BharatKosha
Back to the archive

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

१३२-

Page 971Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

अर्जुनके द्वारा लक्ष्यवेध, द्रोणका ग्राहसे छुटकारा और अर्जुनको ब्रह्मशिर नामक अस्त्रकी प्राप्ति

वैशम्पायन उवाच

ततो धनंजयं द्रोणः स्मयमानोऽभ्यभाषत ।
त्वयेदानीं प्रहर्तव्यमेतल्लक्ष्यं विलोक्यताम् ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर द्रोणाचार्यने अर्जुनसे मुसकराते हुए कहा—'अब तुम्हें इस लक्ष्यका वेध करना है। इसे अच्छी तरह देख लो' ।। १ ।।

मद्वाक्यसमकालं ते मोक्तव्योऽत्र भवेच्छरः ।
वितत्य कार्मुकं पुत्र तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम् ।। २ ।।
‘मेरी आज्ञा मिलनेके साथ ही तुम्हें इसपर बाण छोड़ना होगा। बेटा! धनुष तानकर खड़े हो जाओ और दो घड़ी मेरे आदेशकी प्रतीक्षा करो' ।। २ ।।

एवमुक्तः सव्यसाची मण्डलीकृतकार्मुकः ।
तस्थौ भासं समुद्दिश्य गुरुवाक्यप्रचोदितः ।। ३ ।।
उनके ऐसा कहनेपर अर्जुनने धनुषको इस प्रकार खींचा कि वह मण्डलाकार (गोल) प्रतीत होने लगा। फिर वे गुरुकी आज्ञासे प्रेरित हो गीधकी ओर लक्ष्य करके खड़े हो गये ।। ३ ।।

Page 972Permalink

मुहूर्तादिव तं द्रोणस्तथैव समभाषत ।
पश्यस्येनं स्थितं भासं द्रुमं मामपि चार्जुन ॥ ४ ॥
मानो दो घड़ी बाद द्रोणाचार्यने उनसे भी उसी प्रकार प्रश्न किया—'अर्जुन! क्या तुम उस वृक्षपर बैठे हुए गीधको, वृक्षको और मुझे भी देखते हो?' ॥ ४ ॥

पश्याम्येकं भासमिति द्रोणं पार्थोऽभ्यभाषत ।
न तु वृक्षं भवन्तं वा पश्यामीति च भारत ॥ ५ ॥
जनमेजय! यह प्रश्न सुनकर अर्जुनने द्रोणाचार्यसे कहा—'मैं केवल गीधको देखता हूँ। वृक्षको अथवा आपको नहीं देखता' ॥ ५ ॥

ततः प्रीतमना द्रोणो मुहूर्तादिव तं पुनः ।
प्रत्यभाषत दुर्धर्षः पाण्डवानां महारथम् ॥ ६ ॥
इस उत्तरसे द्रोणका मन प्रसन्न हो गया। मानो दो घड़ी बाद दुर्धर्ष द्रोणाचार्यने पाण्डव-महारथी अर्जुनसे फिर पूछा— ॥ ६ ॥

भासं पश्यसि यद्येनं तथा ब्रूहि पुनर्वचः ।
शिरः पश्यामि भासस्य न गात्रमिति सोऽब्रवीत् ॥ ७ ॥
'वत्स! यदि तुम इस गीधको देखते हो तो फिर बताओ, उसके अंग कैसे हैं?' अर्जुन बोले—'मैं गीधका मस्तकभर देख रहा हूँ, उसके सम्पूर्ण शरीरको नहीं' ॥ ७ ॥

Page 973Permalink

अर्जुनेनैवमुक्तस्तु द्रोणो हृष्टतनूरुहः । मुञ्चस्वेत्यब्रवीत् पार्थं स मुमोचाविचारयन् ॥ ८ ॥ अर्जुनके यों कहनेपर द्रोणाचार्यके शरीरमें (हर्षातिरेकसे) रोमांच हो आया और वे अर्जुनसे बोले, 'चलाओ बाण'! अर्जुनने बिना सोचे-विचारे बाण छोड़ दिया ॥ ८ ॥

ततस्तस्य नगस्थस्य क्षुरेण निशितेन च । शिर उत्कृत्य तरसा पातयामास पाण्डवः ॥ ९ ॥ फिर तो पाण्डुनन्दन अर्जुनने अपने चलाये हुए तीखे क्षुर नामक बाणसे वृक्षपर बैठे हुए उस गीधका मस्तक वेगपूर्वक काट गिराया ॥ ९ ॥

तस्मिन् कर्मणि संसिद्धे पर्यष्वजत पाण्डवम् । मेने च द्रुपदं संख्ये सानुबन्धं पराजितम् ॥ १० ॥ इस कार्यमें सफलता प्राप्त होनेपर आचार्यने अर्जुनको हृदयसे लगा लिया और उन्हें यह विश्वास हो गया कि राजा द्रुपद युद्धमें अर्जुनद्वारा अपने भाई-बन्धुओंसहित अवश्य पराजित हो जायँगे ॥ १० ॥

कस्यचित् त्वथ कालस्य सशिष्योऽङ्गिरसां वरः । जगाम गङ्गामभितो मज्जितुं भरतर्षभ ॥ ११ ॥ भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर किसी समय आंगिरसवंशियोंमें उत्तम आचार्य द्रोण अपने शिष्योंके साथ गंगाजीमें स्नान करनेके लिये गये ॥ ११ ॥

अवगाढमथो द्रोणं सलिले सलिलेचरः । ग्राहो जग्राह बलवाञ्जङ्घान्ते कालचोदितः ॥ १२ ॥ वहाँ जलमें गोता लगाते समय कालसे प्रेरित हो एक बलवान् जलजन्तु ग्राहने द्रोणाचार्यकी पिंडली पकड़ ली ॥ १२ ॥

स समर्थोऽपि मोक्षाय शिष्यान् सर्वानचोदयत् । ग्राहं हत्वा मोक्षयध्वं मामिति त्वरयन्निव ॥ १३ ॥ वे अपनेको छुड़ानेमें समर्थ होते हुए भी मानो हड़बड़ाये हुए अपने सभी शिष्योंसे बोले—'इस ग्राहको मारकर मुझे बचाओ' ॥ १३ ॥

तद्वाक्यसमकालं तु बीभत्सुर्निशितैः शरैः । अवार्यैः पञ्चभिर्ग्राहं मग्नमम्भस्यताडयत् ॥ १४ ॥ उनके इस आदेशके साथ ही बीभत्सु (अर्जुन)-ने पाँच अमोघ एवं तीखे बाणोंद्वारा पानीमें डूबे हुए उस ग्राहपर प्रहार किया ॥ १४ ॥

इतरे त्वथ सम्मूढास्तत्र तत्र प्रपेदिरे । तं तु दृष्ट्वा क्रियोपेतं द्रोणोऽमन्यत पाण्डवम् ॥ १५ ॥ विशिष्टं सर्वशिष्येभ्यः प्रीतिमांश्चाभवत् तदा । स पार्थबाणैर्बहुधा खण्डशः परिकल्पितः ॥ १६ ॥

