आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
लो।'' इस पर डॉनीवर्थ ने उत्तर दिया- ‘‘ऐसा ही होगा! आप दस दिन यहां ठहरिये, देश को जरा और शांत होने दीजिये, फिर बुला लेगे।’’ डॉनीवर्थ के पास पल्टन की मुर्गियां पली हुई थी और उनके यहां का पानी भी बहुत अच्छा था। विभिन्न वन्यपक्षी उनके टेबल की शोभा बढ़ाते थे। दाढ़ीवाला बावर्ची मानो द्वितीय द्रौपदी था। अतः बिना कुछ बोले- चाले कप्तान टॉमस वही डटे रहने लगे। इधर भवानंद मन ही मन व्यस्त हैं कि कब इस कप्तान का सर काटकर द्वितीय शम्बरारि की उपाधि धारण करूं । अंग्रेज इस समय भारत्तोद्वार के लिए(?) आये हैं, ये संतानगण तब तक समझ न सके थे। कैसे समझते? कप्तान टॉमस के सम-सामयिक भी उस समय यह न समझ सके थे कि भारतवर्ष पर हमारा राज्य स्थापित हो सकेगा। उस समय भविष्य तो विधाता ही जानते थे! भवानंद मन मे सोचते थे कि इस असुर- वंश का एक दिन मे निपात करूंगा; सब एकचित हो जाएं और जरा असतर्क सन्तान लोग अलग रहे। यही विचारक सब अलग रहे। उधर कप्तान टॉमस द्रौपदी गुण-ग्रहण मे संलग्न थे। साहब बहादुर शिकार के बड़े शौकीन थे। वे कभी-कभी शिवग्राम के निकट के जंगल मे शिकार खेलने निकल जाते थे। एक दिन डॉनीवर्थ के साथ अनेक शिकारियो को लेकर टॉमस शिकार के लिए निकल पड़े। कहना ही क्या है! टॉमस बड़े ही साहसी व्यक्ति हैं, बल-वीर्य मे अंगरेजो मे अतुलनीय हैं। इस जंगल मे शेर, भालू आदि हिंसक जन्तुओ का बाहुल्य है। बहुत दूर निकल जानेपर साथ के शिकारियो ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया कि निविड़ जंगल मे हम न घुसेगे; वे बोले- ‘‘अब भीतर राह नहीं हैं, आगे जा न सकेंगे।’’ डानीवर्थ भी ऐसे भयानक शेर के सामने पड़ चुके थे कि वे भी घुसने से मुकर गये। सब लोग लौटना चाहते थे। कप्तान टॉमस ने कहा- ‘‘तुम लोग लौट जाओ, मैं न लौटूंगा।’’ यह कहकर कप्तान साहब ने भयानक जंगल मे प्रवेश किया। वस्तुतः उस जंगल मे राह न थी। घोड़ा आगे बढ़ न सकता थाः लेकिन साहब ने अपना घोड़ा भी छोड़ दिया और कन्धे पर बन्दूक रखकर पांव पैदल आगे बढ़े। घने जंगल मे प्रवेश कर इधर उधर शेर की खोज करने लगे; पर शेर कही न था। फिर देखा क्या- एक बड़े पेड़ के नीचे, खिले पुष्पो की लता अपने शरीर से लपेटे हुए कौन बैठा हुआ था? एक नवीन संन्यासी बैठा अपने रूप से जंगल मे उजाला किये हुए है। प्रस्फुटित पुष्प मानो उस शरीर का सानिध्य पाकर कुछ अधिक सुगन्धित हो गये हैं। कप्तान टॉमस को पहले तो विस्मय हुआ, फिर क्रोध आया। कप्तान साहब थोड़ी बहुत हिन्दी बोल लेते थे,बोले-‘‘टुम कौन?’’ संन्यासी ने कहा- ‘‘मैं संन्यासी हूं।’’ कप्तान ने कहा – ‘‘टुम रिबेल है? संन्यासी- ‘‘वह क्या? कप्तान-‘‘हम तुमको गोली करके माड़ेगा।’’ सन्यासी-‘‘मारो।’’ कप्तान जरा मन मे आगा-पीछा कर रहे थे कि गोली मारे या न मारे; इसी समय विद्युत वेग से संन्यासी ने आक्रमण कर उनकी बन्दूक छीन ली। संन्यासी ने अपना वक्षावरण चर्म खोलकर फेंक दिया। एक झटके मे जटा अलग हो गयी। कप्तान टॉमस ने देखा कि उसके सामने अपूर्व स्त्री-मूर्ति है। सुन्दरी ने हंसते-हंसते कहा- ‘‘साहब! हम लोग नारी है, किसी को चोट नही पहुंचाती। मैं तुमसे एक बात पूछना चाहती हूं कि जब हिन्दू- मुसलमानो मे लड़ाई हो रही है, तो इस बीच मे तुम लोग क्यो बोलते हो? अपने घर लौट जाओ!‘‘ साहब- ‘‘कौन हो तुम?‘‘
शान्ति-‘‘देखते तो हो, संन्यासिनी हूं-जिन लोगो से लड़ने आये हो, मै उन्ही मे से एक स्त्री हूं।‘‘ साहब-‘‘तुम हमाड़ा घड़ मे रहेगा?‘‘ शान्ति-‘‘क्या तुम्हारी उपपत्नी बनकर?‘‘ साहब-‘‘इसी माफक रहने सकता; शादी नही करेगा।‘‘ शान्ति-‘‘मुझे भी एक बात पूछनी है, हमारे घर मे एक सुन्दर बन्दर था,वह हाल मे ही मर गया है- उसकी जगह खाली पड़ी है। कमरे मे सिकड़ी डाल दूंगी। तुम उस दरबे मे रहोगे? हमारे बगीचे मे खूब केला होता है।‘‘ साहब-‘‘ तुम बड़ी स्प्रीटेड वूमेन है। टुमारी करेज पर हाम खुशी है। तुम हमाड़ा घड़ मे चलो। टुमाड़ा आदमी लड़ाई मे मड़ेगा,तब तुम क्या कड़ेगा? शान्ति-‘‘ तब हमारी एक शर्त हो जाए। युद्ध तो दो-चार दिन मे होगा ही। अगर तुम जीतोगे, तो मै तुम्हारी उपपत्नी होकर रहूंगी। अगर हम लोग जीतेगे, तो तुम हमारे घर मे उसी दरबे मे बन्दर बनकर रहना और केला खाना।‘‘ साहब-‘‘केला बहुत अच्छा चीज। अभी तुम्हारे पास है?‘‘ शान्ति-‘‘ले अपनी बन्दूक ले! ऐसे बेवकूफो के साथ कौन बात करे!‘‘ यह कहकर शान्ति बन्दूक फेककर हंसती हुई भाग गयी। साहब के पास से भागकर शान्ति जंगल मे गायब हो गयी। थोड़ी ही देर बाद साहब ने मधुर स्त्री-कण्ठ से गाना सुना- ‘‘ए यौवन-जल तरंग रोघिबे के हरे मुरारे! हरे मुरारे!‘‘ इसके साथ ही सारंगी पर वही मधुर झनकार उठी-‘‘ए यौवन-जल तरंग रोघिबे के? हरे मुरारे! हरे मुरारे!‘‘ इसके साथ ही पुरुष कण्ठ के साथ फिर गाना हुआ-‘‘ए यौवन-जल तरंग रोघिबे को? हरे मुरारे! हरे मुरारे!‘‘ तीन स्वरो की मिलित झनकार ने जंगल की समूची लताओ को कंपा दिया। शान्ति गाती हुई गीत के पूरे चरण गाने लगी- ‘‘ए यौवन जल- तरंग रोघिबे के? ‘‘हरे मुरारे! हरे मुरारे!‘‘ ‘‘ए यौवन जल- तरंग रोघिबे के? ‘‘हरे मुरारे! हरे मुरारे! जलेते तूफान होये छे आमार नूतन तरी मसिलो सुखे, माझीते हाल धरे छे, हरे मुरारे! हरे मुरारे! मेगे बालिरे बांध, पुराई मनेर साध, जोरदार गांगे जल छूटे छे, राखिबे के?
