महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
भय प्राप्त होता है। इस प्रकार सभी फल क्रमशः भोगने पड़ते हैं ।।
दुःखान्यनुभवन्त्याढ्या दरिद्राश्च सुखानि च ।
यौगपद्याद्धि भुञ्जाना दृश्यन्ते लोकसाक्षिकम् ॥
कभी धनाढ्य लोग दुःखका अनुभव करते हैं और कभी दरिद्र भी सुख भोगते हैं। इस प्रकार एक ही साथ लोग शुभ और अशुभका भोग करते देखे जाते हैं। सारा जगत् इस बातका साक्षी है ।।
नरके स्वर्गलोके च न तथा संस्थितिः प्रिये ।
नित्यं दुःखं हि नरके स्वर्गे नित्यं सुखं तथा ॥
प्रिये! किंतु नरक और स्वर्गलोकमें ऐसी स्थिति नहीं है। नरकमें सदा दुःख ही दुःख है और स्वर्गमें सदा सुख ही सुख ।।
तत्रापि सुमहद् भुक्त्वा पूर्वमल्पं पुनः शुभे ।
एतत् ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
शुभे! वहाँ भी शुभ या अशुभमेंसे जो बहुत अधिक होता है, उसका भोग पहले और जो बहुत कम होता है, उसका भोग पीछे होता है। ये सब बातें मैंने तुम्हें बता दीं, अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।
उमोवाच
भगवन् प्राणिनो लोके म्रियन्ते केन हेतुना ।
जाता जाता न तिष्ठन्ति तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा— भगवन्! इस लोकमें प्राणी किस कारणसे मर जाते हैं? जन्म ले-लेकर वे यहीं बने क्यों नहीं रहते हैं? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु सत्यं समाहिता ।
आत्मा कर्मक्षयाद् देहं यथा मुञ्चति तच्छृणु ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! इस विषयमें जो यथार्थ बात है, वह मैं तुम्हें बता रहा हूँ। कर्मोंका भोग समाप्त होनेपर आत्मा इस शरीरको कैसे छोड़ता है? यह एकाग्रचित्त होकर सुनो ।।
शरीरात्मसमाहारो जन्तुरित्यभिधीयते ।
तत्रात्मानं नित्यमाहुरनित्यं क्षेत्रमुच्यते ॥
शरीर और आत्माका (जड और चेतनका) जो संयोग है, उसीको जीव या प्राणी कहते हैं। इनमें आत्माको नित्य और शरीरको अनित्य बताया जाता है ।।
एवं कालेन संक्रान्तं शरीरं जर्जरीकृतम् ।
अकर्मयोग्यं संशीर्णं त्यक्त्वा देही ततो व्रजेत् ॥
जब कालसे आक्रान्त होकर शरीर जरावस्थासे जर्जर हो जाता है, कोई कर्म करने योग्य नहीं रह जाता और सर्वथा गल जाता है, तब देहधारी जीव उसे त्यागकर चल देता है॥
नित्यस्यानित्यसंत्यागाल्लोके तन्मरणं विदुः ।
कालं नातिक्रमेरेन् हि सदेवासुरमानवाः ॥
नित्य जीवात्मा जब अनित्य शरीरको त्यागकर चला जाता है, तब लोकमें उस प्राणीकी मृत्यु हुई मानी जाती है। देवता, असुर और मनुष्य कोई भी कालका उल्लंघन नहीं कर सकते॥
यथाऽऽकाशे न तिष्ठेत द्रव्यं किंचिदचेतनम् ।
तथा धावति कालोऽयं क्षणं किंचिन्न तिष्ठति ॥
जैसे आकाशमें कोई भी जड द्रव्य स्थिर नहीं रह सकता, उसी प्रकार यह काल निरन्तर दौड़ लगाता रहता है। एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता॥
स पुनर्जायतेऽन्यत्र शरीरं नवमाविशन् ।
एवं लोकगतिर्नित्यमादिप्रभृति वर्तते ॥
वह जीव फिर किसी दूसरे शरीरमें प्रवेश करके अन्यत्र जन्म लेता है। इस प्रकार आदि कालसे ही लोककी सदा ऐसी ही गति चल रही है॥
उमोवाच
भगवन् प्राणिनो बाला दृश्यन्ते मरणं गताः ।
अतिवृद्धाश्च जीवन्तो दृश्यन्ते चिरजीविनः ॥
उमाने पूछा— भगवन्! इस संसारमें बाल्यावस्थामें भी प्राणियोंकी मृत्यु होती देखी जाती है और अत्यन्त वृद्ध मनुष्य भी चिरजीवी होकर जीवित दिखायी देते हैं॥
केवलं कालमरणं न प्रमाणं महेश्वर ।
तस्मान्मे संशयं ब्रूहि प्राणिनां जीवकारणम् ॥
महेश्वर! केवल काल-मृत्यु अर्थात् वृद्धावस्थामें ही मृत्यु होनेकी बात प्रमाणभूत नहीं रह गयी है; अतः प्राणियोंके जीवनके लिये उठे हुए मेरे इस संदेहका आप निवारण कीजिये॥
श्रीमहेश्वर उवाच
शृणु तत् कारणं देवि निर्णयस्त्वेक एव सः ।
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! इसका कारण सुनो। इस विषयमें एक ही निर्णय है॥
यावत् पूर्वकृतं कर्म तावज्जीवति मानवः ।
तत्र कर्मवशाद् बाला म्रियन्ते कालसंक्षयात् ॥
चिरं जीवन्ति वृद्धाश्च तथा कर्मप्रमाणतः ।
इति ते कथितं देवि निर्विशङ्का भव प्रिये ॥ जबतक पूर्वकृत कर्म (प्रारब्ध) शेष है, तबतक मनुष्य जीवित रहता है। उसी कर्मके अधीन होकर प्रारब्ध भोगका काल समाप्त होनेपर बालक भी मर जाते हैं और उसी कर्मकी मात्राके अनुसार वृद्ध पुरुष भी दीर्घकालतक जीवित रहते हैं। देवि! यह सब विषय तुम्हें बताया गया। प्रिये इस विषयमें अब तुम संशयरहित हो जाओ ॥
उमोवाच
भगवन् केन वृत्तेन भवन्ति चिरजीविनः । अल्पायुषो नराः केन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ **उमाने पूछा—**भगवन्! किस आचरणसे मनुष्य चिरजीवी होते हैं और किससे अल्पायु हो जाते हैं? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
