ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished548 पृष्ठ
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( ८ )
| मन्त्र | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १४ | नचिकेताका सर्वातीत तत्त्वविषयक प्रश्न | ..... १११ |
| १५—१७ | यमराजद्वारा ॐकारोपदेश, नाम-नामीका अभेद-निरूपण और नामकी महिमा | ..... १११ |
| १८—१९ | आत्माके स्वरूपका वर्णन | ..... ११३ |
| २०—२१ | परमात्माके स्वरूपका वर्णन | ..... ११५ |
| २२ | परमेश्वरकी महिमा समझनेवाले पुरुषकी पहिचान | ..... ११७ |
| २३ | कृपानिर्धर साधकको परमेश्वरकी प्राप्तिका निरूपण | ..... ११७ |
| २४—२५ | परमात्मा किसको और क्यों नहीं मिलते? इसका कथन | ..... ११८ |
( तृतीय वल्ली )
| १ | जीवात्मा और परमात्माका नित्य सम्बन्ध और प्राणियोंकी हृदय-गुफामें दोनोंके निवास-स्थानका निरूपण | ..... १२० |
|---|---|---|
| २ | प्रार्थनाको परमात्माकी प्राप्तिका सर्वोत्तम साधन बतलाना | ..... १२२ |
| ३—४ | रथ और रथीके रूपकसे परमात्मप्राप्तिके उपायका कथन | ..... १२३ |
| ५—९ | विवेकहीनकी विवशता तथा दुर्गति और विवेकशीलकी स्वाधीनता तथा परमगतिका प्रतिपादन | ..... १२४ |
| १०—११ | इन्द्रियोंको असत्-मार्गसे रोककर भगवान्की ओर लगानेके प्रकारका तात्विक विवेचन | ..... १२८ |
| १२—१३ | परमात्माकी प्राप्तिके महत्त्व और साधनका निरूपण | ..... १३१ |
| १४—१५ | परमात्माकी प्राप्तिके लिये मनुष्योंको चेतावनी, परमात्माके स्वरूपका और उसके जाननेके फलका वर्णन | ..... १३२ |
| १६—१७ | उपर्युक्त उपदेशमय आख्यानके श्रवण और वर्णनका फलसहित माहात्म्य | ..... १३३ |
द्वितीय अध्याय
( प्रथम वल्ली )
| १ | परमेश्वरके दर्शनमें इन्द्रियोंको बहिर्मुखता ही विघ्न है | ..... १३५ |
|---|---|---|
| २ | अविवेकी और विवेकियोंका अन्तर | ..... १३६ |
| ३—५ | जिनकी कृपाशक्तिसे इन्द्रियाँ और अन्तःकरण अपना-अपना कार्य करते हैं, उन सर्वव्यापी सर्वशक्तिमान् परमेश्वरके ज्ञानसे शोक-निन्दा आदि सब दोषोंकी निवृत्तिका कथन | ..... १३७ |