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केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३

पद-भाष्य "नैषा तर्केण मतिरापनेया" | "यह बुद्धि तर्कद्वारा प्राप्त होने (क० उ० १।२।९) | योग्य नहीं है" इस श्रुतिसे भी यही गुरुपसत्तिः इतिश्रुतेश्च। "आचार्य- | बात सिद्ध होती है। अतः "आचार्य- वान्पुरुषो वेद" (छा० उ० ६। | वान् पुरुष [ब्रह्मको] जानता है" १४।२) "आचार्याद्धैव विद्या | "आचार्यसे प्राप्त हुई विद्या ही विदिता साधिष्ठं प्रापदिति" | उत्कृष्ट‌ताको प्राप्त होती है" "उसे साष्टाङ्ग प्रणामके द्वारा जानो" (छा०उ०४।९।३) "तद्विद्धि | इत्यादि श्रुति-स्मृतिके नियमानुसार प्रणिपातेन" (गीता ४।३४) | किसी शिष्यने प्रत्यगात्मविषयक ज्ञानके सिवा कोई और शरण इत्यादिश्रुतिस्मृतिनियमाच्च कश्चि- | (आश्रय) न देखकर उस निर्भय, द्गुरुं ब्रह्मनिष्ठं विधिवदुपety | नित्य, कल्याणमय अचल पदकी प्रत्यगात्मविषयादन्यत्र शरणम् | इच्छा करते हुए किसी ब्रह्मनिष्ठ गुरुके पास विधिपूर्वक जाकर अपश्यन्नभयं नित्यं शिवमचलम् | पूछा—यही बात [आगेकी श्रुतिसे] इच्छन्प्रपच्छेति कल्प्यते- | कल्पना की जाती है- वाक्य-भाष्य प्रवृत्तिलिङ्गाद्विशेषार्थः प्रश्न | [मन आदि अचेतन पदार्थोंकी] उपपन्नः। रथादीनां हि चेतना- | प्रवृत्तिरूप लिङ्गसे [उनकी प्रेरणा करनेवाले] किसी विशेष तत्त्वके वदधिष्ठितानां प्रवृत्तिर्दृष्टा न | विषयमें प्रश्न करना ठीक ही है, क्योंकि रथ आदि [अचेतन पदार्थों] की अनधिष्ठितानाम्। मन आदीनां | प्रवृत्ति भी चेतन प्राणियोंसे अधिष्ठित च अचेतनानां प्रवृत्तिर्दृश्यते। | होकर ही देखी है, उनसे अधिष्ठित हुए बिना नहीं देखी। मन आदि तद्धि लिङ्गं चेतनावतोऽधिष्ठातुः | अचेतन पदार्थोंकी भी प्रवृत्ति देखी ही जाती है। यही उनके चेतन अस्तित्वे। करणानि हि मन | अधिष्ठाताके अस्तित्वका अनुमापक आदीनि नियमेन प्रवर्तन्ते। | लिङ्ग है। मन आदि इन्द्रियाँ नियमसे

१४ केनोपनिषद् [ खण्ड १

१४ केनोपनिषद् [ खण्ड १ प्रेरकविषयक प्रश्न ॐ केनेषितं पतति प्रेषितं मनः । केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः । केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥ १ ॥ यह मन किसके द्वारा इच्छित और प्रेरित होकर अपने विषयोंमें गिरता है ? किससे प्रयुक्त होकर प्रथम ( प्रधान ) प्राण चलता है ? प्राणी किसके द्वारा इच्छा की हुई यह वाणी बोलते हैं ? और कौन देव चक्षु तथा श्रोत्रको प्रेरित करता है ? ॥ १ ॥ पद-भाष्य केन इषितं केन कर्त्रा इषितम् | केन इषितम्—किस कर्ताके | द्वारा इच्छित अर्थात् अभिप्रेत हुआ इष्टमभिप्रेतं सत् मनः पतति | मन अपने विषयकी ओर जाता वाक्य-भाष्य तन्नासति चेतनावत्यधिष्ठातरि | प्रवृत्त हो रही हैं उनकी प्रवृत्ति बिना | किसी चेतन अधिष्ठाताके बन नहीं उपपद्यते । तद्विशेषस्य चानधि- | सकती । इस प्रकार सामान्य चेतनका गमाच्चेतनावत्सामान्ये चाधिगते | ज्ञान होनेपर भी उसके विशेष रूपका | ज्ञान न होनेके कारण यह विशेष-विषयक विशेषार्थः प्रश्न उपपद्यते । | प्रश्न उचित ही है । केनेषितम् केनेष्टं कस्येच्छा- | केन इषितम्—किससे इच्छा किया | हुआ अर्थात् किसकी इच्छामात्रसे मन मात्रेण मनः पतति गच्छति | अपने विषयोंकी ओर गिरता अर्थात् | जाता है ? यानी वह किसकी इच्छासे स्वविषये नियमेन व्याप्रियत | अपने विषयमें नियमानुसार व्यापार इत्यर्थः । मनुतेऽनेनेति विज्ञान- | करता है ? जिससे मनन करते हैं वह निमित्तमन्तःकरणं मनः प्रेषितम् | विज्ञाननिमित्तक अन्तःकरण मन है । | यहाँ 'किसके द्वारा प्रेषित हुआ-सा'— इवेत्युपमार्थः । न त्विषित- | ऐसा उपमापरक अर्थ लेना चाहिये ।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५ पद-भाष्य गच्छति स्वविषयं प्रतीति सम्बध्यते | है—यहाँ 'पतति' क्रियाके साथ | 'स्वविषयं प्रति' का सम्बन्ध इषेराभीक्ष्ण्यार्थस्य गत्यर्थस्य चेहा- | (अन्वय) है । यहाँ आभीक्ष्ण्य | और गत्यर्थक * 'इष्' धातु सम्भव सम्भवादिच्छार्थस्यैवैतद्रूपमिति | न होनेके कारण यह इच्छार्थक | 'इष्' धातुका ही [ इषितम् ] रूप गम्यते । इषितमिति इट्प्रयोग- | है—ऐसा जाना जाता है। [ 'इष्टम्' | के स्थानमें 'इषितम्' ] यह इट्-प्रयोग स्तुच्छान्दसः । तस्यैव प्रपूर्वस्य | छान्दस (वैदिक)† है। उस प्र-पूर्वक | 'इष् धातुका ही प्रेरणा अर्थमें नियोगार्थे प्रेषितमित्येतत् । | 'प्रेषितम्' रूप हुआ है । यदि तत्र प्रेषितमित्येवोक्ते प्रेषयितृ- | यहाँ केवल 'प्रेषितम्' इतना ही | कहा होता तो प्रेषण करनेवाले प्रेषणविशेषविषयाकाङ्क्षा स्यात्— | और उसके प्रेषण-प्रकारके | सम्बन्धमें ऐसी शङ्का हो सकती थी केन प्रेषयितृविशेषेण, कीदृशं | कि किस प्रेषकविशेषके द्वारा और वा प्रेषणमिति । इषितमिति तु | किस प्रकार प्रेषण किया हुआ ? | अतः यहाँ 'इषितम्' इस विशेषणके विशेषणे सति तदुभयं निवर्तते, | रहनेसे ये दोनों शङ्काएँ निवृत्त हो | जाती हैं, क्योंकि 'इससे किसीकी कस्येच्छामात्रेण प्रेषितमित्यर्थ- | इच्छामात्रसे प्रेषित हुआ' यह विशेष | अर्थ हो जाता है । विशेषनिर्धारणात् । | वाक्य-भाष्य प्रेषितशब्दयोरर्थाविह सम्भवतः। | 'इषित' और 'प्रेषित' शब्दोंके मुख्य | अर्थ यहाँके लिये सम्भव नहीं हैं, न हि शिष्यानिव मन आदीनि | क्योंकि आत्मा मन आदिको विषयोंकी

