१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
१५४ ] [ पंचम अध्याय
१५४ ] [ पंचम अध्याय CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri आस्थामात्रमनन्तानां दुःखानामाकरं विदुः । अनास्थामात्रमभितः सुखानामालयं विदुः ॥८५ वासनातन्तुबद्धोऽयं लोको विपरिवर्तते । सा प्रसिद्धाऽतिदुःखाय सुखायोच्छेदमागता ॥८६ धीरोऽप्यतिबहुज्ञोऽपि कुलजोऽपि महानपि । तृष्णया बध्यते जन्तुः सिंहः शृङ्खलया यथा ॥८७ परमं पौरुषं यत्नमास्थायादाय सूक्ष्मम् । यथाशास्त्रमनुद्वेगमाचरन् को न सिद्धिभाक् ॥८८ . अहं सर्वमिदं विश्वं परमात्माऽहमच्युतः । नान्यदस्तीति संवित्त्या पर [ प्रथ ] मा सा ह्यहंकृतिः ॥८९ सर्वस्माद्व्यतिरिक्तोऽहं वालाग्रादप्यहं तनुः । इति या संविदो ब्रह्मन् द्वितीयाऽहंकृति शुभा ॥६० मोक्षायैषा न बन्धाय जीवन्मुक्तस्य विद्यते ॥६१ पाणिपादादिमात्रोऽयमह मित्येष निश्चयः । अहंकारस्तृतीयोऽसौ लौकिकस्तुच्छ एव सः ॥६२ वर्ज्य इव दुरात्माऽसौ कन्दः संसारदुस्तरोः । अनेनाभिहतो जन्तुरधोऽधः परिधावति ॥६३ अनया दुरहंकृत्या भावात् संत्यक्तया चिरम् । शिष्टाहङ्कारवान् जन्तुः शमवान् याति मुक्तताम् ॥६४ प्रथमो द्वावहङ्कारावङ्गीकृत्य त्वलौकिकौ । तृतीयाऽहंकृतिस्त्याज्या लौकिकी दुःखदायिनी ॥६५ अथ ते अपि संत्यज्य सर्वाहंकृतिवर्जितः । स तिष्ठते तथाऽत्युच्चैः परमेवाधिरोहति ॥६६ संसार में आशा ही अनन्त दुःखों को उत्पन्न करने वाली है, केवल अनास्था ही सुख का सदन समझना चाहिए । वासना के सूत्र- बन्धन में बँधा हुआ यह विश्व पुनः-पुनः प्रकट होता है । वह वासना
महोपनिषत् ] [ १५५ अत्यन्त दुःखदायिनी होती हुई समस्त सुखों को समूल नष्ट करने वाली होकर आती है। वासना के पाश में अत्यन्त धीर, वीर कुलीन, महान् अथवा बहुश्रुत भी वैसे ही बंध जाते हैं, जैसे जंजीरों में सिंह बँध जाता है। ऐसा कौन-सा पुरुष है जो शास्त्रानुकूल आचरण और श्रेष्ठ कामों को करता हुआ भी सिद्धि को प्राप्त नहीं होता ? मैं सम्पूर्ण विश्वस्वरूप हूँ, अच्युत परमात्मा हूँ, मुझसे भिन्न कुछ भी नहीं है, इस प्रकार का ज्ञानात्मक अहंभाव श्रेय माना गया है। 'मैं बाल के अग्रभाग से भी अत्यन्त सूक्ष्म हूँ और सम्पूर्ण प्रपंच से परे हूँ' इस प्रकार का अहङ्कारयुक्त भाव मुक्ति देने वाला है, बन्धन प्राप्त कराने वाला नहीं। जीवन्मुक्त पुरुष ही ऐसे अहंभाव से युक्त होते हैं। 'मैं हाथ-पांव आदि सहित शरीर वाला हूँ' यह लौकिक अहंकार अत्यन्त तुच्छ श्रेणी का है। अहङ्कार से ओत-प्रोत दुरात्मभाव वाला प्राणी ही दुःखदायी संसार-वृक्ष की जड़ है। इसके द्वारा ताड़ित जीव नीचे गर्त की ओर ही जाता है। इस तृतीय प्रकार के दुःखदायी अहङ्कार को छोड़कर श्रेष्ठ अहंभाव में लगने वाला प्राणी शमवान् होता हुआ कल्याण को पाता है। प्रारम्भ में प्रथम दो अहंभावों में लगकर तीसरे प्रकार के अहंभाव का त्याग करे और जैसे ही साधन शक्ति बढ़े, वैसे ही उन दोनों का भी त्याग कर निरहंकार वृत्ति धारण करे, इससे ही उच्च पद की प्राप्ति सम्भव है ॥८५-६६॥ भोगेच्छामात्र को बन्धस्तत्त्यागो मोक्ष उच्यते । मनसोऽभ्युदतो नाशो मनोनाशो महोदयः । ज्ञमनो नाशमभ्येति मनोऽज्ञस्य हि शृंखला । ६७ नानन्दं ननिरानन्दं नचलं नाचलं स्थिरम् । नसन्नासन्न चैतेषां मध्यं ज्ञाननिमनो विदुः ॥६८ यथा सौक्ष्म्याच्चिदाभास्य आकाशो नोपलक्ष्यते । तथा निरंशश्चिद्भावः सर्वगोऽपि न लक्ष्यते ॥६६
१५६ ] [ पंचम अध्याय
१५६ ] [ पंचम अध्याय CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri सर्वसंकल्परहिता सर्व संज्ञाविवर्जिता । सैषा चिदविनाशात्मा स्वात्मेत्यादिकृताभिधा ॥१०० आकाशशतभागाच्छा ज्ञेषु निष्कलरूपिणी । सकलाऽमलसंसारस्वरूपैकात्मदर्शिनी ॥१०१ नास्तमेति न चोदेति नोत्तिष्ठति न तिष्ठति । न च याति न चायाति न च नेह न चेह चित् ॥१०२ सैषा चिदमलाकारा निर्विकल्पा निरास्पदा ॥१०३ आदौ शमदमप्रायैर्गुणैः शिष्यं विशोधयेत् । पश्चात् सर्वमिदं ब्रह्म शुद्धस्त्वमिति बोधयेत् ॥१०४ अज्ञस्यार्ध प्रबुद्धस्य सर्वं ब्रह्मेति यो वदेत् । महानरकजालेषु स तेन विनियोजितः ॥