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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished572 pages

द्वितीय अध्याय ] [ २६७

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द्वितीय अध्याय ] [ २६७ अथ वागीश्वरीधाम शिरो वस्त्रेण वेष्टयेत् । शनैरुत्कर्षयेद्योगी कालवेलाविधानवित् ॥३२ पुनः षाण्मासमात्रेण नित्यं संघर्षणान्मुने । भ्रू मध्यावधि चाप्येति तियक्कर्णबिलावधि ॥३३ अधश्च चुबुकं मूलं प्रयाति क्रम चारिता । पुनः संवत्सराणां तु तृतीयादेव लीलया ॥३५ केशान्तमूर्ध्वं क्रमति तिर्यक्शाखाऽवधिर्मुने । अधस्तात्कण्ठकूपान्तं पुनर्वर्षत्रयेण तु ॥३५ ब्रह्मरन्ध्रं समावृत्य तिष्ठेदेव न संशयः । तिर्यक् चूलितलं याति अधः कण्ठबिलावधि ॥३६ इस क्रम से निरन्तर प्रयत्न करते रहने से जीभ का तालू के साथ वाला बन्धन कट जायगा ॥ ३१ ॥ तब जीभ के अग्रभाग को कपड़े से लपेट कर धीरे-धीरे दोहन करे ( बाहर की तरफ खींचे ) । इस प्रकार छः मास तक अभ्यास करने से जीभ बढ़कर भौंहों के मध्य तक पहुँचने लगेगी और बगल में कान के छेद तक पहुंचने लगती है । बाहर की तरफ जीभ थोड़ी तक पहुंच जाती है । जब इस अभ्यास को बराबर किया जाय तो तीसरे वर्ष में जीभ बालों तक पहुंच जाती है और बगल में कन्धे तक तथा नीचे कण्ठकूप तक पहुंचने लगती है । आगामी तीन वर्ष के अभ्यास से जीभ ब्रह्मरन्ध्र तक पहुंचकर उसे ढक लेगी इसमें संशय नहीं । तब वह गर्दन के पीछे तक और नीचे कण्ठ के अन्त तक पहुँच जायगी ॥ ३२-३६ ॥ शनैः शनैर्मस्तकाच्च महावज्रकवाटभित् । पूर्वं बीजयुता विद्या ह्याख्याता याति दुर्लभाम् ॥३७ तस्याः षडङ्गं कुर्वीत तया षट्स्वरभिन्नया । कुर्यादिकं करन्यासं सर्वसिद्धिप्रदिहेतवे ॥३८

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२६८ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् शनैरेवं प्रकर्तव्यमभ्यासं युगपन्न हि । युगपद्वर्तते यस्य शरीरं विलयं व्रजेत् ॥३९ तस्माच्छनैः शनैः कार्यमभ्यासं मुनिपुंगव । यदा च बाह्यमार्गेण जिह्वा ब्रह्मबिलं व्रजेत् ॥४० तदा ब्रह्मार्गलं ब्रह्मन्दुर्भेदं त्रिदशैरपि । अंगुल्यग्रेण संधृष्य जिह्वामात्र निवेशयेत् ॥४१ धीरे-धीरे जिह्वा ब्रह्मरन्ध्र को भेद जाती है। यह समस्त बीजाक्षर की विधि सहित विद्या बड़ी ही कठिन है। इस पूर्वोक्त छःओं बीजाक्षरों से षडंगन्यास और करन्यास करना चाहिये तब सम्पूर्ण सिद्धि सम्भव होती है ॥ ३७--३८ ॥ इस प्रकार का अभ्यास बहुत सावधानी से क्रमशः धीरे-धीरे करना चाहिये । जल्दी करने से शरीर की हानि होना सम्भव है । इसीलिए इन अभ्यास में कभी जल्दी नहीं करनी चाहिये । जब बाहर के मार्ग से जीभ ब्रह्म विवर के भीतर जाने लगे तो उसे अँगुली से उठाकर उसके भीतर करदे ॥ ४०-४१ ॥ एवं वर्षत्रयं कृत्वा ब्रह्मद्वारं प्रविश्यति । ब्रह्मद्वारे प्रविष्टे तु सम्यङ्मथनमाचरेत् ॥४२ मथनेन विना केचित्साधयन्ति विपश्चितः । खेचरीमन्त्रसिद्धस्य सिध्यते मथनं विना ॥३३ जपं न मथनं चैव कृत्वा शीघ्रं फलं लभेत् । स्वर्णजां रौप्यजां वाऽपि लोहजां वा शलाकिकाम् ॥४४ नियोज्य नासिकारन्ध्रं दुग्धसिक्तेन तन्तुना । प्राणान्निरुध्य हृदये सुखमासनमात्सनः ॥४५ शनैः सुमथनं कुर्याद्भ्रू मध्ये न्यस्तचक्षुषि । षाण्मासान्मथवात्कस्य भवेनेव प्रजायते ॥४६