  • इष् धातुके अर्थ आभांक्ष्ण्य ( बारम्बार होना ) गति और इच्छा हैं । † व्याकरणका यह सिद्धान्त है कि 'छन्दसि दृष्टानुविधिः' वेदमें जो प्रयोग जैसे देखे गये हैं वहाँके लिये उनका वैसा ही विधान माना गया है ।

१६ केनोपनिषद् [ खण्ड १

१६ केनोपनिषद् [ खण्ड १ ❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧

पद-भाष्य

मन्त्रार्थ-मीमांसा (संस्कृत) यद्येषोऽर्थोऽभिप्रेतः स्यात्, केनेषितमित्येतावत्तैव सिद्धत्वात्प्रेषितमिति न वक्तव्यम् । अपि च शब्दाधिक्यादर्थाधिक्यं युक्तमिति इच्छया कर्मणा वाचा वा केन प्रेषितमित्यर्थविशेषोऽवगन्तुं युक्तः । न, प्रश्नसामर्थ्यात्; देहादिसंघातादनित्यात्कर्मकार्याद्विरक्तः

(हिन्दी) शङ्का—यदि यही अर्थ अभिमत था तो 'केनेषितम्' इतनेहीसे सिद्ध हो सकनेके कारण 'प्रेषितम्' ऐसा और नहीं कहना चाहिये था। इसके अतिरिक्त शब्दोंकी अधिकतासे अर्थकी अधिकता होनी उचित है इसलिये 'इच्छा' कर्म अथवा वाणी इनमेंसे किसके द्वारा प्रेषित, इस प्रकार प्रेषकविशेषका ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक होगा । समाधान—नहीं, प्रश्नकी सामर्थ्यसे यह बात प्रतीत नहीं होती; क्योंकि इससे यह निश्चय होता है कि जो पुरुष देहादि सङ्घातरूप अनित्य कर्म और कार्यसे विरक्त हो गया है

वाक्य-भाष्य

(संस्कृत) विषयेभ्यः प्रेषयत्यात्मा । विविक्त-नित्यचित्स्वरूपतया तु निमित्तमात्रं प्रवृत्तौ नित्यचिकित्साधिष्ठातृवत् ।

(हिन्दी) ओर इस प्रकार नहीं भेजता जैसे गुरु शिष्योंको । यह तो सबसे विलक्षण और नित्य चित्स्वरूप होनेके कारण नित्य चिकित्साके अधिष्ठाता [ चकोर पक्षी ] के समान उनकी प्रवृत्तिमें केवल निमित्तमात्र है ।


१. राजा लोग जब भोजन करते हैं तो उसमें विष मिला हुआ तो नहीं है इसकी परीक्षाके लिये उसे चकोरके सामने रख देते हैं । विषमिश्रित अन्नको देखकर चकोरकी आँखोंका रंग बदल जाता है । इस प्रकार चकोरकी केवल सन्निधिमात्रसे ही राजाकी भोजनमें प्रवृत्ति हो जाती है । इसके लिये उसे और कुछ नहीं करना पड़ता ।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ पद-भाष्य अतोऽन्यत्कूटस्थं नित्यं वस्तु | और इनसे पृथक् कूटस्थ नित्य बुभुत्समानः पृच्छतीति साम- | वस्तुको जाननेकी इच्छा करनेवाला र्थ्यादुपपद्यते । इतरथा इच्छावा- | है वही यह बात पूछ रहा है । क्कर्मभिर्देहादिसंघातस्य प्रेरयितृत्वं | अन्यथा इच्छा, वाक् और कर्मके द्वारा तो इस देहादि सङ्घातका प्रेरकत्व प्रसिद्ध ही है [ अर्थात् इच्छा, वाणी और कर्मके द्वारा यह प्रसिद्धमिति प्रश्नोऽनर्थक एव देहादि सङ्घात मनको प्रेरित किया करता है—इस बातको तो सभी जानते हैं ] । अतः यह प्रश्न स्यात् । | निरर्थक ही हो जाता । एवमपि प्रेषितशब्दस्यार्थो न | शङ्का—किन्तु इस प्रकार भी प्रदर्शित एव । | ‘प्रेषित’ शब्दका अर्थ तो प्रदर्शित हुआ ही नहीं । न; संशयवतोऽयं प्रश्न इति | समाधान—नहीं, यह प्रश्न किसी संशयालुका है इसीसे प्रेषितशब्दस्यार्थविशेष उपपद्यते । | ‘प्रेषित’ शब्दका अर्थविशेष उपपन्न हो सकता है [अर्थात् किं यथाप्रसिद्धमेव कार्यकारण- | जिसे ऐसा सन्देह है कि ] यह संघातस्य प्रेषयितृत्वम्, किं वा | प्रेरक-भाव सर्वप्रसिद्ध भूत और इन्द्रियोंके संघातरूप देहमें है, संघातव्यतिरिक्तस्य स्वतन्त्रस्य | अथवा उस सङ्घातसे भिन्न किसी स्वतन्त्र वस्तुमें ही केवल इच्छामात्रसे इच्छामात्रेणैव मनआदिप्रेषयितृ- | मन आदिकी प्रेरकता है ? इस वाक्य-भाष्य प्राण इति नासिकाभवः, | यहाँ प्रकरणवश ‘प्राण’ शब्दसे नासिकामें रहनेवाला वायु समझना प्रकरणातू । प्रथमत्वं प्रचलन- | चाहिये । चलन-क्रिया प्राण-निमित्तक क्रियायाः प्राणनिमित्तत्वात्स्वतो | होनेसे प्राणको प्रधान माना गया है ।

