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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

सर्ग ५ ] सुन्दरकाण्ड २२७


[संस्कृत श्लोक]

शब्देनैव विजानीमः कृतकार्यः समागतः ।
हनूमानेव पश्यध्वं वानरा वानरर्षभम् ॥१३॥

एवं ब्रुवत्सु वीरेषु वानरेषु स मारुतिः ।
अवतीर्य गिरेर्मूर्ध्नि वानरानिदमब्रवीत् ॥१४॥

दृष्टा सीता मया लङ्का धर्षिता च सकानना ।
सम्भाषितो दशग्रीवस्ततोऽहं पुनरागतः ॥१५॥

इदानीमेव गच्छामो रामसुग्रीवसन्निधिम् ।
इत्युक्ता वानराः सर्वे हर्षेणालिङ्ग्य मारुतिम् ॥१६॥

केचिच्चुचुम्बुर्लाङ्गूलं ननृतुः केचिदुत्सुकाः ।
हनूमता समेतास्ते जग्मुः प्रस्रवणं गिरिम् ॥१७॥

गच्छन्तो ददृशुर्वीरा वनं सुग्रीवरक्षितम् ।
मधुसंज्ञं तदा प्राहुरङ्गदं वानरर्षभाः ॥१८॥

क्षुधिताः स्मो वयं वीर देह्यनुज्ञां महामते ।
भक्षयामः फलान्यद्य पिवामोऽमृतवन्मधु ॥१९॥

सन्तुष्टा राघवं द्रष्टुं गच्छामोऽद्यैव सानुजम् ॥२०॥

अङ्गद उवाच
हनूमान्कृतकार्योऽयं पिवतैतत्प्रसादतः ।
जक्षध्वं फलमूलानि त्वरितं हरिसत्तमाः ॥२१॥

ततः प्रविश्य हरयः पातुमारभिरे मधु ।
रक्षिणस्ताननादृत्य दधिमुखेन नोदितान् ॥२२॥

पिवतस्ताडयामासुर्वानरान्वानरर्षभाः ।
ततस्तान्मुष्टिभिः पादैश्चूर्णयित्वा पपुर्मधु ॥२३॥

ततो दधिमुखः क्रुद्धः सुग्रीवस्य स मातुलः ।
जगाम रक्षिभिः सार्धं यत्र राजा कपीश्वरः ॥२४॥

गत्वा तमब्रवीद्देव चिरकालाभिरक्षितम् ।
नष्टं मधुवनं तेऽद्य कुमारेण हनूमता ॥२५॥

श्रुत्वा दधिमुखेनोक्तं सुग्रीवो हृष्टमानसः ।


[हिन्दी अनुवाद]

"इस सिंहनादसे ही मालूम होता है कि हनुमान्‌जी कार्य सिद्ध करके लौटे हैं । हे वानरगण ! देखो, देखो, ये कपिश्रेष्ठ हनुमान्‌जी ही तो हैं" ॥१३॥ वानर वीरोंके इस प्रकार कहते-कहते हनुमान्‌जी उस गिरिशिखरपर उतर आये और उनसे यों कहने लगे ॥१४॥ "मैने सीताजीको देखा, अशोकवनसहित लंकाका विध्वंस किया और रावणसे भी बातचीत की । उसके पश्चात् मैं यहाँ आया हूँ ॥१५॥ अब हम इसी समय राम और सुग्रीवके पास चलेंगे ।" हनुमान्‌जीके इस प्रकार कहनेपर सब वानरोंने अत्यन्त हर्षसे उन्हें गले लगाया, किन्हींने उनकी पूँछ चूमीं और कोई अति उत्साहसे नाचने लगे । तदनन्तर हनुमान्‌जीके साथ वे सब प्रस्रवण पर्वतपर गये ॥१६-१७॥

जिस समय वे वीर वानरगण जा रहे थे उनकी दृष्टि सुग्रीवद्वारा सुरक्षित मधुवनपर पड़ी । उसे देखकर वे अंगदजीसे बोले ॥१८॥ "हे वीर ! हमें बड़ी भूख लगी है । अतः हे महामते ! हमें आज्ञा दीजिये जिससे आज हम इस वनके फल खाकर अमृततुल्य मधु पियें ॥१९॥ उसके पश्चात् हम तृप्त होकर भाई लक्ष्मणसहित रघुनाथजीके दर्शन करनेके लिये चलेंगे" ॥२०॥

अंगदजी बोले—हनुमान्‌जीने कार्य सिद्ध किया है, अतः हे वानरश्रेष्ठगण ! इनकी कृपासे तुम शीघ्र ही फल-मूल खाओ और मधु-पान करो ॥२१॥

अंगदजीकी आज्ञा पा वानरगण उस वनमें घुसकर दधिमुखके भेजे हुए वनरक्षकोंकी उपेक्षाकर मधु पीने लगे ॥२२॥ जब उन वानरोंने उन्हें मधुपान करते देखकर मारा तो वे उन्हें लात और घूँसोंसे कुचलकर मधु पीते रहे ॥२३॥ तब सुग्रीवका मामा दधिमुख अन्य वनरक्षकोंके साथ अति क्रुद्ध हो जहाँ वानरराज सुग्रीव थे वहाँ गया ॥२४॥ वहाँ पहुँचकर वह बोला—"राजन् ! तुमने चिरकालसे जिस मधुवनकी रक्षा की थी उसे आज युवराज अंगद और हनुमान्‌ने उजाड़ डाला" ॥२५॥ दधिमुखकी बात सुनकर सुग्रीव प्रसन्न होकर कहने लगे—"इसमें सन्देह नहीं पवनकुमार सीताजीको देख आये

२२८ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ५

दृष्ट्वाऽऽगतो न सन्देहः सीतां पवननन्दनः ॥२६॥ नो चेन्मधुवनं द्रष्टुं समर्थः को भवेन्मम । तत्रापि वायुपुत्रेण कृतं कार्यं न संशयः ॥२७॥

श्रुत्वा सुग्रीववचनं हृष्टो रामस्तमब्रवीत् । किमुच्यते त्वया राजन्यचः सीताकथान्वितम् ॥२८॥

सुग्रीवस्त्वब्रवीद्वाक्यं देव दृष्टाऽवनीसुता । हनूमत्प्रमुखाः सर्वे प्रविष्टा मधुकाननम् ॥२९॥

भक्षयन्ति स्म सकलं ताडयन्ति स्म रक्षिणः । अकृत्वा देवकार्यं ते द्रष्टुं मधुवनं मम ॥३०॥

न समर्थास्ततो देवी दृष्टा सीतेति निश्चितम् । रक्षिणो वो भयं माऽस्तु गत्वा ब्रूत ममाज्ञया ॥३१॥

वानरानङ्गदप्रमुखानिनयध्वं ममान्तिकम् । श्रुत्वा सुग्रीववचनं गत्वा ते वायुवेगतः ॥३२॥

हनुमत्प्रमुखानुचुर्गच्छतेश्वरशासनात् । द्रष्टुमिच्छति सुग्रीवः सरामो लक्ष्मणान्वितः ॥३३॥

युष्मानतीव हृष्टास्ते त्वरयन्ति महाबलाः । तथेत्यम्बरमासाद्य ययुस्ते वानरोत्तमाः ॥३४॥

हनूमन्तं पुरस्कृत्य युवराजं तथाऽङ्गदम् । रामसुग्रीवयोग्रे निपेतुर्भुवि सत्वरम् ॥३५॥

हनूमान् राघवं प्राह दृष्टा सीता निरामया । साष्टाङ्गं प्रणिपत्याग्रे रामं पश्चाद्धरीश्वरम् ॥३६॥

कुशलं प्राह राजेन्द्र जानकी त्वां शुचान्विता । अशोकवनिकामध्ये शिंशपामूलमाश्रिता ॥३७॥

राक्षसीभिः परिवृता निराहारा कृशा प्रभो । हा राम राम रामेति शोचन्ती मलिनाम्बरा ॥३८॥

एकवेणी मया दृष्टा शनैराश्वासिता शुभा ।


हैं; नहीं तो, मेरे मधुवनकी ओर देखनेकी भला किसे सामर्थ्य थी ? और उनमें भी निस्सन्देह यह कार्य किया हनुमान्‌जीने ही है"॥ २६-२७ ॥

सुग्रीवके वचन सुनकर भगवान् रामने प्रसन्न हो उनसे पूछा—"राजन् ! यह सीता-सम्बन्धी तुम क्या बात कह रहे हो ?" ॥ २८ ॥ सुग्रीवने कहा—"भगवन् ! मालूम होता है भूमिसुता जानकीजीका पता लग गया है, क्योंकि हनुमान् आदि समस्त वानरगण मधुवनमें घुसकर उसके फल खा रहे हैं और उसके रक्षकोंको मारते हैं। बिना आपका कार्य किये तो वे मेरे मधुवनकी ओर देख भी नहीं सकते थे। अतः यह निश्चय होता है कि वे देवी जानकीजीसे मिल आये हैं। रक्षको ! तुम डरो मत, उन्हें जाकर मेरी आज्ञा सुनाओ और उन अंगदादि वानरोंको मेरे पास ले आओ।" सुग्रीवकी आज्ञा सुनकर वे वायुवेग से चले और हनुमान् आदिसे कहा—"महाराजकी आज्ञा है, आपलोग तुरन्त वहाँ जाइये क्योंकि राम और लक्ष्मणके सहित महाराज सुग्रीव आपलोगोंसे मिलना चाहते हैं। हे महावीरगण ! आपलोगोंसे प्रसन्न होकर वे आपको बहुत शीघ्र बुला रहे हैं।" तब वे वानरश्रेष्ठ 'बहुत अच्छा' कह आकाशमें चढ़कर चलने लगे। वे सब वानरगण हनुमान् और युवराज अंगदको आगे कर चले और तुरन्त ही राम और सुग्रीवके सामने पृथिवीपर उतर आये ॥ २९–३५ ॥

हनुमान्‌जीने पहले श्रीरघुनाथजीको और फिर वानरराज सुग्रीवको साष्टाङ्ग प्रणाम कर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—"मैं सीताजीको सकुशल देख आया हूँ ॥ ३६ ॥ हे राजेन्द्र ! शोकमग्ना जानकीजीने आपको अपना कुशल-समाचार सुनानेके लिये कहा है। वे अशोक-वाटिकाके बीचमें शिंशपा वृक्षके तले बैठी हैं, और हे प्रभो ! सदा राक्षसियोंसे घिरी रहती हैं, अन्न-जल छोड़ देनेके कारण वे अत्यन्त दुर्बल हो गयी हैं, और निरन्तर 'हा राम ! हा राम !' कहकर शोक करती रहती हैं, उनके वस्त्र मलिन हो गये हैं तथा बालोंकी मिलकर एक वेणी हो गयी है—ऐसी अवस्था-

सर्ग ५ ] सुन्दरकाण्ड २२९


[ संस्कृत मूल ]