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द्वितीय अध्याय ]            [ २६१ यथा सुषुप्तिर्बालानां यथा भावस्तथा भवेत् । न सदा मथनं शस्तं मासे समाचरेत् ॥४७ सदा रसनया योगी मार्गं न परिसंक्रमेत् । एवं द्वादशवर्षान्ते संसिद्धिर्भवति ध्रुवं ॥४८ शरीरे सकलं विश्वं पश्यत्यात्माविभेदतः । ब्रह्माण्डोऽयं महामार्गो राजदन्तोर्ध्वकुण्डली ॥४९ इति ॥ इस प्रकार तीन वर्ष तक करने से जीभ ब्रह्म द्वार में प्रवेश कर जायगी । जब वह प्रवेश कर जाय तब उसका विधिपूर्वक मंथन आरम्भ करना चाहिए ॥ ४२ ॥ कोई साधक बिना मन्थन के ही खेचरी करते हैं । जिनको खेचरी मन्त्र सिद्ध हो चुका है वे ऐसा कर सकते हैं ॥ ४३ ॥ तो भी जप और मन्थन दोनों करने से फल शीघ्र प्राप्त होता है । मन्थन के लिये सुवर्ण, चाँदी अथवा लोहे की शलाका के सिरे पर दुग्धयुक्त तन्तु लगाकर उसे नाक के भीतर डाले । फिर प्राण को हृदय में निरोध करके सुखासन पर बैठकर, आंखों को भ्रुकुटी स्थान में लगाकर धीरे-धीरे मन्थन करे । छः मास तक इस प्रकार मन्थन करने से उसका प्रभाव दिखलाई पड़ने लगता है ॥ ४४-४६ ॥ तब उसकी अवस्था इस प्रकार की होती है जैसी बालक की सुषुप्ति अवस्था में । मन्थन नित्य नहीं करना चाहिये वरन् महीने में एक बार करना होता है । इसी प्रकार जिह्वा को बार-बार ब्रह्मारन्ध्र में प्रविष्ट न करे । इस प्रकार बारह वर्ष अभ्यास करने पर सिद्धि निश्चित रूप से होती है ॥ ४७-४८ ॥ उस समय योगी करने समस्त विश्व अपने भीतर दिखाई देने लगता है, क्योंकि जीभ के ब्रह्मारन्ध्र तक जाने के मार्ग में ही ब्रह्माण्ड की स्थिति है ॥ ४६ ॥ ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥

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२७० ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ योगकुण्डल्युपनिषत् तृतीयोऽध्यायः ह्रीं भं सं मं पं सं क्षम् पद्मज उवाच— अमावस्या च प्रतिपत्पौर्णमासी च शंकर । अस्याः का वर्ण्यते संज्ञा एतदाख्याहि तत्त्वतः ॥१॥ प्रतिपद्दिनतोऽकाले अमावस्या तथैव च । पौर्णमास्यां स्थिरीकुर्यात्स च पन्था हि नान्यथा ॥२ कामेन विषयाकाङ्क्षी विषयात्काममोहितः । द्वावेव संत्यजेन्नित्यं निरञ्जनमुपाश्रयेत् ॥३ अपरं सत्यजेत्सर्वं यदिच्छेदात्मनो हितम् । शक्तिमध्ये मनः कृत्वा मनः शक्तेश्च मध्यगम् ॥४ मनसा मन आलोक्य तत्यजेत्परमं पदम् । मन एव हि बिन्दुश्च उत्पत्तिस्थितिकारणम् ॥५ ब्रह्माजी बोले—मेलन मन्त्र इस प्रकार है—"ह्रीं भं सं मं पं सं क्षम् । हे शंकर ! अमावस्या, प्रतिपदा और पौर्णमासी का मूल आशय क्या है ? ॥ १ ॥ प्रतिपदा से सूर्य का आशय है और पौर्णमासी से चन्द्रमा का । अमावस्या का अर्थ सूर्य और चन्द्र दोनों का अभाव है ॥ २ ॥ मनुष्य कामनाओं में ग्रसित होकर विषयाकांक्षी होता है और विषय में पड़कर कामना बढ़ती जाती है । इसलिए शुद्ध परमात्म भाव की प्राप्ति के लिए विषय और कामना दोनों का त्याग करना और आत्मा में ध्यान लगाना ही आवश्यक है ॥ ३ ॥ जो अपने हित की इच्छा रखता हो उसे अन्य सब मिथ्या विषयों को त्याग देना चाहिए और शक्ति में प्रवेश करके उसी में स्थित रहना चाहिए ॥ ४ ॥ मन द्वारा मन को देखकर और समझकर उसका त्याग करना ही परमपद है । उत्पत्ति और स्थिति का प्रधान बिन्दु मन ही है ॥ ५ ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

तृतीय अध्याय ] [ २७१

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तृतीय अध्याय ] [ २७१ मनसोत्पद्यते बिन्दुर्यथा क्षीरं घृतात्मकम् । न च बन्धनमध्यस्थं तद्वै कारणमानसम् ॥६ चन्द्रार्कमध्यमा शक्तिर्यत्रस्था तत्र बन्धनम् । ज्ञात्वा सुषुम्ना तद्भेदं कृत्वा वायुं च मध्यगम् ॥७ स्थित्वाऽसौ बैन्दवस्थाने घ्राणरन्ध्रे निरोधयेत् । वायुं बिन्दुं समाख्यातं सत्वं प्रकृ तिमेव च ॥८ षट् चक्राणि परिज्ञात्वा प्रविशेत्सुखमण्डलम् । मूलाधारं स्वाधिष्ठानं मणिपूरं तृतीयकम् ॥६ अनाहतं विशुद्धिं च आज्ञाचक्रं च षष्ठकम् । आधारं गुदमित्युक्तं स्वाधिष्ठानं तु लैङ्गिकम् ॥१० मणिपूरं नाभिदेशं हृदयस्थमनाहतम् । विशुद्धिः कण्ठमूले च आज्ञाचक्रं च मस्तकम् ॥११ यह बिन्दु मन से ही उत्पन्न होता है, जैसे दूध से घी प्रकट होता है। उस बिन्दु में कोई बन्धन नहीं है, वरन् जो कुछ बन्धन है वह सब मन का ही है ॥ ६॥ सूर्य और चन्द्र के मध्य में जो शक्ति रहती है वही बन्धन रूप है। इसलिये इन दोनों के मध्य की सुषुम्ना का ज्ञान प्राप्त करके उसके भीतर प्राण को चलाना आवश्यक है ॥ ७॥ प्राण को इसी बिन्दु स्थान में स्थिर करके नासिका से वायु का निरोध करना चाहिये। यही प्राणवायु, बिन्दु, सत्व और प्रकृति का वर्णन है ॥ ८ ॥ इसके साथ ही षट्चक्रों की जानकारी भी प्राप्त करनी चाहिये जिससे सुख की स्थिति प्राप्त हो सके । ये षट्चक्र इस प्रकार है—मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा। मूलाधार का स्थान गुदा है, उसके ऊपर लिङ्ग के समीप स्वाधिष्ठान है, मणिपुर नाभि में है, अनाहत हृदय में, विशुद्ध कण्ठ में और आज्ञा-चक्र मस्तक में होता है ॥ ६-११ ॥

