BharatKosha
Back to the archive

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

कुबेरभवनाभ्याशे जातां पर्वतनिर्झरैः ।

Page 1036Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

क्रोधवश नामक राक्षसोंका भीमसेनसे सरोवरके निकट आनेका कारण पूछना

वैशम्पायन उवाच

स गत्वा नलिनीं रम्यां राक्षसैरभिरक्षिताम् ।
कैलासशिखराभ्याशे ददर्श शुभकाननाम् ॥ १ ॥
कुबेरभवनाभ्याशे जातां पर्वतनिर्झरैः ।
सुरम्यां विपुलच्छायां नानाद्रुमलताकुलाम् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार आगे बढ़नेपर भीमसेनने कैलास पर्वतके निकट कुबेरभवनके समीप एक रमणीय सरोवर देखा, जिसके आस-पास सुन्दर वनस्थली शोभा पा रही थी। बहुत-से राक्षस उसकी रक्षाके लिये नियुक्त थे। वह सरोवर पर्वतीय झरनोंके जलसे भरा था। वह देखनेमें बहुत ही सुन्दर, घनी छायासे सुशोभित तथा अनेक प्रकारके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त था ॥ १-२ ॥

हरिताम्बुजसंच्छन्नां दिव्यां कनकपुष्कराम् ।
नानापक्षिजनाकीर्णां सूपतीर्थामकर्दमाम् ॥ ३ ॥
हरे रंगके कमलोंसे वह दिव्य सरोवर ढका हुआ था। उसमें सुवर्णमय कमल खिले थे। वह नाना प्रकारके पक्षियोंसे युक्त था। उसका किनारा बहुत सुन्दर था और उसमें कीचड़ नहीं था। ॥ ३ ॥

अतीवरम्यां सुजलां जातां पर्वतसानुषु ।
विचित्रभूतां लोकस्य शुभामद्भुतदर्शनाम् ॥ ४ ॥
वह सरोवर अत्यन्त रमणीय, सुन्दर जलसे परिपूर्ण, पर्वतीय शिखरोंके झरनोंसे उत्पन्न, देखनेमें विचित्र, लोकके लिये मंगलकारक तथा अद्भुत दृश्यसे सुशोभित था ॥ ४ ॥

तत्रामृतरसं शीतं लघु कुन्तीसुतः शुभम् ।
ददर्श विमलं तोयं पिबंश्च बहु पाण्डवः ॥ ५ ॥
उस सरोवरमें कुन्तीकुमार पाण्डुपुत्र भीमने अमृतके समान स्वादिष्ट, शीतल, हलका, शुभकारक और निर्मल जल देखा तथा उसे भरपेट पीया ॥ ५ ॥

तां तु पुष्करिणीं रम्यां दिव्यसौगन्धिकावृताम् ।
जातरूपमयैः पद्मैश्छन्नां परमगन्धिभिः ॥ ६ ॥
वैदूर्यवरनालैश्च बहुचित्रैर्मनोरमैः ।
हंसकारण्डवोधूतैः सृजद्भिरमलं रजः ॥ ७ ॥

Page 1037Permalink

वह सरोवर दिव्य सौगन्धिक कमलोंसे आवृत तथा रमणीय था। परम सुगन्धित सुवर्णमय कमल उसे ढँके हुए थे। उन कमलोंकी नाल उत्तम वैदूर्यमणिमय थी। वे कमल देखनेमें अत्यन्त विचित्र और मनोरम थे। हंस और कारण्डव आदि पक्षी उन कमलोंको हिलाते रहते थे, जिससे वे निर्मल पराग प्रकट किया करते थे ॥ ६-७ ॥ आक्रीडं राजराजस्य कुबेरस्य महात्मनः । गन्धर्वैरप्सरोभिश्च देवैश्च परमार्चितम् ॥ ८ ॥ वह सरोवर राजाधिराज महाबुद्धिमान् कुबेरका क्रीडास्थल था। गन्धर्व, अप्सरा और देवता भी उसकी बड़ी प्रशंसा करते थे ॥ ८ ॥ सेवितामृषिभिर्दिव्यैर्यक्षैः किम्पुरुषैस्तथा । राक्षसैः किन्नरैश्चापि गुप्तां वैश्रवणेन च ॥ ९ ॥ दिव्य ऋषि-मुनि, यक्ष, किम्पुरुष, राक्षस और किन्नर उसका सेवन करते थे तथा साक्षात् कुबेरके द्वारा उसके संरक्षणकी व्यवस्था की जाती थी ॥ ९ ॥ तां च दृष्ट्वैव कौन्तेयो भीमसेनो महाबलः । बभूव परमप्रीतो दिव्यं सम्प्रेक्ष्य तत् सरः ॥ १० ॥ कुन्तीनन्दन महाबली भीमसेन उस दिव्य सरोवरको देखते ही अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥ १० ॥ तच्च क्रोधवशा नाम राक्षसा राजशासनात् । रक्षन्ति शतसाहस्राश्चित्रायुधपरिच्छदाः ॥ ११ ॥ महाराज कुबेरके आदेशसे क्रोधवश नामक राक्षस, जिनकी संख्या एक लाख थी, विचित्र आयुध और वेशभूषासे सुसज्जित हो उसकी रक्षा करते थे ॥ ११ ॥ ते तु दृष्ट्वैव कौन्तेयमजिनैः प्रतिवासितम् । रुक्माङ्गदधरं वीरं भीमं भीमपराक्रमम् ॥ १२ ॥ सायुधं बद्धनिस्त्रिंशमशङ्कितमरिंदमम् । पुष्करेप्सुमुपायान्तमन्योन्यमभिचुक्रुशुः ॥ १३ ॥ उस समय भयानक पराक्रमी कुन्तीकुमार वीरवर भीम अपने अंगोंमें मृगचर्म लपेटे हुए थे। भुजाओंमें सोनेके अंगद (बाजूबंद) पहन रखे थे। वे धनुष और गदा आदि आयुधोंसे युक्त थे। उन्होंने कमरमें तलवार बाँध रखी थी। वे शत्रुओंका दमन करनेमें समर्थ और निर्भीक थे। उन्हें कमल लेनेकी इच्छासे वहाँ आते देख वे पहरा देनेवाले राक्षस आपसमें कोलाहल करने लगे ॥ अयं पुरुषशार्दूलः सायुधोऽजिनसंवृतः । यच्चिकीर्षुरिह प्राप्तस्तत् सम्प्रष्टुमिहार्हथ ॥ १४ ॥ उनमें परस्पर इस प्रकार बातचीत हुई—'देखो, यह नरश्रेष्ठ मृगचर्मसे आच्छादित होनेपर भी हाथमें आयुध लिये हुए है। यह यहाँ जिस कार्यके लिये आया है, उसे

