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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished572 pages

द्वितीय अध्याय ] [ २६३

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द्वितीय अध्याय ] [ २६३ तदा शिवत्वमाप्नोति निर्मुक्तः सर्वसंसृतेः ॥६ शास्त्रं विनाऽपि संबोद्धुं गुरवोऽपि न शक्नुयुः । तस्मात्सुदुर्लभतरं लभ्यं शास्त्रमिदं मुने ॥१० अभ्यास तो किसी जन्म में मिल भी जाता है । पर मेलन (योग) सैकड़ों जन्म में भी नहीं मिलता ॥ ३ ॥ बहुत से जन्मों तक अभ्यास करने पर किसी जन्म में योगी 'मेलन' को प्राप्त होता है ॥ ७ ॥ जब साधक गुरु के मुख से 'मेलन' का मन्त्र प्राप्त करता है, तो उसे शास्त्रानुकूल सिद्धि की भी प्राप्ति हो जाती है ॥ ८ ॥ जब साधक ग्रन्थ के अर्थ को समझ कर 'मेलन' को प्राप्त करता है, तो भी वह संसार से छूटकर शिवत्वं को प्राप्त होता है ॥ ६ ॥ शास्त्र का होना भी अत्यावश्यक है क्योंकि इसके बिना गुरु भी यथार्थ बोध नहीं करा सकते । इसी लिए शास्त्र का प्राप्त होना भी बड़े महत्व का है ॥१०॥ यावन्न लभ्यते शास्त्रं तावद्दुर्गा पर्यटेद्यतिः । यदा संलभ्यते शास्त्रं तदा सिद्धिः कर स्थिता ॥११ न शास्त्रेण विना सिद्धिर्दृष्टा चैव जगत्त्रये । तस्मान्मेलनदातारं शास्त्रदातारमच्युतम् ॥१२ तदभ्यासप्रदातारं शिवं मत्वा समाश्रयेत् । लब्ध्वा शास्त्रमिदं मह्यमन्येषां न प्रकाशयेत् ॥१३ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गोपनीयं विजानता । यत्रास्ते च गुरुर्ब्रह्मन्दिव्ययोगप्रदायकः ॥१४ तत्र गत्वा च तेनाक्तविद्यां संगृह्य खेचरीम् । तेनोक्तः सम्यगभ्यासं कुर्यादादावतन्द्रितः ॥१५ जब तक शास्त्र की प्राप्ति न हो तब तक पर्यटन करते हुए प्रयत्नशील रहे । जब सच्चा शास्त्र मिल जायगा तब सिद्धि हाथ में ही

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२६४ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् रखी है ॥ ११ ॥ शास्त्र के बिना सिद्धि तीनों लोक में कहीं दिखाई नहीं देती । इसलिए मेलन ( योग ) का देने वाला, शास्त्र का देने वाला और अभ्यास का कराने वाला गुरु भगवत स्वरूप ही है, ऐसा समझ कर उसका आश्रय लेना चाहिये और इस शास्त्र को प्राप्त कर लेने पर किसी अन्य के सम्मुख प्रकट न करना चाहिए ॥१२—१३ ॥ इसलिए इसको हर तरह से प्रयत्न करके गुप्त रखना चाहिये और जहाँ कहीं इस दिव्य योग का ज्ञाता गुरु रहता हो, वहाँ उसके पास जाकर खेचरी विद्या को ग्रहण करके सम्यक रूप से इसका अभ्यास करना चाहिए ॥ १४—१५ ॥ अनया विद्यया योगी खेचरीसिद्धिभाग्भवेत् । खेचर्या खेचरीं युञ्जन् खेचरीबीजपूरया ॥१६ खेचराधिपतिर्भूत्वा खेचरेषु सदा वसेत् । खेचरावसथं वह्निसम्बुमण्डलभूषितम् ॥१७ आख्यातं खेचरीबीजं तेन योगः प्रसिध्यति । सोमांशनवकं वर्णं प्रतिलोमेन चोद्धरेत् ॥१८ तस्मात् त्र्यंशकमाख्यातमक्षरं चन्द्ररूपकम् । तस्मादप्यष्टमं वर्णं विलोमेनापरं मुने ॥१९ तथा तत्परमं विद्धि तदादिरपि पञ्चमा । इन्दोश्च बहुभिन्नं च कूटोऽयं परिकीर्तितः ॥२० योगी को इस विद्या द्वारा खेचरी शक्ति की प्राप्ति होती है । खेचरी में खेचरी के बीज सहित खेचरी का योग करने से साधक खेचरों ( देवताओं ) का अधीश्वर बनकर सदा उन्हीं में रहता है । खेचर का प्रतीक 'ह' कार आवसथ ( धारणा ) का 'ई'कार, अग्नि का 'रकार और जल का 'म'कार है । इन सबका योग करने से 'ह्रीं' होता है जो कि खेचरी का बीज मन्त्र है और इसी से खेचरी