Page 974Permalink

ग्राहः पञ्चत्वमापेदे जङ्घां त्यक्त्वा महात्मनः ।
अथाब्रवीन्महात्मानं भारद्वाजो महारथम् ।। १७ ।।
परंतु दूसरे राजकुमार हक्के-बक्के-से होकर अपने-अपने स्थानपर ही खड़े रह गये। अर्जुनको तत्काल कार्यमें तत्पर देख द्रोणाचार्यने उन्हें अपने सब शिष्योंसे बढ़कर माना और उस समय वे उनपर बहुत प्रसन्न हुए। अर्जुनके बाणोंसे ग्राहके टुकड़े-टुकड़े हो गये और वह महात्मा द्रोणकी पिंडली छोड़कर मर गया। तब द्रोणाचार्यने महारथी महात्मा अर्जुनसे कहा— ।। १५—१७ ।।
गृहाणेदं महाबाहो विशिष्टमतिदुर्धरम् ।
अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम सप्रयोगनिवर्तनम् ।। १८ ।।
‘महाबाहो! यह ब्रह्मशिर नामक अस्त्र मैं तुम्हें प्रयोग और उपसंहारके साथ बता रहा हूँ। यह सब अस्त्रोंसे बढ़कर है तथा इसे धारण करना भी अत्यन्त कठिन है। तुम इसे ग्रहण करो’ ।। १८ ।।
न च ते मानुषेष्वेतत् प्रयोक्तव्यं कथंचन ।
जगद् विनिर्दहेदेतदल्पतेजसि पातितम् ।। १९ ।।
‘मनुष्योंपर तुम्हें इस अस्त्रका प्रयोग किसी भी दशामें नहीं करना चाहिये। यदि किसी अल्प तेजवाले पुरुषपर इसे चलाया गया तो यह उसके साथ ही समस्त संसारको भस्म कर सकता है ।। १९ ।।
असामान्यमिदं तात लोकेष्वस्त्रं निगद्यते ।
तद् धारयेथाः प्रयतः शृणु चेदं वचो मम ।। २० ।।
‘तात! यह अस्त्र तीनों लोकोंमें असाधारण बताया गया है। तुम मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर इस अस्त्रको धारण करो और मेरी यह बात सुनो ।। २० ।।
बाधेतामानुषः शत्रुर्यदि त्वां वीर कश्चन ।
तद्वधाय प्रयुञ्जीथास्तदस्त्रमिदमाहवे ।। २१ ।।
‘वीर! यदि कोई अमानव शत्रु तुम्हें युद्धमें पीड़ा देने लगे तो तुम उसका वध करनेके लिये इस अस्त्रका प्रयोग कर सकते हो’ ।। २१ ।।
तथेति सम्प्रतिश्रुत्य बीभत्सुः स कृताञ्जलिः ।
जग्राह परमास्त्रं तदाह चैनं पुनर्गुरुः ।
भविता त्वत्समो नान्यः पुमाँल्लोके धनुर्धरः ।। २२ ।।
तब अर्जुनने ‘तथास्तु’ कहकर वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा की और हाथ जोड़कर उस उत्तम अस्त्रको ग्रहण किया। उस समय गुरु द्रोणने अर्जुनसे पुनः यह बात कही—‘संसारमें दूसरा कोई पुरुष तुम्हारे समान धनुर्धर न होगा’ ।। २२ ।।

Page 975Permalink

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि द्रोणग्राहमोक्षणे द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें द्रोणाचार्यका ग्राहसे छुटकारा नामक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३२ ॥

१३३-

Page 976Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

राजकुमारोंका रंगभूमिमें अस्त्र-कौशल दिखाना

वैशम्पायन उवाच

कृतास्त्रान् धार्तराष्ट्रांश्च पाण्डुपुत्रांश्च भारत ।
दृष्ट्वा द्रोणोऽब्रवीद् राजन् धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् ॥ १ ॥
कृपस्य सोमदत्तस्य बाह्लीकस्य च धीमतः ।
गाङ्गेयस्य च सांनिध्ये व्यासस्य विदुरस्य च ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**भारत! जब द्रोणने देखा कि धृतराष्ट्रके पुत्र तथा पाण्डव अस्त्र-विद्याकी शिक्षा समाप्त कर चुके, तब उन्होंने कृपाचार्य, सोमदत्त, बुद्धिमान् बाह्लीक, गंगानन्दन भीष्म, महर्षि व्यास तथा विदुरजीके निकट राजा धृतराष्ट्रसे कहा— ॥ १-२ ॥

राजन् सम्प्राप्तविद्यास्ते कुमाराः कुरुसत्तम ।
ते दर्शयेयुः स्वां शिक्षां राजन्ननुमते तव ॥ ३ ॥
ततोऽब्रवीन्महाराजः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
‘राजन्! आपके कुमार अस्त्र-विद्याकी शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं। कुरुश्रेष्ठ! यदि आपकी अनुमति हो तो वे अपनी सीखी हुई अस्त्र-संचालनकी कलाका प्रदर्शन करें’।
यह सुनकर महाराज धृतराष्ट्र अत्यन्त प्रसन्नचित्तसे बोले ॥ ३ १/२ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

भारद्वाज महत् कर्म कृतं ते द्विजसत्तम ॥ ४ ॥
**धृतराष्ट्रने कहा—**द्विजश्रेष्ठ भरद्वाजनन्दन! आपने (राजकुमारोंको अस्त्रकी शिक्षा देकर) बहुत बड़ा कार्य किया है ॥ ४ ॥

यदानुमन्यसे कालं यस्मिन् देशे यथा यथा ।
तथा तथा विधानाय स्वयमाज्ञापयस्व माम् ॥ ५ ॥
आप कुमारोंकी अस्त्र-शिक्षाके प्रदर्शनके लिये जब जो समय ठीक समझें, जिस स्थानपर जिस-जिस प्रकारका प्रबन्ध आवश्यक मानें, उस-उस तरहकी तैयारी करनेके लिये स्वयं ही मुझे आज्ञा दें ॥ ५ ॥

स्पृहयाम्यद्य निर्वेदात् पुरुषाणां सचक्षुषाम् ।
अस्त्रहेतोः पराक्रान्तान् ये मे द्रक्ष्यन्ति पुत्रकान् ॥ ६ ॥
आज मैं नेत्रहीन होनेके कारण दुःखी होकर, जिनके पास आँखें हैं, उन मनुष्योंके सुख और सौभाग्यको पानेके लिये तरस रहा हूँ; क्योंकि वे अस्त्र-कौशलका प्रदर्शन करनेके लिये भाँति-भाँतिके पराक्रम करनेवाले मेरे पुत्रोंको देखेंगे ॥ ६ ॥

Page 977Permalink

क्षत्तर्यद् गुरुराचार्यो ब्रवीति कुरु तत् तथा । न हीदृशं प्रियं मन्ये भविता धर्मवत्सल ॥ ७ ॥ (आचार्यसे इतना कहकर राजा धृतराष्ट्र विदुरसे बोले—) ‘धर्मवत्सल! विदुर! गुरु द्रोणाचार्य जो काम जैसे कहते हैं, उसी प्रकार उसे करो। मेरी रायमें इसके समान प्रिय कार्य दूसरा नहीं होगा' ॥ ७ ॥

