ॥ हंसो जटाधारी त्रिपुण्ड्रोर्ध्वपुण्ड्रधारी। असंक्लृप्तमाधुकरान्नाशी कौपीनखण्डतुण्डधारी ॥२६ 'हंस' नामक संन्यासी जटाधारी (लम्बे केशों वाला,) त्रिपुण्ड्र एवं ऊर्ध्व पुण्ड्र को धारण करने वाला, अनजान स्थान पर माँगकर भोजन करने वाला तथा कौपीन (लँगोटी) मात्र धारण करने वाला होता है ॥ २६
३१० संन्यासोपनिषद् परमहंसः शिखायज्ञोपवीतरहितः पञ्चगृहेषु करपात्री एककौपीनधारी। शाटीमेकामेकं वैणवं दण्डमेकशाटीधरो वा भस्मोद्धूलनपरः सर्वत्यागी ।। २७ ।। 'परमहंस' संन्यासी शिखा-यज्ञोपवीत से विहीन पाँच घरों से हाथ रूपी पात्र में भिक्षा प्राप्त करने वाला, एक लँगोटी, एक चादर तथा एक बाँस का दण्ड अपने पास में रखने वाला होता है अथवा शरीर पर भस्म धारण कर एक चादर ही अपने पास रखता है और सभी कुछ का परित्याग कर देता है ॥ २७ ॥ तुरीयातीतो गोमुखवृत्त्या फलाहारी अन्नाहारी । चेद्गृहत्रये देहमात्रावशिष्टो दिगम्बरः कुणपवच्छरीरवृत्तिकः ॥ २८ ॥ 'तुरीयातीत' संन्यासी सब कुछ त्याग देने वाला, गोमुख वृत्ति वाला, तीन गृहों से फल अथवा अन्न की भिक्षा लेने वाला, अपना शरीर नग्न रखने वाला अर्थात् बिना वस्त्रादि के शरीर को रखने वाला होता है। वह अपने शरीर को मरे हुए की भाँति जान करके किसी तरह जीवन निर्वाह करता है ॥ २८ ॥ अवधूतस्त्वनियमः पतिताभिशस्तवर्जनपूर्वकं सर्ववर्णेष्वजगरवृत्त्याहारपरः स्वरूपा- नुसंधानपरः ॥ २९ ॥ जगत्तावदिदं नाहं सवृक्षतृणपर्वतम् । यद्बाह्यं जडमत्यन्तं तत्स्यां कथमहं विभुः । कालेनाल्पेन विलयी देहो नाहमचेतनः ॥ ३० ॥ 'अवधूत' नामक संन्यासी किसी भी तरह का नियम नहीं मानता। पतित और निन्दित के अतिरिक्त समस्त जातियों में अजगर वृत्ति से आहार प्राप्त करने वाला होता है। वह अपने स्वरूप की खोज में ही सतत लगा रहता है। यह जो वृक्ष, घास-पात, पर्वत आदि सम्पूर्ण विश्व है, वह मेरे से अलग है। जो कुछ बाह्य जगत् में दृष्टिगोचर हो रहा है, वह अत्यन्त जड़ है। मैं किस तरह उसमें स्थित रह सकता हूँ; क्योंकि मैं विराट् हूँ, काल के द्वारा कल्पित एवं जल्दी ही विलय होने वाला भी मैं नहीं हूँ ॥ २९-३० ॥ जडया कर्णशष्कुल्या कल्पमानक्षणस्थया । शून्याकृतिः शून्यभवः शब्दो नाहमचेतनः ।।३१ ॥ मैं (संन्यासी) वह जड़ शब्द रूप नहीं हूँ; जो कि क्षण-मात्र ही ठहरता है। शून्य आकृति एवं स्वरूप से युक्त अचेतन भी मैं नहीं हूँ ॥ ३१ ॥ त्वचा क्षणविनाशिन्या प्राप्योऽप्राप्योऽयमन्यथा । चित्रसादोपलब्धात्मा स्पर्शो नाहमचेतनः ॥३२ इस प्रकार क्षण भर में नष्ट होने वाली एवं बनने-बिगड़ने वाली त्वचा भी मुझसे अलग है। मैं वह जड़ (अचेतन) स्पर्श नहीं हूँ, जो कि चैतन्यता के प्रभाव से आत्मानुभूति प्राप्त करता है ॥ ३२ ॥ लब्धात्मा जिह्वया तुच्छो लोलया लोलसत्तया । स्वल्पस्पन्दो द्रव्यनिष्ठो रसो नाहमचेतनः ॥३३ ॥ चंचलता से युक्त मन एवं मन से युक्त जिह्वा द्वारा द्रव्य से उत्पन्न तुच्छ स्पन्दन शक्ति भी मैं नहीं हूँ ॥ ३३ दृश्यदर्शनयोर्लीनं क्षयि क्षणविनाशिनोः। केवले द्रष्टरि क्षीणं रूपं नाहमचेतनः ॥ ३४ ॥ इसी तरह से दृश्य एवं दर्शन के विलीन हो जाने से विनष्ट हो जाने वाला अचेतन जड़ अनुभव भी मैं नहीं हूँ, मैं तो केवल द्रष्टा मात्र हूँ ॥ ३४ ॥ नास्या गन्धजडया क्षयिण्या परिकल्पितः । पेलवोऽनियताकारो गन्धो नाहमचेतनः ॥ ३५ ॥ गन्ध भी जड़ पदार्थ से युक्त तथा घ्राणेन्द्रिय के द्वारा परिकल्पित है, ऐसी तुच्छ जड़-गन्ध भी मैं नहीं हूँ ॥ निर्ममोऽमननः शान्तो गतपञ्चेन्द्रियभ्रमः । शुद्धचेतन एवाहं कलाकलनवर्जितः ॥ ३६ ॥ मैं (संन्यासी) पञ्च इन्द्रियों के भ्रम से विहीन, मनन रहित, शान्त स्वरूप से युक्त तथा मलिनता रहित शुद्ध चैतन्य मात्र हूँ। ॥ ३६ ॥
