भारतकोश
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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

दूरादावसथान्मूत्रं दूरात् पादावसेचनम् ।

१४० मनुस्मृति । पौर्विकीं संस्मरन् जातिं ब्रह्मैवाभ्यसते पुनः । ब्रह्माभ्यासेन चाजस्रमनन्तंसुखमश्नुते ॥ १४६ ॥ सावित्रान् शान्तिहोमांश्च कुर्यात् पर्वसु नित्यशः । पितॄंश्चाष्टकास्वर्चयेन्नित्यमन्वष्टकासु च ॥ १५० ॥ दूरादावसथान्मूत्रं दूरात् पादावसेचनम् । उच्छिष्टान्ननिषेकं च दूरादेव समाचरेत् ॥ १५१ ॥ मन्त्रप्रसाधनं स्नानं दन्तधावनमञ्जनम् । पूर्वाह्न एव कुर्वीत देवतानाञ्च पूजनम् ॥ १५२ ॥ दैवतान्यभिगच्छेत्तु धार्मिकांश्च द्विजोत्तमान् । ईश्वरं चैव रक्षार्थं गुरूनेव च पर्वसु ॥ १५३ ॥ पूर्व जन्म की जाति को स्मरण करता हुआ वेदका स्वाध्याय किया करता है और वेदाभ्यास से अक्षय सुख पाता है । द्विज को पर्व दिनों में और नित्यभी शान्ति होम आदि करना चाहिए । अष्टका और अन्वष्टका* में श्राद्ध द्वारा पितरों का पूजन करना चाहिए । हवन स्थान से दूर पर मल मूत्र का त्याग, पैर धोना, जूठा अन्न और वीर्य का त्याग, करना चाहिए । शौच, दातन, स्नान, अंजन, लेपन और देवता का पूजन यह सब प्रातः काल में ही करना चाहिए । पर्व दिनों में देवमूर्ति, श्रेष्ठ ब्राह्मण, राजा, पिता और गुरुजनों का दर्शन अवश्य करना चाहिए ॥ १४६-१५३ ॥ अभिवादयेद् वृद्धांश्च दद्याच्चैवासनं स्वकम् । कृताञ्जलिरुपासीत गच्छतः पृष्ठतोऽन्वियात् ॥१५४॥ श्रुतिस्मृत्युदितं सम्यङ् निबद्धं स्वेषु कर्मसु । धर्ममूलं निषेवेत सदाचारमतन्द्रितः ॥ १५५ ॥

  • हेमन्त और शिशिर ऋतु में, कृष्णपक्ष की सप्तमी और नवमी तिथि को 'अन्वष्टका' कहते हैं ।

चौथा अध्याय । १४१

चौथा अध्याय । १४१ गुरु आदि वृद्ध-मान्य पुरुष घर आवें तो उनको प्रणाम करना। बैठने को आसन देना, हाथ जोड़कर पास बैठना और जाने लगें तो कुछ दूर पहुंचाने को जाना चाहिए। गृहस्थ को आलस्य छोड़ कर, श्रुति और स्मृति में कहे हुए कर्म वेद पाठ, व्रत आदि और नित्य कर्म और धर्म का मूलभूत सदाचार को सदा करना चाहिए ॥ १५४-१५५ ॥ आचाराल्लभते ह्यायुराचारादीप्सिताः प्रजाः । आचाराद्धनमक्षय्यमाचारो हन्त्यलक्षणम् ॥ १५६ ॥ दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः । दुःखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च ॥ १५७ ॥ सर्वलक्षणहीनोऽपि यः सदाचारवान्नरः । श्रद्दधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति ॥ १५८ ॥ सदाचार के पालन से दीर्घ आयु, मनचाही सन्तान और अ- क्षय धन मिलता है । और आचार से ही कुलक्षणों का विनाश होता है। दुराचारी पुरुष की निन्दा संसार में होती है। वह सदा दुःख पाता है, रोगी रहता है और कम उमर पाता है। जो पुरुष दूसरे शुभ लक्षणों से रहित भी हो, पर सदाचार में लगा रहता हो, शास्त्र में भक्ति रखता हो, ईर्षारहित हो तो उसकी उमर सौ वर्ष की होती है ॥ १५६-१५८ ॥ यद्यत्परवशं कर्म तत्तद्यत्नेन वर्जयेत् । यद्यदात्मवशं तु स्यात्तत्तत्सेवेत यत्नतः ॥ १५६ ॥ सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् । एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः ॥ १६० ॥ यत्कर्म कुर्वतोऽस्य स्यात्परितोषोऽन्तरात्मनः । तत्प्रयत्नेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत् ॥ १६१ ॥

१४२ मनुस्मृति ।

आचार्यं च प्रवक्तारं पितरं मातरं गुरुम् । न हन्याद्ब्राह्मणान्गाश्च सर्वांश्चैव तपस्विनः ॥ १६२ ॥ नास्तिक्यं वेदनिन्दां च देवतानां च कुत्सनम् । द्वेषं दम्भं च मानं च क्रोधं तैक्ष्ण्यं च वर्जयेत् ॥ १६३ ॥

संसार में जो जो काम दूसरे के अधीन हों उनको यत्न से छोड़ देना चाहिए। और जो जो काम अपने से होनेवाले हों उनको यत्न से करना चाहिए। जो पराधीन विषय हैं उन सबों में दुःख और जो स्वाधीन हैं उनमें सुख होता है। यही सुख दुःख का संक्षेप में लक्षण है। जिस कर्म के करने से पुरुष की आत्मा सुख संतोष पावे उसी कर्म को यत्न से करना चाहिए और जिसको करने से मन को दुःख पहुँचे वह काम छोड़ देना चाहिए। यज्ञो- पवीत देनेवाला आचार्य, वेद व्याख्या करनेवाला, पिता, माता, गुरु, गौ और सब भांति के तपस्वियों के चित्त दुखानेवाला कोई काम न करना चाहिए। स्वर्ग, ईश्वर आदि को न माननेवाली ना- स्तिक बुद्धि, वेद निंदा, देवताओं की निंदा, द्वेष, दंभ, अभिमान, क्रोध और क्रूरता को छोड़ देना चाहिए ॥ १५६-१६३ ॥