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२७२ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् षट् चक्राणि परिज्ञात्वा प्रविशेत्सुखमण्डले । प्रविशेद्व वायुमाकृष्य तयैवोर्ध्वं नियोजयेत् ॥१२ एवं समभ्यसेद्वायुं स ब्रह्माण्डमयो भवेत् । वायुं बिन्दुं तथा चक्रं चित्तं चैव समभ्यसेत् ॥१३ समाधिमेकेन समममृतं यान्ति योगिनः । यथाऽग्निर्दारुमध्यस्थो नोत्तिष्ठेन्मथनं विना ॥१४ विना चाभ्यासयोगेन ज्ञानदीपस्तथा न हि । घटमध्यगतो दीपो बाह्ये नैव प्रकाशते ॥१५ भिन्ने तस्मिन्घटे चैव दीपज्वाला च भासते । स्वकायं घटमित्युक्तं यथा दीपो हि तत्पदम् ॥१६ गुरुवाक्यसमा भिन्ने ब्रह्मज्ञानं स्फुटीभवेत् । कर्णधारं गुरुं प्राप्य कृत्वा सूक्ष्मं तरन्ति च ॥१७ इन समस्त चक्रों का ज्ञान प्राप्त करके सुख मण्डल रूप सहस्र दल कमल में प्रवेश करे और प्राण को ऊर्ध्व भाग में खींचकर स्थित करे ॥ १२ ॥ इस प्रकार प्राण का अभ्यास करने से ब्रह्माण्ड में स्थित हो जाती है । प्राणवायु, बिन्दु, चक्र तथा चित्त का उचित रूप से अभ्यास करके योगीजन एक्य रूप की समाधि तक पहुँच जाते हैं, और अमृत पद को प्राप्त होते हैं । जिस प्रकार काष्ठ में अग्नि रहती है, पर घिसने के बिना वह प्रकट नहीं होती, उसी प्रकार सतत अभ्यास के बिना योग विद्या का दीपक भी प्रकाशित नहीं होता । अथवा जिस प्रकार घड़े के भीतर रखा हुआ दीपक बाहर प्रकाश नहीं कर सकता जब तक कि उस घड़े का भेदन न किया जाय, उसी प्रकार शरीर रूपी घट के भीतर रखे हुये ब्रह्मरूपी दीप का प्रकाश भी उस समय तक बाहर नहीं निकलता जब तक गुरु के उपदेश से इस घट का भेदन नहीं होता । इस प्रकार इस अपार सागर को पार करने का उपाय गुरु रूपी कर्णधार ही है ॥ १३-१७ ॥

तृतीय अध्याय ] [ २७३

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तृतीय अध्याय ] [ २७३ अभ्यासवासनाशक्त्या तरन्ति भवसागरम् । परायामंकुरी भूय पश्यन्त्यां द्विदलीकृता ॥१८ मध्यमायां मुकुलिता वैखर्यां विकसीकृता । पूर्वं यथोदिता या वाग्विलोमेनास्तगा भवेत् ॥१९ तस्या वाचः परो देवः कटस्थो वाक्प्रबोधकः । सोऽहमस्मीति निश्चित्य यः सदा वर्तते पुमान् ॥२० शब्दंरुच्चावचैर्नीचैर्भाषितोऽपि न लिप्यते । विश्वश्च तैजसश्चैव प्राज्ञश्चेति च ते त्रयः ॥२१ विराड्ढिरण्यगर्भश्च ईश्वरश्चेति ते त्रयः । ब्रह्माण्डं चैव पिण्डाण्डं लोका भूरादयः क्रमात् ॥२२ स्वस्वोपाधिलयादेव लीयन्ते प्रत्यगात्मनि । अण्डं ज्ञानाग्निना तप्तं लीयये कारणैः सह ॥२३ अभ्यास और श्रेष्ठ वासना की शक्ति द्वारा ही वे इस भव सागर को तैर कर पार करने में समर्थ होते हैं। वाणी परा में अंकुरित होती है, पश्यन्ती में उसके दो भाग होते हैं, मध्यमा में पुष्पित होती है और बैखरी में विकास को प्राप्त हो जाती है। इस विधि से जिस प्रकार वाणी का आविर्भाव होता है, उसके विलोम-क्रम से ही वह लय हो जाती है ॥ १८-१९ ॥ इस वाणी का बोध कराने वाला अथवा परमदेव मैं ही हूँ, इस प्रकार निश्चय करके जो व्यक्ति तदनुसार व्यवहार करता है ॥ २० ॥ उससे कोई उच्च या नीच कैसा भी शब्द कहे, पर वह उसमें लिप्त नहीं होता । विश्व, तैजस और प्राज्ञ—ये तीन पिण्डक तथा विराट्, हिरण्यगर्भ और ईश्वर—ये तीन ब्रह्माण्ड के और भूः, भुवः स्वः—ये तीन लोक के भेद हैं, जो अपनी उपाधि के लय होने पर प्रत्यगात्मा में लीन हो जाते हैं । ज्ञानाग्नि से तप्त होने पर ब्रह्माण्ड भी अपने मूल रूप में विलीन हो जाता है ॥ २१-२३ ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