अध्याय २ मन्त्र ४९ ३११
अध्याय २ मन्त्र ४९ ३११ चैत्यवर्जितचिन्मात्रमहमेषोऽवभासकः । सबाह्याभ्यन्तरव्यापी निष्कलोऽहं निरञ्जनः । निर्विकल्पचिदाभास एक आत्मास्मि सर्वगः ॥ ३७ ॥ मैं (संन्यासी) चैतन्य से भी परे चिन्मात्र प्रकाश से युक्त हूँ। मैं बाह्य एवं अन्तः में संव्याप्त रहने वाला निष्कल (कलारहित), निरञ्जन, निर्विकल्प, चिदाभास एवं सर्वत्र व्याप्त रहने वाला आत्मतत्त्व हूँ॥ ३७॥ मयैव चेतनेनेमे सर्वे घटपटादयः । सूर्यान्ता अवभास्यन्ते दीपेनेवात्मतेजसा ॥ ३८ ॥ मुझ एक चैतन्य स्वरूप के द्वारा ही घट-पट आदि से लेकर सूर्य पर्यन्त सभी दीपक के सदृश तेजवान् विनिर्मित किये जाते हैं॥ ३८॥ मयैवैताः स्फुरन्तीह विचित्रेन्द्रियवृत्तयः । तेजसान्तः प्रकाशेन यथाग्निकणपङ्क्तयः ॥ ३९ ॥ ये सभी इन्द्रियों की विचित्र एवं भिन्न-भिन्न प्रकार की वृत्तियाँ (पंक्तियाँ) मेरे अन्तःकरण के प्रकाश से ही प्रादुर्भूत होती हैं। जैसे-अग्नि से चिनगारियाँ निःसृत होती हैं॥ ३९॥ अनन्तानन्दसंभोगा परोपशमशालिनी । शुद्धेयं चिन्मयी दृष्टिर्जयत्यखिलदृष्टिषु ॥ ४० ॥ यह पवित्र चिन्मय दृष्टि अन्तरहित, शाश्वत, आनन्द का उपभोग करने वाली एवं अत्यन्त शान्ति प्रदान करने वाली है। यह अन्य समस्त दृष्टियों पर विजय पाने वाली है॥ ४० ॥ सर्वभावान्तरस्थाय चैत्यमुक्तचिदात्मने । प्रत्यक्चैतन्यरूपाय मह्यमेव नमो नमः ॥ ४१ ॥ यह मुक्तात्मा सभी तरह की भावनाओं में स्थायी रूप से स्थित रहता है, यह चैत्य अवस्था से भी मुक्त चिदात्मा है। इस प्रत्येक चैतन्य रूप वाले आत्मा को नमस्कार है॥ ४१॥ विचित्राः शक्तयः स्वच्छाः समा या निर्विकारया । चिता क्रियन्ते समया कलाकलनमुक्तया ॥ कालत्रयमुपेक्षित्या हीनायाश्चैत्यबन्धनैः । चितश्चैत्यमुपेक्षित्याः समतैवावशिष्यते ॥ ४३ ॥ कला एवं कल्पनाविहीन चित्शक्ति से ही इन विचित्र, स्वच्छ तथा समभाव सम्पन्न शक्तियों का प्राकट्य हुआ है। यह चित् शक्ति तीनों कालों में सर्वाधिक शक्ति-सम्पन्न, दृश्यजगत् के बन्धनों से मुक्त है॥४२-४३॥ सा हि वाचामगम्यत्वादसत्तामिव शाश्वतीम् । नैरात्मसिद्धात्मदशामुपयातैव शिष्यते ॥ ४४ ॥ ईहानीहामयैरन्तर्या चिदावलिता मलैः । सा चिन्नोत्पादितुं शक्ता पाशबद्धेव पक्षिणी ॥४५॥ इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन जन्तवः । धराविवरमग्नानां कीटानां समतां गताः ॥ ४६ ॥ यह वाणी से न जाने जा सकने वाली है। शाश्वत असत्ता तथा निरति आत्मा के सदृश वही शेष रहती है। जो चित्शक्ति इच्छा एवं अनिच्छा में स्थित है, वह मलों से आच्छादित है तथा पाश से आबद्ध पक्षिणी की भाँति उड़ने में असमर्थ होती है। इच्छा एवं द्वेष से प्रादुर्भूत द्वन्द्वभाव के कारण ये मोहवश पृथ्वीरूपी गड्ढे में पतित हुए कृमि-कीटों के ही समान हैं॥ ४४-४६॥ आत्मनेऽस्तु नमो मह्यमविच्छिन्नचिदात्मने । परामृष्टोऽस्मि बुद्धोऽस्मि प्रोदितोऽस्म्यचिरादहम् ॥४७ मुझ अविच्छिन्न चिद्रूप आत्मा को नमन-वंदन है। मैं सतत, परम प्रत्यक्ष, बुद्ध एवं उदित हूँ ॥४७॥ उद्धतोऽस्मि विकल्पेभ्यो योऽस्मि सोऽस्मि नमोऽस्तु ते। तुभ्यं महामनन्ताय मह्यं तुभ्यं चिदात्मने ॥ मैं उद्धत हूँ, विकल्पों से परे हूँ, मैं जो हूँ, मैं ही सो हूँ, मुझे नमस्कार है। तुम और मैं अन्तरहित हैं। मैं एवं तुम दोनों ही चिदात्मा हैं। दोनों को नमस्कार है॥ ४८ ॥ नमस्तुभ्यं परेशाय नमो मह्यं शिवाय च । तिष्ठन्नपि हि नासीनो गच्छन्नपि न गच्छति । शान्तोऽपि व्यवहारस्थः कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ४९ ॥