Page 1038Permalink

पूछो' ॥ १४ ॥
ततः सर्वे महाबाहुं समासाद्य वृकोदरम् ।
तेजोयुक्तमपृच्छन्त कस्त्वमाख्यातुमर्हसि ॥ १५ ॥
तब वे सब राक्षस परम तेजस्वी महाबाहु भीमसेनके पास आकर पूछने लगे—'तुम कौन हो?' यह बताओ ॥
मुनिवेषधरश्चैव सायुधश्चैव लक्ष्यसे ।
यदर्थमभिसम्प्राप्तस्तदाचक्ष्व महामते ॥ १६ ॥
'महामते! तुमने वेष तो मुनियोंका-सा धारण कर रखा है; परंतु आयुधोंसे सम्पन्न दिखायी देते हो। तुम किसलिये यहाँ आये हो?' बताओ ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौगन्धिकाहरणे
त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें
सौगन्धिकाहरणविषयक एक सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५३ ॥

१५४-

Page 1039Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

भीमसेनके द्वारा क्रोधवश नामक राक्षसोंकी पराजय और द्रौपदीके लिये सौगन्धिक कमलोंका संग्रह करना

भीम उवाच

पाण्डवो भीमसेनोऽहं धर्मराजादनन्तरः ।
विशालां बदरीं प्राप्तो भ्रातृभिः सह राक्षसाः ॥ १ ॥
अपश्यत् तत्र पाञ्चाली सौगन्धिकमनुत्तमम् ।
अनिलोढमितो नूनं सा बहूनि परीप्सति ॥ २ ॥
**भीमसेन बोले—**राक्षसो! मैं धर्मराज युधिष्ठिरका छोटा भाई पाण्डुपुत्र भीमसेन हूँ और भाइयोंके विशाला बदरी नामक तीर्थमें आकर ठहरा हूँ। वहाँ पाञ्चालराजकुमारी द्रौपदीने सौगन्धिक नामक एक परम उत्तम कमल देखा। उसे देखकर वह उसी तरहके और भी बहुत-से पुष्प प्राप्त करना चाहती है, जो निश्चय ही यहींसे हवामें उड़कर वहाँ पहुँचा होगा ।। १-२ ।।

तस्या मामनवद्याङ्ग्या धर्मपत्नयाः प्रिये स्थितम् ।
पुष्पाहारमिह प्राप्तं निबोधत निशाचराः ॥ ३ ॥
निशाचरो! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि मैं उसी अनिन्द्य सुन्दरी धर्मपत्नीका प्रिय मनोरथ पूर्ण करनेके लिये उद्यत हो बहुत-से सौगन्धिक पुष्पोंका अपहरण करनेके लिये ही यहाँ आया हूँ ।। ३ ।।

राक्षसा ऊचुः

आक्रीडोऽयं कुबेरस्य दयितः पुरुषर्षभ ।
नेह शक्यं मनुष्येण विहर्तुं मर्त्यधर्मणा ॥ ४ ॥
**राक्षसोंने कहा—**नरश्रेष्ठ! यह सरोवर कुबेरकी परम प्रिय क्रीड़ास्थली है। इसमें मरणधर्मा मनुष्य विहार नहीं कर सकता ।। ४ ।।

देवर्षयस्तथा यक्षा देवाश्चात्र वृकोदर ।
आमन्त्र्य यक्षप्रवरं पिबन्ति रमयन्ति च ।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव विहरन्त्यत्र पाण्डव ॥ ५ ॥
वृकोदर! देवर्षि, यक्ष तथा देवता भी यक्षराज कुबेरकी अनुमति लेकर ही यहाँका जल पीते और इसमें विहार करते हैं। पाण्डुनन्दन! गन्धर्व और अप्सराएँ भी इसी नियमके अनुसार यहाँ विहार करती हैं ।। ५ ।।

अन्यायेनेह यः कश्चिदवमान्य धनेश्वरम् ।

Page 1040Permalink

विहर्तुमिच्छेद दुर्वृत्तः स विनश्येन्न संशयः ॥ ६ ॥
जो कोई दुराचारी पुरुष धनाध्यक्ष कुबेरकी अवहेलना करके अन्यायपूर्वक यहाँ विहार करना चाहेगा, वह नष्ट हो जायगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ६ ॥
तमनादृत्य पद्मानि जिहीर्षसि बलादितः ।
धर्मराजस्य चात्मानं ब्रवीषि भ्रातरं कथम् ॥ ७ ॥
भीमसेन! तुम अपने बलके घमंडमें आकर कुबेरकी अवहेलना करके यहाँसे कमलपुष्पोंका अपहरण करना चाहते हो। ऐसी दशामें अपने-आपको धर्मराजका भाई कैसे बता रहे हो? ॥ ७ ॥
आमन्त्र्य यक्षराजं वै ततः पिब हरस्व च ।
नातोऽन्यथा त्वया शक्यं किंचित् पुष्करमीक्षितुम् ॥ ८ ॥
पहले यक्षराजकी आज्ञा ले लो, उसके बाद इस सरोवरका जल पीओ और यहाँसे कमलके फूल ले जाओ। ऐसा किये बिना तुम यहाँके किसी कमलकी ओर देख भी नहीं सकते ॥ ८ ॥

भीमसेन उवाच

राक्षसास्तं न पश्यामि धनेश्वरमिहान्तिके ।
दृष्ट्वापि च महाराजं नाहं याचितुमुत्सहे ॥ ९ ॥
न हि याचन्ति राजान एष धर्मः सनातनः ।
न चाहं हातुमिच्छामि क्षात्रधर्मं कथंचन ॥ १० ॥
**भीमसेन बोले—**राक्षसो! प्रथम तो मैं यहाँ आस-पास कहीं भी धनाध्यक्ष कुबेरको देख नहीं रहा हूँ, दूसरे यदि मैं उन महाराजको देख भी लूँ तो भी उनसे याचना नहीं कर सकता, क्योंकि क्षत्रिय किसीसे कुछ माँगते नहीं हैं, यही उनका सनातन धर्म है। मैं किसी तरह क्षात्र-धर्मको छोड़ना नहीं चाहता ॥ ९-१० ॥
इयं च नलिनी रम्या जाता पर्वतनिर्झरैः ।
नेयं भवनमासाद्य कुबेरस्य महात्मनः ॥ ११ ॥
यह रमणीय सरोवर पर्वतीय झरनोंसे प्रकट हुआ है, यह महामना कुबेरके घरमें नहीं है ॥ ११ ॥
तुल्या हि सर्वभूतानामियं वैश्रवणस्य च ।
एवं गतेषु द्रव्येषु कः कं याचितुमर्हति ॥ १२ ॥
अतः इसपर अन्य सब प्राणियोंका और कुबेरका भी समान अधिकार है। ऐसी सार्वजनिक वस्तुओंके लिये कौन किससे याचना करेगा? ॥ १२ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्त्वा राक्षसान् सर्वान् भीमसेनो ह्यमर्षणः ।

