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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

क. वर्तमान कथा

२३४ [ २३. १७८

क. वर्तमान कथा

श्रावस्ती में एक कुल में प्लेग¹ पैदा हुई। माता पिता ने पुत्र से कहा— तात ! इस घर में मत रह। दीवार तोड कर भाग जा। जहाँ कही जाकर जान बचा। पीछे आना। इस जगह पर बहुत सा खजाना गडा है। उसे निकाल, परिवार के साथ सुख से रहना। पुत्र उनकी बात स्वीकार कर दीवार तोड भाग गया। फिर अपना रोग शान्त होने पर उसने आकर खजाना निकाल घर बसाया। एक दिन वह घी तेल आदि तथा वस्त्र-ओड़न आदि लिवाकर जेतवन गया। वहाँ शास्ता को प्रणाम कर बैठा। शास्ता ने उसका कुशल क्षेम जान कर पूछा—"सुना तुम्हारे घर में प्लेग रोग घुस गया था। तुम उससे कैसे बचे ?" उसने अपना हाल कहा। शास्ता बोले—"उपासक ! पूर्व समय में भी ऐसे लोगो ने जो खतरा आने पर आसक्ति के कारण अपने घर को छोड़कर अन्यत्र नही चले गए जान गँवाई। आसक्ति न कर दूसरी जगह जाने वालो ने जान बचा ली।" उसके प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की बात कही—

ख. अतीत कथा

पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व एक गाँव में कुम्हार का काम करके स्त्री-बच्चों को पालते थे। उस समय बाराणसी की महानदी के साथ मिला हुआ एक बडा तालाब था। अधिक पानी होने पर वह नदी के साथ मिल जाता। कम होने पर पृथक हो जाता। मछलियाँ और कछुवे पहले से जान जाते थे कि इस वर्ष अच्छी वर्षा होगी, इस वर्ष कम होगी। एक वर्ष तालाब में पैदा हुई मछलियाँ और कछुवे यह जानकर कि इस वर्ष अच्छी वर्षा न होगी, जिस समय अभी


¹ अहिवातकरोग।

कच्छप ] २३५

तालाब और नदी एक थे, उसी समय उस तालाब से निकल नदी में चले गए। एक कछुवे ने कहा—यहाँ में पैदा हुआ हूँ। यहीं बड़ा हुआ हूँ। यहीं मेरे मातापिता रहे हैं। में इसे नहीं छोड़ सकता। वह नदी में नहीं गया। गरमी पड़ने पर उस तालाब का पानी सूख गया। यह कछुवा जिस जगह बोधिसत्व मिट्टी खोदते थे, उसी जगह ज़मीन खोदकर उसमें घुसा था। बोधि- सत्त्व ने मिट्टी लेने के लिए वहाँ जाकर, बड़ी कुदाल से ज़मीन खोदते हुए उसकी पीठ तोड कर, मिट्टी के ढेर की ही तरह उसे भी कुदाल से उठाकर स्थल पर गिराया। उसने वेदना से पीडित हो कहा कि मैं घर के प्रति आसक्ति को त्याग, उसे छोड़ न सका, इसीलिए विनाश को प्राप्त हुआ। और रोते हुए यह गाथाएँ कहीं— जनित्तम्मे भवित्तम्मे इति पङ्के अवस्सरिं तं मं पङ्को अज्झभवि यथा दुब्बलकं तया तं तं वदामि भग्गव ! सुणोहि वचनं मम ॥ गामे वा यदि वा रञ्ञे सुखं यत्राधिगच्छति त जनित्तं भवित्तं च पुरिसस्स पजानतो यम्हि जीवे तम्हि गच्छे न निकेतहतो सिया ॥ [ में यहाँ पैदा हुआ। में इसीमे वढा। यह सोच कर में पङ्क में ही रहा। लेकिन मुझ दुर्बल को जैसे पङ्क ने परास्त किया, हे कुम्हार ! में वैसे वैसे तुझे कहता हूँ सुन— ग्राम या अरण्य में जहाँ आदमी को सुख प्राप्त हो, वही बुद्धिमान आदमी की जन्म-भूमि हैं, वही पलने की जगह है। जहाँ रहकर जी सकता हो, वही जाए। घर में रहकर मरने वाला न बने । ] जनित्तम्मे भवित्तम्मे यह मेरे पैदा होने की जगह है, यह बढ़ने की जगह है। इति पङ्के अवस्सरिं इस हेतु से मैंने इस कीचड में आश्रय लिया, पड़ा रहा, रहने लगा। अज्झभवि, पराभूत हुआ, विनाश को प्राप्त हुआ। भग्गव कुम्हार को बुलाता है। कुम्हारो का यही नाम गोत्र तथा प्रज्ञप्ति है—यह