३१२ संन्यासोपनिषद् मुझ परम ईश्वर तथा शिव स्वरूप को नमस्कार है। यह (आत्मा) बैठता हुआ आसीन नहीं होता, जाते हुए भी नहीं जाता, शान्त रहते हुए भी व्यवहार में लगा रहता है, कार्य करता हुआ भी कभी आसक्त नहीं होता॥ सुलभश्चायमत्यन्तं सुज्ञेयश्चामबन्धुवत्। शरीरपद्मकुहरे सर्वेषामेव षट्पदः ॥५०॥ यह (आत्मा) सुलभ है, आप्त बन्धु के सदृश है एवं शरीर रूपी कमल पुष्प में भ्रमर की भाँति है॥५०॥ न मे भोगस्थितौ वाञ्छा न मे भोगविसर्जने। यदायाति तदायातु यत्प्रयाति प्रयातु तत् ॥५१॥ न तो मुझ (आत्मा) को भोग करते रहने की इच्छा है और न ही भोग को त्यागने की, जो आता हो, वह आ जाए एवं जो जाना चाहता हो, वह चला जाये ॥ ५१ ॥ मनसा मनसि च्छिन्ने निरहंकारतां गते। भावेन गलिते भावे स्वस्थस्तिष्ठामि केवलः ॥५२॥ मन से मन के अलग हो जाने पर, अहंकार के विसर्जित हो जाने पर तथा भाव के विनष्ट हो जाने पर मैं (आत्मा) केवल स्वस्थ रूप में स्थित रहता हूँ ॥ ५२ ॥ निर्भावं निरहंकारं निर्मनस्कमनीहितम्। केवलास्पन्दशुद्धात्मन्येव तिष्ठति मे रिपुः ॥५३॥ (मैं) भाव शून्य, अहंकाररहित, मनः शून्य, चेष्टारहित, स्पन्द विहीन तथा केवल शुद्ध आत्मा स्वरूप हूँ। मेरा शत्रु कहाँ हो सकता है ? ॥ ५३ ॥ तृष्णारज्जुगणं छित्त्वा मच्छरीरकपञ्जरात् । न जाने क्व गतोड्डीय निरहंकारपक्षिणी ॥ ५४ ॥ मेरे शरीर रूपी पिंजड़े में निवास करने वाली निरहंकारिता रूपी पक्षिणी, तृष्णा रूपी रज्जु (रस्सी) को काटकर न जाने कहाँ उड़कर चली गई ॥ ५४॥ यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । यः समः सर्वभूतेषु जीवितं तस्य शोभते ॥ ५५ ॥ जिसमें अकर्तापन का भाव विद्यमान है, जिसकी बुद्धि में आसक्ति नहीं है, जो समस्त भूत-प्राणियों को समान भाव से देखता है, निश्चय ही उसी का जीवन शोभनीय है॥ ५५॥ योऽन्तःशीतलया बुद्ध्या रागद्वेषविमुक्तया। साक्षिवत्पश्यतीदं हि जीवितं तस्य शोभते ॥५६॥ जिसकी अन्तःकरण अत्यन्त शीतल है, जिसकी बुद्धि राग-द्वेष आदि से मुक्त हो चुकी है तथा जो साक्षी भाव से इस जगत् का अवलोकन करता है, ऐसे उस श्रेष्ठ संन्यासी का जीवन अत्यधिक शोभनीय है॥ येन सम्यक्परिज्ञाय हेयोपादेयमुज्झता । चित्तस्यान्तेऽर्पितं चित्तं जीवितं तस्य शोभते ॥ ५७॥ जिसको पूर्ण रूप से ज्ञान प्राप्त हो गया है, जिसने अच्छाई एवं बुराई के ध्यान का परित्याग कर दिया है तथा जिस (संन्यासी) ने चित्त को चित्त में ही संयुक्त कर दिया है, उसका ही जीवन अत्यन्त सुन्दर है ॥५७॥ ग्राह्यग्राहकसंबंधे क्षीणे शान्तिरुदेत्यलम् । स्थितिमभ्यागता शान्तिर्मोक्षनामाभिधीयते ॥ ५८ ॥ ग्राह्य एवं ग्राहक का सम्बन्ध विनष्ट हो जाने के पश्चात् स्थिर शान्ति का उदय होता है, इस कारण शान्ति को ही मोक्ष कहा जाता है ॥ ५८ ॥ भ्रष्टबीजोपमा भूयो जन्माङ्कुरविवर्जिता। हृदि जीवद्विमुक्तानां शुद्धा भवति वासना ॥ ५९ ॥ जिस प्रकार से भुना हुआ बीज अंकुर प्रकट करने में असमर्थ रहता है, उसी प्रकार जो जीवन से मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं, उन सभी के हृदय की वासना-आसक्ति प्रायः पवित्रता से युक्त हो जाती है ॥ ५९ ॥ पावनी परमोदारा शुद्धसत्त्वानुपातिनी। आत्मध्यानमयी नित्या सुषुप्तिस्थेव तिष्ठति ॥ ६० ॥ वह पतित-पावन, परम उदार, शुद्ध सत्य को आत्मसात् करने वाले, आत्मध्यान सम्पन्न एवं अपने- अपने नित्य स्वरूप में प्रतिष्ठित रहते हैं ॥ ६० ॥