हरे मुरारे ! हरे मुरारे ! " सारंगी भी बज रही थी-" जोरदार गांगेजल छूटे छे, राखिबे के ? हरे मुरारे ! हरे मुरारे। जहां बहुत ही घना जंगल है- भीतर क्या है, बाहर से यह दिखाई नही देता, शांति उसी के अंदर प्रवेश कर गयी थी। वही उन्ही शाखा- पल्लवो मे छिपी हुई एक छोटी कुटी है। डालियो के ही बन्धन और पत्तो का छाजन है। काठ की जमीन, उस पर मिट्टी पटी हुई है। लताद्वार खोलकर उसी के अंदर शांति प्रवेश कर गयी। वहां जीवानंद बैठे सारंगी बजा रहे थे। जीवानंद ने शांति को देखकर पूछा- "इतने दिनो के बाद गंगा मे ज्वार का जल बढ़ा है क्या?" शांति ने हंसते हुए उत्तर दिया- "ज्वार का बढ़ा हुआ गंगा जल ही क्या तालो को डुबाता है?" जीवानंद ने दुःखी होकर कहा- "देखो, शांति ! एक दिन तो व्रत भंग होने के कारण प्राण उत्सर्ग करूंगा ही; जो पाप हुआ है, उसका प्रायश्चित करना ही पड़ेगा। अब तक प्रायश्चित कर चुका होता, किन्तु केवल तुम्हारे अनुरोध के कारण कर न सका। लेकिन अब किसी दिन यह भी सम्भव हो जाएगा, विलम्ब नही है। उसी युद्ध मे मुझे प्रायश्चित करना पड़ेगा। इस प्राण का परित्याग करना ही होगा। मेरे मरने के दिन.......... झ्हशांति ने बात काट कर कहा- "मैं तुम्हारी धर्मपी हूं, सधर्मिणी हूं-धर्म मे सहायक हूं। तुमने अतिशय गुरु धर्म ग्रहण किया है, उसी धर्म की सहायता के लिए मैं आई हूं। हम दोनो ही एक साथ रहकर उस धर्म मे सहायक होगे, इसलिए घर त्याग कर आयी हूं। मैं तुम्हारे घर मे वृद्धि ही करूंगी। विवाह इहकाल के लिए भी होता है और परकाल के लिए भी होता है। इहकाल के लिए जो विवाह होता है, मन मे समझ लो कि हमने वह किया ही नही। हमलोगो का विवाह केवल परकाल के लिए हुआ है। परकाल मे इसका दूसरा फल होगा, लेकिन प्रायश्चित की बात क्यो ? तुमने कौन सा पाप किया है? तुम्हारी प्रतिज्ञा है कि स्त्री के साथ एकासन पर न बैठोगे? कौन कहता है तुम किसी दिन भी एकासन पर बैठे हो? फिर प्रायश्चित क्यो ? हाय प्रभु तुम मेरे गुरू हो, क्या मैं तुम्हे धर्म सिखाऊं? तुम वीर हो, लेकिन क्या मैं तुम्हे वीर-धर्म सिखाऊं?" जीवानंद ने आह्लाद से गदगद होकर कहा-"प्रिये ! सिखाओ तो सही !" शांति प्रसन्नचित से कहने लगी-"और भी देखो गोस्वामी जी ! इहकाल मे ही क्या हमारा विवाह निष्फल है ? तुम मुझसे प्रेम करते हो, मैं तुमसे प्रेम करती हूं- इससे बढ़कर इहकाल मे और कौन-सा फल हो सकता है? बोलो-वन्देमातरम् !" इसके बाद ही दोनो ने एक स्वर से "वन्देमातरम्" गीत गाया। भवानंद स्वामी एक दिन नगर मे जा पहुंचे। उन्होने प्रशस्थ राजपथ त्यागकर एक गली मे प्रवेश किया। गली के दोनो बाजू ऊंची अट्टालिकाएं है, केवल दोपहर के समय एक बार वहां भगवान सूर्य झांक लेते है, इसके बाद अंधकार ही अंधकार। गली मे घुसकर पास के ही एक दो-मंजिले मकान मे भवानंद ने प्रवेश किया। नीचे की मंजिल मे जहां एक अर्धवयस्का स्त्री रसोई बना रही थी, वही जाकर भवानंद स्वामी ने दर्शन दिया। वह स्त्री अर्धवयस्क, मोटी-झोटी, काली-कलूटी, मैली धोती पहने माथे के बाल ठीक खोपड़ी पर बांधे हुए, दाल की बटलोही मे कलछी डालकर ठन-ठन बजाती हुई बाएं हाथ से मुंह पर लटकानेवाले बालो को हटाती, कुछ मुंह से बड़बड़ाती, रसोई करती हुई सुशोभित हो रही थी। ऐसे ही समय भवानंद महाप्रभु ने घर मे प्रवेश कर कहा- "भाभी ! राम-राम !" भाभी भवानंद को देखकर अवाक होकर अपने हटे हुए कपड़े ठीक करने लगी। इच्छा हुई कि सिर का मोहन
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जूड़ा खोल डाले, लेकिन खोल न सकी- हाथ मे कलछी थी। हाय हाय! उस जूड़े के जंजाल मे उसने एक बकुल पुष्प खोस रखा था। वस्त्रांचल से उसे ढंकने की कोशिश की, लेकिन यह क्या? आज तो एक पांच हाथ का टुकड़ा मात्र पहन रखा था। अतः अंग ढंक न सकी। वह पांच हाथ का कपड़ा ऊपर उठाती थी तो छाती खुलती थी, छाती ढांकती थे तो पीठ खुलती थी, लाचार बेचारी परेशान हो गई। किसी तरह उसने एक कोना खींचकर कान के पास तक लाकर आधा चेहरा ढांकने का भाव कर प्रतिज्ञा की कि दूसरी एक धोती खरीदूंगी और तब इसे कभी न पहनूंगी। इस तरह व्यस्त होने के बाद बोली-‘‘कौन, गोसाई ठाकुर! आओ-आओ! लेकिन भाई! यह हमे राम-राम के साथ प्रणाम क्यो?‘‘ भवानंद-‘‘तुम मेरी भाभी जो हो!‘‘ गौरी-‘‘अच्छा, आदर से कहते हो तो कह लो। प्रणाम किया ही है, तो खुश रहो! फिर तुम्हे प्रणाम करना ही चाहिए, मैं उम्र मे बड़ी जो हूं। लेकिन आखिर हो तो गोसाई ठाकुर देवता ही!‘‘ भवानंद स्वामी से गौरी की उम्र काफी बड़ी-‘‘करीब पचीस वर्ष बड़ी है। लेकिन चतुर भवानंद ने उत्तर दिया-‘‘भाभी! अरे तुम्हे रसीली देखकर भाभी कहता हूं। नही तो हिसाब जब किया गया था, तो तुम मुझसे छः वर्ष छोटी निकली थी। क्या याद नही है? हम लोगो मे सब तरह के वैष्णव हैं न। इच्छा हैं कि एक मठधारी ब्रह्मचारी के साथ तुम्हारी सगाई करा दूं, यही कहने आया हूं।‘‘ गौरी-‘‘यह कैसी बात? अरे राम-राम! ऐसी बात भला कही जाती? मैं ठहरी विधवा औरत!‘‘ भवानंद-‘‘तो सगाई न होगी?‘‘ गौरी-‘‘तो भाई! जैसा समझो वैसा करो। तुम लोग पंडित आदमी ठहरे। हम लोग तो और हैं, क्या समझे? तो कब होगी सगाई?‘‘ भवानंद ने बड़ी मुश्किल से हंसी रोककर कहा-‘‘बास एक बार उस ब्रह्मचारी से मुलाकात होते ही पक्की हो जाएगी सगाई?‘‘ गौरी जल गई। मन मे संदेह हुआ कि शायद सगाई की बात मजाक है। बोली-‘‘है, जैसी, है वैसी है!‘‘ भवानंद-‘‘तुम जरा जाकर एक बार देख आओ। कह देना कि मैं आया हू- एक बार मिलना चाहता हूं।‘‘ इस पर गौरी भात-दाल छोड़कर हाथ धोकर छमछम करती हुई सीढ़ियां तोड़ती ऊपर चढ़ने लगी। एक कमरे मे जमीन पर चटाई बिछाकर एक अपूर्व सुन्दरी बैठी हुईं हैं। लेकिन सौंदर्य पर एक घोर छाया हैं। मध्यान्ह के समय कलकलवाहिनी प्रसन्नसलिला, विपुल-जल-श्रोतवती नदी के ऊपर मेघ आने जैसी यह कैसी छाया है! नदी-हृदय पर तरंगे उछल रही हैं, तटवर्ती कुसुमवृक्ष वायु के झोके मे मस्त झूम रहे है, पुष्प-भार से दबे जा रहे है, उनसे अट्टालिका-श्रेणी सुशोभित है। तरणी-श्रेणी के ताड़न से जल आंदोलित हो रहा है। यह भी वैसे ही पहले की तरह चारु, चिकने, चंचल, गुंथे केश, पहले का वैसा ही तेजपुंज ललाट और उस पर पतली तूलिका से खिंची हुई भौंहे, वही पहले जैसे चंचल मृग-नयन- लेकिन वैसे कटाक्षमय नही, वैसी लोलता नही, कुछ नम्र! अधरो पर वही दाड़िम लालिमा, वैसे ही सुधारसपूर्ण, वैसे ही वनलता-दुष्प्राप्य कोमलतायुक्त बाहु। लेकिन आज वह दीप्ति नही, वह उज्ज्वलता नही, वह प्रखरता नही, वह चंचलता नही, वह रस नही है- शायद वह यौवन भी नही है। केवल सौन्दर्य और माधुर्यमात्र, नयी बात आ गयी हैं-गाम्भीर्य। इसे पहले देखने से जान पड़ता था कि मनुष्य-लोक की अतुलनीय सुन्दरी हैं अब देखने से जान पड़ता हैं कि कोई स्वर्ग की शापग्रस्त देवी हैं। उसके चारो तरफ दो-चार पुस्तके पड़ी हुई हैं। दीवार पर खूंटी के सहारे तुलसी की माला लटक रही हैं। दीवारो पर जगन्नाथ, बलराम, सुभद्रा, कालीयदमन, गोवर्धन-धारण आदि के चित्र टंगे हुए है। वे चित्र उसके स्वयं बनाये हुए है, उनके नीचे लिखा हुआ है-‘‘चित्र या विचित्र!‘‘ ऐसे ही कमरे मे भवानन्द ने