१०५ प्रबुद्धबुद्धेः प्रक्षीणभोगेच्छस्य निराशिषः । नास्त्यविद्या मलमिति प्राज्ञस्तूपदिशेद्गुरुः ॥१०६ सति दीप इवालोकः सत्यर्क इव वासरः । सति पुष्प इवामोदश्चिति सत्यां जगत्तथा ॥१०७ किसी प्रकार की भी भोगेच्छा हो, वह बन्धन स्वरूप ही है और भोगेच्छा का त्याग ही मुक्ति है। मन का नाश ही मनोन्नति का कारण है। मन का नाश भाग्यवान पुरुषों का ही होता है। ज्ञानी पुरुषों का मन नष्ट हो जाता है। ज्ञानी जन मन को न तो आनन्द मानते हैं और न आनन्दरहित । वे उसे चल, अचल, स्थिर, सत्, असत् अथवा उसके मध्य की अवस्था वाला भी नहीं मानते, परन्तु अज्ञानी जन मन के बन्धन में पड़े रहते हैं। सभी संकल्पों से परे और सब संज्ञाओं से रहित इस चिदात्मा को अविनाशी एवं स्वात्मा आदि कहा गया है। यह अखण्ड चेतन सत्ता सर्वव्याप्त होते हुए भी उसी प्रकार दिखाई नहीं देती जिस प्रकार चित् में स्थित आकाश सूक्ष्मता के कारण परिलक्षित Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
महोपनिषत् ] [ १५७ नहीं होता। ज्ञानी जन जिस चित्, चेतन सत्ता को आकाश से भी शतशः स्वच्छ और अवयवरहित देखते हैं, वह सम्पूर्ण निर्मल विश्व के रूप में केवल स्वयं को ही दिखाती है। वह सत्ता कभी उदय या अस्त को प्राप्त नहीं, वह गमनागमन से रहित है, न स्थिर रहती है और न उठती-बैठती है। वह वहां है न यहाँ है। वह तो अवलम्ब- रहित और विकल्परहित है। उसका स्वरूप निर्मल है। शम-दम आदि गुणों के द्वारा शिष्य के अन्तःकरण को शुद्ध करना गुरु का कर्तव्य है। फिर उसे ब्रह्मस्वरूप का बोध कराना चाहिए कि 'यह सब कुछ और तुम भी ब्रह्म रूप हो।' जो ज्ञान रहित तथा अर्द्ध विकसित बुद्धि वाला है उसके समक्ष 'सब कुछ ब्रह्म है' ऐसा कहना उसे नरक रूप में ही धक्का देने के समान है। वेदान्त का उपदेश तो उसे ही देना चाहिए जिसकी भोगेच्छा नष्ट होकर बुद्धि जाग्रत हो गई है। जैसे दीपक से प्रकाश सम्भव है, सूर्योदय होने पर ही दिन की स्थिति है और पुष्प से ही सुगन्ध निकल सकती है वैसे चित्-चेतन से संसार स्थित है। यथार्थ में तो इस संसार का अस्तित्व है ही नहीं, यह तो केवल आभास मात्र है। जब तुम्हारी दृष्टि आवरण रहित हो जायेगी और उसमें ज्ञान का प्रकाश भर जायगा, तब तुम स्वयं ही अपने रूप में स्थित हो जाओगे। उसी समय तुम्हें मेरे उपदेश की सार-असारता का भले प्रकार ज्ञान हो सकेगा ॥६७-१०७॥ प्रतिभासत एवेदं न जगत् परमार्थतः । ज्ञानदृष्टौ प्रसन्नायां प्रबोधे विततोदये ॥१०८ यथावज्ज्ञास्यसि स्वस्थो मद्वाग्वृष्टिबलाबलम् । अविद्ययैवोत्तमया स्वार्थनाशोद्यमार्थया ॥१०६ विद्या संप्राप्यते ब्रह्मन् सर्वदोषापहारिणी । शाम्यति ह्यस्त्रमस्त्रेण मलेन क्षाल्यते मलम् ॥११० शमं विषं विषेणैति रिपुणा हन्यते रिपुः ।
१५८ ] [महोपनिषत् ईदृशी भूतसायेयं या स्वनाशेन हर्षदा ॥१११ न लक्ष्यते स्वभावोऽस्या वीक्ष्यमाणैव नश्यति । नास्त्येषा परमार्थेनेत्येवं भावनयेद्धया ॥११२ सर्वं ब्रह्मेति यस्यान्तर्भाविना सा हि मुक्तिदा । भेदद्रष्टिरविद्येयं सर्वथा तां विसर्जयेत् ॥११३ श्रेष्ठ अविद्या स्वार्थ को नष्ट करने के लिये ही उद्यत है, उसी के द्वारा सर्वदोषनाशिनी विद्या प्राप्त होती है । अस्त्र ही अस्त्र को काटता है और मल से ही मल घुलता है । विष ही विष को नष्ट करने वाला है, शत्रु ही शत्रु का संहार करता है । इसी प्रकार यह भूत माया अपने ही नाश द्वारा प्रसन्न होती है । इसका स्वरूप दृष्टिगोचर नहीं होता । जब यह दिखाई देती है, तभी नाश को प्राप्त होती है । परन्तु इसे माया न मानकर सब कुछ ब्रह्म मानना ही मोक्ष प्राप्ति का साधन है । भेद का दिखाई देना ही अविद्या है, इसलिए भेद-दृष्टि का त्याग करना ही श्रेयस्कर है ॥१०८-११३॥ मुने नासाद्यते तद्धि पदमक्षयमुच्यते । कुतो जातेयमिति ते द्विज माऽस्तु विचारणा ॥११४ इमां कथ महं हन्मीत्येषा तेऽस्तु विचारणा । अस्तं गतायां क्षीणायामस्यां ज्ञास्यसि तत् पदम् ॥११५ यत एषा यथा चैषा यथा नष्टेत्यखण्डितम् । तदस्या रोगशालाया तत्नं कुरु चिकित्सने ॥११६ यथैषा जन्मदुःखेषु न भूयस्त्वां नियोक्ष्यति । स्वात्मनि स्वपरिस्पन्दैः स्फुरत्यच्छेश्चिदर्णवः ॥११७ एकात्मकमखण्डं तदित्यन्तर्भाव्यतां दृढम् । किंचित्क्षुभितरूपा सा चिच्छक्तिश्चिन्महार्णवे ॥११८ तन्मयैव स्फुरत्यच्छा तत्रैवोर्मिरिवार्णवे । आत्मन्येवात्मना ऽम्भोरित्न यथा सरति मारुतः ॥११९॥
