जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
कथा कही।
मक्कट ] २२१ समय शास्ता ने 'भिक्षुओ, यह भिक्षु केवल अभी ढोगी नही है, इसने पहले भी जब यह बन्दर था अग्नि के लिए ढोग किया है', कह पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसो मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व किसी काशी-ग्राम मे ब्राह्मण कुल मे पैदा हुए। बडे होने पर तक्षशिला जा विद्या सीख घर बसाया। उसकी ब्राह्मणी ने एक पुत्र को जन्म दिया। जब लडका दौडने भागने लग गया, तो वह मर गई। बोधिसत्त्व ने उसका शरीर-कृत्य करके सोचा, अब मुझे घर में रहने से क्या लाभ ? मै पुत्र को लेकर प्रव्रजित हो जाऊँ। रोते हुए रिश्तेदारो तथा मित्र-समूह को छोड वह पुत्र को ले हिमालय मे प्रविष्ट हुआ। वहाँ ऋपियो के ढग से प्रव्रजित हो फल-मूल खाता हुआ रहने लगा। एक दिन वर्षा ऋतु में जब वर्षा हुई, तो वह सूखी लकडियाँ जलाकर आग तापते हुए एक तख्ते पर लेटा था। इसका पुत्र तपस्वी-कुमार भी इसके पैरो को दबाता हुआ बैठा था। एक जगली बन्दर ने शीत से पीडित हो उस पर्ण-कुटी में आग देख कर सोचा—"यदि मैं यहाँ प्रवेश करूँगा, तो 'बन्दर है, बन्दर है' कह मुझे पीट कर निकाल देंगे। मुझे आग तापना न मिलेगा। एक उपाय है। मै तपस्वी-वेश बना ढोग करके प्रवेश करूँ।" उसने एक मृत तपस्वी के वल्कल वस्त्र पहन लिए। फिर खारी ले, पर्ण-कुटी के द्वार पर एक ताड-वृक्ष के नीचे सिकुड कर बैठा। तपस्वी-कुमार ने उसे देख, बन्दर न समझ सोचा—शीत से पीडित एक बूढा तपस्वी आग तापने आया होगा। तपस्वी को कह कर इसे पर्ण-कुटी मे ला आग तपवाऊँ। उसने पिता को सम्बोधन कर यह पहली गाथा कही— तात ! माणवको एसो तालमूल अपस्सितो, अगारफञ्च्चिदं अत्थि हन्द देमस्स गारक ॥
२२२ [ २.३.१७३ [ तात ] यह एक माणवक ताड-वृक्ष को आश्रय करके बैठा है। यह घर है। हन्त ! हम इसे गृह दे । ] माणवको एसो, प्राणी वाची शब्द है। तात ! यह एक माणवक प्राणी है। 'एक तपस्वी है' यही प्रकट करता है। तालमूलं अपस्सितो, ताड के वृक्ष के आश्रय है। अगारकञ्चिद अत्थि, यह हमारा प्रव्रजितो का घर है। पर्ण- कुटी को लेकर कहा है। हन्द, निश्चय के अर्थ में निपात है। वेमस्सगारकं, इसे एक कोने में रहने के लिए घर दें। बोधिसत्त्व ने पुत्र की बात सुन उठकर पर्ण-कुटी के दरवाजे पर खडे हो देखकर पहचान लिया कि वह बन्दर है। उन्होने कहा—'तात ! मनुष्यों का मुंह ऐसा नहीं होता। यह बन्दर है। इसे यहाँ नहीं बुलाना चाहिए।' यह कहते हुए दूसरी गाथा कही— मा खो तं तात ! पक्कोसि दूसेय्य नो अगारकं नेतादिस मुखं होति ब्राह्मणस्स सुसीलिनो ॥ [ तात ! इसे मत बुला । यह हमारे घर को खराब कर देगा। सदाचारी ब्राह्मण का ऐसा मुंह नही होता । ] दूसेय्य नो अगारकं, यह यहाँ प्रवेश पाकर इस कठिनाई से बनाई हुई पर्ण-कुटी को या तो आग से जलाकर अथवा मल त्याग कर खराब कर दे सकता है। नेतादिसं शीलवान् ब्राह्मण का ऐसा मुंह नहीं होता। 'यह बन्दर है' कह बोधिसत्त्व ने एक जलती हुई लकडी फेंकी कि यहाँ क्यो बैठा है ? इस प्रकार उसे भगा दिया। बन्दर वल्कल वस्त्र छोड वृक्ष पर चढ वन में चला गया। बोधिसत्त्व चारो ब्रह्म विहारो की भावना कर ब्रह्मलोकगामी हुए। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय बन्दर यह ढोंगी भिक्षु था। तपस्वी-कुमार राहुल। तपस्वी तो मैं ही था।
१७४. दुब्बभियमक्कट जातक
दुब्बभियमक्कट ] २२३ १७४. दुब्बभियमक्कट जातक “अदम्हु ते वारि बहूतहूपं...” यह शास्ता ने वेणुवन में रहते समय देवदत्त के बारे मे कही। क. वर्तमान कथा एक दिन धर्मसभा में बैठे हुए भिक्षु देवदत्त के अकृतज्ञता तथा मित्र-द्रोही भाव की चर्चा कर रहे थे। शास्ता ने कहा—“भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त अकृतज्ञ तथा मित्र-द्रोही है। पहले भी यह ऐसा ही था।” इतना कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व किसी काशीग्राम में ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर घर बसाया। उस समय काशी राष्ट्र की एक बड़ी चलने वाली सड़क पर एक गहरा कुआँ था। जानवरो की उस तक पहुँच नही हो सकती थी। इसलिए रास्ता चलने वाले पुण्यार्थी मनुष्य, लम्बी रस्सी बँधे बर्तन से पानी निकाल एक द्रोणी में भर जानवरो को पानी पिलाते थे। उसके चारो तरफ भारी जगल था। उसमें बहुत से बन्दर रहते थे। दो तीन दिन उस मार्ग से आदमियो का आना जाना न हुआ। जानवरो को पानी न मिला। एक प्यासा बन्दर पानी खोजता हुआ कुएँ के आस पास घूमता था। बोधिसत्त्व किसी काम से उस रास्ते से आए। जब वह वहाँ जा, पानी निकाल, पी, हाथ पाँव धो कर खड़े थे, उन्होने उस बन्दर को देखा। ज यह जानकर कि वह प्यासा है उन्होने पानी निकाल द्रोणी में डाल कर उसे दिया। पानी देकर वह विश्राम करने के लिए एक वृक्ष के नीचे लेटे।
२२४ [ २.३.१७४
बन्दर ने पानी पी, पास बैठ नकल बनाते हुए, बोधिसत्त्व को डराया। बोधिसत्त्व ने उसकी वह करतूत देख 'अरे दुष्ट बन्दर ! मैंने तुझे प्यास से कष्ट पाते हुए को पानी दिया। तू मुझे चिढाता है ? अहो ! पापी पर किया गया उपकार निरर्थक होता है" कहते हुए पहली गाथा कही— अदम्ह ते वारि बहूतरूपं घम्माभितत्तस्स पिपासितस्स सो दानि पीत्वान किंकि करोसि, असङ्कमो पापजनेन सेय्यो ॥ [ धूप से तप्त तुझ प्यासे को हमने बहुत सा पानी दिया । अब तू पानी पी कर चिडाने के लिए 'किं किं' आवाज करता है। पापी से दूर रहना ही अच्छा है। ] सो दानि पीत्वान किंकि करोसि, सो अब तू मेरा दिया हुआ पानी पीकर (मुझे) चिढ़ाता हुआ 'किंकि' आवाज करता है। असङ्कमो पापजनेन सेय्यो, पापी जन के साथ मिलना अच्छा नहीं। दूर रहना ही अच्छा है।
उसे सुन वह मित्र-द्रोही बन्दर बोला—क्या तू समझता है कि यह इतने से ही समाप्त हो गया ? अब तेरे सिर पर पाखाना करके जाऊँगा। यह कहते हुए उसने दूसरी गाथा कही। को ते सुतो वा दिट्ठो वा सीलवा नाम मक्कटो इदानि खो तं ऊहच्च एसा अस्माक धम्मत्ता ॥ [तूने कौन सा बन्दर सदाचारी है, सुना वा देखा ? अभी मैं तुझे मैला करके (जाऊँगा) यही हमारा स्वभाव है। ] अधिप्पार्थ यह है—रे ब्राह्मण मक्कटो कृतज्ञ, सदाचारी शीलवा नाम है यह तूने कहाँ सुनो वा दिट्ठो वा ? इदानि खो में तं ऊहच्च तेरे सिर पर
आदिच्चुपट्ठान ] २२५ पाखाना करके चला जाऊंगा। अस्माकं हि बन्दरो का ऐसा धम्मता, यह जातीय स्वभाव है कि हमें उपकार करने वाले के सिर पर मल त्यागना चाहिए। इसे सुन बोधिसत्त्व उठकर चलने लगे। बन्दर उसी क्षण उछल, शाखा पर बैठ, सरकी छोड़ने की तरह उसने सिर पर पाखाना गिरा, चिल्लाता हुआ वन में घुस गया। बोधिसत्त्व नहा कर चले गए। शास्ता ने कहा—भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त अकृतज्ञ है। पहले भी मेरे किए उपकार को नही जानता था। इतना कह, यह धर्मदेशना ला शास्ता ने जातक का मेल बैठाया। उस समय बन्दर देवदत्त था। ब्राह्मण मैं ही था। १७५. आदिच्चुपट्ठान जातक “सब्बेसु किर भूतेसु . .” यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक ढोगी के बारे में कही। वर्तमान-कथा उक्त कथा ही की तरह है। ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व काशी-राष्ट्र में ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर तक्षशिला जा, विद्या सीख, ऋषियों की प्रव्रज्या के ढंग पर प्रव्रजित हुए। अभिज्ञा और समापत्तियां प्राप्त कर, अनेक अनुयायियों के साथ उनके गण-शास्ता बन, हिमालय में रहने लगे। वह वहाँ चिरकाल तक रह कर, निमक-खटाई खाने के लिए पर्वत से उतर प्रत्यन्त-देश में किसी ग्राम के पास एक पर्णकुटी में रहने लगे। १५
२२६ [ २.३.१७५
