भारतकोश
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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

२१४ मनुस्मृति । शिक्षित राजा भी ऐसे योग्य ब्राह्मणों से नित्य विनय सीखे । क्योंकि विनीत राजाको कभी हानि नहीं पहुँचती । बहुत से राजा अविनय से धन सम्पत्ति सहित नष्ट होगये और बहुत से जङ्गल में रहकर भी अपने विनय से राज्य पागए हैं । राजा वेन, नहुष, सुदास, यवन, सुमुख और निमि अपने अविनय-दुराचार से नष्ट होगये । पृथु और मनुने विनय से राज्य पाया। कुवेर ने धनाधिपत्य और विश्वामित्र ने ब्राह्मण्य को पाया ॥ ३६-४२ ॥ त्रैविद्येभ्यस्त्रयीं विद्यां दण्डनीतिं च शाश्वतीम् । आन्वीक्षिकीं चात्मविद्यां वार्तारम्भांश्च लोकतः ॥ ४३ ॥ इन्द्रियाणां जये योगं समातिष्ठेदिवानिशम् । जितेन्द्रियो हि शक्नोति वशे स्थापयितुं प्रजाः ॥ ४४ ॥ दशकामसमुत्थानि तथाष्टौ क्रोधजानि च । व्यसनानि दुरन्तानि प्रयत्नेन विवर्जयेत् ॥ ४५ ॥ कामजेषु प्रसक्तो हि व्यसनेषु महीपतिः । वियुज्यन्तेऽर्थधर्माभ्यां क्रोधजेष्वात्मनैव तु ॥ ४६ ॥ वेदज्ञों से वेद, दण्डनीति, ब्रह्मविद्या को पढ़े । और अर्थशास्त्र वगैरह व्यवहार विद्या को पढ़े । इन्द्रियों को वश में रखने का सदा उद्योग करे क्योंकि जितेन्द्रिय राजा ही प्रजा को वश में रख सकता है । काम से पैदाहुए दश और क्रोध से पैदाहुए आठ व्यसनों का कोई अन्त नहीं है इनसे राजा को यत्नपूर्वक बचना चाहिए । काम से पैदा व्यसनों में आसक्त राजा अर्थ और धर्म से हीन होजाता है और क्रोध से पैदाहुए व्यसनों में लग जाने से अपने शरीर से ही नष्ट होजाता है ॥ ४३-४६ ॥ मृगयाक्षो दिवास्वप्नः परीवादः स्त्रियो दमः । तौर्यत्रिकं वृथाट्या च कामजो दशको गणः ॥ ४७ ॥

सातवां अध्याय। २१५

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पैशुन्यं साहसं द्रोहं ईर्ष्यासूयार्थदूषणम् । वाग्दण्डजं च पारुष्यं क्रोधजोऽपि गणोऽष्टकः॥ ४८ ॥ द्वयोरप्येतयोर्मूलं यं सर्वे कवयो विदुः । तं यत्नेन जयेल्लोभं तज्जावेतावुभौ गणौ ॥ ४६ ॥ पानमक्षास्त्रियश्चैव मृगया च यथाक्रमम् । एतत्कष्टतमं विद्याच्चतुष्कं कामजे गणे ॥ ५० ॥ दण्डस्य पातनं चैव वाक्पारुष्यार्थदूषणे । क्रोधजेऽपि गणे विद्यात्कष्टमेतत्त्रिकं सदा ॥ ५१ ॥ शिकार, जुआ, दिन में सोना, दूसरे के दोषों को कहना, स्त्री- संभोग, मद्यपान, नाच, बाजा और व्यर्थ घूमना ये दश कामके व्यसन हैं अर्थात् काम से पैदा हुए हैं। चुगली, साहस, द्रोह, ईर्षा, दूसरे के गुणों में दोष लगाना, द्रव्य हरलेना, गाली देना, कठोरपन ये आठ क्रोध से उत्पन्न व्यसन हैं। विद्वान् लोग इन दोनों प्रकार के दोषों का कारण लोभ कहते हैं, इसलिए लोभ को अवश्य छोड़ देना चा- हिए । काम से पैदा व्यसनों में मद्यपान, जुआ, स्त्रीसंग और शिकार ये एक से एक बढ़कर दुःखदायी हैं । और क्रोध से पैदा व्यसनों में मारपीट, कठोर वचन, दूसरे की धनहानि करना ये तीन बड़े दुःखदायी हैं ॥ ४७-५१ ॥ सप्तकस्यास्य वर्गस्य सर्वत्रैवानुषङ्गिणः । पूर्वं पूर्वं गुरुतरं विद्याद्व्यसनमात्मवान् ॥ ५२ ॥ व्यसनस्य च मृत्योश्च व्यसनं कष्टमुच्यते । व्यसन्यधोऽधो व्रजति स्वर्यात्यव्यसनी मृतः ॥ ५३ ॥ मौलाञ्छास्त्रविदः शूराल्लब्धलक्षान्कुलोद्गतान् । सचिवान्सप्त चाष्टौ वा प्रकुर्वीत परीक्षितान् ॥ ५४ ॥