द्वितीय अध्याय ] [ २६५

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द्वितीय अध्याय ] [ २६५ योग सिद्ध होता है। सोमांश 'स' कार है, उसका प्रतिलोम से नौवां अक्षर 'भ' होता है। फिर चन्द्रमा का बीजाक्षर 'स' है, उसका आठवां अक्षर विलोम से 'म' होता है। फिर से पांच अक्षर उलटा गिनने से 'प' अक्षर निकलता है। चन्द्रमा का बीज 'स' और अनेक वर्ण वाला 'क्ष' अन्तिम अक्षर है। (इस प्रकार "ह्रीं भं सं मं पं सं क्ष" यह खेचरी का बीज मन्त्र प्रकट होता है) ॥ १६—२० ॥ गुरूपदेशलभ्यं च सर्वयोगप्रसिद्धिदम् । यत्तस्य देहजा माया निरुद्धकरणाश्रया ॥२१ स्वप्नेऽपि न लभेत्तस्य नित्यं द्वादशजप्यतः । य इमां पञ्च लक्षाणि जपेदपि सुयन्त्रितः ॥२२ तस्य श्रीखेचरीसिद्धिः स्वयमेव प्रवर्तते । नश्यन्ति सर्वविघ्नानि प्रसीदन्ति च देवताः ॥२३ वलीपलितनाशश्च भविष्यति न संशयः । एवं लब्ध्वा महाविद्यामभ्यासं कारयेत्ततः ॥२४ अन्यथा क्लिश्यते ब्रह्मन्न सिद्धिः खेचरी पथे । यदभ्यासविधौ विद्यां न लभेद्यः सुधामयीम् ॥२२ ततः संमेलकादौ च लब्ध्वा विद्यां सदां जपेत् । नान्यथा रहितो ब्रह्मन्न किंचित्सिद्धिभागभवेत् ॥२६ यह खेचरी मन्त्र सब प्रकार की सिद्धियों को देने वाला है। यह गुरु के उपदेश से ही सिद्ध होता है। जो नियम से इसका प्रतिदिन बारह बार जप करता है, उसे अन्तःकरण में स्थित देह सम्बन्धी माया नहीं व्यापती। जो इसे भावपूर्वक पाँच लाख जपेगा उसको खेचरी की सिद्धि स्वयमेव हो जायेगी, सब विघ्न दूर होकर देवताओं की प्रसन्नता प्राप्त होगी ॥ २१—२३ ॥ इससे शरीर पर पड़ी हुई झुरियां मिट जाती हैं इसमें कुछ भी संशय नहीं। इस महाविद्या को जब

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२६६ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् भली प्रकार जान ले तब उसका अभ्यास भली भाँति करे ॥ २४ ॥ ऐसा न करने से खेचरी की सिद्धि न होकर उलटा कष्ट ही उठाना पड़ता है । विधिपूर्वक अभ्यास करने पर भी सफलता न हो तो भी 'सम्मेलक' (गुरु शिक्षक आदि) के बताये अनुसार सदैव इसका जप करता रहे । बिना उपयुक्त शिक्षक के इनमें कभी सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती ॥ २५—२६ ॥ यदिदं लभ्यते शास्त्रं तदा विद्यां समाश्रयेत् । ततस्तदोदितां सिद्धिमाशु तां लभते मुनिः ॥२७ तालूमूलं समुत्कृष्य सप्तवासरमात्मवित् । स्वगुरूक्तप्रकारेण मलं सर्वं विशोधयेत् ॥२८ स्नुहिपत्रनिभं शस्त्रं सुतीक्ष्णं स्निग्धनिर्मलम् । समादाय ततस्तेत लोममात्रं समुच्छिनेत् ॥२६ हित्वा सैन्धवपथ्याभ्यां चूर्णिताभ्यां प्रकर्षयेत् । पुनः सप्तदिने प्राप्ते रोम मात्र समुच्छिनेत् ॥३० जब इस विद्या के शास्त्र का ठीक तरह से ज्ञान हो जायेगा तब साधक की सिद्धि प्राप्त करने में देर न लगेगी ॥ २७ ॥ सर्व प्रथम साधक को सात दिन तक तालु के मूल स्थान को गुरु के आदेश के अनुसार घिसकर वहां का सब मैल दूर करना चाहिए ॥ २८ ॥ फिर थूहर के पत्ते के समान उत्तम धार वाले शुद्ध चाकू आदि से तालूमूल को एक बाल के बराबर काटे अथवा गुरु या शिक्षक से कटावे) ॥ २६ ॥ कटे स्थान के ऊपर हर्र और सैन्धे नमक का चूर्ण भुरभुराता रहे। सात दिन के पश्चात् फिर पूर्ववत् बाल बराबर काटे ॥ ३० ॥ एवं क्रमेण षण्मासं नित्योद्युक्तः समाचरेत् । षण्मासाद्रसनामूलं शिराबन्धं प्रनश्यति ॥३१

द्वितीय अध्याय ] [ २६७

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द्वितीय अध्याय ] [ २६७ अथ वागीश्वरीधाम शिरो वस्त्रेण वेष्टयेत् । शनैरुत्कर्षयेद्योगी कालवेलाविधानवित् ॥३२ पुनः षाण्मासमात्रेण नित्यं संघर्षणान्मुने । भ्रू मध्यावधि चाप्येति तियक्कर्णबिलावधि ॥३३ अधश्च चुबुकं मूलं प्रयाति क्रम चारिता । पुनः संवत्सराणां तु तृतीयादेव लीलया ॥३५ केशान्तमूर्ध्वं क्रमति तिर्यक्शाखाऽवधिर्मुने । अधस्तात्कण्ठकूपान्तं पुनर्वर्षत्रयेण तु ॥३५ ब्रह्मरन्ध्रं समावृत्य तिष्ठेदेव न संशयः । तिर्यक् चूलितलं याति अधः कण्ठबिलावधि ॥३६ इस क्रम से निरन्तर प्रयत्न करते रहने से जीभ का तालू के साथ वाला बन्धन कट जायगा ॥ ३१ ॥ तब जीभ के अग्रभाग को कपड़े से लपेट कर धीरे-धीरे दोहन करे ( बाहर की तरफ खींचे ) । इस प्रकार छः मास तक अभ्यास करने से जीभ बढ़कर भौंहों के मध्य तक पहुँचने लगेगी और बगल में कान के छेद तक पहुंचने लगती है । बाहर की तरफ जीभ थोड़ी तक पहुंच जाती है । जब इस अभ्यास को बराबर किया जाय तो तीसरे वर्ष में जीभ बालों तक पहुंच जाती है और बगल में कन्धे तक तथा नीचे कण्ठकूप तक पहुंचने लगती है । आगामी तीन वर्ष के अभ्यास से जीभ ब्रह्मरन्ध्र तक पहुंचकर उसे ढक लेगी इसमें संशय नहीं । तब वह गर्दन के पीछे तक और नीचे कण्ठ के अन्त तक पहुँच जायगी ॥ ३२-३६ ॥ शनैः शनैर्मस्तकाच्च महावज्रकवाटभित् । पूर्वं बीजयुता विद्या ह्याख्याता याति दुर्लभाम् ॥३७ तस्याः षडङ्गं कुर्वीत तया षट्स्वरभिन्नया । कुर्यादिकं करन्यासं सर्वसिद्धिप्रदिहेतवे ॥३८