२३६ [ २३.१७८ भाग्यवान् ।¹ सुखं, शारीरिक तथा मानसिक आनन्द। तं जनित्त भवित्तञ्च वह पैदा होने का तथा पलने का स्थान है। जनित भावित दीर्घाकार भी पाठ है, अर्थ यही है। पजानतो, जो अर्थ अनर्थ तथा कारण अकारण को जानता हैं। न निकेतहतो सिया, घर में आसक्ति कर, किसी दूसरी जगह न जा, घर में मरा। इस प्रकार मरण रूपी दुख को प्राप्त करने वाला न बने। इस प्रकार वह बोधिसत्त्व से बोलते ही बोलते मर गया। बोधिसत्त्व ने उसे ले ग्राम के सारे निवासियो को इकट्ठा कर उन्हे उपदेश देते हुए कहा— "इस कछुए को देखते हैं ? जब दूसरी मछलियां तथा कछुए महानदी में चले गए तो यह अपने निवास स्थान में आसक्ति न छोड़ सकने के कारण उनके साथ नही गया। जहाँ से मिट्टी ली जाती है, वही पडा रहा। मैने मिट्टी खोदते हुए, महाकुदाल से इसकी पीठ तोड कर इस मिट्टी के ढेले की तरह इसे जमीन पर गिरा दिया। इसे अपना किया याद आया। दो गाथाएँ कह यह रोता हुआ मर गया। इस प्रकार यह अपने निवास स्थान के प्रति आसक्ति कर मर गया। तुम भी इस कछुए की तरह न होना। अब से तृष्णा के वश होकर उपयोग करते हुए यह मत समझो कि यह रूप मेरा है, यह शब्द मेरा है, यह सुगन्ध मेरी है, यह रस मेरा है, यह स्पर्शितव्य मेरा है, यह पुत्र मेरा है, यह लडकी मेरी है, यह दास-दासियाँ तथा यह सोना मेरा है। यह प्राणी अकेला ही तीनो भवों में चक्कर काटता है।" इस प्रकार बोधिसत्त्व ने बुद्ध-लीला से जनता को उपदेश दिया। वह उपदेश सारे जम्बूद्वीप में फैल कर सात सो वर्ष² रहा। जनता बोधिसत्त्व के उपदेश के अनुसार चल दान आदि पुण्य कर्म कर स्वर्ग को गई। बोधिसत्त्व ने भी उसी तरह पुण्य कर्म करते हुए स्वर्ग का रास्ता लिया। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला (आर्य-)सत्यो को प्रकाशित कर जातक ¹ आजकल कुम्हारों को कहीं कहीं 'प्रजापति' कहते है। ² फोसबोल की प्रति में 'वस्स सहस्सानि' पाठ है।

१७६. सतधम्म जातक

सत्यम्म ] २३७ य१ मेल बैठाया। सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर वह कुल-पुत्र स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ। उस समय काश्यप आनन्द था। कुम्हार तो मैं ही था। १७६. सतधम्म जातक “तञ्च अप्प...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय इक्कीस तरह की अनुचित जीविका के बारे में कही। क. वर्तमान कथा एक समय भिक्षु इक्कीस तरह के ऐसे कर्मों से जीविका चलाते थे जैसे वैद्यक, दूत बनकर जाना, सन्देस लेकर जाना, पैदल दौड कर (सन्देस ले) जाना, भिक्षा (=पिण्ड) के बदले में भिक्षा लेना आदि। शास्ता ने उन भिक्षुओं का उस उस तरह जीविका चलाना जान सोचा— 'इस समय भिक्षु अनुचित ढंग से जीविका चलाते हैं। इस प्रकार से जीविका चलाने से वे यक्ष-योनि से वा प्रेत-योनि से मुक्त न होंगे। जुए के बैल होकर पैदा होंगे। नरक में जन्म ग्रहण करेंगे। इनके हित के लिए, सुख के लिए अपने विचारानुकूल तथा प्रतिभा के अनुसार एक धर्मोपदेश देना चाहिए।” तब भगवान् ने भिक्षुओं को इकट्ठा करवा उपदेश दिया—"भिक्षुओ ! इक्कीस तरह के अनुचित तरीकों से जीविका नहीं चलानी चाहिए। अनुचित तरीकों से जो भिक्षा मिलती है, वह लोहे के तप्त गोले के समान है, हलाहल विष की तरह है। अनुचित तरीकों से जीविका चलाने की बुद्ध, प्रत्येक-बुद्ध तथा श्रावकों सभी ने निन्दा की है, निकृष्ट बताया है। अनुचित तरीकों से जिस भिक्षा की प्राप्ति होती है, उसे खाने वाले के मुंह पर मुस्कराहट नहीं आ

कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही।

० २३८ [ २३।७६ करती, उसका मन प्रसन्न नहीं हो सकता। अनुचित तरीके से जो भिक्षा मिलती है, वह मेरे मन में चाण्डाल के जूठे भोजन की तरह है। उसका खाना ऐसा ही है, जैसे मागन्ध माणव ने चाण्डाल का जूठा भोजन खाया।" इतना कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व ने चाण्डाल का जन्म ग्रहण किया। बड़े होने पर किसी काम से उन्होने रास्ते में खाने के लिए पायस और भात की पोटली ले रास्ता पकड़ा। उसी समय में वाराणसी में एक माणवक था। नाम था शत्रपन्न। उदीच्च गोत्र के महापाषाद् कुल में पैदा हुआ था। यह भी किसी काम से रास्ते में खाने के लिए पायस या भात की पोटली बिना लिए ही निकल पड़ा। [L13: उन दोनों की महामार्ग में भेंट हुई। माणवक ने बोधिसत्त्व से पूछा— "तेरी जात क्या है?" उसने कहा-"मैं चाण्डाल हूँ' और माणवक से पूछा- "तेरी जात क्या है?" "मैं उदीच्च ब्राह्मण हूँ।" "अच्छा, तो चलें" कह दोनों ने रास्ता पकड़ा। बोधिसत्त्व ने प्रातःकाल या भोजन करने के समय एक ऐसी जगह जहाँ पानी की सुविधा थी, बैठ हाथ धो भात की पोटली खोल माणवक से पूछा— "भात खाओगे?" "रे चाण्डाल ! मुझे भात की जरूरत नहीं है।" बोधिसत्त्व बोला "अच्छा।" फिर भात की पोटली को जूठा न कर, अपनी आवश्यकता भर भात एक दूसरे पत्ते में डाल, पोटली को बाँध कर एक ओर रख दिया। भोजन कर, पानी पी, हाथ पैर धो, चावल तथा शेष भात ले माणवक से कहा "माणवक, चलें', और रास्ता पकड़ा। वे सारा दिन चलकर, पानी की सुविधा की एक जगह में नहा कर बाहर निकले। बोधिसत्त्व ने आराम की जगह बैठ भात की पोटली खोल माणवक को बिना पूछे ही खाना आरम्भ किया। दिन भर चलने से माणवक थक गया था और