जिस समय ऋषि-गण भिक्षा के लिए जाते, एक लोभी बन्दर आश्रम पर आकर पर्ण-कुटी का फूस उजाड देता, पानी के घडो मे से पानी गिरा देता। कुण्डियाँ तोड देता और अग्नि-शाला में पाखाना कर देता। तपस्वियो ने वर्षा भर रह कर सोचा कि अब हेमन्त ऋतु आ गई है। फल फूल बहुत हो गए है। (प्रदेश) रमणीय है। यही चलकर रहें। उन्होने प्रत्यन्त-गांव के वासियों से विदा माँगी। मनुष्य बोले—भन्ते ! हम कल आश्रम पर भिक्षा लेकर आएंगे। उसे ग्रहण कर जाएँ। दूसरे दिन वे बहुत सारा खाद्य-भोज्य लेकर वहाँ पहुँचे। उसे देख बन्दर ने सोचा मैं भी ढोंग करके मनुष्यो को प्रसन्न कर अपने लिए खाद्य-भोज्य मँगवाऊँ। वह तप करते तपस्वी की तरह हो, सदाचारी की तरह हो, तपस्वियो से कुछ ही दूर पर सूर्य्य को नमस्कार करता हुआ खडा हुआ। मनुष्यो ने उसे देख सोचा कि सदाचारियो के पास रहने वाले सदाचारी होते है और पहली गाथा कही— सब्बेसु किर भूतेसु सन्ति सीलसमाहिता, पस्स साखामिगं जम्मं आदिच्चमुपतिट्ठति ॥ [ सभी प्राणियो में सदाचारी होते हैं। सूर्य्य की पूजा करते हुए नीच बन्दर को देखो।] सन्ति सीलसमाहिता, शील से युक्त है, शीलवान तथा समाहित या एकाग्रचित्त हैं, यह भी अर्थ है। जम्म नीच, आदिच्चमुपतिट्ठति, सूर्य्य को नमस्कार करते हुए ठहरा है। इस प्रकार उन मनुष्यो को उसकी प्रशंसा करते देख बोधिसत्त्व ने कहा कि तुम इस लोभी बन्दर के आचरण को न जानकर अयोग्य-जगह में ही श्रद्धा- वान् हुए हो, और यह दूसरी गाथा कही— नास्स सील विजानाथ अनञ्ञाय पसंसथ अग्गिहुत्तञ्च ऊहन्त द्वे च भिन्ना कमण्डलु ॥
कळायमुट्ठि ] २२७ [ तुम इसके स्वभाव को नही जानते । बिना जाने ही प्रशंसा कर रहे हो । इसने अग्नि-शाला खराब कर दी और दो कमण्डल तोड़ डाले । ] अनञ्जाय बिना जाने । ऊहन्त इस दुष्ट बन्दर द्वारा मैली की गई। कमण्डलु कुण्डी, द्वे च कुण्डियां उसके द्वारा भिन्ना । इस प्रकार उसने दुर्गुण कहे । मनुष्यो ने बन्दर का ढोग जान, ढेले और लाठियाँ ले, पीट कर भगा दिया। तब ऋषिगण को भिक्षा दी। ऋषि भी हिमालय प्रदेश में ही जा ध्यानावस्थित हो ब्रह्मलोकगामी हुए। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय बन्दर यह ढोंगी था। ऋषि-गण बुद्ध-परिषद थी। गण- शास्ता तो मैं ही था। १७६. कळायमुट्ठि जातक "बालो यतायं दुमसारगोचरो . . ." यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय कोशल नरेश के बारे में कही। क. वर्तमान कथा एक बार वर्षा ऋतु के समय कोशल नरेश के इलाके में बग़ावत हुई। वहाँ जो योद्धा थे, उन्होने दो तीन युद्ध किए। जब वह शत्रुओ को न जीत सके तो उन्होने राजा के पास सन्देश भेजा। राजा वर्षा-ऋतु में असमय में ही निकल पड़ा। जेतवन के समीप पड़ाव डलवाकर उसने सोचा—मैं असमय में निकल पड़ा हूँ। कन्दराएँ और
दरारे पानी से भरी हैं। मार्ग दुर्गम है। मैं शास्ता के पास जाता हूँ। वे मुझे पूछेंगे, 'महाराज ! कहाँ जाते हो ?' मैं उन्हें यह बात कहूँगा। शास्ता मुझे केवल पारलौकिक उपदेश ही नहीं देते हैं। वह मुझे इस लोक में भी लाभ की बात बताते हैं। इसलिए यदि जाने से मेरी हानि होती होगी तो वह कह देंगे, 'महाराज ! यह असमय है।' यदि लाभ होगा, तो वह चुप रहेंगे। वह जेतवन जा शास्ता को प्रणाम कर एक ओर बैठा। शास्ता ने पूछा--महाराज ! दिन चढ़े तुम कैसे आए ? भन्ते ! मैं इलाके को शान्त करने के लिए निकला हूँ। तुम्हें प्रणाम करके जाने की इच्छा से आया हूँ। शास्ता न कहा--'महाराज ! पूर्व समय में भी सेना के तैयार होने पर, पण्डितो का कहना मान राजा लोग असमय में सेना को चढ़ा कर नहीं ले गए।' फिर उसके प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की बात कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व उसके अर्थ-धर्मानुशासक सर्वार्थ-अमात्य थे। राजा के इलाके के बगावत करने पर प्रत्यन्त के योद्धाओ ने सन्देशा भेजा ! राजा वर्षा ऋतु में निकला। उसका पड़ाव उद्यान में लगा। बोधिसत्त्व राजा के पास खड़े थे। उस समय घोडो के लिए मटर भिगो, ला कर द्रोणियो में डाल रहे थे। उद्यान के बन्दरो में से एक बन्दर वृक्ष से उतरा। उसने वहाँ से मटर लिए, मुँह भरा, हाथ भी भरे और कूद कर वृक्ष पर चढ़ खाना शुरू किया। खाते समय उसके हाथ से एक मटर भूमि पर गिर पड़ा। वह हाथ में और मुंह में जितने मटर थे उन्हें छोड़ वृक्ष से उतर उस मटर को ढूंढने लगा। जब उसे वह मटर नहीं दिखाई दिया तो वह फिर वृक्ष पर चढा और वहां जुए मे हजार हार गए की तरह चिन्ता करता हुआ रोनी शकल बना वृक्ष की शाखा पर बैठा। राजा ने बन्दर की करतूत देख बोधिसत्त्व को सम्बोधन कर पूछा— 'मित्र ! बन्दर ने यह क्या किया ?' बोधिसत्त्व ने कहा—'महाराज !