परस्य दण्डं नोद्यच्छेत्क्रुद्धो नैव निपातयेत् । अन्यत्र पुत्राच्छिष्याद्वा शिष्ट्यर्थं ताडयेत्तु तौ ॥ १६४॥ ब्राह्मणायोवगुर्येव द्विजातिर्वधकाम्यया । शतं वर्षाणि तामिस्रे नरके परिवर्तते ॥ १६५ ॥ ताडयित्वा तृणेनापि संरम्भान्मतिपूर्वकम् । एकविंशत्तमाञ्जातीः पापयोनिषु जायते ॥ १६६ ॥ अयुध्यमानस्योत्पाद्य ब्राह्मणस्यासृगङ्गतः । दुःखं सुमहदाप्नोति प्रेत्याप्राज्ञतया नरः ॥ १६७ ॥

चौथा अध्याय । १४३

चौथा अध्याय । १४३ शोणितं यावतः पांसून्संगृह्णाति महीतलात् । तावतोऽब्दानमुत्रान्यै शोणितोत्पादकोर्द्यते ॥ १६८ ॥ क्रोध में आकर किसीको मारने को लकड़ी न उठाना । पुत्र और शिष्य के सिवा दूसरे को लकड़ी से न मारना । परन्तु शिक्षा के लिए पुत्र और शिष्य दोनों को मारना उचित है । गृहस्थ यदि ब्राह्मण को मारने की इच्छा से लकड़ी उठावे तो सौ वर्ष तामिस्र नरक में लुढ़कता है । यदि ब्राह्मण को क्रोधवश तिनके से भी जानकर मारे तो इक्कीस जन्म तक पाप योनि में जन्म लेना पड़ता है । जो पुरुष, ब्राह्मण लड़ता न हो तो भी उसके शरीर से रुधिर निकालता है वह अपनी भूल से मरने के बाद बड़ा दुःख पाता है । ब्राह्मण के शरीर का रुधिर, भूमि में जितने रजकणों को सान लेता है उतने वर्ष तक उस मनुष्य को परलोक में रुधिर निकालने वाले जीव काट काट कर दुःख देते हैं ॥ १६४-१६८ ॥ न कदाचिद् द्विजे तस्माद्विद्वानवगुरेदपि । न ताडयेत्तृणेनापि न गात्रात्स्रावयेदसृक् ॥ १६६ ॥ अधार्मिको नरो योहि यस्य चाप्यनृतं धनम् । हिंसारतस्य यो नित्यं नेहासौ सुखमेधते ॥ १७० ॥ इस लिए बुद्धिमान पुरुष को कभी ब्राह्मण के सामने लकड़ी न उठाना चाहिए । उसको तिनके से भी न मारना । उसके शरीर में रुधिर न निकालना चाहिए । अधर्मी-पापी पुरुष, झूठी गवाही देकर धन लेनेवाला, और नित्य हिंसा में लगा हुआ इस लोक में सुख नहीं पाते वे सदा दुःखी रहते हैं ॥ १६६-१७० ॥ न सीदन्नपि धर्मेण मनोऽधर्मे निवेशयेत् । अधार्मिकाणां पापाना माशु पश्यन् विपर्ययम् ॥१७१॥ नाधर्मश्चरितो लोके सद्यः फलति गौरिव ।

१४४ मनुस्मृति । शनैरावर्तमानस्तु कर्तुर्मूलानि कृन्तति ॥ १७२ ॥ यदि नात्मनि पुत्रेषु न चेत् पुत्रेषु नप्तृषु । न त्वेवतु कृतोऽधर्मः कर्तुर्भवति निष्फलः ॥ १७३ ॥ अधर्मेणैधते तावत्ततो भद्राणि पश्यति । ततः सपत्नान् जयति समूलस्तु विनश्यति ॥ १७४ ॥ अधर्मी-पापी पुरुष की दशा बदलती अर्थात् उन्नति आदि होते देखकर पुरुष को धर्माचरण करने में दुःखभी होता हो तोभी उस को न छोड़ना चाहिए। धर्म में ही मन लगा रखना चाहिए। जैसे भूमि में बीज बोने पर वह तत्काल फल नहीं दे सकता वैसेही अ- धर्म का फल भी तुरंत नहीं मिलता। किन्तु धीरे धीरे वह करनेवाले का जड़ से नाश करदेता है। अधर्म का फल करनेवाले को न हुआ तो उसके पुत्र को होगा, पुत्र को नहीं तो पौत्र को अवश्य होगा। किन्तु बिना फल भोग किए छुटकारा नहीं होता। अधर्मी पहले धन आदि से बढ़ता है। सुख भोगता है, अपने शत्रुओं को जीत लेता है, लेकिन अन्त में जड़ मूल से नष्ट होजाता है ॥१७१-१७४॥ सत्यधर्मार्यवृत्तेषु शौचे चैवारमेत्सदा । शिष्यांश्च शिष्याद्धर्मेण वाग्बाहूदरसंयतः ॥ १७५ ॥ परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ । धर्मं चाप्यसुखोदर्कं लोकविक्रुष्टमेव च ॥ १७६ ॥ न पाणिपादचपलो न नेत्रचपलोऽनृजुः । न स्याद्वाकचपलश्चैव न परद्रोहकर्मधीः ॥ १७७ ॥ सत्य, धर्म और सदाचार में सदा लगा रहना चाहिए। जबान, हाथ और पेट को नियम में रखकर, पुत्र स्त्री आदि को शिक्षा देनी चाहिए। जो धर्म से रहित हो ऐसे अर्थ-काम को छोड़देना,