प्रवेश किया। भवानन्द ने पूछा-"क्यो कल्याणी! शारीरिक कुशल तो है?" कल्याणी-"यह प्रश्न करना आप न छोड़ेंगे? मेरे शारीरिक कुशल से आपका क्या मतलब?" भवानन्द-"जो वृक्ष लगाता है, उसमे नित्य जल देता है-वृक्ष के बढ़ते से ही उसे सुख होता है। तुम्हारे मृत शरीर मे मैने नवजीवन दिया है। वह बढ़ रहा है या नही, मैं क्यो न पूछूंगा?" कल्याणी-"विक्ष-वृक्ष का क्या कभी कोई दाम होता है?" भवानन्द-"जीवन क्या विष है?" कल्याणी-"न होता तो अमृत ढालकर मे उसे ध्वंस करने को क्यो तैयार होती?" भवानन्द-"बहुत दिनो से सोच रहा था-पूछूंगा, लेकिन पूछ नही सका। किसने तुम्हारे जीवन को विषममय बना दिया था?" कल्याणी ने स्थिर भाव से उत्तर दिया-"मेरे जीवन को किसी ने विषममय नही बनाया : जीवन स्वयं विषममय है- मेरा जीवन विषमय है; आपका जीवन विषमय है : सभी का जीवन विषमय है।" भवानन्द-"सच है, कल्याणी! मेरा जीवन तो अवश्य विषममय है।......उसी दिन से तुम्हारा व्याकरण समाप्त हो गया है?" कल्याणी-"नही?" भवानन्द-"फिर क्या बात है?" कल्याणी-"अच्छा नही मालूम होता।" भवानन्द-"विद्या-अर्जन मे तुम्हारी कुछ प्रवृत्ति देखी थी। अब ऐसी अश्रद्धा क्यो?" कल्याणी-"आप जैसे पण्डित जब महापापिष्ठ है, तो न पढ़ना-लिखना ही अच्छा है। मेरे पतिदेव की क्या खबर है, प्रभु?" भवानन्द-"बारंबार यह संवाद क्यो पूछती हो? वो तो तुम्हारे लिए मृत समान है।" कल्याणी-"मैं उनके लिए मृत हूं; वे मेरे लिए नही।" भवानन्द-"वह तुम्हारे लिये मृतवत् होंगे, यही समझकर तो तुमने विष खाया था? बार-बार यह बात क्यो कल्याणी?" कल्याणी-"मर जाने से क्या संबंध मिट जाता है! वह कैसे है?" भवानन्द-"अच्छे है।" कल्याणी-"कहां है? पदचिन्ह मे?" भवानन्द-"हां, वही है!" कल्याणी-"क्या कर रहे है?" भवानन्द-"जो कर रहे थे-दुर्ग-निर्माण, अस्त्र-निर्माण; उन्ही के द्वारा निर्मित अस्त्र-शस्त्रो से सहस्त्रो सन्तान सज्जत हो रहे है। उन्ही की कृपा से अब हम लोगो को तोप, बन्दूक, गोला-गोली, बारूद आदि की कमी नही है। सन्तान गण मे वही श्रेष्ठ हैं। वे हम लोगो को महत् उपकार कर रहे है; वे हम लोगो के दाहिने हाथ है।" कल्याणी-"मै प्राण-त्याग न करती, तो इतना होता! जिसकी छाती पर छेदही कलसी बंधी हो, वह क्या कभी भवसागर पार कर सकता है! जिसके पैरो मे लौह सीकड़ पड़े हो, वह क्या कभी दौड़ सकता है! क्यो संन्यासी! तुमने अपना क्षार जीवन क्यो बचा रखा था?" भवानन्द-"स्त्री सहधर्मिणी होती है, धर्म मे सहायक होती है।"
कल्याणी--“छोटे-छोटे धर्मों मे। बड़े धर्मों के अनुसरण मे कण्टक! मैने विष-कटक द्वारा उनके अधर्म या कष्ट का उद्धार किया था। छिः, दुराचारी पामर ब्रह्मचारी! तुमने मेरे प्राण क्यो लौटाये?” भवानन्द--“अच्छा, न तो मैने जो किया है, उसे मुझे वापस कर दो। मैने जो प्राण-दान किया है, क्या तुम उसे वापस कर सकती हो।” कल्याणी--“क्या आपको पता है, मेरी सुकुमारी कैसी है?” भवानन्द--“बहुत दिनो से उसकी खबर नही लगी। जीवानन्द बहुत दिनो से उधर गये ही नही।” कल्याणी--“उसकी खबर क्या मुझे ला नही दे सकते? स्वामी मेरे लिए त्याज्य है; लेकिन जब जिन्दा रह गई हूं तो कन्या को क्यो त्याग दूं! अब तो सुकुमारी के पास जाने से ही जीवन मे कुछ सुख मिल सकता है। लेकिन मेरे लिए इतना आप क्यो करेगे।” भवानन्द--“करूंगा कल्याणी! तुम्हारे लिए कन्या ला दूंगा; लेकिन इसके बाद?” कल्याणी--“इसके बाद क्या गोस्वामी?” भवानन्द--“स्वामी” कल्याणी--“उन्हे तो इच्छापूर्वक त्यागा है।” भवानन्द--“यदि उनका व्रत पूर्ण हो जाए तो?” कल्याणी--“तो मै उनकी हूंगी। मै जो बच गई हूं, क्या वे यह जानते है?” भवानन्द--“नही।” कल्याणी--“आपसे क्या उनकी मुलाकात नही होती?” भवानन्द--“होती है।” कल्याणी--“मेरी बात कभी नही करते?” भवानन्द--“नही! जो स्त्री मर गयी, उससे फिर पति का क्या सम्बन्ध!” कल्याणी--“क्या कहा?” भवानन्द--“तुम फिर विवाह कर सकती हो, तुम्हारे पुनर्जन्म हुआ है।” कल्याणी--“मेरी कन्या ला दो!” भवानन्द--“ला दूंगा! तुम फिर विवाह कर सकती हो?” कल्याणी--“तुम्हारे साथ न?” भवानन्द--“विवाह करोगी?” कल्याणी--“तुम्हारे साथ” भवानन्द--“यही मान लो।” कल्याणी--“सन्तान धर्म कहां रहेगा?” भवानन्द--“अतल जल मे।” कल्याणी--“यह तुम्हारा महाव्रत है?” भवानन्द--“अतल जल मे गया?” कल्याणी--“किसलिए सब अतल जल मे डुबाते हो?” भवानन्द--“तुम्हारे लिए! देखो, मनुष्य हो, ऋषि हो, सिद्ध हो, देवता हो, सबका चित्त अवश्य होता है। सन्तान-धर्म मेरा प्राण है, लेकिन आज पहले-पहल करता हूं, तुम प्राणो से भी बढ़कर प्राण हो। जिस दिन तुम्हे प्राण-दान किया, उसी दिन से मै तुम्हारे पैरो पर गिर गया। मै नही जानता था कि संसार मे ऐसा रूप भी
है। ऐसी रूपराशि जीवन मे कभी देखूंगा, यदि यह जानता तो कभी सन्तान-धर्म ग्रहण न करता। यह धर्म इस अग्नि मे जलकर क्षार हो जाता है। धर्म जल गया है-प्राण है। आज चार वर्षों से प्राण भी जल रहा है, बचना नही चाहता। दाह! कल्याणी! दाह! ज्वाला! लेकिन जलने वाला, ईंधन अब बच नही गया है। प्राण जा रहा है। चार बरस से सह रहा हूं; अब सहा नही जाता। क्या तुम मेरी होगी?’’ कल्याणी-‘‘तुम्हारे ही मुंह से सुना है कि सन्तान-धर्म का एक यह भी नियम है कि जिसकी इन्द्रिय परवश हो जाए, उसका प्रायश्चित मृत्यु है। क्या यह सच है?’’ भवानन्द-‘‘यह सच है।’’ कल्याणी-‘‘तो तुम्हारे लिए भी वही प्रायश्चित मृत्यु है?’’ भवानन्द-‘‘मेरे लिए एकमात्र प्रायश्चित मृत्यु है।’’ कल्याणी-‘‘तुम्हारी मनोकामना पूरी होने पर मरोगे?’’ भवानन्द-‘‘निश्चय मरूंगा!’’ कल्याणी-‘‘और यदि मै मनोकामना पूरी न करूं?’’ भवानन्द-‘‘तब भी मृत्यु निश्चय है। कारण, मेरी इन्द्रियां परवश हो चुकी है। आगामी युद्ध मे.....’’ कल्याणी-‘‘तुम अब विदा हो! मेरी कन्या भिजवा दोगे?’’ भवानन्द ने आंसू भरी आंखो से कहा-‘‘भिजवा दूंगा। क्या मेरे जाने पर भी मुझे हृदय मे याद रखोगी?’’ कल्याणी-‘‘याद रखूंगी-ब्रम्हच्युत विधर्मी के रूप मे याद रखूंगी।’’ भवानन्द विदा हुए। कल्याणी पुस्तक पढ़ने लगी। भवानन्द विचार-सागर मे गोते लगाते हुए मठ की तरफ चले। वे राह मे अकेले चले आ रहे थे। वन मे भी अकेले ही उन्होंने प्रवेश किया। अब उन्होने देखा कि वन मे उनके आगे-आगे एक आदमी चला जा रहा है। भवानन्द ने पूछा-‘‘कौन हो भाई?‘‘ अग्रगामी व्यक्ति ने कहा-‘‘जानना चाहते हो? उत्तर देता हूं-एक पथिक‘‘ भावानन्द-‘‘वन्दे-‘‘ वह आदमी बोला-‘’मातरम् ।‘‘ भवानन्द-‘‘मै भवानन्द स्वामी हूं ।‘‘ अग्रगामी-‘‘मै धीरानंद ।‘‘ भवानन्द-‘‘धीरानंद! कहां गये थे?‘‘ धीरानंद-‘‘आपकी ही खोज मे ।‘‘ भवानन्द-‘‘क्यो?‘‘ धीरानंद-‘‘एक बात कहने ।‘‘ भवानन्द-‘‘कौन-सी बात?‘‘ धीरानंद-‘‘अकेले मे कहने की है ।‘‘ भवानन्द-‘‘यही बताओ न, यह तो निर्जन स्थान है ।‘‘ धीरानंद- ‘‘ आप नगर मे गए थे‘‘ भवानंद- ‘‘हाँ ।‘‘ धीरानंद- ‘‘गौरी के घर?‘‘ भवानंद- ‘‘तुम भी नगर मे गए थे क्या?‘‘
धीरानंद- ‘‘वहां एक परम सुंदरी रहती है?’’ भवानंद- कुछ विस्मित भी हुए डरे भी। बोले- ‘‘यह सब कैसी बाते है?’’ धीरानंद- ‘‘आप उसके साथ मुलाकात की थी?’’ भवानंद- ‘‘हसके बाद?’’ धीरानंद- ‘‘आप उस कामिनी के प्रति अति अनुरक्त है?’’ भवानंद- ‘‘(कुछ विचारकर) धीरानंद! तुमने क्यो इतनी खोज-बीन की। देखो धीरानंद! तुम जो कुछ कह रहे हो, सब सच है। लेकिन तुम्हारे अतिरिक्त कितने लोग यह बात जानते है?’’ धीरानंद- ‘‘और कोई नही।’’ भवानंद- ‘‘तब तुम्हारा बध करने से ही मै मुक्त हो सकता हूँ।’’ धीरानंद- ‘‘कर सकते हो?’’ भवानंद- ‘‘तब आओ, इस निर्जन स्थान मे ही युद्ध करे। हो सकता तो मै तुम्हारा बध कर कलंक से बचूं या तुम मेरा बध कर दो, ताकि सारी ज्वालाओ मे मेरी मुक्ति हो जाए। बोलो, पास मे अस्त्र है?’’ धीरानंद- ‘‘है! खाली हाथ किसकी मजाल है कि तुम्हारे सामने यह बाते करे। यदि युद्ध की ही तुम्हारी इच्छा है तो वही सही, पर संतान-संतान मे विरोध निषिद्ध है किन्तु आत्महत्या के लिए किसी के साथ भी युद्ध करने मे हर्ज नही। जो बात कहने के लिए मै तुम्हे खोज रहा था, क्या वह सब सुन लेने पर युद्ध करना अच्छा न होगा?’’ भवानंद- ‘‘हर्ज क्यो है कहो!’’ भवानंद ने तलवार निकाल कर धीरानंद के कंधे पर रख दी। धीरानंद भागे नही। धीरानंद- ‘‘मै यह कह रहा था कि तुम कल्याणी से विवाह कर लो।’’ भवानंद- ‘‘कल्याणी यह! भी जानते हो?’’ धीरानंद- ‘‘विवाह क्यों नही कर लेते?’’ भवानंद- ‘‘उसके तो पति जीवित है‘‘ धीरानंद- ‘‘वैष्णो का ऐसा विवाह होता है।’’ भवानंद- ‘‘यह नीच वैरागियो की बात है-संतानो मे नही। संतान की शादी नही होती।’’ धीरानंद- ‘‘संतान-धर्म क्या अपरिहार्य है? तुम्हारे तो प्राण जा रहे है। छिः! छिः! मेरा कंधा न कट गया।’’ (वस्तुतः धीरानंद के कंधे से रक्त निकल रहा था।) भवानंद- ‘‘तुम किसलिए मुझे यह अधर्म-मति देने आए हो? अवश्य ही तुम्हारा कोई स्वार्थ है!‘‘ धीरानंद- ‘‘वह भी कहने की इच्छा है। तलवार न धंसना, बताता हूं। इस संतान-धर्म ने मेरी हड्डियो को जर्जर कर दिया है। मै इसका परित्याग कर स्त्री-पुत्र का मुंह देखकर दिन बिताने के लिए उतावला हो रहा हूं। मै इस संतान-धर्म का परित्याग करूंगा। लेकिन क्या मेरे लिए घर जाकर बैठने का अवसर है। विद्रोही के रूप मे अनेक लोग मुझे पहचानते है। घर जाकर बैठते ही शायद राजपुरुष सर उतार ले जाएंगे। अथवा सन्तान लोग ही विश्वासघात समझकर मार डालेगे। इसीलिए तुम्हे भी अपना साथी बना लेना चाहता है।‘‘ भवानन्द-‘‘क्यो, मुझे क्यो?‘‘ धीरानन्द- ‘‘यही असली बात है। सन्तान गण तुम्हारे अधीन है। सत्यानन्द अभी यहां है नही; इनके नायक हो तुम। इस सेना को लेकर युद्ध करो, तुम्हारी विजय होगी, इसका मुझे विश्वास है। युद्ध मे विजय प्राप्त कर क्यो नही तुम अपने नाम से एक राज्य स्थापित करते? सेना तो तुम्हारी आज्ञाकारिणी है। तुम राजा हो, कल्याणी