Page 1041Permalink

व्यगाहत महाबाहुर्नलिनीं तां महाबलः ॥ १३ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! सभी राक्षसोंसे ऐसा कहकर अमर्षमें भरे हुए महाबली महाबाहु भीमसेन उस सरोवरमें प्रवेश करने लगे ॥ १३ ॥

ततः स राक्षसैर्वाचा प्रतिषिद्धः प्रतापवान् । मा मैवमिति सक्रोधैर्भर्त्सयद्भिः समन्ततः ॥ १४ ॥ उस समय क्रोधमें भरे राक्षस चारों ओरसे प्रतापी भीमको फटकारते हुए वाणीद्वारा रोकने लगे—‘नहीं-नहीं, ऐसा न करो’ ॥ १४ ॥

कदर्थीकृत्य तु स तान् राक्षसान् भीमविक्रमः । व्यगाहत महातेजास्ते तं सर्वे न्यवारयन् ॥ १५ ॥ परंतु भयंकर पराक्रमी महातेजस्वी भीम उन सब राक्षसोंकी अवहेलना करके उस जलाशयमें उतर ही गये। यह देख सब राक्षस उन्हें रोकनेकी चेष्टा करते हुए चिल्ला उठे— ॥ १५ ॥

गृह्णीत बध्नीत विकर्ततेमं पचाम खादाम च भीमसेनम् । क्रुद्धा ब्रुवन्तोऽभिययुर्द्रुतं ते शस्त्राणि चोद्यम्य विवृत्तनेत्राः ॥ १६ ॥ ‘अरे! इसे पकड़ो, बाँध लो, काट डालो, हम सब लोग इस भीमको पकायेंगे और खा जायँगे।’ क्रोधपूर्वक उपर्युक्त बातें कहते और आँखें फाड़-फाड़कर देखते हुए वे सभी राक्षस शस्त्र उठाकर तुरंत उनकी ओर दौड़े ॥ १६ ॥

ततः स गुर्वी यमदण्डकल्पां महागदां काञ्चनपट्टनद्धाम् । प्रगृह्य तानभ्यपतत् तरस्वी ततोऽब्रवीत् तिष्ठत तिष्ठतेति ॥ १७ ॥ तब भीमसेनने यमदण्डके समान विशाल और भारी गदा उठा ली, जिसपर सोनेका पत्र मढ़ा हुआ था। उसे लेकर वे बड़े वेगसे उन राक्षसोंपर टूट पड़े और ललकारते हुए बोले—‘खड़े रहो, खड़े रहो’ ॥ १७ ॥

Page 1042Permalink

ते तं तदा तोमरपट्टिशाद्यै- र्व्याविद्धशस्त्रैः सहसा निपेतुः । जिघांसवः क्रोधवशाः सुभीमा भीमं समन्तात् परिवव्रुरुग्राः ॥ १८ ॥ वातेन कुन्त्यां बलवान् सुजातः शूरस्तरस्वी द्विषतां निहन्ता । सत्ये च धर्मे च रतः सदैव पराक्रमे शत्रुभिरप्रधृष्यः ॥ १९ ॥ यह देख वे भयंकर क्रोधवश नामक राक्षस भीमसेनको मार डालनेकी इच्छासे शत्रुओंके शस्त्रोंको नष्ट कर देनेवाले तोमर, पट्टिश आदि आयुधोंको लेकर सहसा उनकी ओर दौड़े और उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये। वे सब-के-सब बड़े उग्र स्वभावके थे। इधर भीमसेन कुन्तीदेवीके गर्भसे वायु देवताके द्वारा उत्पन्न होनेके कारण बड़े बलवान्, शूरवीर, वेगशाली एवं शत्रुओंका वध करनेमें समर्थ थे। वे सदा ही सत्य एवं धर्ममें रत थे। पराक्रमी तो वे ऐसे थे कि अनेक शत्रु मिलकर भी उन्हें परास्त नहीं कर सकते थे ॥ १८-१९ ॥ तेषां स मार्गान् विविधान् महात्मा विहत्य शस्त्राणि च शात्रवाणाम् ।

Page 1043Permalink

यथा प्रवीरान् निजघान भीमः परं शतं पुष्करिणीसमीपे ॥ २० ॥ महामना भीमने शत्रुओंके भाँति-भाँतिके पैंतरों तथा अस्त्र-शस्त्रोंको विफल करके उनके सौसे भी अधिक प्रमुख वीरोंको उस सरोवरके समीप मार गिराया ॥ २० ॥ ते तस्य वीर्यं च बलं च दृष्ट्वा विद्याबलं बाहुबलं तथैव । अशक्नुवन्तः सहितं समन्ताद् द्रुतं प्रवीराः सहसा निवृत्ताः ॥ २१ ॥ भीमसेनका पराक्रम, शारीरिक बल, विद्याबल और बाहुबल देखकर वे वीर राक्षस एक साथ संगठित होकर भी उनका वेग सहनेमें असमर्थ हो गये और सहसा सब ओरसे युद्ध छोड़कर निवृत्त हो गये ॥ २१ ॥ विदीर्यमाणास्तत एव तूर्ण- माकाशमास्थाय विमूढसंज्ञाः । कैलासशृङ्गाण्यभिदुद्रुवुस्ते भीमार्दिताः क्रोधवशाः प्रभग्नाः ॥ २२ ॥ भीमसेनकी मारसे क्षत-विक्षत एवं पीड़ित हो वे क्रोधवश नामक राक्षस अपनी सुध-बुध खो बैठे थे। अतः उनके पाँव उखड़ गये और वे तुरंत वहाँसे आकाशमें उड़कर कैलासके शिखरोंपर भाग गये ॥ २२ ॥ स शक्रवद् दानवदैत्यसङ्घान् विक्रम्य जित्वा च रणेऽरिसङ्घान् । विगाह्य तां पुष्करिणीं जितारिः कामाय जग्राह ततोऽम्बुजानि ॥ २३ ॥ शत्रुविजयी भीम इन्द्रकी भाँति पराक्रम करके दानव और दैत्योंके दलको युद्धमें हराकर उस सरोवरमें प्रविष्ट हो इच्छानुसार कमलोंका संग्रह करने लगे ॥ २३ ॥ ततः स पीत्वामृतकल्पमम्भो भूयो बभूवोत्तमवीर्यतेजाः । उत्पाट्य जग्राह च सोऽम्बुजानि सौगन्धिकान्युत्तमगन्धवन्ति ॥ २४ ॥ तदनन्तर उस सरोवरका अमृतके समान मधुर जल पीकर वे पुनः उत्तम बल और तेजसे सम्पन्न हो गये और श्रेष्ठ सुगन्धसे युक्त सौगन्धिक कमलोंको उखाड़-उखाड़कर संगृहीत करने लगे ॥ २४ ॥ ततस्तु ते क्रोधवशाः समेत्य धनेश्वरं भीमबलप्रणुन्नाः ।