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२६८ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् शनैरेवं प्रकर्तव्यमभ्यासं युगपन्न हि । युगपद्वर्तते यस्य शरीरं विलयं व्रजेत् ॥३९ तस्माच्छनैः शनैः कार्यमभ्यासं मुनिपुंगव । यदा च बाह्यमार्गेण जिह्वा ब्रह्मबिलं व्रजेत् ॥४० तदा ब्रह्मार्गलं ब्रह्मन्दुर्भेदं त्रिदशैरपि । अंगुल्यग्रेण संधृष्य जिह्वामात्र निवेशयेत् ॥४१ धीरे-धीरे जिह्वा ब्रह्मरन्ध्र को भेद जाती है। यह समस्त बीजाक्षर की विधि सहित विद्या बड़ी ही कठिन है। इस पूर्वोक्त छःओं बीजाक्षरों से षडंगन्यास और करन्यास करना चाहिये तब सम्पूर्ण सिद्धि सम्भव होती है ॥ ३७--३८ ॥ इस प्रकार का अभ्यास बहुत सावधानी से क्रमशः धीरे-धीरे करना चाहिये । जल्दी करने से शरीर की हानि होना सम्भव है । इसीलिए इन अभ्यास में कभी जल्दी नहीं करनी चाहिये । जब बाहर के मार्ग से जीभ ब्रह्म विवर के भीतर जाने लगे तो उसे अँगुली से उठाकर उसके भीतर करदे ॥ ४०-४१ ॥ एवं वर्षत्रयं कृत्वा ब्रह्मद्वारं प्रविश्यति । ब्रह्मद्वारे प्रविष्टे तु सम्यङ्मथनमाचरेत् ॥४२ मथनेन विना केचित्साधयन्ति विपश्चितः । खेचरीमन्त्रसिद्धस्य सिध्यते मथनं विना ॥३३ जपं न मथनं चैव कृत्वा शीघ्रं फलं लभेत् । स्वर्णजां रौप्यजां वाऽपि लोहजां वा शलाकिकाम् ॥४४ नियोज्य नासिकारन्ध्रं दुग्धसिक्तेन तन्तुना । प्राणान्निरुध्य हृदये सुखमासनमात्सनः ॥४५ शनैः सुमथनं कुर्याद्भ्रू मध्ये न्यस्तचक्षुषि । षाण्मासान्मथवात्कस्य भवेनेव प्रजायते ॥४६

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द्वितीय अध्याय ]            [ २६१ यथा सुषुप्तिर्बालानां यथा भावस्तथा भवेत् । न सदा मथनं शस्तं मासे समाचरेत् ॥४७ सदा रसनया योगी मार्गं न परिसंक्रमेत् । एवं द्वादशवर्षान्ते संसिद्धिर्भवति ध्रुवं ॥४८ शरीरे सकलं विश्वं पश्यत्यात्माविभेदतः । ब्रह्माण्डोऽयं महामार्गो राजदन्तोर्ध्वकुण्डली ॥४९ इति ॥ इस प्रकार तीन वर्ष तक करने से जीभ ब्रह्म द्वार में प्रवेश कर जायगी । जब वह प्रवेश कर जाय तब उसका विधिपूर्वक मंथन आरम्भ करना चाहिए ॥ ४२ ॥ कोई साधक बिना मन्थन के ही खेचरी करते हैं । जिनको खेचरी मन्त्र सिद्ध हो चुका है वे ऐसा कर सकते हैं ॥ ४३ ॥ तो भी जप और मन्थन दोनों करने से फल शीघ्र प्राप्त होता है । मन्थन के लिये सुवर्ण, चाँदी अथवा लोहे की शलाका के सिरे पर दुग्धयुक्त तन्तु लगाकर उसे नाक के भीतर डाले । फिर प्राण को हृदय में निरोध करके सुखासन पर बैठकर, आंखों को भ्रुकुटी स्थान में लगाकर धीरे-धीरे मन्थन करे । छः मास तक इस प्रकार मन्थन करने से उसका प्रभाव दिखलाई पड़ने लगता है ॥ ४४-४६ ॥ तब उसकी अवस्था इस प्रकार की होती है जैसी बालक की सुषुप्ति अवस्था में । मन्थन नित्य नहीं करना चाहिये वरन् महीने में एक बार करना होता है । इसी प्रकार जिह्वा को बार-बार ब्रह्मारन्ध्र में प्रविष्ट न करे । इस प्रकार बारह वर्ष अभ्यास करने पर सिद्धि निश्चित रूप से होती है ॥ ४७-४८ ॥ उस समय योगी करने समस्त विश्व अपने भीतर दिखाई देने लगता है, क्योंकि जीभ के ब्रह्मारन्ध्र तक जाने के मार्ग में ही ब्रह्माण्ड की स्थिति है ॥ ४६ ॥ ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥

