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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished572 pages
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( ५३ ) CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri वहाँ अनेक देवताओं की उपासना के भी विधि-विधानों एवं महत्वों की चर्चा हुई है । कई उपनिषद् देवताओं के नाम पर ही हैं, उसमें :प्रतिपादित देवता के गुण धर्म एवं उपासना के प्रतिफल विस्तारपूर्वक बताये गये हैं । उच्च मनोभूमि के साधक वेदान्त की अद्वैत साधना में संलग्न रहें एवं उससे कुछ नीची श्रेणी के साधक देव-उपासना द्वारा अभीष्ठ काम्य-प्रयो- जनों की भी पूर्ति करते रहें, ऐसा अभिमत उपनिषद्कारों का रहा है । सूर्य, शिव, गणेश, नृसिंह, गरुड़, हनुमान, कृष्ण, राम, राधा, सीता, सरस्वती, लक्ष्मी, काली, त्रिपुरा आदि देवी देवताओं की उपासना का उद्देश्य क्या है और उनका क्या प्रतिफल प्राप्त होता है,उसका वर्णन उन देवताओं के प्रयोजन से बने हुए उपनिषदों में हुआ है । यह देवपूजा विशेषतया लौकिक प्रयोजनों के लिये की जाती है । पीछे अध्यात्म-मार्ग पर चलते हुए साधक ब्रह्म प्राप्ति के परम श्रेयस्कर लक्ष्य की ओर अभिमुख हो जाता है। देव-उपासना भी परमात्मा के एक रूप विशेष की ही पूजा है और उससे सीमित उद्देश्य की पूर्ति भी होती है । देव-उपासना के परिणामों की कुछ चर्चा नीचे देखिये:— “एक बार कौषीतकि ऋषि ने अपने पुत्र से कहा—मैंने सूर्य की उपासना की, इससे तू मेरा एक पुत्र हुआ । तू सूर्य की किरणों का सब ओर से आवर्तनकर, उन सबके रूप में ॐकार का चिन्तन कर, इससे निश्चय ही तेरे बहुत पुत्र होंगे ।” —छान्दोग्य, पंचम खंड “सूर्य नारायण का आष्टाक्षर मंत्र नित्य जपने वाला ब्रह्मज्ञानी होता है। सूर्य की ओर मुख करके जाप करने से घोर Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

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( ५४ ) रोगों से छुटकारा मिलता है, दरिद्रता दूर होती है, पाप दूर होते हैं। प्रातःकाल पाठ करने से भाग्यवृद्धि होती है। उसे पशु, धन आदि के साथ ही वेदार्थ ज्ञान की उपलब्धि भी होती है। सूर्य के हस्त नक्षत्र पर रहते हुये इसका जप करने वाला महामृत्यु से पार होता है।" —सूर्योपनिषद् “चाक्षुषी विद्या नेत्र रोगों का नाश करने वाली तथा नेत्रों को तेजयुक्त करने में समर्थ है। इसका विनियोग नेत्र रोगों के शमनार्थ होता है। —चाक्षुषोपनिद् ‘गणपति का अभिषेक करने वाला वक्ता बन जाता है। चतुर्थी तिथि को उपवास करके जो इसे जपता है वह विद्यावान होता है, ऐसा महर्षि अथर्वण का कथन है। इस मन्त्र द्वारा तप करने वाले को कभी भय नहीं लगता। दूर्वा के अंकुरों द्वारा गणपति का यजन करने वाला कुवेर के समान धनवान होता है। लाजाओं द्वारा यज्ञ करने वाला यशस्वी होता है। सहस्र मोदकों द्वारा यजन करने वाला इच्छित फल पाता है। जो घृत और समिधा से यज्ञ करता है, उसे सब कुछ प्राप्त हो जाता है। सूर्य ग्रहण के समय किसी महानदी या प्रतिमा के निकट बैठ कर जप करे तो मन्त्र सिद्धि प्राप्त होती है। ऐसा साधक विघ्नों से भी छुटकारा पा लेता है। —गणपत्युपनिषद् “एक समय मृत्यु, पाप और संसार से सब देवता अत्यन्त भयभीत हुए और भागकर प्रजापति की शरण में पहुँचे। ब्रह्मा जी ने उन्हें भगवान नृसिंह का मन्त्र बताया देवताओं ने