Page 1044Permalink

भीमस्य वीर्यं च बलं च संख्ये यथावदाचख्युरतीव भीताः ॥ २५ ॥ तब भीमसेनके बलसे पीड़ित और अत्यन्त भयभीत हुए क्रोधवशोंने धनाध्यक्ष कुबेरके पास जाकर युद्धमें भीमके बल और पराक्रमका यथावत् वृत्तान्त कह सुनाया ॥ २५ ॥

तेषां वचस्तत् तु निशम्य देवः प्रहस्य रक्षांसि ततोऽभ्युवाच । गृह्णातु भीमो जलजानि कामात् कृष्णानिमित्तं विदितं ममैतत् ॥ २६ ॥ उनकी बातें सुनकर देवप्रवर कुबेरने हँसकर उन राक्षसोंसे कहा—‘मुझे यह मालूम है। भीमसेनको द्रौपदीके लिये इच्छानुसार कमल ले लेने दो’ ॥ २६ ॥

ततोऽभ्यनुज्ञाप्य धनेश्वरं ते जग्मुः कुरूणां प्रवरं विरोषाः । भीमं च तस्यां ददृशुर्नलिन्यां यथोपजोषं विहरन्तमेकम् ॥ २७ ॥ तब धनाध्यक्षकी आज्ञा पाकर वे राक्षस रोषरहित हो कुरुप्रवर भीमके पास गये और उन्हें अकेले ही उस सरोवरमें इच्छानुसार विहार करते देखा ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौगन्धिकाहरणे चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें सौगन्धिकाहरणविषयक एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५४ ॥

भयंकर उत्पात देखकर युधिष्ठिर आदिकी चिन्ता और सबका गन्धमादन-पर्वतपर सौगन्धिकवनमें भीमसेनके पास पहुँचना

Page 1045Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

भयंकर उत्पात देखकर युधिष्ठिर आदिकी चिन्ता और सबका गन्धमादन-पर्वतपर सौगन्धिकवनमें भीमसेनके पास पहुँचना

वैशम्पायन उवाच

ततस्तानि महार्हाणि दिव्यानि भरतर्षभ ।
बहूनि बहुरूपाणि विरजांसि समाददे ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतश्रेष्ठ, तदनन्तर भीमसेनने अनेक प्रकारके बहुमूल्य, दिव्य और निर्मल बहुत-से सौगन्धिक कमल संगृहीत कर लिये ॥ १ ॥

ततो वायुर्महान् शीघ्रो नीचैः शर्करकर्षणः ।
प्रादुरासीत् खरस्पर्शः संग्राममभिचोदयन् ॥ २ ॥
इसी समय गन्धमादन पर्वतपर तीव्र वेगसे बड़े जोरकी आँधी उठी, जो नीचे कंकड़-बालूकी वर्षा करनेवाली थी। उसका स्पर्श तीक्ष्ण था। वह किसी भारी संग्रामकी सूचना देनेवाली थी ॥ २ ॥

पपात महती चोल्का सनिर्घाता महाभया ।
निष्प्रभश्चाभवत् सूर्यश्छन्नरश्मिस्तमोवृतः ॥ ३ ॥
वज्रकी गड़गड़ाहटके साथ अत्यन्त भयदायक भारी उल्कापात होने लगा। सूर्य अन्धकारसे आवृत हो प्रभाशून्य हो गये। उनकी किरणें आच्छादित हो गयीं ॥ ३ ॥

निर्घातश्चाभवद् भीमो भीमे विक्रममास्थिते ।
चचाल पृथिवी चापि पांसुवर्षं पपात च ॥ ४ ॥
जिस समय भीम राक्षसोंके साथ युद्धमें भारी पराक्रम दिखा रहे थे, उस समय पृथ्वी हिलने लगी, आकाशमें भीषण गर्जना होने लगी और धूलकी वर्षा आरम्भ हो गयी ॥ ४ ॥

सलोहिता दिशश्चासन् खरवाचो मृगद्विजाः ।
तमोवृतमभूत् सर्वं न प्राज्ञायत किंचन ॥ ५ ॥
सम्पूर्ण दिशाएँ लाल हो गयी, मृग और पक्षी कठोर शब्द करने लगे, सारा जगत् अन्धकारसे आच्छन्न हो गया और किसीको कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था ॥ ५ ॥

अन्ये च बहवो भीमा उत्पातास्तत्र जज्ञिरे ।
तदद्भुतमभिप्रेक्ष्य धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ६ ॥
उवाच वदतां श्रेष्ठः कोऽस्मानभिभविष्यति ।
सज्जीभवत भद्रं वः पाण्डवा युद्धदुर्मदाः ॥ ७ ॥

Page 1046Permalink

यथारूपाणि पश्यामि स्वभ्यग्रो नः पराक्रमः । एवमुक्त्वा ततो राजा वीक्षाञ्चक्रे समन्ततः ॥ ८ ॥ इसके सिवा और भी बहुत-से भयानक उत्पात वहाँ प्रकट होने लगे। यह अद्भुत घटना देखकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ धर्मपुत्र युधिष्ठिरने कहा—'कौन हम लोगोंको पराजित कर सकेगा? रणोन्मत्त पाण्डवो! तुम्हारा भला हो, तुम युद्धके लिये तैयार हो जाओ। मैं जैसे लक्षण देख रहा हूँ, उससे पता लगता है कि हमारे लिये पराक्रम दिखानेका समय अत्यन्त निकट आ गया है।' ऐसा कहकर राजा युधिष्ठिरने चारों ओर दृष्टिपात किया ॥ ६—८ ॥

अपश्यमानो भीमं तु धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । ततः कृष्णां यमौ चापि समीपस्थावरिंदमः ॥ ९ ॥ पप्रच्छ भ्रातरं भीमं भीमकर्माणमाहवे । कच्चित् क्व भीमः पाञ्चालि किंचित् कृत्यं चिकीर्षति ॥ १० ॥ जब भीम नहीं दिखायी दिये, तब शत्रुदमन धर्मनन्दन युधिष्ठिरने द्रौपदी तथा पास ही बैठे हुए नकुल-सहदेवसे अपने भाई भीमके सम्बन्धमें, जो रणभूमिमें भयानक कर्म करनेवाले थे, पूछा—'पांचाल-राजकुमारी! भीमसेन कहाँ है? क्या वे कोई काम करना चाहते हैं? ॥ ९-१० ॥