वृक्षशाखान्तरे स्थित्वा सूक्ष्मरूपेण ते कथाम् ॥ ३९ ॥
जन्मारभ्य तदात्यर्थं दण्डकागमनं तथा ।
दशाननेन हरणं जानक्या रहिते त्वयि ॥ ४० ॥
सुग्रीवेण यथा मैत्री कृत्वा वालिनिबर्हणम् ।
मार्गणार्थं च वैदेह्याः सुग्रीवेण विसर्जिताः ॥ ४१ ॥
महाबला महासत्त्वा हरयो जितकाशिनः ।
गताः सर्वत्र सर्वे वै तत्रैकोऽहमिहागतः ॥ ४२ ॥
अहं सुग्रीवसचिवो दासोऽहं राघवस्य हि ।
दृष्टा यज्जानकी भाग्यात्प्रयासः फलितोऽद्य मे ॥ ४३ ॥

इत्युदीरितमाकर्ण्य सीता विस्फारितेक्षणा ।
केन वा कर्णपीयूषं श्रावितं मे शुभाक्षरम् ॥ ४४ ॥
यदि सत्यं तदायातु मदर्शनपथं तु सः ।
ततोऽहं वानराकारः सूक्ष्मरूपेण जानकीम् ॥ ४५ ॥
प्रणम्य प्राञ्जलिर्भूत्वा दूरादेव स्थितः प्रभो ।
पृष्टोऽहं सीतया कस्त्वमित्यादि बहुविस्तरम् ॥ ४६ ॥
मया सर्वं क्रमेणैव विज्ञापितमरिन्दम ।
पश्चान्मयार्पितं देव्यै भवद्दत्ताङ्गुलीयकम् ॥ ४७ ॥
तेन मामतिविश्वस्ता वचनं चेदमब्रवीत् ।
यथा दृष्टोऽस्मि हनुमन्पीड्यमाना दिवानिशम् ४८
राक्षसीनां तर्जनैस्तत्सर्वं कथय राघवे ।
मयोक्तं देवि रामोऽपि त्वच्चिन्तापरिनिष्ठितः ॥ ४९ ॥
परिशोचत्यहोरात्रं त्वद्वार्ता नाधिगम्य सः ।
इदानीमेव गत्वाऽहं स्थितिं रामाय ते ब्रुवे ॥ ५० ॥
रामः श्रवणमात्रेण सुग्रीवेण सलक्ष्मणः ।
वानरानीकपः सार्धमागमिष्यति तेऽन्तिकम् ॥ ५१ ॥
रावणं सकुलं हत्वा नेष्यति त्वां स्वकं पुरम् ।
अभिज्ञां देहि मे देवि यथा मां विश्वसेद्विभुः ॥ ५२ ॥
इत्युक्ता सा शिरोरत्नं चूडापाशे स्थितं प्रियम् ।


[ हिन्दी अनुवाद ]

में मैंने सीताजीको देखा और धीरे-धीरे उन्हें ढाँढ़स-बँधाया। वहाँ जाकर पहले मैंने सूक्ष्मरूपसे वृक्षके पत्तोंमें छिपे-छिपे संक्षेपमें आपकी सब कथा सुनायी, जिस प्रकार जन्मसे लेकर आपका दण्डकारण्यमें आना हुआ, आपकी अनुपस्थितिमें रावणने सीताजीको हरा, तथा जिस प्रकार सुग्रीवसे मित्रता कर आपने वालीको मारा— (वह सब सुनाकर फिर मैंने कहा कि) सुग्रीवद्वारा सीताजीकी खोजके लिये भेजे हुए बड़े बलवान्, पराक्रमी और विजयशाली वानरगण सब दिशाओंमें गये हैं और उनमेंसे एक मैं सुग्रीवका मन्त्री और रघुनाथजीका दास यहाँ आया हूँ। आज भाग्यवश मैने जानकीजीको देख लिया अतः मेरा प्रयास सफल हो गया ॥ ३७–४३ ॥

"मेरा यह कथन सुनकर सीताजीके नेत्र खिल गये और वे कहने लगीं— 'मुझे ये कर्णामृतरूप शुभ संवाद किसने सुनाया है? यदि यह सब सत्य है (—मुझे भ्रम नहीं हुआ है) तो इस संवादको सुनानेवाला मेरे सामने आवे।' हे प्रभो! तब मैं सूक्ष्मरूपसे बन्दरके आकारमें उनके सामने उपस्थित हुआ और दूरहीसे प्रणाम कर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। तब जानकीजीने मुझसे 'तुम कौन हो?' इत्यादि बहुत-सी बातें पूछीं ॥ ४४–४६ ॥ और हे शत्रुदमन! मैंने उन्हें क्रमशः सब बातें बतला दीं। इसके पश्चात् मैंने उन्हें आपकी दी हुई अँगूठी निवेदन की ॥ ४७ ॥ इससे उन्हें मुझपर पूर्ण विश्वास हो गया और वे मुझसे इस प्रकार कहने लगीं— 'हनुमन्! जिस प्रकार इन राक्षसियोंके त्राससे तुमने मुझे अहर्निश दुःख उठाते देखा है वह सब ज्यों-का-त्यों रघुनाथजीको सुना देना।' मैंने कहा— 'देवि! रघुनाथजी भी तुम्हारी ही चिन्तासे ग्रस्त रहते हैं, और तुम्हारा समाचार न मिलनेसे रात-दिन तुम्हारी ही चिन्ता करते रहते हैं। मैं अभी जाकर उन्हें तुम्हारी स्थिति सुनाऊँगा ॥ ४८–५० ॥ और रघुनाथजी उसे सुनते ही सुग्रीव, लक्ष्मण और अन्यान्य वानर सेनापतियोंके साथ तुम्हारे पास आयेंगे ॥ ५१ ॥ तथा रावणको कुटुम्बसहित मारकर तुम्हें अपनी राजधानी अयोध्याको ले जायेंगे। हे देवि! तुम मुझे कोई ऐसा चिह्न दो जिससे भगवान् मेरा विश्वास करें' ॥ ५२ ॥ मेरे इस प्रकार कहनेपर उन्होंने अपने केशपाशमें स्थित अपनी प्रिया चूडामणि दी और पहले

२३०अध्यात्मरामायण[ सर्ग ५

दत्त्वा काकेन यद्वृत्तं चित्रकूटगिरौ पुरा ॥५३॥ तदप्याहाश्रुपूर्णाक्षी कुशलं ब्रूहि राघवम् । लक्ष्मणं ब्रूहि मे किञ्चिद्दुरुक्तं भाषितं पुरा ॥५४॥ तत्क्षमस्वाज्ञभावेन भाषितं कुलनन्दन । तारयेन्मां यथा रामस्तथा कुरु कृपान्वितः ॥५५॥

इत्युक्त्वा रुदती सीता दुःखेन महताऽऽवृता । मयाऽप्याश्वासिता राम वदता सर्वमेव ते ॥५६॥ ततः प्रस्थापितो राम त्वत्समीपमिहागतः । तदागमनवेलायामशोकवनिकां प्रियाम् ॥५७॥ उत्पाट्य राक्षसांस्तत्र बहून्हत्वा क्षणादहम् । रावणस्य सुतं हत्वा रावणेनाभिभाष्य च ॥५८॥ लङ्कामशेषतो दग्ध्वा पुनरप्यगमं क्षणात् ।

श्रुत्वा हनूमतो वाक्यं रामोऽत्यन्तप्रहृष्टधीः ॥५९॥ हनूमंस्ते कृतं कार्यं देवैरपि सुदुष्करम् । उपकारं न पश्यामि तव प्रत्युपकारिणः ॥६०॥ इदानीं ते प्रयच्छामि सर्वस्वं मम मारुते । इत्यालिङ्ग्य समाकृष्य गाढं वानरपुङ्गवम् ॥६१॥ सार्द्रनेत्रो रघुश्रेष्ठः परां प्रीतिमवाप सः । हनूमन्तमुवाचेदं राघवो भक्तवत्सलः ॥६२॥ परिरम्भो हि मे लोके दुर्लभः परमात्मनः । अतस्त्वं मम भक्तोऽसि प्रियोऽसि हरिपुङ्गव ॥६३॥

यत्पादपङ्कजयुगलं तुलसीदलाद्यैः संपूज्य विष्णुपदवीमतुलां प्रयान्ति । तेनैव किं पुनरसौ परिरब्धमूर्तिं रामेण वायुतनयः कृतपुण्यपुञ्जः ॥६४॥

चित्रकूट पर्वतपर काकके साथ जो कुछ हुआ था वह सब भी सुनाया तथा नेत्रोंमें जल भरकर कहा—"रघुनाथजीसे मेरी कुशल कहना और लक्ष्मणजीसे कहना कि हे कुलन्दन ! मैंने पहले तुमसे जो कुछ कठोर वचन कहे थे उन अज्ञानवश कहे हुए वाक्योंके लिये मुझे क्षमा करें। इसके सिवा जिस प्रकार रघुनाथजी कृपा करके मेरा उद्धार करें वही चेष्टा करना" ॥५३–५५॥

"ऐसा कहकर सीताजी महान् दुःखमें भरकर रोने लगीं; मैंने भी उन्हें आपका सब वृत्तान्त सुनाकर ढाँढस बँधाया और फिर उनसे विदा होकर आपके पास चला आया। आती-बार मैंने रावणकी प्रिय अशोक वाटिका उजाड़ दी और एक क्षणमें ही बहुतसे राक्षस मार डाले। रावणके पुत्रको भी मारा और रावणसे वार्तालाप कर लंकाको सब ओरसे जलाकर फिर क्षणभरमें ही यहाँ चला आया।"

हनुमान्जीके ये वचन सुन श्रीरामचन्द्रजी अति प्रसन्न होकर कहने लगे–॥५६-५९॥ "हनुमन् ! तुमने जो कार्य किया है वह देवताओंसे भी होना कठिन है, मैं इसके बदलेमें तुम्हारा क्या उपकार करूँ—सो नहीं जानता ॥६०॥ लो, मैं अभी तुम्हें अपना सर्वस्व सौंपता हूँ।" ऐसा कह उन्होंने वानरश्रेष्ठ हनुमान्जीको खींचकर गाढ़ आलिङ्गन किया ॥ ६१ ॥ उनके नेत्रोंमें जल भर आया और हृदयमें परम प्रेम उमड़ने लगा। तब भक्तवत्सल रघुनाथजीने हनुमान्जीसे कहा–॥ ६२ ॥ "संसारमें मुझ परमात्माका आलिङ्गन मिलना अत्यन्त दुर्लभ है, हे वानरश्रेष्ठ ! (तुम्हें यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है) अतः तुम मेरे परम भक्त और प्रिय हो" ॥ ६३ ॥

हे पार्वति ! जिनके चरणारविन्दयुगलका तुलसीदल आदिसे पूजन कर भक्तजन अतुलनीय विष्णुपद प्राप्त करते हैं उन्हीं रामने जिनके शरीरका आलिङ्गन किया उन पवित्र कर्म करनेवाले पवनपुत्रके विषयमें क्या कहा जाय ? ॥ ६४ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे सुन्दरकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥

समाप्तमिदं सुन्दरकाण्डम्

युद्धकाण्ड

श्रीसीतारामाभ्यां नमः

अध्यात्मरामायण

युद्धकाण्ड

यस्यातिवीर्याम्बुधिवीचिराजौ वंश्यैरहो वैश्रवणो विलीनः ।
तं बैरिविध्वंसनशीललीलं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥

॥ श्रीराम ॥

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राम-रावण-युद्ध


ततः पावकसङ्काशैः शरैः काञ्चनभूषणैः। अभ्यवर्षद्रणे रामो दशग्रीवं समाहितः॥ (अ० रा० युद्ध० ११।१८)

युद्धकाण्ड - सर्ग १: वानर-सेनाका प्रस्थान

अध्यात्मरामायण

युद्धकाण्ड


प्रथम सर्ग

वानर-सेनाका प्रस्थान।

श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले—
यथावद्भाषितं वाक्यं श्रुत्वा रामो हनूमतः ।<br>उवाचानन्तरं वाक्यं हर्षेण महताऽऽवृतः ॥ १ ॥हे पार्वति ! हनुमान्जीके ज्यों-के-त्यों कहे हुए वाक्योंको सुननेके अनन्तर श्री-रामचन्द्रजीने अति हर्षसे भरकर ये वचन कहे—॥ १ ॥
कार्यं कृतं हनुमता देवैरपि सुदुष्करम् ।<br>मनसाऽपि यदन्येन स्मर्तुं शक्यं न भूतले ॥ २ ॥“हनुमान्जीने जो कार्य किया है उसका करना देवताओंको भी अति कठिन है, पृथ्वीतलपर और कोई तो उसका मनसे भी स्मरण नहीं कर सकता ॥ २ ॥
शतयोजनविस्तीर्णं लङ्घयेत्कः पयोनिधिम् ।<br>लङ्कां च राक्षसैर्गुप्तां को वा धर्षयितुं क्षमः ॥ ३ ॥भला ऐसा कौन है जो सौ योजन विस्तारवाले समुद्रको लाँघने और राक्षसोंसे सुरक्षिता लङ्कापुरीका ध्वंस करनेमें समर्थ हो ? ॥ ३ ॥
भृत्यकार्यं हनुमता कृतं सर्वमशेषतः ।<br>सुग्रीवस्येदृशो लोके न भूतो न भविष्यति ॥ ४ ॥हनुमान्ने सुग्रीवके समग्र सेवक-धर्मको खूब निभाया । संसारमें ऐसा न कोई हुआ और न आगे होगा ही ॥ ४ ॥
अहं च रघुवंशश्च लक्ष्मणश्च कपीश्वरः ।<br>जानक्या दर्शनेनाद्य रक्षिताःस्मो हनूमता ॥ ५ ॥हनुमान्ने जानकीजीको देखकर आज मुझको तथा रघुवंश, लक्ष्मण और सुग्रीव आदि सभीको बचा लिया है ॥५॥
सर्वथा सुकृतं कार्यं जानक्याः परिमार्गणम् ।<br>समुद्रं मनसा स्मृत्वा सीदतीव मनो मम ॥ ६ ॥जानकीजीकी खोजका कार्य तो बिलकुल ठीक हो गया, किन्तु समुद्रकी याद आनेसे मेरा मन व्यथित-सा होने लगता है ॥ ६ ॥
कथं नक्रझषाकीर्णं समुद्रं शतयोजनम् ।<br>लङ्घयित्वा रिपुं हन्यां कथं द्रक्ष्यामि जानकीम् ॥७॥नाके और मकरोंसे भरे हुए सौ योजन विस्तारवाले समुद्रको लाँघकर मैं शत्रुको कैसे मारूँगा ? और जानकीजीको कैसे देख सकूँगा ? ॥७॥
श्रुत्वा तु रामवचनं सुग्रीवः प्राह राघवम् ।<br>समुद्रं लङ्घयिष्यामो महानक्रझषाकुलम् ॥८॥श्रीरघुनाथजीके ये वचन सुनकर सुग्रीव उनसे बोला—
लङ्कां च विधमिष्यामो हनिष्यामोऽद्य रावणम् ।<br>चिन्तां त्यज रघुश्रेष्ठ चिन्ता कार्यविनाशिनी ॥९॥“हम बड़े-बड़े नाके और मछलियोंसे पूर्ण समुद्रको लाँघ जायँगे और शीघ्र ही लङ्काको विध्वंस कर रावणका भी नाश करेंगे । रघुनाथजी ! आप चिन्ता छोड़िये, चिन्ता तो कार्य बिगाड़नेवाली होती है

३०

२३४अध्यात्मरामायण[ सर्ग १
एतान्यश्य महासत्त्वान् शूरान्वानरपुङ्गवान् ।<br>त्वत्प्रियार्थं समुद्युक्तान्प्रवेष्टुमपि पावकम् ॥१०॥<br><br>समुद्रतरणे बुद्धिं कुरुष्व प्रथमं ततः ।<br>दृष्ट्वा लङ्कां दशग्रीवो हत इत्येव मन्महे ॥ ११॥<br><br>नहि पश्याम्यहं कश्चित्त्रिषु लोकेषु राघव ।<br>गृहीतधनुषो यस्ते तिष्ठेदभिमुखो रणे ॥१२॥<br><br>सर्वथा नो जयो राम भविष्यति न संशयः ।<br>निमित्तानि च पश्यामि तथाभूतानि सर्वशः॥१३॥<br><br>सुग्रीववचनं श्रुत्वा भक्तिवीर्यसमन्वितम् ।<br>अङ्गीकृत्याब्रवीद्रामो हनूमन्तं पुरःस्थितम् ॥१४॥<br><br>येन केन प्रकारेण लङ्घयामो महार्णवम् ।<br>लङ्कास्वरूपं मे ब्रूहि दुःसाध्यं देवदानवैः ॥१५॥<br><br>ज्ञात्वा तस्य प्रतीकारं करिष्यामि कपीश्वर ।<br>श्रुत्वा रामस्य वचनं हनूमान्विनयान्वितः ॥१६॥<br><br>उवाच प्राञ्जलिर्देव यथा दृष्टं ब्रवीमि ते ।<br>लङ्का दिव्या पुरी देव त्रिकूटशिखरे स्थिता ॥१७॥<br><br>स्वर्णप्राकारसहिता स्वर्णाट्टालकसंयुता ।<br>परिखाभिः परिवृता पूर्णाभिर्निर्मलोदकैः ॥१८॥<br><br>नानोपवनशोभाढ्या दिव्यवापीभिरावृता ।<br>गृहैर्विचित्रशोभाढ्यैर्मणिस्तम्भमयैः शुभैः ॥१९॥<br><br>पश्चिमद्वारमासाद्य गजवाहाः सहस्रशः ।<br>उत्तरे द्वारि तिष्ठन्ति साश्ववाहाः सपत्तयः ॥२०॥<br><br>तिष्ठन्त्यर्बुदसङ्ख्याकाः प्राच्यामपि तथैव च ।<br>दक्षिणे राक्षसा वीर द्वारं दक्षिणमाश्रिताः ॥२१॥<br><br>मध्यकक्षेऽप्यसङ्ख्याता गजाश्वरथपत्तयः ।<br>रक्षयन्ति सदा लङ्कां नानास्त्रकुशलाः प्रभो ॥२२॥॥ ८-९ ॥ आप इन महापराक्रमी और शूरवीर वानर-वीरोंको देखिये। ये आपका प्रिय करनेके लिये अग्निमें प्रवेश करनेको भी तैयार हैं ॥ १० ॥ पहले समुद्र पार करनेका विचार कीजिये, फिर लङ्काके तो दर्शन होते ही हम रावणको मरा हुआ ही समझते हैं ॥ ११ ॥ हे राघव ! त्रिलोकीमें मुझे ऐसा कोई वीर दिखायी नहीं देता जो आपके धनुष ग्रहण करनेपर युद्धमें सामने डटा रहे ॥ १२ ॥ हे राम ! इसमें तनिक भी सन्देह नहीं सब प्रकारसे जीत हमारी ही होगी, क्योंकि मुझे सब ओर ऐसे ही कारण (शकुन) दिखायी दे रहे हैं" ॥ १३ ॥<br><br>सुग्रीवके ये भक्ति और पुरुषार्थसे भरे वचन सुनकर भगवान् रामने उन्हें सादर स्वीकार किया और फिर सामने खड़े हुए हनुमान्‌जीसे कहा—॥१४॥ "हम जैसे-तैसे समुद्र तो पार करेंगे ही, किन्तु तुम लङ्काका रूप तो बताओ। सुना है, उसे जीतना तो देवता और दानवोंको भी अत्यन्त कठिन है ॥ १५॥ हे कपीश्वर ! उसका स्वरूप विदित होनेपर मैं उसका कोई प्रतिकार सोचूँगा।"<br><br>रामचन्द्रजीके ये वचन सुनकर हनुमान्जीने विनयपूर्वक हाथ जोड़कर कहा—"देव ! मैंने जैसा कुछ देखा है वह आपसे निवेदन करता हूँ। दिव्यपुरी लङ्का त्रिकूटपर्वतके शिखरपर बसी हुई है ॥१६-१७॥ उसका सोनेका परकोटा है और उसमें सोनेकी ही अट्टालिकाएँ हैं तथा वह निर्मल जलसे भरी खाइयोंसे घिरी हुई है ॥ १८ ॥ अनेकों उपवनोंके कारण उसकी अत्यन्त शोभा हो रही है और उसमें जहाँ-तहाँ बहुत-सी वावड़ियाँ तथा विचित्रशोभासम्पन्न मणिस्तम्भयुक्त भवन शोभायमान हैं ॥१९॥ उसके पश्चिमद्वारपर हजारों गजारोही, उत्तरद्वारपर पैदल सेनाके सहित बहुत-से घुड़सवार, पूर्वद्वारपर एक अरब राक्षस वीर और दक्षिणद्वारपर भी इतने ही रक्षक रहते हैं ॥ २०-२१ ॥ हे प्रभो ! उसके मध्यभागमें भी हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंकी असंख्य सेना रहकर नगरकी रक्षा करती है। वे सब नाना प्रकारके शस्त्र चलानेमें अत्यन्त कुशल हैं ॥ २२ ॥ इस प्रकार लङ्कामें
सर्ग १ ]युद्धकाण्डे२३५