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CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [योगकुण्डल्युपनिषद् परमात्मनि लीनं तत्परं ब्रह्मव जायते । ततः स्तिमितगम्भीरं न तेजो न तमस्ततम् ॥२४ अनाख्यमनभिव्यक्तं सत्किंचिदवशिष्यते । ध्यात्वा मध्यस्थमात्मानं कलशान्तरदीपवत् ॥२५ अङ्गुष्ठमात्रमात्मानमधूमज्योतिरूपकम् । प्रकाशयन्तमन्तस्स्थं ध्यायेत्कूटस्थमव्ययम् ॥२६ विज्ञानात्मा तथा देहे जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिः । मायया मोहितः पश्चाद्बहुजन्मन्तरे पुनः ॥२७ सत्कर्मपरिपाकात्तु स्वविकारं चिकीर्षति । कोऽहं कथमयं दोष संसाराख्य उपागतः ॥२८ जाग्रत्स्वप्ने व्यवहरन्त्सुषुप्तौ क्व गतिर्मम । इति चिन्तापरो भूत्वा स्वभासा च विशेषतः ॥२९ अज्ञानात्तु चिदाभासो बहिस्तापेन तापितः । दग्धं भवत्येव तदा तूलपिण्डमिवाग्निना ॥३० परमात्मा में मिल जाने से वह ब्रह्मरूप हो जाता है । उस समय एक ऐसा अगाध और गम्भीर रूप हो जाता है जो न प्रकाश कहा जा सकता है न अन्धकार । तब केवल सत्स्वरूप एक अव्यक्त तत्व ही शेष रहता है। जैसे घट के भीतर दीपक की ज्योति रहती है ऐसी ही एक निर्धूम ज्योति अपने अन्तःकरण में प्रकाशित होती रहती है । इसी स्वरूप में उस कूटस्थ अव्यय रूप का ध्यान करना चाहिए ॥ २४-२६ ॥ आत्मा अपने मूल रूप में विज्ञानमय होता है, पर देह में आकर वह मायावश, जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति अवस्थाओं को प्राप्त होकर विमोहित हो जाता है । कितने ही जन्मों के पश्चात् जब शुभ कर्म उदय होते हैं तब उसके भीतर अपने विकारों को जानने की इच्छा उत्पन्न होती है कि मैं वास्तव में कौन हूँ और Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

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तृतीय अध्याय २७५

यह दोषमय संसार कहाँ से आ गया है ? ॥ २७-२८ ॥ जाग्रत और स्वप्न अवस्था में तो मैं अपने को कर्ता समझ कर व्यवहार करता हूँ, पर सुषुप्ति में मेरी क्या अवस्था होती है ? इस प्रकार चिन्ता करता हुआ वह अपने आभास रूप पर विचार करता है ॥ २९ ॥ रुई का ढेर जैसे आग से जलने लगता है, वैसे ही चिदाभास अज्ञान में पड़ कर सांसारिक ताप से नष्ट हो जाता है ॥ ३० ॥

दहरस्थः प्रत्यगात्मा नष्टे ज्ञाने ततः परम् । विततो व्याप्य विज्ञानं दहत्येव क्षणेन तु ॥३१॥ मनोमयज्ञानमयान् सम्यग्दग्ध्वा क्रमेण तु । घटस्थदीपवच्छश्वदन्तरेव प्रकाशते ॥३२॥ ध्यायन्नास्ते मुनिश्चैवमा सुप्तेरा मृतेस्तु यः । जीवन्मुक्तः स विज्ञेयः स धन्यः कृतकृत्यवान् ॥३३॥ जीवन्मुक्तपदं त्यक्त्वा स्वदेहे कालसात्कृते । विशत्यदेहमुक्तत्वं पवनोऽस्पन्दतामिव ॥३४॥ अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् । अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं तदेव शिष्यत्यमलं निरामयम् ॥३५॥ इत्युपनिषत् ॥

इस प्रकार सांसारिक ज्ञान के मिटाने पर प्रत्यगात्मा विस्तार को प्राप्त होकर विज्ञान का भी नाश कर देता है। इस प्रकार मनो- मय और विज्ञानमय के पूर्णतः मिल जाने पर शाश्वत प्रकाश के समान आत्मा ही अन्तर में प्रकाशित होता रहता है ॥ ३१-३२ ॥ जो आत्म- ज्ञानी ऐसी आत्मा का नित्य प्रति ध्यान करता रहता है और मृत्यु के

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२७६ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् समय भी उस ध्यान को स्थिर रखता है, वह जीवन्मुक्त ही है, वह धन्य है और कृतकृत्य है ॥ ३३ ॥ जब उसका अन्तिम समय आ जाता है तब वह जीवन्मुक्त से विदेहमुक्त पद को प्राप्त हो जाता है, उसका अन्त ऐसा ही होता है जैसे हवा का चलना बन्द हो जाता है ॥ ३४ ॥ जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, से रहित अर्थात् पञ्चभूतों से परे, नित्य और अव्यय है, जो आदि और अन्त से रहित है, जो महान और ध्रुव (अटल) है, वही शुद्ध और अविकारी ब्रह्म अन्त में शेष रहता है ॥ ३५ ॥ ॥ योगकुण्डली उपनिषद् समाप्त ॥ —:०:—