कळायमुट्ठि ] २२६ बहुत की ओर ध्यान न दे थोडे की ओर ध्यान देने वाले दुर्बुद्धि मूर्ख जन ऐसा करते ही हैं।' इतना कह, पहली गाथा कही— बालो यतायं दुमसाखगोचरो पञ्ञा जनिन्द ! नयिमस्स विज्जति, कळायमुट्ठिं अवकिरिय सेयतं एकं कळायं पतितं गवेसति ॥ [ राजन् ! यह वृक्षों की शाखाओ पर घूमने वाला बन्दर मूर्ख है। इसे प्रज्ञा नहीं है। यह मटर की सारी मुट्ठी को बगेर कर गिरे हुए एक मटर को खोजता है।] दुमसालगोचरो बन्दर, यह वृक्षों की शाखा पर रहता है, इसके रहने की जगह इसके घूमने की जगह है, इसलिए वृक्षों की शाखा पर घूमने वाला कहलाया। जनिन्द, राजा को सम्बोधन करता है, परम ऐश्वर्यशाली होने से, राजा जनता के इन्द्र हैं; इसीलिए जनिन्द। कळायमुट्ठि मटर की मुट्ठि, काले मास की मुट्ठि भी कहते हैं। अवकिरिय वखेर कर सेयतं सय गवेसति भूमि पर गिरे एक ही मटर को खोजता है। ऐसा कहकर बोधिसत्त्व ने फिर राजा को सम्बोधन कर दूसरी गाथा कही— एवमेव मयं राज ! ये चञ्ञे अतिलोभिनो अप्पेन बहुजिज्याम कळायेनेव वानरो ॥ [ इसी प्रकार हे राजन ! हम और दूसरे अत्यन्त लोभी लोग थोडे के लिए बहुत की हानि कर देते हैं; जैसे बन्दर ने एक मटर के लिए।] सक्षिप्तार्थ इस प्रकार है—महाराज ! एवमेव मयं और अञ्ञे च सभी लोभी जन अप्पेन बहुं जिज्याम हम ही अब इस वर्षा काल में, इस अयोग्य समय में रास्ते पर चलकर थोडे से लाभ के लिए बहुत सी हानि करेंगे। कळायेनेव वानरो जैसे इस बन्दर ने एक मटर को ढूँढते हुए, उस एक मटर
२३० [ २.२.१७७ के कारण सब मटर गंवाए, उसी प्रकार हम भी असमय में जब कन्दराएँ और दरारें पानी से भरी हैं, छलने पर छोटे से लाभ के लिए बहुत से हाथी घोड़ों तथा सेना को गँवाएँगे। इसलिए असमय में जाना उचित नहीं। यूँ राजा को उपदेश दिया। राजा उसकी बात सुन वहीं से लौट कर वाराणसी नगर में वापिस चला गया। चोरों ने सुना कि राजा चोरों को दबाने के लिए नगर से निकल पड़ा है, ये इलाके से भाग गए। वर्तमान समय में भी चोरों ने जब यह सुना कि कोशल राजा निकल पड़ा है, वह भाग गए। राजा ने शास्ता का धर्मोपदेश सुना। फिर आसन से उठ, प्रणाम और प्रदक्षिणा कर श्रावस्ती को चला गया। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय राजा आनन्द था। पण्डित अमात्य तो मैं ही था। १७७. तिन्दुक जातक “धनुहत्थकलापेहि. ” यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय प्रज्ञा पार- मिता के बारे में कही। क. वर्तमान कथा महाबोधि जातक¹ तथा उम्मग्ग जातक² (में आए वर्णन) की तरह शास्ता ने अपनी प्रज्ञा की प्रशंसा सुन कर कहा—“भिक्षुओ ! तथागत केवल ¹ महाबोधी जातक (५२८) ² उम्मग्ग जातक (५४६)
कह पूर्व-जन्म की कथा कही।
तिन्दुक ] २३१
अभी प्रज्ञावान् नहीं हैं, पहले भी प्रज्ञावान् तथा उपायकुशल रहे हैं।" इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व एक वानर के रूप में पैदा हो अस्सी हजार बन्दरों की मण्डली के साथ हिमालय में रहने लगे। वहीं पास ही एक प्रत्यन्त-गाँव था, जो कभी बसता था, कभी उजड़ जाता था। उस गाँव के बीच में शाखा-प्रशस्त तथा मधुर फलों से युक्त एक तिन्दुक- वृक्ष था। जब गाँव बसा न होता, तो वानर आकर उस वृक्ष के फल खाते। अगली बार फलों का मौसम आने पर वह गाँव बसा हुआ था। उसके चारों ओर बाँसो का घेरा था और एक फाटक था। उस वृक्ष की शाखाएँ भी फलों के भार से झुकी हुई थीं। वानर सोचने लगे—हम पहले अमुक गाँव में तिन्दुक फल खाते थे। इस बार वह वृक्ष फला है या नहीं ? उस गाँव में बस्ती है या नहीं ? यह सोच उन्होंने एक वानर को समाचार मालूम करने के लिए भेजा। उसने लौट कर कहा कि वृक्ष फला है और गाँव में घनी बस्ती है। वानरों ने जब सुना कि वृक्ष फला है तो उन्हें बड़ी खुशी हुई कि मीठे मीठे फल खाने को मिलेंगे। बहुत सारे वानरों ने वानरेश को जाकर कहा। वानरेश ने पूछा—"गाँव बसा है वा नहीं ? 'देव ! बसा है।" “तो (लौट) जाओ। मनुष्य बहुत मायावी होते हैं।" "देव ! आधी रात के समय जब मनुष्य सो जाएँगे, तब खाएँगे।" बहुत से वानरों ने जाकर वानरेश को मना लिया। फिर हिमालय से उतर, उस ग्राम से थोड़ी ही दूर पर वह मनुष्यों के सोने के समय की प्रतीक्षा करते हुए एक बड़े भारी पत्थर पर सो रहे। आधी रात को जब मनुष्य सो रहे थे उन्होंने वृक्ष पर चढ़ फल खाए। एक आदमी शौच के लिए घर से निकला। उसने गाँव के बीच