ततो राजानमामन्त्र्य निर्गतो विदुरो बहिः । भारद्वाजो महाप्राज्ञो मापयामास मेदिनीम् ॥ ८ ॥ तदनन्तर राजाकी आज्ञा लेकर विदुरजी (आचार्य द्रोणके साथ) बाहर निकले। महाबुद्धिमान् भरद्वाजनन्दन द्रोणने रंगमण्डपके लिये एक भूमि पसंद की और उसका माप करवाया ॥ ८ ॥

समामवृक्षां निर्गुल्मामुदक्प्रस्रवणान्विताम् । तस्यां भूमौ बलिं चक्रे तिथौ नक्षत्रपूजिते ॥ ९ ॥ अवघुष्टे समाजे च तदर्थं वदतां वरः । रङ्गभूमौ सुविपुलं शास्त्रदृष्टं यथाविधि ॥ १० ॥ प्रेक्षागारं सुविहितं चक्रुस्ते तस्य शिल्पिनः । राज्ञः सर्वायुधोपेतं स्त्रीणां चैव नरर्षभ ॥ ११ ॥ मञ्चांश्च कारयामासुस्तत्र जानपदा जनाः । विपुलामुच्छ्रयोपेतान् शिबिकाश्च महाधनाः ॥ १२ ॥ वह भूमि समतल थी। उसमें वृक्ष या झाड़-झंखाड़ नहीं थे। वह उत्तरदिशाकी ओर नीची थी। वक्ताओंमें श्रेष्ठ द्रोणने वास्तुपूजन देखनेके लिये डिण्डिम-घोष कराके वीरसमुदायको आमन्त्रित किया और उत्तम नक्षत्रसे युक्त तिथिमें उस भूमिपर वास्तुपूजन किया। तत्पश्चात् उनके शिल्पियोंने उस रंगभूमिमें वास्तु-शास्त्रके अनुसार विधिपूर्वक एक अति विशाल प्रेक्षागृहकी* नींव डाली तथा राजा और राजघरानेकी स्त्रियोंके बैठनेके लिये वहाँ सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न बहुत सुन्दर भवन बनाया। जनपदके लोगोंने अपने बैठनेके लिये वहाँ ऊँचे और विशाल मंच बनवाये तथा (स्त्रियोंको लानेके लिये) बहुमूल्य शिबिकाएँ तैयार करायीं ॥ ९—१२ ॥

तस्मिंस्ततोऽहनि प्राप्ते राजा ससचिवस्तदा । भीष्मं प्रमुखतः कृत्वा कृपं चाचार्यसत्तमम् ॥ १३ ॥ (बाह्लीकं सोमदत्तं च भूरिश्रवसमेव च । कुरूनन्यांश्च सचिवानादाय नगराद् बहिः ॥) मुक्ताजालपरिक्षिप्तं वैदूर्यमणिशोभितम् । शातकुम्भमयं दिव्यं प्रेक्षागारमुपागमत् ॥ १४ ॥

Page 978Permalink

तत्पश्चात् जब निश्चित दिन आया, तब मन्त्रियोंसहित राजा धृतराष्ट्र भीष्मजी तथा आचार्यप्रवर कृपको आगे करके बाह्लीक, सोमदत्त, भूरिश्रवा तथा अन्यान्य कौरवों और मन्त्रियोंको साथ ले नगरसे बाहर उस दिव्य प्रेक्षागृहमें आये। उसमें मोतियोंकी झालरें लगी थीं, वैदूर्यमणियोंसे उस भवनको सजाया गया था तथा उसकी दीवारोंमें स्वर्णखण्ड मढ़े गये थे ।। १३-१४ ।।

गान्धारी च महाभागा कुन्ती च जयतां वर । स्त्रियश्च राज्ञः सर्वास्ताः सप्रेष्याः सपरिच्छदाः ।। १५ ।। हर्षादारुरुहुर्मञ्चान् मेरुं देवस्त्रियो यथा । ब्राह्मणक्षत्रियाद्यं च चातुर्वर्ण्यं पुराद् द्रुतम् ।। १६ ।। दर्शनेप्सु समभ्यागात् कुमाराणां कृतास्त्रताम् । क्षणेनैकस्थतां तत्र दर्शनेप्सु जगाम ह ।। १७ ।।

विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ जनमेजय! परम सौभाग्यशालिनी गान्धारी, कुन्ती तथा राजभवनकी सभी स्त्रियाँ वस्त्राभूषणोंसे सज-धजकर दास-दासियों और आवश्यक सामग्रियोंके साथ उस भवनमें आयीं तथा जैसे देवांगनाएँ मेरुपर्वतपर चढ़ती हैं, उसी प्रकार वे हर्षपूर्वक मंचोंपर चढ़ गयीं। ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि चारों वर्णोंके लोग कुमारोंका अस्त्र-कौशल देखनेकी इच्छासे तुरंत नगरसे निकलकर आ गये। क्षणभरमें वहाँ विशाल जनसमुदाय एकत्र हो गया ।। १५-१७ ।।

प्रवादितैश्च वादित्रैर्जनकौतूहलेन च । महार्णव इव क्षुब्धः समाजः सोऽभवत् तदा ।। १८ ।।

अनेक प्रकारके बाजोंके बजनेसे तथा मनुष्योंके बढ़ते हुए कौतूहलसे वह जनसमूह उस समय क्षुब्ध महासागरके समान जान पड़ता था ।। १८ ।।

ततः शुक्लाम्बरधरः शुक्लयज्ञोपवीतवान् । शुक्लकेशः सितश्मश्रुः शुक्लमाल्यानुलेपनः ।। १९ ।। रंगमध्यं तदाऽऽचार्यः सपुत्रः प्रविवेश ह । नभो जलधरैर्हीनं साङ्गारक इवांशुमान् ।। २० ।।

तदनन्तर श्वेत वस्त्र और श्वेत यज्ञोपवीत धारण किये आचार्य द्रोणने अपने पुत्र अश्वत्थामाके साथ रंगभूमिमें प्रवेश किया; मानो मेघरहित आकाशमें चन्द्रमाने मंगलके साथ पदार्पण किया हो। आचार्यके सिर और दाढ़ी-मूँछके बाल सफेद हो गये थे। वे श्वेत पुष्पोंकी माला और श्वेत चन्दनसे सुशोभित हो रहे थे ।। १९-२० ।।

स यथासमयं चक्रे बलिं बलवतां वरः । ब्राह्मणांस्तु सुमन्त्रज्ञान् कारयामास मङ्गलम् ।। २१ ।।

बलवानोंमें श्रेष्ठ द्रोणने यथासमय देवपूजा की और श्रेष्ठ मन्त्रवेत्ता ब्राह्मणोंसे मंगलपाठ करवाया ।। २१ ।।

Page 979Permalink

(सुवर्णमणिरत्नानि वस्त्राणि विविधानि च । प्रददौ दक्षिणां राजा द्रोणस्य च कृपस्य च ॥) सुखपुण्यार्हघोषस्य पुण्यस्य समनन्तरम् । विविशुर्विविधं गृह्य शस्त्रोपकरणं नराः ॥ २२ ॥ उस समय राजा धृतराष्ट्रने सुवर्ण, मणि, रत्न तथा नाना प्रकारके वस्त्र आचार्य द्रोण और कृपको दक्षिणारूपमें दिये। फिर सुखमय पुण्याहवाचन तथा दान-होम आदि पुण्यकर्मोंके अनन्तर नाना प्रकारकी शस्त्र-सामग्री लेकर बहुत-से मनुष्योंने उस रंगमण्डपमें प्रवेश किया ॥ २२ ॥

