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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

[Page Header] ८८ हितोपदेशः [सुहृद्भेदः १४-

तमालोक्य वर्धमानोऽचिन्तयत्— ‘करोतु नाम नीतिज्ञो व्यवसायमितस्ततः । फलं पुनस्तदेवाप्यं यद्विधेर्मनसि स्थितम् ॥ १४ ॥ उसे देख कर वर्धमान चिंता करने लगा—‘नीति जानने वाला इधर उधर भले ही व्यापार करे, परंतु उसको लाभ उतना ही होता है कि जितना विधाताके जीमें है ॥ १४ ॥ किंतु,— विस्मयः सर्वथा हेयः प्रत्यूहः सर्वकर्मणाम् । तस्माद्विस्मयमुत्सृज्य साध्ये सिद्धिर्विधीयताम्’ ॥ १५ ॥ परंतु—सब कार्योंको रोकने वाले संशयको छोड़ देना चाहिये, एवं संदेहको छोड़ कर, अपना कार्य सिद्ध करना चाहिये’ ॥ १५ ॥ इति संचिन्त्य संजीवकं तत्र परित्यज्य वर्धमानः पुनः स्वयं धर्मपुरं नाम नगरं गत्वा महाकायमन्यं वृषभमेकं समानीय धुरि नियोज्य चलितः। ततः संजीवकोऽपि कथंकथमपि खुरत्रये भारं कृत्वोत्थितः। यह विचार कर संजीवकको वहां छोड़ कर-फिर वर्धमान आप धर्मपुर नाम नगरमें जा कर एक दूसरे बड़े शरीर वाले बैलको ला कर जुएमें जोत कर चल दिया। फिर संजीवकभी बड़े कष्टसे तीन खुरोंके सहारे उठ कर खडा हुआ। यतः,— निमग्नस्य पयोराशौ पर्वतात्पतितस्य च । तक्षकेणापि दष्टस्य आयुर्मर्माणि रक्षति ॥ १६ ॥ क्योंकि—समुद्रमें डूबे हुएकी, पर्वतसे गिरे हुएकी और तक्षक नाम सर्पसे डसे हुएकी आयुकी प्रबलता मर्म (जीवनस्थान) की रक्षा करती है ॥ १६ ॥ नाकाले म्रियते जन्तुर्विद्धः शरशतैरपि । कुशाग्रेणैव संस्पृष्टः प्राप्तकालो न जीवति ॥ १७ ॥ जो काल न होय तो सैकड़ों बाणोंके बिंधनेसेभी प्राणी नहीं मरता है और जो काल आ जाय तो केवल कुशाकी नोंकसे छूतेही मर जाता है ॥ १७ ॥

-१९ ] दैवकी समस्या ८९ अरक्षितं तिष्ठति दैवरक्षितं सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति । जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जितः कृतप्रयत्नोऽपि गृहे न जीवति ॥ १८ ॥ दैवसे रक्षा किया हुआ, विना रक्षाके भी ठहरता ( बच जाता ) है, और अच्छी तरह रक्षा किया हुआ भी, दैवका मारा हुआ नहीं बचता है, जैसे वनमें छोड़ा हुआ सहायहीनभी जीता रहता है, घर पर कई उपाय करनेसेभी नहीं जीता है ॥ १८ ॥ ततो दिनेषु गच्छत्सु संजीवकः स्वेच्छाहारविहारं कृत्वारण्यं भ्राम्यन् हृष्टपुष्टाङ्गो बलवन्ननाद । तस्मिन्वने पिङ्गलकनामा सिंहः स्वभुजोपार्जितराज्यसुखमनुभवन्निवसति । फिर कितनेही दिनोंके बाद संजीवक अपनी इच्छानुसार खाता पीता वनमें फिरता फिरता हृष्ट पुष्ट हो कर ऊंचे स्वरसे डकराने लगा; उसी बनमें पिंगलक नाम एक सिंह अपनी भुजाओं ( स्वबल ) से पाये हुए राज्यके सुखका भोग करता हुआ रहता था. तथा चोक्तम्— नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते मृगैः । विक्रमार्जितराज्यस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता ॥ १९ ॥ जैसा कहा है—मृगोंने सिंहका न तो राज्यतिलक किया और न संस्कार किया परंतु सिंह अपने आपही पराक्रमसे राज्यको पा कर मृगोंका राजा होना दिखला- ता है ॥ १९ ॥ स चैकदा पिपासाकुलितः पानीयं पातुं यमुनाकच्छमगच्छत् । तेन च तत्र सिंहेनाननुभूतपूर्वकमकालघनगर्जितमिव संजीवक- नर्दितमश्रावि । तच्छ्रुत्वा पानीयमपीत्वा स चकितः परिवृत्य स्वस्थानमागत्य किमिदमित्यालोचयस्तूष्णीं स्थितः । स च तथा- विधः करटकदमनकाभ्यामस्य मन्त्रिपुत्राभ्यां शृगालाभ्यां दृष्टः । तं तथाविधं दृष्ट्वा दमनकः करटकमाह—'सखे करटक ! किमित्य- यमुदकार्थी स्वामी पानीयमपीत्वा सचकितो मन्दं मन्दमव-

९० हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः २०- तिष्ठते ?' । करटको ब्रूते-'मित्र दमनक ! अस्मन्मतेनास्य सेवैव न क्रियते । यदि तथा भवति तर्हि किमनेन स्वामिचेष्टानिरूपणे- नास्माकम् ? यतोऽनेन राज्ञा विनाऽपराधेन चिरमवधीरिताभ्या- मावाभ्यां महद्दुःखमनुभूतम् । और वह एक दिन प्याससे व्याकुल होकर पानी पीनेके लिये यमुनाके किनारे पर गया । और वहां उस सिंहने नवीन कृन्ततुकालके मेघकी गर्जनाके समान संजीवकका डकराना सुना । यह सुन कर पानीके बिना पिये वह घबराया-सा लौट कर अपने स्थान पर आ कर 'यह क्या है ?' यह सोचता हुआ चुपसा बैठ गया । और उसके मंत्रीके बेटे दमनक और करटक दो गीदड़ोंने उसे वैसा बैठा देखा । उसको इस दशामें देख कर दमनकने करटकसे कहा-'भाई करटक ! यह क्या बात है कि, प्यासा स्वामी पानीको बिना पिये डरसे धीरे धीरे आ बैठा है ?' करटक बोला-'भाई दमनक ! हमारी समझसे तो इसकी सेवाही नहीं की जाती है । जो ऐसे बैठा भी है तो हमें स्वामीकी चेष्टाका निर्णय करनेसे क्या प्रयोजन है ? क्योंकि इस राजासे बिना अपराध बहुत काल तक तिरस्कार किये गये हम दोनोंने बड़ा दुःख सहा है ॥ सेवया धनमिच्छद्भिः सेवकैः पश्य यत्कृतम् । स्वातन्त्र्यं यच्छरीरस्य मूढैस्तदपि हारितम् ॥ २० ॥ सेवासे धनको चाहने वाले सेवकोंने जो किया सो देख कि शरीरकी स्वतंत्र- ताभी मूर्खोंने हार दी है ॥ २० ॥ अपरं च,— शीतवातातपक्लेशान्सहन्ते यान्पराश्रिताः । तदंशेनापि मेधावी तपस्तप्त्वा सुखी भवेत् ॥ २१ ॥ और दूसरे—जो पराधीन हो कर जाड़ा, हवा और धूपमें दुःखोंको सहते हैं उस दुःखके छोटेसे छोटे भागसे तप ( खलही दुःख सहन ) करके बुद्धिमान् सुखी हो सकता है ॥ २१ ॥ अन्यच्च,— एतावज्जन्मसाफल्यं यदनायत्तवृत्तिता । ये पराधीनतां यातास्ते वै जीवन्ति के मृताः ॥ २२ ॥