१८ केनोपनिषद् [ खण्ड १

पद-भाष्य त्वम्, इत्यस्यार्थस्य प्रदर्शनार्थं | प्रकार इस अभिप्रायको प्रदर्शित | करनेके लिये ही 'किसके द्वारा केनेषितं पतति प्रेषितं मन इति | इच्छित और प्रेषित किया हुआ मन | [अपने विषयकी ओर] जाता है' ऐसे विशेषणद्वयमुपपद्यते । | दो विशेषण ठीक हो सकते हैं । ननु स्वतन्त्रं मनः स्वविषये | यदि कहो कि यह बात तो | प्रसिद्ध ही है कि मन स्वतन्त्र है मनःप्रभृतीनां स्वयं पततीति प्रसि- | और वह स्वयं ही अपने विषयोंकी पारतन्त्र्य- द्धम्; तत्र कथं प्रश्न | ओर जाता है; फिर उसके विषयमें प्रदर्शनम् उपपद्यत इति, उच्यते— | यह प्रश्न कैसे बन सकता है ? | तो इसके उत्तरमें हमारा कहना है यदि स्वतन्त्रं मनः प्रवृत्ति- | कि यदि मन प्रवृत्ति-निवृत्तिमें | स्वतन्त्र होता तो सभीको अनिष्ट- निवृत्तिविषये स्यात्, तर्हि सर्वस्य | चिन्तन होना ही नहीं चाहिये था । अनिष्टचिन्तनं न स्यात् । अनर्थं | किन्तु मन जान-बूझकर भी अनर्थ- च जानन्सङ्कल्पयति । अभ्यग्र- | चिन्तन करता है और रोके वाक्य-भाष्य विषयावभासमात्रं करणानां | इन्द्रियोंकी स्वतः प्रवृत्ति तो केवल | विषयोंका प्रकाशनमात्र ही है । मन प्रवृत्तिः । चलिक्रिया तु प्राण- | आदिमें चलन-क्रिया तो प्राण- स्यैव मनआदिषु । तस्मात्प्राथम्यं | हीकी है; इसीलिये प्राणकी प्रधानता प्राणस्य । प्रैति गच्छति युक्तः | है । वह प्राण किससे युक्त अर्थात् | प्रेरित होकर गमन करता यानी प्रयुक्त इत्येतत् । वाचो वदनं किं | चलता है । वाणीका भाषण भी किस निमित्तं प्राणिनां चक्षुःश्रोत्रयोश्च | निमित्तसे होता है ? प्राणियोंके नेत्र | और श्रोत्रोंको प्रेरित करनेवाला कौन को देवः प्रयोक्ता । करणानाम् | देव है ? अर्थात् जो चेतन तत्त्व अधिष्ठाता चेतनावान्यः स किं- | इन्द्रियोंका अधिष्ठाता है वह किन विशेषण इत्यर्थः ॥ १ ॥ | विशेषणोंसे युक्त है ? ॥ १ ॥

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९

पद-भाष्य दुःखे च कार्ये वार्यमाणमपि प्रव- | जानेपर भी अत्यन्त दुःखमय र्तत एव मनः। तस्माद्युक्त एव | कार्यमें भी प्रवृत्त हो ही जाता है। केनेषितमित्यादिप्रश्नः। | अतः 'केनेषितम्' इत्यादि प्रश्न उचित ही है। केन प्राणः युक्तः नियुक्तः | किसके द्वारा नियुक्त यानी प्रेरितः सन् प्रैति गच्छति स्व- | प्रेरित हुआ प्राण अपने व्यापारमें व्यापारं प्रति । प्रथम इति प्राण- | प्रवृत्त होता है? 'प्रथम' यह प्राणका विशेषणं स्यात्, तत्पूर्वकत्वात् | विशेषण हो सकता है, क्योंकि सर्वेन्द्रियप्रवृत्तीनाम् । | समस्त इन्द्रियोंकी प्रवृत्तियाँ प्राण- पूर्वक ही होती हैं। केन इषितां वाचम् इमां | लौकिक पुरुष किसके द्वारा शब्दलक्षणां वदन्ति लौकिकाः। | इच्छित यह शब्दरूपा वाणी बोलते तथा चक्षुः श्रोत्रं च स्वे स्वे | हैं? तथा कौन देव—द्योतनवान् विषये क उ देवः द्योतनवान् | (प्रकाशमान) व्यक्ति चक्षु एवं युनक्ति नियुङ्क्ते प्रेरयति ॥१॥ | श्रोत्रेन्द्रियको अपने-अपने व्यापारमें नियुक्त-प्रेरित करता है-॥१॥

पद-भाष्य
एवं पृष्टवते योग्यायाह गुरुः। | इस प्रकार पूछनेवाले योग्य
शिष्यसे गुरुने कहा—तू जो
शृणु यत् त्वं पृच्छसि, मनआदि- | पूछता है कि मन आदि इन्द्रिय-
समूहको अपने विषयोंकी ओर
करणजातस्य को देवः स्वविषयं | प्रेरित करनेवाला कौन देव है और
वह उन्हें किस प्रकार प्रेरित करता
प्रति प्रेरयिता कथं वा प्रेरयतीति। | है, सो सुन—

२० केनोपनिषद् खण्ड १

२० केनोपनिषद् खण्ड १ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ आत्माका सर्वनियन्तृत्व श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणश्चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्मा- ल्लोकादमृता भवन्ति ॥ २ ॥ जो श्रोत्रका श्रोत्र, मनका मन और वाणीका भी वाणी है वही प्राणका प्राण और चक्षुका चक्षु है [-ऐसा जानकर] धीर पुरुष संसारसे मुक्त होकर इस लोकसे जाकर अमर हो जाते हैं ॥ २ ॥ पद-भाष्य श्रोत्रस्य श्रोत्रं शृणोत्यनेनेति | श्रोत्रस्य श्रोत्रम्—जिससे श्रवण श्रोत्रम्, शब्दस्य श्रवणं प्रति | करते हैं वह 'श्रोत्र' है अर्थात् करणं शब्दाभिव्यञ्जकं श्रोत्र- | शब्दके श्रवणमें साधन यानी मिन्द्रियम्, तस्य श्रोत्रं सः | शब्दका अभिव्यञ्जक श्रोत्रेन्द्रिय है। यस्त्वया पृष्टः 'चक्षुः श्रोत्रं क | उसका भी श्रोत्र वह है जिसके उ देवो युनक्ति' इति । | विषयमें तूने पूछा है कि 'चक्षु और श्रोत्रको कौन देव नियुक्त करता है?' वाक्य-भाष्य श्रोत्रस्य श्रोत्रम् इत्यादिप्रति- | 'श्रोत्रस्य श्रोत्रम्' इत्यादि उत्तर वचनं निर्विशेषस्य निमित्तत्वार्थम्। | देना निर्विशेष आत्माका निमित्तत्व बतलानेके लिये है । इस 'श्रोत्रस्य विक्रियादिविशेषरहितस्यात्मनो | श्रोत्रम्' इत्यादि रूपसे उत्तर देनेका मनआदिप्रवृत्तौ निमित्तत्वम् | यही तात्पर्य है कि विक्रिया आदि समस्त इत्येतच्छ्रोत्रस्य श्रोत्रमित्यादिप्रति- | विशेषोंसे रहित आत्माका मन आदि- वचनस्यार्थः; अनुगमात् । तदनु- | की प्रवृत्तिमें कारणत्व है१ यही इससे जाना जाता है, क्योंकि इस श्रुतिके अक्षर गतानि ह्यत्रास्मिन्नर्थेऽक्षराणि। | भी इसी अर्थमें अनुगत हैं। १—अर्थात् वह सर्वथा निर्विकार और निर्विशेष होनेपर भी मन आदिको प्रेरित करनेवाला है ।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१ पद-भाष्य