शृणु तत् सर्वमखिलं गुह्यं पथ्यतरं नृणाम् । येन वृत्तेन सम्पन्ना भवन्ति चिरजीविनः ॥ **श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! यह सारा गूढ़ रहस्य मनुष्योंके लिये परम लाभदायक है। जिस आचरणसे सम्पन्न मनुष्य चिरजीवी होते हैं, वह सब सुनो ॥ अहिंसा सत्यवचनमक्रोधः क्षान्तिराजर्वम् । गुरूणां नित्यशुश्रूषा वृद्धानामपि पूजनम् ॥ शौचादकार्यसंत्यागः सदा पथ्यस्य भोजनम् । एवमादिगुणं वृत्तं नराणां दीर्घजीविनाम् ॥ अहिंसा, सत्यभाषण, क्रोधका त्याग, क्षमा, सरलता, गुरुजनोंकी नित्य सेवा, बड़े-बूढ़ोंका पूजन, पवित्रताका ध्यान रखकर न करनेयोग्य कर्मोंका त्याग, सदा ही पथ्य भोजन इत्यादि गुणोंवाला आचार दीर्घजीवी मनुष्योंका है ॥ तपसा ब्रह्मचर्येण रसायननिषेवणात् । उदग्रसत्त्वा बलिनो भवन्ति चिरजीविनः ॥ तपस्या, ब्रह्मचर्य तथा रसायनके सेवनसे मनुष्य अधिक धैर्यशाली, बलवान् और चिरजीवी होते हैं ॥ स्वर्गे वा मानुषे वापि चिरं तिष्ठन्ति धार्मिकाः ॥ अपरे पापकर्माणः प्रायशोऽनृतवादिनः । हिंसाप्रिया गुरुद्विष्टा निष्क्रियाः शौचवर्जिताः ॥ नास्तिका घोरकर्माणः सततं मांसपानपाः । पापाचारा गुरुद्विष्टाः कोपनाः कलहप्रियाः ॥ एवमेवाशुभाचारास्तिष्ठन्ति निरये चिरम् ।
और स्त्री-भावनासे युक्त पुरुष तदनुरूप कर्म करके उस कर्मके अनुसार स्त्री हो सकता है॥
उमोवाच
भगवन् सर्वलोकेश कर्मात्मा न करोति चेत्।
कोऽन्यः कर्मकरो देहे तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि॥
उमाने पूछा— भगवन्! सर्वलोकेश्वर! यदि आत्मा कर्म नहीं करता तो शरीरमें दूसरा कौन कर्म करनेवाला है? यह मुझे बताइये॥
श्रीमहेश्वर उवाच
शृणु भामिनि कर्तारमात्मा हि न च कर्मकृत्।
प्रकृत्या गुणयुक्तेन क्रियते कर्म नित्यशः॥
श्रीमहेश्वरने कहा— भामिनि! कर्ता कौन है? यह सुनो। आत्मा कर्म नहीं करता है। प्रकृतिके गुणोंसे युक्त प्राणीद्वारा ही सदा कर्म किया जाता है॥
शरीरं प्राणिनां लोके यथा पित्तकफानिलैः।
व्याप्तमेभिस्त्रिभिर्दोषैस्तथा व्याप्तं त्रिभिर्गुणैः॥
जगत्में प्राणियोंका शरीर जैसे वात, पित्त और कफ—इन तीन दोषोंसे व्याप्त रहता है, इसी प्रकार प्राणी सत्त्व, रज और तम—इन गुणोंसे व्याप्त होता है॥
सत्त्वं रजस्तमश्चैव गुणास्त्वेते शरीरिणः।
प्रकाशात्मकमेतेषां सत्त्वं सततमिष्यते॥
रजो दुःखात्मकं तत्र तमो मोहात्मकं स्मृतम्।
त्रिभिरेतैर्गुणैर्युक्तं लोके कर्म प्रवर्तते॥
सत्त्व, रज और तम—ये तीनों शरीरधारीके गुण हैं। इनमेंसे सत्त्व सदा प्रकाशस्वरूप माना गया है। रजोगुण दुःखरूप और तमोगुण मोहरूप बताया गया है। लोकमें इन तीनों गुणोंसे युक्त कर्मकी प्रवृत्ति होती है॥
सत्यं प्राणिदया शौचं श्रेयः प्रीतिः क्षमा दमः।
एवमादि तथान्यच्च कर्म सात्त्विकमुच्यते॥
सत्यभाषण, प्राणियोंपर दया, शौच, श्रेय, प्रीति, क्षमा और इन्द्रिय-संयम—ये तथा ऐसे ही अन्य कर्म भी सात्त्विक कहलाते हैं॥
दाक्ष्यं कर्मपरत्वं च लोभो मोहो विधिं प्रति।
कलत्रसङ्गो माधुर्यं नित्यमैश्वर्यलुब्धता॥
रजसश्चोद्भवं चैतत् कर्म नानाविधं सदा॥
दक्षता, कर्मपरायणता, लोभ, विधिके प्रति मोह, स्त्री-संग, माधुर्य तथा सदा ऐश्वर्यका लोभ—ये नाना प्रकारके भाव और कर्म रजोगुणसे प्रकट होते हैं॥
अनृतं चैव पारुष्यं धृतिर्विद्वेषिता भृषम् ।
हिंसासत्यं च नास्तिक्यं निद्रालस्यभयानि च ॥
तमसश्चोद्भवं चैतत् कर्म पापयुतं तथा ॥
असत्यभाषण, रूखापन, अत्यन्त अधीरता, हिंसा, असत्य, नास्तिकता, निद्रा, आलस्य और भय—ये तथा पापयुक्त कर्म तमोगुणसे प्रकट होते हैं ।।
तस्माद् गुणमयः सर्वः कार्यारम्भः शुभाशुभः ।
तस्मादात्मानमव्यग्रं विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥
इसलिये समस्त शुभाशुभ कार्यारम्भ गुणमय है, अतः आत्माको व्यग्रतारहित, अकर्ता और अविनाशी समझो ।।
सात्त्विकाः पुण्यलोकेषु राजसा मानुषे पदे ।
तिर्यग्योनौ च नरके तिष्ठेयुस्तामसा नराः ॥
सात्त्विक मनुष्य पुण्यलोकोंमें जाते हैं। राजस जीव मनुष्यलोकमें स्थित होते हैं तथा तमोगुणी मनुष्य पशु-पक्षियोंकी योनिमें और नरकमें स्थित होते हैं ।।
उमोवाच
किमर्थमात्मा भिन्नेऽस्मिन् देहे शस्त्रेण वा हते ।
स्वयं प्रयास्यति तदा तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा—इस शरीरके भेदनसे अथवा शस्त्रद्वारा मारे जानेसे आत्मा स्वयं ही क्यों चला जाता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् ।
एतन्नैर्मापिकैश्चापि मुह्यन्ते सूक्ष्मबुद्धिभिः ॥
श्रीमहेश्वरने कहा—कल्याणि! इसका कारण मैं बताता हूँ, सुनो। इस विषयमें सूक्ष्म बुद्धिवाले विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं ।।
कर्मक्षये तु सम्प्राप्ते प्राणिनां जन्मधारिणाम् ।