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CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ध्यानबिन्दूपनिषत् ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सहवीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। ब्रह्म हम दोनों की रक्षा करे, वह हम दोनों का पालन करे, हम दोनों एक साथ सामर्थ्य को प्राप्त हों, हमारा अध्ययन तेजस्वी हो, हम परस्पर द्वेष न करे। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। यदि शैलसमं पापं विस्तीर्णं बहुयोजनम्। भिद्यते ध्यानयोगेन नान्यो भेदः कदाचन ॥१॥ बीजाक्षरं परं बिन्दु नादं तस्योपरि स्थितम्। सशब्दचाक्षरे क्षीणे निशब्दं परमं पदम् ॥२॥ अनाहतं तु यच्छब्दं तस्य शब्दस्य यत्परम्। तत्परं विन्दते यस्तु स योगी छिन्नसंशयः ॥३॥ वालाग्रशतसाहस्रं तस्य भागस्य भागिनः। तस्य भागस्य भागार्धं तत्क्षये तु निरञ्जनम् ॥४॥ पुष्पमध्ये यथा गन्धः पयोमध्ये यथा घृतम्। तिलमध्ये यथा तैलं पाषाणेष्विव काञ्चनम् ॥५॥ एवं सर्वाणि भूतानि मणौ सूत्र इवात्मनि। स्थिरबुद्धिरसमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥६॥ यदि पर्वत के समान अनेक योजन विस्तार वाले पाप भी हों, तो भी वे ध्यान योग से नष्ट हो जाते हैं, इसके अतिरिक्त और किसी तरह उनका नाश नहीं होता ॥ १॥ बीजाक्षर परम बिन्दु है और उसके ऊपर नाद की स्थिति है। जब वह नाद (शब्द) अक्षर में Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

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२७८ ] [ ध्यानबिन्दूपनिषत् लय हो जाता है तब शब्द रहित परमपद का रूप होता है ॥ २ ॥ अनाहत शब्द से भी परे जो शब्द है, उसके पाने से ही योगी के संशय की निवृत्ति होती है ॥ ३ ॥ केशाग्र के सौवें भाग का हजारवां भाग और उसका आधे का भाग, उसका भी क्षय हो जाने पर निरंजन होता है ॥ ४ ॥ जिस प्रकार फूलों में गन्ध रहती है, दूध में घी रहता है, तिल में तेल और पाषाण में सोना होता है, जिस प्रकार माला के दाने सूत में पिरोये रहते हैं, उसी प्रकार सब भूत निरंजन में व्याप्त हैं। स्थिर बुद्धि वाला ज्ञानी मोह रहित होकर ऐसे ब्रह्म क ा ज्ञान प्राप्त करके उसमें स्थिर रहता है ॥ ५-६ ॥ तिलानां तु यथा तैल पुष्पे गन्ध इवाश्रितः । पुरुषस्य शरीरे तु सबाह्याभ्यान्तरे स्थितः ॥७ वृक्षं तु सकलं विद्याच्छाया तस्यैव निष्कला । सकले निष्कले भावे सर्वत्रात्मा व्यवस्थितः ॥८ ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ध्येयं सर्वं मुमुक्षुभिः । पृथिव्याग्निश्च ऋग्वेदो भूरित्येव पितामहः ॥९ अकारे तु लयं प्राप्ते प्रथमे प्रणवांशके । अन्तरिक्ष यजुर्वायुर्भुवो विष्णुर्जनार्दनः ॥१० उकारे तु लयं प्राप्ते द्वितीये प्रणवांशके । द्यौः सूर्यः सामवेदश्च स्वरित्येव महेश्वरः ॥११ मकारे तु लयं प्राप्ते तृतीये प्राणवांशके । अकारः पीतवर्णः स्याद्रजोगुण उदीरितः ॥१२ उकारः सात्त्विकः शुक्लो मकारः कृष्णतामसः । अष्टाङ्गं च चतुष्पादं त्रिस्थानं पञ्चदैवतम् ॥१३ जिस प्रकार तैल का आश्रय तिल : का आश्रय पुष्प है इसी प्रकार ब्रह्म पुरुष शरीर के भीतर और बाहर स्थित

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रहता है ॥ ७ ॥ वृक्ष को सम्पूर्ण जान लेने पर उसकी छाया निष्कल होती है, इसी प्रकार आत्मा सब कला रहित स्थान में स्थित रहता है ॥ ८ ॥ सब मोक्षाभिलाषी व्यक्ति ॐकार रूप एकाक्षर ब्रह्म का ही ध्यान करते हैं। इस प्रणव के प्रथम अंश ‘अ’कार में पृथिवी, अग्नि, ऋग्वेद, भूः तथा पितामह का लय होता है। दूसरे अंश ‘उ’कार में अन्तरिक्ष, यजुर्वेद, वायु, भुवः और विष्णु का लय होता है। तीसरे अंश ‘म’कार में द्यौ, सूर्य, सामवेद, स्वर्लोक और महेश्वर का लय होता है। ‘अ’कार पीले रङ्ग और रजोगुण वाला कहा जाता है, ‘उ’कार श्वेत वर्ण और सतोगुण वाला और ‘म’कार कृष्णवर्ण तथा तामस गुण वाला है। इस प्रकार ॐकार आठ अङ्ग, चार पद, तीन नेत्र और पाँच दैवत वाला होता है ॥ ९-१३ ॥

ओंकारं यो न जानाति ब्राह्मणो न भवेत्तु सः । प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते ॥१४ अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् । निवर्तन्ते क्रियाः सर्वास्तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥१५ ओंकारप्रभवा देवा ओंकारप्रभवाः स्वराः । ओंकारप्रभवं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥१६

ह्रस्वो दहति पापानि दीर्घः संपत्प्रदोऽव्ययः । अर्धमात्रासमायुक्तः प्रणवो मोक्षदायकः ॥१७ तैलधारामिवाच्छिन्नं दीर्घघण्टानिनादवत् । अवाच्यं प्रणवस्याग्रं यस्तं वेद स वेदवित् ॥१८ हृत्पद्मकर्णिकामध्ये स्थिरदीपनिभाकृतिम् । अंगुष्ठमात्रमचलं ध्यायेदोंकारमीश्वरम् ॥१९ इडया वायुमापूर्य पूरयित्वोदरस्थितम् । ओंकारं देहमध्यस्थं ध्यायेज्ज्यालावलीवृतम् ॥२०