ततो बद्धाङ्गुलित्राणा बद्धकक्षा महारथाः । बद्धतूणाः सधनुषो विविशुर्भरतर्षभाः ॥ २३ ॥ उसके बाद भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ वे वीर राजकुमार बड़े-बड़े रथोंके साथ दस्ताने पहने, कमर कसे, पीठपर तूणीर बाँधे और धनुष लिये हुए उस रंगमण्डपके भीतर आये ॥ २३ ॥

अनुज्येष्ठं तु ते तत्र युधिष्ठिरपुरोगमाः । (रणमध्ये स्थितं द्रोणमभिवाद्य नरर्षभाः । पूजां चक्रुर्यथान्यायं द्रोणस्य च कृपस्य च ॥ नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर आदि उन राजकुमारोंने जेठे-छोटेके क्रमसे स्थित हो उस रंगभूमिके मध्यभागमें बैठे हुए आचार्य द्रोणको प्रणाम करके द्रोण और कृप दोनों आचार्योंकी यथोचित पूजा की।

आशीर्भिश्च प्रयुक्ताभिः सर्वे संहृष्टमानसाः । अभिवाद्य पुनः शस्त्रान् बलिपुष्पैः समन्वितान् ॥ रक्तचन्दनसम्मिश्रैः स्वयमर्चन्त कौरवाः । रक्तचन्दनदिग्धाश्च रक्तमाल्यानुधारिणः ॥ सर्वे रक्तपताकाश्च सर्वे रक्तान्तलोचनाः । द्रोणेन समनुज्ञाता गृह्य शस्त्रं परंतपाः ॥ धनूंषि पूर्वं संगृह्य तप्तकाञ्चनभूषिताः । सज्यानि विविधाकारैः शरैः संधाय कौरवाः ॥ ज्याघोषं तलघोषं च कृत्वा भूतान्यपूजयन् ।) चक्रुरस्त्रं महावीर्याः कुमाराः परमाद्भुतम् ॥ २४ ॥ फिर उनसे आशीर्वाद पाकर उन सबका मन प्रसन्न हो गया। तत्पश्चात् पूजाके पुष्पोंसे आच्छादित अस्त्र-शस्त्रोंको प्रणाम करके कौरवोंने रक्त चन्दन और फूलोंद्वारा पुनः स्वयं उनका पूजन किया। वे सब-के-सब लाल चन्दनसे चर्चित तथा लाल रंगकी मालाओंसे विभूषित थे। सबके रथोंपर लाल रंगकी पताकाएँ थीं। सभीके नेत्रोंके कोने लाल रंगके थे। तदनन्तर तपाये हुए सुवर्णके आभूषणोंसे विभूषित एवं शत्रुओंको संताप देनेवाले कौरव

Page 980Permalink

राजकुमारोंने आचार्य द्रोणकी आज्ञा पाकर पहले अपने अस्त्र एवं धनुष लेकर डोरी चढ़ायी और उसपर भाँति-भाँतिकी आकृतिके बाणोंका संधान करके प्रत्यंचाका टंकार करते और ताल ठोंकते हुए समस्त प्राणियोंका आदर किया। तत्पश्चात् वे महापराक्रमी राजकुमार वहाँ परम अद्भुत अस्त्र-कौशल प्रकट करने लगे ॥ २४ ॥

केचिच्छराक्षेपभयाच्छिरांस्यवननामिरे । मनुजा धृष्टमपरे वीक्षाञ्चक्रुः सुविस्मिताः ॥ २५ ॥ कितने ही मनुष्य बाण लग जानेके डरसे अपना मस्तक झुका देते थे। दूसरे लोग अत्यन्त विस्मित होकर बिना किसी भयके सब कुछ देखते थे ॥ २५ ॥

ते स्म लक्ष्याणि बिभिदुर्बाणैर्नामाङ्कशोभितैः । विविधैर्लाघवोत्सृष्टैरुह्यन्तो वाजिभिर्द्रुतम् ॥ २६ ॥ वे राजकुमार घोड़ोंपर सवार हो अपने नामके अक्षरोंसे सुशोभित और बड़ी फुर्तीके साथ छोड़े हुए नाना प्रकारके बाणोंद्वारा शीघ्रतापूर्वक लक्ष्यवेध करने लगे ॥ २६ ॥

तत् कुमारबलं तत्र गृहीतशरकार्मुकम् । गन्धर्वनगराकारं प्रेक्ष्य ते विस्मिताभवन् ॥ २७ ॥ धनुष-बाण लिये हुए राजकुमारोंके उस समुदायको गन्धर्वनगरके समान अद्भुत देख वहाँ समस्त दर्शक आश्चर्यचकित हो गये ॥ २७ ॥

सहसा चुक्रुशुश्चान्ये नराः शतसहस्रशः । विस्मयोत्फुल्लनयनाः साधु साध्विति भारत ॥ २८ ॥ जनमेजय! सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें एक-एक जगह बैठे हुए लोग आश्चर्यचकित नेत्रोंसे देखते हुए सहसा 'साधु-साधु (वाह-वाह)' कहकर कोलाहल मचा देते थे ॥ २८ ॥

कृत्वा धनुषि ते मार्गान् रथचर्यासु चासकृत् । गजपृष्ठेऽश्वपृष्ठे च नियुद्धे च महाबलः ॥ २९ ॥ उन महाबली राजकुमारोंने पहले धनुष-बाणके पैंतरे दिखाये। तदनन्तर रथ-संचालनके विविध मार्गों (शीघ्र ले जाना, लौटा लाना, दायें, बायें और मण्डलाकार चलाना आदि)-का अवलोकन कराया। फिर कुश्ती लड़ने तथा हाथी और घोड़ेकी पीठपर बैठकर युद्ध करनेकी चातुरीका परिचय दिया ॥ २९ ॥

गृहीतखड्गचर्माणस्ततो भूयः प्रहारिणः । त्सरुमार्गान् यथोद्दिष्टांश्चेरूः सर्वासु भूमिषु ॥ ३० ॥ इसके बाद वे ढाल और तलवार लेकर एक-दूसरेपर प्रहार करते हुए खड्ग चलानेके शास्त्रोक्त मार्ग (ऊपर-नीचे और अगल-बगलमें घुमानेकी कला)-का प्रदर्शन करने लगे। उन्होंने रथ, हाथी, घोड़े और भूमि—इन सभी भूमियोंपर यह युद्ध-कौशल दिखाया ॥ ३० ॥

Page 981Permalink

लाघवं सौष्ठवं शोभां स्थिरत्वं दृढमुष्टिम् । ददृशुस्तत्र सर्वेषां प्रयोगं खड्गचर्मणोः ॥ ३१ ॥ दर्शकोंने उन सबके ढाल-तलवारके प्रयोगोंको देखा। उस कलामें उनकी फुर्ती, चतुरता, शोभा, स्थिरता और मुट्ठीकी दृढ़ताका अवलोकन किया ॥ ३१ ॥