महोपनिषत् ] [ १५६ तथैवात्माऽऽत्मशक्त्यैव स्वात्मन्येवेति लोलताम् । क्षणं स्फुरित सा देवी सर्वशक्तितया तथा ॥१२० देशकालक्रियाशक्तिं यस्याः संप्रकर्षति । स्वस्वभावं विदित्वोच्चैरप्यनन्तपदे स्थिता ॥१२१ रूपं परिमितेनासौ भावयत्यविभाविता । यदैवं भावितं रूपं तया परमकान्तया ॥१२२ तदैवैनामनुगता नामसंख्यादिका दृशः । विकल्पकलिताकारं देशकालक्रियाऽऽस्पदम् ॥१२३ चितो रूपमिदं ब्रह्मन् क्षेत्रज्ञ इति कथ्यते । वासनाः कल्पयन् सोऽपि यात्यहंकारतां पुनः ॥१२४ अहङ्कारो विनिर्णॆता कलङ्की बुद्धिरुच्यते । बुद्धिः सङ्कल्पितकारा प्रयाति मननास्पदम् ॥१२५ मनो घनविकल्पं तु गच्छतीन्द्रियतां शनैः । पाणिपादमयं देहमिन्द्रियाणि विदुर्बुधाः ॥१२६ एवं जीवो हि संकल्पवासनारज्जुवेष्टितः । दुःखजालपरीतात्मा क्रमादायाति नोचताम् ॥१२७ इति शक्तिमयं चेतो घनाहंकारतां गतम् । कोशकारक्रमिरिव स्वेच्छया याति बन्धनम् ॥१२८ स्वसंकल्पिततन्मात्रजालाभ्यन्तरवर्ति च । परां विवशतामेति शृंखलाबद्धसिंहवत् ॥१२९ क्वचिन्मनः क्वचिद्बुद्धिः क्वचिज्ज्ञानं क्वचित् क्रिया । क्वचिदेतहंकारः क्वचिच्चित्तमिति स्मृतम् ॥१३० क्वचित् प्रकृतिरित्युक्तं क्वचिन्मायेति कल्पितम् । क्वचिन्मलमिति प्रोक्तं क्वचित् कर्मेति स स्मृतम् ॥१३१॥ क्वचित्बन्ध इति ख्यातं क्वचित् पुर्यष्टकं स्मृतम् । प्रोक्तं क्वचिदविद्येति क्वचिदिच्छेति संमतम् ॥१३२
१६० ] [ ... अध्याय
१६० ] [ ... अध्याय इमं संसारमखिलमाशापाशविधायकम् । दधदन्तः फलैर्हीनं वटधाना वटं यथा ॥१३३ हे पुत्र ! जो प्राप्त नहीं होता वह अक्षयपद कहा जाता है । माया की उत्पत्ति किसके द्वारा हुई, तुम्हें इसका विचार नहीं करना है । तुम्हें तो इस पर विचार करना चाहिये कि मैं इस माया को कैसे नष्ट करूँ ? जब यह क्षीण होकर नष्ट हो जाय, तभी अक्षय पद का ज्ञान पा सकोगे । यह जहाँ से प्रकट होती है, इसका जैसा स्वरूप है, जैसे यह नष्ट होगी इसका विचार करते हुये इस रोग के मूल की ही चिकित्सा करनी चाहिए, जिससे यह तुम्हें बारम्बार जन्म-मरण के चक्र में न डाले और चित् रूपी समुद्र स्वयं में विभासित हो उठे । अपने अन्तर में यह दृढ़ भावना करे कि यह चित् सत्ता एक अखण्ड रूप की है । वह चित्-शक्ति चिन्मय रूप सागर में स्वल्प क्षोभ युक्त हो रही है । समुद्र में निर्मल चिन्मय तरंग ही लहरों के समान उठ रही हैं । वायु जैसे स्वयं ही आकाश सरोवर में लहरें मारता है, वैसे ही स्वात्मा में आत्मा तरङ्गित होता है । सर्व शक्ति सम्पन्नता के कारण ऐसी दिव्य स्फुरण क्षण भर के लिये होती है । जिस आत्मशक्ति को चलायमान करने में देश-काल और क्रियाशक्ति असमर्थ रहती है, वह आत्मशक्ति उच्च अनन्त पद में अवस्थित है । वह चित्-शक्ति जानी नहीं जाने से परिमित-सी होकर रूप-भावना वाली होती है । उस परम शक्ति में जब रूप की भावना होती है, तब उसके साथ नाम और संख्या आदि लग जाती है । चित् शक्ति का वह रूप देश, काल और क्रिया का आधार भूत है तथा विकल्प के रूप का धारण करने वाला है, वह क्षेत्रज्ञ कहा जाता है । फिर वह भी वासनाओं की कल्पना से अहंकार का धारक होता है । निश्चयात्मक एवम् दोषयुक्त हुआ अहंभाव ही बुद्धि कहा जाता है । वही बुद्धि जब सङ्कल्प का रूप धारण करती है तब मन रूप हो जाती है और मन जब घोर विकल्प में पड़ जाती है, तब धीरे-धीरे इन्द्रिय रूप को प्राप्त होता है । मेधावी जन
महोपनिषद् [ १६१