सतधम्म ] २३६ उसे खूब भूख लगी थी। वह बोधिसत्त्व की ओर देखने लगा—"यदि यह भात देगा, तो खा लूंगा।" लेकिन बोधिसत्त्व बिना कुछ बोले खाते रहे। माणवक ने सोचा—यह चाण्डाल बिना मुझे पूछे ही सब खाए जा रहा है। इससे जबरदस्ती छीन कर भी, ऊपर का जूठा भात हटा कर शेष खाना चाहिए। उसने वैसा कर जूठा भात खाया। भात खाते के ही साथ माणवक के मन में बड़े जोर का पश्चाताप पैदा हुआ। वह सोचने लगा—"मैंने अपनी जाति, गोत्र तथा प्रदेश के योग्य कार्य नहीं किया। मैंने चाण्डाल का जूठा भात खा लिया।" उसी समय उसके मुंह से रक्त सहित भात बाहर आया। इस बड़े जोर से शोकातुर हो कि मैंने जरा सी बात के लिए अनुचित कर्म किया, उसने रोते हुए यह पहली गाथा कही— सञ्च अप्पञ्च उच्छिट्ठ सञ्च किच्छेन नो अदा, सोहं ब्राह्मणजातिको यं भुत्तं तम्पि उग्गतं ॥ [वह थोड़ा सा था। जूठा था, और वह भी उसने कठिनाई से दिया। ब्राह्मण जाति का होकर मैंने वह खाया। जो खाया सो भी निकल गया।] जो मैंने खाया वह अप्पं उच्छिट्ठं तं च नो उस चाण्डाल ने अपनी इच्छा से नहीं बल्कि ज़बरदस्ती करने पर किच्छेन कठिनाई से दिया। सोहं परिशुद्ध ब्राह्मण जाति का होकर (खाया) उसीसे मैंने यं भुत्तं तम्पि रक्त के साथ उग्गतं। इस प्रकार माणवक रो पीट कर 'मैंने ऐसा अनुचित काम किया, अब मैं जी कर क्या करूँगा' सोच जंगल में चला गया। वहाँ सबसे छिपे रह कर अनाथ-मरण मरा। शास्ता ने यह पूर्व की बात कह उपदेश दिया—'भिक्षुओ, जैसे सतधम्म माणवक को उस चाण्डाल का जूठा भात खाने से, अपने लिए अनुचित भात खाया रहने से, न हँसी आई न मन प्रसन्न हो सका, इसी प्रकार जो इस शासन में प्रव्रजित हो अनुचित ढंग से जीविका चलाता है और उसमे प्राप्त पदार्थों का

.२४० [ २.३.१८० उपभोग करता है, बुद्ध द्वारा निन्दित, बुद्ध द्वारा निकृष्ट कही गई जीविका से जीविका चलाने के कारण उसके मुंह पर न हँसी आती है, न प्रसन्नता। शास्ता ने सम्बुद्धत्व प्राप्त किए रहने पर यह दूसरी गाथा कही— एवं धम्मं निरकत्वा यो अधम्मेन जीवति सतधम्मोव लाभेन लद्धेनपि न नन्दति ॥ [ इस प्रकार धर्म छोड़ जो अधर्म से जीता है। वह सतधर्म की तरह लाभ होने पर भी प्रसन्न नही होता।] धम्मं जीविका को शुद्ध रखने के सदाचार का धर्म। निरंकत्वा बाहर करके, छोड़ कर। अधम्मेन, इक्कीस तरह के अनुचित तरीको से जीविका खोजना। सतधम्मो उसका नाम है। न नन्दति जैसे सतधम्म माणवक चाण्डाल का जूठा मुझे मिला सोच उस लाभ से प्रसन्न नही होता। इसी प्रकार इस शासन में प्रव्रजित कुलपुत्र अनुचित ढंग से प्राप्त लाभ का परिभोग करता हुआ प्रसन्न नही होता, सन्तुष्ट नहीं होता। निन्दित जीविका से जीता हूँ सोच दुःखी ही होता है। इसलिए अनुचित ढंग से जीविका खोजने वाले के लिए यही अच्छा है कि वह सतधम्म माणवक की तरह जगल में जा अनाथ की तरह मर जाए इस प्रकार शास्ता ने यह धर्मोपदेश कर चार आर्य(-सत्यो) को प्रका- शित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यो का प्रकाशन समाप्त होने पर बहुत से भिक्षुओ को स्रोतापत्ति आदि फल की प्राप्ति हुई। उस समय मै ही चाण्डालपुत्र था। १८०. दुद्दद जातक “दुद्ददं वदमान...” यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय सामूहिक दान के बारे में कही।