अथ तौ नित्यसंहृष्टौ सुयोधनवृकोदरौ । अवतीर्णौ गदाहस्तावेकशृङ्गाविवाचलौ ॥ ३२ ॥ तदनन्तर सदा एक-दूसरेको जीतनेका उत्साह रखनेवाले दुर्योधन और भीमसेन हाथमें गदा लिये रंगभूमिमें उतरे। उस समय वे एक-एक शिखरवाले दो पर्वतोंकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ३२ ॥

बद्धकक्षौ महाबाहू पौरुषे पर्यवस्थितौ । बृंहन्तौ वासिताहेतोः समदाविव कुञ्जरौ ॥ ३३ ॥ वे दोनों महाबाहु कमर कसकर पुरुषार्थ दिखानेके लिये आमने-सामने डटकर खड़े थे और गर्जना कर रहे थे, मानो दो मतवाले गजराज किसी हथिनीके लिये एक-दूसरेसे भिड़ना चाहते और चिग्घाड़ते हों ॥ ३३ ॥

तौ प्रदक्षिणसव्यानि मण्डलानि महाबलौ । चेरतुर्मण्डलगत्तौ समदाविव कुञ्जरौ ॥ ३४ ॥ वे दोनों महाबली योद्धा अपनी-अपनी गदाको दायें-बायें मण्डलाकार घुमाते हुए दो मदोन्मत्त हाथियोंकी भाँति मण्डलके भीतर विचरने लगे ॥ ३४ ॥

विदुरो धृतराष्ट्राय गान्धार्याः पाण्डवारणिः । न्यवेदयतां तत् सर्वं कुमाराणां विचेष्टितम् ॥ ३५ ॥ विदुर धृतराष्ट्रको और पाण्डव जननी कुन्ती गान्धारीको उन राजकुमारोंकी सारी चेष्टाएँ बताती जाती थीं ॥ ३५ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वण्यस्त्रदर्शने त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें अस्त्र-कौशलदर्शनविषयक एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३३ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ४२ १/२ श्लोक हैं)


* जो उत्सव या नाटक आदिको सुविधापूर्वक देखनेके उद्देश्यसे बनाया गया हो, उसे प्रेक्षागृह या प्रेक्षाभवन कहते हैं।

१३४-

Page 982Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

भीमसेन, दुर्योधन तथा अर्जुनके द्वारा अस्त्र-कौशलका प्रदर्शन

वैशम्पायन उवाच

कुरुराजे हि रङ्गस्थे भीमे च बलिनां वरे ।
पक्षपातकृतस्नेहः स द्विधेवाभवज्जनः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! जब कुरुराज दुर्योधन और बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमसेन रंगभूमिमें उतरकर गदायुद्ध कर रहे थे, उस समय दर्शक जनता उनके प्रति पक्षपातपूर्ण स्नेह करनेके कारण मानो दो दलोंमें बँट गयी ॥ १ ॥

ही वीर कुरुराजेति ही भीम इति जल्पताम् ।
पुरुषाणां सुविपुलाः प्रणादाः सहसोत्थिताः ॥ २ ॥
कुछ कहते, 'अहो! वीर कुरुराज कैसा अद्भुत पराक्रम दिखा रहे हैं।' दूसरे बोल उठते, 'वाह! भीमसेन तो गजबका हाथ मारते हैं।' इस तरहकी बातें करनेवाले लोगोंकी भारी आवाजें वहाँ सहसा सब ओर गूँजने लगीं ॥ २ ॥

ततः क्षुब्धार्णवनिभं रंगमालोक्य बुद्धिमान् ।
भारद्वाजः प्रियं पुत्रमश्वत्थामानमब्रवीत् ॥ ३ ॥
फिर तो सारी रंगभूमिमें क्षुब्ध महासागरके समान हलचल मच गयी। यह देख बुद्धिमान् द्रोणाचार्यने अपने प्रिय पुत्र अश्वत्थामासे कहा ॥ ३ ॥

द्रोण उवाच

वार्येतौ महावीर्यौ कृतयोग्यावुभावपि ।
मा भूद् रङ्गप्रकोपोऽयं भीमदुर्योधनोद्भवः ॥ ४ ॥
**द्रोण बोले—**वत्स! ये दोनों महापराक्रमी वीर अस्त्र-विद्यामें अत्यन्त अभ्यस्त हैं। तुम इन दोनोंको युद्धसे रोको, जिससे भीमसेन और दुर्योधनको लेकर रंगभूमिमें सब ओर क्रोध न फैल जाय ॥ ४ ॥

वैशम्पायन उवाच

(तत उत्थाय वेगेन अश्वत्थामा न्यवारयत् ।
गुरोराज्ञा भीम इति गान्धारे गुरुशासनम् ।
अलं योग्यकृतं वेगमलं साहसमित्युत ॥)
ततस्तावुद्यतगदौ गुरुपुत्रेण वारितौ ।
युगान्तानिलसंक्षुब्धौ महावेलाविवार्णवौ ॥ ५ ॥

Page 983Permalink

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर अश्वत्थामाने बड़े वेगसे उठकर भीमसेन और दुर्योधनको रोकते हुए कहा—'भीम! तुम्हारे गुरुकी आज्ञा है, गान्धारीनन्दन! आचार्यका आदेश है, तुम दोनोंका युद्ध बंद होना चाहिये। तुम दोनों ही योग्य हो, तुम्हारा एक-दूसरेके प्रति वेगपूर्वक आक्रमण अवांछनीय है। तुम दोनोंका यह दुःसाहस अनुचित है। अतः इसे बंद करो।' इस प्रकार कहकर प्रलयकालीन वायुसे विक्षुब्ध उत्ताल तरंगोंवाले दो समुद्रोंकी भाँति गदा उठाये हुए दुर्योधन और भीमसेनको गुरुपुत्र अश्वत्थामाने युद्धसे रोक दिया।। ५।।

ततो रङ्गाङ्गणगतो द्रोणो वचनमब्रवीत् ।
निवार्य वादित्रगणं महामेघनिभस्वनम् ॥ ६ ॥
तत्पश्चात् द्रोणाचार्यने महान् मेघोंके समान कोलाहल करनेवाले बाजोंको बंद कराकर रंगभूमिमें उपस्थित हो यह बात कही— ।। ६ ।।

यो मे पुत्रात् प्रियतरः सर्वशस्त्रविशारदः ।
ऐन्द्रिरिन्द्रानुजसमः स पार्थो दृश्यतामिति ॥ ७ ॥
'दर्शकगण! जो मुझे पुत्रसे भी अधिक प्रिय है, जिसने सम्पूर्ण शस्त्रोंमें निपुणता प्राप्त की है तथा जो भगवान् नारायणके समान पराक्रमी है, उस इन्द्रकुमार कुन्तीपुत्र अर्जुनका कौशल आपलोग देखें' ।। ७ ।।