[Header] चौथा अध्याय । १४५

[Header] चौथा अध्याय । १४५ परिणाम में दुःख देनेवाला धर्म भी न करना। और जिस धर्म के आचरण से लोक में निन्दा हो वह धर्म भी न करना। पुरुष को हाथ, पैर और आंखों की चञ्चलता न करनी चाहिए । झूठी, सच्ची लोकनिन्दा आदि से वाणी की चंचलता न रखनी चाहिए और दूसरे का अनभल कभी न सोचना चाहिये ॥ १७५-१७७ ॥ येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः । तेन यायात्सतां मार्गं तेन गच्छन्न रिष्यते ॥ १७८ ॥ ऋत्विक्पुरोहिताचार्यैर्मातुलातिथिसंश्रितैः । बालवृद्धातुरैर्वैद्यैर्ज्ञातिसम्बन्धिबान्धवैः ॥ १७६ ॥ मातापितृभ्यां यामीभिर्भ्रात्रा पुत्रेण भार्यया । दुहित्रा दासवर्गेण विवादं न समाचरेत् ॥ १८० ॥ एतैर्विवादान् संत्यज्य सर्वपापैः प्रमुच्यते । एभिर्जितैश्च जयति सर्वांल्लोकानिमान् गृही ॥ १८१ ॥ जिस उत्तम मार्ग से अपने बाप, दादा चलते आये हों उस मार्ग से चलना चाहिए । इस प्रकार के आचरण से पुरुष अधर्म से नष्ट नहीं होता । ऋत्विक्, पुरोहित, आचार्य, मामा, अतिथि, आश्रित, बालक, बूढ़ा, रोगी, वैद्य, जाति के पुरुष, नातेदार, कुटुम्बी, माता, पिता, दौरानी, जेठानी, ननँद, भावज आदि भाई, पुत्र, स्त्री बेटी और नौकरों के साथ झगड़ा न करना चाहिए। गृहस्थ इनके साथ झगड़ा बखेड़ा न करे तो सब पापों से छूट जाता है और इनको वश में करके सब लोकों में जय पाता है ॥ १७८-१८१ ॥ आचार्यों ब्रह्मलोकेशः प्राजापत्ये पिता प्रभुः । अतिथित्विन्द्रलोकेशो देवलोकस्य चर्त्विजः॥१८२॥ यामयोऽप्सरसांलोके वैश्वदेवस्य बान्धवाः । सम्बन्धिनो ह्यपांलोके पृथिव्यां मातृमातुलौ ॥१८३॥ [Footer] १६

१४६ मनुस्मृति । आकाशेशास्तु विज्ञेया बालवृद्धकृशातुराः । भ्राता ज्येष्ठःसमः पित्रा भार्या पुत्रःस्वका तनुः॥१८४॥ आचार्य ब्रह्मलोक का स्वामी है । पिता प्रजापति, अतिथि इन्द्र- लोक, ऋत्विक् देवलोक का प्रभु है । पुत्रवधू आदि अप्सरालोक की अधीश्वरी हैं । कुटुम्बी वैश्वदेवलोक, नातेदार वरुणलोक और पिता माता भूलोक के ईश्वर हैं । बालक, वृद्ध, दुर्बल और रोगी आकाश के ईश्वर हैं । बड़ा भाई पिता के समान है । स्त्री और पुत्र अपना शरीर जानना चाहिए ॥ १८२-१८४ ॥ छाया स्वो दासवर्गश्च दुहिता कृपणं परम् । तस्मादेतैरविक्षिप्तः सहेतासंज्वरः सदा ॥ १८५ ॥ अपनी छाया दासजन हैं और पुत्री कृपापात्र है । इस कारण इन सब लोगों से अपना अपमान होने पर भी उसको सहन कर लेना किन्तु झगड़ा न करना चाहिए ॥ १८५ ॥ प्रतिग्रहसमर्थोऽपि प्रसङ्गं तत्र वर्जयेत् । प्रतिग्रहेण ह्यस्याशु ब्राह्मं तेजः प्रशाम्यति ॥ १८६ ॥ न द्रव्याणामविज्ञाय विधिं धर्म्यं प्रतिग्रहे । प्राज्ञः प्रतिग्रहं कुर्यादवसीदन्नपि क्षुधा ॥ १८७ ॥ हिरण्यं भूमिरश्वं गामन्नं वासस्तिलान् घृतम् । प्रतिगृह्णन्नविद्वांस्तु भस्मीभवति दारुवत् ॥ १८८ ॥ हिरण्यमायुरन्नं च भूगौँश्चाथोषतस्तनुम् । अश्वश्चक्षुस्त्वचं वासो घृतं तेजस्तिलाः प्रजाः॥१८६॥ अतपास्त्वनधीयानः प्रतिग्रहरुचिर्द्विजः । अम्भस्यश्मप्लवेनेव सह तेनैव मज्जति ॥ १९० ॥