उपद्रवो भवेद् देहे येन केनापि हेतुना ॥
तन्निमित्तं शरीरी तु शरीरं प्राप्य संक्षयम् ।
अपयाति परित्यज्य ततः कर्मवशेन सः ॥
जन्मधारी प्राणियोंके कर्मोंका क्षय हो जानेपर इस देहमें जिस किसी भी कारणसे उपद्रव होने लगता है। उसके कारण शरीरका क्षय हो जानेपर देहाभिमानी जीव कर्मके अधीन हो उस शरीरको त्यागकर चला जाता है ।।
देहः क्षयति नैवात्मा वेदनाभिर्न चाल्यते ।
तिष्ठेत् कर्मफलं यावद् व्रजेत् कर्मक्षये पुनः ॥
शरीर क्षीण होता है, आत्मा नहीं। वह वेदनाओंसे भी विचलित नहीं होता। जबतक कर्मफल शेष रहता है, तबतक जीवात्मा इस शरीरमें स्थित रहता है और कर्मोंका क्षय होनेपर पुनः चला जाता है ।।
आदिप्रभृति लोकेऽस्मिन्नेवमात्मगतिः स्मृता ।
एतत् ते कथितं देवि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।।
आदिकालसे ही इस जगत्में आत्माकी ऐसी ही गति मानी गयी है। देवि! यह सब विषय तुम्हें बताया गया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
अध्याय (पृष्ठ 1282)
[प्राणियोंके चार भेदोंका निरूपण, पूर्वजन्मकी स्मृतिका रहस्य, मरकर फिर लौटनेमें कारण स्वप्नदर्शन, दैव और पुरुषार्थ तथा पुनर्जन्मका विवेचन]
उमोवाच
भगवन् देवदेवेश कर्मणैव शुभाशुभम् ।
यथायोगं फलं जन्तुः प्राप्नोतीति विनिश्चयः ॥
**उमाने पूछा—**भगवन्! देवदेवेश्वर! जीव अपने कर्मसे यथायोग्य शुभाशुभ फल पाता है—यह निश्चय हुआ ॥
परेषां विप्रियं कुर्वन् यथा सम्प्राप्नुयाच्छुभम् ।
यदेतदस्मिंश्चेद् देहे तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
दूसरोंका अप्रिय करके भी इस शरीरमें स्थित हुआ जीवात्मा किस प्रकार शुभ फल पाता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
तदप्यस्ति महाभागे अभिसंधिबलान्नृणाम् ।
हितार्थं दुःखमन्येषां कृत्वा सुखमवाप्नुयात् ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**महाभागे! ऐसा भी होता है कि शुभ संकल्पके बलसे मनुष्योंके हितके लिये उन्हें दुःख देकर भी पुरुष सुख प्राप्त कर सके ॥
दण्डयन् भर्त्सयन् राजा प्रजाः पुण्यमवाप्नुयात् ।
गुरुः संतर्जयन् शिष्यान् भर्ता भृत्यजनान् स्वकान् ॥
राजा प्रजाको अपराधके कारण दण्ड देता और फटकारता है तो भी वह पुण्यका ही भागी होता है। गुरु अपने शिष्योंको और स्वामी अपने सेवकोंको उनके सुधारके लिये यदि डाँटता-फटकारता है तो इससे सुखका ही भागी होता है ॥
उन्मार्गप्रतिपन्नांश्च शास्ता धर्मफलं लभेत् ॥
चिकित्सकश्च दुःखानि जनयन् हितमाप्नुयात् ।
जो कुमार्गपर चल रहे हों, उनका शासन करनेवाला राजा धर्मका फल पाता है। चिकित्सक रोगीकी चिकित्सा करते समय उसे कष्ट ही देता है तथापि रोग मिटानेका प्रयत्न करनेके कारण वह हितका ही भागी होता है ॥
एवमन्ये सुमनसो हिंसकाः स्वर्गमाप्नुयुः ॥
एकस्मिन् निहते भद्रे बहवः सुखमाप्नुयुः ।
तस्मिन् हते भवेद् धर्मः कुत एव तु पातकम् ॥
इस प्रकार दूसरे लोग भी यदि शुद्ध हृदयसे किसीको कष्ट पहुँचाते हैं तो स्वर्गलोकमें जाते हैं। भद्रे! जहाँ किसी एक दुष्टके मारे जानेपर बहुत-से सत्पुरुषोंको सुख प्राप्त होता हो तो उसके मारनेपर पातक क्या लगेगा, उलटे धर्म होता है ॥
अभिसंधेरजिह्मत्वाच्छुद्धे धर्मस्य गौरवात् । एतत् कृत्वा तु पापेभ्यो न दोषं प्राप्नुयुः क्वचित् ॥ यदि उद्देश्य कुटिलतापूर्ण न हो, अपितु धर्मके गौरवसे शुद्ध हो तो पापियोंके प्रति ऐसा व्यवहार करके भी कहीं दोषकी प्राप्ति नहीं होती ॥
उमोवाच
चतुर्विधानां जन्तूनां कथं ज्ञानमिह स्मृतम् । कृत्रिमं तत्स्वभावं वा तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ **उमाने पूछा—**इस जगत्में रहनेवाले चार प्रकारके प्राणियोंको कैसे ज्ञान प्राप्त होता है! वह कृत्रिम है या स्वाभाविक? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
स्थावरं जङ्गमं चेति जगद् द्विविधमुच्यते । चतस्रो योनयस्तत्र प्रजानां क्रमशो यथा ॥ **श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! यह जगत् स्थावर और जंगमके भेदसे दो प्रकारका पाया जाता है! इसमें प्रजाकी क्रमशः चार योनियाँ हैं—जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज ॥
तेषामुद्भिदजा वृक्षा लतावल्ल्यश्च वीरुधः । दंशयूकादयश्चान्ये स्वेदजाः कृमिजातयः ॥ इनमेंसे वृक्ष, लता, वल्ली और तृण आदि उद्भिज्ज कहलाते हैं। डाँस और जूँ आदि कीट जातिके प्राणी स्वेदज कहे गये हैं ॥
पक्षिणश्छिद्रकर्णाश्च प्राणिनस्त्वण्डजा मताः । मृगव्यालमनुष्यांश्च विद्धि तेषां जरायुजान् ॥ जिनके पंख होते हैं और कानके स्थानमें एक छिद्र मात्र होता है, ऐसे प्राणी अण्डज माने गये हैं। पशु, व्याल (हिंसक जन्तु बाघ, चीते आदि) और मनुष्य—इनको जरायुज समझो ॥