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इस मन्त्र की सिद्धि द्वारा 'मृत्यु पर विजय प्राप्त करली। वे सब पापों से मुक्त हो गये और संसार रूपी समुद्र को भी लांघ गये। अतः जो मनुष्य मृत्यु, पाप और भवसागर से भय मानता हो, वह इस नृसिंह मन्त्र की शरण ग्रहण करे।" —नृसिंहपूर्वतापनोपनिषद् "प्रजापति ब्रह्मा ने कहा—प्रणव, यजुर्लक्ष्मी, गायत्री और नृसिंह गायत्री ये सब मन्त्रराज के अङ्गभूत मंत्र हैं। इनका ज्ञाता ऐश्वर्य प्राप्ति के साथ ही अन्त में अमृतत्व को प्राप्त कर लेता है।" —नृसिंहपूर्व तापनीयोपनिषद् "जो व्यक्ति नृसिंह मन्त्र का नित्य प्रति जप करता है, वह अग्नि की गति रोकने में भी समर्थ होता है वह वायु की भी गति रोक देता है। सूर्य चन्द्रमा की गति तथा जल के प्रवाह को रोक देता है। वह सब ग्रहों की गति रोक सकता है, सब देवताओं को स्तंभित कर सकता है तथा विष का भी स्तंभन कर सकता है।······सब देवताओं, यज्ञों तथा नागों को आकर्षित कर लेता है। मनुष्य भी उसकी ओर खिंचते हैं तथा सभी उससे आकर्षित रहते हैं।" —नृसिंहपूर्व तापनीयोपनिषद् नृसिंह सबका कल्याण करने वाले हैं। ये ही विष्णु हैं। ये ही सर्वतोमुख हैं। ये ही उग्र वीर एवं तुरीय हैं। ये ही महान् ज्वलन और भीषण हैं। ये ही कल्याण स्वरूप हैं तथा ये ही मृत्यु के लिये भी मृत्यु हैं। ये ही 'नमामि' पद के लक्ष्यार्थ तथा अहम्' पद के आश्रयभूत हैं—······'महान् ज्वलन्, उग्र, वीर, भीषण,सर्वतोमुख, कल्याणमय नृसिंह रूप यह

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( ५६ ) CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri सब कुछ ब्रह्म ही है..................अतः जो ब्रह्म को भय रहित एवं उपरोक्त गुणों से सम्पन्न जानता है वह ज्ञानी भय रहित होता है और ब्रह्म ही बन जाता है।” —नृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् “जो इस नरसिंह चक्र को जानता है, वह सभी वेदों का अध्ययनकर्त्ता समझा जाता है। वह सभी यज्ञों का कर्त्ता समझा जाता है। उसने सभी तीर्थों में स्नान कर लिया। उसे सभी मन्त्रों की सिद्धियां भी प्राप्त हो जाती हैं। वह सर्वत्र शुद्ध हो जाता है। सब की रक्षा करता है। भूत, प्रेत, पिशाच, डाकिनी, शाकिनी, बेताल आदि भयङ्कर योनियों का नाश करने वाला भी वह होता है और सब प्रकार निर्भय हो जाता है।” —नरसिंहषट्चक्रोपनिषद् मनुष्यो ! इन भगवान नीलकंठ का दर्शन करो। यही भगवान रुद्र हैं, जो जल में, औषधियों में निहित होकर रोग रूप पापों को नष्ट करते हैं। यह प्राणियों के लिए प्राण रूप हैं। तुम्हारे अमङ्गल को नष्ट करने के लिये और अप्राप्त कामनाओं को पूर्ण कराने के लिये तुम्हारे निकट पधारें।” —नीलरुद्रोपनिषद् “जो इस विद्या का अमावस्या के दिन अध्ययन करता है, उसे सारे जीवन भर सांप नहीं काटते।...........मन से ही बिष को मुक्त किया जा सकता है।” —गरुड़ोपनिषद् Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

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( ५७ ) CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri “जो कवित्व, भोग, निर्भयता अथवा मोक्ष की इच्छा करता हो वह इन मन्त्रों के द्वारा भगवती सरस्वती की भक्तिपूर्वक पूजा स्तुति करे। भक्ति और श्रद्धा सहित विधिपूर्वक पूजा करने वाला, नित्य स्तुति करने वाला भगवती की कृपा शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है। वह दूसरों से सुने बिना भी ग्रन्थों के अर्थों को समझने वाला होता है।” —सरस्वती रहस्योपनिषद् “इस सौभाग्यलक्ष्मी उपनिषद् की साधना से साधक अग्निपूत और वायुपूत होता है। वह सब धन-धान्य, स्त्री, पुत्र, हाथी, अश्व, गौ, भैंस, सेवक आदि ऐश्वर्यों से सम्पन्न होकर ज्ञानी बनता है और अन्त में परम पद को प्राप्त करता है।” —सौभाग्यलक्ष्मी उपनिषद् “सर्वाङ्ग सुन्दरी त्रिपुरा देवी का देह रूप गुहा में स्थित काम, रूप, कला का ध्यान करके मनुष्य काम रूप हो जाता है और कामनाएँ पूर्ण करता है। इस कामोपभोग संस्कारों से फिर जन्म धारण करने पड़ते हैं। अतः मोक्ष के इच्छुकों को यह कामो- उपासना नहीं करनी चाहिये।” --त्रिपुरोपनिषद् ——— देवता और उनकी सिद्धि साधना इस सृष्टि का उत्पादक, पोषक, संहारक, कर्ता-हर्ता—एक परमात्मा ही है। उसे ही अनेक नाम से पुकारते हैं। “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ती” उस एक ही सत् परमात्मा को विद्वानों ने बहुत प्रकार से कहा है। Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