| सङ्क्रमैर्विविधैर्लङ्का शतघ्नीभिश्च संयुता ।<br>एवं स्थितेऽपि देवेश शृणु मे तत्र चेष्टितम् ॥२३॥<br>दशाननबलौघस्य चतुर्थांशो मया हतः ।<br>दग्ध्वा लङ्कां पुरीं स्वर्णप्रासादो धर्षितो मया ॥२४॥<br>शतघ्न्यः सङ्क्रमाश्चैव नाशिता मे रघूत्तम ।<br>देव त्वद्दर्शनादेव लङ्का भस्मीकृता भवेत् ॥२५॥<br>प्रस्थानं कुरु देवेश गच्छामो लवणाम्बुधेः ।<br>तीरं सह महावीरैर्वानरौघैः समन्ततः ॥२६॥<br>श्रुत्वा हनूमतो वाक्यमुवाच रघुनन्दनः ।<br>सुग्रीव सैनिकान्सर्वान्प्रस्थानायाभिनोदय ॥२७॥<br>इदानीमेव विजयो मुहूर्तः परिवर्तते ।<br>अस्मिन्मुहूर्ते गत्वाऽहं लङ्कां राक्षससङ्कुलाम् ॥२८॥<br>सप्राकारां सुदुर्धर्षां नाशय्यामि सरावाणाम् ।<br>आनेष्यामि च सीतां मे दक्षिणाक्षि स्फुरत्यधः ॥२९॥<br>प्रयातु वाहिनी सर्वा वानराणां तरस्विनाम् ।<br>रक्षन्तु यूथपाः सेनामग्रे पृष्ठे च पार्श्वयोः ॥३०॥<br>हनूमन्तमथारुह्य गच्छाम्यग्रेऽङ्गदं ततः ।<br>आरुह्य लक्ष्मणो यातु सुग्रीव त्वं मया सह ॥३१॥<br>गजो गवाक्षो गवयो मैन्दो द्विविद एव च ।<br>नलो नीलः सुषेणश्च जाम्बवांश्च तथाऽपरे ॥३२॥<br>सर्वे गच्छन्तु सर्वत्र सेनायाः शत्रुघातिनः ।<br>इत्याज्ञाप्य हरीन् रामः प्रतस्थे सहलक्ष्मणः ॥३३॥<br>सुग्रीवसहितो हर्षात्सेनामध्यगतो विभुः ।<br>वारणेन्द्रनिभाः सर्वे वानराः कामरूपिणः ॥३४॥<br>क्ष्वेलन्तः परिगर्जन्तो जग्मुस्ते दक्षिणां दिशम् ।<br>भक्षयन्तो ययुः सर्वे फलानि च मधूनि च ॥३५॥<br>ब्रुवन्तो राघवस्याग्रे हनिष्यामोऽद्य रावणम् । | जानेके मार्ग नाना प्रकारके संक्रम (सुरंग) और शतघ्नियों<br>(तोपों) से सुरक्षित हैं; किन्तु हे देवेश्वर ! यह सब<br>कुछ होते हुए भी मैंने जो कुछ किया है वह सुनिये<br>॥ २३ ॥ मैंने रावणकी चौथाई सेना मार डाली और<br>लङ्कापुरीको जलाकर उसका सोनेका महल नष्ट कर दिया<br>॥ २४॥ हे रघुश्रेष्ठ ! संक्रमों और तोपोंको मैंने तोड़ डाला ।<br>हे देव ! (मुझे तो विश्वास है) आपकी दृष्टि पड़ते<br>ही लङ्का भस्मीभूत हो जायगी ॥ २५ ॥ हे देवेश्वर !<br>अब चलनेकी तैयारी कीजिये । हम सब ओरसे<br>महाबलवान् वानर-वीरोंकी सेना लेकर क्षार (खारे<br>पानीके) समुद्रके तटपर चलें” ॥ २६ ॥<br>हनुमान्‌जीका कथन सुनकर श्रीरघुनाथजीने कहा—<br>“सुग्रीव ! सब सैनिकोंको इसी समय कूच करनेकी<br>आज्ञा दो, क्योंकि इस समय विजयनामक मुहूर्त्त बीत<br>रहा है । इस मुहूर्त्तमें जाकर मैं राक्षससंकुलित लङ्काको,<br>जो परकोटे आदिके कारण अति दुर्जय है, रावणके<br>सहित नष्ट कर दूँगा और सीताजीको ले आऊँगा ।<br>इस समय मेरी दायीं आँखका नीचेका भाग फड़क<br>रहा है ॥ २७-२९ ॥ इसी समय बलवान् वानरोंकी<br>सम्पूर्ण सेना चले; जो यूथपति हों वे अपने-अपने<br>यूथकी आगे-पीछे और इधर-उधरसे रक्षा करें ॥३०॥<br>मैं हनुमान्‌के कन्धेपर चढ़कर सबसे आगे चलता हूँ,<br>उसके पीछे लक्ष्मण अंगदके ऊपर चढ़कर चलें और<br>हे सुग्रीव ! तुम मेरे साथ चलो ॥ ३१ ॥ गज, गवाक्ष,<br>गवय, मैन्द, द्विविद, नल, नील, सुषेण और जाम्बवान्<br>तथा शत्रुओंका नाश करनेवाले और भी समस्त<br>सेनापतिगण सेनाके चारों ओर चलें ।” वानरोंको<br>इस प्रकार आज्ञा दे श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीके सहित<br>कूच किया ॥ ३२-३३ ॥<br>भगवान् राम अति हर्षसे सुग्रीवके साथ सेनाके<br>बीचमें जा रहे थे । समस्त वानरगण गजराजके समान<br>बड़े डीलवाले और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले<br>थे ॥३४॥ वे सब बड़े वेगसे उछलते-कूदते, गरजते और<br>फल तथा मधु खाते दक्षिण दिशाको चले ॥ ३५ ॥<br>इस प्रकार वे अतुल पराक्रमी वानरश्रेष्ठ श्रीरघुनाथजीके |

२३६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग १


एवं ते वानरश्रेष्ठा गच्छन्त्यतुलविक्रमाः ॥३६॥ हरिभ्यामुह्यमानौ तौ शुशुभाते रघूत्तमौ । नक्षत्रैः सेवितौ यद्वच्चन्द्रसूर्याविवाम्बरे ॥३७॥ आवृत्य पृथिवीं कृत्स्नां जगाम महती चमूः । प्रस्फोटयन्तः पुच्छाग्राल्लुङ्हन्तश्च पादपान् ॥३८॥ शैला नारोहयन्तश्च जग्मुर्मारुतवेगतः । असङ्ख्याताश्च सर्वत्र वानराः परिपूरिताः ॥३९॥ हृष्टास्ते जग्मुरत्यर्थं रामेण परिपालिताः । गता चमूर्दिंवारान्नं कचिन्नासज्जत क्षणम् ॥४०॥ काननानि विचित्राणि पश्यन्मलयसह्ययोः । ते सह्यं समतिक्रम्य मलयं च तथा गिरीन् ॥४१॥ आययुश्चानुपूर्व्येण समुद्रं भीमनिःस्वनम् । अवतीय हनूमन्तं रामः सुग्रीवसंयुतः ॥४२॥ सलिलाभ्याशमासाद्य रामो वचनमब्रवीत् । आगताः स्म वयं सर्वे समुद्रं मकरालयम् ॥४३॥ इतो गन्तुमशक्यं नो निरुपायेन वानराः । अत्र सेनानिवेशोऽस्तु मन्त्रयामोऽस्य तारणे ॥४४॥

श्रुत्वा रामस्य वचनं सुग्रीवः सागरान्तिके । सेनां निवेशयत्क्षिप्रं रक्षितां कपिकुञ्जरैः ॥४५॥ ते पश्यन्तो विषेदुस्तं सागरं भीमदर्शनम् । महोन्नततरङ्गाढ्यं भीमनक्रमयङ्करम् ॥४६॥ अगाधं गगनाकारं सागरं वीक्ष्य दुःखिताः । तरिष्यामः कथं घोरं सागरं वरुणालयम् ॥४७॥ हन्तव्योऽस्माभिरद्यैव रावणो राक्षसाधमः । इति चिन्ताकुलाः सर्वे रामपार्श्वे व्यवस्थिताः ॥४८॥ रामः सीतामनुस्मृत्य दुःखेन महताऽऽवृतः । विलप्य जानकीं सीतां बहुधा कार्यमानुषः ॥४९॥


सामने 'हम आज ही रावणको मार डालेंगे' ऐसा कहते हुए जा रहे थे ॥ ३६ ॥ हनुमान् और अंगदके कन्धोंपर जाते हुए वे दोनों रघुश्रेष्ठ ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो आकाश-मण्डलमें नक्षत्रोंसे सुसेवित सूर्य और चन्द्रमा हों ॥ ३७ ॥ वह महान् सेना सम्पूर्ण पृथिवी-को घेरकर चल रही थी। वानरगण अपनी पूँछ फटकारते और पेड़ोंको उखाड़ते हुए पर्वतोंपर उछलते-कूदते वायुवेगसे जा रहे थे। उस समय सब ओर असंख्य वानर भरे हुए दीख पड़ते थे ॥ ३८-३९ ॥ भगवान् रामसे सुरक्षित होकर वे प्रसन्नतापूर्वक बड़ी तेजीसे जा रहे थे। वह वानर-सेना रात-दिन चलनी थी, कहीं एक क्षणको भी न रुकती थी ॥ ४० ॥ अन्तमें वे सबलोग मलयाचल और सह्याद्रिके विचित्र वनोंको देखते हुए उन दोनों पर्वतोंको पार कर क्रमशः भयङ्कर गर्जना करनेवाले समुद्रके तटपर पहुँच गये । तब श्रीरामचन्द्रजी हनुमान्‌जीके कन्धेसे उतरकर सुग्रीवके साथ जलके निकट आये और बोले—"हे वानरगण ! हमलोग मकरादिसे पूर्ण समुद्रके तटपर तो आ गये, किन्तु अब आगे बिना कोई विशेष उपाय किये हम नहीं जा सकते । अतः अब यहीं सेनाकी छावनी डाली जाय । हमलोग समुद्र पार करनेके विषयमें परस्पर परामर्श करेंगे" ॥ ४१–४४ ॥

रामके वचन सुनकर सुग्रीवने तुरन्त ही समुद्रके निकट सेनाका पड़ाव डाला । और बहुत-से प्रधान-प्रधान वानर-वीर उसकी रक्षा करने लगे ॥ ४५ ॥ वे लोग उत्ताल तरङ्गोंसे पूर्ण तथा दारुण नाके आदिके कारण भयङ्कर समुद्रको देखकर मन-ही-मन विषाद करने लगे ॥ ४६ ॥ उस आकाशके समान अगाध समुद्रको देखकर उन्हें बड़ा दुःख हुआ और वे सोचने लगे कि 'हम इस घोर वरुणालयको कैसे पार करेंगे ॥४७॥ राक्षसाधम रावणको तो हमें आज ही मारना है (पर मारें कैसे ?)' इस प्रकार सब लोग अति चिन्ताग्रस्त हो श्रीरघुनाथजीके पास बैठ गये ॥ ४८ ॥

इधर श्रीरामचन्द्रजी भी सीताकी यादकर महान् दुःखमें डूब गये । वे यद्यपि एक अद्वितीय चिन्मात्र