-२६ ] पराधीन जीवनकी निन्दा ९१ और-स्वाधीनताका होनाही जन्मकी सफलता है, और जो पराधीन होने परभी जीते ( कहलाते ) हैं तो मरे कौनसे हैं ? अर्थात् वेही मरेके समान हैं जो पराधीन हो कर रहते हैं ॥ २२ ॥ अपरं च,— एहि गच्छ पतोत्तिष्ठ वद् मौनं समाचर । एवमाशाग्रहग्रस्तैः क्रीडन्ति धनिनोऽर्थिभिः ॥ २३ ॥ और दूसरे-धनवान् पुरुष, आशारूपी ग्रहसे भरमाये गये हुए याचकोंके साथ, 'इधर आ, चला जा, बैठ जा, खड़ा हो, बोल, चुपसा रह' इस तरह खेल किया करते हैं ॥ २३ ॥ किंच,— अबुधैरर्थलाभाय पण्यस्त्रीभिरिव स्वयम् । आत्मा संस्कृत्य संस्कृत्य परोपकरणीकृतः ॥ २४ ॥ और जैसे वेश्या दूसरोंके लिये सिंगार करती है वैसेही मूर्खोंनेभी धनके लाभ- के लिये अपनी आत्माको संस्कार करके हृष्ट पुष्ट बनवा कर पराये उपकारके लिये कर रक्खी है ॥ २४ ॥ किंच,— या प्रकृत्यैव चपला निपतत्यशुचावपि । स्वामिनो बहु मन्यन्ते दृष्टिं तामपि सेवकाः ॥ २५ ॥ और जो दृष्टि स्वभावहीसे चपल है और मल, मूत्र आदि नीची वस्तुओं परभी गिरती है ऐसी स्वामीकी दृष्टिका सेवकलोग बहुत गौरव करते हैं ॥ २५ ॥ अपरं च,— मौनान्मूर्खः प्रवचनपटुर्वातुलो जल्पको वा क्षान्त्या भीरुर्यदि न सहते प्रायशो नाभिजातः । धृष्टः पार्श्वे वसति नियतं दूरतश्चाप्रगल्भः सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः ॥ २६ ॥ और चुपचाप रहनेसे मूर्ख, बहुत बातें करनेमें चतुर होनेसे उन्मत्त अथवा वातून, क्षमाशील होनेसे डरपोक, न सहन सकनेसे नीतिरहित (अकुलीन), सर्वदा पास रहनेसे ढीठ, और दूर रहनेसे घमंडी कहलाता है. इसलिये सेवाका धर्म बड़ा रहस्यमय है ( सब क्लेश सहन करनेवाले ) योगियोंसेभी पहचाना नहीं जा सका है ॥ २६ ॥

९२ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः २७- विशेषतश्च,— प्रणमत्युन्नतिहेतोर्जीवितहेतोर्विमुञ्चति प्राणान् । दुःखीयति सुखहेतोः, को मूढः सेवकादन्यः ? ॥ २७ ॥ और विशेष बात यह है कि—जो उन्नतिके लिये झुकता है, जीनेके लिये प्राणका भी त्याग करता है, और सुखके लिये दुःखी होता है, ऐसा सेवकको छोड़ और कौन भला मूर्ख हो सकता है?' ॥ २७ ॥ दमनको ब्रूते—'मित्र ! सर्वथा मनसापि नैतत्कर्तव्यम् । यतः,— कथं नाम न सेव्यन्ते यत्नतः परमेश्वराः । अचिरेणैव ये तुष्टाः पूरयन्ति मनोरथान् ॥ २८ ॥ दमनक बोला–'मित्र ! कभी यह बात मनसेभी नहीं करनी चाहिये, क्योंकि स्वामियोंकी सेवा यत्नसे क्यों नहीं करनी चाहिये, जो सेवासे प्रसन्न हो कर शीघ्र (सेवकके) मनोरथ पूरे कर देते हैं ॥ २८ ॥ अन्यच्च पश्य,— कुतः सेवाविहीनानां चामरोद्धूतसंपदः । उद्दण्डधवलच्छत्रं वाजिवारणवाहिनी' ॥ २९ ॥ और दूसरे देखो—स्वामीकी सेवा नहीं करने वालोंको चमरके डुलावसे युक्त ऐश्वर्य तथा ऊंचे दंड वाले श्वेत छत्र और घोड़े हाथियोंकी सेना कहां धरी है ? ॥ २९ ॥ करतको ब्रूते—'तथापि किमनेनास्माकं व्यापारेण ? यतोऽव्यापा- रेषु व्यापारः सर्वथा परिहरणीयः । करटक बोला–'तोभी हमको इस कामसे क्या प्रयोजन है ? क्योंकि अयोग्य कामोंमें व्यापार ( अनधिकृत चेष्टा ) करना सर्वथा त्यागनेके योग्य है ॥ पश्य,— अव्यापारेषु व्यापारं यो नरः कर्तुमिच्छति । स भूमौ निहतः शेते कीलोत्पाटीव वानरः' ॥ ३० ॥ देख–जो मनुष्य नहीं करनेके कामोंमें (पड़ना) व्यापार करना चाहता है वह कीलके उखाड़ने वाले बंदरकी तरह धरती पर मृत्युशायी होता है ॥ ३० ॥ दमनकः पृच्छति—कथमेतत् ?' । करटकः कथयति— दमनक पूछने लगा—'यह कथा कैसे है?' तब करटक कहने लगा।—