कृतवानपि वा वीरः साहसं साहसप्रियः । इमे ह्यकस्मादुत्पाता महासमरदर्शनाः ॥ ११ ॥ 'अथवा साहसप्रेमी वीरवर भीमने कोई साहसका कार्य तो नहीं कर डाला? यह अकस्मात् प्रकट हुए उत्पात महान् युद्धके सूचक हैं ॥ ११ ॥

दर्शयन्तो भयं तीव्रं प्रादुर्भूताः समन्ततः । तं तथावादिनं कृष्णा प्रत्युवाच मनस्विनी । प्रिया प्रियं चिकीर्षन्ती महिषी चारुहासिनी ॥ १२ ॥ 'ये चारों ओर तीव्र भयका प्रदर्शन करते हुए प्रकट हो रहे हैं।' धर्मराज युधिष्ठिरको ऐसी बातें करते देख मनोहर मुसकानवाली मनस्विनी महारानी पतिप्रिया द्रौपदीने उनका प्रिय करनेकी इच्छासे इस प्रकार उत्तर दिया ॥

द्रौपद्युवाच

यत् तत् सौगन्धिकं राजन्नाहृतं मातरिश्वना । तन्मया भीमसेनस्य प्रीतयाद्योपपादितम् ॥ १३ ॥ अपि चोक्तो मया वीरो यदि पश्येर्बहून्यपि । तानि सर्वाण्युपादाय शीघ्रमागम्यतामिति ॥ १४ ॥ द्रौपदी बोली—राजन्! आज जो सौगन्धिक पुष्प वायु उड़ा लायी थी, उसे मैंने प्रसन्नतापूर्वक भीमसेनको दिया और उन वीरशिरोमणिसे यह भी कहा कि 'यदि इसी

Page 1047Permalink

तरहके बहुत-से पुष्प तुम्हें दिखायी दें, तो उन सबको लेकर शीघ्र यहाँ लौट आना।' ॥ १३-१४ ॥

स तु नूनं महाबाहुः प्रियार्थं मम पाण्डवः । प्रागुदीचीं दिशं राजंस्तान्याहर्तुमितो गतः ॥ १५ ॥ महाराज! मालूम होता है कि वे महाबाहु पाण्डुकुमार निश्चय ही मेरा प्रिय करनेके लिये उन्हीं फूलोंको लानेके निमित्त यहाँसे पूर्वोत्तर दिशाको गये हैं ॥ १५ ॥

उक्तस्त्वेवं तया राजा यमाविदमथाब्रवीत् । गच्छाम सहितास्तूर्णं येन यातो वृकोदरः ॥ १६ ॥ द्रौपदीके ऐसा कहनेपर राजा युधिष्ठिरने नकुल-सहदेवसे इस प्रकार कहा—'अब हम लोग भी एक साथ शीघ्र ही उस मार्गपर चलें' जिससे भीमसेन गये हैं ॥ १६ ॥

वहन्तु राक्षसा विप्रान् यथाश्रान्तान् यथाकृशान् । त्वमप्यमरसंकाश वह कृष्णां घटोत्कच ॥ १७ ॥ 'देवताओंके समान तेजस्वी घटोत्कच! तुम्हारे साथी राक्षस लोग इन ब्राह्मणोंको, जो जैसे थके और दुर्बल हों, उसके अनुसार कंधेपर बिठाकर ले चलें और तुम भी द्रौपदीको ले चलो ॥ १७ ॥

व्यक्तं दूरमितो भीमः प्रविष्ट इति मे मतिः । चिरं च तस्य कालोऽयं स च वायुसमो जवे ॥ १८ ॥ तरस्वी वैनतेयस्य सदृशो भुवि लंघने । उत्पतेदपि चाकाशं निपतेच्च यथेच्छकम् ॥ १९ ॥ 'यह स्पष्ट जान पड़ता है कि भीमसेन यहाँसे बहुत दूर चले गये हैं, मेरा यही विश्वास है। क्योंकि उनको गये बहुत समय हो गया है तथा वे वेगमें वायुके समान हैं और इस पृथ्वीको लाँघनेमें गरुड़के समान शीघ्रगामी हैं। वे आकाशमें छलाँग मार सकते हैं और इच्छानुसार कहीं भी कूद सकते हैं ॥ १८-१९ ॥

तमन्वियाम भवतां प्रभावाद् रजनीचराः । पुरा स नापराध्नोति सिद्धानां ब्रह्मवादिनाम् ॥ २० ॥ 'निशाचरो! भीमसेन ब्रह्मवादी सिद्धोंका कुछ अपराध न कर पावें, इसके पहले ही तुम्हारे प्रभावसे हम उन्हें ढूँढ़ निकालें' ॥ २० ॥

तथेत्युक्त्वा तु ते सर्वे हैडिम्बप्रमुखास्तदा । उद्देशज्ञाः कुबेरस्य नलिन्या भरतर्षभ ॥ २१ ॥ आदाय पाण्डवांश्चैव तांश्च विप्राननेकशः । लोमशेनैव सहिताः प्रययुः प्रीतमानसाः ॥ २२ ॥ जनमेजय! तब कुबेरके उस सरोवरका पता जाननेवाले उन घटोत्कच आदि सब राक्षसोंने 'तथास्तु' कहकर पाण्डवों तथा उन अनेकानेक ब्राह्मणोंको कंधेपर बैठाकर