युद्धकाण्ड - सर्ग २: रावणद्वारा विभीषणका तिरस्कार

सर्ग २] युद्धकाण्ड २३७


अद्वितीयश्चिदात्मैकः परमात्मा सनातनः ।
यस्तु जानाति रामस्य स्वरूपं तत्त्वतो जनः ॥ ५० ॥
तं न स्पृशति दुःखादि किमुतानन्दमव्ययम् ।
दुःखहर्षभयक्रोधलोभमोहमदादयः ॥ ५१ ॥
अज्ञानलिङ्गान्येतानि कुतः सन्ति चिदात्मनि ।
देहाभिमानिनो दुःखं न देहस्य चिदात्मनः ॥ ५२ ॥
सम्प्रसादे द्वयाभावात्सुखमात्रं हि दृश्यते ।
बुद्ध्याद्यभावात्संशुद्धे दुःखं तत्र न दृश्यते ।
अतो दुःखादिकं सर्वं बुद्धेरेव न संशयः ॥ ५३ ॥
रामः परात्मा पुरुषः पुराणो
नित्योदितो नित्यसुखो निरीहः ।
तथापि मायागुणसङ्गतोऽसौ
सुखीव दुःखीव विभाव्यतेऽबुधैः ॥ ५४ ॥

भावार्थ: परमात्मा सनातन पुरुष थे, तथापि कार्यवश मनुष्यरूप होनेके कारण जानकीजीके लिये नाना प्रकारसे विलाप करने लगे। जो पुरुष परमात्मा रामका वास्तविक स्वरूप जानता है उसे भी दुःखादि स्पर्श नहीं कर सकते, फिर आनन्दस्वरूप अविनाशी भगवान् रामकी तो बात ही क्या है? दुःख, हर्ष, भय, क्रोध, लोभ, मोह और मद आदि सब अज्ञानके ही चिह्न हैं; चिदात्मा राममें ये कैसे हो सकते हैं ? देहका दुःख देहाभिमानीको ही होता है, चेतन आत्माको नहीं ॥४९-५२॥ समाधि-अवस्थामें द्वैत-प्रपञ्चका अभाव हो जानेके कारण वहाँ केवल सुखका ही साक्षात्कार होता है। उस अवस्थामें बुद्धि आदिका अभाव हो जानेसे शुद्ध आत्मामें दुःखका लेश भी दिखायी नहीं देता। अतः इसमें सन्देह नहीं ये दुःखादि सब बुद्धिके ही धर्म हैं॥५३॥
भगवान् राम परमात्मा, पुराणपुरुष, नित्य-प्रकाश-स्वरूप, नित्यसुख-स्वरूप और निरीह हैं; किन्तु अज्ञानी पुरुषोंको वे मायिक गुणोंके सम्बन्धसे सुखी या दुःखी-से प्रतीत होते हैं ॥ ५४ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥


द्वितीय सर्ग

रावणद्वारा विभीषणका तिरस्कार।

श्रीमहादेव उवाच
लङ्कायां रावणो दृष्ट्वा कृतं कर्म हनूमता ।
दुष्करं दैवतैर्वाऽपि ह्रिया किञ्चिदवाङ्मुखः ॥ १ ॥
आहूय मन्त्रिणः सर्वानिदं वचनमब्रवीत् ।
हनूमता कृतं कर्म भवद्भिर्दृष्टमेव तत् ॥ २ ॥
प्रविश्य लङ्कां दुर्धर्षां दृष्ट्वा सीतां दुरासदाम्।
हत्वा च राक्षसान्वीरानेकं मन्दोदरीसुतम् ॥ ३ ॥
दग्ध्वा लङ्कामशेषेण लङ्घयित्वा च सागरम् ।
युष्मान्सर्वानतिक्रम्य स्वस्थोऽगात्पुनरेव सः ॥ ४ ॥
किं कर्तव्यमितोऽस्माभिर्यूयं मन्त्रविशारदाः।
मन्त्रयध्वं प्रयत्नेन यत्कृतं मे हितं भवेत् ॥ ५ ॥

भावार्थ: श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! इधर लङ्कामें श्रीहनुमान्‌जीका देवताओंके लिये भी दुष्कर कृत्य देख रावणने अपने समस्त मन्त्रियोंको बुलाकर लज्जासे शिर नीचा करके कहा—"हनुमान्‌ने जो-जो कर्म किया वह सब आप लोगोंने देखा ही है ॥१-२॥ वह दुष्प्रवेश्य लङ्कामें घुसकर सर्वथा दुष्प्राप्य सीतासे मिला तथा उसने अन्य राक्षस वीरोंके साथ मन्दोदरीके पुत्र अक्षको मारकर सम्पूर्ण लङ्काको जला दिया और फिर आप सब लोगोंका तिरस्कार कर कुशलतापूर्वक समुद्र लाँघकर लौट गया ॥ ३-४ ॥ आप सब लोग नीति-निपुण हैं, अतः अब हमें क्या करना चाहिये, और क्या करनेसे हमारा हित हो सकता है—इसका प्रयत्नपूर्वक विचार कीजिये" ॥ ५ ॥

२३८अध्यात्मरामायण[सर्ग २

[संस्कृत श्लोक]

रावणस्य वचः श्रुत्वा राक्षसास्तमथाब्रुवन् ।
देव शङ्का कुतो रामात्तव लोकजितो रणे ॥ ६ ॥

इन्द्रस्तु बद्ध्वा निक्षिप्तः पुत्रेण तव पत्तने ।
जित्वा कुबेरमानीय पुष्पकं भुज्यते त्वया ॥ ७ ॥

यमो जितः कालदण्डाद्भयं नाभूत्तव प्रभो ।
वरुणो हुङ्कृतेनैव जितः सर्वेऽपि राक्षसाः ॥ ८ ॥

मयो महासुरो भीत्या कन्यां दत्त्वा स्वयं तव ।
त्वद्वशे वर्ततेऽद्यापि किमुतान्ये महासुराः ॥ ९ ॥

हनूमद्धर्षणं यत्तु तदवज्ञाकृतं च नः ।
वानरोऽयं किमस्माकमस्मिन्पौरुषदर्शने ॥१०॥

इत्युपेक्षितमस्माभिर्धर्षणं तेन किं भवेत् ।
वयं प्रमत्ताः किं तेन वञ्चिताः सो हनूमता ॥११॥

जानीमो यदि तं सर्वे कथं जीवन् गमिष्यति ।
आज्ञापय जगत्कृत्स्नमवानरमानुषम् ॥१२॥

कृत्वाऽऽगस्यामहे सर्वे प्रत्येकं वा नियोजय ।
कुम्भकर्णस्तदा प्राह रावणं राक्षसेश्वरम् ॥१३॥

आरब्धं यत्त्वया कर्म स्वात्मनाशाय केवलम् ।
न दृष्टोऽसि तदा भाग्यात्त्वं रामेण महात्मना ॥१४॥

यदि पश्यति रामस्त्वां जीवन्नायासि रावण ।
रामो न मानुषो देवः साक्षान्नारायणोऽव्ययः॥१५॥

सीता भगवती लक्ष्मी रामपत्नी यशस्विनी ।
राक्षसानां विनाशाय त्वयाऽऽनीता सुमध्यमा ॥१६॥

विषपिण्डमिवागीर्य महामीनो यथा तथा ।
आनीता जानकी पश्चात्त्वया किं वा भविष्यति॥१७॥

यद्यप्यत्युचितं कर्म त्वया कृतमजानता ।
सर्वं समं करिष्यामि स्वस्थचित्तो भव प्रभो ॥१८॥


[हिन्दी अनुवाद]

रावणके वचन सुनकर राक्षसोंने उससे कहा— "देव ! आपको रामसे क्या शंका है ? आपने तो युद्धमें समस्त लोकोंको जीत लिया है ॥ ६ ॥ आपके पुत्रने इन्द्रको बाँधकर अपनी राजधानीमें डाल दिया था और आप स्वयं भी कुबेरको जीतकर उसका पुष्पक विमान लाकर भोगते हैं ॥ ७ ॥ हे प्रभो ! आपने यमराजको भी जीत लिया, उसके कालदण्डसे भी आपको कोई भय नहीं हुआ तथा वरुण और समस्त राक्षसोंको आपने हुंकारसे ही जीत लिया था ॥ ८ ॥ और महासुरोंकी तो बात ही क्या है, स्वयं मयासुर भी आपके भयसे आपको अपनी कन्या देकर आजतक आपके अधीन बना हुआ है ॥ ९ ॥ हनुमान्‌ने जो हमारा तिरस्कार किया है वह तो हमारी ही उपेक्षासे हुआ है। हमने यह सोचकर कि यह वानर है इसे पुरुषार्थ दिखानेमें क्या रक्खा है उसकी उपेक्षा कर दी थी, नहीं तो वह हमारी अवज्ञा क्या कर सकता था ? ॥ १० ॥ अतः असावधान रहनेके कारण यदि हमें हनुमान्‌ने ठग लिया तो इससे क्या हुआ ? यदि हम सब उसे जानते तो वह जीता हुआ कैसे जा सकता था ? आप हमें आज्ञा दीजिये, हम सब अभी जाकर पृथिवीको वानर और मनुष्योंसे शून्य कर आते हैं। अथवा हममेंसे एक-एकको ही इस कार्यके लिये नियुक्त कीजिये।"

तदनन्तर राक्षसराज रावणसे कुम्भकर्ण बोला— ॥ ११-१३ ॥ "आपने जो कार्य आरम्भ किया है वह केवल आपका नाश करनेके लिये ही है। सौभाग्यवश इतना ही अच्छा हुआ कि सीताजीको चुरानेके समय महात्मा रामने आपको नहीं देखा ॥ १४ ॥ हे रावण ! यदि उस समय राम आपको देख लेते तो आप जीते-जागते नहीं लौट सकते थे। राम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं, वे साक्षात् अव्यय नारायणदेव हैं ॥१५॥ भगवान् रामकी पत्नी यशस्विनी सीताजी साक्षात् भगवती लक्ष्मी हैं, उस सुन्दरीको आप राक्षसोंके नाशके लिये ही लाये हैं ॥ १६ ॥ जिस प्रकार कोई महामत्स्य विषका पिण्ड निगल जाय उसी प्रकार आप (अपने नाशके लिये) जानकीको ले आये हैं, न जाने आगे क्या होना है ? ॥ १७ ॥ यद्यपि आपने अनजानमें यह बड़ा ही अनुचित कार्य किया है, तथापि आप शान्त होइये, मैं सब काम ठीक किये देता हूँ"