अध्याय २ मन्त्र ७० ३१३
अध्याय २ मन्त्र ७० ३१३ चेतनं चित्तिरिक्तं हि प्रत्यक्केतनमुच्यते। निर्मनस्कस्वभावत्वान्न तत्र कलनामलम् ॥६१॥ जब चेतन तत्त्व-'चित्त-मुक्त' हो जाता है, तभी यह आत्मरूप चैतन्य तत्त्व कहा जाता है। जब स्वभाव-मन (इच्छा) रहित हो जाता है, तब उसमें किसी भी तरह के दोष प्रकट नहीं होते ॥६१॥ सा सत्यता सा शिवता सावस्था पारमात्मिकी । सर्वज्ञता सा संतृप्तिर्नतु यत्र मनः क्षतम् ॥६२ ॥ वही सत्यता है, वही शिव स्वरूप है, उसमें ही परमात्मा अवस्थित है। वही सर्वज्ञता है, वही सम्पूर्ण तृप्ति है, न कि जहाँ मन क्षतिग्रस्त (मेरे-तेरे में बँटा हुआ) हो। ॥६२॥ प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । निरस्तमननानन्दःद संविन्मात्रपरोऽस्म्यहम् ॥६३॥ यद्यपि मैं प्रलाप करता, परित्याग करता, स्वीकार करता, चक्षुओं को खोलता एवं बन्द करता रहता हूँ, फिर भी मैं मननशील, आनन्दस्वरूप, संवित् (ज्ञानरूप) आत्मा ही हूँ॥ ६३ ॥ मलं संवेद्यमुत्सृज्य मनो निर्मूलयन्परम् । आशापाशानलं छित्त्वा संविन्मात्रपरोऽस्म्यहम् ॥६४॥ संवेद्य रूपी मन को दूर करके तथा मन को निर्मूल अर्थात् बिना इच्छा किये हुए आशा रूपी फन्दे को काट करके मैं केवल संवित् रूप ही हूँ॥ ६४ ॥ अशुभाशुभसंकल्पः संशान्तोऽस्मि निरामयः । नष्टेष्टानिष्टकलनः संविन्मात्रपरोऽस्म्यहम् ॥६५॥ शुभ एवं अशुभ संकल्पों से मुक्त तथा सम्यक् रूप से शान्त होकर मैं आरोग्य अवस्था में स्थित हूँ। इष्ट तथा अनिष्ट के भाव का परित्याग करके मैं केवल संवित् रूप ही हो गया हूँ ॥ ६५ ॥ आत्मतापरते त्यक्त्वा निर्विभागो जगत्स्थितौ । वज्रस्तम्भवदात्मानमवलम्ब्य स्थिरोऽस्म्यहम् । निर्मलायां निराशायां स्वसंवित्तौ स्थितोऽस्म्यहम् ॥ ६६ ॥ राग एवं द्वेष के भावों का परित्याग करके, विभागरहित, नश्वर जगत् में प्रतिष्ठित अत्यधिक विशेष रूप से दृढ़ आत्मारूपी साम्य के आश्रय में मैं पूर्णरूप से प्रतिष्ठित हूँ। मैं अपनी निर्मल एवं आशारहित संवित् (आत्मिक दशा) में प्रतिष्ठित हूँ। ॥ ६६॥ ईहितानीहितैर्मुत्को हेयोपादेयवर्जितः । कदान्तस्तोषमेष्यामि स्वप्रकाशपदे स्थितः ॥ ६७ ॥ चेष्टा और चेष्टारहित तथा हेय एवं उपादेय की भावना से मैंने मुक्ति को प्राप्त कर लिया है। मैं आत्मिक संतोष को कब प्राप्त करूँगा? स्वयं प्रकाश स्वरूप पद में कब प्रतिष्ठित होऊँगा ॥ ६७ ॥ कदोपशान्तमननो धरणीधरकन्दरे । समेष्यामि शिलासाम्यं निर्विकल्पसमाधिना ॥ ६८ ॥ पर्वत-श्रृंखला की गुफा में आसन ग्रहण करके शांत भाव से कब चिन्तन-मनन करूँगा। मैं निर्विकल्प समाधि लगाकर शिला के समान कब चेष्टारहित हो जाऊँगा ? ॥ ६८ ॥ निरंशध्यानविश्रान्तिमूकस्य मम मस्तके। कदा तार्णं करिष्यन्ति कुलायं वनपत्रिणः ॥ ६९ ॥ मैं उस अंश-विहीन अविनाशी ब्रह्म के चिन्तन में इस तरह से कब निश्चल हो जाऊँगा कि कोयल पक्षी हमारे मस्तक पर घोंसला विनिर्मित कर लें ॥ ६९ ॥ संकल्पपादपं तृष्णालतं छित्त्वा मनोवनम् । विततां भुवमासाद्य विहरामि यथासुखम् ॥७०॥ मैं संकल्प रूपी वृक्षों तथा तृष्णा रूपी लताओं को काटकर मन रूपी विशाल वन को पारकर विस्तृत भूमि (मैदान) में पहुँचकर आनन्द पूर्वक विचरण करता हूँ ॥ ७० ॥