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( ५८ ) CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri सृष्टि में अनेकों प्रक्रयाएँ चलती हैं। उनकी संचालक शक्तियां भी अनेक हैं। यद्यपि वे सभी परमात्मा की ही शक्तियाँ हैं पर उनकी गतिविधियों की प्रथकता के अनुरूप उनके नामकरण अलग-अलग किये गये हैं। सूर्य एक ही है पर उसकी अनेक किरणें अपने गुण धर्म की प्रथकता के कारण अल्टा वायलेट, अल्फा वायलेट, एक्सरेज़ आदि अनेक नामों से पुकारी जाती हैं। मनुष्य शरीर एक ही है पर उसके विभिन्न अंगों का उपयोग और स्वरूप भिन्न-भिन्न होने के कारण उन अंगों के नाम भी पृथक-पृथक हैं। शरीर को जो कार्य करना होता है वह अपने तदनुकूल अंग से ही उसे पूरा कराता है। ईश्वर के विराट स्वरूप से अंग प्रत्यंगों को उसकी क्रिया- किरणों को देवता नाम से पुकारते हैं। यह देवता अपने- अपने कार्य क्षेत्र में उसी प्रकार संलग्न रहते हैं जिस प्रकार किसी सरकार के अनेक मन्त्री एवम् अफसर अपने अपने विभाग को संभालते हुये राजतन्त्र का संचालन करते हैं। देवताओं की सत्ता पृथक से दृष्टिगोचर होते हुये भी वे वस्तुतः एक ही विराट ब्रह्म के अवयव मात्र हैं। उनका स्वतन्त्र अस्तित्व भासता तो है पर है नहीं। लहरें और बबूले जल के ही अंग हैं। विविध देवताओं का जहाँ स्वरूप और गुण धर्म शास्त्रकारों ने वर्णन किया है वहां यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वे सब वस्तुतः एक ही परमात्मा के अंग-प्रत्यंगमात्र हैं। कहा गया है कि :— एकं सद्विप्रा बहुता वदन्ति —ऋग्वेद ६।३।२२।४६ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

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( ५६ ) उस एक ही परमात्मा को विद्वान लोग अनेक नामों से वर्णन करते हैं।” एकं सन्तं बहुधा कल्पपन्ति । “उस एक ही अनेक रूपों में कल्पना की गई है।” सृष्टि स्थित्यन्तकरणीं ब्रह्मविष्णु शिवाभिधाम् । स संज्ञा यांति भगवानेक एक जनार्दनः । —विष्णु पुराण १।२।६६ “वह एक ही भगवान् सृष्टि का उत्पादन, पालन और संहार करता है। उसी के ब्रह्मा, विष्णु, महेश नाम हैं।” आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् —एतरेय १।१।१ “यह आत्मा एक ही था !” एकमेवाद्वितीयम् —छान्दोग्य ६।२।१ “वह एक ही है, दो नहीं।” एकैव सा महाशक्तिस्तया सर्वं भिदं ततम् । “वह एक ही महाशक्ति है। उसी से यह सारा विश्व आच्छादित है।” एक एव तदा रुद्रो न द्वितीयोऽस्ति कश्चन —शिव पुराण “तब ( सृष्टि के आदि में ) अकेला रुद्र ही था और कोई नहीं।” तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदुचंद्रमाः तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म ता आपः स प्रजापतिः —यजु० ३२।१

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( ६० ) “यह परमात्मा ही अग्नि, सूर्य, वायु, चन्द्रमा, शुक्र, ब्रह्म, और वरुण है।” तमादि देवमजरं केचिदाहुः शिवामिधम् केचिद्विष्णुं सदा सत्यं ब्रह्माणं केचिदुच्यते —बृहन्नारदीय पुराण १।२।५ “उस अनादि, अजर परमात्मा कोई शिव, कोई विष्णु, कोई ब्रह्मा कहते हैं।” त्रिधाभिन्नोह्यहं विष्णो, ब्रह्मा विष्णु हराख्यया । सर्गरक्षालय गुणैर्निष्क्लोऽहं सदा हरे । —शिव पुराण २।१।६।२८ “सृष्टि के उत्पादन, पालन तथा संहार के गुणों के कारण मेरे ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव यह तीन भेद हुये हैं। वस्तुतः मेरा स्वरूप सदा भेद रहित है।” ब्रह्मा दक्षः कुवेरो यमवरुणमरुद्वह्नि चन्द्रैन्द्र रुद्राः । शैलानद्यः समुद्रा ग्रह गण मनुजा दैत्य गन्धर्वनागाः ॥ द्वीपां नक्षत्र तारा रवि वसु मुनयोव्योमभूरिश्वनौ च । संलीना यस्य सर्वे वपुषि स भगवान् पातु वोर्विश्वस्वरूपः ॥ “ब्रह्मा, दक्ष, कुवेर, यम, वरुण, मरुत, अग्नि, चन्द्र, इन्द्र, रुद्र, पर्वत, नदी, समुद्र, ग्रह, मनुष्य, दैत्य, गन्धर्व नाग, द्वीप, नक्षत्र, तारागण, रवि, वसु, मुनि, आकाश-पृथ्वी, अश्वनीकुमार आदि सभी जिसमें लीन हैं, उस विश्वरूप परमात्मा को नमस्कार है।” यो ब्रह्मा स हरिः प्रोक्तो यो हरिः स महेश्वरः । या काली सैव कृष्णः स्याद् यः कृष्ण सैव कालिका ॥ देव देवीं समुद्दिश्य न कुर्यादन्तरं क्वचित् । तत्तद्भेदों न मन्तव्यः शिव शक्तिमयं जगत् ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