सर्ग २ ]युद्धकाण्ड२३९

| कुम्भकर्णवचः श्रुत्वा वाक्यमिन्द्रजिदब्रवीत् ।<br>देहि देव ममानुज्ञां हत्वा रामं सलक्ष्मणम् ।<br>सुग्रीवं वानरांश्चैव पुनर्यास्यामि तेऽन्तिकम् ॥१९॥<br><br>तत्रागतो भागवतप्रधानो<br>विभीषणो बुद्धिमतां वरिष्ठः ।<br>श्रीरामपादद्वय एकतानः<br>प्रणम्य देवारिमुपोपविष्टः ॥२०॥<br><br>विलोक्य कुम्भश्रवणादिदैत्या-<br>न्मत्तप्रमत्तानतिविस्मयेन ।<br>विलोक्य कामातुरमप्रमत्तो<br>दशाननं प्राह विशुद्धबुद्धिः ॥२१॥<br><br>न कुम्भकर्णेन्द्रजितौ च राजं-<br>स्तथा महापाश्र्वमहोदरौ तौ ।<br>निकुम्भकुम्भौ च तथातिकायः<br>स्थातुं न शक्ता युधि राघवस्य ॥२२॥<br><br>सीताऽभिधानेन महाग्रहेण<br>ग्रस्तोऽसि राजन् न च ते विमोक्षः ।<br>तामेव सत्कृत्य महाधनेन<br>दत्त्वाभिरामाय सुखी भव त्वम् ॥२३॥<br><br>यावन्न रामस्य शिताः शिलीमुखा<br>लङ्कामभिव्याप्य शिरांसि रक्षसाम् ।<br>छिन्दन्ति तावद्रघुनायकस्य भो<br>तां जानकीं त्वं प्रतिदातुमर्हसि ॥२४॥<br><br>यावन्नगाभाः कपयो महाबला<br>हरीन्द्रतुल्या नखदंष्ट्रयोधिनः ।<br>लङ्कां समाक्रम्य विनाशयन्ति ते<br>तावद्द्रुतं देहि रघूत्तमाय ताम् ॥२५॥<br><br>जीवन्न रामेण विमोक्ष्यसे त्वं<br>गुप्तः सुरेन्द्रेरपि शङ्करेण ।<br>न देवराजाङ्कगतो न मृत्योः<br>पाताललोकानपि सम्प्रविष्टः ॥२६॥<br><br>शुभं हितं पवित्रं च विभीषणवचः खलः ।<br>प्रतिजग्राह नैवासौ म्रियमाण इवौषधम् ॥२७॥ | ॥ १८ ॥ कुम्भकर्णके ये वचन सुनकर इन्द्रजित् बोला—"प्रभो ! आप मुझे आज्ञा दीजिये, मैं अभी लक्ष्मणके सहित राम, सुग्रीव और समस्त वानरोंको मारकर आपके पास लौट आता हूँ" ॥ १९ ॥<br><br>इसी समय वहाँ भागवत-प्रधान बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ विभीषणजी आये। उनके अन्तःकरणकी वृत्ति एकाग्रता-पूर्वक भगवान् रामके चरणयुगलमें लगी हुई थी। वहाँ आकर वे देवशत्रु रावणको प्रणाम कर उसके पास बैठ गये ॥ २० ॥ वहाँ बैठकर उन्होंने एक बार कुम्भकर्ण आदि समस्त मदोन्मत्त राक्षसोंको अति विस्मयके साथ देखा । फिर यह भी देखा कि रावण कामातुर है, (वह किसीकी माननेवाला नहीं है) । तथापि अति निर्मल-बुद्धि होनेसे वे अपने कर्त्तव्यमें सावधान थे, इसलिये उन्होंने रावणसे कहा—॥ २१ ॥ "हे राजन् ! युद्धमें रघुनाथजीके सामने कुम्भकर्ण, इन्द्रजित्, महापाश्र्व, महोदर, निकुम्भ, कुम्भ तथा अतिकाय आदि कोई भी नहीं ठहर सकते ॥ २२ ॥ हे राजन् ! आपको सीता नामक एक प्रबल ग्रहने ग्रस्त कर लिया है, इससे आपका छुटकारा इस तरह नहीं हो सकता। अब आप उसे सत्कारपूर्वक बहुत-से धनके साथ श्रीरामचन्द्रजीको लौटा दीजिये और सुखी हो जाइये ॥ २३ ॥ जबतक श्रीरामचन्द्रजीके तीक्ष्ण बाण लंकामें व्याप्त होकर राक्षसोंके शिर नहीं काटते, तबतक ही उचित है कि आप उन्हें जानकीजीको सौंप दें ॥ २४ ॥ नख और दाढ़ोंसे ही लड़नेवाले, सिंहके समान महाबलवान् वे पर्वताकार वानर-गण जबतक लंकामें फैलकर उसे नष्ट-भ्रष्ट नहीं करते तभीतक आप सीताजीको जल्दी-से-जल्दी श्रीरघुनाथजीको सौंप दीजिये ॥ २५ ॥ नहीं तो, भले ही इन्द्र और शंकर भी आपकी रक्षा करें, अथवा देवराज इन्द्र और मृत्यु भी आपको गोदमें लेकर बचायें, या आप पातालमें भी घुस जायें, तो भी रामसे आप जीवित नहीं बच सकते" ॥ २६ ॥<br><br>विभीषणके इन शुभ, हितकर और पवित्र वचनोंको दुष्ट रावणने इसी प्रकार ग्रहण नहीं किया जैसे मरने-वालापुरुष औषध ग्रहण नहीं करता ॥ २७ ॥ बल्कि |

२४०अध्यात्मरामायण[ सर्ग २

कालेन नोदितो दैत्यो विभीषणमथाब्रवीत् ।<br>मद्दत्तभोगैः पुष्टाङ्गो मत्समीपे वसन्नपि ॥२८॥<br>प्रतीपमाचरत्येष ममैव हितकारिणः ।<br>मित्रभावेन शत्रुर्मे जातो नास्त्यत्र संशयः ॥२९॥<br>अनार्येण कृतघ्नेन सङ्गतिर्मे न युज्यते ।<br>विनाशमभिकाङ्क्षन्ति ज्ञातीनां ज्ञातयः सदा॥३०॥<br>योऽन्यस्त्वेवंविधं ब्रूयाद्वाक्यमेकं निशाचरः ।<br>हन्मि तस्मिन् क्षणे एव धिक् त्वां रक्षःकुलाधमम्॥३१<br>रावणेनैवमुक्तः सन्परुषं स विभीषणः ।<br>उत्पपात सभामध्याद्गदापाणिर्महाबलः ॥३२॥<br>चतुर्भिर्मन्त्रिभिः सार्धं गगनस्थोऽब्रवीद्वचः ।<br>क्रोधेन महताऽऽविष्टो रावणं दशकन्धरम् ।<br>मा विनाशमुपैहि त्वं प्रियवादिनमेव माम् ॥३३॥<br>धिक्करोषि तथापि त्वं ज्येष्ठो भ्राता पितुः समः ।<br>कालो राघवरूपेण जातो दशरथालये ॥३४॥<br>काली सीताऽभिधानेन जाता जनकनन्दिनी ।<br>तावुभावागतावत्र भूमेर्भारापनुत्तये ॥३५॥<br>तेनैव प्रेरितस्त्वं तु न शृणोषि हितं मम ।<br>श्रीरामः प्रकृतेः साक्षात्परस्तात्सर्वदा स्थितः॥३६॥<br>बहिरन्तश्च भूतानां समः सर्वत्र संस्थितः ।<br>नामरूपादिभेदेन तत्तन्मय इवामलः ॥३७॥<br>यथा नानाप्रकारेपु वृक्षेष्वेको महानलः ।<br>तत्तदाकृतिभेदेन भिद्यतेऽज्ञानचक्षुषाम् ॥३८॥<br>पञ्चकोशादिभेदेन तत्तन्मय इवावभौ ।<br>नीलपीतादियोगेन निर्मलः स्फटिको यथा ॥३९॥<br>स एव नित्यमुक्तोऽपि स्वमायागुणबिम्बितः ।<br>कालः प्रधानं पुरुषोऽव्यक्तं चेति चतुर्विधः ॥४०॥ | वह दुष्ट दैत्य कालकी प्रेरणासे विभीषणसे इस प्रकार कहने लगा—“देखो, यह मेरे ही दिये हुए भोगोंसे पुष्ट होकर और मेरे ही पास रहकर भी मुझ अपने हितकर्ताके ही विरुद्ध चलता है; निःसन्देह यह मित्ररूपसे मेरा शत्रु ही प्रकट हुआ है॥ २८-२९ ॥ इस अनार्य और कृतघ्नका मेरे साथ रहना ठीक नहीं है। प्रायः यह देखनेमें आता है कि जातिवाले अपने ही जाति-भाइयोंके नाशकी सदा इच्छा किया करते हैं॥ ३० ॥ यदि कोई और राक्षस ऐसा एक भी वाक्य कहता तो मैं उसे उसी क्षण मार डालता ! अरे नीच ! तू राक्षसकुलमें अत्यन्त अधम है, तुझे धिक्कार है" ॥ ३१ ॥<br><br>रावणके इस प्रकार कटुवचन कहनेपर महाबली विभीषण हाथमें गदा लेकर सभासे उड़े ॥ ३२ ॥ और अपने चार मन्त्रियोंके साथ आकाशमें स्थित होकर अत्यन्त क्रोधमें भरकर दशशीश रावणसे कहा—॥ ३३ ॥ “मैं तुम्हारे हितकी बात कहनेवाला हूँ; फिर भी तुम मुझे धिक्कारते हो ! तथापि मैं चाहता हूँ कि तुम्हारा नाश न हो, क्योंकि तुम मेरे बड़े भाई हो; अतः पिताके समान हो। तुम्हारा काल रघुनाथजीके रूपसे महाराज दशरथके घरमें प्रकट हो गया है ॥३४॥ और महाशक्ति काली 'सीता' नामसे जनकजीकी पुत्री हुई है। ये दोनों पृथिवीका भार उतारनेके लिये ही यहाँ आये हैं ॥ ३५ ॥ उन्हींकी प्रेरणासे तुम मेरा हितकर वचन नहीं सुनते। भगवान् राम सर्वदा साक्षात् प्रकृतिसे परे हैं ॥ ३६ ॥ वे प्राणियोंके बाहर-भीतर सर्वत्र समान भावसे स्थित हैं और नित्य निर्मल होते हुए भी नाम-रूप आदि भेदसे विभिन्न-से भासते हैं ॥३७॥ जिस प्रकार अज्ञानी पुरुषोंकी दृष्टिमें एक ही महाग्नि नाना प्रकारके वृक्षोंमें उनके आकार-भेदसे भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है, अथवा जैसे शुद्ध स्फटिक मणि नील-पीतादि रङ्गोंकी सन्निधिमात्रसे ही नील-पीत आदि वर्णोंवाली प्रतीत होती है, वैसे ही पञ्चकोश आदिके भेदसे आत्मा तद्रूप-सा भासता है ॥ ३८-३९ ॥ वे (श्रीभगवान् ही) नित्यमुक्त होकर भी अपनी मायाके गुणोंमें प्रतिबिम्बित होकर काल, प्रधान, पुरुष और अव्यक्त इन चार प्रकारके नामोंसे कहे जाते हैं॥ ४० ॥ वे