३१४ संन्यासोपनिषद् पदं तदनुयातोऽस्मि केवलोऽस्मि जयाम्यहम्। निर्वाणोऽस्मि निरीहोऽस्मि निरंशोऽस्मि निरीप्सितः॥ ७१॥ स्वच्छतोजितता सत्ता हृद्यता सत्यता ज्ञता। आनन्दितोपशमता सदा प्रमुदितोदिता। पूर्णतोदारता सत्या कान्तिसत्ता सदैकता॥ ७२॥ इत्येवं चिन्तयन्भिक्षुः स्वरूपस्थितिमञ्जसा। निर्विकल्पस्वरूपज्ञो निर्विकल्पो बभूव ह॥ ७३॥ मैं उस अविनाशी पद का स्वरूप हूँ, केवल हूँ, जय रूप हूँ, निर्वाण, निरीह (अहंरहित), अंशरहित, निरीप्सित (इच्छारहित) स्वच्छ, वीर्यवान्, सत्ताशाली, सत्य एवं ज्ञान स्वरूप हो गया हूँ। आनन्द, उपशम, प्रसन्नता, पूर्णता, उदारता, सत्य, द्वैतरहित आदि की भावना करते हुए संन्यासी को अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित रहना चाहिए। निर्विकल्प स्वरूप का पूर्ण जानकार होकर, निर्विकल्प बन करके ही रहना चाहिए॥ ७१-७३॥ आतुरो जीवति चेत्क्रमसंन्यासः कर्तव्यः। न शूद्रस्त्रीपतितोदक्या संभाषणम्। न यतेर्दे- वपूजनोत्सवदर्शनम्। तस्मान्न संन्यासिन एष लोकः। आतुरकुटीचकयोर्भूर्लोकभुवर्लोकौ। बहूदकस्य स्वर्गलोकः। हंसस्य तपोलोकः। परमहंसस्य सत्यलोकः। तुरीयातीतावधूतयोः स्वात्मन्येव कैवल्यं स्वरूपानुसंधानेन भ्रमरकीटन्यायवत्॥ ७४॥ आतुर संन्यासी यदि संन्यास लेने की इच्छा से जीवित रहे, तभी उसे क्रम-संन्यास प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। शूद्र, स्त्री, पद-भ्रष्ट तथा रजस्वला से कभी भी सम्भाषण नहीं करना चाहिए। किसी भी देवता के पूजनोत्सव को देखने के लिए संन्यासी को कभी नहीं जाना चाहिए। वे लौकिक कार्य संन्यासी के लिए नहीं हैं। आतुर और कुटीचक का भूः एवं भुवः लोक होता है, बहूदक का स्वर्गलोक होता है, हंस का तपोलोक एवं परमहंस का स्थान सत्यलोक होता है। तुरीयातीत तथा अवधूत श्रेणी के लोग भ्रमर-कीट के सदृश अपने स्वरूप का अन्वेषण करने हुए कैवल्य (केवल आत्मतत्त्व) रूप में प्रतिष्ठित हो जाते हैं॥ ७४॥ स्वरूपानुसंधानव्यतिरिक्तान्यशास्त्राभ्यास उष्ट्रकुङ्कुमभारवद्व्यर्थः। न योगशास्त्र प्रवृत्तिः। न सांख्यशास्त्राभ्यासः। न मन्त्रतन्त्रव्यापारः। नेतरशास्त्रप्रवृत्तिर्यतेरस्ति। अस्ति चेच्छवालंकारवत्कर्माचारविद्यादूरः। न परिव्राण्नामसंकीर्तनपरो यद्यत्कर्म करोति तत्तत्फल- मनुभवति। एरण्डतैलफेनवत्सर्वं परित्यजेत्। न देवताप्रसादग्रहणम्। न बाह्यदेवाभ्यर्चनं कुर्यात्॥ ७५॥ संन्यासी के लिए अपने स्वरूप के अनुसंधान के अलावा अन्य विभिन्न शास्त्रों का निरन्तर अभ्यास करना, ऊँट के ऊपर केशर लादने के सदृश बेकार है। संन्यासी के लिए योग की प्रवृत्ति अथवा सांख्य शास्त्र का मंत्र-तंत्र का व्यापार आदि तथा किसी भी शास्त्र की प्रवृत्ति वर्जनीय है। यदि कोई संन्यासी ऐसा करता है, तो वह मृतक शव के ऊपर आभूषणों के समान है तथा संन्यासी के कर्म एवं विद्या के अनुकूल नहीं है। संन्यासी को किसी भी देवता के नाम तथा कीर्तन आदि में भाग नहीं लेना चाहिए। कारण यह है कि कोई भी कार्य करने के बाद उसका फल तो भोगना ही पड़ेगा। इसलिए एरण्ड (रेड़ी) तेल के फेन के सदृश सभी का परित्याग कर देना चाहिए। संन्यासी को न तो किसी देवी-देवता का प्रसाद ग्रहण करना चाहिए और न ही किसी बाह्य देवता आदि की पूजा ही करनी चाहिए॥ ७५॥ स्वव्यतिरिक्तं सर्वं त्यक्त्वा मधुकरवृत्त्याहारमाहरन्कृशीभूत्वा मेदोवृद्धिमकुर्वन्विहरेत्। माधुकरेण करपात्रेणास्यपात्रेण वा कालं नयेत्। आत्मसंमितमाहारमाहरेदात्मवान्यतिः॥ ७६॥ संन्यासी को चाहिए कि वह अपने अतिरिक्त सभी का त्याग करके अपने हाथ रूपी पात्र से मधुकरी