असावेवंविशिष्टः श्रोत्रादीनि | शङ्का—प्रश्नके उत्तरमें तो यह नियुङ्क्त इति वक्तव्ये, नन्वेत- | बतलाना चाहिये था कि इस दननुरूपं प्रतिवचनं श्रोत्रस्य | प्रकारके गुणोंवाला व्यक्ति श्रोत्रादि- श्रोत्रमिति। | को प्रेरित करता है; उसमें यह | कहना कि वह श्रोत्रका श्रोत्र है— | ठीक उत्तर नहीं है। नैष दोषः, तस्यान्यथाविशेषा- | समाधान—यह कोई दोष नहीं नवगमात्। यदि हि श्रोत्रादि- | है, क्योंकि उस प्रेरकका और व्यापारव्यतिरिक्तेन स्वव्यापा- | किसी प्रकार कोई विशेषरूप नहीं रेण विशिष्टः श्रोत्रादिनियोक्ता | जाना जा सकता। यदि दराँती अवगम्येत दात्रादिप्रयोक्तृवत्, | आदिका प्रयोग करनेवालेके समान तदेदमननुरूपं प्रतिवचनं स्यात्। | श्रोत्रादि व्यापारसे अतिरिक्त किसी न त्विह श्रोत्रादीनां प्रयोक्ता | अपने व्यापारसे विशिष्ट कोई स्वव्यापारविशिष्टो लवित्रादि- | श्रोत्रादिका नियोक्ता ज्ञात होता तो वदधिगम्यते। श्रोत्रादीनामेव तु | यह उत्तर अनुचित होता। किन्तु संहतानां व्यापारेणालोचन- | यहाँ खेत काटनेवालेके समान कोई सङ्कल्पाध्यवसायलक्षणेन फलाव- | श्रोत्रादिका स्वव्यापारविशिष्ट प्रयोक्ता | ज्ञात नहीं है। अवयव-सहयोगसे | उत्पन्न हुए श्रोत्रादिका जो चिदा- | भासकी फलव्याप्तिका लिङ्गरूप | आलोचना, सङ्कल्प एवं निश्चय | आदिरूप व्यापार है उसीसे यह

वाक्य-भाष्य

कथम्? शृणोत्यनेनेति श्रोत्रम्; | कैसे ? [सो इस प्रकार कि] जिससे तस्य शब्दावभासकत्वं श्रोत्रत्वम्। | प्राणी सुनते हैं उसे 'श्रोत्र' कहते हैं। शब्दोपलब्धिरूपतयावभासकत्वं न | उसका जो शब्दको प्रकाशित करना है स्वतः, श्रोत्रस्याचिद्रूपत्वात्, | वह 'श्रोत्रत्व' है। श्रोत्रका जो शब्द- आत्मनश्च चिद्रूपत्वात्। | के उपलब्धिरूपसे प्रकाशकत्व है वह | स्वतः नहीं है; क्योंकि वह अचेतन | है और आत्मा चेतनरूप है।

२२ keनोपनिषद् [ खण्ड १

२२ keनोपनिषद् [ खण्ड १ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦

पद-भाष्य

सानलिङ्गेनावगम्यते—अस्ति हि श्रोत्रादिभिरसंहतः, यत्प्रयोजन-प्रयुक्तः श्रोत्रादिकलापः गृहादिवदिति । संहतानां परार्थत्वादवगम्यते श्रोत्रादीनां प्रयोक्ता। तस्मादनुरूपमेवेदं प्रतिवचनं श्रोत्रस्य श्रोत्रमित्यादि । जाना जाता है कि गृह आदिके समान जिसके प्रयोजनसे श्रोत्रादि कारण-कलाप प्रवृत्त हो रहा है वह श्रोत्रादिसे असंहत ( पृथक् ) कोई तत्त्व अवश्य है। संहत पदार्थ परार्थ (दूसरेके साधनरूप) हुआ करते हैं; इसीसे कोई श्रोत्रादिका प्रयोक्ता अवश्य है—यह जाना जाता है। अतः यह 'श्रोत्रस्य श्रोत्रम्' इत्यादि उत्तर ठीक ही है।

[पार्श्व-टिप्पणी: आत्मनः श्रोत्रादि-प्रकाशकत्वम्] कः पुनरत्र पदार्थः श्रोत्रस्य श्रोत्रमित्यादेः ? न ह्यत्र श्रोत्रस्य श्रोत्रान्तरेणार्थः, यथा प्रकाशस्य प्रकाशान्तरेण । शङ्का—किन्तु इस 'श्रोत्रस्य श्रोत्रम्' इत्यादि पदका यहाँ क्या अर्थ अभिप्रेत है ? क्योंकि जिस तरह एक प्रकाशको दूसरे प्रकाशका प्रयोजन नहीं होता उसी तरह एक श्रोत्रको दूसरे श्रोत्रसे तो कोई प्रयोजन है ही नहीं।

वाक्य-भाष्य

यच्छ्रोत्रस्योपलब्धृत्वेनावभासकत्वं तदात्मनिमित्तत्वाच्छ्रोत्रस्य श्रोत्रमित्युच्यते; यथा क्षत्रस्य क्षत्रं यथा चोदकस्यौष्ण्यमग्निनिमित्तमिति दग्धुरप्युदकस्य दग्धाग्निरुच्यते; उदकमपि ह्यग्निसंयोगादग्निरुच्यते, तद्वद् श्रोत्रका जो उपलब्ध्वारूपसे अवभासकत्व है वह आत्मनिमित्तक होनेसे आत्माको 'श्रोत्रका श्रोत्र' ऐसा कहा जाता है, जैसे क्षत्रिय जातिका [ नियामक कर्म ] क्षत्र कहलाता है; अथवा जैसे [ उष्ण ] जलकी उष्णता अग्निके कारण होती है; इसलिये उस जलानेवाले जलको भी जलानेवाला अग्नि कहा जाता है; और अग्निके संयोगसे जल भी अग्नि कहा जाता है, उसी प्रकार

