छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७
| मुख्यं च प्राणं भेदगुणविशिष्ट- मुद्गीथं पश्यन्भूमानं मनसाभिगायतात् पूर्ववदावर्तयेत्यर्थः । बहवो वै मे मम पुत्रा भविष्यन्तीत्येवमभिप्रायः सन्नित्यर्थः । | समझना चाहिये । अतः तू वागादि और मुख्य प्राण इनकी दृष्टिसे उद्गीथको भेदगुणविशिष्ट देखता हुआ उसका मनसे बहुत्वरूपसे अभिगान अर्थात् पूर्ववत् आवर्तन कर । तात्पर्य यह है कि 'मेरे बहुत-से पुत्र होंगे' ऐसे अभिप्रायसे युक्त होकर [ उसकी उपासना कर ] । | | प्राणादित्यैकत्वोद्गीथदृष्टेरेकपुत्रत्वफलदोषेणापोदितत्वाद्रश्मिप्राणभेददृष्टेः कर्तव्यता चोद्यतेऽस्मिन्काण्डे बहुपुत्रफलत्वार्थम् ॥ ४ ॥ | एकपुत्रप्राप्तिरूप फलके दोषसे प्राण और आदित्यके एकत्वरूप उद्गीथदृष्टिकी निन्दा की जानेके कारण इस खण्डमें अनेक पुत्ररूप फलकी प्राप्तिके लिये रश्मि और प्राण इनकी भेददृष्टिका प्रतिपादन किया गया है ॥ ४ ॥ |
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प्रणव और उद्गीथका अभेद
अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इति होतृषदनाद्धैवापि दुरुद्गीतमनुसमाहरतीत्यनु समाहरतीति ॥ ५ ॥
निश्चय ही जो उद्गीथ है, वही प्रणव है तथा जो प्रणव है, वही उद्गीथ है—इस प्रकार [उपासना करके] उद्गाता होताके कर्ममें किये हुए उद्गानसम्बन्धी दोषका अनुसन्धान (संशोधन) करता है, अनुसन्धान करता है ॥ ५ ॥
८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| ८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| अथ खलु य उद्गीथ इत्यादि प्रणवोद्गीथैकत्वदर्शनमुक्तं तस्यैतत्फलमुच्यते—होतृषदनाद्धोता यत्रस्थः शंसति तत्स्थानं होतृषदनं हौत्रात्कर्मणः सम्यक्प्रयुक्तादित्यर्थः । न हि देशमात्रात् फलमाहर्तुं शक्यम् । किं तत् ? हैवापि दुरुद्गीतं दुष्टमुद्गीतमुद्गानं कृतमुद्गात्रा स्वकर्मणि क्षतं कृतमित्यर्थः, तदनुसमाहरत्यनुसंदधत इत्यर्थः । चिकित्सयेव धातुवैषम्यसमीकरणमिति ॥ ५ ॥ | 'अथ खलु य उद्गीथः' इत्यादि वाक्यसे प्रणव और उद्गीथकी एकताका प्रतिपादन किया गया है । उसीका यह फल बतलाया जाता है—होतृषदनात्—जहाँ स्थित होकर होता शंसन कर्म करता है उस स्थानका नाम होतृषदन है, [ उससे ] अर्थात् सम्यक् प्रकारसे अनुष्ठान किये हुए होताके कर्मसे—क्योंकि केवल देशमात्रसे किसी फलकी प्राप्ति नहीं हो सकती । क्या होता है ? उद्गाताद्वारा जो दुरुद्गीत–दोषयुक्त उद्गान किया होता है अर्थात् अपने कर्ममें कोई दोष किया होता है उसका वह (उद्गाता) समाहार अर्थात् अनुसन्धान (सुधार) कर देता है, जिस प्रकार कि चिकित्साद्वारा धातुओंकी विषमताको ठीक कर दिया जाता है ॥ ५ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये पञ्चमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ५ ॥
षष्ठ खण्ड
अनेक प्रकारकी आधिदैविक उद्गीथोपासनाएँ
| अथेदानीं सर्वफलसंपत्त्यर्थमुद्गीथस्य उपासनान्तरं विधित्स्यते— | *अब समस्त फलकी प्राप्तिके लिये श्रुति उद्गीथसम्बन्धिनी अन्य प्रकारकी उपासनाओंका विधान करना चाहती है। |
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इयमेवर्गग्निः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳसाम तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयत इयमेव साग्निरमस्तत्साम ॥ १॥
यह (पृथिवी) ही ऋक् है और अग्नि साम है। वह यह [अग्निसंज्ञक] साम इस ऋक्में अधिष्ठित है। अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। यह पृथिवी ही 'सा' है और अग्नि 'अम' है; इस प्रकार ये [दोनों मिलकर] साम हैं ॥१॥
| इयमेव पृथिवी ऋक्, ऋचि पृथिवीदृष्टिः कार्या। तथाग्निः साम, सामन्यग्निदृष्टिः। कथं पृथिव्यग्न्योर्ऋक्सामत्वम् ? इत्युच्यते—तदेतत्तदेतदग्न्याख्यं सामैतस्यां पृथिव्यामृच्यध्यूढमधिगतमुपरिभावेन स्थितमित्यर्थः, | यह पृथिवी ही ऋक् है, अर्थात् ऋक्में पृथिवीदृष्टि करनी चाहिये। तथा अग्नि साम है, साममें अग्निदृष्टि करनी चाहिये। पृथिवी और अग्नि ऋक् एवं साम किस प्रकार हैं ? सो बतलाया जाता है—यह जो अग्नि-संज्ञक साम है, इस पृथिवीसंज्ञक ऋक्-में अध्यूढ—अधिगत अर्थात् उपरि-भावसे स्थित है, जिस प्रकार कि साम |