२३२ [ २३.१७७ जाने पर बानरो को देखा तो और आदमियो को खबर दी। बहुत से आदमी तीर कमान तैयार कर, नाना प्रकार के आयुध ले, ढेले-डण्डे आदि के साथ वृक्ष को घेर कर खड़े हो गए कि रात बीतने पर बानरो को पकड़ेंगे। अस्सी हजार बानरो ने मनुष्यों को देखा तो उन्हें डर लगा कि अब मरे। उन्होंने सोचा कि बानरेश को छोड़ उन्हें और कही शरण न मिलेगी। वे उसके पास गए और पहली गाथा कही— धनुहत्थकलापेहि नेत्तिसवरधारिहि समन्ता परिकिण्णम्हा कथ मोक्खो भविस्सति ॥ [तीर कमान हाथ में लिए तथा उत्तम खड्ग धारण किए हुए आदमियो से हम घिरे हैं। कैसे मुक्त होगे ? ] धनुहत्थकलापेहि, धनुष और (तीर-)समूह जिनके हाथ में हैं, धनुष और तीर-समूह लेकर जो खड़े हैं। नेत्तिसवरधारिहि, नेत्तिस कहते हैं खड्ग को, उत्तम खड्गधारियो से, परिकिण्णम्हा, हम घिरे हुए है, कथ किस उपाय से हमारा मोक्ष होगा। उनकी बात सुन बानरेश ने कहा—'डरो मत ! मनुष्यो को बहुत काम रहते हैं। अभी आधी रात है। यह हमें मारने के लिए खडे हैं। इस (हमारे मारने के) काम में विघ्न करने वाला दूसरा काम पैदा कर दें।' इस प्रकार उन्हें आश्वासन देते हुए दूसरी गाथा कही— अप्पेव बहुकिच्चान अत्थो जायेय कोचि न अथ्थिय रुक्खस्स अच्छेद्दन खज्जतञ्ञेव तिन्दुक ॥ [इन बहुत काम वालो को कोई न कोई काम पैदा हो सकता है। वृक्ष पर अभी फल लगे हैं। तिन्दुक को खाओ।] नं निपातमात्र है। अप्पेव बहुकिच्चान, मनुष्यो को दूसरा कोचि अत्यो उत्पन्न हो सकता है। अथ्थिय रुक्खस्स अच्छेद्दन इन वृक्षो पर से तोडने उतारने
कच्छप ] २३३ की बहुत जगह है। खज्जतञ्चेव तिन्दुक तिन्दुक फल खाओ। तुम्हें जितनी जरूरत है उतने फल खाओ। हमें मारने का समय आएगा तब देखेंगे। इस प्रकार महासत्त्व ने सब को दिलासा दिया। यह आश्वासन न मिलता तो डर था कि सभी हृदय फट कर मर जाते। महासत्त्व ने इस प्रकार वानरो को दिलासा दे कहा—सभी वानरो को इकट्ठा करो। इकट्ठे होने पर बोधिसत्त्व के सेनक नाम भानजे को न देखकर वह बोले कि सेनक नहीं आया। यदि सेनक नहीं आया तो मत डरो। वह अब कुछ अच्छा काम करेगा। वानरो के भागने के समय सेनक सोता रह गया था। पीछे उठ कर जब उसने किसी को न देखा तो वह भी वानरो के पीछे पीछे आया। रास्ते में उसने आदमियो को देखकर सोचा कि बानरो के लिए खतरा पैदा हो गया। उसने गांव के किनारे पर अग्नि जला कर कातती हुई एक स्त्री के पास जा, खेत पर जाने वाले लड़के की तरह उससे मशाल ले, जिधर की हवा थी उधर खडे हो गांव में आग लगा दी। आदमी वानरो को छोड़ कर आग बुझाने दौड़ पड़े। वानर भागे, लेकिन भागते हुए सेनक के लिए एक एक फल तोड़ कर लेते गए। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय भानजा सेनक महानाम शाक्य था। वानर समूह बुद्ध-परिषद थी। वानरेश तो में ही था। १७८. कच्छप जातक "जनित्तम्मे भवित्तम्मे..." यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक ऐसे आदमी के बारे में कही जो प्लेग से मुक्त हो गया था।
क. वर्तमान कथा
२३४ [ २३. १७८
क. वर्तमान कथा