चौथा अध्याय । १४७

चौथा अध्याय । १४७ तस्मादविद्वान् बिभियाद्यस्मात्तस्मात्प्रतिग्रहात् । स्वल्पकेनाप्यविद्वान् हि पङ्के गौरिव सीदति ॥१९१॥ दान-निर्णय । ब्राह्मण अपनी तपस्या से दान लेने की शक्ति रखता हो तोभी उसमें प्रीति न रक्खे । प्रतिग्रह-दान लेने से ब्रह्मतेज शीघ्र ही नष्ट होजाता है । बिना धर्मानुसार विधि जाने, द्रव्यदान, दुःखी होने पर भी न लेना चाहिए । जिस वस्तु का दान लेना हो, उसके देवता, मंत्र, जप आदि न जानकर जो ब्राह्मण सोना, भूमि, घोड़ा, गौ, अन्न, वस्त्र, तेल और घी आदि का दान लेता है वह काठ की भांति जलकर खाक होजाता है । मूर्ख ब्राह्मण दान में सोना और अन्न लेय तो आयु का नाश होता है । भूमि और गौ शरीर को सु- खाती है । घोड़ा नेत्र, वस्त्र त्वचा, घृत तेज और तिल प्रजा को नष्ट करता है । जो मूर्ख ब्राह्मण दान लेने की इच्छा रखता है, वह पत्थर की नाव बैठनेवालों के साथ जैसे जल में डूब जाती है, वैसे ही दाता के साथ नरक में डूब जाता है । इसलिये दानविधि न जानकर, मूर्ख ब्राह्मणोंको हर एक से दान लेने में डरना चाहिये । जैसे कीचड़ में गौ फँसकर दुःखी होती है वैसेही थोड़ा भी दान लेकर मूर्ख ब्राह्मण महादुःख को पाता है ॥ १८६-१९१॥ न वार्यपि प्रयच्छेत्तु वैडालव्रतिके द्विजे । न वकव्रतिके विप्रे नावेदविदि धर्मवित् ॥ १९२ ॥ त्रिष्वप्येतेषु दत्तं हि विधिनाप्यार्जितं धनम् । दातुर्भवत्यनर्थाय परत्रादातुरेव च ॥ १९३ ॥ यथा प्लवेनौपलेन निमज्जत्युदके तरन् । तथा निमज्जतोऽधस्तादज्ञौ दातृप्रतीच्छकौ ॥ १९४ ॥ जो ब्राह्मण बिलाव का सा मौन साधता है, बगला भगत है, वेद नहीं जानता उसको जलपान को भी न पूछना । इन तीन भांति के ब्राह्मणों को दिया धन चाहे वह धर्म से ही पैदा किया हो, पर पर-

१४८ मनुस्मृति । लोक में दोनों का अशुभकारक होता है। जैसे पत्थर की नाव से तैरता हुआ पुरुष जल में डूब जाता है, वैसेही मूर्खदाता और लेने वाला नरक में डूबते हैं ॥ १६२-१६४ ॥ धर्मध्वजी सदा लुब्धश्छाद्मिको लोकदम्भकः । वैडालव्रतिको ज्ञेयो हिंस्रः सर्वाभिसन्धकः ॥ १६५॥ अधोदृष्टिर्नैकृतिकः स्वार्थसाधनतत्परः । शठो मिथ्या विनीतश्च वकव्रतचरो द्विजः ॥ १६६ ॥ ये वकव्रतिनो विप्रा ये च मार्जारलिङ्गिनः । ते पतन्त्यन्धतामिस्रे तेन पापेन कर्मणा ॥ १६७ ॥ जो संसार को छलने के लिये धर्माचरण करते हैं, लोगों को धोखा देते हैं, दूसरे की बुराई में लगे रहते हैं, लोभी हैं और दूसरे के गुणों को न सहकर लड़ा करते हैं, ऐसे पुरुषों को 'वैडाल व्रतिक' कहते हैं। जो सदा नीची दृष्टिरखतेहैं, शान्तभाव से रहते हैं, मन में मतलब गांठा करते हैं, जड़ हैं और झूठा विनय दिखाते हैं, ऐसे पुरुषों को वकभक्त-बगलाभगत कहतेहैं, जो वैडालव्रतिक, वकभक्त आदि हैं वे सब अपने पापवश 'अन्धतामिस्र' नरक में पड़ते हैं ॥ १६५-१६७ ॥ न धर्मस्यापदेशेन पापं कृत्वा व्रतं चरेत् । व्रतेन पापं प्रच्छाद्य कुर्वन् स्त्रीशूद्रदम्भनम् ॥ १६८ ॥ कोई पाप करके, उसका प्रायश्चित्त करते हुए यह न कहै कि यह प्रायश्चित्त नहीं, किन्तु धर्मार्थ करते हैं। ऐसा कहकर लोक को छलना न चाहिए ॥ १६८ ॥ प्रेत्येह चेदृशा विप्रा गर्ह्यन्ते ब्रह्मवादिभिः । छद्मना चरितं यच्च व्रतं रक्षांसि गच्छति ॥ १६६ ॥ अलिङ्गी लिङ्गिवेषेण यो वृत्तिमुपजीवति ।

चौथा अध्याय । १४६

चौथा अध्याय । १४६ स लिङ्गिनां हरत्येनस्तिर्यग्योनौ च जायते ॥ २०० ॥ परकीयनिपानेषु न स्नायाच्च कदाचन । निपानकर्त्तुः स्नात्वा तु दुष्कृतांशेन लिप्यते ॥ २०१ ॥ यानशय्यासनान्यस्य कूपोद्यानगृहाणि च । अदत्तान्युपभुञ्जान एनसः स्यात्तुरीयभाक् ॥ २०२ ॥ ऐसे कपटी ब्राह्मणों की लोक परलोक दोनों में विद्वान् ब्राह्मण निन्दा करते हैं और उनके कपटव्रतों का फल राक्षसों को पहुँचता है। जो पुरुष जिस वर्ण वा आश्रम से सम्बन्ध नहीं रखता, पर उसके चिह्नों को जीविका के लिये धारण करता है, वह उन वर्णा- श्रमवालों के पाप को ग्रहण करता है और अन्त में पक्षियोनि को प्राप्त होता है। किसीके तालाब, पौशाला आदि में कभी स्नान न करना। स्नान करने से, उसके मालिक के चतुर्थांश पाप का वह भागी होता है। सवारी, शय्या, आसन, कुआं, बगीचा और घर बिना दिये जो दूसरे का भोगता है वह उसके स्वामी का चौथाई पाप का भागी होता है ॥ १६६-२०२ ॥ नदीषु देवखातेषु तडागेषु सरःसु च । स्नानं समाचरेन्नित्यं गर्तप्रस्रवणेषु च ॥ २०३ ॥ यमान्सेवेत सततं न नित्यं नियमान् बुधः । यमान्पतत्यकुर्वाणो नियमान् केवलान् भजन् ॥२०४॥ नाश्रोत्रियतते यज्ञे ग्रामयाजिकृते तथा । स्त्रिया क्लीबेन च हुते भुञ्जीत ब्राह्मणः क्वचित् ॥ २०५ ॥ नदी, देवताओं के लिये बने जलाशय, सरोवर, सोता झरना आदि में नित्य स्नान करना चाहिए। विद्वान् गृहस्थ नित्य नियम का ही पालन न करें, बल्कि यमोंका भी पालन करे। क्योंकि यमों को न करके केवल नियमोंके ही पालन से वह पतित होजाता