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* यहाँतक पुत्रादिप्राप्तिरूप एकदेशीय फलवाली उपासनाओंका वर्णन किया गया है।
६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| ६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| ऋचीव साम । तस्मादत एव कारणादृच्यध्यूढमेव साम गीयत इदानीमपि सामगैः ।<br><br>यथा च ऋक्सामनी नात्यन्तं भिन्ने अन्योन्यं तथैतौ पृथिव्याग्नी । कथम् ? इयमेव पृथिवी सा सामनामार्धशब्दवाच्या । इतरार्धशब्दवाच्योऽग्निरमस्तदेतत्पृथिव्यग्निद्वयं सामैकशब्दाभिधेयत्वमापन्नं साम । तस्मान्नान्योन्यं भिन्नं पृथिव्यग्निद्वयं नित्यसंश्लिष्टमृक्सामनी इव। तस्माच्च पृथिव्यग्न्योर्ऋक्सामत्वमित्यर्थः ।<br><br>सामाक्षरयोः पृथिव्यग्निदृष्टिविधानार्थमियमेव साग्निरम इति केचित् ॥ १ ॥ | ऋक्में अधिष्ठित रहता है । अतः इस समय भी सामगान करनेवाले द्विजोंद्वारा ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है ।<br><br>जिस प्रकार ऋक् और साम परस्पर अत्यन्त भिन्न नहीं हैं, उसी प्रकार ये पृथिवी और अग्नि भी अत्यन्त भिन्न नहीं हैं । यह किस प्रकार ? [ सो बतलाते हैं— ] यह पृथिवी ही ‘सा’—‘साम’ नामके आधे शब्दद्वारा प्रतिपाद्य है तथा उसके अन्य नामार्ध ‘अम’ शब्दका वाच्य अग्नि ‘अम’ है । इस प्रकार ‘साम’ इस एक शब्दके वाच्यत्वको प्राप्त हुए वे ही ये पृथिवी और अग्नि दोनों साम कहे जाते हैं । अतः ऋक् और सामके समान सर्वदा मिले-जुले रहनेके कारण ये पृथिवी और अग्नि एक-दूसरेसे भिन्न नहीं हैं । भाव यह कि इसीसे पृथिवी और अग्निको ऋक् एवं साम कहा गया है । किन्हीं-किन्हींका मत है कि ‘साम’ शब्दके अक्षरोंमें पृथिवी और अग्निदृष्टिका विधान करनेके लिये ही ‘इयमेव सा अग्निरमः’ ऐसा उपदेश किया गया है ॥ १ ॥ |
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खण्ड ६] शाङ्करभाष्यार्थ ९१
अन्तरिक्षमेवर्ग्यायुः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳ साम । तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयतेऽन्तरिक्षमेव सा वायुरमस्तत्साम ॥ २ ॥
अन्तरिक्ष ही ऋक् है और वायु साम है। वह यह साम इस ऋक्में अधिष्ठित है; अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। अन्तरिक्ष ही 'सा' है और वायु 'अम' है। इस प्रकार ये [ दोनों मिलकर ] साम हैं ॥ २ ॥
द्यौ रेवर्गादित्यः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳ साम। तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयते। द्यौरेव सादित्योऽमस्तत्साम ॥ ३ ॥
द्यौ ही ऋक् है और आदित्य साम है। वह यह [ आदित्यरूप ] साम इस [ द्यौरूप ] ऋक्में अधिष्ठित है अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। द्यौ ही 'सा' है और आदित्य 'अम' है। इस प्रकार ये [ दोनों मिलकर ] साम हैं ॥ ३ ॥
| अन्तरिक्षमेवर्ग्यायुः सामेत्यादि पूर्ववत् ॥ २-३ ॥ | अन्तरिक्ष ही ऋक् है और वायु साम है इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिये ॥ २-३ ॥ |
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नक्षत्राण्येवर्क्चन्द्रमाः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳसाम । तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयते । नक्षत्राण्येव सा चन्द्रमा अमस्तत्साम ॥ ४ ॥
नक्षत्र ही ऋक् हैं और चन्द्रमा साम है। वह यह [ चन्द्रमारूप ] साम इस [ नक्षत्ररूप ] ऋक्में अधिष्ठित है। अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। नक्षत्र ही 'सा' है और चन्द्रमा 'अम' है, इस प्रकार ये [ दोनों मिलकर ] साम हैं ॥ ४ ॥
५२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| ५२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| नक्षत्राणामधिपतिश्चन्द्रमा<br>अतः स साम ॥ ४ ॥ | चन्द्रमा नक्षत्रोंका अधिपति है इसलिये [नक्षत्रोंके ऋक्स्थानीय होनेपर] वह साम है ॥ ४ ॥ |