श्रावस्ती में एक कुल में प्लेग¹ पैदा हुई। माता पिता ने पुत्र से कहा— तात ! इस घर में मत रह। दीवार तोड कर भाग जा। जहाँ कही जाकर जान बचा। पीछे आना। इस जगह पर बहुत सा खजाना गडा है। उसे निकाल, परिवार के साथ सुख से रहना। पुत्र उनकी बात स्वीकार कर दीवार तोड भाग गया। फिर अपना रोग शान्त होने पर उसने आकर खजाना निकाल घर बसाया। एक दिन वह घी तेल आदि तथा वस्त्र-ओड़न आदि लिवाकर जेतवन गया। वहाँ शास्ता को प्रणाम कर बैठा। शास्ता ने उसका कुशल क्षेम जान कर पूछा—"सुना तुम्हारे घर में प्लेग रोग घुस गया था। तुम उससे कैसे बचे ?" उसने अपना हाल कहा। शास्ता बोले—"उपासक ! पूर्व समय में भी ऐसे लोगो ने जो खतरा आने पर आसक्ति के कारण अपने घर को छोड़कर अन्यत्र नही चले गए जान गँवाई। आसक्ति न कर दूसरी जगह जाने वालो ने जान बचा ली।" उसके प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की बात कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व एक गाँव में कुम्हार का काम करके स्त्री-बच्चों को पालते थे। उस समय बाराणसी की महानदी के साथ मिला हुआ एक बडा तालाब था। अधिक पानी होने पर वह नदी के साथ मिल जाता। कम होने पर पृथक हो जाता। मछलियाँ और कछुवे पहले से जान जाते थे कि इस वर्ष अच्छी वर्षा होगी, इस वर्ष कम होगी। एक वर्ष तालाब में पैदा हुई मछलियाँ और कछुवे यह जानकर कि इस वर्ष अच्छी वर्षा न होगी, जिस समय अभी
¹ अहिवातकरोग।
कच्छप ] २३५
तालाब और नदी एक थे, उसी समय उस तालाब से निकल नदी में चले गए। एक कछुवे ने कहा—यहाँ में पैदा हुआ हूँ। यहीं बड़ा हुआ हूँ। यहीं मेरे मातापिता रहे हैं। में इसे नहीं छोड़ सकता। वह नदी में नहीं गया। गरमी पड़ने पर उस तालाब का पानी सूख गया। यह कछुवा जिस जगह बोधिसत्व मिट्टी खोदते थे, उसी जगह ज़मीन खोदकर उसमें घुसा था। बोधि- सत्त्व ने मिट्टी लेने के लिए वहाँ जाकर, बड़ी कुदाल से ज़मीन खोदते हुए उसकी पीठ तोड कर, मिट्टी के ढेर की ही तरह उसे भी कुदाल से उठाकर स्थल पर गिराया। उसने वेदना से पीडित हो कहा कि मैं घर के प्रति आसक्ति को त्याग, उसे छोड़ न सका, इसीलिए विनाश को प्राप्त हुआ। और रोते हुए यह गाथाएँ कहीं— जनित्तम्मे भवित्तम्मे इति पङ्के अवस्सरिं तं मं पङ्को अज्झभवि यथा दुब्बलकं तया तं तं वदामि भग्गव ! सुणोहि वचनं मम ॥ गामे वा यदि वा रञ्ञे सुखं यत्राधिगच्छति त जनित्तं भवित्तं च पुरिसस्स पजानतो यम्हि जीवे तम्हि गच्छे न निकेतहतो सिया ॥ [ में यहाँ पैदा हुआ। में इसीमे वढा। यह सोच कर में पङ्क में ही रहा। लेकिन मुझ दुर्बल को जैसे पङ्क ने परास्त किया, हे कुम्हार ! में वैसे वैसे तुझे कहता हूँ सुन— ग्राम या अरण्य में जहाँ आदमी को सुख प्राप्त हो, वही बुद्धिमान आदमी की जन्म-भूमि हैं, वही पलने की जगह है। जहाँ रहकर जी सकता हो, वही जाए। घर में रहकर मरने वाला न बने । ] जनित्तम्मे भवित्तम्मे यह मेरे पैदा होने की जगह है, यह बढ़ने की जगह है। इति पङ्के अवस्सरिं इस हेतु से मैंने इस कीचड में आश्रय लिया, पड़ा रहा, रहने लगा। अज्झभवि, पराभूत हुआ, विनाश को प्राप्त हुआ। भग्गव कुम्हार को बुलाता है। कुम्हारो का यही नाम गोत्र तथा प्रज्ञप्ति है—यह
२३६ [ २३.१७८ भाग्यवान् ।¹ सुखं, शारीरिक तथा मानसिक आनन्द। तं जनित्त भवित्तञ्च वह पैदा होने का तथा पलने का स्थान है। जनित भावित दीर्घाकार भी पाठ है, अर्थ यही है। पजानतो, जो अर्थ अनर्थ तथा कारण अकारण को जानता हैं। न निकेतहतो सिया, घर में आसक्ति कर, किसी दूसरी जगह न जा, घर में मरा। इस प्रकार मरण रूपी दुख को प्राप्त करने वाला न बने। इस प्रकार वह बोधिसत्त्व से बोलते ही बोलते मर गया। बोधिसत्त्व ने उसे ले ग्राम के सारे निवासियो को इकट्ठा कर उन्हे उपदेश देते हुए कहा— "इस कछुए को देखते हैं ? जब दूसरी मछलियां तथा कछुए महानदी में चले गए तो यह अपने निवास स्थान में आसक्ति न छोड़ सकने के कारण उनके साथ नही गया। जहाँ से मिट्टी ली जाती है, वही पडा रहा। मैने मिट्टी खोदते हुए, महाकुदाल से इसकी पीठ तोड कर इस मिट्टी के