कथा २

-३१ ] अनधिकृत चेष्टाका परिणाम ९३

कथा २ [ अनधिकृत चेष्टा करने वाले बंदरकी कहानी २ ] 'अस्ति मगधदेशे धर्मारण्यसंनिहितवसुधायां शुभदत्तनाम्ना कायस्थेन विहारः कर्तुमारब्धः । तत्र करपत्रक्षार्यमाणैकस्तम्भस्य कियद्दूरस्फटितस्य काष्ठखण्डद्वयमध्ये कीलकः सूत्रधारेण निहितः । तत्र बलवान्वानरयूथः क्रीडन्नागतः । एको वानरः कालप्रेरित इव तं कीलकं हस्ताभ्यां धृत्वोपविष्टः । तत्र तस्य मुष्कद्वयं लम्बमानं काष्ठखण्डद्वयाभ्यन्तरे प्रविष्टम् । अनन्तरं स च सहजचपलतया महता प्रयत्नेन तं कीलकमाकृष्टवान् । आकृष्टे च कीलके चूर्णिताण्डद्वयः पञ्चत्वं गतः । अतोऽहं ब्रवीमि—"अव्यापारेषु व्यापारम्" इत्यादि' ॥ दमनको ब्रूते— 'तथापि स्वामिचेष्टानिरूपणं सेवकेनावश्यं करणीयम् ।'— करटको ब्रूते—'सर्वस्मिन्नधिकारे य एव नियुक्तः प्रधानमन्त्री स करोतु । यतोऽनुजीविना पराधिकारचर्चा सर्वथा न कर्तव्या । 'मगध देशमें धर्मारण्यके पास किसी प्रदेशमें शुभदत्त नामक कायस्थने एक मन्दिर बनवाना आरंभ किया । वहां आरेसे चीरा हुआ लट्ठा जो कितनीही दूर तक फट रहा था; उस काटके दोनों भागोंके बीचमें बढ़ईने कील ठोक दी थी । वहां बलवान् बन्दरोंका झुंड खेलता हुआ आया । एक बन्दर मृत्युसे प्रेरित हुएके समान उस लकड़ीकी खूंटीको दोनों हाथोंसे पकड़ कर बैठ गया । वहां उसके लटकते हुए दोनों अंडकोश, उस काटके दोनों भागोंकी संदमें लटक पड़े और फिर उसने स्वभावकी चंचलतासे बडे बड़े उपाय करके खूंटीको खींच लिया, और खूंटीको खींचतेही उसके दोनों अंडकोश पिचले जाने पर वह मर गया ॥ इसलिये मैं कहता हूं—"विना कामके कामोंमें पड़ना" इत्यादि' ॥ दमनकने कहा—'तोभी सेवकको स्वामीके कामका विचार अवश्य करना चाहिये ॥' करटक बोला—'जो सब काम पर अधिकारी प्रधान मंत्री हो वही करे । क्योंकि सेवकको पराये कामकी चर्चा कभी नहीं करनी चाहिये ॥ पश्य,— पराधिकारचर्चां यः कुर्यात् स्वामिहितेच्छया । स विषीदति चीत्काराद्गर्दभस्ताडितो यथा ॥ ३१ ॥

दमनक पूछने लगा— ‘यह कथा कैसे है ?’ करटक कहने लगा ।—

९४ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ३१- देख, — जो स्वामीके हितकी इच्छासे पराये अधिकारकी चर्चा करता है वह रेंकनेसे मारे गये गधेकी तरह मारा जाता है ॥ ३१ ॥ दमनकः पृच्छति — ‘कथमेतत् ?’ । करटको ब्रूते— दमनक पूछने लगा— ‘यह कथा कैसे है ?’ करटक कहने लगा ।— कथा ३ [ धोबी, धोबन, गधा और कुत्तेकी कहानी ३ ] ‘अस्ति वाराणस्यां कर्पूरपटको नाम रजकः । स चाभिनववय- स्कया वध्वा सह चिरं निधुवनं कृत्वा निर्भरमालिङ्गय प्रसुप्तः । तदनन्तरं तद्गृहद्रव्याणि हर्तुं चौरः प्रविष्टः । तस्य प्राङ्गणे गर्दभो बद्धस्तिष्ठति, कुक्कुरश्चोपविष्टोऽस्ति । अथ गर्दभः श्वानमाह— ‘सखे ! भवतस्तावदयं व्यापारः । तत्किमिति त्वमुच्चैः शब्दं कृत्वा स्वामिनं न जागरयसि ?’ कुक्कुरो ब्रूते—‘भद्र ! मम नियोगस्य चर्चा त्वया न कर्तव्या । त्वमेव किं न जानासि यथा तस्याहर्निशं गृहरक्षां करोमि । यतोऽयं चिरान्निर्वृतो ममोपयोगं न जानाति । तेनाधुनापि ममाहारदाने मन्दादरः । यतो विना विधुरदर्शनं स्वामिन उपजीविषु मन्दादरा भवन्ति ।’ ‘बनारसमैं एक कर्पूरपटक नामक धोबी रहता था। वह नवजवान अपनी स्त्रीके साथ बहुत काल तक विलास करके, और अत्यन्त छातीसे चिपटा कर सो गया । इसके बाद उसके घरके द्रव्यको चुरानेके लिये चोर अंदर घुसा । उसके आंग- नमें एक गधा बंधा था और एक कुत्ता भी बैठा था । इतनेमें गधेने कुत्तेसे कहा-‘मित्र ! यह तेरा काम है, इसलिये क्यों नहीं ऊंचे शब्दसे भोंक कर स्वामीको जगाता है ?’ कुत्ता बोला-‘भाई ! मेरे कामकी चर्चा तुझे नहीं करनी चाहिये, और क्या तू सचमुच नहीं जानता है कि जिसप्रकार मैं उनके घरकी रखवाली रातदिन करता हूं, पर वैसा वह बहुत कालसे निश्चित होकर मेरे उपयोगको नहीं मानता है; इसलिये आजकल वह मेरे आहार देनेमें भी आदर ( फिक्र ) कम करता है । क्योंकि बिना आपत्तिके देखें स्वामी सेवकों पर थोड़ा आदर करते हैं ।