क. वर्तमान कथा

दुद्दद ] २४१ क. वर्तमान कथा श्रावस्ती में कुटुम्ब-पुत्र परस्पर मित्रो ने चन्दा इकट्ठा करके सभी आव- श्यक वस्तुओ से युक्त दान की तैयारी कर भिक्षुसघ को जिसके प्रमुख बुद्ध थे, निमन्त्रित कर एक सप्ताह तक महादान दिया। १ सातवें दिन सब आव- श्यक वस्तुएं दी। उनमें जो मण्डली का प्रधान था उसने शास्ता को प्रणाम कर एक ओर बैठ कर कहा—'भन्ते ! इस दान में अधिक देने वाले भी सम्मिलित हैं, थोडा देने वाले भी सम्मिलित हैं। यह दान सभी के लिए महान् फलदायी हो।' यह कह उसने दान दिया। शास्ता बोले—'उपासको ! भिक्षुसघ को, जिसके प्रमुख बुद्ध हैं दान देते हुए जो तुमने इस प्रकार दान दिया, यह महान् कर्म है। पुराने समय में पण्डितो ने भी दान देते हुए इसी प्रकार दिया।' उनके प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व काशी देश में ब्राह्मण कुल मे पैदा हुए। बड़े होने पर तक्षशिला जा वहाँ सब विद्याएं सीखी। फिर घर छोड, ऋपियो के ढंग से प्रव्रज्या ग्रहण कर, मण्डली का नेता बन हिमालय प्रदेश में चिरकाल तक रहे। नमक-खटाई के लिए वस्ती में घूमते हुए, आकर वाराणसी पहुँचे। वहाँ राजोद्यान में रह कर अगले दिन परिषद सहित दरवाजे पर के गांव मे भिक्षाटन किया। मनुष्यो ने भिक्षा दी। अगले दिन वाराणसी में भिक्षाटन किया। आदमियो ने श्रद्धावान् हो भिक्षा दे, टोली बना कर चन्दा इकट्ठा कर दान की तैयारी की और ऋषिगण को महादान दिया। दान की समाप्ति पर टोली के नेता ने इसी प्रकार कह कर दातव्य-वस्तुओ का परित्याग किया। १ सात दिन तक नियमित भोजन कराया। १६

२४२ [ २.३ १८० बोधिसत्त्व ने, "आयुष्मन्तो ! श्रद्धा होने पर दान कभी थोडा नहीं होता" वह दानानुमोदन करते हुए यह गाथा कही— दुद्ददं ददमानानं दुक्करं कम्मकुव्वतं असन्तो नानुकुव्वन्ति सतं धम्मो दुरन्वयो ॥ तस्मा सतञ्च असतञ्च नाना होति इतो गति असन्तो निरयं यन्ति सन्तो सग्गपरायणा ॥ [कठिनाई से जो दिया जा सके देने वाले, कठिनाई से जो किया जा सके करने वाले सत्पुरुषो का धर्म दुर्ज्ञेय है, असत्पुरुष इसे नही करते । इसीलिए सत्पुरुषो और असत्पुरुषो की गति भिन्न भिन्न होती है । सत्पुरुष स्वर्ग जाने वाले होते हैं और असत्पुरुष नरक में ।] दुद्ददं लोभ आदि से युक्त अपण्डित-जन दान नहीं दे सकते। इसलिए दान को कठिनाई से दिया जा सकने योग्य कहा। उसे ददमानानं। दुक्करं कम्मकुव्वतं उसी दान कर्म को सब नहीं कर सकते, इसलिए उस दुष्कर कर्म को करने वाले। दुरन्वयो फल-सम्बन्ध की दृष्टि से दुर्ज्ञेय—इस प्रकार के दान का इस प्रकार का फल होता है, यह जानना कठिन है, और भी दुरन्वयो कठिनाई से प्राप्य, मूर्ख जन दान देकर भी दान का फल नहीं प्राप्त कर सकते। नाना होति इतो गति यहाँ से च्युत होकर परलोक जाने वालो को नाना प्रकार से जन्म ग्रहण करने होते हैं। असन्तो निरयं यन्ति, मूर्ख, दुश्शील लोग दान न दे, तथा सदाचार की रक्षा न कर नरक को जाते हैं। सन्तो सग्गपरायणा, पण्डित लोग दान देकर, शील की रक्षा कर, उपोसथ-व्रत रख, तीनो प्रकार के सुचरित्र¹ पूरे कर स्वर्गगामी होते हैं। महान् स्वर्ग-सुख सम्पत्ति का आनन्द लूटते हैं। ¹काय, वाक् तथा वाणी के शुभ कर्म।

शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय

कुद्द ] ० २४३ इस प्रकार बोधिसत्त्व (दान-) अनुमोदन कर वर्षा के चार महीने वहीं रहे। वर्षा-ऋतु समाप्त होने पर ध्यान-प्राप्त कर ध्यान-युक्त ही ब्रह्मलोकगामी हुए। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय ऋषिगण बुद्धपरिषद थी। मण्डली का नेता तो मैं ही था।

१८१. असदिस जातक

दूसरा परिच्छेद ४. असदिस वर्ग १८१. असदिस जातक “धनुग्गहो असदिसो...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय महाभिनिष्क्रमण के बारे में कही। क. वर्तमान कथा एक दिन धर्मसभा में बैठे हुए भिक्षु भगवान् की नैष्क्रम्यपारमी की प्रशंसा कर रहे थे। शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ, यहाँ बैठे क्या बात चीत कर रहे हो ?” 'अमुक बात चीत ।' "भिक्षुओ ! तथागत ने केवल अभी अभि- निष्क्रमण नहीं किया, पहले भी श्वेत-छत्र छोडकर अभिनिष्क्रमण किया है।" इतना कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पुराने समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व ने उसकी रानी की कोख में जन्म ग्रहण किया। सकुशल पैदा हुए उस राजकुमार का, नामग्रहण के दिन नाम रक्खा गया असदिसकुमार। जिस समय वह दौड भाग कर चलन फिरने लगा, एक दूसरे पुण्यवान् प्राणी ने देवी की कोख में जन्म ग्रहण किया। सकुशल पैदा हुए उस कुमार का नाम रक्खा गया ब्रह्मदत्त कुमार।