एवं चतुर्विधां जातिमात्मा संसृत्य तिष्ठति ॥ इस तरह आत्मा इन चार प्रकारकी जातियोंका आश्रय लेकर रहता है ॥
तथा भूम्यम्बुसंयोगाद् भवन्त्युद्भिदजाः प्रिये । शीतोष्णयोस्तु संयोगाज्जायन्ते स्वेदजाः प्रिये ॥ प्रिये! पृथ्वी और जलके संयोगसे उद्भिज्ज प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है तथा स्वेदज जीव सर्दी और गर्मीके संयोगसे जीवन ग्रहण करते हैं ॥
अण्डजाश्चापि जायन्ते संयोगात् क्लेदबीजयोः । शुक्लशोणितसंयोगात् सम्भवन्ति जरायुजाः ॥
जरायुजानां सर्वेषां मानुषं पदमुत्तमम् ।। क्लेद और बीजके संयोगसे अण्डज प्राणियोंका जन्म होता है और जरायुज प्राणी रज-वीर्यके संयोगसे उत्पन्न होते हैं। समस्त जरायुजोंमें मनुष्यका स्थान सबसे ऊँचा है ।।
अतः परं तमोत्पत्तिं शृणु देवि समाहिता । द्विविधं हि तमो लोके शार्वरं देहजं तथा ।। देवि! अब एकाग्रचित्त होकर तमकी उत्पत्ति सुनो। लोकमें दो प्रकारका तम बताया गया है—रात्रिका और देहजनित ।।
ज्योतिर्भिश्श्च तमो लोके नाशं गच्छति शार्वरम् । देहजं तु तमो लोके तैः समस्तैर्न शाम्यति ।। लोकमें ज्योति या तेजके द्वारा रात्रिका अन्धकार नष्ट हो जाता है; परंतु जो देहजनित तम है, वह सम्पूर्ण ज्योतियोंके प्रकाशित होनेपर भी नहीं शान्त होता ।।
तमसस्तस्य नाशार्थं नोपायमधिजग्मिवान् । तपश्चचार विपुलं लोककर्ता पितामहः ।। लोककर्ता पितामह ब्रह्माजीको जब उस तमका नाश करनेके लिये कोई उपाय नहीं सूझा, तब वे बड़ी भारी तपस्या करने लगे ।।
चरतस्तु समुद्भूता वेदाः साङ्गाः सहोत्तराः । ताँल्लब्ध्वा मुमुदे ब्रह्मा लोकानां हितकाम्यया ।। देहजं तत् तमो घोरं वेदैरेव विनाशितम् ।। तपस्या करते समय उनके मुखसे छहों अंगों और उपनिषदोंसहित चारों वेद प्रकट हुए। उन्हें पाकर ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने लोकोंके हितकी कामनासे वेदोंके ज्ञानद्वारा ही उस देहजनित घोर तमका नाश किया ।।
कार्याकार्यमिदं चेति वाच्यावाच्यमिदं त्विति । यदि चेन्न भवेल्लोके श्रुतं चारित्रदैशिकम् ।। पशुभिर्निर्विशेषं तु चेष्टन्ते मानुषा अपि ।। यह वेदज्ञान कर्तव्य और अकर्तव्यकी शिक्षा देनेवाला है, वाच्य और अवाच्यका बोध करानेवाला है। यदि संसारमें सदाचारकी शिक्षा देनेवाली श्रुति न हो तो मनुष्य भी पशुओंके समान ही मनमानी चेष्टा करने लगें ।।
यज्ञादीनां समारम्भः श्रुतेनैव विधीयते । यज्ञस्य फलयोगेन देवलोकः समृद्ध्यते ।। वेदोंके द्वारा ही यज्ञ आदि कर्मोंका आरम्भ किया जाता है। यज्ञफलके संयोगसे देवलोककी समृद्धि बढ़ती है ।।
प्रीतियुक्ताः पुनर्देवा मानुषाणां भवन्त्युत । एवं नित्यं प्रवर्धेते रोदसी च परस्परम् ।।
इससे देवता मनुष्योंपर प्रसन्न होते हैं। इस प्रकार पृथ्वी और स्वर्गलोक दोनों एक-दूसरेकी उन्नतिमें सदा सहयोगी होते हैं।।
लोकसंधारणं तस्माच्छ्रुतमित्यवधारय।
ज्ञानाद् विशिष्टं जन्तूनां नास्ति लोकत्रयेऽपि च।।
अतः तुम यह अच्छी तरह समझ लो कि वेद ही धर्मकी प्रवृत्तिद्वारा सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाला है। जीवोंके लिये इस त्रिलोकीमें ज्ञानसे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है।।
सम्प्रगृह्य श्रुतं सर्वं कृतकृत्यो भवत्युत।
उपर्युपरि मर्त्यानां देववत् सम्प्रकाशते।।
सम्पूर्ण वेदोंका यथार्थ ज्ञान प्राप्त करके द्विज कृतकृत्य हो जाता है और साधारण मनुष्योंकी अपेक्षा ऊँची स्थितिमें पहुँचकर देवताके समान प्रकाशित होने लगता है।।
कामं क्रोधं भयं दर्पमज्ञानं चैव बुद्धिजम्।
तच्छ्रुतं नुदति क्षिप्रं यथा वायुर्बलाहकान्।।
जैसे हवा बादलोंको उड़ाकर छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार वेदशास्त्रजनित ज्ञान काम, क्रोध, भय, दर्प और बौद्धिक अज्ञानको भी शीघ्र ही दूर कर देता है।।
अल्पमात्रं कृतो धर्मो भवेज्ज्ञानवता महान्।
महानपि कृतो धर्मो ह्यज्ञानान्निष्फलो भवेत्।।
ज्ञानवान् पुरुषके द्वारा किया हुआ थोड़ा-सा धर्म भी महान् बन जाता है और अज्ञानपूर्वक किया हुआ महान् धर्म भी निष्फल हो जाता है।।
उमोवाच
भगवन् मानुषाः केचिज्जातिस्मरणसंयुताः।
किमर्थमभिजायन्ते जानन्तः पौर्वदैहिकम्।।
उमाने पूछा— भगवन्! कुछ मनुष्योंको पूर्वजन्म-की बातोंका स्मरण होता है। वे किसलिये पूर्व शरीरके वृत्तान्तको जानते हुए जन्म लेते हैं?।।
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु तत्त्वं समाहिता।।
ये मृताः सहसा मर्त्या जायन्ते सहसा पुनः।
तेषां पौराणिकोऽभ्यासः कंचिद् कालं हि तिष्ठति।।
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! मैं तुम्हें तत्त्वकी बात बता रहा हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो। जो मनुष्य सहसा मृत्युको प्राप्त होकर फिर कहीं सहसा जन्म ले लेते हैं, उनका पुराना अभ्यास या संस्कार कुछ कालतक बना रहता है।।