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अथ यदेतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत्साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳसाम । तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयते ॥ ५ ॥
तथा यह जो आदित्यकी शुक्लज्योति है वही ऋक् है और उसमें जो नीलवर्ण अत्यन्त श्यामता दिखायी देती है वह साम है । वह यह [ नीलवर्णरूप ] साम इस [ शुक्लज्योतीरूप ] ऋक्में अधिष्ठित है । अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है ॥ ५ ॥
| अथ यदेतदादित्यस्य शुक्लं भाः शुक्ला दीप्तिः सैवर्क् । अथ यदादित्ये नीलं परः कृष्णं परोऽतिशयेन कार्ष्ण्यं तत्साम, तद्ध्येकान्तसमाहितदृष्टेर्दृश्यते ॥ ५ ॥ | तथा यह जो आदित्यकी शुक्ल प्रभा—शुक्ल दीप्ति है वही ऋक् है । तथा आदित्यमें जो नीलवर्ण अत्यन्त श्यामता है वह साम है; किन्तु वह तो एकमात्र समाहित दृष्टिवाले पुरुषको ही दिखायी देती है ॥ ५ ॥ |
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अथ यदेवैतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैव साथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्तत्सामाथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात्सर्व एव सुवर्णः ॥ ६ ॥
तथा यह जो आदित्यका शुक्ल प्रकाश है वही 'सा' है और जो नीलवर्ण अत्यन्त श्यामता है वही 'अम' है, ये ही दोनों मिलकर साम हैं। तथा यह
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९३
जो आदित्यमण्डलके अन्तर्गत सुवर्णमय-सा पुरुष दिखायी देता है, जो सुवर्णके समान श्मश्रुओंवाला (दाढ़ी-मूँछोंवाला) और स्वर्णसदृश केशोंवाला है तथा जो नखपर्यन्त सारा-का-सारा सुवर्ण-सा ही है ॥ ६ ॥
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| ते एवैते भाः शुक्लकृष्णत्वे सा चामश्च साम। अथ य एषोऽन्तरादित्य आदित्यस्यान्तर्मध्ये हिरण्मयो हिरण्मय इव हिरण्मयः। न हि सुवर्णविकारत्वं देवस्य संभवति ऋक्सामगेष्णत्वापहतपाप्मत्वासंभवात्। न हि सौवर्णेऽचेतने पाप्मादिप्राप्तिरस्ति येन प्रतिषिध्येत। चाक्षुषे चाग्रहणात्। अतो लुप्तोपम एव हिरण्मयशब्दो ज्योतिर्मय इत्यर्थः। उत्तरेष्वपि समाना योजना। | वे ही ये शुक्लत्व एवं कृष्णत्वरूप प्रकाश क्रमशः 'सा' और 'अम' होनेके कारण साम हैं। तथा यह जो आदित्यके अन्तर्गत—आदित्यके मध्यमें हिरण्मय—सुवर्णमयके सदृश होनेके कारण सुवर्णमय [साक्षात् सुवर्णका नहीं], क्योंकि सूर्यदेवका सुवर्णके विकाररूप होना, सम्भव नहीं है; [विकाररूप होनेपर] उनका ऋक् एवं सामरूप पंखोंवाला तथा निष्पाप होना सम्भव न होगा; क्योंकि सुवर्णमय अचेतन पदार्थोंमें तो पाप आदिकी सम्भावना ही नहीं है, जिसके कारण उनका प्रतिषेध किया जाय। इसके सिवा, नेत्रस्थ उपास्य पुरुषमें सुवर्णविकारत्वका ग्रहण भी नहीं किया जाता। इसलिये यह हिरण्मय शब्द लुप्तोपम ही है* अतः इसका अर्थ ज्योतिर्मय है। आगेके हिरण्मयादि शब्दोंका अर्थ भी इसीके समान लगाना चाहिये। |
* अर्थात् इसके आगे उपमावाचक 'इव' शब्दका लोप हुआ है।
९४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
९४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
| पुरुषः पुरि शयनात्पूरयति वा स्वेनात्मना जगदिति, दृश्यते निवृत्तचक्षुर्भिः समाहितचेतोभिर्ब्रह्मचर्यादिसाधनापेक्षैः । तेजस्विनोऽपि श्मश्रुकेशादयः कृष्णाः स्युरित्यतो विशिनष्टि— हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश इति । ज्योतिर्मयान्येवास्य श्मश्रूणि केशाश्चेत्यर्थः । आप्रणखात्प्रणखो नखाग्रं नखाग्रेण सह सर्वः सुवर्ण इव भारूप इत्यर्थः ॥ ६ ॥ | [ ऐसा जो हिरण्मय ] पुरुष, [ शरीररूप ] पुरमें शयन करनेके कारण अथवा अपनेद्वारा सारे जगत्-को पूर्ण करता है इसलिये यह पुरुष कहलाता है, जिनकी इन्द्रियाँ बाह्य विषयोंसे निवृत्त हो गयी हैं उन समाहित चित्त और ब्रह्मचर्यादि-साधनवान् पुरुषोंको दिखायी देता है—तेजस्वी होनेपर भी उसके दाढ़ी-मूँछ आदि तो काले ही होंगे, अतः श्रुति उसकी विशेषता बतलाती है—जो सुनहली श्मश्रु और सुनहले केशोंवाला है; अर्थात् इसके दाढ़ी-मूँछ और केश भी ज्योतिर्मय ही हैं । तात्पर्य यह है कि यह नख-पर्यन्त अर्थात् नखाग्रसे लेकर सारा-का-सारा सुवर्णके समान प्रकाशस्वरूप ही है ॥ ६ ॥ |
तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी तस्योदिति नाम स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदित उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद ॥ ७ ॥
उसके दोनों नेत्र बन्दरके बैठनेके स्थान (गुदा) के सदृश अरुण वर्णवाले पुण्डरीक (कमल) के समान हैं । उसका 'उत' ऐसा नाम है, क्योंकि वह सम्पूर्ण पापोंसे ऊपर गया हुआ है ! जो इस प्रकार जानता है वह निश्चय ही सम्पूर्ण पापोंसे ऊपर उठ जाता है ॥ ७ ॥
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| तस्यैवं सर्वतः सुवर्णवर्णस्याप्य- | इस प्रकार · सब ओरसे सुवर्ण- |
| वर्ण होनेपर भी उसके नेत्रोंमें एक | |
| क्ष्णोर्विशेषः । कथम् ? तस्य | विशेषता है । किस प्रकार ? उस |
| देवके, जैसा कि कप्यास होता है | |
| यथा कपेर्मर्कटस्यासः कप्यासः, | उसके सदृश लाल पुण्डरीक (कमल)के |
| समान अत्यन्त तेजस्वी नेत्र हैं। कपि- | |
| आसेरुपवेशनार्थस्य करणे घञ्, | मर्कट (बंदर) के आसका नाम |
| कप्यास है; उपवेशन (बैठने) अर्थके | |
| कपिपुष्ठान्तो येनोपविशति । | वाचक 'आस्' धातुसे करणमें 'घञ्' |
| प्रत्यय होनेपर 'आस' शब्द सिद्ध | |
| कप्यास इव पुण्डरीकमत्यन्त- | होता है । अतः 'कप्यास' का अर्थ |
| वानरकी पीठका अन्तिम भाग (गुदा) | |
| तेजस्वि, एवमस्य देवस्या- | है, जिससे कि वह बैठता है । |
| [यहाँ 'पुण्डरीक' को 'कप्यास' से | |
| क्षिणी । उपमितोपमानत्वान्न | उपमित किया गया है और नेत्रोंको |
| पुण्डरीककी उपमा दी गयी है; इस | |
| हीनोपमा । | प्रकार] उपमितोपमान होनेके कारण |
| यह हीनोपमा नहीं है । | |
| तस्यैवं गुणविशिष्टस्य गौण- | ऐसे गुणवाले उस आदित्यान्तर्गत |
| मिदं नामोदिति। कथं गौणत्वम् ? | पुरुषका 'उत' यह गौण नाम है । |
| इसकी गौणता किस-प्रकार है ? | |
| स एष देवः सर्वेभ्यः पाप्मभ्यः | वह यह देव सम्पूर्ण पापोंसे अर्थात् |
| पाप्मना सह तत्कार्येभ्य इत्यर्थः। | पापोंसहित उनके कार्योंसे उदित |
| अर्थात् ऊपर गया हुआ है, इसलिये | |
| 'य आत्मापहतपाप्मा' इत्यादि | वह 'उत' नामवाला है । जैसा कि |
| वक्ष्यति । उदित उद् इत उद्गत | 'जो आत्मा पापसे हटा हुआ है' |
| इत्यादिरूपसे श्रुति आगे कहेगी । | |
| इत्यर्थः, अतोऽसावुन्नामा । | ऐसे गुणसे युक्त उस 'उत' नामवाले |
| तमेवंगुणसंपन्नमुन्नामानं यथोक्तेन | पुरुषको जो पूर्वोक्त प्रकारसे जानता |
| प्रकारेण यो वेद सोऽप्येवमेवो- | है वह भी इसी प्रकार सम्पूर्ण |
९६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १
९६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १ XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX
| देत्युद्गच्छति सर्वेभ्यः पाप्मभ्यः। हं वा इत्यवधारणार्थौ निपातौ उदेत्येवेत्यर्थः ॥ ७ ॥ | पापोंसे ऊपर उठ जाता है। 'ह' और 'वै' ये निश्चयार्थक निपात हैं—अर्थात् ऊपर उठ ही जाता है ॥ ७ ॥ |
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| तस्योद्गीथत्वं देवस्यादित्या-<br>दीनामिव विवक्षितत्वादाह— | आदित्यादिके समान उस [ उद्-<br>संज्ञक ] देवका उद्गीथत्व कहना<br>इष्ट होनेके कारण श्रुति कहती है— |
तस्यर्क् साम च गेष्णौ तस्मादुद्गीथस्तस्मात्त्वे-<br>वोद्गातैतस्य हि गाता । स एष ये चामुष्मात्पराञ्चो<br>लोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां चेत्यधिदैवतम् ॥ ८ ॥
उस देवके ऋक् और साम—ये दोनों पक्ष हैं। इसीसे वह देव उद्गीथरूप है, और इसीसे [ इसका गान करनेवाला ] उद्गाता कहलाता है, क्योंकि वह इस (उत्) का ही गान करनेवाला होता है। वह यह उत् नामक देव जो इस ( आदित्यलोक ) से ऊपरके लोक हैं और जो देवताओंकी कामनाएँ हैं, उनका शासन करता है। यह अधिदैवत उद्गीथोपासना है ॥ ८ ॥