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३

पद-भाष्य नैष दोषः। अयमत्र पदार्थः— समाधान—यह भी कोई दोष श्रोत्रं तावत्स्वविषयव्यञ्जनसमर्थं नहीं है। यहाँ इस पदका अर्थ दृष्टम् । तत्तु स्वविषयव्यञ्जन- इस प्रकार है—श्रोत्र अपने विषय- सामर्थ्यं श्रोत्रस्य चैतन्ये ह्यात्म- को अभिव्यक्त करनेमें समर्थ है— ज्योतिषि नित्येऽसंहते सर्वान्तरे यह देखा ही जाता है। किन्तु सति भवति, न असति इति । श्रोत्रका वह अपने विषयको अभि- अतः श्रोत्रस्य श्रोत्रमित्याद्युप- व्यक्त करनेका सामर्थ्य नित्य, पद्यते । तथा च श्रुत्यन्तराणि— असंहत, सर्वान्तर चेतन आत्म- “आत्मनैवायं ज्योतिषास्ते” ज्योतिके रहनेपर ही रह सकता है, न (बृ० उ० ४।३।६) “तस्य भासा रहनेपर नहीं रह सकता। अतः सर्वमिदं विभाति” (क० उ० उसे ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ इत्यादि कहना २।२।१५, श्वे० ६।१४, उचित ही है। “यह अपने ही मु० २।२।१०) “येन सूर्यस्त- प्रकाशसे प्रकाशित है” “उसके पति तेजसेद्धः” (तै० ब्रा० ३। प्रकाशसे ही यह सब प्रकाशित १२।९।७) इत्यादीनि । होता है” “जिस तेजसे प्रदीप्त हुआ सूर्य तपता है” इत्यादि श्रुतियाँ भी इसी अर्थकी द्योतक हैं। तथा वाक्य-भाष्य अनित्यं यत्संयोगादुपलब्धृत्वं आत्मामें ] जिनके संयोगसे अनित्य उपलब्धृत्व है वे श्रोत्रादि करण कहलाते तत्करणं श्रोत्रादि । उदकस्येव हैं। जलके दाहकत्वके समान आत्मामें दग्धृत्वमनित्यं हि तत्र तत्। उपलब्धृत्व अनित्य ही है। जैसे अग्निमें नित्य उष्णता रहनेके कारण यत्र तु नित्यमुपलब्धृत्वमग्ना- वह दग्धा कहलाता है उसी प्रकार विवौष्ण्यं स नित्योपलब्धिस्वरूप- जिसमें नित्य-उपलब्धृत्व रहता है वह नित्य उपलब्धिस्वरूप होनेके कारण उप- त्वादग्ध्नेवोपलब्धोच्यते । श्रोत्रा- लब्धा कहा जाता है। श्रोत्रादि निमित्तोंके होनेपर जो आत्मामें श्रोतृत्ववादिकी उप- दिषु श्रोतृत्वानुपलब्धिरनित्या लब्धि होती है वह अनित्य है और केवल नित्या चात्मन्यतः श्रोत्रस्य आत्मामें वह नित्य है, अतः 'श्रोत्रस्य

२४ केनोपनिषद् [ खण्ड १

२४ केनोपनिषद् [ खण्ड १ पद-भाष्य

“यदादित्यगतं तेजो जगद्भा- | गीतामें भी कहा है—“जो तेज सयतेऽखिलम्” (गीता १५।१२) | सूर्यमें स्थित होकर सम्पूर्ण जगत्को “क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति | प्रकाशित करता है” “हे भारत ! भारत” (गीता १३।३३) इति | इसी प्रकार सम्पूर्ण क्षेत्रको क्षेत्री च गीतासु। काठके च “नित्यो | प्रकाशित करता है।” कठोप- नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्” | निषत्में भी कहा है—“वह (२।२।१३) इति। श्रोत्राद्येव | नित्योंका नित्य और चेतनोंका सर्वस्यात्मभूतं चेतनमिति | चेतन है” इत्यादि । श्रोत्रादि प्रसिद्धम्; तदिह निवर्त्यते। अस्ति | इन्द्रियवर्ग ही सबका आत्मभूत किमपि विद्वद्बुद्धिगम्यं सर्वान्तर- | चेतन है—यह बात [लोकमें] तमं कूटस्थमजमजरममृतमभयं | प्रसिद्ध है। उस भ्रान्तिका इस श्रोत्रादेरपि श्रोत्रादि तत्सामर्थ्य- | पदसे निराकरण किया जाता है। निमित्तम् इति प्रतिवचनं शब्दार्थ- | अतः श्रोत्रादिका भी श्रोत्रादि श्चोपपद्यत एव। | अर्थात् उनकी सामर्थ्यका निमित्त- | भूत ऐसा कोई पदार्थ है जो | आत्मवेत्ताओंकी बुद्धिका विषय, | सबसे अन्तरतम, कूटस्थ, अजन्मा, | अजर, अमर और अभयरूप है— | इस प्रकार यह उत्तर और शब्दार्थ | ठीक ही है।

वाक्य-भाष्य

श्रोत्रमित्याद्यक्षराणामर्थानुगमाद् | 'श्रोत्रम्' इत्यादि अक्षरोंके अर्थके उपपद्यते निर्विशेषस्योपलब्धि- | अनुगमसे नित्योपलब्धिस्वरूप निर्विशेष स्वरूपस्यात्मनो मनआदिप्रवृत्ति- | आत्माका मन आदिकी प्रवृत्तिमें कारण निमित्तत्वमिति । मन आदिष्वेवं | होना ठीक ही है। इसी प्रकार [जैसा यथोक्तम् । | कि 'श्रोत्रस्य श्रोत्रम्' के विषयमें कहा | गया है] मन, वाक् और प्राणादिके | सम्बन्धमें भी समझ लेना चाहिये।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५ पद-भाष्य तथा मनसः अन्तःकरणस्य | इसी प्रकार वह मनका—अन्तः- मनः । न ह्यन्तःकरणम् अन्त- | करणका मन है, क्योंकि चिज्ज्योति- रेण चैतन्यज्योतिषो दीधितिं | के प्रकाशके बिना अन्तःकरण स्वविषयसङ्कल्पाध्यवसायादि- | अपने विषय सङ्कल्प और अध्यवसाय समर्थं स्यात् । तस्मान्मनसोऽपि | ( निश्चय ) आदिमें समर्थ नहीं हो मन इति । इह बुद्धिमणसी | सकता । अतः वह मनका भी मन एकीकृत्य निर्देशो मनस इति । | है । यहाँ बुद्धि और मनको एक | मानकर मनका निर्देश किया | गया है । यद्वाचो ह वाचम्; यच्छब्दो | यद्वाचो ह वाचम्—यहाँके यस्मादर्थे श्रोत्रादिभिः सर्वैः | 'यत्' शब्दका 'यस्मात्' अर्थ सम्बध्यते—यस्माच्छ्रोत्रस्य श्रोत्रम्, | ( हेत्वर्थ ) में 'क्योंकि वह श्रोत्रका यस्मान्मनसो मन इत्येवम् । | श्रोत्र है, क्योंकि वह मनका मन वाचो ह वाचमिति द्वितीया | है' इस प्रकार श्रोत्रादि सभी पदोंसे प्रथमात्वेन विपरिणम्यते, प्राणस्य | सम्बन्ध है । 'वाचो ह वाचम्' प्राण इति दर्शनात् । वाचो ह | इस पदसमूहमें 'वाचम्' पदकी | द्वितीया विभक्ति प्रथमा विभक्तिके | रूपमें परिणत कर ली जाती है, | जैसा कि 'प्राणस्य प्राणः' में देखा | जाता है । यदि कहो कि 'वाचो वाक्य-भाष्य वाचो ह वाचं प्राणस्य प्राण | यहाँ 'वाचो ह वाचम्' तथा 'प्राणस्य | प्राणः' इस प्रकार [ पिछले पदमें ] इति विभक्तिद्वयं सर्वत्रैव द्रष्टव्यम् । | सर्वत्र ही [ प्रथमा और द्वितीया ] दो | विभक्ति समझनी चाहिये, क्यों ? क्योंकि कथम् ? पृष्टत्वात्स्वरूपनिर्देशः, | आत्मा-विषयक प्रश्न होनेके कारण | उसके स्वरूपका निर्देश किया गया है | और निर्देश प्रथमा विभक्तिसे ही प्रथमेयव च निर्देशः । तस्य च | किया जाता है; तथा आत्मा ही

