मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
सातवां अध्याय। २३१
सातवां अध्याय। २३१ विक्रोशन्त्यो यस्य राष्ट्राद् ध्रियन्ते दस्युभिः प्रजाः । संपश्यतः सभृत्यस्य मृतः स न तु जीवति ॥ १४३ ॥ क्षत्रियस्य परोधर्मः प्रजानामेव पालनम् । निर्दिष्टफलभोक्ता हि राजा धर्मेण युज्यते ॥ १४४ ॥ अपने सब कर्त्तव्यों को इस तरह पूरा कर के, प्रमाद-रहित और कार्यपरायण होकर अपनी प्रजा की रक्षा करे । राजा और उसके कर्मचारियों के देखते यदि चोर, लुटेरे प्रजा को लूट पाट से दुःख पहुंचावें, तो वह राजा मरा सा है, जीता नहीं है। प्रजा का पालन करना ही क्षत्रिय का मुख्य धर्म है। इसलिए अपने धर्म ही से प्राप्त हो फल भोग करना उचित है ॥ १४२-१४४ ॥ उत्थाय पश्चिमे यामे कृतशौचः समाहितः । हुताग्निर्ब्राह्मणांश्चार्च्य प्रविशेत्सशुभां सभाम् ॥ १४५॥ तत्र स्थितः प्रजाः सर्वाः प्रतिनन्द्य विसर्जयेत् । विसृज्य च प्रजाः सर्वा मन्त्रयेत्सह मन्त्रिभिः ॥ १४६॥ गिरिपृष्ठं समारुह्य प्रासादं वा रहोगतः । अरण्ये निःशलाके वा मन्त्रयेदविभावितः ॥ १४७॥ यस्य मन्त्रं न जानन्ति समागम्य पृथग्जनाः । सकृत्स्नां पृथिवीं भुङ्क्ते कोशहीनोऽपि पार्थिवः ॥ १४८ ॥ जडमूकन्धबधिरान्तिर्यग्योनान्र्वयोऽतिगान् । स्त्रीम्लेच्छव्याधितव्यङ्गान् मन्त्रकालेऽपसारयेत् ॥ १४६॥ राजा बड़े तड़के उठकर, शौच से निपटकर, एकाग्र चित्त होकर अग्निहोत्र और ब्राह्मणसत्कार करके, राजसभा में प्रवेश करे । वहां दर्शकों को प्रीतिपूर्वक पहले बिदा करके फिर मन्त्रियों के साथ
२३२ : मनुस्मृतिः ।
राजकाज का विचार करे। पर्वत पर या महल में जाकर, एकान्त में वा वृक्षरहित वन में, जहाँ भेद लेनेवाले दूत न पहुँच सकें, वहाँ मन्त्रणा करे। जिस राजा के मन्त्र को दूसरे लोग मिले रहने पर भी नहीं जान सकते, वह धन-सम्पत्ति के न होते भी संपूर्ण पृथिवी को भोगता है। मूर्ख, गूँगा, अंधा, बहिरा, तोता-मैना आदि पक्षी, बूढ़े, स्त्री, म्लेच्छ, रोगी, और अङ्गहीनों को, सलाह के समय हटा देवे। प्रायः ये लोग गुप्त बातों को प्रकट कर दिया करते हैं॥ १४५-१४६ ॥
भिन्दन्त्यवमता मन्त्रं तिर्यग्योनास्तथैव च । स्त्रियश्चैव विशेषेण तस्मात्तत्रादृतो भवेत् ॥ १५० ॥ मध्यन्दिनेऽर्धरात्रे वा विश्रान्तो विगतक्लमः । चिन्तयेद्धर्मकामार्थान् सार्धं तैरैक एव वा ॥ १५१ ॥ परस्परविरुद्धानां तेषां च समुपाजर्नम् । कन्यानां संप्रदानं च कुमाराणां च रक्षणम् ॥ १५२ ॥ दूतसंप्रेषणं चैव कार्यशेषं तथैव च । अन्तःपुरप्रचारं च प्रणिधीनां च चेष्टितम् ॥ १५३ ॥ कृत्स्नं चाष्टविधं कर्म पञ्चवर्गं च तत्त्वतः । अनुरागापरागौ च प्रचारं मण्डलस्य च ॥ १५४ ॥ मध्यमस्य प्रचारं च विजिगीषोश्च चेष्टितम् । उदासीनप्रचारं च शत्रोश्चैव प्रयत्नतः ॥ १५५ ॥ एताः प्रकृतयो मूलं मण्डलस्य समासतः । अष्टौ चान्याः समाख्याता द्वादशैव तु ताः स्मृताः ॥ १५६ ॥ अमात्यं राष्ट्रदुर्गार्थदण्डाख्याः पञ्च चापराः ।
सातवां अध्याय। २३३
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प्रत्येकं कथिता ह्येताः संक्षेपेण द्विसप्ततिः ॥ १५७॥ मूर्ख वगैरह, तोता, मैना और स्त्रियाँ प्रायः गुप्त सम्मति को प्रकाशित कर देती हैं इसलिए इन लोगों को धीरे से हटा देना चा- हिए। दोपहर या आधी रात को विश्राम करके, मन्त्रियों के साथ या अकेला ही धर्म-अर्थ-काम का विचार करे। यदि धर्म, अर्थ, काम का परस्पर विरोध हो तो उनको मिटाकर अर्थोपार्जन, कन्यादान, पुत्रों को रक्षा और शिक्षा की चिन्ता करे। परराज्य में दूत भेजना, बाक़ी कामों का, अन्तःपुर का और प्रतिनिधियों के काम का विचार करे। आठ प्रकार के सब काम * और पञ्चवर्ग † का खूब विचार करे। मन्त्री आदि की प्रीति-अप्रीति, शत्रु, मित्र-उदासीन आदि राजमण्डल पर, विशेष ध्यान रक्खे । अपने से मध्यम बलवाले राजा के बर्ताव, जीतने की इच्छा रखनेवाले की चेष्टा, उदासीन और शत्रु राजा के वृत्तान्तों को यत्न से जानता रहे। ये मध्यम आदि चार प्रकृतियां मण्डल का मूल मानी जाती हैं और जो आठ हैं, वे सब मिलकर बारह ‡ होती हैं। मंत्री, देश, क़िला, धनभण्डार, और दण्ड ये पांच प्रकृतियां और भी हैं। ये बारहों की अलग अलग होती हैं, यों सब मिलाकर संक्षेप में बहत्तर प्रकृतियां हुईं॥