आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलो।'' इस पर डॉनीवर्थ ने उत्तर दिया- ‘‘ऐसा ही होगा! आप दस दिन यहां ठहरिये, देश को जरा और शांत होने दीजिये, फिर बुला लेगे।’’ डॉनीवर्थ के पास पल्टन की मुर्गियां पली हुई थी और उनके यहां का पानी भी बहुत अच्छा था। विभिन्न वन्यपक्षी उनके टेबल की शोभा बढ़ाते थे। दाढ़ीवाला बावर्ची मानो द्वितीय द्रौपदी था। अतः बिना कुछ बोले- चाले कप्तान टॉमस वही डटे रहने लगे। इधर भवानंद मन ही मन व्यस्त हैं कि कब इस कप्तान का सर काटकर द्वितीय शम्बरारि की उपाधि धारण करूं । अंग्रेज इस समय भारत्तोद्वार के लिए(?) आये हैं, ये संतानगण तब तक समझ न सके थे। कैसे समझते? कप्तान टॉमस के सम-सामयिक भी उस समय यह न समझ सके थे कि भारतवर्ष पर हमारा राज्य स्थापित हो सकेगा। उस समय भविष्य तो विधाता ही जानते थे! भवानंद मन मे सोचते थे कि इस असुर- वंश का एक दिन मे निपात करूंगा; सब एकचित हो जाएं और जरा असतर्क सन्तान लोग अलग रहे। यही विचारक सब अलग रहे। उधर कप्तान टॉमस द्रौपदी गुण-ग्रहण मे संलग्न थे। साहब बहादुर शिकार के बड़े शौकीन थे। वे कभी-कभी शिवग्राम के निकट के जंगल मे शिकार खेलने निकल जाते थे। एक दिन डॉनीवर्थ के साथ अनेक शिकारियो को लेकर टॉमस शिकार के लिए निकल पड़े। कहना ही क्या है! टॉमस बड़े ही साहसी व्यक्ति हैं, बल-वीर्य मे अंगरेजो मे अतुलनीय हैं। इस जंगल मे शेर, भालू आदि हिंसक जन्तुओ का बाहुल्य है। बहुत दूर निकल जानेपर साथ के शिकारियो ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया कि निविड़ जंगल मे हम न घुसेगे; वे बोले- ‘‘अब भीतर राह नहीं हैं, आगे जा न सकेंगे।’’ डानीवर्थ भी ऐसे भयानक शेर के सामने पड़ चुके थे कि वे भी घुसने से मुकर गये। सब लोग लौटना चाहते थे। कप्तान टॉमस ने कहा- ‘‘तुम लोग लौट जाओ, मैं न लौटूंगा।’’ यह कहकर कप्तान साहब ने भयानक जंगल मे प्रवेश किया। वस्तुतः उस जंगल मे राह न थी। घोड़ा आगे बढ़ न सकता थाः लेकिन साहब ने अपना घोड़ा भी छोड़ दिया और कन्धे पर बन्दूक रखकर पांव पैदल आगे बढ़े। घने जंगल मे प्रवेश कर इधर उधर शेर की खोज करने लगे; पर शेर कही न था। फिर देखा क्या- एक बड़े पेड़ के नीचे, खिले पुष्पो की लता अपने शरीर से लपेटे हुए कौन बैठा हुआ था? एक नवीन संन्यासी बैठा अपने रूप से जंगल मे उजाला किये हुए है। प्रस्फुटित पुष्प मानो उस शरीर का सानिध्य पाकर कुछ अधिक सुगन्धित हो गये हैं। कप्तान टॉमस को पहले तो विस्मय हुआ, फिर क्रोध आया। कप्तान साहब थोड़ी बहुत हिन्दी बोल लेते थे,बोले-‘‘टुम कौन?’’ संन्यासी ने कहा- ‘‘मैं संन्यासी हूं।’’ कप्तान ने कहा – ‘‘टुम रिबेल है? संन्यासी- ‘‘वह क्या? कप्तान-‘‘हम तुमको गोली करके माड़ेगा।’’ सन्यासी-‘‘मारो।’’ कप्तान जरा मन मे आगा-पीछा कर रहे थे कि गोली मारे या न मारे; इसी समय विद्युत वेग से संन्यासी ने आक्रमण कर उनकी बन्दूक छीन ली। संन्यासी ने अपना वक्षावरण चर्म खोलकर फेंक दिया। एक झटके मे जटा अलग हो गयी। कप्तान टॉमस ने देखा कि उसके सामने अपूर्व स्त्री-मूर्ति है। सुन्दरी ने हंसते-हंसते कहा- ‘‘साहब! हम लोग नारी है, किसी को चोट नही पहुंचाती। मैं तुमसे एक बात पूछना चाहती हूं कि जब हिन्दू- मुसलमानो मे लड़ाई हो रही है, तो इस बीच मे तुम लोग क्यो बोलते हो? अपने घर लौट जाओ!‘‘ साहब- ‘‘कौन हो तुम?‘‘