२१६ मनुस्मृति। इस प्रकार ये सात व्यसन और इनके सम्बन्धवाले व्यसनों में एक से दूसरा अधिक कष्टदायक है । मृत्यु से व्यसन अधिक कष्टदायक माना जाता है। व्यसनी पुरुष मरकर नरक में पड़ता है और जो व्यसन से दूर है, वह स्वर्गगामी होता है । परंपरा से राजसेवक, नीतिविद्या में चतुर, शूरवीर, अच्छा निशाना लगाने वाले, कुलीन और असमय में परीक्षित, सात या आठ मुख्य राजमंत्री रखना चाहिए ॥ ५२-५४ ॥ अपि यत्सुकरं कर्म तदप्येकेन दुष्करम् । विशेषतोऽसहायेन किन्तु राज्यं महोदयम् ॥ ५५ ॥ तैः सार्धं चिन्तयेन्नित्यं सामान्यं संधिविग्रहम् । स्थानं समुदयं गुप्तिं लब्धप्रशमनानि च ॥ ५६ ॥ तेषां स्वं स्वमभिप्रायमुपलभ्य पृथक् पृथक् । समस्तानां च कार्येषु विदध्याद्धितमात्मनः ॥ ५७ ॥ सर्वेषां तु विशिष्टेन ब्राह्मणेन विपश्चिता । मन्त्रयेत्परमं मन्त्रं राजा षाड्गुण्यसंयुतम् ॥ ५८ ॥ नित्यं तस्मिन् समाश्वस्तः सर्वकार्याणि निःक्षिपेत् । तेन सार्धं विनिश्चित्य ततः कर्म समारभेत् ॥ ५६ ॥ अन्यानपि प्रकुर्वीत शुचीन् प्राज्ञानवस्थितान् । सम्यगर्थसमाहर्तॄनमात्यान्सुपरीक्षितान् ॥ ६० ॥ जबकि गृहस्थ का एक छोटासा भी काम एक पुरुष को करना क- ठिन पड़ता है तब बड़ा भारी राजकार्य बिना सहाय अकेला राजा कैसे कर सकता है ? उन मन्त्रियों के साथ साधारण संधि-विग्रह की सलाह और दण्ड, पुर, राष्ट्र, स्थान आदि का विचार करे । द्रव्य मिलने के उपाय, धनरक्षा, देशरक्षा आदि का भी परामर्श करे । उन मन्त्रियों की अलग अलग सलाह लेकर जो अपना हित-

सातवां अध्याय । २१७

सातवां अध्याय । २१७ कर कार्य हो वह करे । उन मन्त्रियों में विद्वान्, धार्मिक ब्राह्मण मन्त्री के साथ संधि, विग्रह, आदि छ गुणोंवाला विचार करे। विश्वास के साथ उस मंत्रीपर, सब कामों का भार रक्खे और उसके साथ सम्मति लेकर कार्य करे । पवित्र, बुद्धिमान्, स्थिर- स्वभाव, संन्मार्ग से धन लानेवाले, परीक्षा किये हुए और भी मन्त्रियों को रक्खे ॥ ५५-६० ॥ निवर्तेतास्य यावद्भिरिति कर्तव्यता नृभिः । तावतोऽतन्द्रितान् दक्षान् प्रकुर्वीत विचक्षणान् ॥ ६१ ॥ तेषामर्थे नियुञ्जीत शूरान् दक्षान् कुलोद्गतान् । शुचीनाकरकर्मान्ते भीरूनन्तर्निवेशने ॥ ६२ ॥ जितने मनुष्यों से पूरा काम निकले, उतने निरालस बुद्धिमान् राजकर्मचारियों की भरती करे । उनमें शूर, चतुर, कुलीन को खज़ाने के काम में नियुक्त करे, और डरपोकों को महलों के भीतर नियुक्त करे ॥ ६१-६२ ॥ दूतं चैव प्रकुर्वीत सर्वशास्त्रविशारदम् । इङ्गिताकारचेष्टज्ञं शुचिं दक्षं कुलोद्गतम् ॥ ६३ ॥ अनुरक्तः शुचिर्दक्षः स्मृतिमान् देशकालवित् । वपुष्मान् वीतभीर्वाग्मी दूतो राज्ञः प्रशस्यते ॥ ६४ ॥ अमात्ये दण्ड आयत्तो दण्डे वैनयिकी क्रिया । नृपतौ कोशराष्ट्रे च दूते संधिविपर्ययौ ॥ ६५ ॥ दूत एव हि संधत्ते भिनत्त्येव च संहतान् । दूतस्तत्कुरुते कर्म भिद्यन्ते येन मानवाः ॥ ६६ ॥ स विद्यादस्य कृत्येषु निगूढेङ्गितचेष्टितैः । २८