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( ६३ ) “जो ब्रह्मा है वही हरि हैं, जो हरि हैं वे ही महेश्वर हैं। जो काली है वही कृष्ण है, जो कृष्ण हैं वही काली है। देव और देवी को लक्ष्य करके कभी मन में भेद भाव उत्पन्न होने देना उचित नहीं है। देवता के चाहे जितने नाम और रूप हों, सभी एक हैं। यह जगत् शिव शक्तिमय है।” विभिन्न देवताओं की अलग-अलग उपासना का तात्पर्य परमात्मा की उस शक्ति से सम्बन्ध स्थापित करना है जो साधक के अभीष्ट प्रयोजन से सम्बन्धित है। जैसे समस्त प्रजा एक ही राजा के राज्य में रहती है तो भी उसे अलग-अलग प्रयोजनों के लिये अलग-अलग विभागों के दफ्तरी एवं कर्मचारियों के पास जाना पड़ता है। देव उपासना का भी यही प्रयोजन है। साधक अपनी आवश्यकता और आकांक्षा के अनुरूप उनमें से समय समय पर इन देवताओं का अंचल पकड़ता है और छोड़ता रहता है। किस देवता की आराधना किस प्रयोजन के लिये किस प्रकार करनी चाहिये इसका वर्णन और साधना शास्त्रों में विस्तारपूर्वक मिलता है। श्रीमद्भागवत में भी इस प्रकार का प्रसंग आता है:– ब्रह्मवर्चसमामस्तु यजेत ब्रह्मणस्पतिम् । इन्द्रमिन्द्रिय कामस्तु प्रजाकामः प्रजापतीन् ॥ देवीं यायाँ तु श्रीकामस्तेजत्कामो विभावसुम् । वसुकामो वसून् रुद्रान्वीर्य कामोऽथ वीर्यवान् ॥ अन्नाद्यकामस्त्वदितिं स्वर्ग कामोऽदितेः सुतान् । विश्वान् देवान् राज्यकामः साध्यान्संसाधको विशाम् ॥ आयुष्कामोऽश्विनौ देवौ पुष्टि काम इलां यजेत् । प्रतिष्ठा कामः पुरुषो रोदसी लोक मातरो ॥ रूपाभिकामो गन्धर्वान्स्त्रीकामोऽप्सर उर्वसीम् ।

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[Header] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ( ६२ )

आधिपत्य कामः सर्वेषां यजेत परमेष्ठिनम् ॥ यज्ञं यजेद्यशस्कामः कोशकामः प्रचेतसम् । विद्या कामस्तुगिरिशं दाम्पत्यार्थ उमां सतीम् ॥ धर्मार्थ उत्तमश्लोकं तन्तुं तन्वन्पितॄन्यजेत् । रक्षाकामः पुण्य जनानोजस्कामो मरुद्गणान् ॥ राज्य कामो मनून्देवान् निर्ऋतित्वभिचरन्यजेत् । कामकामो यजेत्सोममकामः पुरुषं परम् ॥ —श्रीमद्भागवत २।३।२—६ "ब्रह्मतेज की इच्छा वाले को ब्रह्मा की, इन्द्रिय भोगों के लिये इन्द्र की, सन्तान के लिये प्रजापति की, सौभाग्य के लिये दुर्गा, की तेज, के लिए अग्नि की धन के लिये वसुओं की, वीर्य के लिए रुद्र की, अन्न के लिए अदिति की, स्वर्ग के लिए आदित्यों की, राज्य के लिये विश्वेदेवों की, लोक प्रियता के लिए साध्यगण की, दीर्घायु के लिए अश्विनी कुमारों की पुष्टि के लिये बसुन्धरा की, प्रतिष्ठा के लिए अन्तरिक्ष की, रूप के लिए गन्धर्वों की रमणी के लिये उर्वशी की, आधिपत्य के लिए प्रजापति की, यश के लिए यज्ञ की, कोश के लिए वरुण की, विद्या के लिए शंकर की, दाम्पत्य के लिये गौरी की, धन संचय के लिये नारायण की, कुटुम्ब वृद्धि के लिए पितृगण की, रक्षा के लिए यज्ञों की, बल के लिये मरुद्गण की, अभिचार के लिए राक्षसों की, भोगों के लिए चन्द्रमा की, और जिसे कोई इच्छा न हो वह परमात्मा की उपासना करे।" यह देव शक्तियां विभिन्न आकार प्रकार में चित्रित की गई हैं। इनकी आकृतियां, आयुध, वाहन, आदि का भी स्वरूप दिखाया गया है पर वस्तुतः इस सब का आधार ध्यान-विद्या का विज्ञान है। किस प्रकार से ध्यान करने पर कौन-सी