आचार्यवचनेनाथ कृतस्वस्त्ययनो युवा ।
बद्धगोधाङ्गुलित्राणः पूर्णतूणः सकार्मुकः ॥ ८ ॥
काञ्चनं कवचं बिभ्रत् प्रत्यदृश्यत फाल्गुनः ।
सार्कः सेन्द्रायुधतडित् ससंध्य इव तोयदः ॥ ९ ॥
तदनन्तर आचार्यके कहनेसे स्वस्तिवाचन कराकर तरुण वीर अर्जुन गोहके चमड़ेके बने हुए हाथके दस्ताने पहने, बाणोंसे भरा तरकस लिये धनुषसहित रंगभूमिमें दिखायी दिये। वे श्याम शरीरपर सोनेका कवच धारण किये ऐसे सुशोभित हो रहे थे, मानो सूर्य, इन्द्रधनुष, विद्युत् और संध्याकालसे युक्त मेघ शोभा पाता हो ।। ८-९ ।।

ततः सर्वस्य रङ्गस्य समुत्पिञ्जलकोऽभवत् ।
प्रावाद्यन्त च वाद्यानि सशङ्खानि समन्ततः ॥ १० ॥
फिर तो समूचे रंगमण्डपमें हर्षोल्लास छा गया। सब ओर भाँति-भाँतिके बाजे और शंख बजने लगे ।। १० ।।

एष कुन्तीसुतः श्रीमानेष मध्यमपाण्डवः ।
एष पुत्रो महेन्द्रस्य कुरूणामेष रक्षिता ॥ ११ ॥
एषोऽस्त्रविदुषां श्रेष्ठ एष धर्मभृतां वरः ।
एष शीलवतां चापि शीलज्ञाननिधिः परः ॥ १२ ॥
इत्येवं तुमुला वाचः शृण्वत्याः प्रेक्षकेरिताः ।

Page 984Permalink

कुन्त्याः प्रसवसंयुक्तैरस्रैः क्लिन्नमुरोऽभवत् ॥ १३ ॥
‘ये कुन्तीके तेजस्वी पुत्र हैं। ये ही पाण्डुके मझले बेटे हैं। ये देवराज इन्द्रकी संतान हैं। ये ही कुरुवंशके रक्षक हैं। अस्त्र-विद्याके विद्वानोंमें ये सबसे उत्तम हैं। ये धर्मात्माओं और शीलवानोंमें श्रेष्ठ हैं। शील और ज्ञानकी तो ये सर्वोत्तम निधि हैं।' उस समय दर्शकोंके मुखसे तुमुल ध्वनिके साथ निकली हुई ये बातें सुनकर कुन्तीके स्तनोंसे दूध और नेत्रोंसे स्नेहके आँसू बहने लगे। उन दुग्धमिश्रित आँसुओंसे कुन्तीदेवीका वक्षःस्थल भीग गया ॥ ११—१३ ॥

तेन शब्देन महता पूर्णश्रुतिरथाब्रवीत् ।
धृतराष्ट्रो नरश्रेष्ठो विदुरं हृष्टमानसः ॥ १४ ॥
वह महान् कोलाहल धृतराष्ट्रके कानोंमें भी गूँज उठा। तब नरश्रेष्ठ धृतराष्ट्र प्रसन्नचित्त होकर विदुरसे पूछने लगे— ॥ १४ ॥

क्षत्तः क्षुब्धार्णवनिभः किमेष सुमहास्वनः ।
सहसैवोत्थितो रङ्गे भिन्दन्निव नभस्तलम् ॥ १५ ॥
‘विदुर! विक्षुब्ध महासागरके समान यह कैसा महान् कोलाहल हो रहा है? यह शब्द मानो आकाशको विदीर्ण करता हुआ रंगभूमिमें सहसा व्यक्त हो उठा है' ॥ १५ ॥

विदुर उवाच

एष पार्थो महाराज फाल्गुनः पाण्डुनन्दनः ।
अवतीर्णः सकवचस्तत्रैष सुमहास्वनः ॥ १६ ॥
**विदुरने कहा—**महाराज! ये पाण्डुनन्दन अर्जुन कवच बाँधकर रंगभूमिमें उतरे हैं। इसी कारण यह भारी आवाज हो रही है ॥ १६ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि रक्षितोऽस्मि महामते ।
पृथाऽरणिसमुद्भूतैस्त्रिभिः पाण्डववह्निभिः ॥ १७ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**महामते! कुन्तीरूपी अरणिसे प्रकट हुए इन तीनों पाण्डवरूपी अग्नियोंसे मैं धन्य हो गया। इन तीनोंके द्वारा मैं सर्वथा अनुगृहीत और सुरक्षित हूँ ॥ १७ ॥

वैशम्पायन उवाच

तस्मिन् प्रमुदिते रङ्गे कथंचित् प्रत्युपस्थिते ।
दर्शयामास बीभत्सुराचार्यायास्त्रलाघवम् ॥ १८ ॥
आग्नेयेनासृजद् वह्निं वारुणेनासृजत् पयः ।
वायव्येनासृजद् वायुं पार्जन्येनासृजद् घनान् ॥ १९ ॥

Page 985Permalink

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! इस प्रकार आनन्दातिरेकसे मुखरित हुआ वह रंगमण्डप जब किसी तरह कुछ शान्त हुआ, तब अर्जुनने आचार्यको अपनी अस्त्र-संचालनकी फुर्ती दिखानी आरम्भ की। उन्होंने पहले आग्नेयास्त्रसे आग पैदा की, फिर वारुणास्त्रसे जल उत्पन्न करके उसे बुझा दिया। वायव्यास्त्रसे आँधी चला दी और पर्जन्यास्त्रसे बादल पैदा कर दिये ॥ १८-१९ ॥

भौमेन प्राविशद् भूमिं पार्वतेनासृजद् गिरीन् । अन्तर्धानेन चास्त्रेण पुनरन्तर्हितोऽभवत् ॥ २० ॥ उन्होंने भौमास्त्रसे पृथ्वी और पार्वतास्त्रसे पर्वतोंको उत्पन्न कर दिया; फिर अन्तर्धानास्त्रके द्वारा वे स्वयं अदृश्य हो गये ॥ २० ॥

क्षणात् प्रांशुः क्षणाद् ह्रस्वः क्षणाच्च रथधूर्गतः । क्षणेन रथमध्यस्थः क्षणेनावतरन्महीम् ॥ २१ ॥ वे क्षणभरमें बहुत लंबे हो जाते और क्षणभरमें ही बहुत छोटे बन जाते थे। एक क्षणमें रथके धुरेपर खड़े होते तो दूसरे क्षण रथके बीचमें दिखायी देते थे। फिर पलक मारते-मारते पृथ्वीपर उतरकर अस्त्र-कौशल दिखाने लगते थे ॥ २१ ॥

सुकुमारं च सूक्ष्मं च गुरुं चापि गुरुप्रियः । सौष्ठवेनाभिसंक्षिप्तः सोऽविध्यद् विविधैः शरैः ॥ २२ ॥ अपने गुरुके प्रिय शिष्य अर्जुनने बड़ी फुर्ती और खूबसूरतीके साथ सुकुमार, सूक्ष्म और भारी निशानेको भी बिना हिलाये-डुलाये नाना प्रकारके बाणोंद्वारा बींध दिया ॥ २२ ॥