१५० मनुस्मृति ।

है* जो वेदवेत्ता न हो, या बहुतों को साथही यज्ञ कराता हो और जिसमें नपुंसक वा स्त्री होम करनेवाले हों, ऐसे यज्ञों में ब्राह्मण को भोजन कभी न करना चाहिए ॥ २०३-२०५ ॥ अश्रीकमेतत् साधूनां यत्र जुह्वत्यमी हविः । प्रतीपमेतद्देवानां तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥ २०६ ॥ मत्तक्रुद्धादुराणां च न भुञ्जीत कदाचन । केशकीटावपन्नञ्च पदा स्पृष्टञ्च कामतः ॥ २०७ ॥ भ्रूणघ्नावेक्षितञ्चैव संस्पृष्टं चाप्युदक्यया । पतत्रिणावलीढं च शुना संस्पृष्टमेव च ॥ २०८ ॥ गवा चान्नमुपघ्रातं घुष्टान्नं च विशेषतः । गणान्नं गणिकान्नं च विदुषा च जुगुप्सितम् ॥ २०६ ॥ कुधान्य-निर्णय । जिस यज्ञ में ऐसे लोग हवन करते हैं वह साधुओं को श्रीहीन करनेवाला है, देवताओं के विरुद्ध है। इस लिए उसको छोड़ देना चाहिए । मतवाला, क्रोधी और रोगी का अन्न कभी न खाना बाल, कीड़ा पड़ा हो, पैर-से छुआ हो उस अन्नको भी न खाना। भ्रूणहत्या करनेवाले का देखा हुआ, रजस्वला का छुआ, पक्षी का खाया, कुत्ता का छुआ भी न खाना। गौ का सूंघा हुआ, 'जो चाहे खाजाय' ऐसा पुकार कर कहा हुआ, बहुतों की मदद से भण्डारे का अन्न, वेश्या का अन्न, यह सब निन्दित अन्न हैं ॥ २०६--२०६॥ स्तेनगायनयोश्चान्नं तक्षणो वार्द्धुषिकस्य च । दीक्षितस्य कदर्यस्य बद्धस्य निगडस्य च ॥ २१० ॥

  • अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, दया, सहनशीलता, अक्रूरता, मधुर वचन को यम कहते हैं । स्नान, मौन, उपवास, वेदाध्ययन, शौच, अक्रोध, अप्रमाद आदि नियम हैं । इन दोनों का पालन करने से फल होता है केवल एकही से नहीं । इस लिये सबको दोनों नियमों का पालन आवश्यक है ।

चौथा अध्याय। १५१

चौथा अध्याय। १५१ अभिशस्तस्य षण्ढस्य पुंश्चल्या दाम्भिकस्य च । शुक्लं पर्युषितं चैव शूद्रस्योच्छिष्टमेव च ॥ २११ ॥ चिकित्सकस्य मृगयोः क्रूरस्योच्छिष्टभोजिनः । उग्रान्नं सूतिकान्नं च पर्याचान्तमनिर्देशम् ॥ २१२ ॥ चोर, गवैया, बढ़ई, व्याजखोर, अग्नीसोमीय यज्ञ न करके यज्ञ में दीक्षित, कृपण और क़ैदी का अन्न न खाना। महापातकी, नपुंसक, व्यभिचारिणी स्त्री, कपटब्रह्मचारी का अन्न, खट्टा, बासी और शूद्र का जूॅठा अन्न न खाना। वैद्य का, शिकारी का, क्रूर का, जूठन खाने वाले का, क्रूर कर्म करनेवाले का, दश दिन तक सूतक का और पर्याचान्त * इन सब अन्नों को न खाना चाहिए ॥ २१०-२१२ ॥ अनर्चितं वृथामांसमवीरायाश्च योषितः । द्विषदन्नं नगर्य्यन्नं पतितान्नमवक्षुतम् ॥ २१३ ॥ पिशुनानृतिनोश्चान्नं क्रतुविक्रयिणस्तथा । शैलूषतुन्नवायान्नं कृतघ्नस्यान्नमेव च ॥ २१४ ॥ कर्म्मारस्य निषादस्य रङ्गावतारकस्य च । सुवर्णकर्तुर्वैणस्य शस्त्रविक्रयिणस्तथा ॥ २१५ ॥ श्ववतां शौण्डिकानाञ्च चैलनिर्णेजकस्य च । रजकस्य नृशंसस्य यस्य चोपपतिर्गृहे ॥ २१६ ॥ अपमान से दिया अन्न, वृथामांस, पति-पुत्र हीन स्त्री का, शत्रु के नगर का, पतित मनुष्य का और जिसके ऊपर छींक भई हो वह अन्न न खाना। चुगल, झूठा, यज्ञ फल बेचनेवालों का अन्न, नट, दर्जी और कृतघ्न का अन्न त्याग देना। लोहार, भील, बहुरू-

  • एक पंक्ति में भोजन करते हों तभी दूसरी पंक्ति में यदि कोई भोजन विश्राम करके आचमन करले तो उसको 'पर्याचान्त' कहते हैं। ऐसा होजाने पर भोजन बंद कर देना चाहिए ।