-३४ ] अनधिकृत चेष्टाका उपाख्यान ९५ गर्दभो ब्रूते—‘शृणु रे बर्बर ! याचते कार्यकाले यः स किंभृत्यः स किंसुहृत् ।’ गधा बोला—‘सुन रे मूर्ख ! जो कामके समय पर माँगे वह निन्दित सेवक और निन्दित मित्र है.’ कुकुरो ब्रूते— ‘भृत्यान्संभाषयेद्यस्तु कार्यकाले स किंप्रभुः ॥ ३२ ॥ कुत्ता बोला-‘जो काम अटकने पर सेवकोंसे ( केवल अपने स्वार्थके खातर ) मीठी मीठी बातें करे वह तो निन्दित स्वामी है ॥ ३२ ॥ यतः,— आश्रितानां भृतौ स्वामिसेवायां धर्मसेवने । पुत्रस्योत्पादने चैव न सन्ति प्रतिहस्तकाः’ ॥ ३३ ॥ क्योंकि आश्रितोंके पालन-पोषणमें, स्वामीकी सेवामें, धर्मकी सेवा (आचरण) करनेमें, और पुत्रके उत्पन्न करनेमें, प्रतिनिधि (एवजी) नहीं होते हैं अर्थात् ये काम अपने आपही करनेके हैं, दूसरेसे करानेके योग्य नहीं हैं’ ॥ ३३ ॥ ततो गर्दभः सकोपमाह—‘अरे दुष्टमते ! पापीयांस्त्वं यद्विपत्तौ स्वामिकार्यं उपेक्षां करोषि । भवतु तावत्, यथा स्वामी जाग- रिष्यति तन्मया कर्तव्यम् । फिर गधा झुंझला कर बोला-‘अरे दुष्टबुद्धि ! तू बड़ा पापी है, कि विपत्तिमें स्वामीके कामकी अवहेलना करता है । ठीक, जिस किसी भी प्रकार से स्वामी जग जावे ऐसा मैं तो अवश्य करूँगा ॥ यतः,— पृष्ठतः सेवयेदर्कं जठरेण हुताशनम् । स्वामिनं सर्वभावेन परलोकममायया’ ॥ ३४ ॥ क्योंकि—पीठके बल धूप खाय, पेटके बल अग्निसे तापे, स्वामीकी सब प्रकारसे (वफादारीसे) और परलोककी बिना कपटसे सेवा करनी चाहिये ॥३४॥ इत्युक्त्वातीव चीत्कारशब्दं कृतवान् । ततः स रजकस्तेन ची- त्कारेण प्रबुद्धो निद्राभङ्गकोपादुत्थाय गर्दभं लगुडेन ताडया- मास । तेनासौ पञ्चत्वमगमत् । अतोऽहं ब्रवीमि—"पराधि-

९६ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ३५-

कारचर्चाम्" इत्यादि ॥ पश्य । पशूनामन्वेषणमेवास्मन्नियोगः । स्वनियोगचर्चा क्रियताम् । ( विमृश्य) किंत्वद्य तया चर्चया न प्रयोजनम् । यत आवयोर्भक्षितशेषाहारः प्रचुरोऽस्ति ।' दमनकः सकोपमाह—'कथमाहारार्थी भवान्केवलं राजानं सेवते ? एतदयुक्तमुक्तं त्वया । यह कह कर उसने अत्यंत रेंकनेका शब्द किया । तब वह धोबी उसके चिल्लानेसे जाग उठा और नींद टूटनेके क्रोधके मारे उठ कर लकड़ीसे गधेको मारा कि जिससे वह मर गया । इसलिये मैं कहता हूं-"पराये अधिकारकी चर्चाको" इत्यादि ॥ देख-पशुओंका ढूंढना हमारा काम है ॥ अपने कामकी चर्चा करो । ( सोच कर ) परन्तु आज उस चर्चासे कुछ प्रयोजन नहीं ॥ क्योंकि अपने दोनोंके भोजनसे बचा हुआ आहार बहुत धरा है ।' दमनक क्रोधसे बोला-‘क्या तुम केवल भोजनकेही अर्थी हो कर राजाकी सेवा करते हो ? यह तुमने अयोग्य कहा । यतः,— सुहृदामुपकारकारणा- द्विषतामप्यपकारकारणात् । नृपसंश्रय इष्यते बुधै- र्जठरं को न बिभर्ति केवलम् ॥ ३५ ॥ क्योंकि-मित्रोंके उपकारके लिये, और शत्रुओंके अपकारके लिये चतुर मनुष्य राजाका आश्रय करते हैं (याने अपने मित्र या आप्तके हितके लिये और शत्रुके नाशके लियेही राजाश्रय किया जाता है ) और केवल पेट कौन नहीं भर लेता हैं ? अर्थात् सभी भरते हैं ॥ ३५ ॥ जीविते यस्य जीवन्ति विप्रा मित्राणि बान्धवाः । सफलं जीवितं तस्य आत्मार्थे को न जीवति ? ॥ ३६ ॥ जिसके जीनेसे ब्राह्मण, मित्र और भाई जीते हैं उसीका जीवन सफल है और केवल अपने (स्वार्थके) लिये कौन नहीं जीता है ? ॥ ३६ ॥ अपि च,— यस्मिञ्जीवति जीवन्ति बहवः स तु जीवतु । काकोऽपि किं न कुरुते चञ्च्वा स्वोदरपूरणम् ? ॥ ३७ ॥