भ्रमतश्च वराहस्य लोहस्य प्रमुखे समम् । पञ्च बाणानसंयुक्तान् सम्मुमोचैकबाणवत् ॥ २३ ॥ रंगभूमिमें लोहेका बना हुआ सूअर इस प्रकार रखा गया था कि वह सब ओर चक्कर लगा रहा था। उस घूमते हुए सूअरके मुखमें अर्जुनने एक ही साथ एक बाणकी भाँति पाँच बाण मारे। वे पाँचों बाण एक-दूसरेसे सटे हुए नहीं थे ॥ २३ ॥

गव्ये विषाणकोषे च चले रज्ज्ववलम्बिनि । निचखान महावीर्यः सायकानेकविंशतिम् ॥ २४ ॥ एक जगह गायका सींग एक रस्सीमें लटकाया गया था, जो हिल रहा था। महापराक्रमी अर्जुनने उस सींगके छेदमें लगातार इक्कीस बाण गड़ा दिये ॥ २४ ॥

इत्येवमादि सुमहत् खड्गे धनुषि चानघ । गदायां शस्त्रकुशलो मण्डलानि ह्यदर्शयत् ॥ २५ ॥ निष्पाप जनमेजय! इस प्रकार उन्होंने बड़ा भारी अस्त्र-कौशल दिखाया। खड्ग, धनुष और गदा आदिके भी शस्त्र-कुशल अर्जुनने अनेक पैंतरे और हाथ दिखलाये ॥ २५ ॥

ततः समाप्तभूयिष्ठे तस्मिन् कर्मणि भारत ।

Page 986Permalink

मन्दीभूते समाजे च वादित्रस्य च निःस्वने ॥ २६ ॥ द्वारदेशात् समुद्भूतो माहात्म्यबलसूचकः । वज्रनिष्पेषसदृशः शुश्रुवे भुजनिःस्वनः ॥ २७ ॥ भारत! इस प्रकार अस्त्र-कौशल दिखानेका अधिकांश कार्य जब समाप्त हो चला, मनुष्योंका कोलाहल और बाजे-गाजेका शब्द जब शान्त होने लगा, उसी समय दरवाजेकी ओरसे किसीका अपनी भुजाओंपर ताल ठोंकनेका भारी शब्द सुनायी पड़ा; मानो वज्र आपसमें टकरा रहे हों। वह शब्द किसी वीरके माहात्म्य तथा बलका सूचक था ॥ २६-२७ ॥

दीर्यन्ते किं नु गिरयः किंस्विद् भूमिर्विदीर्यते । किंस्विदापूर्यते व्योम जलधाराघनैर्घनैः ॥ २८ ॥ उसे सुनकर लोग कहने लगे, 'कहीं पहाड़ तो नहीं फट गये! पृथ्वी तो नहीं विदीर्ण हो गयी! अथवा जलकी धारासे परिपूर्ण घनीभूत बादलोंकी गम्भीर गर्जनासे आकाशमण्डल तो नहीं गूँज रहा है?' ॥ २८ ॥

रङ्गस्यैवं मतिरभूत् क्षणेन वसुधाधिप । द्वारं चाभिमुखाः सर्वे बभूवुः प्रेक्षकास्तदा ॥ २९ ॥ राजन्! उस रंगमण्डपमें बैठे हुए लोगोंके मनमें क्षणभरमें उपर्युक्त विचार आने लगे। उस समय सभी दर्शक दरवाजेकी ओर मुँह घुमाकर देखने लगे ॥ २९ ॥

पञ्चभिर्भ्रातृभिः पार्थैर्द्रोणः परिवृतो बभौ । पञ्चतारेण संयुक्तः सावित्रेणेव चन्द्रमाः ॥ ३० ॥ इधर कुन्तीकुमार पाँचों भाइयोंसे घिरे हुए आचार्य द्रोण पाँच तारोंवाले हस्त नक्षत्रसे संयुक्त चन्द्रमाकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ३० ॥

अश्वत्थाम्ना च सहितं भ्रातॄणां शतमूर्जितम् । दुर्योधनममित्रघ्नमुत्थितं पर्यवारयत् ॥ ३१ ॥ स तैस्तदा भ्रातृभिरुद्यतायुधै- र्गदाग्रपाणिः समवस्थितैर्वृतः । बभौ यथा दानवसंक्षये पुरा पुरन्दरो देवगणैः समावृतः ॥ ३२ ॥ शत्रुहन्ता बलवान् दुर्योधन भी उठकर खड़ा हो गया। अश्वत्थामासहित उसके सौ भाइयोंनै आकर उसे चारों ओरसे घेर लिया। हाथोंमें आयुध उठाये खड़े हुए अपने भाइयोंसे घिरा हुआ गदाधारी दुर्योधन पूर्वकालमें दानवसंहारके समय देवताओंसे घिरे देवराज इन्द्रके समान शोभा पाने लगा ॥ ३१-३२ ॥

Page 987Permalink

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि अस्त्रदर्शने चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें अस्त्रदर्शनविषयक एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३४ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३३ १/३ श्लोक हैं)

१३५-

Page 988Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

कर्णका रंगभूमिमें प्रवेश तथा राज्याभिषेक

वैशम्पायन उवाच

दत्तेऽवकाशे पुरुषैर्विस्मयोत्फुल्लोचनैः ।
विवेश रङ्गं विस्तीर्णं कर्णः परपुरंजयः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! आश्चर्यसे आँखें फाड़-फाड़कर देखते हुए द्वारपालोंने जब भीतर जानेका मार्ग दे दिया, तब शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले कर्णने उस विशाल रंगमण्डपमें प्रवेश किया ॥ १ ॥

सहजं कवचं बिभ्रत् कुण्डलोद्योतिताननः ।
सधनुर्बद्धनिस्त्रिंशः पादचारीव पर्वतः ॥ २ ॥
उसने शरीरके साथ ही उत्पन्न हुए दिव्य कवचको धारण कर रखा था। दोनों कानोंके कुण्डल उसके मुखको उद्भासित कर रहे थे। हाथमें धनुष लिये और कमरमें तलवार बाँधे वह वीर पैरोंसे चलनेवाले पर्वतकी भाँति सुशोभित हो रहा था ॥ २ ॥

कन्यागर्भः पृथुयशाः पृथायाः पृथुलोचनः ।
तीक्ष्णांशोर्भास्करस्यांशः कर्णोऽरिगणसूदनः ॥ ३ ॥
कुन्तीने कन्यावस्थामें ही उसे अपने गर्भमें धारण किया था। उसका यश सर्वत्र फैला हुआ था। उसके दोनों नेत्र बड़े-बड़े थे। शत्रुसमुदायका संहार करनेवाला कर्ण प्रचण्ड किरणोंवाले भगवान् भास्करका अंश था ॥ ३ ॥

सिंहर्षभगजेन्द्राणां बलवीर्यपराक्रमः ।
दीप्तिकान्तिद्युतिगुणैः सूर्येन्दुज्वलनोपमः ॥ ४ ॥
उसमें सिंहके समान बल, साँड़के समान वीर्य तथा गजराजके समान पराक्रम था, वह दीप्तिसे सूर्य, कान्तिसे चन्द्रमा तथा तेजरूपी गुणसे अग्निके समान जान पड़ता था ॥ ४ ॥