अध्याय २ मन्त्र ८६ ३१५
अध्याय २ मन्त्र ८६ ३१५ वृत्ति पर जीवनयापन करे। जिससे कि उसके शरीर में चर्बी की वृद्धि न हो तथा उसको सतत विचरण करते रहना चाहिए। वह हाथ रूपी पात्र के द्वारा या मुख रूपी पात्र के द्वारा भिक्षा ग्रहण करते हुए जीवन व्यतीत करे॥ आहारस्य च भागौ द्वौ तृतीयमुदकस्य च। वायोः संचरणार्थाय चतुर्थमवशेषयेत् ॥ ७७॥ संन्यासी को पेट के चार भागों में से दो भाग में आहार (भोजन) ग्रहण करना चाहिए। एक भाग में जल तथा एक भाग वायु-संचरण के लिए रिक्त रखना चाहिए ॥ ७७॥ भैक्षेण वर्तयेन्नित्यं नैकान्नाशी भवेत्क्वचित्। निरीक्षन्ते त्वनुद्विग्नास्तद्गृहं यत्नतो व्रजेत् ॥ ७८ ॥ (संन्यासी) सतत भिक्षावृत्ति पर ही आश्रित रहे। हमेशा एक ही घर से भोजन नहीं ग्रहण करना चाहिए। जो शान्त-भाव से उसकी राह देखते हों, उन्हीं के यहाँ प्रयासपूर्वक भोजन के लिए जाना चाहिए ॥ ७८ ॥ पञ्चसप्तगृहाणां तु भिक्षामिच्छेत्क्रियावताम्। गोदोहमात्रमाकाङ्क्षेत्रिष्क्रान्तो न पुनर्व्रजेत् ॥७९ संन्यासी को श्रेष्ठ आचरण वाले पाँच या सात घरों में भिक्षा के लिए जाना चाहिए तथा गौ के दोहन में जितना समय लगता है, उतनी ही देर तक प्रतीक्षा करनी चाहिए। वह जहाँ से एक बार भिक्षा ग्रहण कर ले, वहाँ पुनः नहीं जाना चाहिए ॥ ७९ ॥ नक्ताद्वरश्श्रोपवास उपवासादयाचितः। अयाचिताद्वरं भैक्षं तस्माद्भैक्षेण वर्तयेत् ॥ ८० ॥ रात्रि के आहार (भोजन) से उपवास अधिक श्रेष्ठ है, उपवास की अपेक्षा अयाचित अर्थात् बिना माँगी हुई भिक्षा अधिक श्रेष्ठ है। अयाचित भिक्षा की अपेक्षा माँगकर खाना कहीं अधिक श्रेष्ठ है। अतः यथा सम्भव भिक्षा का ही आश्रय लेना चाहिए ॥ ८० ॥ नैव सव्यापसव्येन भिक्षाकाले विशेद्गृहान्। नातिक्रामेद्गृहं मोहाद्यत्र दोषो न विद्यते ॥ ८१ ॥ भिक्षा काल में सव्य-अपसव्य (दायें-बायें) मार्ग से घर में प्रविष्ट नहीं होना चाहिए। जिस घर में किसी तरह का दोष न हो, उसे भूल या मोह से भी नहीं छोड़ा जाना चाहिए (वहाँ भिक्षा ग्रहण कर लेनी चाहिए) ॥ श्रोत्रियान्नं न भिक्षेत श्रद्धाभक्तिबहिष्कृतम्। व्रात्यस्यापि गृहे भिक्षेच्छ्रद्धाभक्तिपुरस्कृते ॥८२ यदि श्रोत्रिय अर्थात् वेदज्ञ श्रद्धा-भक्ति से विहीन हो, तो उसके यहाँ भिक्षा नहीं स्वीकार करनी चाहिए तथा जो संस्कार विहीन (व्रात्य) भी यदि श्रद्धा-भक्ति रखता हो, तो उसके यहाँ भिक्षा ग्रहण करनी चाहिए॥ माधूकरमसंकॢप्तं प्राक्प्रणीतमयाचितम्। तात्कालिकं चोपपन्नं भैक्षं पञ्चविधं स्मृतम् ॥ ८३ ॥ (संन्यासियों की) भिक्षा पाँच तरह की कही गयी है- असंकल्पित माधूकर, प्राक्प्रणीत, अयाचित, तात्कालिक तथा उपपन्न ॥ ८३ ॥ मनः संकल्परहितांस्त्रीन्गृहान्पञ्च सप्त वा। मधुमक्षिकवत्कृत्वा माधूकरमिति स्मृतम् ॥ ८४ ॥ मन में किसी भी तरह का संकल्प किये बिना किन्हीं तीन, पाँच अथवा सात घरों में से मधुमक्खी के सदृश थोड़ी-थोड़ी भिक्षा ग्रहण करना असंकल्पित माधूकर है ॥ ८४ ॥ प्रातःकाले च पूर्वेद्युर्भक्तैः प्रार्थितं मुहुः। तद्भैक्षं प्राक्प्रणीतं स्यात्स्थितिं कुर्यात्तथापि वा ॥८५ प्रातःकाल अथवा पिछले दिन कोई भी मनुष्य भक्तिपूर्वक भिक्षा के लिए निवेदन करे, तो उसके यहाँ जो भिक्षा ग्रहण की जाती है, उसे प्राक्प्रणीत भिक्षा कहते हैं ॥ ८५ ॥ भिक्षाटनसमुद्योगाद्येन केन निमन्त्रितम्। अयाचितं तु तद्भैक्षं भोक्तव्यं च मुमुक्षुभिः ॥ ८६ ॥ भिक्षा के लिए विचरण करते समय संन्यासी को यदि कोई (व्यक्ति) निमंत्रित करे, तो उस (व्यक्ति) के यहाँ (अयाचित) भिक्षा ग्रहण कर लेना चाहिए ॥ ८६ ॥