१५२ मनुस्मृति।

पिया, सोनार, घरकाट और अस्त्र बेंचनेवाले का अन्न न खाना। कुत्तावाला, मद्यवाला, धोवी, रंगरेज़, निर्दयी और जिस के यहां उपपति हो, इन सबका अन्न न लेना चाहिए ॥ २१३-२१६ ॥ मृष्यन्ति ये चोपपतिं स्त्रीजितानां च सर्वशः । अनिर्दशं च प्रेतान्नमतुष्टिकरणेव च ॥ २१७ ॥ राजान्नं तेज आदत्ते शूद्रान्नं ब्रह्मवर्चसम्। आयुः सुवर्णकारान्नं यशश्चर्मविकर्तिनः ॥ २१८ ॥ कारुकान्नं प्रजां हन्ति बलं निर्णेजकस्य च । गणान्नं गणिकान्नं च लोकेभ्यः परिकृन्तति ॥ २१९ ॥ पूयं चिकित्सकस्यान्नं पुंश्चल्यास्त्वन्नमिन्द्रियम् । विष्ठा वार्धुषिकस्यान्नं शस्त्रविक्रयिणो मलम् ॥ २२०॥ जो स्त्री के जार को स्वीकृत किये हों, जो स्त्री के अधीन हों, दश दिन तक मरण शौच का और जो सन्तोष न दे, इन अन्नों को न खाना चाहिए। राजा का अन्न तेज, शूद्र का ब्रह्मतेज, सोनार का आयु, मोची का यश, रसोईदार का प्रजा, धोवी का बल हर लेता है। और समूह का अन्न, वेश्या का अन्न परलोक को बिगाड़ता है। वैद्य का अन्न पीब के समान, व्यभिचारिणी का इन्द्रिय के समान, व्याजखोर का विष्ठा के समान और हथियार बेंचनेवाले का मैल के समान होता है। इन सब कुधान्यों को जहां तक बन पड़े बचाना चाहिए ॥ २१७-२२० ॥ य एतेऽन्ये त्वभोज्यान्नाः क्रमशः परिकीर्त्तिताः । तेषां त्वगस्थिरोमाणि वदन्त्यन्नं मनीषिणः ॥ २२१ ॥ भुक्त्वातोऽन्यतमस्यान्नममत्याक्षपणं त्र्यहम् । मत्या भुक्त्वा चरेत्कृच्छ्रं रेतोविण्मूत्रमेव च ॥ २२२ ॥

चौथा अध्याय। १५३

चौथा अध्याय। १५३ नाद्याच्छूद्रस्य पक्वान्नं विद्वानश्राद्धिनो द्विजः । आददीताममेवास्मादवृत्तावेकरात्रिकम् ॥ २२३ ॥ श्रोत्रियस्य कदर्यस्य वदान्यस्य च वार्धुषेः । मीमांसित्वोभयं देवाः सममन्नमकल्पयन् ॥ २२४ ॥ तान्प्रजापतिराहैत्य मा कृध्वं विषमं समम् । श्रद्धापूतं वदान्यस्य हतमश्रद्धयेतरत् ॥ २२५ ॥ इसप्रकार जो अन्न कहे गये हैं और ऐसेही दूसरे प्रकार के अन्न को त्वचा, हड्डी और रोम की भांति विद्वानोंने कहा है । इन सब अन्नों को अज्ञान से खा लेवे तो तीन दिन व्रत करे और जान- कर खाया हो तो भी कृच्छ्र व्रत करे । विद्वान् ब्राह्मण श्रद्धाहीन शूद्र के घर पक्वान्न न खाय, यदि अन्न न हो तो एक दिन के लिए कच्चा सीधा उससे ले लेना चाहिए । वेद पढ़कर भी कृपण हो, दाता भी व्याजखोर हो, इन दोनोंके अन्न को देवताओं ने एक भांति कहा हैं । पर ब्रह्माजी ने देवताओं के पास जाकर कहा कि-विषम को सम न करना, व्याजखोर होने परभी दाता का अन्न श्रद्धासे पवित्र होता है । और वेद पढ़कर भी कृपण का श्रद्धारहित अन्न अपवित्र होता है ॥ २२१-२२५ ॥ श्रद्धयेष्टं च पूतं च नित्यं कुर्यादतन्द्रितः । श्रद्धाकृते ह्यक्षये ते भवतः स्वागतैर्द्धनैः ॥ २२६ ॥ दानधर्मं निषेवेत नित्यमैष्टिकपौर्त्तिकम् । परितुष्टेन भावेन पात्रमासाद्य शक्तितः ॥ २२७ ॥ यत्किञ्चिदपि दातव्यं याचितेनानसूयया । उत्पत्स्यते हि तत्पात्रं यत्तारयति सर्वतः ॥ २२८ ॥ द्विज को श्रद्धा से यज्ञ, कूप, धर्मशाला आदि बनवाना चाहिए । सुमार्ग से मिले धन से यह काम करने से बड़ा फल होता है । २०

१५४ मनुस्मृति । गृहस्थ को यज्ञ आदि कर्मों में सुपात्र को दान देना चाहिए। गृहस्थ के यहां कोई मांगने आवे तो उसको शान्तभाव से जो हो सके देना चाहिए। क्योंकि कभी कोई ऐसा पात्र मिल जाता है, जो दाता को सब पापों से तार देता है ॥ २२६-२२८ ॥ वारिदस्तृप्तिमाप्नोति सुखमक्षय्यमन्नदः । तिलप्रदः प्रजामिष्टां दीपदेश्चक्षुरुत्तमम् ॥ २२९ ॥ भूमिदो भूमिमाप्नोति दीर्घमायुर्हिरण्यदः । गृहदोऽग्र्याणि वेश्मानि रूप्यदो रूपमुत्तमम् ॥ २३० ॥ वासोदश्चन्द्रसालोक्यमश्विसालोक्यमश्वदः । अनडुहः श्रियं पुष्टां गोदो ब्रध्नस्य विष्टपम् ॥ २३१ ॥ विविध-विषय । जल पिलानेवाला तृप्ति, अन्नदाता अक्षय सुख, तिलदाता अभीष्ट संतान और दीपक का दान करनेवाला उत्तम नेत्र पाता है। भूमिदाता भूमि, सुवर्णदाता उमर, गृहदाता उत्तम गृह, चांदी- दाता उत्तम रूप को पाता है। वस्त्रदाता चन्द्रलोक पाता है, घोड़ा देनेवाला अश्विनीकुमार का लोक, वृषभदाता पूर्णलक्ष्मी और गो- दान करनेवाला सूर्यलोक पाता है ॥ २२९-२३१ ॥ यानशय्याप्रदो भार्यामैश्वर्यमभयप्रदः । धान्यदः शाश्वतं सौख्यं ब्रह्मदो ब्रह्ममार्ष्टिताम् ॥ २३२ ॥ सर्वेषामेव दानानां ब्रह्मदानं विशिष्यते । वार्यन्नगोमहीवासस्तिलकाञ्चनसर्पिषाम् ॥ २३३ ॥ येन येन तु भावेन यद्यद्दानं प्रयच्छति । तत्तत्तेनैव भावेन प्राप्नोति प्रतिपूजितः ॥ २३४ ॥ योऽर्चितं प्रतिगृह्णाति ददात्यर्चितमेव च ।