तुम्हारी मन्दोदरी हो, मैं भी तुम्हारा अनुचर बनकर स्त्री-पुत्र का मुंह देखकर दिन बिताऊं और आशीर्वाद करूं। सन्तान-धर्म को अलग जल मे डुबो दो!‘‘ भवानन्द ने धीरानन्द के कंधे पर से तलवार हटा ली; बोले-‘‘धीरानन्द! युद्ध करो! मैं तुम्हारा वध करूंगा। मैं इन्द्रिय-परवश हो सकता हैं, लेकिन विश्वासघातक नही। तुमने मुझे विश्वासघाती होने का परामर्श दिया है- स्वयं भी विश्वासघातक हो। तुम्हे सामने मारने से ब्रह्महत्या भी न होगी। मैं तुम्हारा वध करूंगा!‘‘ बात समाप्त होते-न-होते धीरानन्द दम भरकर भागे। भगवान ने पीछा न किया। भगवान कुछ अनमने से थे; उन्होने अब देखा, धीरानन्द का कही पता न था। मठ मे जाकर और फिर भवानन्द जंगल मे घुस गए। उस जंगल मे एक जगह प्राचीन अट्टालिका का भग्नावशेष है। उस ढूहे पर घास-पात आदि जम आई है। वहां असंख्य सर्पों का वास है। ढूहे की जमीन अपेक्षाकृत साफ और ऊंची थी। भवानन्द उसी पर जाकर बैठे और चिंता मे मग्न हो गए। भयानक अंधेरी रात थी। उस पर वह जंगल अति विस्तृत, एकदम सूना जंगल वृक्ष-लताओ से घना और दुर्भेद्य, गमनागमन मे दुष्कर है। आवाज आती भी है तो भूखे शेर की हुंकार, अन्यान्य पशुओ के भागने या बोलने का शब्द, कभी पक्षियो के पर फटफटाने की आवाज, तो कभी भागते हुए पशुओ के पैर की खरखराहट। ऐसे निर्जन स्थान मे उस ढूहे पर अकेले भगवान बैठे हुए है। उनके लिए इस समय पृथ्वी है ही नही, या केवल उपादान मात्र है। भवानन्द निश्चल थे, श्वास-प्रश्वास अति सूक्ष्म, अपने मे ही विलीन, माथे पर हाथ रखे बैठे थे। मन मे सोचते थे-जोहोना होना है, अवश्य होगा। भागीरथी की जल-तरंगो के बीच क्षुद्र हाथी की तरह इंद्रिय-स्रोत मे डूब गया, यही दुःख है। एक क्षण मे इंद्रियो का ध्वंस हो सकता है, शरीर-निपात कर देने से। मैं इसी इंद्रिय के वश मे हो गया? मेरा मरना ही अच्छा है। धर्मत्यागी! छिः! छिः! मैं अवश्य मरूंगा। इसी समय माथे पर पेचक ने भयानक शब्द किया। भवानन्द अब खुलकर बड़बड़ाने लगे- ‘‘यह कैसा शब्द? कान मे ऐसा सुनाई पड़ा, मानो भय का आह्वान हो। मैं नही जानता, मुझे कौन बुलाता-यह किसका शब्द है? किसने राह बतायी, किसने मरने के लिए कहा? पुण्यमय अनन्त! तुम शब्द-शब्दमय हो; लेकिन तुम्हारे शब्द का अर्थ तो मैं समझ नही पाता हूं!‘‘ इसी समय भीषण जंगल मे से मधुर साथ ही गंभीर, प्रेम भरा मनुष्य-कष्ठ सुनाई दिया-‘‘आशीर्वाद देता हूं, धर्म मे तुम्हारी मति अवश्य होगी!‘‘ भवानन्द के शरीर के रोगटे खड़े हो गये-यह क्या? यह तो गुरुदेव की आवाज है- ‘‘महाराज! आप कहां है? इस समय सेवक को दर्शन दीजिये।‘‘ लेकिन किसी ने भी दर्शन न दिया, किसी ने भी उत्तर न दिया। भवानन्द ने बार-बार बुलाया, लेकिन कोई उत्तर न मिला। इधर-उधर खोजा, कही कोई न था। रात बीतने पर जब जंगल मे प्रभात का सूर्य उदय हुआ-जंगल मे प्रभात का सूर्य उदय हुआ-जंगल मे पत्तो की हरियाली जब चमक उठी, तब भवानन्द मठ मे वापस आ गए। उनके कानो मे आवाज पहुंची- ‘‘हरे मुरारे! हरे मुरारे!‘‘ पहचान गए कि यह सत्यानन्द की आवाज है। समझ गए कि प्रभु वापस आ गए! जीवानन्द के कुटी से बाहर चले जाने पर शान्ति देवी फिर सारंगी लेकर मृदु स्वर मे गाने लगी- ‘‘प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदं विहित वहित्र चरित्रमखेदं, केशवधूत मीन शरीर,
जय जगदीश हरे !‘‘ गोस्वामी विरचित स्तोत्र को जिस समय सारंगी की मधुर ध्वनि पर कोमल स्वर से शांति गाने लगी, उस समय वह स्वर-लहरी वायुमण्डल पर इस तरह तरंगित हो उठी, जिस तरह जल मे अवगाहन करने पर स्रोत वाहिनी नदी मे धार कुण्डलाकार होकर लहराने लगती है। शांति गाने लगी ! ‘ ‘निन्दसि यज्ञविधेरहः श्रुतिजात सदस्य हृदय दर्शित पशुघातम, केशव धुत बुद्ध शरीर जय जगदीश हरे !‘‘ इसी समय किसी ने बाहर से गंभीर स्वर मे-मेघगर्जन के समान गंभीर स्वर मे गाया ! ‘‘म्लेच्छ निवहनिधने कलयसि करवालम् धूमकेतुमिव किमपि करालम् केशवधृत कल्कि शरीर जय जगदीश हरे !‘‘ शांति ने भक्ति-भाव से प्रणत होकर सत्यानन्द के पैरों की धूलि ग्रहण की और बोली- ‘‘प्रभो ! मेरा ऐसा कौन-सा भाग्य है कि श्री पादपद्मो का यहां दर्शन मिला। आज्ञा दीजिये, मुझे क्या करना होगा ?‘‘ यह कहकर शांति ने फिर स्वर-लहरी छेड़ी ! ‘‘भवचरणप्रणता वयमिति भावय कुरु कुशल प्रणतेषु ।‘‘ सत्यानन्द ने कहा-‘‘तुम्हे मैं पहचानता न था, बेटी ! रस्सी की मजबूती न जानकर मैने उसे खीचा था। तुम मेरी अपेक्षा ज्ञानी हो। इसका उपाय तुम्ही कहो। जीवानन्द से न कहना कि मैं सब कुछ जानता हूं। तुम्हारे प्रलोभन से वे अपनी जीवन-रक्षा कर सकेगे-इतने दिनो से कर ही रहे है ऐसा होने से मेरा कार्योद्धार हो जाएगा ।‘‘ शांति के उन विशाल लोल कटाक्षों मे निदाघ-कादम्बिनी मे विराजित बिजली के सामान घोर रोष प्रकट हुआ। उसने कहा- ‘‘यह क्या कहते है महाराज ! मैं और मेरे पति एक आत्मा है। मरना होगा तो वे मरेगे ही, इसमे मेरा नुकसान ही क्या है। मैं भी तो साथ मरूंगी ! उन्हे स्वर्ग मिलेगा तो क्या मुझे स्वर्ग न मिलेगा ?‘‘ ब्रह्मचारी ने कहा-देवी ! मैं कभी हारा न था, आज तुमसे तर्क मे हार मानता है। मां ! मैं तुम्हारा पुत्र है- संतान पर स्नेह रखो। जीवानन्द के प्राणो की रक्षा करो। इसी से मेरा कार्योद्धार होगा। बिजली हंसी। शांति ने कहा-मेरे स्वामी धर्म मेरे स्वामी के ही हाथ हैं। मैं उन्हे धर्म से विरत करनेवाली कौन हूं? इहलोक मे स्त्री का देवता पति है : किंतु परकाल मे सबका पिता धर्म होता है। मेरे समीप मेरे पति बड़े हैं उनकी अपेक्षा मेरा धर्म बड़ा है-उससे भी बढ़कर मेरे लिए पति का धर्म है। मैं अपने धर्म को जिस दिन चाहूं जलांजलि दे सकती हूं, लेकिन क्या स्वामी के धर्म को जलांजलि दे सकती हूं? महाराज ! तुम्हारी आज्ञा पर मरना होगा तो मेरे स्वामी मरेगे, मैं मना नही कर सकती। इस पर ब्रह्मचारी ने ठंडी सांस भरकर कहा-‘ ‘मां ! इस घोर व्रत मे बलिदान ही है। हम सबको बलिदान चढ़ाना पड़ेगा। मैं मरूंगा जीवानन्द, भवानन्द-सभी मरेगे, शायद तुम भी मरोगी। किन्तु देखो, कार्य पूरा करके ही मरना होगा, बिना कार्य के मरना किस काम का? मैंने केवल जन्मभूमि को ही मां माना था और किसी को भी मां नही कहा, क्योकि सुजला-सुफला माता के अतिरिक्त मेरी और कोई माता नही। अब तुम्हे भी मां