हाथ-पांव युक्त देह को ही इन्द्रिय बताते हैं। इस प्रकार सङ्कल्प और वासना की रस्सी में बँध जाने पर प्राणी दुःख-पास में फँस कर अधोगति को पाता है। जैसे रेशम बनाने वाला कीड़ा अपनी इच्छा से बन्धन में पड़ता है, वैसे ही शक्तिमय चित् घोर अहम्भाव को प्राप्त होकर बन्धन में पड़ जाता है। जंजीर में जकड़े हुये सिंह के समान अपने द्वारा ही कल्पित तन्मात्र रूपी पाश में रहकर यह चित्-शक्ति नितांत विवश हो जाती है। यह आत्मा ही कहीं अहंकार रूप से और कहीं चित् के नाम से जाना जाता है। उसे ही कहीं मन, कहीं बुद्धि और कहीं ज्ञान कहा गया है। वही कहीं क्रिया है, कहीं प्रकृति और मन कहा जाता है। इसे कहीं पुर्यष्टक और कहीं बन्धन कहा गया है। यह कहीं इच्छा है तो कहीं अविद्या। यही आशारूप पाश का निर्माता सम्पूर्ण जगत को वैसे ही धारण करता है, जैसे बिना फल का वट बीज वट के वृक्ष को धारण करता है ॥ ११४-१३३ ॥
चिन्तानलशिखादग्धं कोपाजगर चर्वितम् । कामाब्धिकल्लोलरतं विस्मृतात्मपितामहम् ॥१३४ समुद्धर मनो ब्रह्मन् मातङ्गमिव कर्दमात् । एवं जीवाश्चितो भावा भवभावनयाऽऽहिताः ॥१३५ ब्रह्मणा कल्पिताकारा लक्षशोऽप्यथ कोटिशः । संख्याऽतीताः पुरा जाता जायन्तेऽद्यापि चाभितः ॥१३६ उत्पत्स्यन्तेऽपि चैवान्ये कणौघा इव निर्झरात् । केचित् प्रथमजन्मानः केचिज्जन्मशताधिकाः ॥१३७ केचित् च्चासंख्यजन्मानः केचित् द्वित्रिभवान्तराः । केचित् किन्नरगन्धर्वविद्याधरमहोरगाः ॥१३८ केचिदर्केंदुवरुणास्यक्षाधोक्षपद्मजाः । केचिद्ब्राह्मणभूपालवैश्यशूद्रगणाः स्थिताः ॥१३९
१६२ ] [ पंचम अध्याय
१६२ ] [ पंचम अध्याय केचित्तृणौषधिवृक्षफलमूलपतंगकाः । केचित् कदम्बजम्बीरसालतालतमालकाः ॥१४० केचिन्महेन्द्रमलयसह्यमन्दरमेरवः । केचित् क्षारोदधिक्षीरघृते क्षुजलराशयः ॥१४१॥ केचिद्दिशालाः ककुभः केचिन्नद्यो महारयाः । विहरन्त्युच्चकैः केचिन्निपतन्त्युत्पतन्ति च ॥१४२ कन्दुकाइव हस्तेन मृत्युनाऽविरतं हताः । भुक्त्वा जन्मसहस्राणि भूयः संसारसंकटे ॥१४३ पतन्ति केचिदबुधाः संप्राप्यापि विवेकिताम् । दिक्कालाद्यनवच्छिन्नमात्मतत्त्वं स्वशक्तितः ॥१४४ लीलयैव यदादत्ते दिक्कालकलितं वपुः । तदेव जीवपर्यायवासनावेशतः परम्ः ॥१४५ मनः संपद्यते लोलं कलनाकलनोन्मुखम् । कलयन्ती मनः शक्तिरादौ भावयति क्षणात् ॥१४६ आकाशभावनामच्छां शब्दबीजरसोन्मुखीम् । ततस्तद् घनतां यातं घनस्पन्दक्रमन्मनः ॥१४७ भावयत्यनिलस्पन्दं स्पर्शवीजरसोन्मुखम् । ताभ्यामाकाशवाताभ्यां दृढाभ्यासवशात्ततः ॥१४८ शब्दस्पर्शस्वरूपाभ्यां संघर्षाज्जम्यतेऽनलः । रूपतन्मात्रसहितं त्रिभिस्तैः सह संमितम् ॥१४६ मनस्ताहग्गुणगतं रसतन्मात्रवेदनम् । क्षणाच्चेतत्यपां शैत्यं जलसंवित्ततो भवेत् ॥१५० ततस्तादृग्गुणगतं मनो भावयति क्षणात् । गन्धतन्मात्रमेतस्माद् भूमिसंवित्ततो भवेत् ॥१५१
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri महोपनिषत् ] [ १६३ अथेत्थंभूततन्मात्रवेष्टितं तनुतां जहत् । वपुर्वृत्तिकणाकारं स्फुरितं व्योम्नि पश्यति ॥१५२ अहंकारकलायुक्तं बुद्धिबीजसमन्वितम् । तत्पुर्यष्टकमित्युक्तं भूतहृत्पद्मषट्पदम् ॥१५३ तस्मिंस्तु तीव्रसंवेगाद्भावयद् भासुरं वपुः स्थूलतामेति पाकेन मनो विल्वफलं यथा ॥१५४ मूषास्थद्रुतहेमाभं स्फुरितं विमलाम्बरे । संनिवेशमथादत्ते तत्तजः स्वस्वभावतः ॥१५५ ऊर्ध्वं शिरः पिण्डमयमधः पादमयं तथा । पार्श्वयोर्हस्तसंस्थानं मध्ये चोदरधर्मिणम् ॥१५६ कालेन स्फुटतामेत्य भवत्यमलविग्रहम् । बुद्धिसत्त्वबलोत्साहविज्ञानैश्वर्यस्थितः । स एव भगवान् ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ॥१५७ हे ब्रह्मन् ! जैसे हाथी कीचड़ में फँस जाता है, वैसे ही यह मन चिन्तारूपी अग्नि की ज्वाला से जलाया हुआ, क्रोधरूप अजगर द्वारा काटा हुआ और कामरूपी समुद्र के भंवर जाल में पड़ा हुआ है । यह अपने पितामह आत्मा को भी भूल गया है इसलिये इसी का सर्वप्रथम उद्धार करो । जीव के आश्रित हुये अनेक भाव लाखों, करोड़ों भेदों में ब्रह्म के द्वारा कल्पित होकर उत्पन्न हुए और हो रहे हैं। जैसे निर्झर में जल-कणों की उत्पत्ति होती है वैसे ही यह भविष्य में भी होते रहेंगे । कुछ भाव तो सैकड़ों बार उत्पन्न हो चुके हैं, कुछ असंख्य बार उत्पन्न हुये हैं, कोई दो-तीन बार ही उत्पन्न हुये और कुछ तो ऐसे हैं जो प्रथम बार ही जन्म ग्रहण कर रहे हैं । इन सबने विभिन्न नामरूप धारण किये हैं । कोई सूर्य, चन्द्रमा, हरि, शिव, वरुण, ब्रह्मा आदि के रूप में हैं तो कोई किन्नर, यक्ष, गन्धर्व और नाग रूप में प्रकट हुये हैं ।
१६४ ] [ पंचम अध्याय