इस प्रकार से ॐकार को जो नहीं जानता वह ब्राह्मण नहीं

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२८० ] [ ध्यानबिन्दूपनिषत् ब्रह्मा पूरक इत्युक्तो विष्णुः कुम्भक उच्यते । रेचा रुद्र इति प्रोक्तः प्राणायामस्य देवताः ॥२१ इस प्रकार से ॐकार को जो नहीं जानता वह ब्राह्मण नहीं माना जा सकता। यह प्रणव धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म लक्ष्य है। बाण से सावधानी के साथ तन्मय होकर इस लक्ष्य को बेध करने और 'अवर' को जान लेने से सब क्रियाओं से निवृत्ति हो जाती है ॥ १४-१५ ॥ ॐकार से देवता हुए, ॐकार से स्वर हुए और ॐकार से ही तीनों लोक के समस्त चराचर हुये ॥ १६ ॥ इसका ह्रस्व अंश पापों को हरता है, दीर्घ अव्यय स्वरूप सम्पत्ति को देता है, इस प्रकार अर्धमात्रा युक्त प्रणव मोक्षदायक है ॥ १७ ॥ तेल की अविच्छिन्न धार के समान, घण्टा के दीर्घ निनाद के समान नाद के अग्र में वाच्य रहित प्रणव है, उसे जानने वाला ही वेदज्ञ है ॥ १८ ॥ हृदयरूपी कमल की कर्णिका में दीपशिखा तुल्य, अंगुष्ठमात्र आकार के ॐकार रूप ईश्वर का ध्यान करे ॥ १६ ॥ इड़ा ( बांयी नासिका ) से वायु को उदर में भरे और देह के मध्य में ज्वालामय ॐकार का ध्यान करे। पूरक को ब्रह्मा और कुम्भक को विष्णु और रेचक को रुद्र कहा गया है, ये तीनों प्राणायाम के देवता हैं ॥ २०- २१ ॥ आत्मानमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् । ध्याननिर्मथनाभ्यासा देवं पश्येन्निगूढवत् ॥२२ ओंकारध्वनिनादेन वायोः संहरणांतिकम् । यावद्वलं समादध्यात्सम्यङ् नादलयावधि ॥२३ गमागमस्थं गमनादिशून्यमोंकारमेकं रविकोटिदीप्तम् । पश्यन्ति ये सर्वजनान्तरस्थं हंसात्मकं ते विरजा भवन्ति ॥२४

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ध्यानबिन्दूपनिषत् ] [ २८१ आत्मा को नीचे की अरणी के रूप में ग्रहण करके प्रणव को ऊपर की अरणी बनावे । इन दोनों के मंथन रूप ध्यानाभ्यास से गूढ़ तत्व का दर्शन करे ॥ २२ ॥ ॐकार की ध्वनि के नाद सहित रेचक का अन्त होने पर नाद का लय हो जाता है। इस प्रकार का ध्यान अपनी सामर्थ्य के अनुसार करे ॥ २३ ॥ गमनागमन में स्थित और गमनादि से शून्य ऐसे करोड़ों सूर्य की दीप्ति के सदृश्य, सबके हृदय में रहने वाले हंसात्मक ॐकार का जो दर्शन करते हैं वे निष्पाप हो जाते हैं ॥ २४ ॥ यन्मनस्त्रिजगत्सृष्टिस्थिति प्रलयकर्मकृत् । तन्मनो विलयं याति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥२५ अष्टपत्रं तु हृत्पद्मं द्वात्रिंशत्केसरान्वितम् । तस्य मध्यगतो भानुर्भानुमध्यगतः शशी ॥२६ शशिमध्यगतो वह्निर्वह्निमध्यगता प्रभा । प्रभामध्यगतं पीठं नानारत्नप्रवेष्टितम् ॥२७ तस्य मध्यगतं देवं वासुदेवं निरञ्जनम् । श्रीवत्सकौस्तुभोरस्कं मुक्तामणिविभूषितम् ॥ शुद्धस्फटिकसंकाशं चन्द्रकोटिसमप्रभम् । एवं ध्यायेन्महाविष्णुमेवं वा विनयान्वितः ॥२६ अतसीपुष्पसंकाशं नाभिस्थाने प्रतिष्ठितम् । चतुर्भुजं महाविष्णुं पूरकेण विचिन्तयेत् ॥३० सृष्टि, स्थिति और लय होने का कारण जो मन में है उसका जहाँ विलय होता है वहीं विष्णु का परमपद है ॥ २५ ॥ आठ दल और बत्तीस पंखुड़ियों का जो हृदय कमल है उसके मध्य में सूर्य और सूर्य के मध्य में चन्द्रमा स्थित है ॥ २६ ॥ चन्द्रमा के मध्य में