कहकर पुकारा है। तुम माता होकर हम संतानो का कार्य सिद्ध करो। जिससे हमारा कार्योद्धार हो वही करो- जीवानन्द की प्राण-रक्षा करना, अपनी रक्षा करना ! यही कहकर सत्यानन्द-हरे मुरारे, मधुकैटभारे ? गाते हुए चले गये। क्रमशः सन्तान सम्प्रदाय में समाचार प्रचारित हुआ कि सत्यानन्द आ गये है और सन्तानो से कुछ कहना चाहते है। अतः उन्होने सबको बुलवाया है। यह सुनकर दल-के-दल सन्तान लोग आकर उपस्थित होने लगे। चांदनी रात मे नदी-तट पर देवदारु के वृहत् जंगल मे आम, पनस, ताड़, वट, पीपल, बेल, शाल्मली आदि पेड़ो के नीचे करीब दस सहस्र सन्तान आ उपस्थित हुए। सब आपस में सत्यानन्द के लौट आने का समाचार सुनकर महाकोलाहल करने लगे। सत्यानन्द किसलिए वहां गये थे- यह साधारण लोग जानते न थे। अफवाह थी कि वे सन्तानो की मंगलकामना से प्रेरित होकर हिमालय पर्वत पर तपस्या करने ोलगये थे। सब आपस मे कानाफूसी करने लगे- "महाराज की तपस्या सिद्ध हो गयी है- अब हम लोगो का राज्य होगा।" इस पर बड़ा कोलाहल होने लगा। कोई चीत्कार करने लगा-मारो-मारो, पापियो को मारो। कोई कहता-‘‘जय-जय ! महाराज की जय ! कोई गाने लगा- हरे मुरारे मधुकैटभारे ! किसी ने "वंदेमारम" गाना गाया। कोई कहता- "भाई ! ऐसा कौन दिन होगा कि तुच्छ बंगाली होकर भी मै रणक्षेत्र मे शरीर उत्सर्ग करूंगा।" कोई कहता-- "भाई ! ऐसा कौन दिन होगा कि अपना ही धर्म हम स्वयं भोग करेगे।" इस तरह दस सहस्र मनुष्यो के कण्ठ-स्वर से निकली गगनभेदी ध्वनि जंगल, प्रान्त, नदी, वृक्ष, पहाड़ सब कांप उठे। एकाएक शब्द हुआ- वन्देमातरम और लोगो ने देखा कि ब्रह्मचारी सत्यानन्द सन्तानो के मध्य आकर खड़े हो गये। इस समय दस सहस्र-मस्तक उसी चांदनी मे वनभूमि पर प्रणत हो गये। बहुत ही ऊंचे स्वर मे, जलद गंभीर शब्दो मे सत्यानन्द ने दोनों हाथ उठाकर कहा- "शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी, वनमाली बैकुण्ठनाथ जो केशिमथन मधु-मुर-नरकमर्दन, लोक-पालक है वे तुम लोगो के बाहुओ मे बल प्रदान करे, मन मे भक्ति दे, धर्म मे शक्ति दे ! तुम सब लोग मिलकर एक बार उनका गुणगान करो।" इस पर दस सहस्र कण्ठो से एक साथ गान होने लगा। "जय जगदीश हरे। प्रलयपयोधि जले धृतवानसि वेदं विदित विहिवमखेदम जय जगदीश हरे।" इसके उपरान्त सत्यानन्द महाराज उन लोगो को पुनः आशीर्वाद प्रदान कर बोले- "संतानो ! तुम लोगो से आज मुझे कुछ विशेष बात कहनी है। टॉमस नाम के एक विधर्मी दुराचारी ने अनेक संतानो का नाश किया है। आज रात हम लोग उसका ससैन्य वध करेगे ! जगदीश्वर की ऐसी ही आज्ञा है। तुम लोग क्या चाहते हो ?" भयानक हर्षध्वनि से जंगल विदीर्ण उठा- "अभी मारेंगे ! बताओ, चलो, उन सबको दिखा दो। मारो ! मारो ! शत्रुओं का नाश करो?" इसी तरह के शब्द दूर के पहाड़ो से टकराकर प्रतिध्वनित होने लगे। इस पर सत्यानन्द फिर कहने लगे- "उसके लिए हम हम लोगो को जरा धैर्य धारण करना पड़ेगा। शत्रुओ के पास तोप है; बिना तोप के उनके साथ युद्ध हो नही सकता। विशेषतः वे सब वीर-जाति के है। हमारे पदचिन्ह दुर्ग से 17 तोपे आ रही है। तोपो के पहुंचते ही हम लोग युद्ध आरंभ करेंगे। यह देखो, प्रभात हुआ चाहता है। ब्रह्ममुहूर्त के 4 बजते ही....लेकिन यह क्या' --
“गुडुम-गुडुम-गुम! अकस्मात् चारो तरफ विशाल जंगल में तोपो की आवाज होने लगी। यह तोप अंगरेजो की थी। जाल मे पड़ी हुई मछली की तरह कप्तान टॉमस ने सन्तानो को इस जंगल मे घेरकर वध करने का उद्योग किया था। “गुड्डम गुड्डम गुम!” -- अंगरेजों की तोपे गर्जन करने लगी। वह शब्द समूचे जंगल में प्रतिध्वनित होकर सुनाई पड़ने लगा। वह ध्वनि नदी के बांध से टकराकर सुनाई पड़ी। सत्यानन्द ने तुरंत आवाज दी- “देखो, किसकी तोपे है? कई सन्तान तुरंत घोड़े पर चढ़कर देखने के लिए चल पड़े। लेकिन उन लोगो के जंगल से निकलते ही उन पर सावन की बरसात के समान गोले आकर पड़े। अश्वसहित उन सबने वही अपना प्राण त्याग किया। दूर से सत्यानन्द ने देखा, बोल - “पेड़ पर चढ़कर देखो!” उनके कहने के साथ जीवानन्द ने एक पेड़ पर ऊंचे चढ़कर बताया-“अंगरेजो की तोपे!” सत्यानन्द ने पूछा -“अश्वारोही सैन्य है या पदातिक?” जीवानन्द -“दोनो है?” सत्यानन्द - “कितने है?” जीवानन्द – “अन्दाज नही लग सकता। वे सब जंगल की आड़ से बाहर आ रहे है?” सत्यानन्द –“गोरे है या केवल देशी फौज?” जीवानन्द – “गोरे है।” अब सत्यानन्द ने कहा – “तुम पेड़ से उतर आओ।” जीवानन्द पेड़ से उतर आये। सत्यानन्द ने कहा - “तुम दस हजार सन्तान यहां उपस्थित हो। देखना है, क्या कर सकते हो! जीवानन्द ! आज के सेनापति तुम हो।” जीवानन्द हर्षोत्फुल्ल होकर एक छलांग मे घोड़े पर सवार हो गये। उन्हौने एक बार नवीनानन्द की तरफ ताककर इशारे मे ही कुछ कहा-कोई उसे समझ न सका। नवीनानन्द ने भी इशारे मे ही उत्तर दिया। केवल वे दोनो ही आपस मे समझ गये कि शायद इस जीवन मे यह आखिरी मुलाकात है; पर नवीनानन्द ने दाहिनी भुजा उठाकर लोगो से कहा-“भाइयो! समय है, गाओ -- “जय जगदीश हरे!” दस सहस्र सन्तानो के मिलित कण्ठ ने आकाश, भूमि, वन-प्रांत को कंपा दिया। तोप का शब्द उस भीषण हुंकार मे डूब गया। दस सहस्र सन्तानो ने भुजा उठाकर गाया-- “जय जगदीश हरे! म्लेछ निवहनिधने कलयसि करवालम्“ इसी समय अंगरेजो की गोली-दृष्टि जंगल का भेदन करती हुई सन्तानों पर आकर पड़ने लगी। कोई गाता-गाता छिन्नमस्तक छिन्न-बाहु छिन्न-ह्रतपिण्ड होकर जमीन पर गिरने लगा। लेकिन गाना बन्द न हुआ, वे सब गाते ही रहे – “जय जगदीश हरे!” गाना समाप्त होते ही सब निस्तब्ध हो गये। वह सारा वातावरण – नदी, जंगल, पहाड़ – एकदम निस्तब्ध हो गया। केवल तोपो का गर्जन गोरो के अस्त्रो की झंकार और पद-ध्वनि दूर से सुनाई पड़ने लगी। उस निस्तब्धता को भंग करते हुए सत्यानन्द ने कहा - “भगवान तुम्हारी रक्षा करेगे। तोप कितनी दूरी पर है?” ऊपर से आवाज दी “इसी जंगल के समीप एक छोटा मठ हैं, उसी के पास।” सत्यानन्द –“तुम कौन हो?” ऊपर से आवाज आयी -“मै नवीनानन्द।”
अब सत्यानन्द ने कहा - "तुम लोग दस हजार हो, तुम्हारी विजय होगी! क्या देखते हो छीन लो तोपे !' यह सुनते ही अश्वारोही जीवानन्द ने आवाज दी - "आओ भाइयो,मारो !' इस पर दस सहस्र सन्तान सेना, अश्वारोही और पदतिक, तीर की तरह धावा बोलती आगे बढ़ी। पदातिको के कन्धे पर बन्दूक, कमर मे तलवार और हाथ मे भाले थे। बहुत-से सन्तानो ने बिना युद्ध किये ही गिरकर प्राण- त्याग किया। एक ने जीवानन्द से कहा - "जीवानन्द ! अनर्थक प्राणि-हत्या से क्या फायदा है?'' जीवानन्द ने मुड़कर देखा, कहने वाले भवानन्द थे। जीवानन्द ने पूछा - "तब क्या करने को कहते हो?" भवानन्द - "वन के अन्दर रहकर वृक्षो का आश्रय लेकर अपनी प्राण-रक्षा करे। तोपो के सामने खुले मैदान मे बिना तोप की सन्तानसेना एक क्षण भी टिक न सकेगी। लेकिन जंगल मे पेड़ो की आड़ लेकर हम लोग बहुत देर तक युद्ध कर सकते है !' जीवानन्द - "तुम ठीक कहते हो ! लेकिन प्रभु की आज्ञा है कि तोप छीन जाए। अतः हम लोग तोप छीनके ही जाएंगे। " भवानन्द - "किसकी हिम्मत है कि तोप छीन सके। लेकिन यदि जाना ही है, तो तुम ठहरो, मै जाता हूं।' जीवानन्द - "यह न होगा, भवानन्द! आज मेरे मरने का दिन है।' भवानन्द - "आज मेरे मरने का दिन है !' जीवानन्द - "मुझे प्रायश्चित करना होगा।' भवानन्द - "तुम निष्पाप हो, तुम्हे प्रायश्चित की जरूरत नही। मेरा चरित्र कलुषित है; मुझे ही मरना होगा। तुम ठहरो, मै जाता हूं।' जीवानन्द --" भवानन्द, तुमसे क्या पाप हुआ है, मै नही जानता; लेकिन तुम्हारे रहने से सन्तानो का उद्धार होगा। मै जाता हूं।' भवानन्द ने चुप होकर फिर कहा --"मरना होगा तो आज ही मरेगे, जिस दिन जरूरत होगी,उसी दिन मरेगे। मृत्यु के लिए मुझे समय-काल की जरूरत नही !' जीवानन्द - "तब आओ !' इस बात पर भवानन्द सबके आगे हुए। दल-के-दल, एक-एक-कर सन्तान गोले खाकर मरकर गिरने लगे। सन्तान-सैन्य बिखरने लगी। तीर की तरह आगे बढ़ते हुए सन्तान गोला खाकर कटे वृक्ष की तरह नीचे गिरते थे। सैकड़ो लाशे पट गयी। इसी समय भवानन्द ने चिल्लाकर कहा - "आज इस तरंग मे संतानो को कूदना है कौन आता है भाई?' इस पर सहस्र-सहस्र कण्ठो से आवाज आयी- "वन्देमातरम् !' दनादन गोले आ रहे थे। तीर गिर रहे थे, लेकिन संतान सैन्य तीर की तरह आगे बढ़ती ही जाती थी। सबका लक्ष्य तोप छीनना था। इसके बाद तो दस हजार सन्तान सैन्य 'वन्देमातरम्' गाती हुई, अपने भाले आगे कर तीर की तरह तोपों पर जा पड़ी। यद्यपि वे लोग गोले और गोलियो की बौछार से क्षत-विक्षत हो चुके थे, लेकिन पलटे नही, भागे नही घनघोर युद्ध शुरू हो गया। लेकिन इसी समय रण-कुशल टॉमस की आज्ञा से एक सेना बन्दूको पर संगीने चढ़ाकर पीछे से निकलकर संतानो के दाहिने बाजू पर गिरी। अब जीवानन्द ने कहा-" भवानन्द ! तुम्हारी ही बात ठीक थी। अब सन्तान-सैन्य को नाश करने की जरूरत नही लौटाओ इन्हे !' भवानन्द - "अब कैसे लौट सकते है? अब तो जो पीछे पलटेगा, वही मारा जाएगा।' जीवानन्द - "सामने और दाहिने से आक्रमण हो रहा है। आओ, धीरे-धीरे बाएं होकर निकल चले।' भवानन्द - "बाएं घूमकर कहां जाओगे? बाएं नदी है - वर्षा से भरी हुई नदी। इधर गोले से बचोगे, तो नदी