२६ केनोपनिषद् [ खण्ड १ ❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦ पद-भाष्य वाचमित्येतदनुरोधेन प्राणस्य | ह वाचम्' इस प्रयोगके अनुरोधसे प्राणमिति कस्माद्द्बितीयैव न | 'प्राणस्य प्राणम्' इस प्रकार द्वितीया क्रियते ? न; बहूनामनुरोधस्य | ही क्यों नहीं कर ली जाती ? तो युक्तत्वात्। वाचमित्यस्य वागि- | ऐसा कहना उचित नहीं क्योंकि त्येतावद्वक्तव्यं स उ प्राणस्य | बहुतोंका अनुरोध मानना ही प्राण इति शब्दद्वयानुरोधेन; एवं | युक्तिसङ्गत है। अतः 'स उ प्राणस्य हि बहूनामनुरोधो युक्तः कृतः | प्राणः' इस पदसमूहके [स और स्यात्। | प्राणः] दो शब्दोंके अनुरोधसे पृष्टं च वस्तु प्रथमयैव निर्देश्टुं | 'वाचम्' इस शब्दको ही 'वाक्' युक्तम्। स यस्त्वया पृष्टः प्राणस्य | इतना कहना चाहिये। ऐसा प्राणाख्यवृत्तिविशेषस्य प्राणः | करनेसे ही बहुतोंका अनुरोध युक्त तत्कृतं हि प्राणस्य प्राणन- | (स्वीकार) किया समझा जायगा। सामर्थ्यम्। न ह्यात्मनानधिष्ठितस्य | इसके सिवा, पूछी हुई वस्तुका प्राणनमुपपद्यते, "को ह्येवान्यात्कः | निर्देश प्रथमा विभक्तिसे ही करना उचित है। [अभिप्राय यह कि] जिसके विषयमें तूने पूछा है वह प्राणका यानी प्राण नामक वृत्ति- विशेषका प्राण है। उसके कारण ही प्राणका प्राणनसामर्थ्य है, क्यों- कि आत्मासे अनधिष्ठित प्राणका प्राणन सम्भव नहीं है, जैसा कि वाक्य-भाष्य ज्ञेयत्वात्कर्मत्वमिति द्वितीया। | ज्ञेय है, इसलिये उसमें कर्मत्व रहनेके अतो वाचो ह वाचं प्राणस्य | कारण द्वितीया भी ठीक है। अतः 'वाचो प्राण इत्यस्मात्सर्वत्रैव विभक्ति- | ह वाचम्' तथा 'प्राणस्य प्राणः' इस द्वयम्। | कथनके अनुसार सभी जगह दो विभक्ति समझनी चाहिये। [अर्थात् सभी पदोंमें ये दोनों विभक्तियाँ रह सकती हैं।]

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ पद-भाष्य प्राण्याद्यदेष आकाश आनन्दो | “यदि यह आनन्दस्वरूप आकाश न स्यात्” (तै० उ० २।७।१) | न होता तो कौन जीवित रहता “ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्य- | और कौन श्वासोच्छ्वास करता” गस्यति” (क० उ० २।२।३) | “वह प्राणको ऊपर ले जाता है इत्यादिश्रुतिभ्यः । इहापि च | तथा अपानको नीचेकी ओर छोड़ता वक्ष्यते येन प्राणः प्रणीयते | है” इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि इति । | है। यहाँ (इस उपनिषद्में) भी श्रोत्रादीन्द्रियप्रस्तावे घ्राण- | यह कहेंगे ही कि जिसके द्वारा स्यैव ग्रहणम् युक्तं न तु प्राणस्य । | प्राण प्राणन करता है उसीको तू सत्यमेवम् ; प्राणग्रहणेनैव तु | ब्रह्म जान । घ्राणस्य ग्रहणं कृतमेव मन्यते | शङ्का—परन्तु यहाँ श्रोत्रादि श्रुतिः । सर्वस्यैव करणकलापस्य | इन्द्रियोंके प्रसङ्गमें घ्राणको ही ग्रहण यदर्थप्रयुक्ता प्रवृत्तिः, तद्ब्रह्मेति | करना युक्तियुक्त है, प्राणको नहीं । प्रकरणार्थो विवक्षितः । | समाधान—यह ठीक है । किन्तु श्रुति, प्राणको ग्रहण करनेसे ही घ्राणका भी ग्रहण किया मानती है । इस प्रकरणको यही अर्थ बतलाना अभीष्ट है कि जिसके लिये सम्पूर्ण इन्द्रिय-समूहकी प्रवृत्ति है वही ब्रह्म है । वाक्य-भाष्य यदेतच्छ्रोत्राद्युपलब्धिनिमितं | यह जो श्रोत्रादिकी उपलब्धिका [हाशिया: आत्मज्ञानेन] श्रोत्रस्य श्रोत्रमि- | निमित्तभूत तथा ‘श्रोत्रका श्रोत्र’ [हाशिया: अमृतत्व-] त्यादिलक्षणं नित्योप- | इत्यादि लक्षणोंवाला नित्योपलब्धि- [हाशिया: निरूपणम्] लब्धिस्वरूपं नि- | स्वरूप निर्विशेष आत्मतत्त्व है उसे र्विशेषमात्मतत्त्वं | जानकर, अज्ञानके कारण आरोपित तद्बुद्ध्वातिमुच्यानवबोधनिमि- | बुद्धि आदि लक्षणोंवाले संसारसे त्ताध्यारोपिताद् बुद्ध्यादिलक्ष- | छूटकर—उससे मुक्त होकर, धीर— णात्संसारान्मोक्षणं कृत्वा धीरा | केनो० २—