ढेले की तरह इसे जमीन पर गिरा दिया। इसे अपना किया याद आया। दो गाथाएँ कह यह रोता हुआ मर गया। इस प्रकार यह अपने निवास स्थान के प्रति आसक्ति कर मर गया। तुम भी इस कछुए की तरह न होना। अब से तृष्णा के वश होकर उपयोग करते हुए यह मत समझो कि यह रूप मेरा है, यह शब्द मेरा है, यह सुगन्ध मेरी है, यह रस मेरा है, यह स्पर्शितव्य मेरा है, यह पुत्र मेरा है, यह लडकी मेरी है, यह दास-दासियाँ तथा यह सोना मेरा है। यह प्राणी अकेला ही तीनो भवों में चक्कर काटता है।" इस प्रकार बोधिसत्त्व ने बुद्ध-लीला से जनता को उपदेश दिया। वह उपदेश सारे जम्बूद्वीप में फैल कर सात सो वर्ष² रहा। जनता बोधिसत्त्व के उपदेश के अनुसार चल दान आदि पुण्य कर्म कर स्वर्ग को गई। बोधिसत्त्व ने भी उसी तरह पुण्य कर्म करते हुए स्वर्ग का रास्ता लिया। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला (आर्य-)सत्यो को प्रकाशित कर जातक ¹ आजकल कुम्हारों को कहीं कहीं 'प्रजापति' कहते है। ² फोसबोल की प्रति में 'वस्स सहस्सानि' पाठ है।
१७६. सतधम्म जातक
सत्यम्म ] २३७ य१ मेल बैठाया। सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर वह कुल-पुत्र स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ। उस समय काश्यप आनन्द था। कुम्हार तो मैं ही था। १७६. सतधम्म जातक “तञ्च अप्प...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय इक्कीस तरह की अनुचित जीविका के बारे में कही। क. वर्तमान कथा एक समय भिक्षु इक्कीस तरह के ऐसे कर्मों से जीविका चलाते थे जैसे वैद्यक, दूत बनकर जाना, सन्देस लेकर जाना, पैदल दौड कर (सन्देस ले) जाना, भिक्षा (=पिण्ड) के बदले में भिक्षा लेना आदि। शास्ता ने उन भिक्षुओं का उस उस तरह जीविका चलाना जान सोचा— 'इस समय भिक्षु अनुचित ढंग से जीविका चलाते हैं। इस प्रकार से जीविका चलाने से वे यक्ष-योनि से वा प्रेत-योनि से मुक्त न होंगे। जुए के बैल होकर पैदा होंगे। नरक में जन्म ग्रहण करेंगे। इनके हित के लिए, सुख के लिए अपने विचारानुकूल तथा प्रतिभा के अनुसार एक धर्मोपदेश देना चाहिए।” तब भगवान् ने भिक्षुओं को इकट्ठा करवा उपदेश दिया—"भिक्षुओ ! इक्कीस तरह के अनुचित तरीकों से जीविका नहीं चलानी चाहिए। अनुचित तरीकों से जो भिक्षा मिलती है, वह लोहे के तप्त गोले के समान है, हलाहल विष की तरह है। अनुचित तरीकों से जीविका चलाने की बुद्ध, प्रत्येक-बुद्ध तथा श्रावकों सभी ने निन्दा की है, निकृष्ट बताया है। अनुचित तरीकों से जिस भिक्षा की प्राप्ति होती है, उसे खाने वाले के मुंह पर मुस्कराहट नहीं आ
कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही।
० २३८ [ २३।७६ करती, उसका मन प्रसन्न नहीं हो सकता। अनुचित तरीके से जो भिक्षा मिलती है, वह मेरे मन में चाण्डाल के जूठे भोजन की तरह है। उसका खाना ऐसा ही है, जैसे मागन्ध माणव ने चाण्डाल का जूठा भोजन खाया।" इतना कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व ने चाण्डाल का जन्म ग्रहण किया। बड़े होने पर किसी काम से उन्होने रास्ते में खाने के लिए पायस और भात की पोटली ले रास्ता पकड़ा। उसी समय में वाराणसी में एक माणवक था। नाम था शत्रपन्न। उदीच्च गोत्र के महापाषाद् कुल में पैदा हुआ था। यह भी किसी काम से रास्ते में खाने के लिए पायस या भात की पोटली बिना लिए ही निकल पड़ा। [L13: उन दोनों की महामार्ग में भेंट हुई। माणवक ने बोधिसत्त्व से पूछा— "तेरी जात क्या है?" उसने कहा-"मैं चाण्डाल हूँ' और माणवक से पूछा- "तेरी जात क्या है?" "मैं उदीच्च ब्राह्मण हूँ।" "अच्छा, तो चलें" कह दोनों ने रास्ता पकड़ा। बोधिसत्त्व ने प्रातःकाल या भोजन करने के समय एक ऐसी जगह जहाँ पानी की सुविधा थी, बैठ हाथ धो भात की पोटली खोल माणवक से पूछा— "भात खाओगे?" "रे चाण्डाल ! मुझे भात की जरूरत नहीं है।" बोधिसत्त्व बोला "अच्छा।" फिर भात की पोटली को जूठा न कर, अपनी आवश्यकता भर भात एक दूसरे पत्ते में डाल, पोटली को बाँध कर एक ओर रख दिया। भोजन कर, पानी पी, हाथ पैर धो, चावल तथा शेष भात ले माणवक से कहा "माणवक, चलें', और रास्ता पकड़ा। वे सारा दिन चलकर, पानी की सुविधा की एक जगह में नहा कर बाहर निकले। बोधिसत्त्व ने आराम की जगह बैठ भात की पोटली खोल माणवक को बिना पूछे ही खाना आरम्भ किया। दिन भर चलने से माणवक थक गया था और