देव उपासना में जहाँ विधि-विधान और कर्मकाण्ड का

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( ६३ ) देव शक्ति को साधक अपनी धारणा में अवतीर्ण कर सकता है, इस सूक्ष्म विज्ञान के ज्ञाता बहुत खोज करने पर ही प्राप्त हो सकते हैं। देव उपासना में जहाँ विधि-विधान और कर्मकाण्ड का महत्व है वहाँ श्रद्धा और विश्वास की सुदृढ़ भावना का होना भी आवश्यक है। उथली श्रद्धा के साथ, केवल कौतुक, कौतूहल समझकर, मन्त्र या देवता की परीक्षा के लिए कुछ आधा-अधूरा साधन कर लेने से समुचित परिणाम प्राप्त नहीं हो सकता। उसके लिए गहरी श्रद्धा और पूर्ण विश्वास का होना अपरिहार्य है। इस श्रद्धा-विश्वास को ही (अमृत) कहते हैं। इसी को पीकर देवता तृप्त एवं प्रसन्न होते हैं। उपनिषद् में इसी प्रकार का वर्णन आता है:— न वै देवा अश्नन्ति, न पिवन्त्येत देवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति । —छान्दोग्य ३।६।१ “देवता न तो खाते हैं, न पीते हैं। केवल अमृत को देख कर तृप्त रहते हैं।” उपासक केवल विधि-विधान की लकीर पीट रहा है या वह ‘अमृत’ भी अर्पण कर रहा है, इसकी परीक्षा के लिए कई बार देवताओं की ओर से साधना काल में लोभ और भय के अवसर उपस्थित किए जाते हैं। दुर्बल मनोभूमि का साधक उस परीक्षा में विचलित हो जाता है, फलस्वरूप अभीष्ट सिद्धि से उसे वंचित रहना पड़ता है। यों देवता सर्वव्यापी हैं पर उनका सबसे निकटवर्ती निवास स्थान अपनी 'देह' ही है। इस मानव शरीर में सभी देवता निवास करते हैं। विभिन्न अंग प्रत्यङ्गों में विभिन्न

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( ६४ ) देव-शक्तियों का निवास है। इसलिए साधक को अपना शरीर एवं मन इस योग्य बनाना होता है कि वहां निवास करने वाली देव शक्तियां जागृत होकर अपनी सजातीय महाशक्ति को सूक्ष्म जगत में से आकर्षित न कर सकें। आहार-विहार, व्रत, संयम, उपवास, ब्रह्मचर्य एवं विविध तपश्चर्याओं द्वारा शरीर में रहने वाली देव शक्तियों को शुद्ध करना भी अभीष्ट सिद्धि के लिए आवश्यक है। 'एतरेयोपनिषद्' में कहा गया है:— ता एता देवताः सृष्टा अस्मिन् महत्यर्णवे प्रापतंस्तमशना पिपासाभ्यामन्ववार्जत् ता एन मब्रुवन्नायतनं नः प्रजानीहि यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्न मदामेति । —एतरेयोपनिषद् १।२।१ “परमात्मा ने अग्नि आदि सब देवता उत्पन्न किए और इन्हें इस संसार में भेजा । उन्हें भूख और प्यास से युक्त कर दिया । तब वे देवता परमात्मा से बोले—हमारे लिए स्थान की व्यवस्था कीजिए जहां रहकर हम अपना आहार प्राप्त कर सकें ।” ताभ्यः पुरुषमानयत्ता अब्रुवन् सुकृतं बतेति पुरुषो वाव सुकृतम् । ता अब्रवीद्यथायतनं प्रविशतेति । —एतरेयोपनिषद् १।२।३ “परमात्मा ने उनके लिए मनुष्य का शरीर उपस्थित किया । तब देवताओं ने कहा—बस, हमारे लिए यह बहुत सुन्दर स्थान बन गया। यह सचमुच ही बड़ी सुन्दर रचना है। तब परमात्मा ने कहा—अब तुम लोग अपने लिए इसमें उचित स्थान ढूंढलो और उसी में प्रवेश कर जाओ ।”

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( ६५ ) अग्निनर्वाग् भूत्वा मुखं प्राविशद्वायुःप्राणो भूत्वा नासिके प्राविश- दादित्यश्चक्षुर्भूत्वाऽक्षिणी प्राविशद्दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्रावि शन्नोषधि वनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशं श्चचन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविन्मृत्युर्पानो भूत्वा नाभिं प्राविशदापो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन् । —ऐतरेयोपनिषद् १।२।४ “अग्नि ने वाणी बनकर मुख में प्रवेश किया। वायु प्राण बनकर नासिकां में रहने लगा। सूर्य ने नेत्र बनकर आँखों में स्थान ग्रहण किया। दिशा-देवता ने कर्णेन्द्रिय बनकर कानों में, वनस्पति देवता ने रोम बनकर त्वचा में, चन्द्रमा ने मन बनकर हृदय में, यम ने अपान वायु बनकर नाभि में और वरुण देवता ने वीर्य बन कर शिश्नेन्द्रिय में प्रवेश किया।” तमशनायापिपासे अब्रूतामावाभ्यामभि प्रजानीहीति । ते अब्रवी देतास्वेव वां देवतास्वाभजाम्येता सुभागिन्यौ करोमीति । तस्माद्यस्यै कस्यै च देवतायै हविर्गृ ह्यते भागिन्यावेवास्यामशनाया पिपासे भवतः । —ऐतरेयोपनिषद् २।२।५ “तब भूख और प्यास परमात्मा से बोलीं—हमारे लिये भी स्थान दीजिए। उसने उत्तर दिया तुम्हें इन देवताओं में ही प्रविष्ट किये देता हूँ। तुम्हें इन्हीं का भागीदार बनाता हूँ। यह देवता तुम्हारे ही द्वारा अपनी-अपनी हवि ग्रहण करेंगे। तुम दोनों उन्हीं की भागीदार रहोगी।” शरीर में निवास करने वाले देवताओं को भूख, प्यास के माध्यम से ही पोषण मिलता है। अर्थात् जैसा कुछ हम खाते पीते हैं, उसी के अनुरूप देव-शक्तियाँ सशक्त एवं दुर्बल होती हैं।