२८ केनोपनिषद् [ खण्ड १

२८ केनोपनिषद् [ खण्ड १ पद-भाष्य तथा चक्षुषश्चक्षू रूपप्रकाश- तथा [वह ब्रह्म] चक्षुका चक्षु है। रूपको प्रकाशित करनेवाले कस्य चक्षुषो यद्रूपग्रहणसामर्थ्यं चक्षु-इन्द्रियमें जो रूपको ग्रहण तदात्मचैतन्याधिष्ठितस्यैव । अतः करनेका सामर्थ्य है वह आत्म- चैतन्यसे अधिष्ठित होनेके कारण ही चक्षुषश्चक्षुः । है। इसलिये वह चक्षुका चक्षु है। प्रष्टुः पृष्टस्यार्थस्य ज्ञातुमिष्ट- प्रश्न-कर्ताको अपने पूछे हुए आत्मविदो- त्वात् श्रोत्रादेः श्रोत्रा- पदार्थको जाननेकी इच्छा हुआ ही ऽमृतत्व- दिलक्षणं यथोक्तं करती है; अतः 'अमृता भवन्ति' निरूपणम् (अमर हो जाते हैं) ऐसी फल- ब्रह्म 'ज्ञात्वा' इत्यध्या- श्रुति होनेके कारण उपर्युक्त ह्रियते; अमृता भवन्ति इति श्रोत्रादिके श्रोत्रादिरूप ब्रह्मको जानकर—इस प्रकार यहाँ 'ज्ञात्वा' फलश्रुतेश्च । ज्ञानाद्ध्यामृतत्वं क्रियाका अध्याहार किया जाता है, प्राप्यते। ज्ञात्वा विमुच्यते इति क्योंकि ज्ञानसे ही अमरत्वकी प्राप्ति होती है, जैसा कि '[ब्रह्मको] जानकर सामर्थ्यात्। श्रोत्रादिकरणकलाप- मुक्त हो जाता है' इस उक्तिकी सामर्थ्यसे सिद्ध होता है। जीव मुज्झित्वा-श्रोत्रादौ ह्यात्मभावं श्रोत्रादि करणकलापको त्यागकर —श्रोत्रादिमें ही आत्मभाव करके कृत्वा, तदुपाधिः सन्, तदात्मना उनकी उपाधिसे युक्त होकर जायते म्रियते संसरति च । जन्मता, मरता, और संसारको प्राप्त वाक्य-भाष्य धीमन्तः प्रेत्यास्माल्लोकाच्छरीरात् बुद्धिमान् लोग इस लोकसे जाकर प्रेत्य वियुज्यान्यस्मिन्नप्रति- अर्थात् इस शरीरसे पृथक् होकर दूसरे शरीरका अनुसन्धान न करनेके कारण सन्धीयमाने निर्निमित्तत्वादमृता अन्य कोई प्रयोजन न रहनेसे अमृत भवन्ति । हो जाते हैं।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३

पद-भाष्य अतः श्रोत्रादेः श्रोत्रादिलक्षणं | होता है। अतः श्रोत्रादिका श्रोत्रादि ब्रह्मात्मेति विदित्वा, अतिमुच्य | रूप ब्रह्म ही आत्मा है ऐसा जानकर श्रोत्राद्यात्मभावं परित्यज्य—ये | और अतिमोचन करके अर्थात् श्रोत्राद्यात्मभावं परित्यजन्ति, ते | श्रोत्रादिमें आत्मभावको त्यागकर धीर धीराः धीमन्तः; न हि विशिष्ट- | पुरुष 'प्रेत्य' अर्थात् पुत्र, मित्र, धीमत्त्वमन्तरेण श्रोत्राद्यात्म- | कलत्र और बन्धुओंमें अहंता-ममताके भावः शक्यः परित्यक्तुम्—प्रेत्य | व्यवहाररूप इस लोकसे विलग हो व्यावृत्य अस्मात् लोकात् पुत्र- | यानी सम्पूर्ण एषणाओंसे मुक्त मित्रकलत्रबन्धुषु ममाहंभाव- | होकर अमृत—अमरणधर्मा हो संव्यवहारलक्षणात्, त्यक्तसर्वै- | जाते हैं। जो लोग श्रोत्रादिमें आत्म- षणा भूत्वेत्यर्थः अमृता | भावका त्याग करते हैं वे धीर यानी अमरणधर्माणो भवन्ति । | बुद्धिमान् होते हैं। क्योंकि विशिष्ट | बुद्धिमत्त्वके विना श्रोत्रादिमें आत्म- | भावका त्याग नहीं किया जा सकता। वाक्य-भाष्य सति ह्यज्ञाने कर्माणि शरी- | अज्ञानके रहनेतक ही कर्म दूसरे | शरीरकी खोज किया करते हैं । रान्तरं प्रतिसन्दधते । आत्मा- | आत्मज्ञान हो जानेपर तो सम्पूर्ण वबोधे तु सर्वकर्मारम्भनिमित्ता- | कर्मोंके आरम्भक अज्ञानसे विपरीत | ज्ञानरूप अग्निद्वारा कर्मोंके दग्ध ज्ञानविपरीतविद्याग्निप्लुष्टत्वात् | हो जानेपर फिर प्रारब्ध निःशेष हो | जानेके कारण वे अमृत ही हो जाते कर्मणामनारम्भेऽमृता एव | हैं। [अनादि संसारपरम्परासे 'मैं | शरीर हूँ' ऐसे अध्यासके कारण ] भवन्ति। शरीरादिसन्तानाविच्छेद- | 'पुनः पुनः शरीरप्राप्तिरूप परम्पराका | विच्छेद न हो' ऐसा अनुसन्धान करते प्रतिसन्धानाद्यपेक्षयाध्यारोपित- | रहनेके कारण अपने ऊपर आरोपित