| तस्यर्क् साम च गेष्णौ<br><br>पृथिव्याद्युक्तलक्षणे पर्वणी ।<br><br>सर्वात्मा हि देवः। परापरलोक<br><br>कामेशितृत्वादुपपद्यते पृथिव्य-<br><br>ग्न्यादृक्सामगेष्णत्वम्, सर्वयो-<br><br>नित्वाच्च । | उस देवके ऋक् और साम गेष्ण हैं अर्थात् पूर्वोक्त पृथिवी और अग्नि आदि उसके दोनों पक्ष हैं, क्योंकि वह देव सर्वरूप है। वह परलोक और इहलोकसम्बन्धी कामनाओंका शासन करनेवाला है; अतः उसका पृथिवी और अग्नि आदिरूप ऋक् और साममय पंखोंसे युक्त होना उचित ही है। तथा सबका कारण होनेसे भी [ उसका ऋक्-सामरूप पक्षोंवाला होना उचित है ] । |
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| यत एवमुन्नामा चासावृक्सामगेष्णश्च तस्मादृक्सामगेष्णत्वप्राप्तमुद्गीथत्वमुच्यते परोक्षेण परोक्षप्रियत्वाद्देवस्य, तस्मादुद्गीथ इति। तस्मात्त्वेव हेतोरुदं गायतीत्युद्गाता। तस्माद्ध्येतस्य यथोक्तस्योन्नाम्नो गातासावतो युक्तोद्गातेति.नामप्रसिद्धिरुद्गातुः। | इस प्रकार क्योंकि वह 'उत्' नामवाला है तथा ऋक् और साम उसके पक्ष हैं, इसलिये ऋक्-साम-रूप पक्षोंवाला होनेसे उसमें प्राप्त उद्गीथत्वका परोक्षरूपसे प्रतिपादन हो जाता है; क्योंकि वह देव परोक्ष प्रिय* है। इसलिये वह उद्गीथ है ऐसा कहा। इसी हेतुसे, क्योंकि [यज्ञमें उद्गान करनेवाला] उत्का गान करता है इसलिये वह उद्गाता कहलाता है। इस प्रकार क्योंकि वह उपर्युक्त 'उत्' नामक देवका गान करता है इसलिये उद्गाताका 'उद्गाता' ऐसा नाम प्रसिद्ध होना उचित ही है। |
| स एष देव उन्नामा ये चामुष्मादादित्यात्पराञ्चः परागञ्चनादूर्ध्वा लोकास्तेषां लोकानां चेष्टे न केवलमीशितृत्वमेव चशब्दाद्धारयति च, “स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमाम्” (यजु० २५। १०) इत्यादिमन्त्रवर्णात्। किं च देवकामानामीष्ट इत्येतदधिदैवतं देवताविषयं देवस्योद्गीथस्य स्वरूपमुक्तम् ॥ ८ ॥ | वही यह उत् नामक देव इस आदित्यलोकसे परे जानेके कारण जो पराङ् यानी ऊपरके लोक हैं उन लोकोंका ईश्वर (शासक) है। वह केवल शासनकर्ता ही नहीं है 'च' शब्दसे यह भी सिद्ध होता है कि वह उनका धारण भी करता है; जैसा कि “उसने इस पृथ्वीको और द्युलोक-को धारण किया” इत्यादि मन्त्रवर्णसे सिद्ध होता है। यही नहीं, वह देवताओंकी कामनाओंका भी शासक है-इस प्रकार यह उस देवका--उद्गीथका अधिदैवत--देवताविषयक स्वरूप कहा गया ॥ ८ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये षष्ठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥
* देवताओंकी परोक्षप्रियता 'परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विषः' इस श्रुतिसे प्रमाणित होती है।
सप्तम खण्ड
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अध्यात्म-उद्गीथोपासना
अथाध्यात्मं वागेवर्क्प्राणः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳसाम तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयते । वागेव सा प्राणोऽमस्तत्साम ॥ १ ॥
इससे आगे अध्यात्म उपासना है—वाणी ही ऋक् है और प्राण साम है। इस प्रकार इस [वाक्रूप] ऋक्में [प्राणरूप] साम अधिष्ठित है। अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। वाक् ही 'सा' है और प्राण 'अम' है। इस प्रकार ये [दोनों मिलकर] साम हैं ॥ १ ॥
| अथाधुनाध्यात्ममुच्यते—वागेवर्क्प्राणः साम, अधरोपरिस्थानत्वसामान्यात् । प्राणो घ्राणमुच्यते सह वायुना। वागेव सा प्राणोऽम इत्यादि पूर्ववत् ॥ १ ॥ | आधिदैविक उपासनाके पश्चात् अब अध्यात्म उपासनाका वर्णन किया जाता है—नीचे-ऊपर स्थान होनेमें तुल्य होनेके कारण वाक् ही ऋक् है और प्राण साम है। वायुके सहित घ्राणेन्द्रिय ही यहाँ प्राण कहा गया है। वाक् ही 'सा' है और प्राण 'अम' है इत्यादि कथन पूर्ववत् समझना चाहिये ॥ १ ॥ |
चक्षुरेवर्गात्मा साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳसाम तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयते । चक्षुरेव सात्मामस्तत्साम ॥ २ ॥
खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९
चक्षु ही ऋक् है और आत्मा साम है । इस प्रकार इस [चक्षुरूप] ऋक्में यह [आत्मारूप] साम अधिष्ठित है । इसलिये ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है । चक्षु ही 'सा' है और आत्मा 'अम' है । इस प्रकार ये [दोनों मिलकर] साम हैं ॥ २ ॥