३१६ संन्यासोपनिषद् उपस्थानेन यत्प्रोक्तं भिक्षार्थं ब्राह्मणेन तत्। तात्कालिकमिति ख्यातं भोक्तव्यं यतिभिः सदा॥ सिद्धमन्नं यदा नीतं ब्राह्मणेन मठं प्रति। उपपन्नमिति प्राहुर्मुनयो मोक्षकाङ्क्षिणः॥८८॥ भिक्षा के लिए निकलते समय (संन्यासी को) यदि कोई ब्राह्मण उसके समीप में आकर भोजन करने को कहे, तो उस 'तात्कालिक' भिक्षा को सदा ही स्वीकार कर सकता है। यदि कोई ब्राह्मण मठ (आश्रम) में सिद्ध (तैयार) करके भोजन ले आये, तो उसे साधु 'उपपन्न' भिक्षा कहते हैं॥८७-८८॥ चरेन्माधुकरं भैक्षं यतिम्लेच्छकुलादपि। एकान्नं नतु भुञ्जीत बृहस्पतिसमादपि। याचितायाचि- ताभ्यां च भिक्षाभ्यां कल्पयेत्स्थितम्॥८९॥ यदि संन्यासी को भिक्षा को विशेष आवश्यकता पड़ जाये, तो उसे म्लेच्छ के यहाँ से भी भिक्षा माँग लेनी चाहिए; परन्तु कभी भी एक ही स्थान से आहार स्वीकार नहीं करना चाहिए। चाहे वह बृहस्पति के सदृश पूज्य का ही घर क्यों न हो? संन्यासी को सर्वदा 'याचित' अथवा 'अयाचित' भिक्षा के द्वारा निर्वाह करना सर्वथा उचित है॥८९॥ न वायुः स्पर्शदोषेण नाग्निर्दहनकर्मणा। नापो मूत्रपुरीषाभ्यां नान्नदोषेण मस्करी॥९०॥ वायु हर किसी को स्पर्श करता है, अग्नि सभी को जलाता है, जल में सभी तरह के मल-मूत्रादि डाल दिये जाते हैं, फिर भी ये सभी इन दोषों के स्पर्श से प्रदूषित नहीं होते। इसी तरह संन्यासी भी किन्हीं अन्य दोषों से दूषित नहीं होता॥९०॥ विधूमे सन्नमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने। कालेऽपराह्ने भूयिष्ठे भिक्षाचरणमाचरेत्॥९१॥ अग्नि-धूम्र एवं मूसल के शब्द से रहित, जिस जगह पर अग्नि बुझकर समाप्त हो चुकी हो तथा उपस्थित सभी लोग भोजन कर चुके हों, वहाँ पर ही योगी को मध्याह्न काल के पश्चात् भिक्षा ग्रहण करनी चाहिए॥९१॥ अभिशस्तं च पतितं पाषण्डं देवपूजकम्। वर्जयित्वा चरेद्भैक्षं सर्ववर्णेषु चापदि॥९२॥ आपत्ति कालीन स्थिति में संन्यासी निन्दनीय परिवार, पतित एवं पाखण्डी-पदच्युत का परित्याग करके समस्त वर्ण-जातियों के यहाँ से भिक्षा प्राप्त कर सकता है॥९२॥ घृतं श्वमूत्रसदृशं मधु स्यात्सुरया समम्। तैलं सूकरमूत्रं स्यात्सूपं लशुनसंमितम्॥ माषापूपादि गोमांसं क्षीरं मूत्रसमं भवेत्। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन घृतादीन्वर्जयेद्यतिः॥९३-९४॥ संन्यासी के लिए घृत कुत्ते के मूत्र के सदृश है, शहद मदिरा पान के समान है, तेल शूकर के मूत्र के समतुल्य है, लहसुन युक्त पदार्थ एवं उड़द, अपूप (मालपुआ) आदि के पदार्थ गोमांस के सदृश हैं, दूध मूत्र के सदृश है, अतः संन्यासी को सर्वदा घृत आदि से विहीन भिक्षा ही प्रयत्नपूर्वक स्वीकार करनी चाहिए॥ घृतसूपादिसंयुक्तमन्नं नाद्यात्कदाचन। पात्रमस्य भवेत्पाणिस्तेन नित्यं स्थितिं नयेत्। पाणिपात्रश्चरन्योगी नासकृद्भैक्षमाचरेत्॥९५॥ आस्येन तु यदाहारं गोवन्मृगयते मुनिः। तदा समः स्यात्सर्वेषु सोऽमृतत्वाय कल्पते॥९६॥ घृत एवं सूपादि (चटनी, मिर्च-मसाला आदि) से युक्त पकवान को कभी ग्रहण नहीं करना चाहिए। संन्यासी के लिए उसका हाथ भोजन ग्रहण करने का पात्र है। उस हाथ रूपी पात्र में सर्वदा भिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। इस प्रकार संन्यासी को दिन में एक ही बार भोजन ग्रहण करना चाहिए। दो बार भोजन कदापि न करे। जो मुनि गौ की भाँति केवल मुख से आहार ग्रहण करता है, (संचित नहीं करता) वह सभी में समभाव प्राप्त करके अमृतत्व को प्राप्त कर लेता है॥९५-९६॥