१५०-१५७॥ अनन्तरमरिं विद्यादरिसेविनमेव च । अरेरनन्तरं मित्रमुदासीनं तयोः परम् ॥ १५८ ॥ तान् सर्वानभिसंदध्यात्सामादिभिरुपक्रमैः । व्यस्तैश्चैव समस्तैश्च पौरुषेण नयेन च ॥ १५६ ॥
- कर आदि की आय, नौकरी में व्यय, नौकरों की चाल, विरुद्ध कार्यों को रोकना, मिथ्या व्यवहार रोकना, धर्मव्यवहार देखना, दण्ड देना, प्रायश्चित्त कराना, ये आठ कर्म हैं। † कापटिक, उदासीन, वैदेह, गृहपति, तापस, ये पाँच वर्ग हैं । ‡ विजिगीषु, अरि, अरिसेवित, अरिमित्र, पाष्णिग्राह, पार्ष्णिग्राहासार, मित्र, मित्र का मित्र, आक्रन्द, आक्रन्दासार, मध्यम और उदासीन । ३०
२३४ मनुस्मृति । संधिं च विग्रहं चैव यानमासनमेव च । द्वैधीभावं संश्रयं च षड्गुणांश्चिन्तयेत्सदा ॥ १६० ॥ आसनं चैव यानं च संधिं विग्रहमेव च । कार्यं वीक्ष्य प्रयुञ्जीत द्वैधं संश्रयमेव च ॥ १६१ ॥ अपनी सीमा के पास रहनेवाले और शत्रु से मेल रखनेवाले राजा को शत्रु समझना चाहिए। शत्रु की सीमावाले राजा को मित्र और मित्र राजा की सीमावाले को उदासीन जाने। इन सब को सामादि उपायों से या एक ही से वा सब उपायों से अथवा पुरुषार्थ से, या राजनीति ही से वश में करे। मेल, लड़ाई, चढ़ाई, क़िले में रहना, अपनी सेना के दो भाग करना और अपने से बली राजा का आश्रय लेना, इन छः गुणों का नित्य विचार करे। आसन, यान, संधि, विग्रह, द्वैध और आश्रय इन गुणों को अवसर देख कर जब जैसा मौक़ा आवे तब तैसा काम करना चाहिए ॥ १५८-१६१ ॥ संधिं तु द्विविधं विद्याद्राजा विग्रहमेव च । उभे यानासने चैव द्विविधः संश्रयः स्मृतः ॥ १६२ ॥ समानयानकर्माच विपरीतस्तथैव च । तदा त्वायतिसंयुक्तः संधिर्ज्ञेयो द्विलक्षणः ॥ १६३ ॥ स्वयं कृतश्च कार्यार्थमकाले काल एव वा । मित्रस्य चैवापकृते द्विविधो विग्रहः स्मृतः ॥ १६४ ॥ एकाकिनश्चात्ययिके कार्ये प्राप्ते यदृच्छया । संहतस्य च मित्रेण द्विविधं यानमुच्यते ॥ १६५ ॥ संधि, विग्रह दो दो प्रकार के हैं। आसन, यान संश्रय भी दो दो प्रकार के हैं। वर्तमान या भविष्य में लाभ के लिए, मित्र राजा
सातवां अध्याय । २३५
सातवां अध्याय । २३५ से मिल कर दूसरे के ऊपर चढ़ाई का नाम 'समानकर्मा सन्धि' है। हम इसके ऊपर चढ़ाई करेंगे, तुम दूसरे पर करो ऐसी राय को 'असमानकर्मा सन्धि' कहते हैं। शत्रु पराजय के लिए उचित या अनुचित काल में खुद लड़ाई करना एक, अपने मित्र के अपकार होने से, उसकी रक्षा के लिए लड़ाई करना दूसरा, ये दो भांति के विग्रह होते हैं। दैवयोग से, बहुत आवश्यक पड़ जाने पर अकेले या मित्र से मिलकर, शत्रु के ऊपर चढ़ाई करना ये दो प्रकार की चढ़ाइयां कहलाती हैं ॥ १६२-१६५ ॥ क्षीणस्य चैव क्रमशो दैवात्पूर्वकृतेन वा । मित्रस्य चानुरोधेन द्विविधं स्मृतमासनम् ॥ १६६ ॥ बलस्य स्वामिनश्चैव स्थितिः कार्यार्थसिद्धये । द्विविधं कीर्त्यते द्वैधं षाड्गुण्यगुणवेदिभिः ॥ १६७ ॥ अर्थसम्पादनार्थं च पीड्यमानस्य शत्रुभिः । साधुषु व्यपदेशार्थं द्विविधः संश्रयः स्मृतः ॥ १६८ ॥ पूर्वजन्म के पाप से या यहीं के कुकर्मों से, धन आदि से हीन राजा का चुप मार कर बैठना, अथवा सामर्थ्य होते भी किसी मित्र के कहने से चुपचाप बैठा रहना, ये दो आसन कहलाते हैं। कार्यसिद्धि के लिए कुछ सेना को एक जगह और कुछ सेना के साथ राजा क़िले में रहे, यह दो प्रकार का द्वैध, गुणज्ञों ने कहा है। शत्रुओं से पीड़ित राजा के संकट दूर करने के लिए अथवा सत्पुरुषों को जनाने के लिए बली राजा का आश्रय लेना, यह दो प्रकार का संश्रय कहलाता है ॥ १६६-१६८ ॥ यदावगच्छेदायतयामाधिक्यं ध्रुवमात्मनः । तदात्वे चाल्पिकां पीडां तदा सन्धिं समाश्रयेत्॥१६६॥ यदा प्रकृष्टा मन्येत सर्वास्तु प्रकृतीर्भृशम् ।