असदिस ] २४५ वशोड हो वाराणसी लौटे। राजा न मरते समय कहा, असदिसकुमार को राजा तथा ब्रह्मदत्त कुमार को उपराजा बनाना। इतना कह वह मर गया। उसके मर जाने पर जब बोधिसत्त्व को राज्य दिया जाने लगा, उसने मना कर दिया कि मुझे राज्य की ज़रूरत नहीं है। ब्रह्मदत्त का राज्याभिषेक कर दिया गया। बोधिसत्त्व ने कहा कि मुझे यश नहीं चाहिए; और किसी भी चीज की इच्छा नहीं की। छोटे भाई के राज्य करते हुए वह जैसे साधारण ढंग से रहते थे, उसी तरह रहते रहे। राजा के नौकर चाकरों ने राजा को यह कह कर कि बोधिसत्त्व राज्य चाहते हैं, राजा का मन बोधिसत्त्व की ओर से फेर दिया। उसने उनका विश्वास कर, चित्त में सन्देह पैदा हो जाने के कारण मनुष्यों को आज्ञा दी कि मेरे भाई को पकड़ो। बोधिसत्त्व के किसी हितचिन्तक ने उन्हें इसकी सूचना दी। छोटे भाई से क्रुद्ध हो बोधिसत्त्व किसी दूसरे राष्ट्र में चले गए। वहाँ राजद्वार पर पहुँचे कहलाया कि एक धनुर्धारी आया है। राजा ने पूछा कि क्या वेतन लेगा ? उत्तर दिया—एक वर्ष के लिए एक लाख। राजा ने आज्ञा दी—अच्छा, आ जाए। उसके समीप आकर खड़े होने पर पूछा— “तू धनुर्धारी है ?” “देव ! हाँ।” “अच्छा ! मेरी सेवा में रह।” तब से वह राजा की सेवा में रहने लगे। उन्हें जो वेतन मिलता था, उसे देख पुराने धनुर्धारी क्रुद्ध हुए कि इसे बहुत मिलता है। एक दिन राजा उद्यान गया। वहाँ मङ्गल-शिला की शय्या के पास कनात तनवा आम के वृक्ष के नीचे महाशय्या पर लेटा। ऊपर देखते हुए उसने एक आम देखा। उसे लगा कि इस आम को चढ़ कर नहीं तोड़ा जा सकता। इसलिए उसने धनुर्धारियों को बुलवा कर पूछा—"क्या इस आम को तीर मार कर गिरा सकते हो ?” ‘देव ! यह हमारे लिए कठिन कार्य नहीं है। लेकिन ! देव ! हमारा कौशल तो आपने पहले अनेक बार देखा है। जो नया धनुर्धर आया है, वह हमारी अपेक्षा बहुत पाता है। उससे गिरवाएँ।”

२४६ [ २.४.१८१ राजा ने बोधिसत्व को बुलाकर पूछा—"तात ! इसे गिरा सकते हो !" "महाराज ! हाँ ! थोड़ी जगह मिलने पर गिरा सकूँगा।" "जगह कहाँ चाहिए ?" "जहाँ आपकी शय्या है।" राजा ने शय्या हटवा कर जगह करा दी। बोधिसत्त्व हाथ में धनुष नहीं रखते थे। वह कपड़ों के नीचे छिपाए रहते थे। इसलिए कहा कि क़नात चाहिए। राजा ने कहा 'अच्छा' और क़नात मँगवा कर तनवा दी। बोधिसत्त्व क़नात के अन्दर चले गए। वहाँ पहुँच उन्होंने ऊपर पहना श्वेत वस्त्र उतार एक लाल कपड़ा पहना। फिर पच्छ पहन, थैली से जुड़ने-वाली तलवार निकाल, बाईं ओर बाँधी। तब सुनहरी वस्त्र पहन, कमर पर तरकश बाँध, जुड़ने वाला, मेढ़े की सींग का बना बड़ा धनुष ले, मूँगे के रंग की डोरी बाँध, सिर पर पगड़ी धारण की। तेज तीर को नाखून पर घुमाते हुए वह क़नात के दो हिस्से कर ऐसे निकला मानो पृथ्वी फाड़ कर अलङ्कृत नाग-कुमार बाहर आया हो। फिर बोधिसत्त्व तीर चलाने की जगह पर जा, तीर को तैयार कर राजा से बोले— "महाराज ! इस आम को ऊपर जाने वाले तीर से गिराऊँ, अथवा नीचे जाने वाले तीर से ?" "तात ! मैंने ऊपर जाने वाले तीर से बहुत गिराते देखा है, लेकिन नीचे जाने वाले तीर से गिराते नहीं देखा है। नीचे जाने वाले तीर से गिराएँ।" "महाराज ! यह तीर दूर तक जाएगा। चातुर्महाराजिक भवन तक जाकर स्वयं नीचे उतरेगा। जब तक यह नीचे उतरे, तब तक आपको प्रतीक्षा करनी होगी।" राजा ने 'अच्छा' कह स्वीकार किया। बोधिसत्त्व ने फिर कहा—"महाराज ! यह तीर ऊपर जाता हुआ आम की डंठल को ठीक बीच में से छेदता हुआ ऊपर जाएगा; और नीचे उतरता हुआ केशप्रमाण भी इधर उधर न हो, निश्चित जगह पर लग, आम को लेकर नीचे उतरेगा। महाराज ! देखें।" तब बोधिसत्त्व ने जोर लगाकर तीर छोड़ा। आम की डंठल को बीच में से छेदता हुआ तीर ऊपर बढ़ा। बोधिसत्त्व ने यह समझ कि अब यह तीर