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२७० ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ योगकुण्डल्युपनिषत् तृतीयोऽध्यायः ह्रीं भं सं मं पं सं क्षम् पद्मज उवाच— अमावस्या च प्रतिपत्पौर्णमासी च शंकर । अस्याः का वर्ण्यते संज्ञा एतदाख्याहि तत्त्वतः ॥१॥ प्रतिपद्दिनतोऽकाले अमावस्या तथैव च । पौर्णमास्यां स्थिरीकुर्यात्स च पन्था हि नान्यथा ॥२ कामेन विषयाकाङ्क्षी विषयात्काममोहितः । द्वावेव संत्यजेन्नित्यं निरञ्जनमुपाश्रयेत् ॥३ अपरं सत्यजेत्सर्वं यदिच्छेदात्मनो हितम् । शक्तिमध्ये मनः कृत्वा मनः शक्तेश्च मध्यगम् ॥४ मनसा मन आलोक्य तत्यजेत्परमं पदम् । मन एव हि बिन्दुश्च उत्पत्तिस्थितिकारणम् ॥५ ब्रह्माजी बोले—मेलन मन्त्र इस प्रकार है—"ह्रीं भं सं मं पं सं क्षम् । हे शंकर ! अमावस्या, प्रतिपदा और पौर्णमासी का मूल आशय क्या है ? ॥ १ ॥ प्रतिपदा से सूर्य का आशय है और पौर्णमासी से चन्द्रमा का । अमावस्या का अर्थ सूर्य और चन्द्र दोनों का अभाव है ॥ २ ॥ मनुष्य कामनाओं में ग्रसित होकर विषयाकांक्षी होता है और विषय में पड़कर कामना बढ़ती जाती है । इसलिए शुद्ध परमात्म भाव की प्राप्ति के लिए विषय और कामना दोनों का त्याग करना और आत्मा में ध्यान लगाना ही आवश्यक है ॥ ३ ॥ जो अपने हित की इच्छा रखता हो उसे अन्य सब मिथ्या विषयों को त्याग देना चाहिए और शक्ति में प्रवेश करके उसी में स्थित रहना चाहिए ॥ ४ ॥ मन द्वारा मन को देखकर और समझकर उसका त्याग करना ही परमपद है । उत्पत्ति और स्थिति का प्रधान बिन्दु मन ही है ॥ ५ ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

तृतीय अध्याय ] [ २७१

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तृतीय अध्याय ] [ २७१ मनसोत्पद्यते बिन्दुर्यथा क्षीरं घृतात्मकम् । न च बन्धनमध्यस्थं तद्वै कारणमानसम् ॥६ चन्द्रार्कमध्यमा शक्तिर्यत्रस्था तत्र बन्धनम् । ज्ञात्वा सुषुम्ना तद्भेदं कृत्वा वायुं च मध्यगम् ॥७ स्थित्वाऽसौ बैन्दवस्थाने घ्राणरन्ध्रे निरोधयेत् । वायुं बिन्दुं समाख्यातं सत्वं प्रकृ तिमेव च ॥८ षट् चक्राणि परिज्ञात्वा प्रविशेत्सुखमण्डलम् । मूलाधारं स्वाधिष्ठानं मणिपूरं तृतीयकम् ॥६ अनाहतं विशुद्धिं च आज्ञाचक्रं च षष्ठकम् । आधारं गुदमित्युक्तं स्वाधिष्ठानं तु लैङ्गिकम् ॥१० मणिपूरं नाभिदेशं हृदयस्थमनाहतम् । विशुद्धिः कण्ठमूले च आज्ञाचक्रं च मस्तकम् ॥११ यह बिन्दु मन से ही उत्पन्न होता है, जैसे दूध से घी प्रकट होता है। उस बिन्दु में कोई बन्धन नहीं है, वरन् जो कुछ बन्धन है वह सब मन का ही है ॥ ६॥ सूर्य और चन्द्र के मध्य में जो शक्ति रहती है वही बन्धन रूप है। इसलिये इन दोनों के मध्य की सुषुम्ना का ज्ञान प्राप्त करके उसके भीतर प्राण को चलाना आवश्यक है ॥ ७॥ प्राण को इसी बिन्दु स्थान में स्थिर करके नासिका से वायु का निरोध करना चाहिये। यही प्राणवायु, बिन्दु, सत्व और प्रकृति का वर्णन है ॥ ८ ॥ इसके साथ ही षट्चक्रों की जानकारी भी प्राप्त करनी चाहिये जिससे सुख की स्थिति प्राप्त हो सके । ये षट्चक्र इस प्रकार है—मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा। मूलाधार का स्थान गुदा है, उसके ऊपर लिङ्ग के समीप स्वाधिष्ठान है, मणिपुर नाभि में है, अनाहत हृदय में, विशुद्ध कण्ठ में और आज्ञा-चक्र मस्तक में होता है ॥ ६-११ ॥