तस्माज्जातिस्मरा लोके जायन्ते बोधसंयुताः।
तेषां विवर्धतां संज्ञा स्वप्नवत् सा प्रणश्यति ।।
परलोकस्य चास्तित्वे मूढानां कारणं त्विदम् ।।
इसलिये वे लोकमें पूर्वजन्मकी बातोंके ज्ञानसे युक्त होकर जन्म लेते हैं और जातिस्मर (पूर्वजन्मका स्मरण करनेवाले) कहलाते हैं। फिर ज्यों-ज्यों वे बढ़ने लगते हैं, त्यों-त्यों उनकी स्वप्न-जैसी वह पुरानी स्मृति नष्ट होने लगती है। ऐसी घटनाएँ मूर्ख मनुष्योंको परलोककी सत्तापर विश्वास करानेमें कारण बनती हैं ।।
उमोवाच
भगवन् मानुषाः केचिन्मृता भूत्वापि सम्प्रति ।
निवर्तमाना दृश्यन्ते देहेष्वेव पुनर्नराः ।।
**उमाने पूछा—**भगवन्! कई मनुष्य मरनेके बाद भी फिर उसी शरीरमें लौटते देखे जाते हैं। इसका क्या कारण है? ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि कारणं शृणु शोभने ।।
प्राणैर्वियुज्यमानानां बहुत्वात् प्राणिनां क्षये ।
तथैव नामसामान्याद् यमदूता नृणां प्रति ।।
वहन्ति ते क्वचिन्मोहादन्यं मर्त्यं तु धार्मिकाः ।
निर्विकारं हि तत् सर्वं यमो वेद कृताकृतम् ।।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**शोभने! वह कारण मैं बताता हूँ, सुनो। प्राणी बहुत हैं और मृत्युकाल आनेपर सभीका अपने प्राणोंसे वियोग हो जाता है। धार्मिक यमदूत कभी-कभी कई मनुष्योंके एक ही नाम होनेके कारण मोहवश एकके बदले दूसरेको पकड़ ले जाते हैं, परंतु यमराज निर्विकार भावसे दूतोंके द्वारा किये गये और नहीं किये गये, सभी कार्योंको जानते हैं ।।
तस्मात् संयमनीं प्राप्य यमेनैकेन मोक्षिताः ।
पुनरेवं निवर्तन्ते शेषं भोक्तुं स्वकर्मणः ।।
स्वकर्मण्यसमाप्ते तु निवर्तन्ते हि मानवाः ।।
अतः संयमनीपुरीमें जानेपर भूलसे गये हुए मनुष्यको एकमात्र यमराज फिर छोड़ देते हैं; अतः वे अपने प्रारब्ध कर्मका शेष भाग भोगनेके लिये पुनः लौट आते हैं। वे ही मनुष्य लौटते हैं, जिनका कर्म-भोग समाप्त नहीं हुआ होता है ।।
उमोवाच
भगवन् सुप्तमात्रेण प्राणिनां स्वप्नदर्शनम् ।
किं तत् स्वभावमन्यद् वा तन्मे शंसितुमर्हसि ।।
**उमाने पूछा—**भगवन्! सोनेमात्रसे प्राणियोंको स्वप्नका दर्शन होने लगता है। यह उनका स्वभाव है, या और कोई बात है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें॥
श्रीमहेश्वर उवाच
सुप्तानां तु मनश्चेष्टा स्वप्न इत्यभिधीयते ।
अनागतमतिक्रान्तं पश्यते संचरन्मनः ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**प्रिये! सोये हुए प्राणियोंके मनकी जो चेष्टा है, उसीको स्वप्न कहते हैं। स्वप्नमें विचरता हुआ मन भूत और भविष्यकी घटनाओंको देखता है॥
निमित्तं च भवेत् तस्मात् प्राणिनां स्वप्नदर्शनम् ।
एतत् ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥
अतः उन घटनाओंके देखनेमें प्राणियोंके लिये स्वप्नदर्शन निमित्त बनता है। देवि! तुम्हें स्वप्नका विषय बताया गया, अब और क्या सुनना चाहती हो?॥
उमोवाच
भगवन् सर्वभूतेश लोके कर्मक्रियापथे ।
दैवात् प्रवर्तते सर्वमिति केचिद् व्यवस्थिताः ॥
**उमाने कहा—**भगवन्! सर्वभूतेश्वर! जगत्में दैवकी प्रेरणासे ही सबकी कर्ममार्गमें प्रवृत्ति होती है। ऐसी कुछ लोगोंकी मान्यता है॥
अपरे चेष्टया चेति दृष्ट्वा प्रत्यक्षतः क्रियाम् ।
पक्षभेदे द्विधा चास्मिन् संशयस्थं मनो मम ॥
तत्त्वं वद महादेव श्रोतुं कौतूहलं हि मे ॥
दूसरे लोग क्रियाको प्रत्यक्ष देखकर ऐसा मानते हैं कि चेष्टासे ही सबकी प्रवृत्ति होती है, दैवसे नहीं। ये दो पक्ष हैं। इनमें मेरा मन संशयमें पड़ जाता है; अतः महादेव! यथार्थ बात बताइये। इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल हो रहा है॥
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु तत्त्वं समाहिता ।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! मैं तुम्हें तत्त्वकी बात बता रहा हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो॥
लक्ष्यते द्विविधं कर्म मानुषेष्वेव तच्छृणु ।
पुराकृतं तयोरेकमैहिकं त्वितरत् तथा ॥
मनुष्योंमें दो प्रकारका कर्म देखा जाता है, उसे सुनो। इनमें एक तो पूर्वकृत कर्म है और दूसरा इहलोकमें किया गया है॥
लौकिकं तु प्रवक्ष्यामि दैवमानुषनिर्मितम् ।
कृषौ तु दृश्यते कर्म कर्षणं वपनं तथा ॥
रोपणं चैव लवनं यच्चान्यत् पौरुषं स्मृतम् । दैवादसिद्धिंश्च भवेद् दुष्कृतं चास्ति पौरुषे ।। अब मैं देव और मनुष्य दोनोंसे सम्पादित होनेवाले लौकिक कर्मका वर्णन करता हूँ। कृषिमें जो जुताई, बोवाई, रोपनी, कटनी तथा ऐसे ही और भी जो कार्य देखे जाते हैं, वे सब मानुष कहे गये हैं। दैवसे उस कर्ममें सफलता और असफलता होती है। मानुष कर्ममें बुराई भी सम्भव है ।।