चौथा अध्याय । १५५

चौथा अध्याय । १५५ तावुभौ गच्छतः स्वर्गं नरकं तु विपर्यये ॥ २३५ ॥ न विस्मयेन तपसा वदेदिष्ट्वा च नानृतम् । नार्त्तोऽप्यपवदेद्विप्रान्न दत्त्वा परिकीर्त्तयेत् ॥ २३६ ॥ सवारी और शय्या देनेवाला अभयदाता ऐश्वर्य, धान्यदाता अक्षय सुख और वेदाध्यापक ब्रह्मलोक को पाता है। इन सब दानों में वेद का दान सब से उत्तम माना जाता है। जिस सात्त्विक, राजस आदि भावों से दान दिया जाता है उस भाव का फल दाता को मिलता है। जो आदर से दान देता है और जो आदरसे लेता है उन दोनों को स्वर्गफल मिलता है। नहीं तो उलटा फल मिलता है। तप करके अभिमान न करना, यज्ञ करके झूठ न बोलना, ब्राह्मणों से दुःख पाकर भी उनको दुर्वचन न कहना और दान देकर न कहना, यह सत्पुरुषों का कार्य है ॥ २३२-२३६ ॥ यज्ञोऽनृतेन क्षरति तपः क्षरति विस्मयात् । आयुर्विप्रापवादेन दानं च परिकीर्त्तनात् ॥ २३७॥ धर्मं शनैः संचिनुयाद्वल्मीकमिव पुत्तिकाः । परलोकसहायार्थं सर्वभूतान्यपीडयन् ॥ २३८॥ नामुत्र हि सहायार्थं पिता माता च तिष्ठतः । न पुत्रदारा न ज्ञातिर्धर्मस्तिष्ठति केवलः ॥ २३६ ॥ एकः प्रजायते जन्तुरेक एव प्रलीयते । एकोऽनुभुंक्ते सुकृतमेक एव च दुष्कृतम् ॥ २४० ॥ मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्ठसमं क्षितौ । विमुखा बान्धवा यान्ति धर्मस्तमनुगच्छति ॥ २४१॥ असत्य से यज्ञ निष्फल होजाता है, गर्व से तप क्षीण होजाता है। ब्राह्मणों की निन्दा से आयु घटती है। दान करके खुद बड़ाई

करने से वह निष्फल होजाता है। जिस प्रकार चींटी धीरे धीरे मिट्टी का ढेर लगा देती है उसी भांति गृहस्थ को धीरे धीरे पर- लोक की सहायता के लिए धर्म का संग्रह करना चाहिए। परलोक में मदद के लिए पिता, माता, पुत्र, स्त्री और सम्बन्धी नहीं रहते किन्तु वहां केवल धर्म ही साथ में रहता है। प्राणी अकेला जन्म लेता है, अकेला मरता है और अकेला ही पुण्य-पाप को भोगता है। काठ मिट्टी के समान मृत शरीर को ज़मीन में छोड़कर, स- म्बन्धी लोग मुँह फेरकर, घर चले जाते हैं। एक धर्म ही उसके साथ जाता है ॥ २३७-२४१ ॥ तस्माद्धर्मं सहायार्थं नित्यं संचिनुयाच्छनैः । धर्मेण हि सहायेन तमस्तरति दुस्तरम् ॥ २४२ ॥ धर्मप्रधानं पुरुषं तपसा हन्ति किल्विषम् । परलोकं नयत्याशु भास्वन्तं खशरीरिणम् ॥ २४३ ॥ उत्तमैरुत्तमैर्नित्यं सम्बन्धानाचरेत् सह । निनीषुः कुलमुत्कर्षमधमानधमांस्त्यजेत् ॥ २४४ ॥ इस लिए परलोक में सहायता के लिए नित्य धीरे धीरे धर्म का संग्रह करना उचित है। क्योंकि धर्म सहायक होने से प्राणी दुस्तर नरक को तर जाता है। धर्म प्राण, निष्पाप पुरुष को धर्म तत्काल परलोक को लेजाता है। पुरुष को सदा उत्तम पुरुषों से सम्बन्ध करना चाहिए। अधमों को त्यागना चाहिए। इससे कुल की उन्नति होती है ॥ २४२-२४४ ॥ उत्तमानुत्तमान्गच्छन् हीनान्हीनांश्च वर्जयन् । ब्राह्मणः श्रेष्ठतामेति प्रत्यवायेन शूद्रताम् ॥ २४५ ॥ दृढकारी मृदुर्दान्तः क्रूराचारैरसंवसन् । अहिंस्रो दमदानाभ्यां जयेत्स्वर्गं तथा व्रतः ॥ २४६ ॥ एधोदकं मूलफलमन्नमभ्युद्यतं च यत् ।