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२७२ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् षट् चक्राणि परिज्ञात्वा प्रविशेत्सुखमण्डले । प्रविशेद्व वायुमाकृष्य तयैवोर्ध्वं नियोजयेत् ॥१२ एवं समभ्यसेद्वायुं स ब्रह्माण्डमयो भवेत् । वायुं बिन्दुं तथा चक्रं चित्तं चैव समभ्यसेत् ॥१३ समाधिमेकेन समममृतं यान्ति योगिनः । यथाऽग्निर्दारुमध्यस्थो नोत्तिष्ठेन्मथनं विना ॥१४ विना चाभ्यासयोगेन ज्ञानदीपस्तथा न हि । घटमध्यगतो दीपो बाह्ये नैव प्रकाशते ॥१५ भिन्ने तस्मिन्घटे चैव दीपज्वाला च भासते । स्वकायं घटमित्युक्तं यथा दीपो हि तत्पदम् ॥१६ गुरुवाक्यसमा भिन्ने ब्रह्मज्ञानं स्फुटीभवेत् । कर्णधारं गुरुं प्राप्य कृत्वा सूक्ष्मं तरन्ति च ॥१७ इन समस्त चक्रों का ज्ञान प्राप्त करके सुख मण्डल रूप सहस्र दल कमल में प्रवेश करे और प्राण को ऊर्ध्व भाग में खींचकर स्थित करे ॥ १२ ॥ इस प्रकार प्राण का अभ्यास करने से ब्रह्माण्ड में स्थित हो जाती है । प्राणवायु, बिन्दु, चक्र तथा चित्त का उचित रूप से अभ्यास करके योगीजन एक्य रूप की समाधि तक पहुँच जाते हैं, और अमृत पद को प्राप्त होते हैं । जिस प्रकार काष्ठ में अग्नि रहती है, पर घिसने के बिना वह प्रकट नहीं होती, उसी प्रकार सतत अभ्यास के बिना योग विद्या का दीपक भी प्रकाशित नहीं होता । अथवा जिस प्रकार घड़े के भीतर रखा हुआ दीपक बाहर प्रकाश नहीं कर सकता जब तक कि उस घड़े का भेदन न किया जाय, उसी प्रकार शरीर रूपी घट के भीतर रखे हुये ब्रह्मरूपी दीप का प्रकाश भी उस समय तक बाहर नहीं निकलता जब तक गुरु के उपदेश से इस घट का भेदन नहीं होता । इस प्रकार इस अपार सागर को पार करने का उपाय गुरु रूपी कर्णधार ही है ॥ १३-१७ ॥

तृतीय अध्याय ] [ २७३

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तृतीय अध्याय ] [ २७३ अभ्यासवासनाशक्त्या तरन्ति भवसागरम् । परायामंकुरी भूय पश्यन्त्यां द्विदलीकृता ॥१८ मध्यमायां मुकुलिता वैखर्यां विकसीकृता । पूर्वं यथोदिता या वाग्विलोमेनास्तगा भवेत् ॥१९ तस्या वाचः परो देवः कटस्थो वाक्प्रबोधकः । सोऽहमस्मीति निश्चित्य यः सदा वर्तते पुमान् ॥२० शब्दंरुच्चावचैर्नीचैर्भाषितोऽपि न लिप्यते । विश्वश्च तैजसश्चैव प्राज्ञश्चेति च ते त्रयः ॥२१ विराड्ढिरण्यगर्भश्च ईश्वरश्चेति ते त्रयः । ब्रह्माण्डं चैव पिण्डाण्डं लोका भूरादयः क्रमात् ॥२२ स्वस्वोपाधिलयादेव लीयन्ते प्रत्यगात्मनि । अण्डं ज्ञानाग्निना तप्तं लीयये कारणैः सह ॥२३ अभ्यास और श्रेष्ठ वासना की शक्ति द्वारा ही वे इस भव सागर को तैर कर पार करने में समर्थ होते हैं। वाणी परा में अंकुरित होती है, पश्यन्ती में उसके दो भाग होते हैं, मध्यमा में पुष्पित होती है और बैखरी में विकास को प्राप्त हो जाती है। इस विधि से जिस प्रकार वाणी का आविर्भाव होता है, उसके विलोम-क्रम से ही वह लय हो जाती है ॥ १८-१९ ॥ इस वाणी का बोध कराने वाला अथवा परमदेव मैं ही हूँ, इस प्रकार निश्चय करके जो व्यक्ति तदनुसार व्यवहार करता है ॥ २० ॥ उससे कोई उच्च या नीच कैसा भी शब्द कहे, पर वह उसमें लिप्त नहीं होता । विश्व, तैजस और प्राज्ञ—ये तीन पिण्डक तथा विराट्, हिरण्यगर्भ और ईश्वर—ये तीन ब्रह्माण्ड के और भूः, भुवः स्वः—ये तीन लोक के भेद हैं, जो अपनी उपाधि के लय होने पर प्रत्यगात्मा में लीन हो जाते हैं । ज्ञानाग्नि से तप्त होने पर ब्रह्माण्ड भी अपने मूल रूप में विलीन हो जाता है ॥ २१-२३ ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

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CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [योगकुण्डल्युपनिषद् परमात्मनि लीनं तत्परं ब्रह्मव जायते । ततः स्तिमितगम्भीरं न तेजो न तमस्ततम् ॥२४ अनाख्यमनभिव्यक्तं सत्किंचिदवशिष्यते । ध्यात्वा मध्यस्थमात्मानं कलशान्तरदीपवत् ॥२५ अङ्गुष्ठमात्रमात्मानमधूमज्योतिरूपकम् । प्रकाशयन्तमन्तस्स्थं ध्यायेत्कूटस्थमव्ययम् ॥२६ विज्ञानात्मा तथा देहे जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिः । मायया मोहितः पश्चाद्बहुजन्मन्तरे पुनः ॥२७ सत्कर्मपरिपाकात्तु स्वविकारं चिकीर्षति । कोऽहं कथमयं दोष संसाराख्य उपागतः ॥२८ जाग्रत्स्वप्ने व्यवहरन्त्सुषुप्तौ क्व गतिर्मम । इति चिन्तापरो भूत्वा स्वभासा च विशेषतः ॥२९ अज्ञानात्तु चिदाभासो बहिस्तापेन तापितः । दग्धं भवत्येव तदा तूलपिण्डमिवाग्निना ॥३० परमात्मा में मिल जाने से वह ब्रह्मरूप हो जाता है । उस समय एक ऐसा अगाध और गम्भीर रूप हो जाता है जो न प्रकाश कहा जा सकता है न अन्धकार । तब केवल सत्स्वरूप एक अव्यक्त तत्व ही शेष रहता है। जैसे घट के भीतर दीपक की ज्योति रहती है ऐसी ही एक निर्धूम ज्योति अपने अन्तःकरण में प्रकाशित होती रहती है । इसी स्वरूप में उस कूटस्थ अव्यय रूप का ध्यान करना चाहिए ॥ २४-२६ ॥ आत्मा अपने मूल रूप में विज्ञानमय होता है, पर देह में आकर वह मायावश, जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति अवस्थाओं को प्राप्त होकर विमोहित हो जाता है । कितने ही जन्मों के पश्चात् जब शुभ कर्म उदय होते हैं तब उसके भीतर अपने विकारों को जानने की इच्छा उत्पन्न होती है कि मैं वास्तव में कौन हूँ और Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