प्रांशुः कनकतालाभः सिंहसंहननो युवा ।
असंख्येयगुणः श्रीमान् भास्करस्यात्मसम्भवः ॥ ५ ॥
उसका शरीर बहुत ऊँचा था, अतः वह सुवर्णमय ताड़के वृक्ष-सा प्रतीत होता था। उसके अंगोंकी गठन सिंह-जैसी जान पड़ती थी। उसमें असंख्य गुण थे। उसकी तरुण अवस्था थी। वह साक्षात् भगवान् सूर्यसे उत्पन्न हुआ था, अतः (उन्हींके समान) दिव्य शोभासे सम्पन्न था ॥ ५ ॥

स निरीक्ष्य महाबाहुः सर्वतो रङ्गमण्डलम् ।
प्रणामं द्रोणकृपयोर्नात्यादृतमिवाकरोत् ॥ ६ ॥

Page 989Permalink

उस समय महाबाहु कर्णने रंगमण्डपमें सब ओर दृष्टि डालकर द्रोणाचार्य और कृपाचार्यको इस प्रकार प्रणाम किया, मानो उनके प्रति उसके मनमें अधिक आदरका भाव न हो ॥ ६ ॥

स समाजजनः सर्वो निश्चलः स्थिरलोचनः ।
कोऽयमित्यागतक्षोभः कौतूहलपरोऽभवत् ॥ ७ ॥
रंगभूमिमें जितने लोग थे, वे सब निश्चल होकर एकटक दृष्टिसे देखने लगे। यह कौन है, यह जाननेके लिये उनका चित्त चंचल हो उठा। वे सब-के-सब उत्कण्ठित हो गये ॥ ७ ॥

सोऽब्रवीन्मेघगम्भीरस्वरेण वदतां वरः ।
भ्राता भ्रातरमज्ञातं सावित्रः पाकशासनम् ॥ ८ ॥
इतनेमें ही वक्ताओंमें श्रेष्ठ सूर्यपुत्र कर्ण, जो पाण्डवोंका भाई लगता था, अपने अज्ञात भ्राता इन्द्रकुमार अर्जुनसे मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोला— ॥ ८ ॥

पार्थ यत् ते कृतं कर्म विशेषवदहं ततः ।
करिष्ये पश्यतां नृणां माऽऽत्मना विस्मयं गमः ॥ ९ ॥
‘कुन्तीनन्दन! तुमने इन दर्शकोंके समक्ष जो कार्य किया है, मैं उससे भी अधिक अद्भुत कर्म कर दिखाऊँगा। अतः तुम अपने पराक्रमपर गर्व न करो’ ॥ ९ ॥

असमाप्ते ततस्तस्य वचने वदतां वर ।
यन्त्रोत्क्षिप्त इवोत्तस्थौ क्षिप्रं वै सर्वतो जनः ॥ १० ॥
वक्ताओंमें श्रेष्ठ जनमेजय! कर्णकी बात अभी पूरी ही न हो पायी थी कि सब ओरके मनुष्य तुरंत उठकर खड़े हो गये, मानो उन्हें किसी यन्त्रसे एक साथ उठा दिया गया हो ॥ १० ॥

प्रीतिश्च मनुजव्याघ्र दुर्योधनमुपाविशत् ।
ह्रीश्च क्रोधश्च बीभत्सुं क्षणेनान्वाविवेश ह ॥ ११ ॥
नरश्रेष्ठ! उस समय दुर्योधनके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई और अर्जुनके चित्तमें क्षणभरमें लज्जा और क्रोधका संचार हो आया ॥ ११ ॥

ततो द्रोणाभ्यनुज्ञातः कर्णः प्रियरणः सदा ।
यत् कृतं तत्र पार्थेन तच्चकार महाबलः ॥ १२ ॥
तब सदा युद्धसे ही प्रेम करनेवाले महाबली कर्णने द्रोणाचार्यकी आज्ञा लेकर, अर्जुनने वहाँ जो-जो अस्त्र-कौशल प्रकट किया था, वह सब कर दिखाया ॥ १२ ॥

अथ दुर्योधनस्तत्र भ्रातृभिः सह भारत ।
कर्णं परिष्वज्य मुदा ततो वचनमब्रवीत् ॥ १३ ॥
भारत! तदनन्तर भाइयोंसहित दुर्योधनने वहाँ बड़ी प्रसन्नताके साथ कर्णको हृदयसे लगाकर कहा ॥ १३ ॥

दुर्योधन उवाच

Page 990Permalink

स्वागतं ते महाबाहो दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मानद ।
अहं च कुरुराज्यं च यथेष्टमुपभुज्यताम् ॥ १४ ॥
दुर्योधन बोला— महाबाहो! तुम्हारा स्वागत है। मानद! तुम यहाँ पधारे, यह हमारे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है। मैं तथा कौरवोंका यह राज्य सब तुम्हारे हैं। तुम इनका यथेष्ट उपभोग करो ॥ १४ ॥

<div align="center">कर्ण उवाच</div>

कृतं सर्वमहं मन्ये सखित्वं च त्वया वृणे ।
द्वन्द्वयुद्धं च पार्थेन कर्तुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥ १५ ॥
कर्णने कहा— प्रभो! आपने जो कुछ कहा है, वह सब पूरा कर दिया, ऐसा मेरा विश्वास है। मैं आपके साथ मित्रता चाहता हूँ और अर्जुनके साथ मेरी द्वन्द्व-युद्ध करनेकी इच्छा है ॥ १५ ॥

<div align="center">दुर्योधन उवाच</div>

भुङ्क्ष्व भोगान् मया सार्धं बन्धूनां प्रियकृद् भव ।
दुर्हृदां कुरु सर्वेषां मूर्ध्नि पादमरिंदम ॥ १६ ॥
दुर्योधन बोला— शत्रुदमन! तुम मेरे साथ उत्तम भोग भोगो। अपने भाई-बन्धुओंका प्रिय करो और समस्त शत्रुओंके मस्तकपर पैर रखो ॥ १६ ॥

<div align="center">वैशम्पायन उवाच</div>

ततः क्षिप्तमिवात्मानं मत्वा पार्थोऽभ्यभाषत ।
कर्ण भ्रातृसमूहस्य मध्येऽचलमिव स्थितम् ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! उस समय अर्जुनने अपने-आपको कर्णद्वारा तिरस्कृत-सा मानकर दुर्योधन आदि सौ भाइयोंके बीचमें अविचल-से खड़े हुए कर्णको सम्बोधित करके कहा ॥ १७ ॥

<div align="center">अर्जुन उवाच</div>

अनाहूतोपसृष्टाना मनाहूतोपजल्पिनाम् ।
ये लोकास्तान् हतः कर्ण मया त्वं प्रतिपत्स्यसे ॥ १८ ॥
अर्जुन बोले— कर्ण! बिना बुलाये आनेवालों और बिना बुलाये बोलनेवालोंको जो (निन्दनीय) लोक प्राप्त होते हैं, मेरे द्वारा मारे जानेपर तुम उन्हीं लोकोंमें जाओगे ॥ १८ ॥

<div align="center">कर्ण उवाच</div>

रङ्गोऽयं सर्वसामान्यः किमत्र तव फाल्गुन ।
वीर्यश्रेष्ठाश्च राजानो बलं धर्मोऽनुवर्तते ॥ १९ ॥