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[ ६६ ] सात्विक खान-पान देव-तत्वों को पुष्ट करता है, और आसुरी तमोगुणी आहार करने से, मद्य-मांस सेवन करने से देवता दुर्बल हो जाते हैं। यह देवता केवल मुख के द्वारा ही आहार नहीं लेते वरन् प्रत्येक इन्द्रिय के द्वारा उसकी उचित-अनुचित प्रकृयाओं के आधार पर वे देवता पुष्ट एवं असक्त बनते हैं। जो अपनी इन्द्रियों का दुरुपयोग करता है, उनके द्वारा अनैतिक आचरण करता है, अग्राह्य को ग्रहण करता है तो शरीरवासी देवता असक्त हो जाते हैं, फिर विधि-विधान एवं मन्त्र प्रकृया भी वैसा फल नहीं देती जैसी शरीर में पुष्ट देव-स्थिति होने पर दिया करती है। इसलिये देव उपासकों को इन्द्रिय-संयमी, सदाचारी, होना और आहार-विहार की शुद्धता का भी भरपूर ध्यान रखना आवश्यक है। साधक यदि अपने शरीर-देवताओं को परिपुष्ट रखे और श्रद्धा, विश्वास पूर्वक नियत विधि-विधान के साथ साधना करे तो देव वरदान का वही लाभ हो सकता है जो शास्त्रों में वर्णन किया गया है। गायत्री तपोभूमि, मथुरा } श्रीराम शर्मा आचार्य अषाढ़ सुदी ३०, सम्वत् २०१६

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CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri १०८ उपनिषद् (साधना-खण्ड) —ॐ— योगचूड़ामण्युपनिषत् ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषद माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मे अस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ मेरे अङ्ग वृद्धि को प्राप्त हों, वाणी, घ्राण, चक्षु, श्रोत्र बल और सब इन्द्रियां वृद्धि को प्राप्त हों । सब उपनिषद् ब्रह्मरूप हैं। मुझसे ब्रह्म का त्याग न हो और ब्रह्म मेरा त्याग न करे । उसमें रत हुये मुझको उपनिषद् धर्म की प्राप्ति हो । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । योगचूड़ामणिं वक्ष्ये योगिनां हितकाम्यया । कैवल्यसिद्धिदं गूढं सेवितं योगवित्तमैः ॥१॥ आसनं प्राणसंरोध-प्रत्याहारश्च धारणा । ध्यानं समाधिरेतानि योगाङ्गानि भवन्ति षट् ॥२॥

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६८ ] [ योगचूडामणि उपनिषद् एकं सिद्धासनं प्रोक्तं द्वितीयं कमलासनम् । षट्चक्रं षोडशाधारं त्रिलक्ष्यं व्योमपंचकम् ॥३॥ स्वदेहे यो न जानाति तस्य सिद्धिः कथं भवेत् । चतुर्दलं स्यादाधारं स्वाधिष्ठानं च षडदलम् ॥४॥ नाभौ दशदलं पद्मं हृदयं द्वादशारकम् । षोडशारं विशुद्धाख्यं भ्रूमध्ये द्विदलं तथा ॥५॥ ॐ । योगियों की हित कामना से ‘योगचूडामणि’ उपनिषद् को कहता हूँ । यह कैवल्यपद और सिद्धियों का प्रदाता है और योगवेत्ताओं द्वारा सेवित ( अभ्यासित ) है ॥ १ ॥ योग के छः अङ्ग कहे गये हैं—आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि । आसनों में प्रथम सिद्धासन है, दूसरा पद्मासन है । षट्चक्र, षोडश आधार और पाँच आकाशों को जो अपनी देह के भीतर नहीं देखता, उसको सिद्धि कहाँ हो सकती है ? इनमें आधार चक्र (मूलाधार) चार दल वाला है, स्वाधिष्ठान में छः दल हैं, नाभि में दश दल वाला और हृदय में बारह दल वाला पद्म है, फिर सोलह पंखुड़ियों वाला विशुद्ध चक्र है और भ्रुकुटियों के मध्य दो दल का चक्र है ॥२—५॥ सहस्रदलसंख्यातं ब्रह्मारन्ध्रे महापथि । आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम् ॥६॥ योनिस्थानं द्वयोर्मध्ये कामरूपं निगद्यते । कामाख्यं तु गुदस्थाने पङ्कजं तु चतुर्दलम् ॥७॥ तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्धवन्दिता । तस्य मध्ये महालिङ्गं पश्चिमाभिमुखं स्थितम् ॥८॥ नाभौ तु मणिवद्विम्बं यो जानाति स योगवित् । तप्तचामीकराभासं तडिल्लेखेव विस्फुरत् ॥९॥