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तृतीय अध्याय २७५

यह दोषमय संसार कहाँ से आ गया है ? ॥ २७-२८ ॥ जाग्रत और स्वप्न अवस्था में तो मैं अपने को कर्ता समझ कर व्यवहार करता हूँ, पर सुषुप्ति में मेरी क्या अवस्था होती है ? इस प्रकार चिन्ता करता हुआ वह अपने आभास रूप पर विचार करता है ॥ २९ ॥ रुई का ढेर जैसे आग से जलने लगता है, वैसे ही चिदाभास अज्ञान में पड़ कर सांसारिक ताप से नष्ट हो जाता है ॥ ३० ॥

दहरस्थः प्रत्यगात्मा नष्टे ज्ञाने ततः परम् । विततो व्याप्य विज्ञानं दहत्येव क्षणेन तु ॥३१॥ मनोमयज्ञानमयान् सम्यग्दग्ध्वा क्रमेण तु । घटस्थदीपवच्छश्वदन्तरेव प्रकाशते ॥३२॥ ध्यायन्नास्ते मुनिश्चैवमा सुप्तेरा मृतेस्तु यः । जीवन्मुक्तः स विज्ञेयः स धन्यः कृतकृत्यवान् ॥३३॥ जीवन्मुक्तपदं त्यक्त्वा स्वदेहे कालसात्कृते । विशत्यदेहमुक्तत्वं पवनोऽस्पन्दतामिव ॥३४॥ अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् । अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं तदेव शिष्यत्यमलं निरामयम् ॥३५॥ इत्युपनिषत् ॥

इस प्रकार सांसारिक ज्ञान के मिटाने पर प्रत्यगात्मा विस्तार को प्राप्त होकर विज्ञान का भी नाश कर देता है। इस प्रकार मनो- मय और विज्ञानमय के पूर्णतः मिल जाने पर शाश्वत प्रकाश के समान आत्मा ही अन्तर में प्रकाशित होता रहता है ॥ ३१-३२ ॥ जो आत्म- ज्ञानी ऐसी आत्मा का नित्य प्रति ध्यान करता रहता है और मृत्यु के

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२७६ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् समय भी उस ध्यान को स्थिर रखता है, वह जीवन्मुक्त ही है, वह धन्य है और कृतकृत्य है ॥ ३३ ॥ जब उसका अन्तिम समय आ जाता है तब वह जीवन्मुक्त से विदेहमुक्त पद को प्राप्त हो जाता है, उसका अन्त ऐसा ही होता है जैसे हवा का चलना बन्द हो जाता है ॥ ३४ ॥ जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, से रहित अर्थात् पञ्चभूतों से परे, नित्य और अव्यय है, जो आदि और अन्त से रहित है, जो महान और ध्रुव (अटल) है, वही शुद्ध और अविकारी ब्रह्म अन्त में शेष रहता है ॥ ३५ ॥ ॥ योगकुण्डली उपनिषद् समाप्त ॥ —:०:—

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CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ध्यानबिन्दूपनिषत् ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सहवीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। ब्रह्म हम दोनों की रक्षा करे, वह हम दोनों का पालन करे, हम दोनों एक साथ सामर्थ्य को प्राप्त हों, हमारा अध्ययन तेजस्वी हो, हम परस्पर द्वेष न करे। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। यदि शैलसमं पापं विस्तीर्णं बहुयोजनम्। भिद्यते ध्यानयोगेन नान्यो भेदः कदाचन ॥१॥ बीजाक्षरं परं बिन्दु नादं तस्योपरि स्थितम्। सशब्दचाक्षरे क्षीणे निशब्दं परमं पदम् ॥२॥ अनाहतं तु यच्छब्दं तस्य शब्दस्य यत्परम्। तत्परं विन्दते यस्तु स योगी छिन्नसंशयः ॥३॥ वालाग्रशतसाहस्रं तस्य भागस्य भागिनः। तस्य भागस्य भागार्धं तत्क्षये तु निरञ्जनम् ॥४॥ पुष्पमध्ये यथा गन्धः पयोमध्ये यथा घृतम्। तिलमध्ये यथा तैलं पाषाणेष्विव काञ्चनम् ॥५॥ एवं सर्वाणि भूतानि मणौ सूत्र इवात्मनि। स्थिरबुद्धिरसमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥६॥ यदि पर्वत के समान अनेक योजन विस्तार वाले पाप भी हों, तो भी वे ध्यान योग से नष्ट हो जाते हैं, इसके अतिरिक्त और किसी तरह उनका नाश नहीं होता ॥ १॥ बीजाक्षर परम बिन्दु है और उसके ऊपर नाद की स्थिति है। जब वह नाद (शब्द) अक्षर में Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