असदिस ] २४७ चातुर्महाराजिक भवन पहुँचा होगा, पहले तीर से भी अधिक जोर से एक दूसरा तीर चलाया। यह तीर जाकर पहले छोड़े हुए तीर के पख में लगा और उसे लोटा स्वयं तावतिंस भवन को चला गया। उसे वहाँ देवताओ ने पकड लिया। जो तीर लोट रहा था उसके हवा छेदते हुए आने की आवाज बिजली की आवाज के समान थी। लोगो ने पूछा—"यह कैसी आवाज है?" बोधिसत्व ने उत्तर दिया—"यह तीर के लौटने की आवाज है।" लोगो को डर लगने लगा कि उनमे से किसी के बदन पर न गिरे। बोधि- सत्त्व ने उन्हें आश्वासन दिया कि मैं तीर को जमीन पर गिरने न दूंगा। उतरते हुए तीर ने बाल की नोक भर भी इधर उधर न जा निश्चित स्थान पर गिर आम को तोडा। बोधिसत्व ने तीर तथा आम को जमीन पर गिरने न दे, आकाश में ही रोक कर एक हाथ में तीर और दूसरे में आम लिया। जनता उस आश्चर्य को देख "ऐसा तो हमने कभी पहले नहीं देखा" कहते हुए महापुरुष की प्रशंसा करने लगी, चिल्लाने लगी, तालियां पीटने लगी; अंगुलियां चटकाने लगी, और सहस्रो वस्त्रो को ऊपर उछालने लगी। सन्तुष्ट चित्त राज्य-परिषद ने बोधिसत्त्व को एक करोड धन दिया। राजा ने भी धन की वर्षा करते हुए इसे बहुत सा धन तथा यश दिया। इस प्रकार आदृत तथा सत्कृत होकर बोधिसत्त्व के वहाँ रहते समय सात राजाओ ने यह जान कि अब असदिसकुमार वाराणसी में नही है, वाराणसी को घेर लिया और सन्देस भेजा कि चाहे राज्य दें, चाहे युद्ध करें। राजा ने मरने से भयभीत हो पूछा—"इस समय मेरा भाई कहाँ है?" "एक सामन्त राजा की सेवा में है।" उसने दूत भेजे—यदि भाई नहीं आएगा, तो मेरी जान नही बचेगी। जाओ मेरी ओर से उनके चरणो में प्रणाम कर क्षमा माँग उन्हें लिवा कर आओ। उन्होने जाकर बोधिसत्त्व को वह समाचार कहा। बोधिसत्व ने उस राजा को पूछ वाराणसी लौट कर अपने भाई को आश्वासन दिया कि मत डरें। फिर उसने एक तीर पर यह लिखा कि मैं असदिसकुमार आ गया हूँ। दूसरा तीर चला कर सब की जान ले लूंगा। इसलिए जिन्हे जान प्यारी हो, वह भाग जाएँ। उस तीर को उसने अट्टालिका पर चढ़ ऐसे चलाया कि वह

२४८ [ २४.१८१ जहाँ सातो राजा भोजन कर रहे थे वहाँ सोने की थाली के ठीक बीच में जाकर गिरा। उन अक्षरों को देख मरने के भय से वह सभी भाग गए। इस प्रकार बोधिसत्त्व ने, छोटी मक्खी जितना खून पीती है उतना खून भी बिना बहाए सातो राजाओ को भगा दिया। फिर छोटे भाई से भेट कर, काम-भोग के जीवन को त्याग ऋषियो के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रज्या ग्रहण की। अभिज्ञा तथा समापत्तियां प्राप्त कर जीवन समाप्त होने पर ब्रह्मलोकगामी हुए। शास्ता ने बुद्ध हुए रहने पर "भिक्षुओ ! असदिसकुमार ने सात राजाओ को भगा, संग्राम विजयी हो ऋषियों के क्रम से प्रव्रज्या ग्रहण की" कह, यह गाथाएँ कही— ६ धनुग्गहो असदिसो राजपुत्तो महब्बलो दूरेपाती अक्खणवेधी महाकायप्पदालनो ॥ सब्बामित्ते रणं कत्वान च किञ्चि विहेठयि भातरं सोत्थि कत्वान सञ्जमं अज्झुपागमि ॥ [ महाबलशाली, बडी बडी चीजो को बींधने वाले, अचूक निशाना लगाने वाले, धनुर्धारी असदिस राजपुत्र ने जो तीर को दूर गिराता था, बिना किसी को कष्ट दिए सभी शत्रुओं से युद्ध कर भाई का उपकार किया। वह स्वयं सन्यासी हो गया । ] असदिसो केवल नाम से ही नही, बल, वीर्य तथा प्रज्ञा में भी असदृश । महब्बलो शरीर-बल तथा ज्ञान-बल, दोनो बलो से बलशाली। दूरेपाती चातुर्महाराजिक भवन तथा तावतिंस भवन तक तीर पहुँचाने की सामर्थ्य रखने से, दूर गिराने वाला। अक्खणवेधि अचूक निशाने वाला, अथवा अक्खणा कहते है बिजली को, जितनी देर एक बार बिजली चमकती है, एक बार बिजली चमकने के, उतनी ही देर के प्रकाश में सात आठ बार तीर खेंकर बींधने वाला। महाकायप्पदालनो बडी चीजो को बींधने वाला। चर्म-काय, लकडी-काय, लोह-काय,¹ अयस्-काय, बालू-काय, उदक-काय तथा स्फटिक-काय, यह सात ¹ लोह = तांबा ।