चौथा अध्याय । १५७

चौथा अध्याय । १५७ सर्वतः प्रतिगृह्णीयान्मध्वथामयदक्षिणाम् ॥ २४७ ॥ आहृतामभ्युद्यतां भिक्षां पुरस्तादप्रचोदिताम् । मेने प्रजापतिर्ग्राह्यामपि दुष्कृतकर्मणः ॥ २४८ ॥ नाश्नन्ति पितरस्तस्य दश वर्षाणि पञ्च च । न च हव्यं वहत्यग्निर्यस्तामभ्यवमन्यते ॥ २४६ ॥ अच्छे पुरुषों के साथ सम्बन्ध करना और नीचों से सम्बन्ध छोड़ता हुआ पुरुष श्रेष्ठता पाता है, नहीं तो शूद्र के समान होजाता है। कर्तव्यमें अचल, कोमल स्वभाव, इन्द्रियोंको वश रखकर, दुराचार से बचकर, हिंसा न करके पुरुष स्वर्ग को जीत लेता है। समिधा, जल, कन्द, फल, पक्वान्न, कच्चा अन्न, मधु और अभयदान इन पदार्थों में कोई भी वस्तु विना मांगे आजाय तो उसको स्वीकार करलेना चाहिए। विना प्रेरणा के यदि दुराचारी भी भिक्षा ले आवे तो उसे ग्रहण करलेना चाहिए यह प्रजापति की आज्ञा है। जो उस भिक्षा का अपमान करता है, उसके पितर पन्द्रह वर्ष तक उसकी श्राद्ध नहीं लेते और अग्नि हव्य नहीं ग्रहण करता ॥ २४५-२४६ ॥ शय्यागृहान्कुशान्गन्धानपः पुष्पं मणीन्दधि । धाना मत्स्यान्पयो मांसं शाकं चैव न निर्णुदेत् ॥ २५० ॥ गुरून् भृत्यांश्चोज्जिहीर्षन्नर्चिष्यन् देवतातिथीन् । सर्वतःप्रतिगृह्णीयान्न तु तृप्येत् स्वयं ततः ॥ २५१ ॥ गुरुषु त्वभ्यतीतेषु विना वातैर्गृहे वसन् । आत्मनो वृत्तिमन्विच्छन् गृह्णीयात्साधुतः सदा ॥ २५२॥ पलँग, घर, कुश, सुगंध की चीज़, जल, फूल, मणि, दही, भुना अन्न, मछली, दूध, मांस और शाक यह कोई देने आवे तो लौटाना न चाहिए। अतिथि देवता गुरु आदि के सत्कार की सामग्री न होय तो उसे मांग भी लेवे, पर अपने काम में न लगाना चाहिए।

१५८ मनुस्मृति । माता, पिता, गुरु न वर्तमान हों या उनसे जुदा रहता हो तो ब्राह्मण अपनी जीविका के लिए सत्पुरुषों से दान ले लेवे ॥ २५०-२५२ ॥ आर्धिकः कुलमित्रं च गोपालो दासनापितौ । एते शूद्रेषु भोज्यान्ना यश्चात्मानं निवेदयेत् ॥ २५३॥ यादृशोऽस्य भवेदात्मा यादृशश्च चिकीर्षितम् । यथा चोपचरेदेनं तथात्मानं निवेदयेत् ॥ २५४ ॥ योऽन्यथासन्तमात्मानमन्यथा सत्सु भाषते । स पापकृत्तमो लोके स्तेन आत्मापहारकः ॥ २५५ ॥ वाच्यर्था नियताः सर्वे वाङ्मूला वाग्विनिःसृताः । तां तु यःस्तेनयेद्वाचं स सर्वस्तेयकृन्नरः ॥ २५६ ॥ अपना साथी, कुलपरम्परा का मित्र, अहीर, दास, नापित और अपने को अर्पण करनेवाले शूद्र का अन्न ग्रहण करना चाहिए । आत्मसमर्पण करनेवाला अपना कुल, देश, जो काम करके पास रहना चाहे और जैसे सेवा करना चाहे-सब निवेदन करे । जो अपनी असलियत छिपाकर सज्जनों के सामने दूसरे ढंग का बनता है वह महापापी, चोर, अपने को छिपानेवाला माना जाता है, सब अर्थ वाणी में रहते हैं, उनका मूल भी वाणी ही है और वाणी में से निकले हैं, ऐसी वाणी को जो चुराता है अर्थात् झूठ बोलता है वह सब वस्तुओं की चोरी करता है ॥ २५३-२५६ ॥ महर्षिपितृदेवानां गत्वानृण्यं यथाविधि । पुत्रे सर्वं समासज्य वसेन्माध्यस्थ्यमाश्रितः ॥ २५७॥ एकाकी चिन्तयेन्नित्यं विविक्ते हितमात्मनः । एकाकी चिन्तयानो हि परं श्रेयोऽधिगच्छति ॥ २५८ ॥ एषोदिता गृहस्थस्य वृत्तिर्विप्रस्य शाश्वती ।

चौथा अध्याय । १५६

चौथा अध्याय । १५६ स्नातकव्रतकल्पश्च सत्त्ववृद्धिकरः शुभः ॥ २५६ ॥ अनेन विप्रो वृत्तेन वर्तयन् वेदशास्त्रवित् । व्यपेत कल्मषो नित्यं ब्रह्मलोके महीयते ॥ २६० ॥ इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां चतुर्थोऽध्यायः ॥ महर्षि, पितर और देवताओं के ऋण से गृहस्थ को छुटकारा लेकर और पुत्र के ऊपर घर का भार छोड़कर उदासीन वृत्ति से जीवन बिताना चाहिए । एकान्त में अकेला बैठकर, अपना हित चिन्तन करना। एकान्त में विचार करने से पुरुष मोक्ष पाता है। इस प्रकार गृहस्थ ब्राह्मण की जीवननिर्वाह की रीति कही है और स्नातक के आचरण का हाल भी कहा गया है । इस प्रकार के आचरण को करता हुआ ब्राह्मण, निष्पाप होकर ब्रह्मलोक में पूजित होता है ॥ २५७-२६० ॥ चौथा अध्याय पूरा हुआ।