३० केनोपनिषद् [ खण्ड १ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ पद-भाष्य “न कर्मणा न प्रजया धनेन “कर्मसे, प्रजासे अथवा धनसे त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः” नहीं, किन्हीं-किन्हींने केवल त्यागसे (कैवल्य० १।२) “पराञ्चि ही अमरत्व लाभ किया है” “स्वयम्भू- खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात् ने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्। कर दिया है इसलिये जीव बाह्य कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदा- वस्तुओंको ही देखता है, अपने वृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्”(क०उ० अन्तरात्माको नहीं देखता । कोई २।१।१) “यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते बुद्धिमान् पुरुष अमरत्वकी इच्छासे कामा येऽस्य हृदि श्रिताः•••••• इन्द्रियोंको रोककर अपने प्रत्य- अत्र ब्रह्म समश्नुते” (क० उ० गात्माको देखता है” “जिस समय २।३।१४) इत्यादिश्रुतिभ्यः। इसके हृदयकी कामनाएँ छूट जाती अथवा, अतिमुच्येत्यनेनैवैषणा- हैं••••इस अवस्थामें वह ब्रह्मको प्राप्त त्यागस्य सिद्धत्वाद् अस्माल्लोकात् कर लेता है” इत्यादि श्रुतियोंसे प्रेत्य अस्माच्छरीरादपेत्य मृत्वे- भी यही सिद्ध होता है । अथवा त्यर्थः ॥२॥ एषणात्याग तो ‘अतिमुच्य’ इस पदसे ही सिद्ध हो जाता है, अतः ‘अस्माल्लोकात्प्रेत्य’ का यह भाव समझना चाहिये कि इस शरीरसे अलग होकर यानी मरकर [अमर हो जाते हैं] ॥ २ ॥ ❧ ❧ ❧ यस्माच्छ्रोत्रादेरपि श्रोत्राद्यात्म- क्योंकि ब्रह्म श्रोत्रादिका भी भूतं ब्रह्म, अतः । श्रोत्रादिरूप है, इसलिये— वाक्य-भाष्य मृत्युवियोगात्पूर्वमप्यमृताः सन्तो की हुई अज्ञानरूप मृत्युका वियोग नित्यात्मस्वरूपवत्त्वादमृता भवन्ति होनेसे पूर्व भी नित्य आत्मस्वरूप होनेके कारण यद्यपि अमृत ही रहते इत्युपचर्यते ॥ २ ॥ हैं तथापि अमर होते हैं—ऐसा उपचारसे कहा जाता है ॥ २ ॥ ❧ ❧ ❧

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१

आत्माका अज्ञेयत्व और अनिर्वचनीयत्व न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यादन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि। इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे ॥३॥ वहाँ (उस ब्रह्मतक) नेत्रेन्द्रिय नहीं जाती, वाणी नहीं जाती, मन नहीं जाता। अतः जिस प्रकार शिष्यको इस ब्रह्मका उपदेश करना चाहिये, वह हम नहीं जानते—वह हमारी समझमें नहीं आता। वह विदितसे अन्य ही है तथा अविदितसे भी परे है—ऐसा हमने पूर्व- पुरुषोंसे सुना है, जिन्होंने हमारे प्रति उसका व्याख्यान किया था ॥ ३ ॥ पद-भाष्य न तत्र तस्मिन्ब्रह्मणि चक्षुः | वहाँ—उस ब्रह्ममें नेत्रेन्द्रिय गच्छति, स्वात्मनि गमना- | नहीं जाती, क्योंकि अपनेहीमें अपनी सम्भवात्। तथा न वाग् गच्छति। | गति होनी असम्भव है। और न वाणी वाचा हि शब्द उच्चार्यमाणोऽभि- | ही पहुँचती है। जिस समय वाणी- धेयं प्रकाशयति यदा, तदाभि- | से उच्चारण किया हुआ शब्द अपने धेयं प्रति वाग्गच्छतीत्युच्यते। | वाच्यको प्रकाशित करता है उस | समय ही, अपने वाच्यतक वाणी | पहुँचती है—ऐसा कहा जाता है। वाक्य-भाष्य न तत्र चक्षुर्गच्छति इत्युक्तेऽपि | यद्यपि आचार्यने तत्त्वका निरूपण पर्यनुयोगे हेतुप्रतिपत्तेः। | कर दिया तो भी न समझनेके कारण श्रोत्रस्य श्रोत्रमित्येवमादिना | शिष्यके पुनः प्रश्न करनेमें 'वहाँ उक्तेऽप्यात्मतत्त्वेऽप्रतिपन्नतवात् | नेत्रेन्द्रिय नहीं जाती' इत्यादि कारण सूक्ष्मत्वहेतोर्वस्तुनः पुनः | है। अर्थात् 'श्रोत्रस्य श्रोत्रम्' इत्यादि पुनः पर्यनुयुयुक्षाकारणमाह—न | श्रुतिसे आत्मतत्त्वका निरूपण कर | दिये जानेपर भी आत्मतत्त्व अत्यन्त | सूक्ष्म होनेके कारण समझमें न आनेसे | शिष्यको जो पुनः पूछनेकी इच्छा | हुई उसका कारण 'न तत्र चक्षुर्गच्छति'

३२ केनोपनिषद् [ खण्ड १

३२ केनोपनिषद् [ खण्ड १ ❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦ पद-भाष्य तस्य च शब्दस्य तन्निर्वर्तकस्य च | किन्तु ब्रह्म तो शब्द और उसका करणस्यात्मा ब्रह्म । अतो न | व्यवहार करनेवाले इन्द्रियका आत्मा है । अतः वाणी वहाँ उसी प्रकार वाग्गच्छति यथाग्निद्राइकः | नहीं पहुँच सकती, जैसे कि अग्नि प्रकाशकश्चापि सन् न ह्यात्मानं | दाहक और प्रकाशक होनेपर भी अपनेको न जलाता है और न प्रकाशयति दहति वा, तद्वत् । | प्रकाशित ही करता है । नो मनः मनश्चान्यस्य | और न मन ही [ वहाँतक जाता है ] । मन भी अन्य पदार्थोंका सङ्कल्पयितृ अध्यवसायितृ च सत् | सङ्कल्प और निश्चय करनेवाला नात्मानं सङ्कल्पयत्यध्यवस्यति | होता हुआ भी अपना सङ्कल्प या निश्चय नहीं करता है, क्योंकि ब्रह्म च, तस्यापि ब्रह्मात्मेति। इन्द्रिय- | उसका भी आत्मा है । इन्द्रिय और मनोभ्यां हि वस्तुनो विज्ञानम् । | मनसे ही वस्तुका ज्ञान हुआ करता है; उनका अविषय होनेके कारण तद्गोचरत्वान्न विद्मः तद्ब्रह्म | हम यह नहीं जानते कि वह ब्रह्म ईदृशमिति । | ऐसा है । वाक्य-भाष्य तत्र चक्षुर्गच्छतीति। तत्र श्रोत्रा- | इत्यादि श्रुतिसे बतलाया गया है । श्रोत्रादिके आत्मस्वरूप उस आत्म- द्यात्मभूते चक्षुरादीनि वाक्- | तत्त्वके विषयमें चक्षु आदि इन्द्रियाँ चक्षुषोः सर्वेन्द्रियोपलक्षणार्थ- | ज्ञान उत्पन्न नहीं कर सकतीं, क्योंकि यहाँ वाक् और चक्षु सभी त्वात्न विज्ञानमुत्पादयन्ति । | इन्द्रियोंका उपलक्षण करनेके लिये हैं । सुखादिवत्तर्हि गृह्येतान्तःकर- | [ इसपर सन्देह होता है-] तो फिर सुखादिके समान उसकाः अन्तःकरणसे ग्रहण हो सकता होगा ? णेनात आह-नो मनः । न | [ इसपर कहते हैं-] मन भी उसतक