सङ्गामावचर ] २४६ महाकाय हैं। कोई दूसरा चर्म-काय को बीधने वाला केवल भैंस के चर्म को बीधता है। वह सात भैंस-चर्मों को बीधता। दूसरा कोई आठ अगुल मोटे अजीर के तख्ते को, वा चार अगुल मोटे असन वृक्ष के तख्ते को बीधता है। वह एक साथ सौ तख्ते बँधे हो, तो उनको भी बीधता। उसी तरह दो अगुल मोटे ताम्बे के तख्ते, वा अगुल मोटे अयस्-तख्ते को अथवा बालू की गाडी, वा तख्तो की गाडी, वा पराल की गाडी में पीछे से तीर मार कर आग निकाल देता। पानी में सामान्यतया चार ऋषभ की दूरी पर तीर पहुँचा देता, स्थल में आठ ऋषभ की दूरी पर। इस प्रकार इन सात कायो को बीधने वाला होने से महाकाय बीधने वाला। सव्वमित्ते, सभी शत्रु। रण कत्वा युद्ध करके भगा दिए। न च किञ्चि विहेठयि किसी एक को भी कष्ट नही दिया। बिना कष्ट दिए उनके साथ केवल तीर भेज कर ही युद्ध करके। सञ्जम अब्भु- पागमि शील-सयम रूपी प्रव्रज्या को प्राप्त किया। इस प्रकार शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय छोटा भाई आनन्द था। असदिसकुमार तो मैं ही था। १८२. सङ्गामावचर जातक “सङ्गामावचरो सूरो ”यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय नन्द स्थविर के बारे में कही। क. वर्तमान कथा जिस समय शास्ता पहली वार कपिलपुर¹ गए, उन्होने छोटे भाई नन्द- ¹ कपिलवस्तु।

२५० [ २.४.१८२ कुमार को प्रव्रजित किया। कपिलपुर से निकल क्रमशः श्रावस्ती जाते समय आयुष्मान् नन्द भगवान् का पात्र ले शास्ता के साथ साथ चले। जनपद- कल्याणि¹ ने सुना तो आधे बिखरे केशो से झरोखे में से देख कर कहा कि आय्यँ- पुत्र शीघ्र लौटना। नन्द जनपदकल्याणि के इस कथन को याद करता हुआ उत्कण्ठा के कारण शासन में मन न लगा सका। वह पाण्डुवर्ण का हो गया; और उसके शरीर में नसें ही नसें दिखाई देने लगीं। शास्ता ने उसका हाल जान सोचा कि मैं नन्द को अर्हत्-पद पर प्रतिष्ठित करूँ। इसलिए उन्होने उसके रहने के परिवेण में जा वहाँ बिछे आसन पर बैठ पूछा—"नन्द ! इस शासन में तेरा मन लगता है वा नही ? "भन्ते ! जनपदकल्याणि में आसक्ति होने के कारण मन नही लगता।" "नन्द ! तू पहले हिमालय में चारिका करने गया है ?" "भन्ते ! नही गया हूँ।" "तो ! आओ चले।" "भन्ते ! मुझे ऋद्धि (-बल) नही हैं। मैं कैसे जाऊँगा ?" "नन्द ! मैं तुझे अपने ऋद्धि (-बल) से ले जाऊँगा।" शास्ता ने स्थविर को हाथ से पकड आकाश मार्ग से जाते हुए रास्ते में जला हुआ खेत दिखाया। वहाँ जले हुए एक ठूंठ पर एक बन्दरी बैठी दिखाई; जिसके कान, नाक और पूंछ कटी थी; जिसके बाल जल गए थे; जिसकी खाल फट गई थी; जिसकी चमड़ी मात्र बाकी रह गई थी तथा जिसमें से रक्त बह रहा था। "नन्द ! इस बन्दरी को देखते हो ?" "भन्ते ! हाँ।" "अच्छी तरह से प्रत्यक्ष करो।" फिर उसे ले साठ योजन का मनोशिला-तल, अनवतप्त आदि सात महा- सर, पांच महानदियाँ, स्वर्ण-पर्वत, रजत-पर्वत तथा मणि-पर्वत से युक्त सैकडो रमणीय-स्थान और हिमालय-पर्वत दिखा पूछा—

¹नन्द की भार्या।

सङ्गामावचर ] २५१ “नन्द ! तूने तावतिंस-भवन¹ देखा है ?” “भन्ते ! नही देखा ?” “नन्द ! आ तुझे तावतिंस भवन दिखाएँ ।” शास्ता उसे वहाँ ले जा पाण्डु-कम्बल शिला आसन पर बैठें। दोनो देव- लोकों के देवताओ सहित देवेन्द्र शक्र-राजा ने आकर प्रणाम किया और एक ओर बैठ गया। उसकी ढाई करोड सेविकाएँ और कबूतरी की तरह लाल पाँव वाली पांच सौ अप्सराएँ भी आकर, प्रणाम कर एक ओर बैठीं। शास्ता ने नन्द को ऐसा किया कि वह उन पाँच सौ अप्सराओ पर आसक्त हो उन्हें बार बार देखने लगा। “नन्द ! कबूतरी जैसे पाँव वाली इन अप्सराओ को देखता है ?” “भन्ते ! हाँ ।” “क्या यह अच्छी लगती है, अथवा जनपदकल्याणि ?” “भन्ते ! जनपदकल्याणि की तुलना में जैसे यह लुजी बन्दरी थी, उसी तरह इनकी तुलना में जनपदकल्याणि है।” “नन्द ! अब क्या करेगा ?” “भन्ते ! क्या करने से यह अप्सराएँ मिल सकेगी ?” “श्रमण धर्म पूरा करने से ।” “यदि भन्ते ! आप मुझे इन्हें दिलाने के जिम्मेवार हो तो मै श्रमण- धर्म पूरा करूँगा ।” “नन्द ! कर। मै जिम्मेवार होता हूँ।” इस प्रकार देवसमूह के बीच में स्थविर ने तथागत को जिम्मेवार ठहरा कर कहा—“भन्ते ! देर न करें। आएँ चलें। मै श्रमण धर्म करूँगा ।” शास्ता उसे ले जेतवन चले आए। स्थविर ने श्रमण-धर्म करना आरम्भ किया। शास्ता ने धर्मसेनापति सारिपुत्र को सम्बोधन कर कहा—“सारिपुत्र ! मेरे छोटे भाई नन्द ने त्रयस्त्रिंशत् देवलोक में देवसमूह के बीच अप्सराऐं


