भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1275, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1275

भय प्राप्त होता है। इस प्रकार सभी फल क्रमशः भोगने पड़ते हैं ।।
दुःखान्यनुभवन्त्याढ्या दरिद्राश्च सुखानि च ।
यौगपद्याद्धि भुञ्जाना दृश्यन्ते लोकसाक्षिकम् ॥
कभी धनाढ्य लोग दुःखका अनुभव करते हैं और कभी दरिद्र भी सुख भोगते हैं। इस प्रकार एक ही साथ लोग शुभ और अशुभका भोग करते देखे जाते हैं। सारा जगत् इस बातका साक्षी है ।।
नरके स्वर्गलोके च न तथा संस्थितिः प्रिये ।
नित्यं दुःखं हि नरके स्वर्गे नित्यं सुखं तथा ॥
प्रिये! किंतु नरक और स्वर्गलोकमें ऐसी स्थिति नहीं है। नरकमें सदा दुःख ही दुःख है और स्वर्गमें सदा सुख ही सुख ।।
तत्रापि सुमहद् भुक्त्वा पूर्वमल्पं पुनः शुभे ।
एतत् ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
शुभे! वहाँ भी शुभ या अशुभमेंसे जो बहुत अधिक होता है, उसका भोग पहले और जो बहुत कम होता है, उसका भोग पीछे होता है। ये सब बातें मैंने तुम्हें बता दीं, अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।

उमोवाच

भगवन् प्राणिनो लोके म्रियन्ते केन हेतुना ।
जाता जाता न तिष्ठन्ति तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा— भगवन्! इस लोकमें प्राणी किस कारणसे मर जाते हैं? जन्म ले-लेकर वे यहीं बने क्यों नहीं रहते हैं? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु सत्यं समाहिता ।
आत्मा कर्मक्षयाद् देहं यथा मुञ्चति तच्छृणु ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! इस विषयमें जो यथार्थ बात है, वह मैं तुम्हें बता रहा हूँ। कर्मोंका भोग समाप्त होनेपर आत्मा इस शरीरको कैसे छोड़ता है? यह एकाग्रचित्त होकर सुनो ।।
शरीरात्मसमाहारो जन्तुरित्यभिधीयते ।
तत्रात्मानं नित्यमाहुरनित्यं क्षेत्रमुच्यते ॥
शरीर और आत्माका (जड और चेतनका) जो संयोग है, उसीको जीव या प्राणी कहते हैं। इनमें आत्माको नित्य और शरीरको अनित्य बताया जाता है ।।
एवं कालेन संक्रान्तं शरीरं जर्जरीकृतम् ।
अकर्मयोग्यं संशीर्णं त्यक्त्वा देही ततो व्रजेत् ॥