छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 91, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७
| मुख्यं च प्राणं भेदगुणविशिष्ट- मुद्गीथं पश्यन्भूमानं मनसाभिगायतात् पूर्ववदावर्तयेत्यर्थः । बहवो वै मे मम पुत्रा भविष्यन्तीत्येवमभिप्रायः सन्नित्यर्थः । | समझना चाहिये । अतः तू वागादि और मुख्य प्राण इनकी दृष्टिसे उद्गीथको भेदगुणविशिष्ट देखता हुआ उसका मनसे बहुत्वरूपसे अभिगान अर्थात् पूर्ववत् आवर्तन कर । तात्पर्य यह है कि 'मेरे बहुत-से पुत्र होंगे' ऐसे अभिप्रायसे युक्त होकर [ उसकी उपासना कर ] । | | प्राणादित्यैकत्वोद्गीथदृष्टेरेकपुत्रत्वफलदोषेणापोदितत्वाद्रश्मिप्राणभेददृष्टेः कर्तव्यता चोद्यतेऽस्मिन्काण्डे बहुपुत्रफलत्वार्थम् ॥ ४ ॥ | एकपुत्रप्राप्तिरूप फलके दोषसे प्राण और आदित्यके एकत्वरूप उद्गीथदृष्टिकी निन्दा की जानेके कारण इस खण्डमें अनेक पुत्ररूप फलकी प्राप्तिके लिये रश्मि और प्राण इनकी भेददृष्टिका प्रतिपादन किया गया है ॥ ४ ॥ |
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प्रणव और उद्गीथका अभेद
अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इति होतृषदनाद्धैवापि दुरुद्गीतमनुसमाहरतीत्यनु समाहरतीति ॥ ५ ॥
निश्चय ही जो उद्गीथ है, वही प्रणव है तथा जो प्रणव है, वही उद्गीथ है—इस प्रकार [उपासना करके] उद्गाता होताके कर्ममें किये हुए उद्गानसम्बन्धी दोषका अनुसन्धान (संशोधन) करता है, अनुसन्धान करता है ॥ ५ ॥