१६४ ] [ पंचम अध्याय कुछ ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि नाम धारण किया है। कोई ताड़, तमाल, कदम्ब, नींबू, आम, तृण औषधि वृक्ष, मूल, पत्र एवं फल बन गए हैं, तो कोई विभिन्न पर्वतों के आकार में स्थित होकर मन्दर, मेरु, मलय, महेन्द्र आदि कहे जाते हैं। कोई जल-राशि के रूप में, कोई समुद्र, दूध, घृत, इक्षु-रस आदि के रूप में स्थित हुये हैं। कुछ ने महती दिशाओं का रूप धारण किया है तो कोई अत्यन्त वेगवाली नदी के रूप में प्रवाहित हो रहे हैं। जैसे हाथ से गेंद को बारम्बार गिराते हुये उछालते हैं उस प्रकार कुछ को मृत्यु बारम्बार ताड़ित करती है। अनेकों ऐसे हैं कि आकाश में उठते और फिर नीचे गिर जाते हैं। अनेक मनुष्य ऐसे हैं जो विवेकी होकर भी अच्छे कर्म नहीं करते और हजारों जन्म भोग लेने पर भी उनका आवागमन नहीं मिटता। आत्म- तत्व जब दिशा और काल के प्रभाव से तथा अपनी शक्ति के द्वारा देह धारण करता है तब वही वासना से प्रभावित सङ्कल्पों की ओर जाने वाले चंचल मन के रूप में हो जाता है। यह सङ्कल्पों से ओत प्रोत मन शक्ति क्षण भर में ही स्वच्छ आकाश की भावना वाली हो जाती है उसमें शब्द रूप बीज के अंकुर फूटते हैं। फिर वही मन अधिक घनीभूत होकर स्पन्दन क्रम के कारण वायु-स्पन्दन के भाव में रमता है। उसमें स्पर्श रूप वीज के अंकुर लगते हैं। फिर दृढ़ अभ्यास से शब्द-स्पर्श रूप आकाश की उत्पत्ति होती है और वायु की टक्कर से अग्नि प्रकट होता है। वह अग्नि रूप तन्मात्रा के सहयोग से त्रिगुणात्मक हो जाता है और उन तीनों गुणों के साथ मिलकर मन रस-तन्मात्रा की भावना करता है। उस समय वह जल के शीतल गुण का चिन्तन करता हुआ जल का अनुभव करने लगता है। फिर वह चार गुणों वाला होकर गंध तन्मात्रा मय होकर पृथिवी का अनुभव करता है। इस प्रकार पांचों तन्मात्राओं से युक्त होकर वह अपनी सूक्ष्मता त्याग कर आकाश में अग्नि की चिङ्गारियों के रूप में स्फुरित होते हुये शरीर को देख पाता
महोपनिषत् [ १६५ है। वह शरीर ही अहङ्कार कलाओं से युक्त और बुद्धिबीज से समन्वित पुर्यष्टक कहा गया है। वह प्राणियों के हृदय कमल में मँडराने वाले भौंरे के समान है। जैसे पाक कराने पर विल्वफल स्थूलता को प्राप्त होता है वैसे ही उस सूक्ष्म शरीर में तीव्र संवेगात्मक तेजस्वी शरीर की भावना होने पर स्थूल हो जाता है। वह तेज उस स्वच्छ आकाश में मूषा में लगाये हुये सोने के समान स्फुरित होता और अपने स्वभावा- नुकूल ही गठित हो जाता है। वह ऊपर सिर के समान, नीचे पांवों के समान, पार्श्वों में भुजाओं और मध्य में उदर के समान होता जाता है। इस प्रकार पूर्ण शरीर को प्राप्त हो जाता है। वही शरीर बुद्धि, बल, वीर्य, उत्साह, विज्ञान एवं वैभव से सम्पन्न हुआ सब लोकों का पितामह ब्रह्मा बन जाता है ॥ १३४-१५७ ॥
अवलोक्य वपुर्ब्रह्मा कान्तमात्मोयमुत्तमम् ।।१५८ चिन्तामभ्येत्य भगवांस्त्रीकालामलदर्शनः । एतस्मिन् परमाकाशे चिन्मात्रैकात्मरूपिणि ।।१५६ अदृष्टापारपर्यन्ते प्रथमं किं भवेदिति । इति चिन्तितवान् ब्रह्मा सद्योजातामलात्महक् ।।१६० अपश्यत् सर्गवृन्द्वानि समतीतान्यनेकंशः । स्मरत्यथो स सकलान् सर्गधर्मगुणक्रमात् ।।१६१ लीलया कल्पयामास चित्राः संकल्पतः प्रजाः । नानाऽऽचारसमारम्भा गन्धर्वनगरं यथा ।।१६२ तासां स्वर्गापवर्गार्थं धर्मकामार्थसिद्धये । अनन्तानि विचित्राणि शास्त्राणि समकल्पयत् ।।१६३ विरिञ्चिरूपान्मनसः कल्पितत्वाज्जगत्स्थितेः । तावत्स्थितिरियं प्रोक्ता तन्नाशे नाशमाप्नुयात् ।।१६८ न जायते न म्रियते क्वचित् किंचित कदाचन ।
१६६ ] [ पंचम अध्याय