Page 1048Permalink

लोमशजीके साथ वहाँसे प्रसन्नतापूर्वक प्रस्थान किया ।। २१-२२ ।। ते सर्वे त्वरिता गत्वा ददृशुः शुभकाननाम् । पद्मसौगन्धिकवतीं नलिनीं सुमनोरमाम् ।। २३ ।। उन सबने शीघ्रतापूर्वक जाकर सुन्दर वनस्थलीसे सुशोभित वह अत्यन्त मनोरम सरोवर देखा, जिसमें सौगन्धिक कमल थे ।। २३ ।। तं च भीमं महात्मानं तस्यास्तीरे मनस्विनम् । ददृशुर्निहतांश्चैव यक्षांश्च विपुलेक्षणान् ।। २४ ।। भिन्नकायाक्षिबाहूरून् संचूर्णितशिरोधरान् । तं च भीमं महात्मानं तस्यास्तीरे व्यवस्थितम् ।। २५ ।। उसके तटपर मनस्वी महामना भीमको तथा उनके द्वारा मारे गये बड़े-बड़े नेत्रोंवाले यक्षोंको भी देखा—जिनके शरीर, नेत्र, भुजाएँ और जाँघें छिन्न-भिन्न हो गयी थीं, गर्दन कुचल दी गयी थी, महात्मा भीम उस सरोवरके तटपर खड़े थे ।। २४-२५ ।। सक्रोधं स्तब्धनयनं संदष्टदशनच्छदम् । उद्यम्य च गदां दोर्भ्यां नदीतीरेष्ववस्थितम् ।। २६ ।। उनका क्रोध शान्त नहीं हुआ था। उनकी आँखें स्तब्ध हो रही थीं। वे दोनों हाथोंसे गदा उठाये और दाँतोंसे ओठ दबाये नदीके तटपर खड़े थे ।। २६ ।। प्रजासंक्षेपसमये दण्डहस्तमिवान्तकम् । तं दृष्ट्वा धर्मराजस्तु परिष्वज्य पुनः पुनः ।। २७ ।। उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता था, मानो प्रजाके संहारकालमें दण्ड हाथमें लिये यमराज खड़े हों। भीमसेनको उस अवस्थामें देखकर धर्मराजने उन्हें बार-बार हृदयसे लगाया ।। २७ ।। उवाच श्लक्ष्णया वाचा कौन्तेय किमिदं कृतम् । साहसं बत भद्रं ते देवानामथ चाप्रियम् ।। २८ ।। और मधुर वाणीमें कहा—'कुन्तीनन्दन! यह तुमने क्या कर डाला? तुम्हारा कल्याण हो। खेदके साथ कहना पड़ता है कि तुम्हारा यह कार्य साहसपूर्ण है और देवताओंके लिये अप्रिय है ।। २८ ।। पुनरेवं न कर्तव्यं मम चेदिच्छसि प्रियम् । अनुशिष्य तु कौन्तेयं पद्मानि परिगृह्य च ।। २९ ।। तस्यामेव नलिन्यां तु विजहुरमरोपमाः । एतस्मिन्नेव काले तु प्रगृहीतशिलायुधाः ।। ३० ।। प्रादुरासन् महाकायास्तस्योद्यानस्य रक्षिणः । ते दृष्ट्वा धर्मराजानं महर्षिं चापि लोमशम् ।। ३१ ।। नकुलं सहदेवं च तथान्यान् ब्राह्मणर्षभान् ।

Page 1049Permalink

विनयेन नताः सर्वे प्रणिपत्य च भारत ॥ ३२ ॥ सान्त्विता धर्मराजेन प्रसेदुः क्षणदाचराः । विदिताश्च कुबेरस्य तत्र ते कुरुपुङ्गवाः ॥ ३३ ॥ ऊषुर्नातिचिरं कालं रममाणाः कुरूद्वहाः । प्रतीक्षमाणा बीभत्सुं गन्धमादनसानुषु ॥ ३४ ॥

‘यदि मेरा प्रिय करना चाहते हो तो फिर ऐसा काम न करना।’ भीमसेनको ऐसा उपदेश देकर उन्होंने पूर्वोक्त सौगन्धिक कमल ले लिये और वे देवोपम पाण्डव उसी सरोवरके तटपर इधर-उधर भ्रमण करने लगे। इसी समय शिलाओंको आयुधरूपमें ग्रहण किये, बहुत-से विशालकाय उद्यानक्षक वहाँ प्रकट हो गये। भारत! उन्होंने धर्मराज युधिष्ठिर, महर्षि लोमश, नकुल-सहदेव तथा अन्यान्य श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको विनयपूर्वक नतमस्तक होकर प्रणाम किया। फिर धर्मराज युधिष्ठिरने उन्हें सान्त्वना दी। इससे वे निशाचर (राक्षस) प्रसन्न हो गये। तदनन्तर वे कुरुप्रवर पाण्डव धनाध्यक्ष कुबेरकी जानकारीमें कुछ कालतक वहाँ आनन्दपूर्वक टिके रहे और गन्धमादन पर्वतके शिखरोंपर अर्जुनके आगमनकी प्रतीक्षा करते रहे ॥ २९—३४ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौगन्धिकाहरणे पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें सौगन्धिकाहरणविषयक एक सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५५ ॥

१५६-

Page 1050Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

पाण्डवोंका आकाशवाणीके आदेशसे पुनः नर-नारायणाश्रममें लौटना

वैशम्पायन उवाच

तस्मिन् निवसमानोऽथ धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
कृष्णया सहितान् भ्रातॄनित्युवाच सहद्विजान् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस सौगन्धिक सरोवरके तटपर निवास करते हुए धर्मराज युधिष्ठिरने एक दिन ब्राह्मणों तथा द्रौपदीसहित अपने भाइयोंसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

दृष्टानि तीर्थान्यस्माभिः पुण्यानि च शिवानि च ।
मनसो ह्लादनीयानि वनानि च पृथक् पृथक् ॥ २ ॥
'हम लोगोंने अनेक पुण्यदायक एवं कल्याण-स्वरूप तीर्थोंके दर्शन किये। मनको आह्लाद प्रदान करनेवाले भिन्न-भिन्न वनोंका भी अवलोकन किया ॥ २ ॥

देवैः पूर्वं विचीर्णानि मुनिभिश्च महात्मभिः ।
यथाक्रमविशेषेण द्विजैः सम्पूजितानि च ॥ ३ ॥
'वे तीर्थ और वन ऐसे थे, जहाँ पूर्वकालमें देवता और महात्मा, मुनि विचरण कर चुके हैं तथा क्रमशः अनेक द्विजोंने उनका समादर किया है ॥ ३ ॥

ऋषीणां पूर्वचरितं तथा कर्म विचेष्टितम् ।
राजर्षीणां च चरितं कथाश्च विविधाः शुभाः ॥ ४ ॥
शृणवानास्तत्र तत्र स्म आश्रमेषु शिवेषु च ।
अभिषेकं द्विजैः सार्धं कृतवन्तो विशेषतः ॥ ५ ॥
'हमने ऋषियोंके पूर्वचरित्र, कर्म और चेष्टाओंकी कथा सुनी है। राजर्षियोंके भी चरित्र और भाँति-भाँतिकी शुभ कथाएँ सुनते हुए मंगलमय आश्रमोंमें विशेषतः ब्राह्मणोंके साथ तीर्थस्नान किया है ॥ ४-५ ॥

अर्चिताः सततं देवाः पुष्पैर्द्भिः सदा च वः ।
यथालब्धैर्मूलफलैः पितरश्चापि तर्पिताः ॥ ६ ॥
'हमने सदा फूल और जलसे देवताओंकी पूजा की है और यथाप्राप्त फल-मूलसे पितरोंको भी तृप्त किया है ॥ ६ ॥