युद्धकाण्ड - सर्ग ३: विभीषणकी शरणागति, समुद्रका त्रास तथा सेतु-बन्धनका आरम्भ

सर्ग ३ ] युद्धकाण्ड २४१


प्रधानपुरुषाभ्यां स जगत्कृत्स्नं सृजत्यजः ।
कालरूपेण कलनां जगतः कुरुतेऽव्ययः ॥४१॥
कालरूपी स भगवान् रामरूपेण मायया ॥४२॥
ब्रह्मणा प्रार्थितो देवस्त्वद्वधार्थमिहागतः ।
दन्यथा कथं कुर्यात्सत्यसङ्कल्प ईश्वरः ॥४३॥
हनिष्यति त्वां रामस्तु सपुत्रबलवाहनम् ।
हन्यमानं न शक्नोमि द्रष्टुं रामेण रावण ॥४४॥
त्वां राक्षसकुलं कृत्स्नं ततो गच्छामि राघवम् ।
मयि याते सुखीभूत्वा रमस्व भवने चिरम् ॥४५॥

विभीषणो रावणवाक्यतः क्षणा-
द्विसृज्य सर्वं सपरिच्छदं गृहम् ।
जगाम रामस्य पदारविन्दयोः
सेवाभिकाङ्क्षी परिपूर्णमानसः ॥४६॥

अजन्मा होकर भी प्रधान और पुरुषरूपसे सम्पूर्ण जगत्‌की रचना करते हैं और अविनाशी होकर भी कालरूपसे जगत्‌का संहार करते हैं ॥ ४१ ॥ वे ही कालरूपी भगवान् ब्रह्माकी प्रार्थनासे आपका वध करनेके लिये मायासे रामरूप होकर यहाँ आये हैं। ईश्वर सत्यसंकल्प हैं, इसलिये वे अपनी प्रतिज्ञाको अन्यथा कैसे कर सकते हैं ॥ ४२-४३ ॥ अतः राम अवश्य ही आपको पुत्र, सेना और वाहनादिके सहित मारेंगे। हे रावण ! मैं रामद्वारा सम्पूर्ण राक्षसंवश और आपका संहार होता नहीं देख सकता। अतः मैं रघुनाथजीके पास जाता हूँ। मेरे चले जानेपर आप आनन्दपूर्वक अपने महलमें बहुत समयतक भोग भोगना”॥४४-४५॥

इस प्रकार, सन्तुष्टचित्त विभीषण रावणके कठोर भाषणसे एक क्षणमें ही समस्त सामग्रीके सहित अपने घरको छोड़कर भगवान् रामके चरणकमलोंकी सेवाकी कामनासे उनके पास चले गये ॥ ४६ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥


तृतीय सर्ग

विभीषणकी शरणागति, समुद्रका त्रास तथा सेतु-बन्धका आरम्भ।

श्रीमहादेव उवाच
विभीषणो महाभागश्चतुर्भिर्मन्त्रिभिः सह ।
आगत्य गगने रामसम्मुखे समवस्थितः ॥ १ ॥
उच्चैरुवाच भोः स्वामिन् राम राजीवलोचन ।
रावणस्यानुजोऽहं ते दारहर्तुर्विभीषणः ॥ २ ॥
नाम्ना भ्रात्रा निरस्तोऽहं त्वामेव शरणं गतः।
हितमुक्तं मया देव तस्य चाविदितात्मनः ॥ ३ ॥
सीतां रामाय वैदेहीं प्रेषयेति पुनः पुनः ।
उक्तोऽपि न शृणोत्येव कालपाशवशं गतः ॥ ४ ॥
हन्तुं मां खड्गमादाय प्राद्रवद्राक्षसाधमः ।

श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! तदनन्तर महाभाग विभीषण अपने चार मन्त्रियोंके साथ आकर आकाशमें श्रीरघुनाथजीके सामने उपस्थित हुए ॥ १ ॥ और ऊँचे स्वरसे कहने लगे—"हे कमलनयन प्रभो राम ! मैं आपकी भार्याका हरण करनेवाले रावणका छोटा भाई हूँ । मेरा नाम विभीषण है । मुझे भाईने निकाल दिया है, इसलिये मैं आपकी शरणमें आया हूँ । हे देव ! मैंने उस अज्ञानीके हितकी बात कही थी ॥ २-३ ॥ उससे वार-वार कहा है कि ‘तुम विदेहनन्दिनी सीताको रामके पास भेज दो,’ तथापि कालके वशीभूत होनेके कारण वह कुछ सुनता ही नहीं है ॥४॥ इस समय वह राक्षसाधम मुझे तलवारसे मारनेके लिये दौड़ा; तब मैं भयसे तुरन्त ही

२४२अध्यात्मरामायण[ सर्ग ३

ततोऽचिरेण सचिवैश्चतुर्भिः सहितो भयात् ॥ ५ ॥<br>त्वामेव भवमोक्षाय मुमुक्षुः शरणं गतः।<br>विभीषणवचः श्रुत्वा सुग्रीवो वाक्यमब्रवीत् ॥ ६ ॥ | अपने चार मन्त्रियोंके सहित संसार-पाशसे मुक्त होनेके लिये मुमुक्षु होकर आपकी ही शरणमें चला आया हूँ।”<br>विभीषणके ये वचन सुनकर सुग्रीवने कहा—॥ ५-६ ॥ “हे राम ! इस मायावी राक्षसाधमका कुछ विश्वासाहर्हो न ते राम मायावी राक्षसाधमः ।<br>सीताहर्तुर्विशेषेण रावणस्यानुजो बली ॥ ७ ॥ | विश्वास न करना चाहिये । ( यदि कोई और होता तब कोई विशेष चिन्ताकी बात भी नहीं थी किन्तु ) यह तो सीताका हरण करनेवाले रावणका ही छोटा भाई है और वैसे भी बहुत बलवान् दिखायी देता है ॥ ७॥ मन्त्रिभिः सायुधैरस्मान् विवरे निहनिष्यति ।<br>तदाज्ञापय मे देव वानरैर्हन्यतामयम् ॥ ८ ॥ | यह अपने सशस्त्र मन्त्रियोंके साथ किसी समय एकान्तमें हमें मार डालेगा । अतः हे प्रभो ! मुझे आज्ञा दीजिये मैं इसे वानरोंसे मरवा डालूँ ॥ ८ ॥ ममैवं भाति ते राम बुद्ध्या किं निश्चितं वद ।<br>श्रुत्वा सुग्रीववचनं रामः सस्मितमब्रवीत् ॥ ९ ॥ | हे राम ! मुझे तो ऐसा ही जँचता है, आपका इस विषयमें क्या निश्चय है, सो कहिये।” सुग्रीवके वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने मुसकाकर कहा—॥९॥ “हे कपिश्रेष्ठ ! यदीच्छामि कपिश्रेष्ठ लोकान्सर्वान्सहेश्वरान्।<br>निमिषार्धेन संहन्यां सृजामि निमिषार्धतः ॥१०॥ | यदि मेरी इच्छा हो तो मैं आधे निमेषमें ही लोकपालोंके सहित सम्पूर्ण लोकोंको नष्ट कर सकता हूँ और आधे निमेषमें ही सबको रच सकता हूँ, अतः ( तुम किसी अतो मयाऽभयं दत्तं शीघ्रमानय राक्षसम् ॥११॥ | प्रकारकी चिन्ता न करो ) मैं इस राक्षसको अभयदान देता हूँ, तुम इसे शीघ्र ही ले आओ ॥ १०-११ ॥ सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते ।<br>अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतं मम ॥१२॥ | मेरा यह नियम है कि जो एक बार भी मेरी शरण आकर ‘मैं तुम्हारा हूँ’ ऐसा कहकर मुझसे अभय माँगता है उसे मैं समस्त प्राणियोंसे निर्भय कर देता हूँ” ॥१२॥ रामस्य वचनं श्रुत्वा सुग्रीवो हृष्टमानसः ।<br>विभीषणमथानाय्य दर्शयामास राघवम् ॥१३॥ | रामके ये वचन सुनकर सुग्रीवने अति प्रसन्नचित्तसे विभीषणको लाकर रघुनाथजीसे मिलाया ॥ १३ ॥ विभीषणस्तु साष्टाङ्गं प्रणिपत्य रघूत्तमम् ।<br>हर्षगद्गदया वाचा भक्त्या च परयान्वितः ॥१४॥ | विभीषणने रघुनाथजीको साष्टांग प्रणाम किया और हर्षसे गद्गदकण्ठ हो परम भक्तिपूर्वक हाथ जोड़- रामं श्यामं विशालाक्षं प्रसन्नमुखपङ्कजम् ।<br>धनुर्बाणधरं शान्तं लक्ष्मणेन समन्वितम् ॥१५॥<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा स्तोतुं समुपचक्रमे ॥१६॥ | कर शान्तमूर्ति प्रसन्नवदनारविन्द विशालनयन श्यामसुन्दर धनुर्बाणधारी भगवान् रामकी, लक्ष्मणजीके सहित, स्तुति करनी आरम्भ की ॥ १४-१६ ॥

विभीषण उवाच | विभीषण बोले— नमस्ते राम राजेन्द्र नमः सीतामनोरम ।<br>नमस्ते चण्डकोदण्ड नमस्ते भक्तवत्सल ॥१७॥ | “हे राजराजेश्वर राम ! आपको नमस्कार है। हे सीताके मनमें रमण करनेवाले ! आपको नमस्कार है । हे प्रचण्डधनुर्धर ! आपको नमस्कार है । हे भक्तवत्सल ! आपको बारम्बार नमस्कार है ॥ १७ ॥ नमोऽनन्ताय शान्ताय रामायामिततेजसे ।<br>सुग्रीवमित्राय च ते रघूणां पतये नमः ॥१८॥ | हे अनन्त, शान्त, अतुलतेजोमय, सुग्रीवसखा रघुकुलनायक भगवान् राम ! आपको नमस्कार है ॥१८॥ जगदुत्पत्तिनाशानां कारणाय महात्मने । | जो संसारकी उत्पत्ति और नाशके कारण हैं त्रिलोकी-