२३६ मनुस्मृति। अत्युच्छ्रितं तथात्मानं तदा कुर्वीत विग्रहम् ॥ १७० ॥ यदा मन्येत भावेन हृष्टं पुष्टं बलं स्वकम् । परस्य विपरीतं च तदा यायाद्रिपुं प्रति ॥ १७१ ॥ यदा तु स्यात्परिक्षीणो वाहनेन बलेन च । तदासीत प्रयत्नेन शनकैः सान्त्वयन्नरीन् ॥ १७२ ॥ मन्येतारिं यदा राजा सर्वथा बलवत्तरम् । तदा द्विधा बलं कृत्वा साधयेत् कार्यमात्मनः ॥ १७३ ॥ जब भविष्य में अपनी उन्नति की आशा हो तब शत्रु से कुछ पीड़ित होकर भी सन्धि कर लेवे। जब अपने राजमण्डल को खूब प्रसन्न जाने और अपनी शक्ति को पूर्ण देखे, तब वैरी के साथ युद्ध करे। जब अपनी सेना को मन से प्रसन्न, हृष्ट-पुष्ट समझे और शत्रु की सेना को साधारण दशा में जाने, तब युद्ध की तैयारी करे। जब हाथी, घोड़ा आदि वाहन और सेना से क्षीण हो तब यत्नपूर्वक शान्ति से, शत्रु को समझा कर शान्त होकर रहे अर्थात् लड़ाई में न लगे। और जब, राजा अपने शत्रु को सर्वथा बलवान् जाने, तब आधी सेना लड़ाई पर भेज दे और आधी अपने साथ में रखकर कार्यसाधन में लगे ॥ १६६-१७३ ॥ यदा परबलानां तु गमनीयतमो भवेत् । तदा तु संश्रयेत्क्षिप्रं धार्मिकं बलिनं नृपम् ॥ १७४ ॥ निग्रहं प्रकृतीनां च कुर्याद्योऽरिखलस्य च । उपसेवेत तं नित्यं सर्वयत्नैर्गुरुं यथा ॥ १७५ ॥ यदि तत्रापि संपश्येद्दोषं संश्रयकारितम् । सुयुद्धमेव तत्रापि निर्विशङ्कः समाचरेत् ॥ १७६ ॥
सातवां अध्याय । २३७
सातवां अध्याय । २३७ सर्वोपायैस्तथा कुर्यान्नीतिज्ञः पृथिवीपतिः । यथास्याभ्यधिका न स्युर्मित्रोदासीनशत्रवः ॥१७७॥ आयतिं सर्वकार्याणां तदात्वं न विचारयेत् । आयतीनां च सर्वेषां गुणदोषौ च तत्त्वतः ॥ १७८॥ आयत्यां गुणदोषज्ञस्तदात्वे क्षिप्रनिश्चयः । अतीते कार्यशेषज्ञः शत्रुभिर्नाभिभूयते ॥ १७६ ॥ और जब कि शत्रु के आधीन अपने को होता देखे तब झट- पट धार्मिक और बलवान् राजा की शरण लेवे । जो दुष्ट मन्त्रि- मण्डल आदि और शत्रुसेना को दबा सकता हो उस राजा की, गुरु के समान, नित्य सेवा करे । और यदि उस आश्रयवाले राजा से धोखा जाने तो निडर होकर युद्ध ही करे । नीतिवेत्ता राजा को सब भांति से ऐसा बर्त्ताव करना चाहिए जिससे उसके मित्र, उदासीन और शत्रु राजा बलवान् न हो जावें । सम्पूर्ण कार्यों की वर्तमान, भूत और भविष्य स्थिति और उनके गुण-दोषों का विचार किया करे । जो राजा कार्यों के भविष्य शुभाशुभ परिणाम को जानता है, वर्तमान कार्य का शीघ्र निश्चय कर लेता है और बाक़ी कामों को जानता है, उसका शत्रु कुछ नहीं कर सकते ॥१७४-१७६॥ यथैनं नाभिसंदध्युर्मित्रोदासीनशत्रवः । तथा सर्वं संविदध्यादेष सामासिको नयः ॥ १८० ॥ यदा तु यानमातिष्ठेदरिराष्ट्रं प्रति प्रभुः । तदानेन विधानेन यायादरिपुरं शनैः ॥ १८१ ॥ जिस प्रकार मित्र, उदासीन और बैरी राजा अपने को पीड़ा न दे सकें वैसे उपायों को करता रहे, यह नीति है। और जब किसी बैरी के देश पर चढ़ाई करनी हो तो नीचे लिखी विधि से धीरे धीरे यात्रा करे ॥ १८०-१८१ ॥
२३८ : मनुस्मृति। मार्गशीर्षे शुभे मासि यायाद्यात्रां महीपतिः । फाल्गुनं वाथ चैत्रं वा मासौ प्रति यथाबलम् ॥१८२॥ अन्येष्वपि तु कालेषु यदा पश्येद्ध्रुवं जयम् । तदा यायाद्विगृह्यैव व्यसने चोत्थिते रिपोः ॥ १८३ ॥ कृत्वा विधानं मूले तु यात्रिकं च यथाविधि । उपगृह्यास्पदं चैव चारान् सम्यग् विधाय च ॥१८४॥ संशोध्यं विविधं मार्गं षड्विधं च बलं स्वकम् । सांपरायिककल्पेन यायादरिपुरं शनैः ॥ १८५ ॥ शत्रुसेविनि मित्रे च गूढे युक्ततरो भवेत् । गतप्रत्यागते चैव स हि कष्टतरो रिपुः ॥ १८६ ॥ राजा अपनी सेना के वलावल का विचार करके, शुभ अगहन या फागुन के महीने में या चैत में, शत्रु के ऊपर चढ़ाई करे। इसके सिवा दूसरे समय में भी अगर अपनी जीत देखे तब, अथवा जब शत्रु किसी विपत्ति में फँसा हो तब चढ़ाई करे। अपने नगर की रक्षा का प्रबन्ध करके, गुप्तदूतों को भेजकर, ऊंचा, नीचा और सम मार्ग को साफ़ कराकर छः प्रकार की सेना * को ठीक करके सम्पूर्ण युद्ध-सामग्री को साथ लेकर, धीरे से शत्रु के नगर को जावे। जो मित्र छिप कर शत्रु से मिला हो, जो पहले छुड़ाया नौकर फिर आया हो, इनसे सावधान रहे, क्योंकि ये दोनों दुःखदायक वैरी हैं ॥ १८२-१८६ ॥ दण्डव्यूहेन तन्मार्गं यायात्तु शकटेन वा ।
- छः प्रकार के बलः- हाथीसवार, घोड़ासवार, रथसवार, पैदल, खज़ाना और नौकर चाकर।
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वराहमकराभ्यां वा सूच्या वा गरुडेन वा ॥ १८७ ॥ यतश्च भयमाशङ्केत्ततो विस्तारयेद्बलम् । पद्मेन चैव व्यूहेन निविशेत सदा स्वयम् ॥ १८८ ॥ सेनापतिबलाध्यक्षौ सर्वदिक्षु निवेशयेत् । यतश्च भयमाशङ्केत्प्राचीं तां कल्पयेद्दिशम् ॥१८६॥ राजा, दण्डव्यूह † से मार्ग में चले अथवा शकट, वराह, मकर, सूई, गरुड़ के तुल्य आकार वाले व्यूहों में, जहां जैसा देखे वैसी यात्रा करे। जिस तरफ़ डर जाने, उधर सेना बढ़ावे और खुद पद्माकार व्यूह में सदा रहे । सेनापति और सेनानायकों को सब दिशाओं में नियुक्त करे और जिस दिशा में भय समझे उसे पूर्वदिशा मान लेवे ॥ १८७-१८६ ॥ गुल्मांश्च स्थापयेदाप्तान् कृतसंज्ञान् समन्ततः । स्थानयुद्धे च कुशलानभीरूनविकारिणः ॥ १६०॥ संहतान्योधयेदल्पान् कामं विस्तारयेद्बहून् । सूच्या वज्रेण चैवैतान् व्यूहेन व्यूह्य योधयेत् ॥१६१॥ स्यन्दनाश्वैः समे युद्ध्येदनूपे नौद्विपैस्तथा । वृक्षगुल्मावृते चापैरसिचर्मायुधैः स्थले ॥ १६२ ॥ कुरुक्षेत्रांश्च मत्स्यांश्च पञ्चालान् शूरसेनजान् । दीर्घाल्लघूंश्चैव नरानग्रानीकेषु योजयेत् ॥ १६३ ॥
† दण्डा के समान फौज रखना, दण्डव्यूह ऐसे ही शकटव्यूह वगैरह । ऐसी व्यूहरचना में आगे सेनापति, बीच में राजा, पीछे, सेनापति, दोनों बगल हाथी, उनके पास घोड़े और उनके आसपास में पैदल, इस तरह लम्बा जमाव दण्डव्यूह कहा जाता है।
२४० मनुस्मृति । प्रहर्षयेद्वलं व्यूह्य तांश्च सम्यक् परीक्षयेत् । चेष्टाश्चैव विजानीयादरीन् योधयतामपि ॥ १६४ ॥ उपरुध्यारिमासीत राष्ट्रं चास्योपपीडयेत् । दूषयेच्चास्य सततं यवसान्नोदकेन्धनम् ॥ १६५ ॥ भिन्द्याच्चैव तडागानि प्राकारपरिखास्तथा । समवस्कन्दयेच्चैनं रात्रौ वित्रासयेत्तथा ॥ १६६ ॥ उपजप्यानुपजपेद् बुध्येतैव च तत्कृतम् । युक्ते च दैवे युध्येत जयप्रेप्सुरपेतभीः ॥ १६७ ॥ कुछ सेना का हिस्सा, चतुर पुरुष की अध्यक्षता में चारों तरफ़ से नियत करे और उनमें बाजा वगैरह का संकेत कर ले जिसमें समय समय पर हालात मिला करें। योद्धा कमती हों तो इकट्ठे करके युद्ध करावे, अधिक हों तो मनमानी, चारों तरफ़ फैलाकर, सूई के आकार के व्यूह से लड़ावे । समभूमि में रथ घोड़ों से, जल में नावों से, हाथियों से, वृक्ष आदि की झाड़ियों में बाणों से और स्थल में, ढाल तलवार वगैरह से युद्ध करे । कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पञ्चाल, शूरसेन आदि देशों के ऊंचे और ठिंगने मनुष्यों को सेना के आगे रक्खे । सेना को किसी रचना से खड़ी करके उत्साह दिलावे और क्या क्या करने से खुशी या नाखुश होंगे इन बातों की परीक्षा करे और शत्रुओं के मुक़ाबले दिल से लड़ते हैं या नहीं यह चेष्टाओं से जान लेवे । शत्रु लड़े वा न लड़े पर उसके देश को नष्ट कर के वहाँ का, अन्न, जल, चारा, ईंधन आदि उजाड़ देवे । तालाब, क़िला, खाइयों को तोड़ दे, शत्रु पर हमला करे और रात में अनेक आवाज़ों से उसको डरा देवे । उसके मन्त्री आदि जो फूट सकें उनको लालच देकर मिलाले, उनसे शत्रु की कुल हालतें जाने । और समय अनुकूल आवे, तो निडर होकर, युद्ध करे ॥ १६०-१६७ ॥