पर्वतेषु च रम्येषु सर्वेषु च सरस्सु च ।
उदधौ च महापुण्ये सूपस्पृष्टं महात्मभिः ॥ ७ ॥

Page 1051Permalink

'रमणीय पर्वतों और समस्त सरोवरोंमें विशेषतः परम पुण्यमय समुद्रके जलमें इन महात्माओंके साथ भलीभाँति स्नान एवं आचमन किया है ।। ७ ।। इला सरस्वती सिन्धुर्यमुना नर्मदा तथा । नानातीर्थेषु रम्येषु सूपस्पृष्टं सह द्विजैः ॥ ८ ॥ 'इला, सरस्वती, सिंधु, यमुना तथा नर्मदा आदि नाना रमणीय तीर्थोंमें भी ब्राह्मणोंके साथ विधिवत् स्नान और आचमन किया है ।। ८ ।। गङ्गाद्वारमतिक्रम्य बहवः पर्वताः शुभाः । हिमवान् पर्वतश्चैव नानाद्विजगणायुतः ॥ ९ ॥ 'गंगाद्वार (हरिद्वार)-को लाँघकर बहुत-से मंगलमय पर्वत देखे तथा बहुसंख्यक ब्राह्मणोंसे युक्त हिमालय पर्वतका भी दर्शन किया ।। ९ ।। विशाला बदरी दृष्टा नरनारायणाश्रमः । दिव्या पुष्करिणी दृष्टा सिद्धदेवर्षिपूजिता ॥ १० ॥ 'विशाल बदरीतीर्थ, भगवान् नर-नारायणके आश्रम तथा सिद्धों और देवर्षियोंसे पूजित इस दिव्य सरोवरका भी दर्शन किया ।। १० ।। यथाक्रमविशेषेण सर्वाण्यायतनानि च । दर्शितानि द्विजश्रेष्ठा लोमशेन महात्मना ॥ ११ ॥ 'विप्रवरो! महात्मा लोमशजीने हमें सभी पुण्य-स्थानोंके क्रमशः दर्शन कराये हैं ।। ११ ।। इमं वैश्रवणावासं पुण्यं सिद्धनिषेवितम् । कथं भीम गमिष्यामो गतिरन्तरधीयताम् ॥ १२ ॥ 'भीमसेन! यह सिद्धसेवित पुण्यप्रदेश कुबेरका निवासस्थान है। अब हम कुबेरके भवनमें कैसे प्रवेश करेंगे? इसका उपाय सोचो' ।। १२ ।।

वैशम्पायन उवाच

एवं ब्रुवति राजेन्द्रे वागुवाचाशरीरिणी । न शक्यो दुर्गमो गन्तुमितो वैश्रवणाश्रमात् ॥ १३ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**महाराज युधिष्ठिरके ऐसा कहते ही आकाशवाणी बोल उठी—'कुबेरके इस आश्रमसे आगे जाना सम्भव नहीं है। यह मार्ग अत्यन्त दुर्गम है ।। १३ ।। अनेनैव पथा राजन् प्रतिगच्छ यथागतम् । नरनारायणस्थानं बदरीत्यभिविश्रुतम् ॥ १४ ॥ 'राजन्! जिससे तुम आये हो, उसी मार्गसे विशाला बदरीके नामसे विख्यात भगवान् नर-नारायणके स्थानको लौट जाओ ।। १४ ।। तस्माद् यास्यसि कौन्तेय सिद्धचारणसेवितम् ।

Page 1052Permalink

बहुपुष्पफलं रम्यमाश्रमं वृषपर्वणः ॥ १५ ॥ ‘कुन्तीकुमार! वहाँसे तुम प्रचुर फल-फूलसे सम्पन्न वृषपर्वाके रमणीय आश्रमपर जाओ, जहाँ सिद्ध और चारण निवास करते हैं ॥ १५ ॥ अतिक्रम्य च तं पार्थ त्वाष्टिषेणाश्रमे वसेः । ततो द्रक्ष्यसि कौन्तेय निवेशं धनदस्य च ॥ १६ ॥ ‘उस आश्रमको भी लाँघकर आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाना और वहीं निवास करना। तदनन्तर तुम्हें धनदाता कुबेरके निवासस्थानका दर्शन होगा’ ॥ १६ ॥ एतस्मिन्नन्तरे वायुर्दिव्यगन्धवहः शुचिः । सुखप्रह्लादनः शीतः पुष्पवर्षं ववर्ष च ॥ १७ ॥ इसी समय दिव्य सुगन्धसे परिपूर्ण पवित्र वायु चलने लगी, जो शीतल तथा सुख और आह्लाद देनेवाली थी। साथ ही वहाँ फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ १७ ॥ श्रुत्वा तु दिव्यमाकाशाद् वाचं सर्वे विसिस्मियुः । ऋषीणां ब्राह्मणानां च पार्थिवानां विशेषतः ॥ १८ ॥ वह दिव्य आकाशवाणी सुनकर सबको बड़ा विस्मय हुआ। ऋषियों, ब्राह्मणों और विशेषतः राजर्षियोंको अधिक आश्चर्य हुआ ॥ १८ ॥ श्रुत्वा तन्महदाश्चर्यं द्विजो धौम्योऽब्रवीत् तदा । न शक्यमुत्तरं वक्तुमेवं भवतु भारत ॥ १९ ॥ वह महान् आश्चर्यजनक बात सुनकर विप्रर्षि धौम्यने कहा—‘भारत! इसका प्रतिवाद नहीं किया जा सकता। ऐसा ही होना चाहिये’ ॥ १९ ॥ ततो युधिष्ठिरो राजा प्रतिजग्राह तद् वचः । प्रत्यागम्य पुनस्तं तु नरनारायणाश्रमम् ॥ २० ॥ भीमसेनादिभिः सर्वैर्भ्रातृभिः परिवारितः । पाञ्चाल्या ब्राह्मणाश्चैव न्यवसन्त सुखं तदा ॥ २१ ॥ तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने वह आकाशवाणी स्वीकार कर ली और पुनः नर-नारायणके आश्रममें लौटकर भीमसेन आदि सब भाइयों और द्रौपदीके साथ वहीं रहने लगे। उस समय साथ आये हुए ब्राह्मण लोग भी वहीं सुखपूर्वक निवास करने लगे ॥ २०-२१ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां पुनर्नरनारायणाश्रमागपने षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें पाण्डवोंका पुनः नर-नारायणके आश्रममें आगमनविषयक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५६ ॥

(जटासुरवधपर्व)

Page 1053Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

(जटासुरवधपर्व)

सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

जटासुरके द्वारा द्रौपदीसहित युधिष्ठिर, नकुल, सहदेवका हरण तथा भीमसेनद्वारा जटासुरका वध