२१८ मनुस्मृति। आकारमिङ्गितं चेष्टां भृत्येषु च चिकीर्षितम् ॥ ६७॥ बुद्ध्वा च सर्वं तत्त्वेन परराजचिकीर्षितम् । तथा प्रयत्नमातिष्ठेद्यथात्मानं न पीडयेत् ॥ ६८ ॥ और दूत उसको रक्खे जो बहुश्रुत हो और हृदय के भाव, आ- कार, चेष्टाओं को जानने वाला, अन्तःकरण का शुद्ध, चतुर और कुलीन हो। शत्रु का भी प्रेमपात्र, आचारपवित्र, कार्यकुशल, पूर्वापर बातों का स्मरण रखनेवाला, देश-कालज्ञाता, सुन्दर, निर्भय और वाचाल राजा का दूत प्रशंसा के लायक होता है। मन्त्री के अधीन दण्ड और दण्ड के अधीन शिक्षा है। राजा के अधीन देश और खज़ाना है और दूत के अधीन मेल या बिगाड़ रहता है। दूत ही आपस के शत्रुओं को मिलाता है और मिले हुए को अलग़ाता है। दूत वह काम करता है जिससे मनुष्य लड़कर जुदा होजाते हैं। दूत शत्रु के आकार, मनोभाव, और चेष्टाओं से उस के लिये अभिप्राय को जाने। दूत द्वारा शत्रु की सब चालों को ठीक ठीक जानकर, राजा ऐसा उपाय करे, जिससे वह शत्रु राजा कोई पीड़ा न देसके ॥ ६३-६८ ॥ जाङ्गलं सस्यसम्पन्नमार्यप्रायमनाविलम् । रम्यमानतसामन्तं स्वाजीव्यं देशमावसेत् ॥ ६६ ॥ धन्वदुर्गं महीदुर्गमब्दुर्गं वार्क्षमेव वा । नृदुर्गं गिरिदुर्गं वा समाश्रित्य वसेत् पुरम् ॥ ७० ॥ जहां जङ्गल हो, खेती अच्छी हो, शिष्ट पुरुष बसते हों, रोगादि उपद्रवों से रहित हो, देखने में सुन्दर हो, आसपास के मनुष्य अदब रखते हों, ऐसे स्वाधीन देश में राजा को रहना चाहिए। धनुदुर्ग, महीदुर्ग, जलदुर्ग, वृक्षदुर्ग, सेनादुर्ग वा गिरिदुर्ग इन दुर्ग- क़िलाओं में किसीके आश्रय में नगर वसाना चाहिए ॥ ६६-७० ॥ सर्वेण तु प्रयत्नेन गिरिदुर्गं समाश्रयेत् ।

सातवां अध्याय। २१६

सातवां अध्याय। २१६ एषां हि बाहुगुण्येन गिरिदुर्गं विशिष्यते ॥ ७१ ॥ त्रीण्याद्यान्याश्रितास्तेषां मृगगर्ताश्रयाप्‌चराः । त्रीण्युत्तराणि क्रमशः प्लवङ्गमनरामराः ॥ ७२ ॥ यथा दुर्गाश्रितानेतान्नोपहिंसन्ति शत्रवः । तथारयो न हिंसन्ति नृपं दुर्गसमाश्रितम् ॥ ७३ ॥ एकः शतं योधयति प्राकारस्थो धनुर्धरः । शतं दशसहस्राणि तस्माद्दुर्गं विधीयते ॥ ७४ ॥ तत्स्यादायुधसंपन्नं धनधान्येन वाहनैः । ब्राह्मणैः शिल्पिभिर्यन्त्रैर्यवसेनोदकेन च ॥ ७५ ॥ तस्य मध्ये सुपर्याप्तं कारयेद्गृहमात्मनः । गुप्तं सर्वर्तुकं शुभ्रं जलवृक्षसमन्वितम् ॥ ७६ ॥ इन दुर्गों में गिरिदुर्ग श्रेष्ठ है। इसलिए सब यत्नों से उसका आश्रय ठीक है। उक्त दुर्गों में प्रथम तीन में क्रम से मृग, चूहा और नाक रहते हैं। बाक़ी तीनों में वानर, मनुष्य और देवता निवास करते हैं। जैसे इन दुर्गों में रहनेवाले मृगादि को कोई हिंसक नहीं मार सकते, ऐसे ही गिरिदुर्ग का आश्रय करनेवाले राजा को शत्रु नहीं मार सकते हैं। क़िले के भीतर रहनेवाला एक धनुर्धर सौ योद्धाओं से लड़ सकता है और सौ धनुर्धर दश हज़ार के साथ लड़ सकते हैं। इसीसे क़िला बनाया जाता है। वह क़िला हथियार, धन, धान्य, वाहन, ब्राह्मण, शिल्पविशारद, यन्त्र-कल, घास और जल से परिपूर्ण रक्खे। उस क़िले के बीच में, प्रयोजन भर के लिए एक मकान बनावे, जो सब ऋतुओं के फल-पुष्प युक्त, सफ़ेदी किया हुआ, जल और वृक्षों के सहित हो ॥ ७१-७६ ॥ तदध्यास्योद्वहेद्भार्यां सवर्णां लक्षणान्विताम् ।