१६६ ] [ पंचम अध्याय परमार्थेन विप्रेन्द्र मिथ्या सर्वं तु दृश्यते ॥१६५ कोशमाशाभुजंगानां संसाराडम्बरं त्यज । असदेतदिति ज्ञात्वा मातृभाव निवेशय ॥१६६ गन्धर्वनगरस्यार्थे भूषितेऽभूषिते तथा । अविद्यांशे सुतादौ वा कः क्रमः सुखदुःखयोः ॥१६७ धनदारेषु वृद्धेषु दुःखं युक्तं न तुष्टता । वृद्धायां मोहमायायां कः समाश्वासवानिह ॥१६८ यैरेव जायते रागो मूर्खस्याधिकतां गतै । तैरेव भोगैः प्राज्ञस्य विराग उपजायते ॥१६६ अतो निदाघ तत्त्वज्ञ व्यवहारेषु संसृतेः । नष्टं नष्टंपेक्षस्व प्राप्तं प्राप्तमुपाहर ॥१७० अनागतानां भोगानामवाञ्छनमकृत्रिमम् । आगतानां च संभोग इति पण्डितलक्षणम् ॥१७१ शुद्धं सदतोर्मध्यं पदं बुद्ध्वाऽवलम्ब्य च । सबाह्याभ्यन्तरं दृश्यं मा गृहाण विमुञ्च मा ॥१७२ यस्य नेच्छा तथाऽनिच्छा ज्ञस्य कर्मणि तिष्ठतः । न तस्य लिप्यते प्रज्ञा पद्मपत्रमिवाम्बुभिः ॥१७३ यदि ते नेन्द्रियार्थश्रीः स्वदते हृदि वै द्विज । तदा विज्ञातविज्ञेयः समुत्तीर्णो भवार्णवात् ॥१७४ उच्चैः पदाय परया प्रज्ञया वासनागणात् । पुष्पाद्गन्धमिवोदारं चेतोवृत्तिं पृथक्कुरु ॥१७५ इस प्रकार प्रकट हुये ब्रह्मा जी भूत, भविष्यत, वर्तमान के प्रत्यक्ष देखने वाले हैं। उन्होंने अपने सुन्दर देह को देखकर विचार किया कि इस चिन्मात्र रूपी परमाकाश का आदि अन्त नहीं दिखाई देता । इसमें
महोपनिषत् [ १६७ सर्व प्रथम क्या हो ?' ऐसा विचार करते हुये उनकी आत्म-दृष्टि चैतन्य हुई और उन्हें अतीत में हुई सृष्टि के अनेकों सर्ग दिखाई दिए । उससे उन्हें सब धर्मों और गुणों के क्रम याद हो आए । उन्होंने अपने संकल्पों के द्वारा ही लीला पूर्वक विभिन्न प्रकार के रङ्गरूप और आचार विचार वाली प्रजा को उत्पन्न किया । उनके धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की सिद्धि के लिये उन्होंने चित्र-विचित्र पदार्थों पद्धतियों, शास्त्रों और स्वर्ग नरकादि की कल्पना की। हे पुत्र ! यह मन ही ब्रह्मरूप है, क्योंकि कल्पना द्वारा संसार के स्थित होने के कारण ब्रह्मा के जीवन के साथ ही इसका जीवन है। जब ब्रह्मा की आयु समाप्त होती है, तब यह मन भी समाप्त हो जाता है । हे ब्रह्मन् ! यथार्थ में तो न कहीं कोई जन्म लेता है और न मृत्यु को प्राप्त होता है। यह जो कुछ दिखाई देता है वह सब मिथ्या है । यह संसार प्रपंच आशारूपी सर्पिणियों की पिटारी मात्र है, इसका त्याग करना ही श्रेयस्कर है। इसे असत् जानकर मातृ- भाव में अवस्थित होना उचित है। गंधर्व नगर सुसज्जित या असज्जित कैसा भी क्यों न हो, तुच्छ ही है। उसी के समान अविद्या के अंश रूप यह पुत्र, पत्नी आदि भी तुच्छ ही हैं। फिर इनके कारण सुख-दुःख मानने से क्या लाभ है ? धन, स्त्री आदि सब कुछ प्रपंच है, इनकी वृद्धि दुःख का ही कारण है। इसमें संतोष मानना ही निरर्थक है। मोह- माया की वृद्धि होने पर कोई भी सुख-शान्ति नहीं पा सका । जो वस्तुएँ अज्ञानी पुरुष को सुखमय प्रतीत होती हैं, उन्हीं वस्तुओं के प्रति ज्ञानी पुरुष विरक्त रहते हैं । इसलिये हे पुत्र ! तुम तत्वज्ञानी हो, जागतिक व्यवहारों में जिस-जिस का अभाव होता जाय उसकी इच्छा मत करो और जो-जो सहज प्राप्त हो, उसे ग्रहण करते रहो । अप्राप्त भोगों की इच्छा न करना और प्राप्त भोगों का उपभोग करना, यही पाण्डित्य है । सत्-असत् के मध्य शुद्ध पद का ज्ञान पाकर उसका अवलम्बन करना और बाह्याभ्यांतरिक दृश्यों का न ग्रहण करना और न त्याग करना,
१६८ ] पंचम अध्याय
१६८ ] पंचम अध्याय यही कर्म है। जैसे कीचड़ में कमल पत्र पड़ा रहकर भी उससे लिप्त नहीं होता, वैसे ही इच्छा और अनिच्छा को समान मानने वाले ज्ञानी- जन कर्म में लिप्त रहते हुए भी अपनी बुद्धि को उनमें लिप्त नहीं होने देते। यदि तुम्हारे हृदय में इन्द्रियों से युक्त विषय स्पन्दन नहीं करते, तो अवश्य ही तुम जानने योग्य पदार्थ का ज्ञान प्राप्त करके जगत रूप समुद्र से पार हो गए। वासना रूपी पुष्पों की सुगन्ध लेकर भी यदि उससे चित्तवृत्ति को शीघ्र हटा लिया जाय तो उच्चपद की प्राप्ति संभव है ॥१५८--१७५॥ संसाराम्बुनिधावस्मिन् वासनाऽम्बुपरिप्लुते । ये प्रज्ञानावमारुढास्ते तीर्णाः पण्डिताः परे ॥१७६॥ न त्यजन्ति न वाञ्छन्ति व्यवहारं जगद्गतम् । सर्वमेवानुवर्तन्ते पारावारविदो जनाः ॥१७७॥ अनन्तस्यात्मतत्वस्य सत्तासामान्यरूपिणः । चितश्चेत्योन्मुखत्वं यत्तत् सङ्कल्पाङ्कुरं विदुः ॥१७८॥ लेशतः प्राप्तसत्ताकः स एव घनतां शनैः । याति चित्तत्वमापूर्य दृढं जाड्यायमेधघत् ॥१७९॥ भावयन्ति (न्ती) चितिश्चैत्य व्यतिरिक्तमिवात्मनः । सङ्कल्पतामिवायाति बीजमङ्कुरतामिव ॥१८०॥ संकल्पनं हि संकल्पः स्वयमेव प्रजायते । वर्धते स्वयमेवाशु दुःखाय न सुखाययत् ॥१८१॥ मा सकल्पय संकल्प मा भावं भावय स्थितौ । संकलपनाशने यत्तो न भूयोजननुगच्छति ॥१८२॥ भावनाऽभावमात्रेण संकल्पः क्षीयते स्वयम् । संकल्पेनैव संकल्पं मनसैव मनो मुने ॥१८३॥