वैशम्पायन उवाच

ततस्तान् परिविश्वस्तान् वसतस्तत्र पाण्डवान् ।
पर्वतेन्द्रे द्विजैः सार्धं पार्थार्गमनकाङ्क्षया ॥ १ ॥
गतेषु तेषु रक्षःसु भीमसेनात्मजेऽपि च ।
रहितान् भीमसेनेन कदाचित् तान् यदृच्छया ॥ २ ॥
जहार धर्मराजानं यमौ कृष्णां च राक्षसः ।
ब्राह्मणो मन्त्रकुशलः सर्वशास्त्रविदुत्तमः ॥ ३ ॥
इति ब्रुवन् पाण्डवेयान् पर्युपास्ते स्म नित्यदा ।
परीप्समानः पार्थानां कलापानि धनूंषि च ॥ ४ ॥
अन्तरं सम्परिप्रेप्सुर्द्रौपद्या हरणं प्रति ।
दुष्टात्मा पापबुद्धिः स नाम्ना ख्यातो जटासुरः ॥ ५ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर पर्वतराज गन्धमादनपर सब पाण्डव अर्जुनके आनेकी प्रतीक्षा करते हुए ब्राह्मणोंके साथ निःशंक रहने लगे। उन्हें पहुँचानेके लिये आये हुए राक्षस चले गये। भीमसेनका पुत्र घटोत्कच भी विदा हो गया। तत्पश्चात् एक दिनकी बात है, भीमसेनकी अनुपस्थितिमें अकस्मात् एक राक्षसने धर्मराज युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव तथा द्रौपदीको हर लिया। वह ब्राह्मणके वेषमें प्रतिदिन उन्हींके साथ रहता था और सब पाण्डवोंसे कहता था कि 'मैं सम्पूर्ण शास्त्रोंमें श्रेष्ठ और मन्त्र-कुशल ब्राह्मण हूँ।' वह कुन्तीकुमारोंके तरकस और धनुषको भी हर लेना चाहता था और द्रौपदीका अपहरण करनेके लिये सदा अवसर ढूँढ़ता रहता था। उस दुष्टात्मा एवं पापबुद्धि राक्षसका नाम जटासुर था ॥

पोषणं तस्य राजेन्द्र चक्रे पाण्डवनन्दनः ।
बुबुधे न च तं पापं भस्मच्छन्नमिवानलम् ॥ ६ ॥

जनमेजय! पाण्डवोंको आनन्द प्रदान करनेवाले युधिष्ठिर अन्य ब्राह्मणोंकी तरह उसका भी पालन-पोषण करते थे। परंतु राखमें छिपी हुई आगकी भाँति उस पापीके

Page 1054Permalink

असली स्वरूपको वे नहीं जानते थे ॥ ६ ॥ स भीमसेने निष्क्रान्ते मृगयार्थमरिन्दम । घटोत्कचं सानुचरं दृष्ट्वा विप्रद्रुतं दिशः ॥ ७ ॥ लोमशप्रभृतींस्तांस्तु महर्षींश्च समाहितान् । स्नातुं विनिर्गतान् दृष्ट्वा पुष्पार्थं च तपोधनान् ॥ ८ ॥ रूपमन्यत् समास्थाय विकृतं भैरवं महत् । गृहीत्वा सर्वशस्त्राणि द्रौपदीं परिगृह्य च ॥ ९ ॥ प्रातिष्ठत स दुष्टात्मा त्रीन् गृहीत्वा च पाण्डवान् । सहदेवस्तु यत्नेन ततोऽपक्रम्य पाण्डवः ॥ १० ॥ विक्रम्य कौशिकं खड्गं मोक्षयित्वा ग्रहं रिपोः । आक्रन्दद् भीमसेनं वै येन यातो महाबलः ॥ ११ ॥ शत्रुसूदन! हिंसक पशुओंको मारनेके लिये भीमसेनके आश्रमसे बाहर चले जानेपर उस राक्षसने देखा कि घटोत्कच अपने सेवकोंसहित किसी अज्ञात दिशाको चला गया, लोमश आदि महर्षि ध्यान लगाये बैठे हैं तथा दूसरे तपोधन स्नान करने और फूल लानेके लिये कुटियासे बाहर निकल गये हैं, तब उस दुष्टात्माने विशाल, विकराल एवं भयंकर दूसरा रूप धारण करके पाण्डवोंके सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्र, द्रौपदी तथा तीनों पाण्डवोंको भी लेकर वहाँसे प्रस्थान कर दिया। उस समय पाण्डु-कुमार सहदेव प्रयत्न करके उस राक्षसकी पकड़से छूट गये और पराक्रम करके म्यानसे निकली हुई अपनी तलवारको भी उससे छुड़ा लिया। फिर वे महाबली भीमसेन जिस मार्गसे गये थे, उधर ही जाकर उन्हें जोर-जोरसे पुकारने लगे ॥ ७—११ ॥

Page 1055Permalink

तमब्रवीद् धर्मराजो ह्रियमाणो युधिष्ठिरः ।
धर्मस्ते हीयते मूढ न तत्त्वं समवेक्षसे ॥ १२ ॥
इधर जिन्हें वह जटासुर हरकर लिये जा रहा था 'वे धर्मराज युधिष्ठिर उससे इस प्रकार बोले—‘अरे मूर्ख! इस प्रकार (विश्वासघात करनेसे) तो तेरे धर्मका ही नाश हो रहा है। किंतु उधर तेरी दृष्टि नहीं जाती है ।।
येऽन्ये क्वचिन्मनुष्येषु तिर्यग्योनिगताश्च ये ।
धर्मं ते समवेक्षन्ते रक्षांसि च विशेषतः ॥ १३ ॥
‘दूसरे भी जहाँ कहीं मनुष्य अथवा पशु-पक्षीकी योनिमें स्थित प्राणी हैं, वे सभी धर्मपर दृष्टि रखते हैं। राक्षस तो (पशु-पक्षीकी अपेक्षा भी) विशेषरूपसे धर्मका विचार करते हैं ।। १३ ।।
धर्मस्य राक्षसा मूलं धर्मं ते विदुरुत्तमम् ।
एतत् परीक्ष्य सर्वं त्वं समीपे स्थातुमर्हसि ॥ १४ ॥
देवाश्च ऋषयः सिद्धाः पितरश्चापि राक्षस ।
गन्धर्वोरगरक्षांसि वयांसि पशवस्तथा ॥ १५ ॥
तिर्यग्योनिगताश्चैव अपि कीटपिपीलिकाः ।
मनुष्यानुपजीवन्ति ततस्त्वमपि जीवसि ॥ १६ ॥