सुयत्नाल्लभ्यते कीर्तिर्दुर्यत्नादयशस्तथा । एवं लोकगतिर्देवि आदिप्रभृति वर्तते ।। उत्तम प्रयत्न करनेसे कीर्ति प्राप्त होती है और बुरे उपायोंके अवलम्बनसे अपयश। देवि! आदिकालसे ही जगत्की ऐसी ही अवस्था है ।।
रोपणं चैव लवनं यच्चान्यत् पौरुषं स्मृतम् ।। काले वृष्टिः सुवापं च प्ररोहः पंक्तिरेव च । एवमादि तु यच्चान्यत् तद् दैवतमिति स्मृतम् ।। बीजका रोपना और काटना आदि मनुष्यका काम है; परंतु समयपर वर्षा होना, बोवाईका सुन्दर परिणाम निकलना, बीजमें अंकुर उत्पन्न होना और शस्यका श्रेणीबद्ध होकर प्रकट होना इत्यादि कार्य देवसम्बन्धी बताये गये हैं। दैवकी अनुकूलतासे ही इन कार्योंका सम्पादन होता है ।।
पञ्चभूतस्थितिश्चैव ज्योतिशामयनं तथा । अबुद्धिगम्यं यन्मर्त्यैर्हेतुभिर्वा न विद्यते ।। तादृशं कारणं दैवं शुभं वा यदि वेतरत् । यादृशं चात्मना शक्यं तत् पौरुषमिति स्मृतम् ।। पंचभूतोंकी स्थिति, ग्रहनक्षत्रोंका चलना-फिरना तथा जहाँ मनुष्योंकी बुद्धि न पहुँच सके अथवा किन्हीं कारणों या युक्तियोंसे भी समझमें न आ सके—ऐसा कर्म शुभ हो या अशुभ दैव माना जाता है और जिस बातको मनुष्य स्वयं कर सके, उसे पौरुष कहा गया है ।।
केवलं फलनिष्पत्तिरेकेन तु न शक्यते । पौरुषेणैव दैवेन युगपद् ग्रथितं प्रिये ।। केवल दैव या पुरुषार्थसे फलकी सिद्धि नहीं होती। प्रिये! प्रत्येक वस्तु या कार्य एक ही साथ पुरुषार्थ और दैव दोनोंसे ही गुँथा हुआ है ।।
तयोः समाहितं कर्म शीतोष्णं युगपत् तथा । पौरुषं तु तयोः पूर्वमारब्धव्यं विजानता ।। आत्मना तु न शक्यं हि तथा कीर्तिमवाप्नुयात् ।।
दैव और पुरुषार्थ दोनोंके समानकालिक सहयोगसे कर्म सम्पन्न होता है। जैसे एक ही कालमें सर्दी और गर्मी दोनों होती हैं, उसी प्रकार एक ही समय दैव और पुरुषार्थ दोनों काम करते हैं। इन दोनोंमें जो पुरुषार्थ है, उसका आरम्भ विज्ञ पुरुषको पहले करना चाहिये। जो अपने-आप होना सम्भव नहीं है, उसको आरम्भ करनेसे मनुष्य कीर्तिका भागी होता है ।।
खननान्मथनाल्लोके जलाग्निप्रापणं तथा ।
तथा पुरुषकारे तु दैवसम्पत् समाहिता ।।
जैसे लोकमें भूमि खोदनेसे जल तथा काष्ठका मन्थन करनेसे अग्निकी प्राप्ति होती है, उसी प्रकार पुरुषार्थ करनेपर दैवका सहयोग स्वतः प्राप्त हो जाता है ।।
नरस्याकुर्वतः कर्म दैवसम्पन्न लभ्यते ।
तस्मात् सर्वसमारम्भो दैवमानुषनिर्मितः ।।
जो मनुष्य कर्म नहीं करता, उसको दैवी सहायता नहीं प्राप्त होती; अतः समस्त कार्योंका आरम्भ दैव और पुरुषार्थ दोनोंपर निर्भर है ।।
उमोवाच
भगवन् सर्वलोकेश लोकनाथ वृषध्वज ।
नास्त्यात्मा कर्मभोक्तेति मृतो जन्तुर्न जायते ।।
**उमाने पूछा—**भगवन्! सर्वलोकेश्वर! लोकनाथ! वृषध्वज! कर्मोंका फल भतोनेवाले जीवात्मा नामक किसी द्रव्यकी सत्ता नहीं है; इसलिये मरा हुआ जीव फिर जन्म नहीं लेता है ।।
स्वभावाज्जायते सर्वं यथा वृक्षफलं तथा ।
यथोर्मयः सम्भवन्ति तथैव जगदाकृतिः ।।
जैसे वृक्षसे फल पैदा होता है, उसी प्रकार स्वभावसे ही सब कुछ उत्पन्न होता है और जैसे समुद्रसे लहरें प्रकट होती हैं, उसी प्रकार स्वभावसे ही जगत्की आकृति प्रकट होती है ।।
तपोदानानि यत् कर्म तत्र तद् दृश्यते वृथा ।
नास्ति पौनर्भवं जन्म इति केचिद् व्यवस्थिताः ।।
तप और दान आदि जो कर्म हैं, वे सब व्यर्थ दिखायी देते हैं, किंतु जीवात्माका पुनर्जन्म नहीं होता है। ऐसी कुछ लोगोंकी मान्यता है ।।
परोक्षवचनं श्रुत्वा न प्रत्यक्षस्य दर्शनात् ।
तत् सर्वं नास्ति नास्तीति संशयस्थास्तथा परे ।।
पक्षभेदान्तरे चास्मिंस्तत्त्वं मे वक्तुमर्हसि ।
उक्तं भगवता यत् तु तत् तु लोकस्य संस्थितिः ।।
शास्त्रोंके परोक्षवादी वचन सुनकर और प्रत्यक्ष दर्शन न होनेसे कितने ही लोग इस संशयमें पड़े रहते हैं कि वह सब (परलोक) नहीं है, नहीं है। इस पक्षभेदके भीतर यथार्थवाद क्या है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें। भगवन्! आपने जो कुछ बताया है, वही लोककी स्थिति है॥
नारद उवाच
प्रश्नमेतत् तु पृच्छन्त्या रुद्राण्या परिषत् तदा।
कौतूहलयुता श्रोतुं समाहितमनाभवत्॥
**नारदजी कहते हैं—**रुद्राणीके यह प्रश्न उपस्थित करनेपर सारी मुनिमण्डली एकाग्रचित्त होकर इसका उत्तर सुननेके लिये उत्कण्ठित हो गयी॥
श्रीमहेश्वर उवाच
नैतदस्ति महाभागे यद् वदन्तीह नास्तिकाः।
एतदेवाभिशस्तानां श्रुतविद्वेषिणां मतम्॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**महाभागे! इस विषयमें नास्तिक लोग जो कुछ कहते हैं, वह ठीक नहीं है। यह तो कलंकित शास्त्रद्रोही पुरुषोंका मत है॥
सर्वमर्थं श्रुतं दृष्टं यत् प्रागुक्तं मया तव।
तदाप्रभृति मर्त्यानां श्रुतमाश्रित्य पण्डिताः॥
कामान् संछिद्य परिघान् धृत्या वै परमासनाः।