मे डूबकर मरोगे।‘' जीवानन्द - "मुझे याद है, नदी पर एक पुल है।‘' भवानन्द - "लेकिन इतनी संख्या मे सन्तान जब पुल पर एकत्र हो जाएंगे, तो एक ही तोप उनका समूल नाश कर देगी।‘' जीवानन्द - "तब एक काम करो। आज तुमने जो शौर्य दिखाया है, उससे तुम सब कुछ कर सकते हो। थोड़ी सेना के साथ तुम सामना करो। मैं अवशिष्ट सेना को बाएं घुमाकर निकाल ले जाता हूं। तुम्हारे साथ की सेना तो अवश्य ही विनष्ट होगी, लेकिन अवशिष्ट सन्तान सेना नष्ट होने से बच जाएगी।‘' भवानन्द -"अच्छा, मैं ऐसा ही करूंगा।‘' इस तरह दो हजार सैनिको के साथ भवानन्द के सामने से फिर गोलन्दाजो पर आक्रमण किया। उनमे अपूर्व उत्साह था। घोरतर युद्ध होने लगा। गोलन्दाज सेना उनके विनाश मे और तोप-रक्षा मे संलग्न हुई। सैकड़ों सन्तान कट-कटकर गिरने लगे। लेकिन प्रत्येक सन्तान अपना बदला लेकर मरता था। इधर अवसर पाकर जीवानन्द अवशिष्ट सेना के साथ बाएं मुड़कर जंगल के किनारे से आगे बढ़े। कप्तान टॉमस के सहकारी लेफ्टिनेट वाटसन ने देखा कि सन्तानो का बहुत बड़ा दल भागने की चेष्टा मे बाएं घूमकर जाना चाहता है। इस पर उन्होने देशी सिपाहियो की सेना लेकर उनका पीछा किया। कप्तान टॉमस ने भी यह देखा। सन्तान-सेना का प्रधान भाग इस तरह गति बदल रहा है- यह देखकर उन्होने सहकारी से कहा - "मै दो-चार सौ सिपाहियो के साथ सामने की सेना को मारता हूं, तुम शेष सेना के साथ उन पर धावा करो। बाएं से वाटसन जाते हैं, दाहिने से तुम जाओ। और देखो, आगे जाकर पुल का मुंह बन्द कर देना। इस तरह वे सब तरह से घिर जाएंगे। तब उन्हे फंसी चिड़िया की तरह मार गिराओ। देखना, देशी फौज भागने मे बड़ी तेज होती है, अतः सहज ही उन्हे फंसा न पाओगे। अश्वारोही सेना को व न सके अन्दर से छिपकर पहले पुल के मुंह पर पहुंच जाने को कहो, तब वे फंस सकेगे।?" कप्तान टॉमस ने, जो कुशल सेनापति था, अपने अहंकार के वश होकर यही भूल की। उसने सामने की सेना को तृणवत समझ लिया था। उसने केवल दो सौ पदतिक सैनिको को अपने पास रहने दिया और शेष सबको भेज दिया। चतुर भवानन्द ने जब देखा कि तोप के साथ समूची सेना उधर चली गयी और सामने की छोटी सेना सहज ही वध्य है, तो उन्होने अपनी सेना को जोश दिलाया - "क्या देखते हो, सामने मुट्ठी भर अंग्रेज हैं, मारो! इस पर वह संतान सेना टॉमस की सेना पर टूट पड़ी। उस आक्रमण को थोड़े-से अंग्रेज सह न सक; मूली की तरह वे कटने लगे। भवानन्द ने स्वयं जाकर कप्तान टॉमस को पकड़ लिया। कप्तान अंत तक युद्ध करता रहा। भवानन्द ने कहा - "कप्तान साहेब! मैं तुम्हे मारूंगा नही, अंग्रेज हमारे शत्रु नही है। क्यो तुम मुसलमानो की सहायता करने आये? तुम्हें प्राणदान तो देता हूं, लेकिन अभी तुम बन्दी अवश्य रहोगे। अंग्रेजो की जय हो, तुम हमारे मित्र हो।‘' कप्तान ने भवानन्द को मारने के लिए संगीन उठायी, लेकिन भवानन्द से शेर की तरह जकड़े हुए थे, वह हिल न सका। तब भवानन्द रासने अपने सैनिकों से कहा -"बांधो इन्हे।‘' दो-तीन सन्तानो ने टॉमस को बांध लिया। भवानन्द ने कहा - "इन्हे घोड़े पर बैठाकर ले चलो। हम लोग जीवानन्द की सहायता को जाते हैं।‘' इसी तरह वह अल्पसंख्यक सन्तान-सेना कप्तान टॉमस को कैदी बनाकर घोड़े पर चढ़ भवानन्द के साथ जीवानन्द की सहायता के लिए आगे बढ़ी। जीवानन्द की सेना का उत्साह टूट चुका था, वह भागने को तैयार थी। लेकिन जीवानन्द और धीरानंद ने उन्हे समझाकर किसी तरह ठहराया। परन्तु सब सेना को जीवानन्द और धीरानंद पुल की तरफ ले गये। वहां पहुंचते
ही एक तरफ से हेनरी ने और दूसरी तरफ से वाटसन ने उन्हे घेर लिया। अब सिवा युद्ध के परित्राण न था। इधर सेना भग्नोत्साह थी। इसी समय टॉमस की तोपे पास आ पहुंची। अब सन्तानो का दल छिन्न-भिन्न होने लगा। उन्हे प्राण-रक्षा की कोई आशा न रही। जिसे जिधर राह मिली, भागने लगा। जीवानन्द और धीरानन्द ने उन्हे बहुत संयत करने की चेष्टा की, लेकिन कोई फल न हुआ, संतानो का दल तितर-बितर होने लगा। इसी समय ऊंची आवाज मे सुनाई दिया - ‘‘पुल पर जाओ, पुल पर जाओ ! उस पार चले जाओ, अन्यथा नदी मे डूब मरोगे।‘‘ अंगरेजो की सेना की तरफ मुंह किये हुए पुल पर चले जाओ ! जीवानन्द ने देखा कि कहनेवाले भवानंद सामने है। भवानन्द ने कहा,-‘‘जीवानन्द, तुम सेना को पुल पर ले जाओ। दूसरे प्रकार से रक्षा नही है।‘‘ यह सुनते ही संतान-सेना क्रमशः पुल पर पहुंचने लगी। थोड़ी ही देर मे समूची संतान-सेना पुल पर जा पहुंची। भवानन्द, जीवानन्द धीरानन्द सब एकत्र थे। भवानन्द ने जो कुछ कहा था, वही हुआ। अंगरेजो की तोपे पुल के मुंह पर लगी थी और वे गोले उगलने लगी। भयानक संतान-क्षय होने लगा। यह देखकर भवानन्द ने कहा - ‘‘जीवानन्द ! यह एक तोप हमारा नाश कर डालेगी ! क्या देखते हो, जाओ हम तीनो उस पर टूटकर अधिकार ले।‘‘ भवानंद के यह कहते ही जय नाद उठा -‘‘वन्देमातरम् !‘‘ और उसी समय तीन तलवारे पुनः सिरो पर घूम उठी। तोपची तमाशा ही देखते रह गये। हेनरे और वास्टन दूर खड़े अहंकार और प्रसन्नता मे इसे खिलवाड़ और मूर्खता समझते रहे। किन्तु इसी समय रण का पास पलट गया। पलक मारते ही तीनो सन्तान-नायक तोपचियो पर जा पड़े। तोपचियों के सिर धड़ से कब जुदा हुए कुछ पता नही। उनकी मोह-निद्र टूटी तब, जब बिजली की तरह तलवार चमकाते हुए भवानन्द स्वयं तोप पर खड़े हो गये और बोल -‘‘वन्देमातरम् !‘‘ सहस्रो कंठो से निकला -‘‘वन्देमातरम् !‘‘ उसी समय जीवानन्द ने तोप का मुंह अंगरेजी सेना की तरफ कर दिया और तोप प्रति-क्षण आग उगलने लगी। अब भवानंद ने कहा - ‘‘जीवानंद भाई ! यह क्षणिक जीत है, अब तुम संतानो को लेकर सकुशल पार चले जाओ। केवल बीस तोप भरनेवाले और मृत्यु का वरण करनेवाले संतानो को तोप की रक्षा के लिए छोड़ दो।‘‘ ऐसा ही हुआ। बीस संतान तोप के इर्द-गिर्द आ डटे। शेष समूची सेना जीवानन्द और धीरानन्द के साथ पार पहुंचने लगी। उस समय भवानंद क्रुद्ध गजराज हो रहे थे। पुल की संकरी जगह पर तोप लगाकर वे लगे गोरी वाहिनी का नाश करने। दल-के-दल तोप छीनने के लिए आगे बढ़ते थे और मरकर ढेर बन जाते थे। उस समय वे बीस युवक अजेय थे। ये लोग शीघ्रता इसलिए कर रहे थे कि अंगरेजो की शेष तोपे पहुंचने के पहले तक ही यह सारी अजेय लीला है। लेकिन भगवान को तो कुछ और ही करना था। एकाएक जंगल के अन्दर से बहुत-सी तोपो का गर्जन सुनाई पड़ने लगा। दोनो ही दल अवाक-रिस्पन्द होकर देखने लगे कि ये किसकी तोपे है? थोड़ी ही देर मे लोगो ने देखा कि जंगल के अन्दर से महेन्द्र की सत्रह तोपे, तीन तरफ से घेरा, बांधे हुए आग उगलती चली आ रही है। अंगरेजो की उस देशी फौज मे महामारी आ गयी- दल-के-दल साफ होने लगे। यह देख शेष यवन-सिपाही भागने लगे। उधर जीवानंद और धीरानन्द ने भी जैसे ही वातावरण समझा, वैसे ही उनका सारा क्रोध पलट पड़ा और पलट पड़ी सन्तान-सेना। वे भागती हुई यवन-सेना को घेरने और मारने लगे। अवशिष्ट रह गये यही कोई तीस-चालीस गोरे। वह वीर जाति वैसे ही डटी रही। अब भवानन्द ने उन पर धावा बोलने के लिए हाथ उठाया ही था कि जीवानन्द ने कहा - ‘‘भवानन्द ! महेन्द्र की कृपा से पूर्ण रण- विजय हुई है; अब व्यर्थ इन्हे मारने से क्या फायदा? चलो लौट चले।‘‘
चतुर्थ खण्ड: महायुद्ध, विजय व राष्ट्र-संदेश