महोपनिषत् [ १६६ ] छित्त्वा स्वात्मनि तिष्ठ त्वं किमेतावति दुष्करम् । यथैवेदं नभः शून्यं जगच्छून्यं तथैव हि ॥१८४॥ तण्डुलस्य यथा चर्म यथा ताम्रस्य कालिमा । नश्यति क्रियया विप्र पुरुषस्य तथा मलम् ॥१८५॥ जीवस्य तण्डुलस्येव मलं सहजमप्यलम् । नश्यत्येव न संदेहस्तस्मादुद्योगवान् भव ॥१८६॥ यह संसार-सागर वासनारूपी जल से परिपूर्ण है। जो ज्ञानी पुरुष प्रज्ञा रूप नाव पर चढ़ गए, वे इससे पार हो गए। जो पुरुष इस सांसारिक प्रपञ्च के ज्ञाता हैं, वे न तो संसार के व्यवहारों की आकांक्षा करते हैं और न उसका त्याग ही करते हैं। वे सभी व्यवहारों में अनासक्त रहते हैं। विद्वानों ने संकल्प का अंकुरित होना आत्मतत्व रूप चेतन का विषयों की ओर दौड़ने को ही माना है क्योंकि संकल्प धीरे-धीरे दृढ़ होते जाते हैं और तब उनसे चित्ताकाश आच्छन्न होकर जड़त्व को प्राप्त होता है। जैसे बीज अंकुर रूप होने लगता है, वैसे ही चेतन-विषयों को अपने से पृथक-सा मानते हुये वह संकल्प रूप में स्थित होता है। संकल्प के द्वारा उसकी क्रिया स्वयं ही प्रकट होती है और जल्दी-जल्दी वृद्धि को प्राप्त होने लगती है। परन्तु वह क्रिया सुख देने वाली नहीं होती, बल्कि दुःख ही देती है। इसलिये हे पुत्र ! अपने चित्त में होने वाली संकल्प की क्रिया का अवरोध करो। यदि संकल्प उत्पन्न भी तो उसमें पदार्थ भावना न करो क्योंकि जो संकल्प को नष्ट करने के लिये कटिबद्ध है, वे उसको क्रियात्मक नहीं होने देते। यदि भावना नष्ट हो जाय तो संकल्प भी स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं। मन के द्वारा मन को जीतो और संकल्प के द्वारा संकल्प को नष्ट कर डालो। इस प्रकार आत्म-स्वरूप में स्थित होकर उद्योगी पुरुष बनने की चेष्टा करो। आकाश के समान यह संसार भी शून्य-
१७० ] [ षष्ठ अध्याय
१७० ] [ षष्ठ अध्याय है। जैसे ताँवे की कालौंच अथवा धान का छिलका प्रयत्न द्वारा पृथक किया जाता है, वैसे ही मनुष्य का मल-दोष क्रिया द्वारा ही नष्ट होना सम्भव है ॥१७६--१८६॥ ॥ पंचम अध्याय समाप्त ॥ षष्ठ अध्याय अन्तरास्थां परित्यज्य भावश्रीं भावनामयीम् । योऽसि सोऽसि जगत्यस्मिन् लीलया विहरानघ ॥१ सर्वत्राहमकर्तेति दृढभावनयाऽनया । परमामृतनाम्नी सा समतैवाशिष्यते ॥२ खेदोल्लासविलासेषु स्वात्मकर्तृतयैकया । स्वसंकल्पे क्षयं याते समतैवावशिष्यते ॥३ समताः सर्वभावेषु याऽसौ सत्यपरा स्थितिः । तस्यामवस्थितं चित्तं न भूयो जन्मभागभवेत् ॥४ अथवा सर्वकर्तृत्वमकर्तृत्वं च वै मुने । सर्वं त्यक्त्वा मनः पीत्वा योऽसि सोऽसि स्थिरो भव ॥५ शेषस्थिरसमाधानो येन त्यजसि तत्त्यज । चिन्मनः कलनाऽऽकारं प्रकाशतिमिरादिकम् ॥६ वासनां वासितारं च प्राणस्पन्दनपूर्वकम् । समूलमखिलं त्यक्त्वा व्योमसाम्यः प्रशान्तधीः ॥७ हृदयात् संपरित्यज्य सर्वां वासनापङ्क्तिकाम् । यस्तिष्ठति गतव्यग्रः स मुक्तः परमेश्वरः ॥८ दृष्टं द्रष्टव्यमखिलं भ्रान्तं भ्रान्त्या दिशो दश । युक्त्या वै चरतोऽज्ञस्य संसारो गोष्पदाकृतिः ॥६
महोपनिषत् ] [ १७१ सबाह्याभ्यान्तरे देहे ह्यध ऊर्ध्वं च दिक्षु च । इत आत्मा ततोऽप्यात्मा नास्त्यनात्ममय जगत ॥१०॥ हे पाप-रहित ! अन्तर की आस्था और भाव रूप सम्पत्ति का त्याग करके, अपने यथार्थ रूप में इस संसार में विचरण करो और स्वयं की सर्वत्र अकर्त्ता मानो, ऐसा करने से अमृता नाम वाली समता ही अवशिष्ट रहती है। खेद और उल्लास यह दोनों हो मनुष्य द्वारा स्वयं उत्पन्न किये हुये हैं। ऐसा समझ लेने पर समता ही शेष रहेगी । समता की यथार्थ स्थिति के भले प्रकार धारण कर लेने पर फिर आवागमन का कारण समाप्त हो जाता है। अथवा कर्त्तव्याकर्त्तव्य का त्याग कर डालो और मन का पान कर अपने यथार्थ रूप में स्थित हो जाओ । अन्त में सबका त्याग कर समाधिस्थ हो जाओ । चेतन ही प्रकाशरूप है और वही अन्धकार बन जाता है, क्योंकि वही मानसिक संकल्प