| चक्षुरेव ऋक्, आत्मा साम, आत्मेतिच्छायात्मा तत्स्थत्वात्साम ॥ २ ॥ | चक्षु ही ऋक् है और आत्मा साम है। यहाँ 'आत्मा' शब्दसे छायात्माका ग्रहण है; क्योंकि वही नेत्रमें स्थित होनेके कारण साम है ॥ २ ॥ |
श्रोत्रमेवर्ङ्मनः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳसाम तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयते । श्रोत्रमेव सा मनोऽमस्तत्साम ॥ ३ ॥
श्रोत्र ही ऋक् है और मन साम है । इस प्रकार इस [श्रोत्ररूप] ऋक्में यह [ मनरूप ] साम अधिष्ठित है। अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। श्रोत्र ही 'सा' है और मन 'अम' है । इस प्रकार ये [ दोनों मिलकर ] साम हैं ॥ ३ ॥
| श्रोत्रमेवर्ङ्मनः साम, श्रोत्रस्याधिष्ठातृत्वान्मनसः सामत्वम्॥३॥ | श्रोत्र ही ऋक् है और मन साम है, श्रोत्रका अधिष्ठाता होनेके कारण मनकी सामरूपता है ॥ ३ ॥ |
अथ यदेतदक्षणः शुक्लं भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत्साम । तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳसाम । तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयते। अथ यदेवैतदक्षणः शुक्लं भाः सैव साथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्तत्साम ॥४॥
छा० उ० ४—
१०० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| १०० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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तथा यह जो आँखोंका शुक्ल प्रकाश है वह ऋक् है और जो नीलवर्ण अत्यन्त श्यामता है वह साम है। इस प्रकार इस [शुक्ल प्रकाशरूप] ऋक्में यह [नीलवर्ण अत्यन्त श्यामतारूप] साम अधिष्ठित है। अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। तथा यह जो नेत्रका शुक्ल प्रकाश है वही 'सा' है और जो नीलवर्ण परम श्यामता है वही 'अम' है। इस प्रकार ये [दोनों मिलकर] साम हैं ॥ ४ ॥
| अथ यदेतदक्षणः शुक्लं भाः सैवर्क्। अथ यन्नीलं परः कृष्णमादित्य इव दृक्शक्त्यधिष्ठानं तत्साम ॥ ४ ॥ | तथा यह जो नेत्रोंका शुक्ल प्रकाश है वही ऋक् है और जो सूर्यके समान दृक्शक्तिका अधिष्ठानभूत नीलवर्ण अतिशय श्यामत्व है वह साम है ॥ ४ ॥ |
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आदित्यान्तर्गत और नेत्रान्तर्गत पुरुषोंकी एकता
अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते सैवर्क्साम तदुक्थं तयजुस्तद्ब्रह्म। तस्यैतस्य तदेव रूपं यदमुष्य रूपं यावमुष्य गेष्णौ तौ गेष्णौ यन्नाम तन्नाम ॥५॥
तथा यह जो नेत्रोंके मध्यमें पुरुष दिखलायी देता है वही ऋक् है, वही साम है, वही उक्थ है, वही यजुः है और वही ब्रह्म (वेद) है। उस इस पुरुषका वही रूप है जो उस (आदित्यान्तर्गत पुरुष) का रूप है। जो उसके पक्ष हैं वही इसके पक्ष हैं, जो उसका नाम है वही इसका नाम है ॥ ५ ॥
खण्ड ७] शाङ्करभाष्यार्थ १०१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते, पूर्ववत् । सैवर्गध्यात्मं वागाद्या पृथिव्याद्या चाधिदैवतम् । प्रसिद्धा च ऋक्पादबद्धाक्षरात्मिका तथा साम । उक्थसाहचर्याद्वा स्तोत्रं साम ऋक् शस्त्रमुक्थादन्यत् । तथा यजुःस्वाहास्वधावषडादि सर्वमेव वाग्यजुस्तत्स एव; सर्वात्मकत्वात्सर्वयोनित्वाच्चेति ह्यवोचाम । ऋगादिप्रकरणात्तद्ब्रह्मेति त्रयो वेदाः । | तथा यह जो नेत्रोंके मध्यमें पुरुष दिखलायी देता है—इस वाक्यका तात्पर्य पूर्ववत् समझना चाहिये। वही वागादि अध्यात्म और पृथिवी आदि अधिदैवत ऋक् है, जिसके पाद नियत अक्षरोंसे बँधे होते हैं वह ऋक् तो प्रसिद्ध ही है—तथा वही साम है। अथवा [इन ऋक् और साम शब्दोंका अर्थ इस प्रकार समझना चाहिये—] उक्थका सहचारी होनेसे स्तोत्र ही साम है और उक्थसे भिन्न जो शस्त्र (मन्त्रविशेष) हैं वे ही ऋक् हैं; तथा स्वाहा, स्वधा और वषट् आदि सम्पूर्ण वाक्य ही यजुः है। सर्वात्मक और सबका कारण होनेके कारण वह यजुः स्वयं पुरुष ही है—ऐसा हम पहले कह चुके हैं। यहाँ ऋगादिका प्रकरण होनेसे 'वही ब्रह्म है' इस वाक्यमें [ब्रह्म-शब्दसे] तीनों वेद समझने चाहिये। |