अभियान्त्येव ते स्वर्गं पश्यन्तः कर्मणः फलम्॥
मैंने पहले तुमसे जो कुछ कहा है, वह सारा विषय शास्त्रसम्मत तथा अनुभूत है। तभीसे मनुष्योंमें जो विद्वान् पुरुष हैं, वे वेद-शास्त्रका आश्रय ले परिघ-जैसी कामनाओंका उच्छेद करके धैर्यपूर्वक उत्तम आसन लगाये ध्यानमग्न रहते हैं, वे कर्मोंका फल प्रत्यक्ष देखते हुए स्वर्ग (ब्रह्म) लोकको ही जाते हैं॥
एवं श्रद्धाभवं लोके परतः सुमहत् फलम्।
बुद्धिः श्रद्धा च विनयः करणानि हितैषिणाम्॥
इस प्रकार परलोकमें श्रद्धाजनित महान् फलकी प्राप्ति होती है। जो अपना हित चाहते हैं, उन पुरुषोंके लिये बुद्धि, श्रद्धा और विनय—ये कारण (उन्नतिके साधन) हैं॥
तस्मात् स्वर्गाभिगन्तारः कतिचित् त्वभवन् नराः।
अन्ये करणहीनत्वान्नास्तिक्यं भावमाश्रिताः॥
अतः कुछ ही लोग उक्त साधनसे सम्पन्न होनेके कारण स्वर्ग आदि पुण्यलोकोंमें जाते हैं। दूसरे लोग उन साधनोंसे हीन होनेके कारण नास्तिकभावका अवलम्बन लेते हैं॥
श्रुतविद्वेषिणो मूर्खा नास्तिकादृढनिश्चयाः।
निष्क्रियास्तु निरन्नादाः पतन्त्येवाधमां गतिम्॥
वेदविद्वेषी मूर्ख, नास्तिक, अदृढनिश्चयवाले, क्रियाहीन तथा अन्नार्थियोंको बिना कुछ दिये ही घरसे निकाल देनेवाले पापी मनुष्य अधम गतिको प्राप्त होते हैं ।।
नास्त्यस्तीति पुनर्जन्म कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
नाधिगच्छन्ति तन्नित्यं हेतुवादशतैरपि ॥
पुनर्जन्म नहीं होता है या होता है, इस विषयमें बड़े-बड़े विद्वान् मोहित हो जाते हैं। वे सैकड़ों युक्तिवादोंद्वारा भी उसे सर्वथा नहीं समझ पाते हैं ।।
एषा ब्रह्मकृता माया दुर्विज्ञेया सुरासुरैः ।
किं पुनर्मानवैर्लोके ज्ञातुकामैः कुबुद्धिभिः ॥
यह ब्रह्माजीके द्वारा रची माया है, जिसे देवता और असुर भी बड़ी कठिनाईसे समझ पाते हैं; फिर दूषित बुद्धिवाले मानव यदि लोकमें इस विषयको जानना चाहें तो कैसे जान सकते हैं ।।
केवलं श्रद्धया देवि श्रुतिमात्रनिविष्टया ।
ततोऽस्तीत्येव मन्तव्यं तथा हितमवाप्नुयात् ॥
देवि! केवल वेदमें पूर्णतः श्रद्धा करके 'परलोक एवं पुनर्जन्म होता है' ऐसा मानना चाहिये। इससे आस्तिक मनुष्यका हित होता है ।।
दैवगुह्येषु चान्येषु हेतुर्देवि निरर्थकः ।
बधिरान्धवदेवात्र वर्तितव्यं हितैषिणा ॥
एतत् ते कथितं देवि ऋषिगुह्यं प्रजाहितम् ॥
देवि! देवसम्बन्धी जो दूसरे-दूसरे गुह्य विषय हैं, उनमें युक्तिवाद काम नहीं देता। जो अपना हित चाहनेवाले हैं, उन्हें इस विषयमें अन्धे और बहरेके समान बर्ताव करना चाहिये। अर्थात् नास्तिकोंकी ओर न तो देखे और न उनकी बातें ही सुने। देवि! यह ऋषियोंके लिये गोपनीय तथा प्रजाके लिये हितकर विषय तुम्हें बताया गया है ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[यमलोक तथा वहाँके मार्गोंका वर्णन, पापियोंकी नरकयातनाओं तथा कर्मानुसार विभिन्न योनियोंमें उनके जन्मका उल्लेख]
[यमलोक तथा वहाँके मार्गोंका वर्णन, पापियोंकी नरकयातनाओं तथा कर्मानुसार विभिन्न योनियोंमें उनके जन्मका उल्लेख]
उमोवाच
भगवन् सर्वलोकेश त्रिपुरार्दन शंकर ।
कीदृशा यमदण्डास्ते कीदृशाः परिचारकाः ॥
उमाने पूछा— भगवन्! सर्वलोकेश्वर! त्रिपुरनाशन! शंकर! यमदण्ड कैसे होते हैं? तथा यमराजके सेवक किस तरहके होते हैं? ।।
कथं मृतास्ते गच्छन्ति प्राणिनो यमसादनम् ।
कीदृशं भवनं तस्य कथं दण्डयति प्रजाः ॥
एतत् सर्वं महादेव श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥
मृत प्राणी यमलोकको कैसे जाते हैं? यमराजका भवन कैसा है? तथा वे प्रजावर्गको किस तरह दण्ड देते हैं? प्रभो! महादेव! मैं यह सब सुनना चाहती हूँ ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
शृणु कल्याणि तत् सर्वं यत् ते देवि मनःप्रियम् ।
दक्षिणस्यां दिशि शुभे यमस्य सदनं महत् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— कल्याणि! देवि! तुम्हारे मनमें जो-जो पूछने योग्य बातें हैं, उन सबका उत्तर सुनो। शुभे! दक्षिणदिशामें यमराजका विशाल भवन है ।।
विचित्रं रमणीयं च नानाभावसमन्वितम् ।
पितृभिः प्रेतसंघैश्च यमदूतैश्च संततम् ॥
वह बहुत ही विचित्र, रमणीय एवं नाना प्रकारके भावोंसे युक्त है। पितरों, प्रेतों और यमदूतोंसे व्याप्त है ।।
प्राणिसंघैश्च बहुभिः कर्मवश्यैश्च पूरितम् ।
तत्रास्ते दण्डयन् नित्यं यमो लोकहिते रतः ॥
कर्मोंके अधीन हुए बहुत-से प्राणियोंके समुदाय उस यमलोकको भरे हुए हैं। वहाँ लोकहितमें तत्पर रहनेवाले यम पापियोंको सदा दण्ड देते हुए निवास करते हैं ।।
मायया सततं वेत्ति प्राणिनां यच्छुभाशुभम् ।
मायया संहरंस्तत्र प्राणिसङ्घान् यतस्ततः ॥
वे अपनी मायाशक्तिसे ही सदा प्राणियोंके शुभाशुभ कर्मको जानते हैं और मायाद्वारा ही जहाँ-तहाँसे प्राणि-समुदायका संहार कर लाते हैं ।।