का रूप धारण कर लेता है, इसलिए वासना के कारण का मूल सहित त्याग करके आकाश के समान स्वच्छ और शान्त मन वाले बनो। मुक्त वही जो हार्दिक रूप से सब वासनाओं को त्याग देता है और किसी प्रकार की आकुलता को मन में नहीं टिकने देता । वह भ्रान्ति के वश में पड़ कर दसों दिशाओं में चक्कर काटते हुये द्रष्टव्य पदार्थों को देखने में समर्थ है। देह के बाहर-भीतर, ऊपर-नीचे सर्वत्र आत्मा है, उसके लिए यह विश्व अनात्ममय कभी नहीं होता । अपितु जो लोग प्रयत्नपूर्वक सदाचार में रत रहते हैं वे ज्ञानी पुरुष इस संसार सागर को सहज में ही तरने योग्य बना लेते हैं ॥१-१०॥ न तदस्ति न यत्राहं य तदस्ति न तन्मयम् । किमन्यदभिवाञ्छामि सर्वं सच्चिन्मयं ततम् ॥११॥ समस्तं खल्विदं ब्रह्म सर्वमात्मेदमाततम् । अहमन्य इदं चान्यदिति भ्रान्तिं त्यजनघ ॥१२॥
१७२ ] षष्ठ अध्याय
१७२ ] षष्ठ अध्याय तते ब्रह्मघने नित्ये संभवन्ति न कल्पिताः । न शोकोऽस्ति न मोहोऽस्ति न जराऽस्ति न जन्म वा ॥१३॥ यदस्तीह तदेवास्ति विज्वरो भव सर्वदा । यथाप्राप्तानुभवतः सर्वत्वानभिवाञ्छनात् ॥१४॥ त्यागादानपरित्यागी विज्वरो भव सर्वदा । यस्येदं जन्म पाश्चात्यं तमाश्वेव महामते ॥१५॥ विशन्ति विद्या विमला मुक्ता वेणुमिवोत्तमम् । विरक्तमनसां सम्यक् स्वप्रसङ्गादुदाहृतम् ॥१६॥ द्रष्टृदृश्यसमायोगात् प्रत्ययानन्दनिश्चयः । यस्तं स्वमात्मतत्त्वोत्थं निष्पन्दं समुपास्महे ॥१७॥ द्रष्टृदर्शनदृश्यानि त्यक्त्वा वासनया सह । दर्शनप्रथमाभासमात्मानं समुपास्महे ॥१८॥ द्वयोर्मध्यगं नित्यमस्तिनास्तीति पक्षयोः । प्रकाशनं प्रकाशानामात्मानं समुपास्महे ॥१९॥ संत्यज्य हृद्गुहेशानं देवमन्यं प्रयान्ति ये । ते रत्नमभिवाञ्छन्ति त्यक्तहस्तस्थकौस्तुभाः ॥२०॥ उत्थितानुत्थितानेतानिन्द्रियारीन् पुनः पुनः । हन्याद्विवेकदण्डेन वज्रेणेव हरिर्गिरीन् ॥२१॥ हे पाप रहित-निदाघ ! मैं अन्य हूँ और यह अन्य है, इस प्रकार की भ्रांति त्याग देने योग्य ही है । जहाँ मैं नहीं हूँ, वह स्थान नहीं है, उस वस्तु का भी अभाव है, जो आत्ममय नहीं हो । यह सभी कुछ सत् और चिन्मय है तो मैं अन्य किस वस्तु की अभिलाषा करूँ ? यह सभी कुछ आत्मा है, यह निश्चय ही ब्रह्म है । इसमें शोक, मोह, जरा, जन्म कुछ भी नहीं है । इस नित्य सच्चिदानन्द घन परमेश्वर में कल्प-
नात्मक भावों की संभावना नहीं है । जो आत्मतत्व में है, वही सब कुछ है। इसलिए कहीं भी, किसी भी वस्तु की कामना न करते हुए जो सहज में ही प्राप्त हो जाय, उसको निर्लिप्त भाव से भोगता रहे । न किसी का त्याग और न ग्रहण, इस प्रकार विकार रहित रहो । हे पुत्र ! जिस पुरुष का यह जन्म अन्तिम अर्थात् जिसका आगे जन्म नहीं होना है उस पुरुष में श्रेष्ठ जाति के मुक्ता के समान स्वच्छ विद्या प्रविष्ट होती है । जिनके चित्त में वैराग्य का समावेश है उनके द्वारा भले प्रकार अपने अनुभव द्वारा यह मत व्यक्त किया जाता है कि दृष्टा को दृश्य के द्वारा जिस सुख की अनुभूति होती है, वह आत्मतत्व से उत्पन्न हुआ स्पन्दन ही है और हम उसी का भले प्रकार से उपासना करते हैं । अस्ति और नास्ति के मध्यस्थ, प्रकाशों के भी प्रकाशक आत्मा के हम उपासक हैं । वह आत्मा हमारे हृदय में महेश्वर रूप में स्थित है। जो व्यक्ति उस शाश्वत आत्मा को छोड़कर अन्य वस्तुओं की उपलब्धि के लिए प्रयत्नशील हैं, वे अपनी हस्तगता कौस्तुभ मणि का परित्याग कर अन्य रत्न की कामना करते हैं । यह इन्द्रिय रूपी शत्रु सबल हों या बलहीन, विवेक रूपी दण्ड से बारम्बार ताडन करने योग्य हैं । जैसे इन्द्र अपने वज्र के प्रहार द्वारा बड़े-बड़े पर्वतों को भी गिरा देते हैं, वैसे ही विवेक बुद्धि के द्वारा इन्द्रिय रूपी शत्रुओं को उठने न देना चाहिए ॥११-२१॥
संसाररात्रिदुःस्वप्ने शून्ये देहमये भ्रमे । सर्वतवापवित्रं तद्दृष्टं संसृतिविभ्रमम् ॥२२॥ अज्ञानोपहतो बाल्ये यौवने वनिताहतः । शेषे कलत्रचिन्तार्त्तः किं करोति नराधमः ॥२३॥ सतोऽसत्ता स्थिता मूर्ध्नि रम्याणां मूर्च्छयंरम्यता । सुखानां मूर्ध्नि दुःखानि किमेकं संश्रयाम्यहम् ॥२४॥ येषां निमेषणोन्मेषौ जगतः प्रलयोदयौ ।