| तस्यैतस्य चाक्षुषस्य पुरुषस्य तदेव रूपमतिदिश्यते । किं तत् ? यदमुष्यादित्यपुरुषस्य । हिरण्मय इत्यादि यदधिदैवतमुक्तम् । यावमुष्य गेष्णौ पर्वणी तावेवास्यापि चाक्षुषस्य गेष्णौ । यच्चामुष्य नामोदित्युद्गीथ इति च तदेवास्य नाम । | उस इस नेत्रस्थ पुरुषका वही रूप बतलाया जाता है। वह रूप क्या है? जो रूप उस आदित्यान्तर्गत पुरुषका था, जिसका कि हिरण्मय आदि अधिदैवतरूपसे वर्णन किया गया था। जो उस (आदित्यपुरुष) के पक्ष थे वे ही इस नेत्रान्तर्गत पुरुषके भी पक्ष हैं। जो उसके 'उत्' अथवा 'उद्गीथ' आदि नाम थे, वे ही इसके भी नाम हैं। |
१०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| १०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| स्थानभेदाद्रूपगुणनामातिदेशादीशितृत्वविषयभेदव्यपदेशाच्चादित्यचाक्षुषयोर्भेद इति चेत् ?<br><br>न; अमुनानेनैवेत्येकस्योभयात्मप्राप्त्यनुपपत्तेः । | यदि कहो कि आश्रयका भेद होनेसे, [ आदित्यान्तर्गत पुरुषके ] रूप, गुण और नामका ( चाक्षुष पुरुषमें ) अतिदेश¹ होनेसे तथा ईशितृत्व ( शासन ) के विषयोंका भेद बतलाये जानेके कारण आदित्य और नेत्रान्तर्गत पुरुषोंका भेद है— तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा माननेपर [ मन्त्र ७ और ८ में ] 'अमुना' 'अनेनैव' इन शब्दोंसे प्रतिपादित एकके ही द्वारा दोनोंकी प्राप्ति सम्भव नहीं होगी । | | द्विधाभावेनोपपद्यत इति चेत्, वक्ष्यति हि "स एकधा भवति त्रिधा भवति" इत्यादि, न, चेतनस्यैकस्य निरवयवत्वाद् द्विधाभावानुपपत्तेः। तस्मादध्यात्ममधिदैवतयोरेकत्वमेव ।<br><br>यत्तु रूपाद्यतिदेशो भेदकारणमवोचो न तद्भदावगमाय । किं तर्हि ? स्थानभेदाद् भेदाशङ्का मा भूदित्येवमर्थम् ॥ ५ ॥ | यदि कहो कि वह उन दोनोंको दो रूपसे प्राप्त होता है, जैसा कि "वह एकरूप होता है, वह तीन रूप होता है" इत्यादि रूपसे श्रुति कहेगी भी—तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि निरवयव होनेके कारण एक ही चेतनका दो रूप होना सम्भव नहीं है । अतः अध्यात्म और अधिदैवत—इन दोनोंकी एकता ही है ।<br><br>और तुमने जो रूपादिके अतिदेशको उनके भेदका कारण बतलाया, सो वह उनका भेद सूचित करनेके लिये नहीं है। तो वह किसलिये है? वह तो, आश्रयका भेद होनेसे कहीं उनके भेदकी आशङ्का न हो जाय—इसलिये है॥ ५ ॥ |
१. अन्यके धर्मोंको अन्यमें लगाना ।
खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३
स एष ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे मनुष्यकामानां चेति। तय इमे वीणायां गायन्त्येतं ते गायन्ति तस्मात्ते धनसनयः ॥ ६ ॥
वह यह ( चाक्षुष पुरुष ) जो इस ( अध्यात्म आत्मा ) से नीचेके लोक हैं उनका तथा मानवीय कामनाओंका शासन करता है । अतः जो ये लोग वीणामें गान करते हैं वे उसीका गान करते हैं इसीसे वे धनवान् होते हैं ॥ ६ ॥
| स एष चाक्षुषः पुरुषो ये चैतस्मादाध्यात्मिकादात्मनोऽर्वाञ्चोऽर्वाग्गता लोकास्तेषां चेष्टे मनुष्यसंबन्धिनां च कामानाम्। तत्तस्माद्य इमे वीणायां गायन्ति गायकास्त एतमेव गायन्ति । यस्मादीश्वरं गायन्ति तस्मात्ते धनसनयो धनलाभयुक्ता धनवन्त इत्यर्थः ॥ ६ ॥ | वह यह चाक्षुष पुरुष जो इस आध्यात्मिक आत्मासे नीचेके लोक हैं, उनका तथा मनुष्यसम्बन्धी कामनाओंका ईशन (शासन) करता है । अतः जो ये गायक लोग वीणामें गान करते हैं वे उसीका गान करते हैं । इस प्रकार क्योंकि वे ईश्वरका ही गान करते हैं, इसलिये वे धनलाभयुक्त अर्थात् धनवान् होते हैं ॥ ६ ॥ |
इनकी अभेददृष्टिसे उपासनाका फल
अथ य एतदेवं विद्वान्साम गायत्युभौ स गायति सोऽमुनैव स एष ये चामुष्मात्पराञ्चो लोकास्ताँश्चाप्नोति देवकामाँश्च ॥ ७ ॥
तथा जो इस प्रकार [ चाक्षुष और आदित्य दोनों पुरुषोंकी एकता ] जाननेवाला पुरुष सामगान करता है वह [ चाक्षुष और आदित्य ]
१०४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| १०४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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दोनोंका ही गान करता है। तथा वह इसके ही द्वारा जो इस (आदित्यलोक) से ऊपरके लोक हैं और जो देवताओंके भोग हैं, उन्हें प्राप्त करता है ॥ ७ ॥