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२७८ ] [ ध्यानबिन्दूपनिषत् लय हो जाता है तब शब्द रहित परमपद का रूप होता है ॥ २ ॥ अनाहत शब्द से भी परे जो शब्द है, उसके पाने से ही योगी के संशय की निवृत्ति होती है ॥ ३ ॥ केशाग्र के सौवें भाग का हजारवां भाग और उसका आधे का भाग, उसका भी क्षय हो जाने पर निरंजन होता है ॥ ४ ॥ जिस प्रकार फूलों में गन्ध रहती है, दूध में घी रहता है, तिल में तेल और पाषाण में सोना होता है, जिस प्रकार माला के दाने सूत में पिरोये रहते हैं, उसी प्रकार सब भूत निरंजन में व्याप्त हैं। स्थिर बुद्धि वाला ज्ञानी मोह रहित होकर ऐसे ब्रह्म क ा ज्ञान प्राप्त करके उसमें स्थिर रहता है ॥ ५-६ ॥ तिलानां तु यथा तैल पुष्पे गन्ध इवाश्रितः । पुरुषस्य शरीरे तु सबाह्याभ्यान्तरे स्थितः ॥७ वृक्षं तु सकलं विद्याच्छाया तस्यैव निष्कला । सकले निष्कले भावे सर्वत्रात्मा व्यवस्थितः ॥८ ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ध्येयं सर्वं मुमुक्षुभिः । पृथिव्याग्निश्च ऋग्वेदो भूरित्येव पितामहः ॥९ अकारे तु लयं प्राप्ते प्रथमे प्रणवांशके । अन्तरिक्ष यजुर्वायुर्भुवो विष्णुर्जनार्दनः ॥१० उकारे तु लयं प्राप्ते द्वितीये प्रणवांशके । द्यौः सूर्यः सामवेदश्च स्वरित्येव महेश्वरः ॥११ मकारे तु लयं प्राप्ते तृतीये प्राणवांशके । अकारः पीतवर्णः स्याद्रजोगुण उदीरितः ॥१२ उकारः सात्त्विकः शुक्लो मकारः कृष्णतामसः । अष्टाङ्गं च चतुष्पादं त्रिस्थानं पञ्चदैवतम् ॥१३ जिस प्रकार तैल का आश्रय तिल : का आश्रय पुष्प है इसी प्रकार ब्रह्म पुरुष शरीर के भीतर और बाहर स्थित

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रहता है ॥ ७ ॥ वृक्ष को सम्पूर्ण जान लेने पर उसकी छाया निष्कल होती है, इसी प्रकार आत्मा सब कला रहित स्थान में स्थित रहता है ॥ ८ ॥ सब मोक्षाभिलाषी व्यक्ति ॐकार रूप एकाक्षर ब्रह्म का ही ध्यान करते हैं। इस प्रणव के प्रथम अंश ‘अ’कार में पृथिवी, अग्नि, ऋग्वेद, भूः तथा पितामह का लय होता है। दूसरे अंश ‘उ’कार में अन्तरिक्ष, यजुर्वेद, वायु, भुवः और विष्णु का लय होता है। तीसरे अंश ‘म’कार में द्यौ, सूर्य, सामवेद, स्वर्लोक और महेश्वर का लय होता है। ‘अ’कार पीले रङ्ग और रजोगुण वाला कहा जाता है, ‘उ’कार श्वेत वर्ण और सतोगुण वाला और ‘म’कार कृष्णवर्ण तथा तामस गुण वाला है। इस प्रकार ॐकार आठ अङ्ग, चार पद, तीन नेत्र और पाँच दैवत वाला होता है ॥ ९-१३ ॥

ओंकारं यो न जानाति ब्राह्मणो न भवेत्तु सः । प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते ॥१४ अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् । निवर्तन्ते क्रियाः सर्वास्तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥१५ ओंकारप्रभवा देवा ओंकारप्रभवाः स्वराः । ओंकारप्रभवं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥१६

ह्रस्वो दहति पापानि दीर्घः संपत्प्रदोऽव्ययः । अर्धमात्रासमायुक्तः प्रणवो मोक्षदायकः ॥१७ तैलधारामिवाच्छिन्नं दीर्घघण्टानिनादवत् । अवाच्यं प्रणवस्याग्रं यस्तं वेद स वेदवित् ॥१८ हृत्पद्मकर्णिकामध्ये स्थिरदीपनिभाकृतिम् । अंगुष्ठमात्रमचलं ध्यायेदोंकारमीश्वरम् ॥१९ इडया वायुमापूर्य पूरयित्वोदरस्थितम् । ओंकारं देहमध्यस्थं ध्यायेज्ज्यालावलीवृतम् ॥२०

इस प्रकार से ॐकार को जो नहीं जानता वह ब्राह्मण नहीं

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२८० ] [ ध्यानबिन्दूपनिषत् ब्रह्मा पूरक इत्युक्तो विष्णुः कुम्भक उच्यते । रेचा रुद्र इति प्रोक्तः प्राणायामस्य देवताः ॥२१ इस प्रकार से ॐकार को जो नहीं जानता वह ब्राह्मण नहीं माना जा सकता। यह प्रणव धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म लक्ष्य है। बाण से सावधानी के साथ तन्मय होकर इस लक्ष्य को बेध करने और 'अवर' को जान लेने से सब क्रियाओं से निवृत्ति हो जाती है ॥ १४-१५ ॥ ॐकार से देवता हुए, ॐकार से स्वर हुए और ॐकार से ही तीनों लोक के समस्त चराचर हुये ॥ १६ ॥ इसका ह्रस्व अंश पापों को हरता है, दीर्घ अव्यय स्वरूप सम्पत्ति को देता है, इस प्रकार अर्धमात्रा युक्त प्रणव मोक्षदायक है ॥ १७ ॥ तेल की अविच्छिन्न धार के समान, घण्टा के दीर्घ निनाद के समान नाद के अग्र में वाच्य रहित प्रणव है, उसे जानने वाला ही वेदज्ञ है ॥ १८ ॥ हृदयरूपी कमल की कर्णिका में दीपशिखा तुल्य, अंगुष्ठमात्र आकार के ॐकार रूप ईश्वर का ध्यान करे ॥ १६ ॥ इड़ा ( बांयी नासिका ) से वायु को उदर में भरे और देह के मध्य में ज्वालामय ॐकार का ध्यान करे। पूरक को ब्रह्मा और कुम्भक को विष्णु और रेचक को रुद्र कहा गया है, ये तीनों प्राणायाम के देवता हैं ॥ २०- २१ ॥ आत्मानमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् । ध्याननिर्मथनाभ्यासा देवं पश्येन्निगूढवत् ॥२२ ओंकारध्वनिनादेन वायोः संहरणांतिकम् । यावद्वलं समादध्यात्सम्यङ् नादलयावधि ॥२३ गमागमस्थं गमनादिशून्यमोंकारमेकं रविकोटिदीप्तम् । पश्यन्ति ये सर्वजनान्तरस्थं हंसात्मकं ते विरजा भवन्ति ॥२४