सातवां अध्याय। २४१
सातवां अध्याय। २४१ साम्ना दानेन भेदेन समस्तैरथवा पृथक् । विजेतुं प्रयतेतारीन् न युद्धेन कदाचन ॥ १९८ ॥ अनित्यो विजये यस्माद्दृश्यते युध्यमानयोः । पराजयश्च संग्रामे तस्माद्युद्धं विवर्जयेत् ॥ १९९ ॥ त्रयाणामप्युपायानां पूर्वोक्तानामसम्भवे । तथा युद्ध्येत संपन्नो विजयेत रिपून् यथा ॥ २०० ॥ जित्वा संपूजयेद्देवान् ब्राह्मणांश्चैव धार्मिकान् । प्रदद्यात्परिहारांश्च ख्यापयेदभयानि च ॥ २०१ ॥ सर्वेषां तु विदित्वैषां समासेन चिकीर्षितम् । स्थापयेत्तत्र तद्वंश्यं कुर्याच्च समयक्रियाम् ॥ २०२ ॥ प्रमाणानि च कुर्वीत तेषां धर्मान् यथोदितान् । रत्नैश्च पूजयेदेनं प्रधानपुरुषैः सह ॥ २०३ ॥ आदानमप्रियकरं दानं च प्रियकारकम् । अभीप्सितानामर्थानां काले युक्तं प्रशस्यते ॥ २०४ ॥ सर्वं कर्मेदमादत्तं विधाने दैवमानुषे । तयोर्दैवमचिन्त्यं तु मानुषे विद्यते क्रिया ॥ २०५ ॥ राजा साम, दान और भेद इन तीनों से या एकही किसी से शत्रु के जीतने का उपाय करे। पर जहांतक होसके युद्ध का उद्योग न करे। युद्ध में लड़नेवालों की हार वा जीत कोई निश्चित नहीं देखने में आती, कभी कोई कभी कोई, इसलिए युद्ध न करे। जब उक्त तीनों उपायों से शत्रु को जीतने का भरोसा न हो तभी युद्ध का उपाय पूरी तौर से करना उचित है जिसमें वह अधीन होजाय। युद्ध में विजय पाने पर देवता, ब्राह्मणों की पूजा करे। जीती ३१
२४२ मनुस्मृति । प्रजाओं का भूमि कर कम करे और यह ढिंढोरा पिटावे कि जिन्होंने हमारे साथ बुरा बर्ताव किया है उन्हें भी अभय दिया गया। जीते राजा और मंत्री का अभिप्राय जानकर, उसी के वंशवाले को गद्दी देकर अपनी शर्तें पक्की कर लेवे। और उनके धर्मों को-रिवाजों को माने, रत्नों से मंत्री आदि के साथ उसका सत्कार करे अर्थात्-खिलत देवे। यद्यपि किसी की प्रिय वस्तु ले लेना अप्रिय और देना प्रिय होता है तौभी समयानुसार लेना और देना दोनों अच्छा माना जाता है। ये सब कर्म दैव और मनुष्य के पुरुषार्थ के अधीन हैं। इन में दैव का निर्णय अशक्य है परन्तु पुरुषार्थ से कार्य किया जाता है। अर्थात् मनुष्य-साध्य- कार्य में पुरुषार्थ प्रधान माना जाता है ॥ १६८-२०५॥ सह वापि व्रजेद्युक्तः संधिं कृत्वा प्रयत्नतः । मित्रं हिरण्यं भूमिं वा संपश्यंस्त्रिविधं फलम् ॥२०६॥ पाष्णिग्राहं च संप्रेक्ष्य तथाक्रन्दं च मण्डले । मित्रादथाप्यमित्राद्वा यात्राफलमवाप्नुयात् ॥ २०७ ॥ हिरण्यभूमिसंप्राप्त्या पार्थिवो न तथैधते । यथा मित्रं ध्रुवं लब्ध्वा कृशमप्यायतिक्षमम् ॥ २०८॥ अथवा राजा मित्रता या कुछ द्रव्य या भूमि शत्रु से पाकर सुलह करके लौट आवे अर्थात् इन पदार्थों को देना शत्रु मंजूर करे तो लेकर सुलह कर ले। जो विजय करते हुए राजा के पीछे दूसरा राजा दबाकर चढ़ आवे उसको 'पाष्णिग्राह' कहते हैं और जो उसको इस काम से रोके उसे 'क्रन्द' कहते हैं। इन दोनों को देखकर, मित्र या अमित्र से यात्रा का फल ग्रहण करे । (ऐसा न करे जिसमें ये दोनों बिगड़ जावें) राजा सुवर्ण और भूमि को पाकर वैसा नहीं बढ़ता, जैसा दुर्बल भी स्थिर मित्र को पाकर बढ़ता है ॥२०६-२०८ ॥ धर्मज्ञं च कृतज्ञं च तुष्टप्रकृतिमेव च । अनुरक्तं स्थिरारम्भं लघुमित्रं प्रशस्यते ॥ २०६ ॥
सातवां अध्याय । २४३
सातवां अध्याय । २४३ प्राज्ञं कुलीनं शूरं च दक्षं दातारमेव च । कृतज्ञं धृतिमन्तं च कष्टमाहुररिं बुधाः ॥ २१० ॥ आर्यता पुरुषज्ञानं शौर्यं करुणवेदिता । स्थौललक्ष्यं च सततमुदासीनगुणोदयः ॥ २११ ॥ क्षेम्यां सस्यप्रदां नित्यं पशुवृद्धिकरीमपि । परित्यजेन्नृपो भूमिमात्मार्थमविचारयन् ॥ २१२ ॥ आपदर्थं धनं रक्षेद्दारान् रक्षेद्धनैरपि । आत्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि ॥ २१३ ॥ धर्मज्ञ, कृतज्ञ, प्रसन्नचित्त, प्रीति करनेवाला, स्थिर कार्य का आरम्भ करनेवाला, छोटा मित्र अच्छा होता है । बुद्धिमान्, कुलीन, शूर, चतुर, दाता, कृतज्ञ और धैर्यवान् शत्रु को लोग कठिन कहते हैं । सभ्यता, पुरुषों की पहिचान, शूरता, दयालुता और उदारता ये सब उदासीन राजा के गुण हैं । कल्याण करनेवाली, संपूर्ण धान्यों को देनेवाली और पशुवृद्धि करनेवाली भूमि को भी राजा अपने प्राणों की रक्षा के लिए विना विचार किये छोड़ देवे । आपत्ति दूर करने के लिए धन की करे, धन से स्त्रियों की रक्षा करे और धन, स्त्री से भी अपने शरीर की रक्षा करे ॥ २०६–२१३ ॥ । ॥ २२६ ॥ सह सर्वाः समुत्पन्नाः प्रसमीक्ष्यापदो ऽयां संहितायां संयुक्तांश्च वियुक्तांश्च सर्वोपायान्स्तृ ॥ उपेतारमुपेयं च सर्वोपायांश्च कृत्स्र अपना नित्यकर्म यथावत एतन्त्रयं समाश्रित्य प्रयतेतार्थसिद्ध संपूर्ण राजकार्यों का स्वयं होजाय तो अपने अधिका- एवं सर्वमिदं राजा सह संमन्त्र्य २५–२२६ ॥ व्यायाम्याप्लुत्यमध्याह्नेभोक्तुमन्तः पूरा हुआ।
२४४ , मनुस्मृति । तत्रात्मभूतैः कालज्ञैरहार्यैः परिचारकैः । सुपरीक्षितमन्नाद्यमद्यान्मन्त्रैर्विषापहैः ॥ २१७ ॥ विषघ्नैरुदकैश्चास्य सर्वद्रव्याणि योजयेत् । विषघ्नानि च रत्नानि नियतो धारयेत्सदा ॥ २१८ ॥ सब आपत्तियों को एक साथ आतीं देख पड़ें तो बुद्धिमान् राजा साम दान आदि उपायों को एक साथ वा अलग अलग काम में लावे । उपाय करनेवाले, उपाय के साधन योग्य और उपाय इन तीनों को ठीक ठीक आश्रय करके अर्थसिद्धि के लिए उपाय करे । उक्त प्रकार से संपूर्ण राजकार्यों का मन्त्रियों के साथ विचार करे । स्नान और व्यायाम (कसरत) करके दोपहर में भोजनार्थ अन्तःपुर में प्रवेश करे । वहां नम्र, भोजन- काल को जाननेवाला, शत्रु के बहकाने में न आनेवाला, रसोइयां के तैयार किये, परीक्षित और विषनिवारक मन्त्रों से शुद्ध भोजन को करे । राजा के सब खानेवाले पदार्थों में विषनाशक दवा डाले और विषनाशक रत्नों को राजा सदा धारण करे ॥ २१४–२१८॥ परीक्षिताभिः स्त्रीभिश्चैनं व्यजनोदकधूपनैः । तो लेषाभरणसंशुद्धाः स्पृशेयुः सुसमाहिताः ॥ २१९ ॥ राजा दबा उसको इस एवं कुर्वीत यानशय्यासनाशने । देखकर, मित्र या ने चैव सर्वालङ्कारकेषु च ॥ २२० ॥ करे जिसमें ये दोनों वेष-भूषणों से सजी धजी स्त्रियां, एकाग्रमन पाकर वैसा नहीं चढ़ धूप-गन्ध से राजा की सेवा करें । इसी भांति बढ़ता है ॥ २०६-२०८ या, आसन, भोजन, स्नान, उबटन और सब धर्मज्ञं च कृतज्ञं च क्षा आदि कर्म होना चाहिए ॥ २१९-२२० ॥ अनुरक्तं स्थिरारम्भं स्त्रीभिरन्तःपुरे सह । । पुनः कार्याणि चिन्तयेत् ॥ २२१ ॥
सातवां अध्याय। २४५
सातवां अध्याय। २४५ अलङ्कृतश्च संपश्येदायुधीयं पुनर्जनम् । वाहनानि च सर्वाणि शस्त्राण्याभरणानि च ॥२२२॥ सन्ध्यां चोपास्य शृणुयादन्तर्वेश्मनि शस्त्रभृत् । रहस्याख्यायिनां चैव प्रणिधीनां च चेष्टितम् ॥२२३॥ गत्वा कक्षान्तरं त्वन्यत्समनुज्ञाप्य तं जनम् । प्रविशेद्भोजनार्थं च स्त्रीवृतोऽन्तःपुरं पुनः ॥ २२४ ॥ भोजन करने के बाद, उसी अन्तःपुर में स्त्रियों के साथ कुछ देर टहले, फिर यथासमय अपने राजकाज का विचार करे। फिर शस्त्र, भूषणों से सजकर सवार, सिपाही, घोड़ा वगैरह अस्त्र और राजकीय आभूषणों की देखभाल करे। उसके अनन्तर सायंसंध्या करके, एकान्त में दूत और प्रतिनिधियों के समा- चार और कामों को सुने। उन लोगों को विदा करके दूसरे कमरे में जाकर स्त्रियों के साथ भोजनार्थ अन्तःपुर को गमन करे। वहां यथावत् भोजन करके थोड़ा गाना, बाजा से चित्त को प्रसन्न करके और समय पर निद्रा करे ॥ २२१—२२४ ॥ तत्र भुक्त्वा पुनः किंचित्तूर्यघोषैः प्रहर्षितः । संविशेत्तु यथाकालमुत्तिष्ठेच्च गतक्लमः ॥ २२५ ॥ एतद्विधानमातिष्ठेदरोगः पृथिवीपतिः । अस्वस्थः सर्वमेतत्तु भृत्येषु विनियोजयेत् ॥ २२६ ॥ इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां सप्तमोऽध्यायः ॥ प्रातःकाल कुछ सबेरे उठकर फिर अपना नित्यकर्म यथावत करे। इस प्रकार से नीरोग राजा संपूर्ण राज्यकार्यों का स्वयं संपादन करे। यदि शरीर में कोई क्लेश होजाय तो अपने अधिका- रियों से सब कामों को करावे ॥ २२५—२२६ ॥ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ।