¹ त्रयस्त्रिंशत् देवताओ का भवन।

२५२ [ २.४.१८२ दिलाने के लिए मुझे जिम्मेदार ठहराया है। इस उपाय से महामौद्गल्यायन स्थविर, महाकाश्यप स्थविर, अनुरुद्ध स्थविर, धर्मभण्डारी आनन्द स्थविर, अस्सी महाश्रावकों तथा प्रायः करके शेष सभी भिक्षुओं को कहा। धर्मसेनापति सारिपुत्र स्थविर ने नन्द स्थविर के पास जाकर कहा—आयुष्मन् ! क्या तूने सचमुच त्रयस्त्रिंशत् लोक में देवसमूह के बीच अप्सराएँ मिलें तो श्रमण- धर्म करूँगा, इसके लिए दसबलधारी (बुद्ध) को जामिन ठहराया है ? यदि ऐसा है तो तेरा ब्रह्मचर्य-जीवन स्त्रियों के लिए है, आसक्ति के लिए है। यदि तू स्त्रियों के लिए श्रमण-धर्म कर रहा है तो तुझ में और उस मजदूर में क्या अन्तर है जो मजदूरी के लिए काम करता है ?" इस प्रकार नन्द स्थविर को लज्जित किया, निस्तेज किया। इसी तरह सभी अस्सी महाश्रावकों ने तथा शेष भिक्षुओं ने उस आयुष्मन् को लज्जित किया। उसे लज्जा आई और निन्दा-भय के कारण उसने दृढ़ पराक्रम कर विप- श्यना-भावना बढ़ा अर्हत्व प्राप्त किया। फिर शास्ता के पास जाकर कहा— "भन्ते ! मैं आपको आपकी जिम्मेदारी से मुक्त करता हूँ।" शास्ता ने कहा—"नन्द ! जिस समय तूने अर्हत्व प्राप्त किया, उसी क्षण में अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गया।" यह समाचार सुन भिक्षुओं ने धर्मसभा में बात चीत चलाई—"यह आयुष्मन् नन्द स्थविर उपदेश के कितने अधिकारी हैं। एक बार उपदेश देने से ही लज्जा तथा निन्दा-भय का ख्याल कर श्रमण-धर्म करके अर्हत्व प्राप्त कर लिया।" शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?" "अमुक बातचीत।" "भिक्षुओ, न केवल अभी, पूर्व में भी नन्द उपदेश का अधिकारी ही रहा है।" फिर शास्ता ने पूर्व-जन्म की बात कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व हाथी-शिक्षक के कुल में पैदा हुए। बडे होने पर हाथी-शिक्षा के कार्य में

सङ्गामावचर ] २५३ निष्णात हो वाराणसी राजा के एक शत्रु-राजा की सेवा म रहने लगा। उसने उसके मङ्गल हाथी को अच्छी तरह सिखाया। राजा ने वाराणसी राज्य को जीतने की इच्छा से बोधिसत्त्व को साथ ले मङ्गल हाथी पर चढ बडी भारी सेना के साथ चढाई की। उसने वाराणसी-नरेश के पास सन्देश भेजा— युद्ध करें या राज्य दे। ब्रह्मदत्त ने युद्ध करने का निर्णय किया। उसने चारदीवारी के दरवाजो पर, अट्टालिकाओ पर, नगर-द्वारो पर सेना को बिठा युद्ध करना शुरु किया। शत्रु-राजा ने मङ्गल हाथी को कवच बाँध, स्वय भी कवच पहन, हाथी के कन्धे पर बैठ तेज अङ्कुस ले हाथी को नगर की ओर बढाया, ताकि नगर (की चारदीवारी) को तोड शत्रु को मार राज्य को हस्तगत कर सके। हाथी ने जब देखा कि उधर से गर्म-गारा आदि फेंका जा रहा है तथा गुलेल और नाना प्रकार के दूसरे प्रहार किए जा रहे हैं तो वह मरने से भयभीत हो पास न जा सकने के कारण लौट पडा। हाथी-शिक्षक ने उसके पास जाकर कहा—"तात ! तू शूर है। सग्राम- जित है। इस तरह के मौके पर पीछे लौटना तेरे लिए अयोग्य है।" इतना कह हाथी को उपदेश देते हुए यह दो गाथाएँ कही— सङ्गामावचरो सूरो बलवा इति विस्सुतो किन्नु तोरणमासज्ज पटिक्कमसि कुञ्जर ! ओमह् खिप्पं पळिघ एसिकानि च अब्बह तोरणानि पमद्दित्वा खिप्पं पविस कुञ्जर ! [ कुञ्जर ! यह प्रसिद्ध है कि तू सङ्ग्राम-जित है, शूर है, बलवान् है। तोरण के पास पहुँच कर तू क्यो पीछे लौटता है ? बाधा को जल्दी तोड डाल। स्तम्भो को उखाड फेंक। कुञ्जर ! दरवाजो का मर्दन करके तू जल्दी नगर में प्रविष्ट हो।] इति विस्सुतो तात ! तू ऐसे सङ्ग्राम को जिसमें प्रहार मिलते हो मर्दन करके विचरने वाला होने से सङ्गामावचरो, दृढ-हृदय वाला होने से सूरो। बल-सम्पन्न होने से बलवा, यह प्रसिद्ध है, ज्ञात है, प्रकट है। तोरणमासज्ज,