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ध्यानबिन्दूपनिषत् ] [ २८१ आत्मा को नीचे की अरणी के रूप में ग्रहण करके प्रणव को ऊपर की अरणी बनावे । इन दोनों के मंथन रूप ध्यानाभ्यास से गूढ़ तत्व का दर्शन करे ॥ २२ ॥ ॐकार की ध्वनि के नाद सहित रेचक का अन्त होने पर नाद का लय हो जाता है। इस प्रकार का ध्यान अपनी सामर्थ्य के अनुसार करे ॥ २३ ॥ गमनागमन में स्थित और गमनादि से शून्य ऐसे करोड़ों सूर्य की दीप्ति के सदृश्य, सबके हृदय में रहने वाले हंसात्मक ॐकार का जो दर्शन करते हैं वे निष्पाप हो जाते हैं ॥ २४ ॥ यन्मनस्त्रिजगत्सृष्टिस्थिति प्रलयकर्मकृत् । तन्मनो विलयं याति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥२५ अष्टपत्रं तु हृत्पद्मं द्वात्रिंशत्केसरान्वितम् । तस्य मध्यगतो भानुर्भानुमध्यगतः शशी ॥२६ शशिमध्यगतो वह्निर्वह्निमध्यगता प्रभा । प्रभामध्यगतं पीठं नानारत्नप्रवेष्टितम् ॥२७ तस्य मध्यगतं देवं वासुदेवं निरञ्जनम् । श्रीवत्सकौस्तुभोरस्कं मुक्तामणिविभूषितम् ॥ शुद्धस्फटिकसंकाशं चन्द्रकोटिसमप्रभम् । एवं ध्यायेन्महाविष्णुमेवं वा विनयान्वितः ॥२६ अतसीपुष्पसंकाशं नाभिस्थाने प्रतिष्ठितम् । चतुर्भुजं महाविष्णुं पूरकेण विचिन्तयेत् ॥३० सृष्टि, स्थिति और लय होने का कारण जो मन में है उसका जहाँ विलय होता है वहीं विष्णु का परमपद है ॥ २५ ॥ आठ दल और बत्तीस पंखुड़ियों का जो हृदय कमल है उसके मध्य में सूर्य और सूर्य के मध्य में चन्द्रमा स्थित है ॥ २६ ॥ चन्द्रमा के मध्य में

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CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri २८२ ] [ ध्यानबिन्दूपनिषत् अग्नि है और अग्नि के मध्य में प्रभा है, प्रभा के मध्य में नाना प्रकार के रत्नों से जड़ा पीठस्थान है, उसके मध्य में निरञ्जन भगवान् वासुदेव हैं, जो श्रीवत्स कौस्तुभमणि और मणि मुक्ताओं का धारण किये हुये हैं ॥ २७—२८ ॥ शुद्ध स्फटिक के समान, करोड़ों चन्द्रमा की-सी प्रभा वाले महाविष्णु का विनयावनत भाव से ध्यान करे ॥ २६ ॥ अलसी के पुष्प के समान नाभिस्थान में प्रतिष्ठित चार भुजा वाले महाविष्णु का पूरक करता हुआ ध्यान करे ॥ ३० ॥ कुम्भकेन हृदि स्थाने चिन्तयेत्कमलासनम् । ब्राह्माणं रत्नगौराभं चतुर्वक्त्रं पितामहम् ॥३१॥ रेचकेन तु विद्यात्मा ललाटस्थं त्रिलोचनम् । शुद्धस्फटिकसंकाशं निष्कलं पापनाशनम् ॥३२॥ अब्जपत्रमधःपुष्पमूर्ध्वनालमधोमुखम् । कदलीपुष्पसंकाशं सर्ववेदमयं शिवम् ॥३३॥ शताब्दं शतपत्राढ्यं विप्रकीर्णाब्जकर्णिकम् । तत्रार्कचन्द्रवह्नीनामुपर्युपरि चिन्तयेत् ॥३४॥ पद्मस्योद्घाटनं कृत्वा सूर्यचन्द्राग्निवर्चसः । तस्य हृद्वीजमाहृत्य आत्मानं चरते ध्रुवम् ॥३५॥ कुम्भक के समय हृदय स्थान पर कमलासन पर विराजमान लालिमायुक्त और गौर वर्ण वाले, चार मुँह वाले पितामह ब्रह्मा का ध्यान करे ॥ ३१ ॥ रेचक के समय ललाट स्थान में श्वेत स्फटिक के समान, निष्फल, पापनाशक त्रिलोचन भगवान शङ्कर का ध्यान करे ॥ ३२ ॥ कदली पुष्प के समान नीचे की तरफ फूल, ऊपर डण्डी, नीचे मुख, इस प्रकार सर्व वेदमय शिव हैं ॥ ३३ ॥ सौ आरे, सौ पत्ते और विस्तीर्ण पंखुड़ियों से युक्त हृदय-कमल पर सूर्य, चन्द्रमा