भवानन्द ने कहा - "कभी नही, जीवानंद ! तुम खड़े होकर तमाशा देखो । एक के भी जिंदा रहते भवानन्द वापस नही हो सकता। जीवानन्द! तुम्हे कसम हैं, खड़े होकर चुपचाप देखो। मै अकेले इन सबको मारूंगा।‘' अभी तक कप्तान टॉमस घोड़े पर बंधे हुए थे। भवानन्द ने आक्रमण के समय कहा - "उस अंगरेज को मेरे सामने रखो; पहले यह मरेगा, फिर मैं मरूंगा।" टॉमस हिन्दी समझता था। उसने अपने सिपाहियो को आज्ञा दी- "वीरो ! मै तो मरे के समान हूं। इंगलैण्ड की मान-रक्षा करना, तुम्हे मातृभूमि की कसम हैं! पहले मुझे मारो, इसके बाद प्रत्येक अंग्रेज मारकर अपनी जगह मरे।‘' '‘धांयं‘' एक शब्द हुआ और तुरन्त कप्तान टॉमस मस्तक मे गोली लगने से मरकर गिर पड़ा। यह गोली उसी के एक सिपाही द्वारा चलायी गयी थी। इसके बाद उन सबने आक्रमण किया। अब भवानन्द ने कहा -‘‘आओ भाई! अब कौन ऐसा है जो भीम, नकुल, सहदेव बनकर मेरे साथ मरने को तैयार है?‘' इतना कहते ही जीवानंद, धीरानंद और लगभग पचीस जवान आ पहुंचे। घोर युद्ध हो रहा था। तलवारे रही थी। धीरानंद, भवानंद के पास थे। धीरानंद ने कहा-‘‘भवानंद! क्यो? क्या मरने का किसी का ठेका हैं क्या?‘' यह कहते हुए धीरानंद ने एक गोरे को आहत किया। भवानंद-"यह बात नही? लेकिन मरने पर तो तुम स्त्री-पुत्र का मुंह देखकर दिन बिता न पाओगे!‘' धीरानंद-‘‘दिल की बात कहते हो? अभी भी नही समझे?‘‘ (धीरानंद ने आहत गोरे का वध किया)। भवानंद-‘‘नही‘‘ (इसी समय एक गोरे के आघात से भवानंद का बायां हाथ कट गया।) धीरानंद-"मेरी क्या मजाल थी कि तुम जैसे पवित्रात्मा से यह बाते मै कहता? मै सत्यानंद का गुप्तचर हो कर तुम्हारे पास गया था?‘‘ भवानंद उस समय केवल एक हाथ से युद्ध कर रहे थे। बोले-‘‘यह क्या? महाराज का मेरे प्रति अविश्वास?‘‘ धीरानंद ने उनकी रक्षा करते हुए कहा- "कल्याणी के साथ तुम्हारी जितनी बाते हुई थी,सब उन्होने स्वयं अपने कानो से सुनी।‘' भवानंद-"यह कैसे?‘‘ धीरानंद-‘‘वे स्वयं वहां उपस्थित थे। सावधान बच्चो! (भवानंद ने एक गोरे द्वारा आहत होकर उसे आहत किया) वे कल्याणी को गीता पढ़ा रहे थे, उसी समय तुम आ गए। सावधान!‘‘ (लेकिन इसी समय भवानंद का दाहिना हाथ भी कट गया।) भवानंद-"मेरी मृत्यु का समाचार उन्हे देना। कहना- मै अविश्वासी नही हूं।‘‘ धीरानंद आंखो से आंसू भरे हुए युद्ध कर रहे थे। बोले-‘‘यह वे जानते है। उन्होने मुझसे कह दिया है कि भवानंद के पास रहना, आज वह मरेगा। मृत्यु के समय उससे कहना कि मै आशीर्वाद देता हूं, परलोक मे तुम्हे बैकुण्ठ प्राप्त होगा।‘‘ भवानंद ने कहा-"संतानो की जय हो ! मुझे एक बार मरते समय 'वन्देमातरम्' गीत तो सुनाओ।‘‘ इस पर धीरानंद की आज्ञा पाकर समस्त उन्मत्त संतानो ने एक साथ 'वन्देमातरम्' गीत गाया। इससे उनकी भुजाओ मे दूना बल आ गया। इतनी देर मे अवशिष्ट गोरो का वध हो चुका था। रणक्षेत्र मे एक भी शत्रु न रह गया। हा! रमणी के रूप-लावण्य !....इस संसार मे तुझे ही धिक्कार हैं ! रण-विजय के उपरान्त नदी तट पर सत्यानंद को घेरकर विजयी सेना विभिन्न उत्सवो मे मत्त हो गयी। केवल सत्यानन्द दुःखी थे, भवानन्द के लिए।
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:
अब तक संतानो के पास कोई रण-वाद्य नही था। अब न मालूम कहां से हजारो नगाड़े, ढोल, भेरी, शहनाई, तुरी, रामसिंघा, दमामा आ गये। तुमुल ध्वनि से नदी, तटभूमि और जंगल कांप उठा। इस प्रकार संतानो ने बहुत देर तक विजय का उत्सव मनाया। उत्सव के उपरांत सत्यानन्द स्वामी ने कहा-‘‘आज भगवान सदय हुए है; संतानो की विजय हुई है; धर्म की जय हुई है। लेकिन अभी एक बात बाकी है। जो हमलोगो के साथ इस उत्सव में शरीक न हो सके, जिन्होने हमारे उत्सव के लिए प्राण उत्सर्ग किए किए है, उन्हे हम लोगो को भूलना न चाहिए-विशेषतः उस वीराग्रगण्य भवानन्द को, जिसके अदम्य रण-कौशल से आज हमारी विजय हुई है। चलो, उसके प्रति हमलोग अपना अन्तिम कर्त्तव्य कर आएं।‘‘ यह सुनते ही संतानगण बड़े समारोह से ‘वन्देमातरम‘ आदि जय-ध्वनि करते हुए रणक्षेत्र मे पहुंचे। वहां उन लोगो ने चंदन-चिता सजा कर आदरपूर्वक भवानन्द की लाश सुलाई और आग लगा दी। इसके बाद वे लोग उस वीर की प्रदक्षिणा करते हुए ‘वन्देमातरम्‘ का गीत गाते रहे। संतान-सम्प्रदाय विष्णुभक्त है, वैष्णव सम्प्रदाय नही। अतः इनके शव जलाए ही जाते थे। इसके उपरांत उस कानन मे केवल सत्यानन्द, जीवानन्द, महेंद्र, नवीनानन्द और धीरानन्द रह गए। यह पांचो जन परामर्श के लिए बैठ गए। सत्यानन्द ने कहा-‘‘इतने दिनो से हम लोगो ने अपने सर्वकर्म, सर्वसुख त्याग रखे थे, आज यह व्रत सफल हुआ है। अब इस प्रदेश मे यवन सेना नही रह गयी है। जो थोड़ी-बहुत बच गयी है, वह एक क्षण भी हमारे सामने टिक नही सकती। अब तुम लोग क्या परामर्श देते हो?‘‘ जीवानन्द ने कहा-‘‘चलिये, इसी समय चलकर राजधानी पर अधिकार करे।‘‘ सत्यानन्द-‘‘मेरा भी ऐसा मत है।‘‘ धीरानन्द-‘‘सेना कहां है?‘‘ जीवानन्द-‘‘क्यो, यही सेना!‘‘ धीरानन्द-‘‘यही सेना है कहां? किसी को देख रहे है?‘‘ जीवानन्द-‘‘स्थान-स्थान पर ये लोग विश्राम कर रहे होगे; डंके पर चोट पड़ते ही इकट्ठे हो जाएंगे।‘‘ धीरानन्द-‘‘एक आदमी भी न पा सकेगे।‘‘ सत्यानन्द-‘‘क्यो?‘‘ धीरानन्द-‘‘सब इस समय लूट-पाट मे व्यस्त हैं। इस समय सारे गांव आरक्षित है। मुसलमानो के गांव और रेशम की कोठी लूटने के बाद ही वे लोग घर लौटेंगे। अभी किसी को न पाएंगे, मै देख आया हूं।‘‘ सत्यानन्द दुखी हुए बोले-‘‘जो भी हो, इस समय यह समूचा प्रदेश हमारे अधिकार मे आ गया है। अब यहां कोई हमारा प्रतिद्वन्द्वी नही है। अतएव इस वीरेन्द्र भूमि मे तुम लोग अपना सन्तान-राज्य प्रतिष्ठित करो। प्रजा से कर वसूल करो और सैन्य-संग्रह करो। हिन्दुओ का राज्य हो गया है, यह सुनकर बहुतेरी संतान-सैन्य तुम्हारे झण्डे के नीचे आ जाएगी।‘‘ इस पर जीवानन्द आदि ने सत्यानन्द को प्रणाम किया और कहा-‘‘यदि आज्ञा हो महाराजाधिराज! तो हम लोग इसी जंगल मे आपका सिंहासन स्थापित कर सकते है।‘‘ सत्यानन्द ने अपने जीवन मे यह प्रथम बार क्रोध प्रकट किया बोले-‘‘क्या कहा? क्या मुझे केवल कच्चा घड़ा ही समझ लिया है? हमलोग कोई राजा नही है, हम केवल संन्यासी है। इस प्रदेश के राजा स्वयं बैकुण्ठनाथ है, जहां प्रजातन्त्र-राज्य स्थापित होगा। नगर अधिकारी के बाद तुम्ही लोग कार्यकर्ता होगे। मै तो ब्रह्मचर्य-शक्ति के अतिरिक्त और कुछ भी स्वीकार न करूंगा। अब तुम लोग अपने-अपने काम मे लगो।‘‘
इस पर चारो व्यक्ति प्रणाम करने के बाद उठ गए। सत्यानंद ने इशारे से महेन्द्र को बैठे रहने के लिए कहा, अतः वे तीनो चले गए। अब सत्यानंद ने महेन्द्र से कहा- "तुम लोगो ने विष्णुमण्डप मे शपथ ग्रहण का सनातन धर्म स्वीकार किया था। भवानन्द और जीवानंद दोनो ने ही प्रतिज्ञा भंग की है। भवानन्द ने स्वीकृत प्रायश्चित कर लिया। हमे इस बात का भय है कि कही जीवानन्द भी किसी दिन प्रायश्चित न कर बैठे। लेकिन मेरा किसी निगूढ़ कारणवश विश्वास है कि वह अभी ऐसा न करेगा। अकेले तुम्ही ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की है। अब संतानो का कार्योद्धार हो गया है। तुम्हारी प्रतिज्ञा थी कि जब तक संतानो का कार्योद्धार न होगा, स्त्री-कन्या का मुंह न देखोगे। अब कार्योद्धार हो चुका है, अतः तुम फिर संसारी हो सकते हो।" महेन्द्र की आंखो से आंसू की धारा बह निकली। बड़े कष्ट से महेन्द्र ने कहा- "महाराज! किसे लेकर संसारी बनूं? स्त्री ने आत्म हत्या कर ली, कन्या कहां है- पता नही! कहां-कहां खोजता फिरूंगा? कुछ भी तो नही जानता।" इस पर सत्यानंद ने नवीनानंद को बुलाकर कहा- "महेद्र, ये नवीनानंद गोस्वामी है- बहुत ही पवित्रचेता और मेरे परम प्रिय शिष्य है। तुम्हारी कन्या की खोज कर देगे।" कहकर सत्यानंद ने शांति से कुछ इशारे से कहा। शांति समझकर प्रणाम कर विदा होना चाहती थी, इसी समय महेद्र ने कहा-"तुम्हारे साथ कहां मुलाकात होगी?" शांति ने कहा- "मेरे आश्रम मे आइये।" यह कहकर शांति आगे-आगे चली। महेद्र भी सत्यानंद की पदवंदना कर विदा हुए, फिर शांति के साथ-साथ उसके आश्रम मे उपस्थित हुए? उस समय काफी रात बीत चुकी थी। फिर भी विश्राम न कर शांति ने नगर की तरफ यात्रा की। सबके चले जाने पर सत्यानंदन भूमि पर प्रणत होकर भगवान की वंदना और याद करने लगे। पौ फट रही थी। इसी समय किसी ने आकर उनके मस्तक का स्पर्श कर कहा- "मैं आ गया हूं।" ब्रह्मचारी ने उठकर और चकित व्यग्रभाव से कहा- "आप आ गए क्या!" जो आए थे उन्होने कहा- "दिन पूरे हो गए।" ब्रह्मचारी ने कहा- "हे प्रभु! आज क्षमा कीजिए। आगामी माघी पूर्णिका को मै आपकी आज्ञा का पालन करूंगा।" उस रात को हरिध्वनि के तुमुल नाद से प्रदेश भूमि परिपूर्ण हो गई। संतानो के दल-के-दल उस रात यत्र- तत्र 'वंदेमातरम' और 'जय जगदीश हरे' के गीत गाते हुए घूमते रहे। कोई शत्रु-सेना का शस्त्र तो कोई वस्त्र लूटने लगा। कोई मृत देह के मुंह पर पदाघात करने लगा, तो कोई दूसरी तरह का उपद्रव करने लगा, कोई गांव की तरफ तो कोई नगर की तरफ पहुंचकर राहगीरो और गृहस्थो को पकड़कर कहने लगा- "वंदेमातरम कहो, नही तो मार डालूंगा।" कोई मैदा-चीनी की दुकान लूट रहा था, तो कोई ग्वालो के घर पहुंचकर हांडी भर दूध ही छीनकर पीता था। कोई कहता- "हम लोग ब्रज के गोप आ पहुंचे, गोपियां कहां है?" उस रात मे गांव- गांव मे, नगर-नगर मे महाकोलाहल मच गया। सभी चिल्ला रहे थे- " मुसलमान हार गये; देश हम लोगो का हो गया। भाइयो! हरि-हरि कहो!"