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CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri २८२ ] [ ध्यानबिन्दूपनिषत् अग्नि है और अग्नि के मध्य में प्रभा है, प्रभा के मध्य में नाना प्रकार के रत्नों से जड़ा पीठस्थान है, उसके मध्य में निरञ्जन भगवान् वासुदेव हैं, जो श्रीवत्स कौस्तुभमणि और मणि मुक्ताओं का धारण किये हुये हैं ॥ २७—२८ ॥ शुद्ध स्फटिक के समान, करोड़ों चन्द्रमा की-सी प्रभा वाले महाविष्णु का विनयावनत भाव से ध्यान करे ॥ २६ ॥ अलसी के पुष्प के समान नाभिस्थान में प्रतिष्ठित चार भुजा वाले महाविष्णु का पूरक करता हुआ ध्यान करे ॥ ३० ॥ कुम्भकेन हृदि स्थाने चिन्तयेत्कमलासनम् । ब्राह्माणं रत्नगौराभं चतुर्वक्त्रं पितामहम् ॥३१॥ रेचकेन तु विद्यात्मा ललाटस्थं त्रिलोचनम् । शुद्धस्फटिकसंकाशं निष्कलं पापनाशनम् ॥३२॥ अब्जपत्रमधःपुष्पमूर्ध्वनालमधोमुखम् । कदलीपुष्पसंकाशं सर्ववेदमयं शिवम् ॥३३॥ शताब्दं शतपत्राढ्यं विप्रकीर्णाब्जकर्णिकम् । तत्रार्कचन्द्रवह्नीनामुपर्युपरि चिन्तयेत् ॥३४॥ पद्मस्योद्घाटनं कृत्वा सूर्यचन्द्राग्निवर्चसः । तस्य हृद्वीजमाहृत्य आत्मानं चरते ध्रुवम् ॥३५॥ कुम्भक के समय हृदय स्थान पर कमलासन पर विराजमान लालिमायुक्त और गौर वर्ण वाले, चार मुँह वाले पितामह ब्रह्मा का ध्यान करे ॥ ३१ ॥ रेचक के समय ललाट स्थान में श्वेत स्फटिक के समान, निष्फल, पापनाशक त्रिलोचन भगवान शङ्कर का ध्यान करे ॥ ३२ ॥ कदली पुष्प के समान नीचे की तरफ फूल, ऊपर डण्डी, नीचे मुख, इस प्रकार सर्व वेदमय शिव हैं ॥ ३३ ॥ सौ आरे, सौ पत्ते और विस्तीर्ण पंखुड़ियों से युक्त हृदय-कमल पर सूर्य, चन्द्रमा

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CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ध्यानबिन्दूपनिषत् ] [ २८३ और अग्नि का एक के ऊपर एक करके दर्शन करे। कमल के विकसित होने से सूर्य, चन्द्र, अग्नि का बोध होता है। इनके बीज को ग्रहण करने से स्थिर आत्म-स्थिति प्राप्त होती है ॥ ३४-३५ ॥ त्रिस्थानं च त्रिमागं च त्रिब्रह्मा च त्रयाक्षरम् । त्रिमात्रमर्धमात्रं वा यस्तं वेद स वेदवित् ॥३६ तैलधारामिवाच्छिन्नं दीर्घघण्टानिनादवत् । अवाच्यं प्रणवस्याग्रं यस्तं वेद स वेदवित् ॥३७ यथै वोत्पलनालेन तोयमाकर्षयेन्नरः । तथै वोत्कर्षयेद्वायुं योगी योगपथे स्थितः ॥३८ अर्धमात्रात्मकं कृत्वा कोशभूतं तु पङ्कजम् । कर्षयेन्नालमात्रेण भ्रुवोर्मध्ये लयं नयेत् ॥३६ भ्रू मध्ये तु ललाटे तु नासिकायास्तु मूलतः । जानीयादमृतस्थानं तद्ब्रह्मायतनं महत् ॥४० तीन स्थान, तीन पात्र; तीन ब्रह्मा, तीन अक्षर, तीन मात्रा और अर्धमात्रा में जो इनको जानता है वह वेदज्ञ है ॥ ३३ ॥ तेल की धार के समान अविच्छन्न और दीर्घ घण्टानिनाद के सदृश्य विन्दु, नाद, कला से अतीत को जो जानता है वह वेदज्ञ है ॥ ३७ ॥ जिस प्रकार कमल की नाल से जल को खींच लिया जाता है, उसी प्रकार वायु को खींचकर योगी योग साधन करे ॥ ३८ ॥ सम्पुटित कमल को अर्धमात्रा रूप करके वायु को सुषुम्ना द्वारा खींचकर भ्रुकुटी स्थान में लय करे ॥ ३६ ॥ भौंहों के मध्य में ललाट स्थान में, जहाँ नासिका का मूल है, वहाँ पर अमृत स्थान है, वही ब्रह्म का महान् स्थान है ॥ ४० ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

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CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri २८४ ] [ ध्यानबिन्दूपनिषत् आसनं प्राणसंरोधः प्रत्याहारश्च धारणा । ध्यानं समाधिरेतानि योगाङ्गानि भवन्ति षट् ॥४१ आसनानि च तावन्ति यावन्त्यो जीवजातयः । एतेषामतुलान्भेदान् विजानाति महेश्वरः ॥४२ सिद्धं भद्रं तथा सिंहं पद्मं चेति चतुष्टयम् । आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम् ॥४३ योनिस्यानं तयोर्मध्ये कामरूपं निगद्यते । आधाराख्ये गुदस्थाने पङ्कजं यच्चतुर्दलम् ॥४४ तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्धवन्दिता । योनिमध्ये स्थितं लिंगं पश्चिमाभिमुखं तथा ॥४५ आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि— ये योग के छः अंग हैं ॥ ४१ ॥ संसार में जितनी जीव योनियाँ हैं उतने ही प्रकार के आसन हैं, इनके बहुसंख्यक भेदों को महेश्वर ही जानते हैं ॥ ४२ ॥ सिद्ध, भद्र, सिंह, पद्म चार मुख्य आसन हैं । प्रथम चक्र आधार है और दूसरा स्वाधिष्ठान है ॥ ४३ ॥ इन दोनों के मध्य में कामरूप योनिस्यान है । गुदास्थान में जो आधार-चक्र है उसमें चार दल वाला कमल है । उसके मध्य में काम नाम वाली योनि है जिसकी वन्दना सिद्ध करते हैं । योनि के मध्य में पश्चिमाभिमुख लिङ्ग वर्तमान है ॥ ४४-४५ ॥ मस्तके मणिवद्भिन्नं यो जानाति स योगवित् । तप्तचामीकराकरं तडिल्लेखेव विस्फुरत् ॥४६ चतुरस्रमुपर्यग्नेरधो मेढ्रात्प्रतिष्ठितम् । स्वशब्देन भवेत्प्राणः स्वाधिष्ठानं तदाश्रयम् ॥४७ स्वाधिष्ठानं ततश्चक्रं मेढ्रमेव निगद्यते । मणिवत्तन्तुना यद्वत्वायुना पूरितं वपुः ॥४८