-४१ ] सेवाधर्मकी निन्दा और पराक्रमकी प्रशंसा ९७ औरभी-जिसके जीनेसे बहुतसे लोग जिये वह तो सचमुच जिया, और यों तो काकभी क्या चोंचसे अपना पेट नहीं भर लेता है ? ॥ ३७ ॥ पश्य,— पञ्चभिर्याति दासत्वं पुराणैः कोऽपि मानवः । कोऽपि लक्षैः कृती कोऽपि लक्षैरपि न लभ्यते ॥ ३८ ॥ देख-कोई मनुष्य पांच पुराण में दासपनेको करने लगता है, कोई लाख में करता है और कोई एक लाखमेंभी नहीं मिलता है ॥ ३८ ॥ अन्यच्च,— मनुष्यजातौ तुल्यायां भृत्यत्वमतिगर्हितम् । प्रथमो यो न तत्रापि स किं जीवत्सु गण्यते ? ॥ ३९ ॥ और दूसरे-मनुष्योंको समान जातिमें सेवकाई काम करना अति निन्दित है और सेवकोंमेंभी जो प्रथम अर्थात् सबका मुखिया नहीं है क्या वह जीते हुओंमें गिना जा सकता है ? अर्थात् उसका जीना और मरना समान है ॥ ३९ ॥ तथा चोक्तम्,— वाजिवारणलोहानां काष्ठपाषाणवाससाम् । नारीपुरुषतोयानामन्तरं महदन्तरम् ॥ ४० ॥ जैसा कहा है-घोड़ा, हाथी, लोहा, काष्ठ, पत्थर, वस्त्र, स्त्री, पुरुष और जल इस प्रत्येकमें बड़ा अन्तर है ॥ ४० ॥ तथा हि, स्वल्पमप्यतिरिच्यते । और उसी प्रकार-थोड़ा बहुतभी गिना जाता है. स्वल्पस्नायुवसावशेषमलिनं निर्मांसमप्यस्थिकं श्वा लब्ध्वा परितोषमेति न भवेत्तस्य क्षुधः शान्तये । सिंहो जम्बुकमङ्कगं तमपि त्यक्त्वा निहन्ति द्विपं, सर्वः कृच्छ्रगतोऽपि वाञ्छति जनः सत्त्वानुरूपं फलम्॥४१॥ कुत्ता थोड़ी नस तथा चरबीसे मलिन विना मांसकी हड्डीको पा कर उसीमें संतोष कर लेता है, कुछ उससे उसकी भूख दूर नहीं होती है; और सिंह गोदमें आये हुए सियारको भी छोड़ कर हाथीको मारता है इसलिये सब प्राणी क्लेशको सह कर भी अपने पराक्रमके अनुसार फलकी इच्छा करते हैं ॥ ४१ ॥ १ पुराण=८० कौडी याने एक पैसा; ६४ कौडीका एक पैसा माना जाता है. हि० ७

९८ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ४२- अपरं च, सेव्यसेवकयोरन्तरं पश्य,— लाङ्गूलचालनमधश्चरणावपातं भूमौ निपत्य वदनोदरदर्शनं च । श्वा पिण्डदस्य कुरुते गजपुंगवस्तु धीरं विलोकयति चाटुशतैश्च भुङ्क्ते ॥ ४२ ॥ और दूसरे—स्वामी और सेवकका भेद देखो-कुत्ता, टुकड़ा देने वालोंके सामने पूंछको हिलाता है, उसके चरणोंमें गिरता है, धरती पर लेट कर अपना मुख और पेट दिखाया करता है, परन्तु श्रेष्ठ हाथी तो स्वामीको धीरजसे देखता है, और सौ सौ उपाय करनेसे खाता है ॥ ४२ ॥ किंच,— यज्जीव्यते क्षणमपि प्रथितं मनुष्यै- र्विज्ञानविक्रमयशोभिरभज्यमानम् । तन्नाम जीवितमिह प्रवदन्ति तज्ज्ञाः काकोऽपि जीवति चिराय बलिं च भुङ्क्ते ॥ ४३ ॥ और शास्त्रज्ञान, पराक्रम, तथा यशसे विख्यात होकर जो मनुष्य क्षणभर भी जीते हैं, उसी जीनेको इस दुनियामें पण्डित लोग सफल कहते हैं, और यों तो काकभी बहुत दिन तक जीता है और खुराक खाता है ॥ ४३ ॥ अपरं च,— यो नात्मजे न च गुरौ न च भृत्यवर्गे दीने दयां न कुरुते न च बन्धुवर्गे । किं तस्य जीवितफलेन मनुष्यलोके काकोऽपि जीवति चिराय बलिं च भुङ्क्ते ॥ ४४ ॥ और दूसरा—जो न पुत्र पर, न गुरु पर, न सेवकों पर, और न दीन बांधवों पर दया करता है उसके जीनेके फलसे मनुष्यलोकमें क्या है, और यों तो काकभी बहुत काल तक जीता है और बलि खाता है अर्थात् केवल पेट भरनाही जीवनका फल नहीं है ॥ ४४ ॥

-४७] मनुष्यकी उन्नति और अवनति ९९ अपरमपि, — अहितहितविचारशून्यबुद्धेः श्रुतिसमयैर्बहुभिस्तिरस्कृतस्य । उदरभरणमात्रकेवलेच्छोः पुरुषपशोश्च पशोश्च को विशेषः ?' ॥ ४५ ॥ औरभी-हित और अहितके विचार करनेमें जडमति वाला, और शास्त्रके ज्ञानसे रहित होकर जिसकी इच्छा केवल पेट भरनेकी ही रहती है, ऐसा पुरुषरूपी पशु और सचमुच पशुमें कौनसा अन्तर समझा जा सकता है ? अर्थात् ज्ञानहीन एवं केवल भोजनकी इच्छा रखने वालेसे घास खाकर जीने वाला पशु अच्छा है ॥ ४५ ॥ करटको ब्रूते—'आवां तावदप्रधानौ। तदप्यावयोः किमनया विचारणया ?'। दमनको ब्रूते—'कियता कालेनामात्याः प्रधा- नतामप्रधानतां वा लभन्ते । करटक बोला-'हम दोनों मंत्री नहीं हैं फिर हमें इस विचारसे क्या ?' दमनक बोला-'कुछ कालमें मंत्री प्रधानता वा अप्रधानताको पाते हैं । यतः,— न कस्यचित्कश्चिदिह स्वभावा- द्भवत्युदारोऽभिमतः खलो वा । लोके गुरुत्वं विपरीततां वा स्वचेष्टितान्येव नरं नयन्ति ॥ ४६ ॥ क्योंकि—इस दुनियामें कोई किसीका स्वभावसे अर्थात् जन्मसे सुशील अथ- वा दुष्ट नहीं होता है; परन्तु मनुष्यको अपने कर्मही बड़पनको अथवा नीचपन- को पहुंचाते हैं ॥ ४६ ॥ किंच,— आरोप्यते शिला शैले यत्नेन महता यथा । निपात्यते क्षणेनाधस्तथात्मा गुणदोषयोः ॥ ४७ ॥ और जैसे पर्वत पर बड़े यत्नसे पाषाणकी सिला चढ़ाई जाती है और छिनभ- रमें ढुलका दी जाती है वैसेही मनुष्यके चित्तकी वृत्तिभी गुण और दोषमें लगाई और हटा ली जाती है अर्थात् मनुष्यकी उन्नति कठिनतासे और अवनति सहज- में हो सकती है ॥ ४७ ॥