सर्ग ३ ]
युद्धकाण्डम्
२४३


त्रैलोक्यगुरवेऽनादिगृहस्थाय नमोनमः ॥१९॥के गुरु और अनादिकालीन गृहस्थ* हैं उन महात्मा रामको बारम्बार नमस्कार है ॥ १९ ॥ हे राम ! आप
त्वमादिर्जगतां राम त्वमेव स्थितिकारणम् ।संसारकी उत्पत्ति और स्थितिके कारण हैं तथा अन्तमें-
त्वमन्ते निधनस्थानं स्वेच्छाचारस्त्वमेव हि ॥२०॥आप ही उसके लयस्थान हैं; आप अपनी इच्छानुसार विहार करनेवाले हैं ॥ २० ॥ हे राघव ! चराचर भूतों-
चराचराणां भूतानां बहिरन्तश्च राघव ।के भीतर और बाहर व्याप्य-व्यापक-रूपसे आप विश्वरूप
व्याप्यव्यापकरूपेण भवान् भाति जगन्मयः ॥२१॥ही भास रहे हैं ॥ २१ ॥ आपकी मायाने जिनका
त्वन्मायया हृतज्ञाना नष्टात्मानो विचेतसः।सदसद्विवेक हर लिया है वे नष्ट-बुद्धि मूढ़ पुरुष अपने पाप-पुण्यके वशीभूत होकर संसारमें बारम्बार आते-
गतागतं प्रपद्यन्ते पापपुण्यवशात्सदा ॥२२॥जाते रहते हैं ॥ २२ ॥ जबतक मनुष्य एकाग्र
तावत्सत्यं जगद्भाति शुक्तिकारजतं यथा ।चित्तसे आपके ज्ञानस्वरूपको नहीं जानता तभीतक
यावन्न ज्ञायते ज्ञानं चेतसाऽनन्यगामिना ॥२३॥सीपीमें चाँदीके समान यह संसार सत्य प्रतीत होता है ॥ २३ ॥ हे विभो ! आपको न जाननेसे ही लोग पुत्र, स्त्री
त्वदज्ञानात्सदा युक्ताः पुत्रदारगृहादिषु ।और गृह आदिमें आसक्त होकर अन्तमें दुःख देनेवाले
रमन्ते विषयान्सर्वानन्ते दुःखप्रदान्विभो ॥२४॥विषयोंमें सुख मानते हैं ॥ २४ ॥ हे पुरुषोत्तम ! आप ही इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण और वायु हैं तथा आप
त्वमिन्द्रोऽग्निर्यमो रक्षो वरुणश्च तथानिलः ।ही कुबेर और रुद्र हैं ॥ २५ ॥ हे प्रभो ! आप अणु-से-
कुबेरश्च तथा रुद्रस्त्वमेव पुरुषोत्तम ॥२५॥अणु और महान्-से-महान् हैं तथा आप ही समस्त लोकोंके पिता, माता और धाता (धारण-पोषण करनेवाले) हैं
त्वमणोरप्यणीयांश्च स्थूलात् स्थूलतरः प्रभो ।॥ २६ ॥ आप आदि, मध्य और अन्तसे रहित सर्वत्र परिपूर्ण
त्वं पिता सर्वलोकानां माता धाता त्वमेव हि ॥२६॥अच्युत और अविनाशी हैं । आप हाथ-पाँवसे रहित तथा नेत्र और कर्णहीन हैं ॥ २७ ॥ तथापि हे
आदिमध्यान्तरहितः परिपूर्णोऽच्युतोऽव्ययः ।खरान्तक ! आप सब कुछ देखनेवाले, सब कुछ सुनने-
त्वं पाणिपादरहितश्चक्षुःश्रोत्रविवर्जितः ॥२७॥वाले, सब कुछ ग्रहण करनेवाले और बड़े वेगवान् हैं । हे प्रभो ! आप अन्नमय आदि पाँचों कोशोंसे रहित तथा
श्रोता द्रष्टा ग्रहीता च जवनस्त्वं खरान्तक ।निर्गुण और निराश्रय हैं ॥ २८ ॥ आप निर्विकल्प,
कोशेभ्यो व्यतिरिक्तस्त्वं निर्गुणो निरूपाश्रयः ॥२८॥निर्विकार और निराकार हैं, आपका कोई प्रेरक नहीं
निर्विकल्पो निर्विकारो निराकारो निरीश्वरः ।है, आप (उत्पत्ति, वृद्धि, परिणाम, क्षय, जीर्णता और नाश—इन) छः भाव-विकारोंसे रहित हैं तथा
षड्भावरहितोऽनादिः पुरुषः प्रकृतेः परः ॥२९॥प्रकृतिसे अतीत अनादि पुरुष हैं ॥ २९ ॥ मायाके
मायया गृह्यमाणस्त्वं मनुष्य इव भाव्यसे ।कारण ही आप साधारण मनुष्यके समान प्रतीत होते हैं; वैष्णवजन आपको निर्गुण और अजन्मा जानकर मोक्ष
ज्ञात्वा त्वां निर्गुणमजं वैष्णवा मोक्षगामिनः ॥३०॥प्राप्त करते हैं ॥ ३० ॥ हे राघव ! हे प्रभो ! मैं आप-
अहं त्वत्पादसद्भक्तिनिःश्रेणीं प्राप्य राघव ।के चरण-कमलकी विशुद्ध भक्तिरूप सीढ़ी पाकर ज्ञान-
इच्छामि ज्ञानयोगारूढं सौधमारोढुमीश्वर ॥३१॥योग नामक राजभवनके शिखरपर चढ़ना चाहता हूँ ॥ ३१ ॥ हे कारुणिकश्रेष्ठ सीताफ्ते राम ! आपको
नमः सीतापते राम नमः कारुणिकोत्तम ।नमस्कार है; हे रावणारे ! आपको बारम्बार नमस्कार
रावणारे नमस्तुभ्यं त्राहि मां भवसागरात् ॥३२॥है; आप इस संसार-सागरसे मेरी रक्षा कीजिये” ॥ ३२ ॥

* प्रकृतिरूपा पत्नीके साथ भगवान्का अनादि सम्बन्ध है, इसलिये वे अनादि गृहस्थ हैं ।

२४४अध्यात्मरामायण[सर्ग ३

ततः प्रसन्नः प्रोवाच श्रीरामो भक्तवत्सलः।<br>वरं वृणीष्व भद्रं ते वाञ्छितं वरदोऽस्म्यहम् ॥३३॥तब भक्तवत्सल भगवान् रामने प्रसन्न होकर कहा—<br>"विभीषण ! तेरा कल्याण हो, मैं तुझे वर देना चाहता<br>हूँ; अतः तेरी जो इच्छा हो वही वर माँग ले" ॥३३॥
विभीषण उवाचविभीषण बोले—"हे रघुनन्दन ! मैं तो आपके<br>चरणोंका दर्शन पाकर ही धन्य और कृतकृत्य हो<br>गया; मुझे जो कुछ पाना था वह मिल गया। अब तो<br>मैं निःसन्देह मुक्त हो गया ॥ ३४ ॥ हे राम ! आपकी<br>मनोहर मूर्तिकी दर्शन करनेसे आज मेरे समान कोई<br>धन्य और पवित्र नहीं है; अब इस संसारमें (किसी भी<br>प्रकार) मेरी समता करनेवाला कोई नहीं है ॥ ३५ ॥<br>हे रघुनन्दन ! कर्म-बन्धनको नष्ट करनेके लिये आप<br>मुझे अपनी भक्तिसे प्राप्त होनेवाला ज्ञान और अपने<br>परमार्थ-स्वरूपका साक्षात् करानेवाला ध्यान दीजिये<br>॥ ३६ ॥ हे राजराजेश्वर राम ! मुझे विषयजन्य सुखकी<br>इच्छा नहीं है; मैं तो यही चाहता हूँ कि आपके चरण-<br>कमलोंमें सर्वदा मेरी आसक्तिरूपा भक्ति बनी रहे"॥३७॥
धन्योऽस्मि कृतकृत्योऽस्मि कृतकार्योऽस्मि राघव।<br>त्वत्पाददर्शनादेव विमुक्तोऽस्मि न संशयः ॥३४॥
नास्ति मत्सदृशो धन्यो नास्ति मत्सदृशः शुचिः।<br>नास्ति मत्सदृशो लोके राम त्वन्मूर्तिदर्शनात् ॥३५॥
कर्मबन्धविनाशाय त्वज्ज्ञानं भक्तिलक्षणम्।<br>त्वद्ध्यानं परमार्थं च देहि मे रघुनन्दन ॥३६॥
न याचे राम राजेन्द्र सुखं विषयसम्भवम्।<br>त्वत्पादकमले सक्ता भक्तिरेव सदास्तु मे ॥३७॥
ओमित्युक्त्वा पुनः प्रीतो रामः प्रोवाच राक्षसम्।<br>शृणु वक्ष्यामि ते भद्र रहस्यं मम निश्चितम् ॥३८॥तब रघुनाथजीने 'तथास्तु' कहकर विभीषणसे प्रसन्न<br>होकर कहा—"भद्र ! सुनो, मैं तुम्हें अपना निश्चित<br>रहस्य सुनाता हूँ ॥ ३८ ॥ जो मेरे शान्तस्वभाव, विरक्त<br>और योगनिष्ठ भक्त हैं, उनके हृदयमें मैं सीताजीके सहित<br>सदा रहता हूँ—इसमें सन्देह नहीं ॥ ३९ ॥ अतः तुम<br>सर्वदा शान्त और पापरहित रहकर मेरा ध्यान करनेसे<br>घोर संसार-सागरसे पार हो जाओगे ॥ ४० ॥ जो<br>पुरुष मुझे प्रसन्न करनेके लिये इस स्तोत्रको पढ़ता,<br>लिखता अथवा सुनता है वह मेरा प्रिय सारूप्यपद<br>प्राप्त करता है" ॥ ४१ ॥
मद्भक्तानां प्रशान्तानां योगिनां वीतरागिणाम्।<br>हृदये सीतया नित्यं वसाम्यत्र न संशयः ॥३९॥
तस्मात्त्वं सर्वदा शान्तः सर्वकल्मषवर्जितः।<br>मां ध्यात्वा मोक्ष्यसे नित्यं घोरसंसारसागरात् ॥४०॥
स्तोत्रमेतत्पठेद्यस्तु लिखेद्वाः शृणुयादपि।<br>मत्प्रीतये समाभीष्टं सारूप्यं समवाप्नुयात् ॥४१॥
इत्युक्त्वा लक्ष्मणं प्राह श्रीरामो भक्तभक्तिमान्।<br>पश्यत्विदानीमेवैष मम सन्दर्शने फलम् ॥४२॥विभीषणसे ऐसा कह भक्तवत्सल श्रीरामने<br>लक्ष्मणजीसे कहा—"लक्ष्मण ! यह अभी मेरे दर्शनका<br>फल देखे ॥ ४२ ॥ तुम समुद्रसे जल ले आओ; मैं<br>इसे लंकाके राज्यपर अभिषिक्त किये देता हूँ। जबतक<br>चन्द्र-सूर्य और पृथिवीकी स्थिति है तथा जबतक लोकमें<br>मेरी कथा रहेगी तबतक यह लंकाका राज्य करेगा।"
लङ्काराज्येऽभिषेक्ष्यामि जलमानय सागरात्।<br>यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च यावत्तिष्ठति मेदिनी ॥४३॥
यावन्मम कथा लोके तावद्राज्यं करोत्वसौ।<br>इत्युक्त्वा लक्ष्मणेनाम्बु ह्यानाय्य कलशेन तम्॥४४॥ऐसा कह श्रीरमापतिने लक्ष्मणजीसे कलशमें जल<br>मँगवाया और मन्त्रियों तथा विशेषतः लक्ष्मणजीसे उसे<br>लंकाके राज्यपदपर अभिषिक्त कराया ॥ ४३-४५ ॥<br>उस समय समस्त वानर प्रसन्न होकर 'धन्य है, धन्य
लङ्काराज्याधिपत्यार्थमभिषेकं रमापतिः।<br>कारयामास सचिवैर्लक्ष्मणेन विशेषतः ॥४५॥