२४६ मनुस्मृति । अथ अष्टमोऽध्यायः । ───────────── व्यवहारान् दिदृक्षुस्तु ब्राह्मणैः सह पार्थिवः । मन्त्रज्ञैर्मन्त्रिभिश्चैव विनीतः प्रविशेत् सभाम् ॥ १ ॥ तत्रासीनः स्थितो वापि पाणिमुद्यम्य दक्षिणम् । विनीतवेषाभरणः पश्येत्कार्याणि कार्यिणाम् ॥ २ ॥ प्रत्यहं देशदृष्टैश्च शास्त्रदृष्टैश्च हेतुभिः । अष्टादशसु मार्गेषु निबद्धानि पृथक् पृथक् ॥ ३ ॥ तेषामाद्यमृणादानं निक्षेपोऽस्वामि विक्रयः । संभूय च समुत्थानं दत्तस्यानपकर्म च ॥ ४ ॥ वेतनस्यैव चादानं संविदश्च व्यतिक्रमः । क्रयविक्रयानुशयो विवादः स्वामिपालयोः ॥ ५ ॥ सीमाविवादधर्मश्च पारुष्ये दण्डवाचिके । स्तेयं च साहसं चैव स्त्रीसंग्रहणमेव च ॥ ६ ॥ स्त्रीपुंधर्मो विभागश्च द्यूतमाह्वय एव च । पदान्यष्टादशैतानि व्यवहारस्थिताविह ॥ ७ ॥ आठवाँ अध्याय । व्यवहार-निर्णय—मुक़द्दमा आदि । राजा विद्वान् ब्राह्मण और राजनीति चतुर मन्त्रियों के साथ वादी और प्रतिवादियों के विचारार्थ नम्रता से राजसभा में प्रवेश करे । वहां जाकर, दाहना हाथ उठाकर, बैठकर या खड़ेही
आठवां अध्याय । २४७
आठवां अध्याय । २४७ (जैसा कार्य हो) करमवालों के कामों को देखे । और वंश, जाति आदि देशव्यवहार और शास्त्रोक्त साक्षी, शपथ आदि के अनुसार अठारह प्रकार के विवाद-झगड़ों का अलग अलग विचार-फैसला करे। उन अठारह विवादों का नाम इस प्रकार है— (१) ऋण लेकर न देना (२) धरोहर (३) दूसरे की वस्तु को बेचना (४) साझे का व्यापार (५) दान दिया हुआ लौटा लेना (६) नौकरी न देना (७) प्रतिज्ञा भंग करना (८) खरीद-बेंच का झगड़ा (६) पशु स्वामी और चरवाहे का झगड़ा (१०) सरहद की लड़ाई (११) बड़ी बात कहना (१२) मार पीट (१३) चोरी (१४) ज़ोर-जुलम (१५) पर स्त्री का ले लेना (१६) स्त्री और पुरुष के धर्म की व्यवस्था (१७) जुआखोरी.(१८) जानवरों की लड़ाई में हार जीत का दाँव करना। इस संसार में ये १८ दावा होने के कारण हैं॥१–७॥ एषु स्थानेषु भूयिष्ठं विवादं चरतां नृणाम् । धर्मं शाश्वतमाश्रित्य कुर्यात् कार्यविनिर्णयम् ॥ ८ ॥ यदा स्वयं न कुर्यात्तु नृपतिः कार्यदर्शनम् । तदा नियुञ्ज्याद्विद्वांसं ब्राह्मणं कार्यदर्शने ॥ ६ ॥ सोऽस्य कार्याणि संपश्येत् सभ्यैरेव त्रिभिर्वृतः । सभामेव प्रविश्याग्र्यामासीनः स्थित एव वा ॥ १० ॥ यस्मिन् देशे निषीदन्ति विप्रावेदविदस्त्रयः । राज्ञश्चाधिकृतो विद्वान् ब्रह्मणस्तां सभां विदुः ॥ ११ ॥ धर्मो विद्धस्त्वधर्मेण सभां यत्रोपतिष्ठते । शल्यं चास्य न कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासदः ॥ १२॥ सभां वा न प्रवेष्टव्यं वक्तव्यं वा समञ्जसम् । अब्रुवन् विब्रुवन् वापि नरो भवति किल्बिषी ॥ १३ ॥
२४८ मनुस्मृति । यत्र धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च । हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासदः ॥ १४ ॥ इन विषयों में झगड़ा करनेवालों का फ़ैसला राजा को सनातन- धर्म के अनुसार करना चाहिए। जब आप कारणवश न काम देख सके तो विद्वान् ब्राह्मण को सौंप देवे। वह ब्राह्मण तीन सभासदों के साथ सभा में बैठकर या खड़े ही राजा के खास कामों को देखे। जिस देश में वेदविशारद तीन ब्राह्मण राजसभा में निर्ण- यार्थ बैठते हैं और राजा का अधिकार पाया हुआ एक विद्वान् ब्राह्मण रहता है वह ब्रह्मा की सभा मानी जाती है। जिस सभा में धर्म, अधर्म से चौंका जाता है और उस चुभे काँटे को सभा- सद् धर्मशरीर से नहीं निकालते तो वे सभासद् पापभागी होते हैं। या तो सभा में न जाना, जाना तो सत्यवचन कहना। और जो जानकर भी कुछ न कहे या झूठ कहे तो वह पातकी होता है। जिस सभा में अधर्म से धर्म की और असत्य से सत्य की हत्या होती है उस सभा के सभासद् नष्ट होजाते हैं ॥ ८-१४ ॥ धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः । तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मानो धर्मो हतोऽवधीत् ॥ १५ ॥ वृषो हि भगवान् धर्मस्तस्य यः कुरुते ह्यलम् । वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद्धर्मं न लोपयेत् ॥ १६ ॥ एक एव सुहृद्धर्मो निधनेऽप्यनुयाति यः । शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यद्धि गच्छति ॥ १७ ॥ धर्म का लोप करदेने से वह उस पुरुष को नष्ट करदेता है और धर्म की रक्षा करने से वह भी रक्षा करता है। इसलिए धर्म का नाश न करना चाहिए जिसमें नष्ट धर्म हमारा नाश न करे। भगवान् धर्म को 'वृष' कहते हैं और जो उसका नाश करता है उसको देवता 'वृषल' कहते हैं। इस कारण मनुष्य को धर्म
आठवां अध्याय। २४६
आठवां अध्याय। २४६ का लोप न करना चाहिए । मृत्युसमय में भी एकमात्र मित्र धर्म ही पीछे चलता है और सब शरीर के साथ ही नाश को प्राप्त होजाता है ॥ १५-१७ ॥ पादोऽधर्मस्य कर्तारं पादः साक्षिणमृच्छति । पादः सभासदः सर्वान् पादो राजानमृच्छति ॥ १८ ॥ राजा भवत्यनेनास्तु मुच्यन्ते च सभासदः । एनो गच्छति कर्तारं निन्दार्हो यत्र निन्यते ॥ १९ ॥ जातिमात्रोपजीवी वा कामं स्याद् ब्राह्मणब्रुवः । धर्मप्रवक्ता नृपतेर्न तु शूद्रः कथञ्चन ॥ २० ॥ यस्य शूद्रस्तु कुरुते राज्ञो धर्मविवेचनम् । तस्य सीदति तद्राष्ट्रं पङ्के गौरिव पश्यतः ॥ २१ ॥ यद्राष्ट्रं शूद्रभूयिष्ठं नास्तिकाक्रान्तमद्विजम् । विनश्यत्याशु तत्कृत्स्नं दुर्भिक्षव्याधिपीडितम् ॥ २२॥ न्याय करते समय उसका एक चौथाई अधर्म अन्याय करने वाले को, एक चौथाई झूठे गवाह को, एक चौथाई सभासद् और एक चौथाई राजा को अधर्म लगता है। जिस सभा में अन्यायी पुरुष की ठीक ठीक निन्दा कीजाती है, वहां राजा और सभा- सद् दोष से छूट जाते हैं। और उस अधर्मी को ही पाप लगता है। जिसकी जातिमात्र से जीविका है कुछ विद्या, योग्यता से नहीं वही चाहे न्यायकर्ता नियुक्त किया जाय, पर शूद्र को कभी अधिकार न देवे । जिस राजा का न्यायाधीश शूद्र होता है उसका राज्य कीचड़ में गौ की भांति फँसकर पीड़ा पाता है। जिस राज्य में शूद्र और नास्तिक, अधिक हों, द्विज न हों वह सम्पूर्ण राज्य दुर्भिक्ष और व्याधि से पीड़ित होकर शीघ्रही नष्ट होजाता है ॥ १८-२२ ॥ ३२
२५० मनुस्मृति । धर्मासनमधिष्ठाय संवीताङ्गः समाहितः । प्रणम्य लोकपालेभ्यः कार्यदर्शनमारभेत् ॥ २३ ॥ अर्थानर्थावुभौ बुद्ध्वा धर्माधर्मौ च केवलौ । वर्णक्रमेण सर्वाणि पश्येत्कार्याणि कार्यिणाम् ॥ २४ ॥ बाह्यैर्विभावयेल्लिङ्गैर्भावमन्तर्गतं नृणाम् । स्वरवर्णेङ्गिताकारैश्चक्षुषा चेष्टितेन च ॥ २५ ॥ आकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषितेन च । नेत्रवक्त्रविकारैश्च गृह्यतेऽन्तर्गतं मनः ॥ २६ ॥ राजा न्यायासन पर वस्त्र वगैरह पहन कर बैठे और आठ लोकपालों को प्रणाम करके सावधानी से विचारकार्य का आरम्भ करे। प्रजा की लाभ और हानि को, धर्म और अधर्म को सोचकर वादियों के दावों को ब्राह्मणादि वर्ण के क्रम से देखना शुरू करे। मनुष्यों के बाहरी लक्षण, स्वर (आवाज़) शरीर का वर्ण, नीचे ऊपर देखना, आकार रोमांच होना आदि, आँख, हाथ, पैर की चेष्टा वगैरह से भीतरी हाल पहचानना। आकार, नीचे ऊपर देखना, गति, चेष्टा, बोली, आँख, मुँह के विकार से मन का भाव जाना जाता है ॥ २३-२६ ॥ बालदायादिकं रिक्थं तावद्राजानुपालयेत् । यावत्स स्यात्समावृत्तो यावच्चातीतशैशवः ॥ २७ ॥ वशाऽपुत्रासु चैव स्याद्रक्षणं निष्कुलासु च । पतिव्रतासु च स्त्रीषु विधवास्वातुरासु च ॥ २८ ॥ जीवन्तीनां तु तासां ये तद्धरेयुः स्वबान्धवाः । ताञ्छिष्याच्चौरदण्डेन धार्मिकः पृथिवीपतिः ॥ २६ ॥