१०० हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ४८- यात्यधोऽधो व्रजत्युच्चैर्नरः स्वैरेव कर्मभिः । कूपस्य खनिता यद्वत्प्राकारस्येव कारकः ॥ ४८ ॥ मनुष्य अपनेही कर्मोंसे कुएके खोदने वालेके समान नीचे और राजभवनके बनाने वालेके समान ऊपर जाता है; अर्थात् मनुष्य अपना उच्च (अच्छे) कर्मोंसे उन्नतिको और हीन (खराब) कर्मोंसे अवनतिको पाता है ॥ ४८ ॥ तद्भद्रम् । स्वयत्नायत्तो ह्यात्मा सर्वस्य ।' करटको ब्रूते—'अथ भवान्किं ब्रवीति ?' । स आह—'अयं तावत्स्वामी पिङ्गलकः कुतोऽपि कारणात्सचकितः परिवृत्योपविष्टः ।' करटको ब्रूते— 'किं तत्त्वं जानासि ?' । दमनको ब्रूते—'किमत्राविदितमस्ति ? इसलिये यह ठीक है कि सबकी आत्मा अपनेही यत्नके आधीन रहती है।' करटक बोला-'तुम अब क्या कहते हो?' वह बोला-'यह स्वामी पिंगलक किसी न किसी कारणसे घबराया-सा लौट करके आ बैठा है।' करटकने कहा-'क्या तुम इसका भेद जानते हो?' दमनक बोला-'इसमें नहीं जाननेकी क्या बात है ? उक्तं च,— उदीरितोऽर्थः पशुनापि गृह्यते हयाश्च नागाश्च वहन्ति देशिताः । अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धयः ॥ ४९ ॥ और कहा है—जताए हुए अभिप्रायको पशुभी समझ लेता है और हांके हुए घोड़े और हाथीभी बोझा ढोते हैं। पण्डित कहे बिनाही मनकी बात तर्कसे जान लेता है; क्योंकि पराये चित्तका भेद जान लेनाही बुद्धियोंका फल है ॥ ४९ ॥ आकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषणेन च । नेत्रवक्त्रविकारेण लक्ष्यतेऽन्तर्गतं मनः ॥ ५० ॥ आकारसे, हृदयके भावसे, चालसे, कामसे, बोलनेसे और नेत्र और मुंहके विकारसे, औरोंके मनकी बात जान ली जाती है ॥ ५० ॥ अत्र भयप्रस्तावे प्रज्ञाबलेनाहमेनं स्वामिनमात्मीयं करिष्यामि । इस भयके सुझावमें बुद्धिके बलसे मैं इस स्वामीको अपना कर लूंगा ॥

-५५ ] सेवकका उचित कर्तव्य १०१ यतः,— प्रस्तावसदृशं वाक्यं सद्भावसदृशं प्रियम् । आत्मशक्तिसमं कोपं यो जानाति स पण्डितः' ॥ ५१ ॥ क्योंकि—जो प्रसंगके समान वचनको, स्नेहके सदृश मित्रको और अपनी सामर्थ्यके सदृश क्रोधको समझता है वह बुद्धिमान् है' ॥ ५१ ॥ करटको ब्रूते—'सखे ! त्वं सेवानभिज्ञः । करटक बोला—'मित्र ! तुम सेवा करना नहीं जानते हो । पश्य,— अनाहूतो विशेद्यस्तु अपृष्टो बहु भाषते । आत्मानं मन्यते प्रीतं भूपालस्य स दुर्मतिः' ॥ ५२ ॥ देखो—जो मनुष्य विना बुलाये घुसे, और विना पूछे बहुत बोलता है, और अपनेको राजाका प्रिय मित्र समझता है वह मूर्ख है' ॥ ५२ ॥ दमनको ब्रूते—'भद्र ! कथमहं सेवानभिज्ञः ? दमनक बोला—'भाई ! मैं सेवा करना क्यों नहीं जानता हूं ? पश्य,— किमप्यस्ति स्वभावेन सुन्दरं वाप्यसुन्दरम्। यदेव रोचते यस्मै भवेत्तत्तस्य सुन्दरम् ॥ ५३ ॥ देखो—कोई वस्तु स्वभावसे अच्छी और बुरी होती है, जो जिसको रुचती है वही उसको सुन्दर लगती है ॥ ५३ ॥ यतः,— यस्य यस्य हि यो भावस्तेन तेन हि तं नरम् । अनुप्रविश्य मेधावी क्षिप्रमात्मवशं नयेत् ॥ ५४ ॥ क्योंकि-बुद्धिमान्‌को चाहिये कि जिस मनुष्यका जैसा मनोरथ होय उसी अभिप्रायको ध्यानमें रख कर एवं उस पुरुषके पेटमें घुस कर उसे अपने वशमें कर ले ॥ ५४ ॥ अन्यच्च,— कोऽत्रेत्यहमिति ब्रूयात्सम्यगादेशयेति च । आज्ञामवितथां कुर्याद्यथाशक्ति महीपतेः ॥ ५५ ॥

१०२ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ५६- और दूसरे-यहां कौन है ? मैं हूं; कृपा कर आज्ञा कीजिये, ऐसा कहना चाहिये और जहां तक हो सके राजाकी आज्ञाको सफल करनी चाहिये ॥ ५५ ॥ अपरं च,- अल्पेच्छुधृतिमान् प्राज्ञश्छायेवानुगतः सदा । आदिष्टो न विकल्पेत स राजवसतो वसेत्' ॥ ५६ ॥ और थोड़ा चाहने वाला, धैर्यवान्, पण्डित तथा सदा छायाके समान पीछे चलने वाला और जो आज्ञा पाने पर सोच विचार न करे, अर्थात् यथार्थरूपसे आज्ञाका पालन करे ऐसा मनुष्य राजाके घरमें रहना चाहिये' ॥ ५६ ॥ करटको ब्रूते—'कदाचित्त्वामनवसरप्रवेशादवमन्यते स्वामी' ! स आह—'अस्त्वेवम् । तथाप्यनुजीविना स्वामिसान्निध्यमवश्यं करणीयम् । करटक बोला-‘जो कभी कुसमय पर घुस जानेसे स्वामी तुम्हारा अनादर करे' ॥ वह बोला-‘ऐसा हो तो भी सेवकको स्वामीके पास अवश्य जाना चाहिये । यतः,— दोषभीतेरनारम्भस्तत्कापुरुषलक्षणम् । कैरजीर्णभयाद्भ्रातर्भोजनं परिहीयते ? ॥ ५७ ॥ क्योंकि—दोषके डरसे किसी कामका आरंभ न करना यह कायर पुरुषका चिन्ह है; हे भाई ! अजीर्णके डरसे कौन भोजनको छोड़ते हैं ? ॥ ५७ ॥ पश्य,— आसन्नमेव नृपतिर्भजते मनुष्यं विद्याविहीनमकुलीनमसंगतं वा । प्रायेण भूमिपतयः प्रमदा लताश्च यः पार्श्वतो वसति तं परिवेष्टयन्ति' ॥ ५८ ॥ देखो-पास रहने वाला कैसाही विद्याहीन, कुलहीन तथा विसंगत मनुष्य क्यों न हो राजा उसीसे हित करने लगता है, क्योंकि राजा, स्त्री और बेल ये बहुधा जो अपने पास रहता है, उसीका आश्रय कर लेते हैं' ॥ ५८ ॥