सतधम्म ] २३६ उसे खूब भूख लगी थी। वह बोधिसत्त्व की ओर देखने लगा—"यदि यह भात देगा, तो खा लूंगा।" लेकिन बोधिसत्त्व बिना कुछ बोले खाते रहे। माणवक ने सोचा—यह चाण्डाल बिना मुझे पूछे ही सब खाए जा रहा है। इससे जबरदस्ती छीन कर भी, ऊपर का जूठा भात हटा कर शेष खाना चाहिए। उसने वैसा कर जूठा भात खाया। भात खाते के ही साथ माणवक के मन में बड़े जोर का पश्चाताप पैदा हुआ। वह सोचने लगा—"मैंने अपनी जाति, गोत्र तथा प्रदेश के योग्य कार्य नहीं किया। मैंने चाण्डाल का जूठा भात खा लिया।" उसी समय उसके मुंह से रक्त सहित भात बाहर आया। इस बड़े जोर से शोकातुर हो कि मैंने जरा सी बात के लिए अनुचित कर्म किया, उसने रोते हुए यह पहली गाथा कही— सञ्च अप्पञ्च उच्छिट्ठ सञ्च किच्छेन नो अदा, सोहं ब्राह्मणजातिको यं भुत्तं तम्पि उग्गतं ॥ [वह थोड़ा सा था। जूठा था, और वह भी उसने कठिनाई से दिया। ब्राह्मण जाति का होकर मैंने वह खाया। जो खाया सो भी निकल गया।] जो मैंने खाया वह अप्पं उच्छिट्ठं तं च नो उस चाण्डाल ने अपनी इच्छा से नहीं बल्कि ज़बरदस्ती करने पर किच्छेन कठिनाई से दिया। सोहं परिशुद्ध ब्राह्मण जाति का होकर (खाया) उसीसे मैंने यं भुत्तं तम्पि रक्त के साथ उग्गतं। इस प्रकार माणवक रो पीट कर 'मैंने ऐसा अनुचित काम किया, अब मैं जी कर क्या करूँगा' सोच जंगल में चला गया। वहाँ सबसे छिपे रह कर अनाथ-मरण मरा। शास्ता ने यह पूर्व की बात कह उपदेश दिया—'भिक्षुओ, जैसे सतधम्म माणवक को उस चाण्डाल का जूठा भात खाने से, अपने लिए अनुचित भात खाया रहने से, न हँसी आई न मन प्रसन्न हो सका, इसी प्रकार जो इस शासन में प्रव्रजित हो अनुचित ढंग से जीविका चलाता है और उसमे प्राप्त पदार्थों का
.२४० [ २.३.१८० उपभोग करता है, बुद्ध द्वारा निन्दित, बुद्ध द्वारा निकृष्ट कही गई जीविका से जीविका चलाने के कारण उसके मुंह पर न हँसी आती है, न प्रसन्नता। शास्ता ने सम्बुद्धत्व प्राप्त किए रहने पर यह दूसरी गाथा कही— एवं धम्मं निरकत्वा यो अधम्मेन जीवति सतधम्मोव लाभेन लद्धेनपि न नन्दति ॥ [ इस प्रकार धर्म छोड़ जो अधर्म से जीता है। वह सतधर्म की तरह लाभ होने पर भी प्रसन्न नही होता।] धम्मं जीविका को शुद्ध रखने के सदाचार का धर्म। निरंकत्वा बाहर करके, छोड़ कर। अधम्मेन, इक्कीस तरह के अनुचित तरीको से जीविका खोजना। सतधम्मो उसका नाम है। न नन्दति जैसे सतधम्म माणवक चाण्डाल का जूठा मुझे मिला सोच उस लाभ से प्रसन्न नही होता। इसी प्रकार इस शासन में प्रव्रजित कुलपुत्र अनुचित ढंग से प्राप्त लाभ का परिभोग करता हुआ प्रसन्न नही होता, सन्तुष्ट नहीं होता। निन्दित जीविका से जीता हूँ सोच दुःखी ही होता है। इसलिए अनुचित ढंग से जीविका खोजने वाले के लिए यही अच्छा है कि वह सतधम्म माणवक की तरह जगल में जा अनाथ की तरह मर जाए इस प्रकार शास्ता ने यह धर्मोपदेश कर चार आर्य(-सत्यो) को प्रका- शित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यो का प्रकाशन समाप्त होने पर बहुत से भिक्षुओ को स्रोतापत्ति आदि फल की प्राप्ति हुई। उस समय मै ही चाण्डालपुत्र था। १८०. दुद्दद जातक “दुद्ददं वदमान...” यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय सामूहिक दान के बारे में कही।