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योगचूड़ामणि उपनिषद् ] [ ६६ त्रिकोणं तत्पुरं वन्हेरोधोमेढ्रात्प्रतिष्ठितम् । समाधौ परमं ज्योतिरनन्तं विश्वतोमुखम् ॥१०॥ ब्रह्मरंध्र के महापथ में सहस्र दल-कमल है। प्रथम चक्र 'आधार' है और दूसरा स्वाधिष्ठान है। यह योनि स्थान में दोनों के मध्य में स्थित है और 'कामरूप' कहा जाता है। 'काम' नाम का चार दल का कमल गुदा स्थान में है। उसके मध्य में सिद्धों द्वारा बन्दना की गई 'काम' नाम की योनि है और उसके मध्य में पश्चिम की तरफ मुख वाला महालिङ्ग स्थित है ॥६-८॥ नाभि में मणि के समान आकार वाले (मणिपुर) को जो जानता है, वही योगी है। तप्त सुवर्ण के समान चमक वाला, विद्युत धारा के सदृश्य सुप्रकाशित, तीन कोण युक्त वह्नि का स्थान मेढ़ के नीचे स्थित है। वहां पर समाधि में विश्वतोमुख अनन्त परमज्योति दिखाई देती है ॥६-१०॥ तस्मिन्दृष्टे महायोगे यातायातो म विद्यते । सबशब्देन भवेत्प्राणः स्वाधिष्ठानं तदाश्रयम् ॥११॥ स्वाधिष्ठानाश्रयादस्मान्मेढ्रमेवाभिधीयते । तन्तुना मणिवत्प्रोतो योऽत्र कन्दः सुषुम्नया ॥१२॥ तन्नाभिमण्डले चक्रं प्रोच्यते मणिपूरकम् । द्वादशारे महाचक्रे पुण्यपापविवर्जिते ॥१३॥ तावज्जीवो भ्रमत्येवं यावत्तत्वं न विन्दति । ऊर्ध्वं मेढ्रादधोनाभेः कन्दयोनिः खगाण्डवत्॥१४॥ तत्र नाड्यः समुत्पन्ना सप्तन्नाणिः द्विसप्ततिः । तेषु नाडीसहस्रे षुद्विसप्ततिरुदाहृता ॥१५॥ योगाभ्यास द्वारा उसे देख लेने पर आवागमन से छुटकारा हो जाता है। प्राण को 'स्व' कहा जाता है और वह स्वधिष्ठान के

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७० ] [ योगचूड़ामणि उपनिषद् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri आश्रय में रहता है । स्वाधिष्ठान के आश्रय में होने से उसे मेढ्र भी कहा जाता है । यही तागे में पिरोए हुये मणि के समान सुषुम्ना-नाड़ी का केन्द्र है ॥१२॥ नाभि-मण्डल में रहने वाला यह चक्र मणिपूरक कहा जाता है । इस बारह दल वाले और पाप-पुण्य से रहित चक्र में जब तक जीव तत्त्वज्ञान नहीं प्राप्त कर लेता, तब तक उसे संसार में भ्रमण ही करना पड़ता है । मेढ्र से ऊपर और नाभि के नीचे वाले केन्द्र में पक्षी के अण्डे की आकार वाली योनि है । उसी स्थान से बहत्तर हजार नाड़ियां उत्पन्न हुई हैं, जिनमें से बहत्तर प्रधान कही गई हैं ॥१३—१५॥ प्रधानाः प्राणवाहिन्यो भूयस्तासु दश स्मृताः । इडा च पिंगला चैव सुषुम्ना च तृतीयगा ॥१५॥ गान्धारी हस्तिजिह्वा च पूषा चैव यशस्विनी । अलम्बुसा कुहूश्चैव शङ्खिनी दशमी स्मृता ॥१६॥ एतन्नाडीमहाचक्रं ज्ञातव्यं योगिभिः सदा । इडा वामे स्थिता भागे दक्षिणे पिङ्गला स्थिता ॥१८॥ सुषुम्ना मध्यदेशे तु गान्धारी वामचक्षुषि । दक्षिणे हस्तिजिह्वा च पूषा कर्णे तु दक्षिणे ॥१६॥ यशस्विनी वामकर्णे चानने चाप्यलम्बुसा । कुहूश्च लिङ्गदेशे तु मूलस्थाने तु शङ्खिनी ॥२०॥ इनमें से भी दश प्राण वाहिनी नाड़ियाँ मुख्य मानी गई हैं— इडा, पिंगला और तीसरी सुषुम्ना, गांधारी, हस्तिजिह्व।, पूषा, यशस्विनी, अलम्बुसा, कुहू और शंखिनी दसवीं है ॥१५—१७॥ नाडियों का यह महाचक्र योगियों के लिये सदैव ज्ञातव्य है । इनमें इडा बायीं तरफ और पिंगला दाहिनी तरफ रहती है । इन दोनों के मध्य में सुषुम्ना का स्थान है । गान्धारी बांएॅ नेत्र में, हस्तिजिह्व। बायें नेत्र में रहती है । पूषा दायें कान में और यशस्विनी बाँयें कान में Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