-६२ ] प्रसन्न या अप्रसन्न स्वामिका चिन्ह १०३ करटको ब्रूते—'अथ तत्र गत्वा किं वक्ष्यति भवान् ?'। स आह—'शृणु । किमनुरक्तो विरक्तो वा मयि स्वामीति ज्ञास्यामि' । करटको ब्रूते—'किं तज्ज्ञानलक्षणम् ?' । करटक बोला-'वहां जा कर क्या कहोगे ?' वह बोला-'सुनो । पहिले यह जानूंगा कि स्वामी मेरे ऊपर प्रसन्न है अथवा उदास है'. करटक बोला-'इस बातको जाननेका क्या चिन्ह है ?' दमनको ब्रूते—'शृणु,— दूरादवेक्षणं हासः संप्रश्नेष्वादरो भृशम् । परोक्षेऽपि गुणश्लाघा स्मरणं प्रियवस्तुषु ॥ ५९ ॥ दमनक बोला-'सुनो,-दूरसे बड़ी अभिलाषासे देख लेना, मुसकाना, समा- चार आदि पूछनेमें अधिक आदर करना, पीठ पीछेभी गुणोंकी बड़ाई करना, प्रिय वस्तुओंमें स्मरण रखना ॥ ५९ ॥ असेवके चानुरक्तिर्दानं सप्रियभाषणम् । अनुरक्तस्य चिह्नानि दोषेऽपि गुणसंग्रहः ॥ ६० ॥ जो सेवक न हो उसमेंभी स्नेह दिखाना, सुन्दर सुन्दर बचनोंके साथ धन आदिका देना और दोषमेंभी गुणोंका ग्रहण करना ये स्नेहयुक्त स्वामिके लक्षण हैं ॥ ६० ॥ अन्यच्च— कालयापनमाशानां वर्धनं फलखण्डनम् । विरक्तेश्वरचिह्नानि जानीयान्मतिमान्नरः ॥ ६१ ॥ और दूसरे-आज कल कह करके, कृपा आदिके करनेमें समय टालना तथा आशाओंका बढ़ाना और जब फलका समय आवे तब उसका खंडन करना ये उदास स्वामीके लक्षण मनुष्यको जानना चाहिये ॥ ६१ ॥ एतज्ज्ञात्वा यथा चायं ममायत्तो भविष्यति तथा करिष्यामि । यह जान कर जैसे यह मेरे बशमें हो जायगा वैसे करूंगा; यतः,— अपायसंदर्शनजां विपत्ति- मुपायसंदर्शनजां च सिद्धिम् । मेधाविनो नीतिविधिप्रयुक्तां पुरः स्फुरन्तीमिव दर्शयन्ति' ॥ ६२ ॥

१०४ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ६३- क्योंकि—पण्डित लोग नीतिशास्त्रमें कही हुई बुराईके होनेसे उत्पन्न हुई विपत्तिको, और उपायसे उत्पन्न हुई सिद्धिको नेत्रोंके सामने साक्षात् झलकती हुईसी देखते हैं ॥ ६२ ॥ करटको ब्रूते—'तथाप्यप्राप्ते प्रस्तावे न वक्तुमर्हसि । करटक बोला—'तो भी बिना अवसरके नहीं कह सकते हो; यतः,— अप्राप्तकालवचनं बृहस्पतिरपि ब्रुवन् । प्राप्नुयाद्बुद्ध्यवज्ञानमपमानं च शाश्वतम्' ॥ ६३ ॥ क्योंकि—बिना अवसरकी बातको कहते हुए बृहस्पतिजीभी बुद्धिकी निन्दा और अनादरको सर्वदा पा सकते हैं ॥ ६३ ॥ दमनको ब्रूते—'मित्र ! मा भैषीः । नाहमप्राप्तावसरं वचनं वदिष्यामि । दमनक बोला—'मित्र ! डरो मत; मैं बिना अवसरकी बात नहीं कहूंगा; यतः,— आपद्युन्मार्गगमने कार्यकालात्ययेषु च । अपृष्टेनापि वक्तव्यं भृत्येन हितमिच्छता ॥ ६४ ॥ क्योंकि—आपत्तिमें, कुमार्ग पर चलनेमें और कार्यका समय टले जानेमें, हित चाहने वाले सेवकको बिना पूछेभी कहना चाहिये ॥ ६४ ॥ यदि च प्राप्तावसरेणापि मया मन्त्रो न वक्तव्यस्तदा मन्त्रित्वमेव ममानुपपन्नम् । और जो अवसर पा कर भी मैं परामर्श (राय) नहीं कहूंगा तो मुझे मंत्रीप- नामी अयोग्य है । यतः,— कल्पयति येन वृत्तिं येन च लोके प्रशस्यते सद्भिः । स गुणस्तेन च गुणिना रक्ष्यः संवर्धनीयश्च ॥ ६५ ॥ क्योंकि—मनुष्य जिस गुणसे आजीविका पाता है और जिस गुणके कारण इस दुनियामें सज्जन उसकी बड़ाई करते हैं, गुणीको ऐसे गुणकी रक्षा करना और बड़े यत्नसे बढ़ाना चाहिये ॥ ६५ ॥