| अथ य एतदेवं विद्वान्यथोक्तं देवमुद्गीथं विद्वान्साम गायत्युभौ स गायति चाक्षुषमादित्यं च । तस्यैवंविदः फलमुच्यते—सोऽमुनैवादित्येन स एष ये चामुष्मात्पराञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति आदित्यान्तर्गतदेवो भूत्वेत्यर्थो देवकामांश्च ॥ ७ ॥ | इस उपर्युक्त देवको जो इस प्रकार जाननेवाला पुरुष सामगान करता है वह चाक्षुष और आदित्य दोनों ही पुरुषोंको गाता है। इस प्रकार जाननेवाले उस उपासकको जो फल मिलता है वह बतलाया जाता है—वह यह उपासक इस आदित्यके द्वारा ही जो इससे ऊपरके लोक हैं उन्हें प्राप्त होता है। तात्पर्य यह है कि आदित्यान्तर्गत देवरूप होकर वह इन्हें और देवताओंके भोगोंको प्राप्त करता है ॥ ७ ॥ |
अथानेनैव ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति मनुष्यकामांश्च तस्मादु हैवंविदुद्गाता ब्रूयात् ॥ ८ ॥
कं ते काममागायानीत्येष ह्येव कामागानस्येष्टे य एवं विद्वान्साम गायति साम गायति ॥ ९ ॥
तथा इसीके द्वारा जो इससे नीचेके लोक हैं उन्हें और मनुष्यसम्बन्धिनी कामनाओंको प्राप्त करता है। अतः इस प्रकार जाननेवाला उद्गाता [यजमानसे इस प्रकार] कहे—॥ ८ ॥ 'मैं तेरे लिये किन इष्ट कामनाओंका आगान करूँ' क्योंकि यह उद्गाता कामनाओंके आगानमें समर्थ होता है, जो कि इस प्रकार जाननेवाला होकर सामगान करता है, सामगान करता है ॥ ९ ॥
| खण्ड ७ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १०५ |
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| अथानेनैव चाक्षुषेणैव ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति मनुष्यकामांश्च चाक्षुषो भूत्वेत्यर्थः । तस्मादु हैवंविदुद्गाता ब्रूयाद्यजमानं कमिष्ठं ते तव काममागायानीति । एष हि यस्मादुद्गाता कामागानस्योद्गानेन कामं संपादयितुमीष्टे समर्थ इत्यर्थः । कोऽसौ ? य एवं विद्वान्साम गायति साम गायति । द्विरुक्तिरुपासनसमाप्त्यर्था ॥ ८-९ ॥ | तथा इस चाक्षुष पुरुषके द्वारा ही, जो इससे नीचेके लोक हैं उन्हें मनुष्यसम्बन्धी भोगोंको वह प्राप्त करता है। अभिप्राय यह कि चाक्षुष पुरुष होकर ही उन सबको प्राप्त करता है। अतः इस प्रकार जाननेवाला उद्गाता यजमानसे कहे कि 'मैं तेरे लिये किन इष्ट कामनाओंका आगान करूँ ?' क्योंकि यह उद्गाता इष्टकामनासम्बन्धी आगानके उद्गानसे उन कामनाओंको सम्पन्न करनेमें समर्थ होता है। वह उद्गाता कौन है ! जो इस प्रकार जाननेवाला होकर साम गान करता है, साम गान करता है। यह द्विरुक्ति उपासनाकी समाप्तिके लिये है ॥८-९॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये
सप्तमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ७ ॥
अष्टम खण्ड
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उद्गीथोपासनाकी उत्कृष्टता प्रदर्शित करनेके लिये शिलक, दाल्भ्य और प्रवाहणका संवाद
| अनेकधोपास्यत्वादक्षरस्य प्रकारान्तरेण परोवरीयस्त्वगुणफलमुपासनान्तरमानिनाय । इतिहासस्तु सुखावबोधनार्थः । | उद्गीथसंज्ञक अक्षर (ओंकार) के अनेक प्रकारसे उपासनीय होनेके कारण श्रुति प्रकारान्तरसे उसकी उत्तरोत्तर उत्कृष्ट गुणविशिष्ट फलवाली एक अन्य उपासना प्रस्तुत करती है। यहाँ जो इतिहास दिया जाता है वह सरलतासे समझानेके लिये है। |
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त्रयो होद्गीथे कुशला बभूवुः शिलकः शालावत्यश्चैकितायनो दाल्भ्यः प्रवाहणो जैवलिरिति ते होचुरुद्गीथे वै कुशलाः स्मो हन्तोद्गीथे कथां वदाम इति ॥ १ ॥
कहते हैं, शालावान्का पुत्र शिलक, चिकितायनका पुत्र दाल्भ्य और जीवल्का पुत्र प्रवाहण—ये तीनों उद्गीथविद्यामें कुशल थे। उन्होंने परस्पर कहा—'हमलोग उद्गीथविद्यामें निपुण हैं; अतः यदि आपलोगोंकी अनुमति हो तो उद्गीथके विषयमें परस्पर वार्तालाप करें' ॥ १ ॥
| त्रयस्त्रिसंख्याकाः, ह इत्यैतिह्यार्थः, उद्गीथ उद्गीथज्ञानं प्रति कुशला निपुणा बभूवुः । | त्रयः—तीन संख्यावाले, ‘ह’ यह निपात इतिहासको सूचित करनेके लिये है, उद्गीथमें—उद्गीथविद्यामें कुशल—निपुण थे। तात्पर्य यह |
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