तस्य मायामयाः पाशा न वेद्यन्ते सुरासुरैः ।
को हि मानुषमात्रस्तु देवस्य चरितं महत् ॥
उनके मायामय पाश हैं, जिन्हें न देवता जानते हैं, न असुर। फिर मनुष्योंमें कौन ऐसा
है, जो उन यमदेवके महान् चरित्रको जान सके ।।
एवं संवसतस्तस्य यमस्य परिचारकाः ।
गृहीत्वा संनयन्त्येव प्राणिनः क्षीणकर्मणः ॥
इस प्रकार यमलोकमें निवास करते हुए यमराजके दूत जिनके प्रारब्धकर्म क्षीण हो गये
हैं, उन प्राणियोंको पकड़कर उनके पास ले जाते हैं ।।
येन केनापदेशेन त्वपदेशस्तदुद्भवः ।
कर्मणा प्राणिनो लोके उत्तमाधममध्यमाः ॥
यथार्हं तान् समादाय नयन्ति यमसादनम् ।
जिस किसी निमित्तसे वे प्राणियोंको ले जाते हैं, वह निमित्त वे स्वयं बना लेते हैं।
जगत्में कर्मानुसार उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकारके प्राणी होते हैं। यथायोग्य उन
सभी प्राणियोंको लेकर वे यमलोकमें पहुँचाते हैं ।।
धार्मिकानुत्तमान् विद्धि स्वर्गिणस्ते यथामराः ॥
नृषु जन्म लभन्ते ये कर्मणा मध्यमाः स्मृताः ।
धार्मिक पुरुषोंको उत्तम समझो। वे देवताओंके समान स्वर्गके अधिकारी होते हैं। जो
अपने कर्मके अनुसार मनुष्योंमें जन्म लेते हैं, वे मध्यम माने गये हैं ।।
तिर्यङ्नरकगन्तारो ह्यधमास्ते नराधमाः ॥
पन्थानस्त्रिविधा दृष्टाः सर्वेषां गतजीविनाम् ।
रमणीयं निराबाधं दुर्दर्शमिति नामतः ॥
जो नराधम पशु-पक्षियोंकी योनि तथा नरकमें जानेवाले हैं, वे अधमकोटिके अन्तर्गत
हैं। सभी मरे हुए प्राणियोंके लिये तीन प्रकारके मार्ग देखे गये हैं—एक रमणीय, दूसरा
निराबाध और तीसरा दुर्दर्श ।।
रमणीयं तु यन्मार्ग पताकाध्वजसंकुलम् ।
धूपितं सिक्तसम्मूष्टं पुष्पमालाभिसंकुलम् ॥
मनोहरं सुखस्पर्शं गच्छतामेव तद् भवेत् ।
निराबाधं यथालोकं सुप्रशस्तं कृतं भवेत् ।।
जो रमणीय मार्ग है, वह ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित और फूलोंकी मालाओंसे
अलंकृत है। उसे झाड़-बुहारकर उसके ऊपर जलका छिड़काव किया गया होता है। वहाँ
धूपकी सुगन्ध छायी रहती है। उसका स्पर्श चलनेवालोंके लिये सुखद और मनोहर होता है।
निराबाध वह मार्ग है, जो लौकिक मार्गोंके समान सुन्दर एवं प्रशस्त बनाया गया है। वहाँ
किसी प्रकारकी बाधा नहीं होती ।।
तृतीयं यत् तु दुर्दर्श दुर्गन्धितमसावृतम् ।
परुषं शर्कराकीर्णं श्वदंष्ट्राबहुलं भृशम् ॥
कृमिकीटसमाकीर्णं भजतामतिदुर्गमम् । जो तीसरा मार्ग है, वह देखनेमें भी दुःखद होनेके कारण दुर्दर्श कहलाता है। वह दुर्गन्धयुक्त एवं अन्धकार-से आच्छन्न है। कंकड़-पत्थरोंसे व्याप्त और कठोर जान पड़ता है। वहाँ कुत्ते और दाढ़ोंवाले हिंसक जन्तु अधिक रहते हैं। कृमि और कीट सब ओर छाये रहते हैं। उस मार्गसे चलनेवालोंको वह अत्यन्त दुर्गम प्रतीत होता है ।।
मागैंरैवं त्रिभिर्नित्यमुत्तमाधममध्यमान् ।। संनयन्ति यथा काले तन्मे शृणु शुचिस्मिते । शुचिस्मिते! इस प्रकार तीन मार्गोंद्वारा वे सदा यथासमय उत्तम, मध्यम और अधम पुरुषोंको जिस प्रकार ले जाते हैं, वह मुझसे सुनो ।।
उत्तमानन्तकाले तु यमदूताः सुसंवृताः । नयन्ति सुखमादाय रमणीयपथेन वै ।। उत्तम पुरुषोंको अन्तके समय ले जानेके लिये जो यमदूत आते हैं, वे सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे विभूषित होते हैं और उन पुरुषोंको साथ ले रमणीय मार्गद्वारा सुखपूर्वक ले जाते हैं ।।
मध्यमान् योधवेषेण मध्यमेन पथा तथा ।। चण्डालवेषास्त्वधमान् गृहीत्वा भर्त्संतर्जनैः । आकर्षन्तस्तथा पाशैर्दुर्दर्शेन नयन्ति तान् ।। त्रिविधानेवमादाय नयन्ति यमसादनम् ।। मध्यमकोटिके प्राणियोंको मध्यम मार्गके द्वारा योद्धाका वेष धारण किये हुए यमदूत अपने साथ ले जाते हैं तथा चाण्डालका वेष धारण करके अधमकोटिके प्राणियोंको पकड़कर उन्हें डाँटते-फटकारते तथा पाशोंद्वारा बाँधकर घसीटते हुए दुर्दर्श नामक मार्गसे ले जाते हैं। इस प्रकार त्रिविध प्राणियोंको लेकर वे उन्हें यमलोकमें पहुँचाते हैं ।।
धर्मासनगतं दक्षं भ्राजमानं स्वतेजसा । लोकपालं सभाध्यक्षं तथैव परिषदगतम् ।। दर्शयन्ति महाभागे यामिकास्तं निवेद्य ते । महाभागे! वहाँ धर्मके आसनपर अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए अपनी सभाके सभापतिके रूपमें चतुर लोकपाल यम बैठे होते हैं। यमदूत उन्हें सूचना देकर अपने साथ लाये हुए प्राणीको दिखाते हैं ।।
पूजयन् दण्डयन् कांश्चित् तेषां शृण्वन् शुभाशुभम् । व्यावृतो बहुसाहस्रैस्तत्रास्ते सततं यमः ।। यमराज कई सहस्र सदस्योंसे घिरे हुए अपनी सभामें विराजमान होते हैं। वे वहाँ आये हुए प्राणियोंके शुभाशुभ कर्मोंका ब्यौरेवार वर्णन सुनकर उनमेंसे किन्हींका आदर करते हैं और किन्हींको दण्ड देते हैं ।।