-६६ ] बडे पुरुषको भी छोटीसी चीजकी जरूरी होना १०५ तद्भद्र ! अनुजानीहि माम् । गच्छामि' । करटको ब्रूते- 'शुभ- मस्तु । शिवास्ते पन्थानः । यथाभिलषितमनुष्ठीयताम्' इति । ततो दमनको विस्मित इव पिङ्गलकसमीपं गतः । इसलिये हे शुभचिन्तक ! मुझे आज्ञा दीजिये । मैं जाता हूं ।' करटकने कहा-'कल्याण हो । और तुम्हारे मार्ग विघ्नरहित अर्थात् शुभ हो । अपना मनोरथ पूरा करो !' तब दमनक घबराया-सा पिंगलकके पास गया ॥ अथ दूरादेव सादरं राज्ञा प्रवेशितः साष्टाङ्गप्रणिपातं प्रणि- पत्योपविष्टः । राजाह-'चिराद्दृष्टोऽसि' । दमनको ब्रूते-'यद्यपि मया सेवकेन श्रीमद्देवपादानां १ न किंचित्प्रयोजनमस्ति, तथापि प्राप्तकालमनुजीविना सांनिध्यमवश्यं कर्तव्यमित्यागतोऽस्मि । तब दूरसेही बड़े आदरसे राजाने भीतर आने दिया और वह साष्टांग दंडवत करके बैठ गया । राजा बोला-'बहुत दिनसे दीखे ।' दमनक बोला-'यद्यपि मुझ सेवकसे श्रीमहाराजको कुछ प्रयोजन नहीं है तोभी समय आने पर सेवकको अवश्य पास आना चाहिये, इसलिये आया हूं; किं च,— दन्तस्य निर्घर्षणकेन राजन् ! कर्णस्य कण्डूयनकेन वापि । तृणेन कार्यं भवतीश्वराणां किमङ्गवाक्पाणिमता नरेण ॥ ६६ ॥ और-हे राजा ! दांतके कुरेदनेके लिये तथा कान खुजानेके लिये राजाओंको तुनकेसेभी काम पड़ता है फिर देह, वाणी तथा हाथ वाले मनुष्यसे क्यों नहीं ? अर्थात् अवश्य पड़ताही है ॥ ६६ ॥ यद्यपि चिरेणावधीरितस्य देवपादैर्मे बुद्धिनाशः शङ्क्यते, तदपि न शङ्कनीयम् । यद्यपि बहुत कालसे मुझ अनादर किये गयेकी बुद्धिके नाशकी श्रीमहाराज शंका करते हो सोभी शंका न करनी चाहिये, १ यहां पाद अर्थात् चरणोंका शब्द केवल प्रतिष्ठाके लिये है ।

१०६ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ६७- यतः,- कदर्थितस्यापि च धैर्यवृत्ते- र्बुद्धेर्विनाशो न हि शङ्कनीयः । अधःकृतस्यापि तनूनपातो नाधः शिखा याति कदाचिदेव ॥ ६७ ॥ क्योंकि—अनादरभी किये गये धैर्यवानकी बुद्धिके नाशकी शंका नहीं करनी चाहिये; जैसे नीचेकी ओर की गईभी अग्निकी ज्वाला कभीभी नीचे नहीं जाती है, अर्थात् हमेशा ऊंचीही रहती है ॥ ६७ ॥ देव ! तत्सर्वथा विशेषज्ञेन स्वामिना भवितव्यम् । हे महाराज ! इसलिये सदा स्वामीको विवेकी होना चाहिये, यतः,- मणिर्लुठति पादेषु काचः शिरसि धार्यते । यथैवास्ते तथैवास्तां काचः काचो मणिर्मणिः ॥ ६८ ॥ क्योंकि—मणि चरणोंमें ठुकराता है और कांच शिर पर धारण किया जाता है सो जैसा है वैसा भलेही रहे. कांच कांचही है और मणि मणिही है ॥ ६८ ॥ अन्यच्च,— निर्विशेषो यदा राजा समं सर्वेषु वर्तते । तदोद्यमसमर्थानामुत्साहः परिहीयते ॥ ६९ ॥ और दूसरे—जब राजा सब (लायक और नालायक) के विषयमें समान वर्ताव करता है तब बड़े बड़े कार्यके करनेवाले (पुरुषों)का उत्साह नष्ट हो जाता है ॥ ६९ ॥ किं च,— त्रिविधाः पुरुषा राजन्नुत्तमाधममध्यमाः । नियोजयेत्तथैवैतांस्त्रिविधेष्वेव कर्मसु ॥ ७० ॥ और हे राजा ! उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकारके मनुष्य हैं; उसी प्रकार इन तीन प्रकारके पुरुषोंको तीन प्रकारके ही काममें नियुक्त कर देना चाहिये ॥ ७० ॥ यतः,— स्थान एव नियोज्यन्ते भृत्याश्चाभरणानि च । न हि चडामणिः पादे नूपुरं शिरसा कृतम् ॥ ७१ ॥

-७६ ] राजाको तारतम्यसे ही काम लेनेकी आवश्यकता १०७ क्योंकि सेवक और आभरण योग्य स्थानमें ( जहांके वहां ) लगा दिये जाते हैं, जैसे मुकुट पैरमें और पाजेब शिर पर नहीं पहिनी जाती है ॥ ७१ ॥ अपि च,— कनकभूषणसंग्रहणोचितो यदि मणित्रपुणि प्रणिधीयते । न च विरौति न चापि स शोभते भवति योजयितुर्वचनीयता ॥ ७२ ॥ और भी सुवर्णके आभूषणमें जड़नेके योग्य मणि, जो सीसा आदि धातुके आभूषणमें जड़ दिया जाय तो, वह मणि न तो झनकारता है और न शोभाही देता है किन्तु जड़ियेकी बुराई होती है ॥ ७२ ॥ अन्यच्च,— मुकुटे रोपितः काचश्चरणाभरणे मणिः । न हि दोषो मणेरस्ति किंतु साधोरविज्ञता ॥ ७३ ॥ और दूसरे—जो मुकुटमें कांच जड़ दिया जाय, और चरणके आभूषणमें मणि जड़ दिया जाय तो कुछ मणिकी निन्दा नहीं है पर जड़ियेकी मूर्खता समझी जाती है ॥ ७३ ॥ पश्य,— बुद्धिमाननुरक्तोऽयमयं शूर इतो भयम् । इति भृत्यविचारज्ञो भृत्यैरापूर्यते नृपः ॥ ७४ ॥ देखो—यह बुद्धिमान् है, यह राजभक्त है, यह शूर है, इससे भय है, इस प्रकार सेवकोंके विचारको जानने वाला राजा सेवकोंसे भरा पूरा रहता है ॥ ७४ ॥ तथा हि,— अश्वः शस्त्रं शास्त्रं वीणा वाणी नरश्च नारी च । पुरुषविशेषं प्राप्य हि भवन्ति योग्या अयोग्याश्च ॥ ७५ ॥ और भी कहा है—घोड़ा, शस्त्र, शास्त्र, वीणा, वाणी, मनुष्य और स्त्री ये गुणीके अथवा गुणहीनके पास पहुंचते ही ( उसके संसर्गसे ) योग्य और अयोग्य बन जाते हैं ॥ ७५ ॥ अन्यच्च,— किं भक्तेनासमर्थेन किं शक्तेनापकारिणा ? । भक्तं शक्तं च मां राजन्नावज्ञातुं त्वमर्हसि ॥ ७६ ॥