अध्याय २ मन्त्र १०३ ३१७
अध्याय २ मन्त्र १०३ ३१७ आज्यं रुधिरमिव त्यजेदेकत्रान्नं पललमिव गन्धलेपनमशुद्धलेपनमिव क्षारमन्त्यजमिव वस्त्रमुच्छिष्टपात्रमिवाभ्यङ्गं स्त्रीसङ्गमिव मित्राह्लादकं मूत्रमिव स्पृहां गोमांसमिव ज्ञातचरदेशं चण्डालवाटिकामिव स्त्रियमहिमिव सुवर्णं कालकूटमिव सभास्थलं श्मशानस्थलमिव राज- धानीं कुम्भीपाकमिव शवपिण्डवदेकत्रान्नं न देवतार्चनम्। प्रपञ्चवृत्तिं परित्यज्य जीवन्मुक्तो भवेत्॥ ९७॥ घृत (आज्य) को रुधिर के समान तथा इकट्ठा किये हुए अन्न को मांस की भाँति त्याग देना चाहिए। गन्ध एवं लेपन को गन्दी वस्तु के समान, नमक को अन्त्यज के समान, वस्त्र को जूठे पात्र के सदृश, तेल मालिश को स्त्री प्रसंग की भाँति, मित्रों की हँसी-मजाक को मूत्र के समान, घमण्ड को गौ-मांस के समान, परिचित-मित्रों के घर की भिक्षा को चण्डाल के सदृश, स्त्री को सर्पिणी के समान, सुवर्ण (सोने) को कालकूट के समान, सभा आदि को श्मशानवत्, राजधानी को कुम्भीपाक नरक के समान, एक ही घर के भोजन को मृतक-पिण्ड के समान जानकर इनका परित्याग कर देना चाहिए। देवताओं का पूजन-अर्चन कभी न करे। सांसारिक प्रपञ्चों को त्यागकर उसे जीवन्मुक्त बनना चाहिए॥ ९७॥ आसनं पात्रलोपश्च संचयः शिष्यसंचयः। दिवास्वापो वृथालापो यतेर्बन्धकराणि षट् ॥ ९८ ॥ आसन, पात्रलोप (बर्तन की चाह), सञ्चय, शिष्य बनाना, दिन में शयन करना तथा बेकार की बातें करना इत्यादि ये छः प्रकार के कार्य संन्यासी को बन्धन में डालने वाले हैं ॥ ९८ ॥ वर्षाभ्योऽन्यत्र यत्स्थानमासनं तदुदाहृतम्। उक्तालाब्वादिपात्राणामेकस्यापीह संग्रहः ॥ ९९ ॥ यतेः संव्यवहाराय पात्रलोपः स उच्यते। गृहीतस्य तु दण्डादेर्द्वितीयस्य परिग्रहः ॥ १०० ॥ वर्षा (पानी) के अलावा जो स्थान है, उसे आसन कहा जाता है। कहे हुए पात्रों के संग्रह में से एक ही तुम्बी आदि पात्र को ग्रहण करना चाहिए। संन्यासी के व्यवहार के लिए जो तुम्बी आदि पात्र कहे गये हैं, उनके खो जाने पर दूसरे के पात्रों को ले लेना ही पात्र-लोप है। अपना दण्ड खो जाने पर दूसरे का दण्ड ग्रहण कर लेना ही परिग्रह है ॥ ९९-१०० ॥ कालान्तरोपभोगार्थं संचयः परिकीर्तितः। शुश्रूषालाभपूजार्थं यशोऽर्थं वा परिग्रहः ॥ १०१ ॥ कालान्तर (भविष्य) में भोगार्थ के लिए संग्रह करके रखना ही सञ्चय कहा जाता है। शुश्रूषा लाभ, पूजा एवं यश के लिए चेष्टा करना भी परिग्रह है ॥ १०१ ॥ शिष्याणां नतु कारुण्याच्छिष्यसंग्रह ईरितः। विद्या दिवा प्रकाशत्वादविद्या रात्रिरुच्यते ॥१०२॥ (जो शिष्य) आत्मकल्याण के लिए करुणा से युक्त होकर आये, उसे ही शिष्य बनाये। उसके अतिरिक्त अन्य किसी को शिष्य बनाना ही शिष्य संग्रह कहा जाता है। संन्यास में विद्या को दिन और अविद्या को रात्रि जाना जाता है ॥ १०२ ॥ विद्याभ्यासे प्रमादो यः स दिवास्वाप उच्यते। आध्यात्मिकीं कथां मुक्त्वा भिक्षावार्तां विना तथा। अनुग्रहं परिप्रश्नं वृथाजल्पोऽन्य उच्यते ॥ १०३ ॥ इस कारण से विद्या के अभ्यास में प्रमाद बरतना दिन में शयन करना कहा जाता है। आध्यात्मिक कथा को छोड़कर भिक्षा की बात, अनुग्रह-परिप्रश्न (का उत्तर देने) के अतिरिक्त और जो बात की जाये, वह बेकार का बोला जाना समझा जाता है ॥ १०३ ॥