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ध्यानबिन्दूपनिषत् [ २८५ तन्नाभिमण्डलं चक्रं प्रोच्यते मणिपूरकम् । द्वादशारमहाचक्रे पुण्यपापनियन्त्रितः ॥४६ तावज्जीवो भ्रमत्येवं यावत्तत्त्वं न विन्दति । ऊर्ध्वं मेढ्रादधो नाभेः कन्दो योऽस्ति खगाण्डवत् ॥५० तत्र नाड्यः समुत्पन्नाः सहस्राणि द्विसप्ततिः । तेषु नाडीसहस्रेषु द्विसप्ततिरुदाहृता ॥५१ उसके मस्तक में जो मणि के समान प्रकाश है उसे योगीजन ही जानते हैं । तप्त सुवर्ण के से वर्ण वाला और बिजली की धारा के समान सुप्रकाशित, अग्नि स्थान से चार अंगुल ऊर्ध्व और मेढ्र स्थान के नीचे स्वशब्दयुक्त प्राण स्थित है, जो स्वाधिष्ठान चक्र के आश्रय में रहता है ॥ ४६-४७ ॥ मेढ्र के मूल में स्वाधिष्ठान चक्र है। वहाँ मणि के तन्तु के समान वायु से पूर्ण शरीर है ॥ ४८ ॥ नाभिमण्डल में जो चक्र है वह मणिपूरक कहा जाता है । वहीं पर बारह आरा वाले महाचक्र में पुण्य-पाप का नियंत्रण होता है ॥ ४६ ॥ जब तक जीव इस तत्व को नहीं जान लेता तब तक उसे भ्रमते रहना पड़ता है । मेढ्र से ऊपर और नाभि से नीचे पक्षी के अण्डे के आकार वाला कन्द है, उसी से बहत्तर हजार नाड़ियां निकली हैं, जिनमें से बहत्तर को मुख्य कहा गया है ॥ ५०-५१ ॥ प्रधानाः प्राणवाहिन्यो भूयस्तत्र दश स्मृताः । इडा च पिंगला चैव सुषुम्ना च तृतीयका ॥५२ गान्धारी हस्तिजिह्वा च पूषा चैव यशस्विनी । अलम्बुसा कुहुरत्र शङ्खिनी दशमी स्मृता ॥५३ एवं नाडीमयं चक्रं विज्ञेयं योगिनां सदा । सततं प्राणवाहिन्यः सोमसूर्याग्निदेवताः ॥५४ इडापिंगलासुषुम्नास्तिस्रो नाड्यः प्रकीर्तिताः । इडा वामे स्थिता नाडी पिङ्गला दक्षिणे स्थिता ॥५५

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२८६ ] [ ध्यानबिन्दूपनिष सुषुम्ना मध्य देशस्था प्राणमार्गस्त्रयः स्मृताः । प्राणोऽपानः समानश्चोदानो व्यानस्तथैव च ॥५६ नागः कूर्मः कृकरको देवदत्तो धनंजयः । प्राणाद्याः पञ्च विख्याता नागाद्याः पञ्च वायवः ॥५७ इन बहत्तर में से दश प्रधान नाड़ियां प्राण को चलाने वाली कही गई हैं जो इस प्रकार हैं—इड़ा, पिङ्गला, सुषुम्ना, गान्धारी, हस्तिजिह्वा, पूषा, यशस्विनी, अलम्बुसा, कुहू और शङ्खिनी ॥ ५२— ५३ ॥ योगियों को इस नाड़ी-चक्र का ज्ञान होना परमावश्यक है। इनमें इड़ा, पिङ्गला और सुषुम्ना ये तीन नाड़ियाँ सूर्य, चन्द्र, अग्नि देवताओं द्वारा प्रतिष्ठित हैं और प्राण सदैव इन्हीं में चला करता है। इड़ा बाँयी ओर, पिङ्गला दाहिनी ओर, सुषुम्ना दोनों के मध्य में स्थित है, ये तीनों प्राण के मार्ग स्वरूप हैं। प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त, धनञ्जय—इस प्रकार ये प्राणादि पांच और नागादि पाँच वायु प्रसिद्ध हैं ॥ ५४—५७ ॥ एते नाडीसहस्रेषुवर्तन्ते जीवरूपिणः । प्राणापानवशो जीवो ह्यधश्चोर्ध्वं व धावति ॥५८ वामदक्षिणमार्गेण चञ्चलत्वान्न दृश्यते । आक्षिप्तो भुजदण्डेन यथोच्चलति कन्दुकः ॥५९ प्राणापानसमाक्षिप्तस्तद्वज्जीवो न विश्रमेत् । अपानात्कर्षति प्राणोऽपानः प्राणाच्च कर्षति ॥६० खगरज्जुवदित्येतद्यो जानाति स योगवित् । हकारेण बहिर्याति सकारेण विशेत्पुनः ॥६१ हंसहंसेत्यमुं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा । शतानि षड् दिवारात्रं सहस्राण्येकविंशतिः ॥६२