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रहती है । अलम्बुसा मुख में कुहू लिगेन्द्रो में तथा शङ्खिनी मूल स्थान में है ॥ १८—२० ॥ एवं द्वारं समाश्रित्य तिष्ठन्ते नाडयः क्रमात् । इडापिङ्गलसौषुम्नाः प्राणमार्गे च संस्थिताः ॥२१॥ सततं प्राणवाहिन्यः सोमसूर्याग्निदेवताः । प्राणापानसमानाख्या व्यानोदानौ च वायवः ॥२२॥ नागः कूर्मोऽथ कृकरो देवदत्तो धनंजयः । हृदि प्राणः स्थिती नित्यमपानो गुदमण्डले ॥२३॥ समानो नाभि देशे तु उदानः कण्ठमध्यगः । व्यानः सर्वशरीरे तु प्रधानाः पञ्च वायवः ॥२४॥ उद्गारे नाग आख्यातः कूर्म उन्मीलने तथा । कृकरः क्षुत्करो ज्ञेयो देवदत्तो विजृम्भणे ॥२५॥ इस प्रकार क्रम से शरीर के विभिन्न द्वारों में एक-एक करके समस्त नाड़ियाँ स्थित हैं और इडा, पिंगला, सुषुम्ना प्राण-मार्ग में स्थित रहती है ॥२१॥ सोम ( चन्द्र ) सूर्य और अग्नि देवता प्राण को सदैव गतिमान रखते हैं । प्राण, अपान, समान व्यान, उदान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त, धनञ्जय से वायु तथा उपवायु हैं । इनमें प्राण, वायु हृदय में स्थित रहता है और अपान गुदा स्थान में । समान नाभि देश में, उदान कण्ठ में, व्यान सर्व शरीर में—ये पाँचों प्रधान वायु हैं ॥२२—२४॥ उद्गार (डकार) में नाग, उन्मीलन (पलक बन्द करना) में कूर्म, छींकने में कृकर, जँभाई लेने में देवदत्त को जानना चाहिये ॥२५॥ न जहाति मृतं वापि सर्वव्यापी धनंजय । एते नाडीषु सर्वासु भ्रमन्ते जीवजन्तवः ॥२६॥ आक्षिप्तो भुजदण्डेन यथोच्चलित कन्दुकः । प्राणापानसमाक्षिप्तस्तया जीवो न तिष्ठति ॥२७॥

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७२ ] [ योगचूड़ामणि उपनिषद् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri प्राणापानवशो जीवो ह्यधश्चोर्ध्वं च धावति । वामदक्षिणमार्गाभ्यां चञ्चलत्वान्न दृश्यते ॥२८॥ रज्जुबद्धो यथा श्येनो गतोऽप्याकृष्यते पुनः । गुणबद्धस्तथा जीवः प्राणापानेन कर्षति ॥२९॥ प्राणापानवशो जीवो ह्यधश्चोर्ध्वं च गच्छति । अपानः कर्षति प्राणं प्राणोऽपानेन कर्षति ॥ ऊर्ध्वाधःसंस्थितावेतौ यो जानाति स योगवित् ॥३०॥ धनंजय वायु ऐसा सर्वव्यापी है कि मृत्यु के पश्चात् भी नहीं छोड़ता । इन समस्त नाड़ियों में जीव भ्रमण करता रहता है ॥२६॥ जिस प्रकार हाथ से फेंकी हुई गेंद इधर-उधर जाती रहती है, उसी प्रकार प्राण भी प्राण और अपान वायुओं के वेग से स्थिर नहीं रह पाता ॥२७॥ प्राण और वायुओं के वशीभूत होकर जीव ऊपर और नीचे दौड़ता रहता है और वाम तथा दक्षिण मार्गों से भी आता जाता है, पर गति में अधिक शीघ्रता होने से वह दिखाई नहीं देता ॥२८॥ जिस प्रकार रस्सी से बँधा हुआ श्येन (पक्षी) जाता है और पुनः खींच लिया जाता है, उसी प्रकार गुणों के बन्धन में पड़ा जीव प्राण और अपान वायुओं से खींचा जाता है ॥२९॥ प्राण और अपान की शक्ति से जीव निरन्तर ऊपर नीचे आता जाता है । अपान प्राण को खींचता है और प्राण अपान को खींचता है । जो योगवित् है वह इनके ऊपर नीचे जाने को समझता है ॥३०॥ हकारेण बहिर्याति सकारेण विशेत्पुनः ॥३१॥ हंसहंसेत्यमुं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा । षट्शतानि दिवा रात्रौ सहस्रण्येकविंशतिः ॥३२॥ एतत्संख्यान्वितं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi