अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
पृष्ठ 254, कुल 423 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्ग ५ ] सुन्दरकाण्ड २२७
[संस्कृत श्लोक]
शब्देनैव विजानीमः कृतकार्यः समागतः ।
हनूमानेव पश्यध्वं वानरा वानरर्षभम् ॥१३॥
एवं ब्रुवत्सु वीरेषु वानरेषु स मारुतिः ।
अवतीर्य गिरेर्मूर्ध्नि वानरानिदमब्रवीत् ॥१४॥
दृष्टा सीता मया लङ्का धर्षिता च सकानना ।
सम्भाषितो दशग्रीवस्ततोऽहं पुनरागतः ॥१५॥
इदानीमेव गच्छामो रामसुग्रीवसन्निधिम् ।
इत्युक्ता वानराः सर्वे हर्षेणालिङ्ग्य मारुतिम् ॥१६॥
केचिच्चुचुम्बुर्लाङ्गूलं ननृतुः केचिदुत्सुकाः ।
हनूमता समेतास्ते जग्मुः प्रस्रवणं गिरिम् ॥१७॥
गच्छन्तो ददृशुर्वीरा वनं सुग्रीवरक्षितम् ।
मधुसंज्ञं तदा प्राहुरङ्गदं वानरर्षभाः ॥१८॥
क्षुधिताः स्मो वयं वीर देह्यनुज्ञां महामते ।
भक्षयामः फलान्यद्य पिवामोऽमृतवन्मधु ॥१९॥
सन्तुष्टा राघवं द्रष्टुं गच्छामोऽद्यैव सानुजम् ॥२०॥
अङ्गद उवाच
हनूमान्कृतकार्योऽयं पिवतैतत्प्रसादतः ।
जक्षध्वं फलमूलानि त्वरितं हरिसत्तमाः ॥२१॥
ततः प्रविश्य हरयः पातुमारभिरे मधु ।
रक्षिणस्ताननादृत्य दधिमुखेन नोदितान् ॥२२॥
पिवतस्ताडयामासुर्वानरान्वानरर्षभाः ।
ततस्तान्मुष्टिभिः पादैश्चूर्णयित्वा पपुर्मधु ॥२३॥
ततो दधिमुखः क्रुद्धः सुग्रीवस्य स मातुलः ।
जगाम रक्षिभिः सार्धं यत्र राजा कपीश्वरः ॥२४॥
गत्वा तमब्रवीद्देव चिरकालाभिरक्षितम् ।
नष्टं मधुवनं तेऽद्य कुमारेण हनूमता ॥२५॥
श्रुत्वा दधिमुखेनोक्तं सुग्रीवो हृष्टमानसः ।
[हिन्दी अनुवाद]
"इस सिंहनादसे ही मालूम होता है कि हनुमान्जी कार्य सिद्ध करके लौटे हैं । हे वानरगण ! देखो, देखो, ये कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी ही तो हैं" ॥१३॥ वानर वीरोंके इस प्रकार कहते-कहते हनुमान्जी उस गिरिशिखरपर उतर आये और उनसे यों कहने लगे ॥१४॥ "मैने सीताजीको देखा, अशोकवनसहित लंकाका विध्वंस किया और रावणसे भी बातचीत की । उसके पश्चात् मैं यहाँ आया हूँ ॥१५॥ अब हम इसी समय राम और सुग्रीवके पास चलेंगे ।" हनुमान्जीके इस प्रकार कहनेपर सब वानरोंने अत्यन्त हर्षसे उन्हें गले लगाया, किन्हींने उनकी पूँछ चूमीं और कोई अति उत्साहसे नाचने लगे । तदनन्तर हनुमान्जीके साथ वे सब प्रस्रवण पर्वतपर गये ॥१६-१७॥
जिस समय वे वीर वानरगण जा रहे थे उनकी दृष्टि सुग्रीवद्वारा सुरक्षित मधुवनपर पड़ी । उसे देखकर वे अंगदजीसे बोले ॥१८॥ "हे वीर ! हमें बड़ी भूख लगी है । अतः हे महामते ! हमें आज्ञा दीजिये जिससे आज हम इस वनके फल खाकर अमृततुल्य मधु पियें ॥१९॥ उसके पश्चात् हम तृप्त होकर भाई लक्ष्मणसहित रघुनाथजीके दर्शन करनेके लिये चलेंगे" ॥२०॥
अंगदजी बोले—हनुमान्जीने कार्य सिद्ध किया है, अतः हे वानरश्रेष्ठगण ! इनकी कृपासे तुम शीघ्र ही फल-मूल खाओ और मधु-पान करो ॥२१॥
अंगदजीकी आज्ञा पा वानरगण उस वनमें घुसकर दधिमुखके भेजे हुए वनरक्षकोंकी उपेक्षाकर मधु पीने लगे ॥२२॥ जब उन वानरोंने उन्हें मधुपान करते देखकर मारा तो वे उन्हें लात और घूँसोंसे कुचलकर मधु पीते रहे ॥२३॥ तब सुग्रीवका मामा दधिमुख अन्य वनरक्षकोंके साथ अति क्रुद्ध हो जहाँ वानरराज सुग्रीव थे वहाँ गया ॥२४॥ वहाँ पहुँचकर वह बोला—"राजन् ! तुमने चिरकालसे जिस मधुवनकी रक्षा की थी उसे आज युवराज अंगद और हनुमान्ने उजाड़ डाला" ॥२५॥ दधिमुखकी बात सुनकर सुग्रीव प्रसन्न होकर कहने लगे—"इसमें सन्देह नहीं पवनकुमार सीताजीको देख आये