-गांव मे मुसलमान दिखाई पड़ते ही लोग खदेड़कर मारते थे। बहुतेरे लोग दलबद्ध होकर मुसलमानो की बस्ती मे पहुंचकर घरो मे आग लगाने और माल लूटने लगे। अनेक मुसलमान दाढ़ी मुंढ़वाकर देह मे भस्मी रमाकर राम-राम जपने लगे। पूछने पर कहते- "हम हिंदू है।" त्रस्त मुसलमानो के दल-के-दल नगर की तरफ भागे। राज-कर्मचारी व्यस्त हो गए। अवशिष्ट सिपाहियो को
सुसज्जित कर नगर रक्षा के लिए स्थान-स्थान पर नियुक्त किया जाने लगा। नगर के किले मे स्थान-स्थान पर, परिखाओ पर और फाटक पर सिपाही रक्षा के लिए एकत्रित हो गए। नगर के सारे लोग सारी रात जागकर “क्या होगा... क्या होगा?” करते रात बिताने लगे। हिंदू कहने लगे- “आने दो, संन्यासियो को आने दो- हिंदुओ का राज्य- भगवान करे- प्रतिष्ठित हो!” मुसलमान कहे लगे-“इतने रोज के बाद क्या सचमुच कुरानशरीफ झूठा हो गया? हम लोगो ने पांच वक्त नवाज पढ़कर क्या किया, जब हिंदुओ की फतह हुई। सब झूठ है!” इस तरह कोई रोता हुआ, तो कोई हंसता हुआ बड़ी उत्कंठा से रात बिताने लगा। यह खबर कल्याणी के कानो मे भी पहुंची आबाल-वृद्ध-वनिता किसी से भी बात छिपी न रही। कल्याणी ने मन-ही-मन कहा- “जय जगदीश हरे! आज तुम्हारा कार्य सिद्ध हुआ। आज मै स्वामी-दर्शन के लिए यात्रा करूंगी। हे प्रभु! आज मेरी सहायता करो।” गहरी रात को कल्याणी शय्या से उठी और उसने पहले खिड़की खोलकर राह देखी। राह सूनी पड़ी हुई थी- कोई राह मे न था। तब उसने धीरे से दरवाजा खोलकर गौरी देवी का घर त्यागा। शाही राह पर आकर उसने मन-ही-मन भगवान को स्मरण कर कहा- “देव! आज पदचिन्ह का दर्शन करा दो।” कल्याणी नगर के किनारे पहुंची। पहरेवाला ने आवाज दी- “कौन जाता है?” कल्याणी ने डरकर उत्तर दिया- “मै औरत हूं!” पहरेदार ने कहा- “जाने का हुक्म नही है।” वह आवाज जमादार के कान मे पहुंची। उसने कहा- “जाने की मनाही नही है; जाने की मनाही नहीं है।” यह सुनकर पहरेवाले ने कहा- “जाने की मनाही नही है, माई! जाओ, लेकिन आज रात को बड़ी आफत है। कौन जाने माई! किसी आफत मे पड़ जाओ- डाकुओ के हाथ मे पड़ जाओ, मै नही जानता? आज तो न जाना ही अच्छा है।” कल्याणी ने कहा- “बाबा! मै भिखारिन हूं। मेरे पास एक कौड़ी भी नहीं है। डाकू मुझे पकड़ कर क्या करेगे?” पहरेवाले ने कहा- “उम्र तो है, माई जी! उम्र तो है न! दुनिया मे वही तो जवाहरत है। बल्कि हमी डाकू हो सकते हैं!” कल्याणी ने देखा, बड़ी विपद है; वह धीरे से सरक गयी और फिर तेजी से आगे बढ़ी! पहरेदार ने देखा कि औरत रसिक मिजाज नही थी, लाचार होकर पहरे पर बैठा गांजे का दम लगाकर ही संतुष्ट हो गया। उस रात राह मे दल-के-दल घूम रहे थे। कोई मार-मार कहता है, तो कोई भागो-भागो चिल्लाता है। कोई हंसता है, कोई रोता है, कोई राह मे किसी को देखकर पकड़ लेता है। कल्याणी बड़ी विपदा मे पड़ी। राह मालूम नही, और फिर किसी से पूछ भी नही सकती, केवल छिपती हुई राह चलने लगी। छिपते-छिपते एक विद्रोही दल के हाथ मे पड़ गई। वे लोग चिल्लाकर पकड़ने दौड़े। कल्याणी प्राण लेकर जंगल के अंदर घुसकर भागी। वे सब शोर मचाते हुए पकड़ने के लिए पीछे दौड़े। आखिर एक ने आंचल पकड़ लिया, बोला- “वाह री, चंद्रमुखी!” इसी समय एक और आदमी अकस्मात पहुंच गया और अत्याचारी को उसने एक लाठी जमायी; वह आहत होकर भागा। परित्राणकर्ता का वेश संन्यासियो का था और उसकी छाती ढंकी हुई थी! उसने कल्याणी से कहा- “तुम भय न करो। मेरे साथ आओ- कहां जाओगी?” कल्याणी-“पदचिह्न।” आगंतुक चौंक उठा, विस्मित हुआ; पूछा- “क्या कहा? पदचिह्न?” यह कहकर कल्याणी के दोनो कन्थो पर हाथ रखकर गौर से चेहरा देखने लगा। कल्याणी अकस्मात पुरुष-स्पर्श से भयभीत तथा रोमांचित होकर रोने लगी। इतनी हिम्मत नही हुई कि भाग सके। आगन्तुक ने भरपूर देख लेने के बाद कहा- “ओ हो, पहचान गया! तुम्ही डायन कल्याणी हो?” कल्याणी ने भयविह्वल होकर पूछा-“आप कौन है?”
आगन्तुक ने कहा, "मै तुम्हारा दासानुदास हूं। हे सुन्दरी! मुझ पर प्रसन्न हो।" कल्याणी बड़ी तेजी से वहां से हटकर गर्जन कर बोली- "क्या यह अपमान के लिए ही आपने मेरी रक्षा की थी? देखती हूं, ब्रह्मचारियो का क्या यही धर्म है? आज मैं निःसहाय हूं, नही तो तुम्हारे चेहरे पर लात लगाती।" ब्रह्मचारी ने कहा- "अयि स्मितवदने! मैं बहुत दिनो से तुम्हारे पुष्प समान कोमल शरीर के आलिंगन की कामना कर रहा हूं?" यह कहकर दौड़कर ब्रह्मचारी ने कल्याणी को पकड़ लिया और जबर्दस्ती छाती से लगा लिया। अब कल्याणी खिलखिला कर हंस पड़ी, बोली "यह तुम्हारा कपाल है। पहले ही कह देना था- भाई, मेरी भी यही दशा है।" शान्ति ने पूछा- "क्यो भाई! महेन्द्र की खोज मे चली हो?" कल्याणी ने कहा-"तुम कौन हो? तुम तो सब कुछ जानती हो!" शान्ति बोली- "मै ब्रह्मचारी हूं, सन्तान -सेना का अधिनायक -घोरतर वीर पुरुष! मैं सब जानता हूं आज राह मे सिपाहियो का बहुत हुड़दंग ऊधम है, अतः आज तुम पदचिन्ह जा न सकोगी!" कल्याणी रोने लगी। शान्ति ने त्योरी बदलकर कहा-"डरती क्यो हो? हम अपने नयनबाणो से हजारो का वध कर सकते हैं- चलो, पदचिन्ह चले।" कल्याणी ने ऐसी बुद्धिमती स्त्री की सहायता पाकर मानो हाथ बढ़ाकर स्वर्ग पा लिया। बोली- "तुम जहां कहोगी, वही चलूंगी।" शान्ति कल्याणी को लेकर जंगली राह से चल पड़ी। झ्रध्रह्वघ्रजब आधी रात को शान्ति अपना आश्रम त्यागकर नगर की तरफ चली, तो उस समय जीवानंद वहां उपस्थित थे। शान्ति ने जीवानंद से कहा- "मै नगर की तरफ जाती हूं । महेन्द्र की स्त्री को ले आऊंगी। तुम महेन्द्र से कह रखो कि तुम्हारी स्त्री जीवित है।" जीवानंद ने भवानंद से कल्याणी के जीवन की सारी बाते सुनी थी और उसका वर्तमान वास-स्थान भी सुन चुके थे। क्रमशः ये सारी बाते महेन्द्र को सुनाने लगे। पहले तो महेन्द्र को विश्वास न हुआ। अन्त मे अपार आनंद से अभिभूत अवाक हो रहे। उस रात के बीतने पर सबेरे, शान्ति की सहायता से महेन्द्र के साथ कल्याणी की मुलाकात हुई । निस्तब्ध जंगल के बीच अतिघनी शालतस् श्रेणी की अंधेरी छाया के बीच, पशु-पक्षियो की निद्रा टूटने के पहले उन लोगों का परस्पर मिलन हुआ। म्लान अरण्य मे फूटनेवाली पहली आभामयी किरणे और नक्षत्रराज ही साक्षी थे। दूर शिला-संघर्षिणी नदी का कलकल प्रवाह हो रह था तो कही अरुणोदय की लालिमा से प्रफुल्ल-हृदय कोकिल की कुहू ध्वनि सुनाई पड़ जाती थी। क्रमशः एक पहर दिन चढ़ा। वहां शांति और जीवानंद आये। कल्याणी ने शांति से कहा- "मै आप लोगो के हाथ बिना मूल्य के बिक चुकी हूं। मेरी कन्या का पता लगाकर मेरे उस उपकार को पूर्ण कीजिए।" शांति ने जीवानंद के चेहरे की तरफ देखकर कहा- "मै अब सोऊं गा। आठ पहर बीते, मैं बैठा तक नही । आखिर मैं भी पुरुष हूं!" कल्याणी जरा मुस्कुरा दी। जीवानंद ने महेन्द्र की तरफ देखकर कहा- "यह भार मेरे ऊपर रहा। आप लोग पदचिन्ह की यात्रा कीजिए- वही आपकी कन्या पहुंचा दूंगा!" जीवानंद भैरवीपुर-निवासी बहिन के पास से लड़की लाने चले। पर कार्य सरल न था!