२२० मनुस्मृति । कुले महति संभूतां हृद्यां रूपगुणान्विताम् ॥ ७७ ॥ पुरोहितं च कुर्वीत वृणुयादेव चर्त्विजम् । तेऽस्य गृह्याणि कर्माणि कुर्युर्वैतानिकानि च ॥ ७८ ॥ उस मकान-महल में रहकर राजा, अपने वर्ण की, कुलीन मनो- हारिणी, रूपवती, गुणवती कन्या का विवाह करे। और शान्तिक, पौष्टिक कर्म करनेवाला पुरोहित और ऋत्विज का वरण करे जो अग्निहोत्रादि कर्म करें ॥ ७७-७८ ॥ यजेत राजा क्रतुभिर्विविधैराप्तदक्षिणैः । धर्मार्थं चैव विप्रेभ्यो दद्याद्भोगान् धनानि च ॥ ७९ ॥ सांवत्सरिकमाप्तैश्च राष्ट्रादाहारयेद्बलिम् । स्याच्चाम्नायपरो लोके वर्तेत पितृवन्नृषु ॥ ८० ॥ अध्यक्षान् विविधान्कुर्यात्तत्र तत्र विपश्चितः । तेऽस्य सर्वाण्यवेक्षेरन्नृणां कार्याणि कुर्वताम् ॥ ८१ ॥ आवृत्तानां गुरुकुलाद्विप्राणां पूजको भवेत् । नृपाणामक्षयो ह्येष निधिर्ब्राह्मोऽभिधीयते ॥ ८२ ॥ न तं स्तेना न चामित्रा हरन्ति न च नश्यति । तस्माद्राज्ञा निधातव्यो ब्राह्मणेष्वक्षयो निधिः ॥ ८३ ॥ राजा, बहुत दक्षिणावाले अनेक यज्ञों को करे और धर्म के लिए ब्राह्मणों को नाना विधि दान-दक्षिणा देवै । किसी विश्वासपात्र मनुष्य के द्वारा साल में राजकर का संग्रह करावे, प्रजा में नीति से बर्ताव करे और पिता के समान स्नेह करे। नाना प्रकार के कामों को जानने वाले पुरुष, अलग अलग कामों पर अध्यक्ष-अफ़सर नियुक्त करे। जो राजा के सब कार्यकर्त्ताओं पर निगरानी रक्खें।

सातवां अध्याय। २२१

सातवां अध्याय। २२१ गुरुकुल से विद्या पढ़कर लौटे हुए ब्राह्मणों का पूजन करे, क्योंकि इससे राजाओं को अक्षय ब्रह्म प्राप्ति होती है ॥ ७६-८३ ॥ न स्कन्दते न व्यथते न विनश्यति कर्हिचित् । वरिष्ठमग्निहोत्रेभ्यो ब्राह्मणस्य मुखे हुतम् ॥ ८४ ॥ समसब्राह्मणे दानं द्विगुणं ब्राह्मणब्रुवे । प्राधीते शतसाहस्रमनन्तं वेदपारगे ॥ ८५ ॥ पात्रस्य हि विशेषेण श्रद्धानतयैव च । अल्पं वा बहु वा प्रेक्ष्य दानस्यावाप्यते फलम् ॥ ८६ ॥ इस अक्षय निधि को चोर नहीं चुराते, शत्रु नहीं छीन सकते। खोया नहीं जासकता ! इसलिए राजा, ब्राह्मणों में उस अक्षयनिधि का स्थापन करे। अग्नि में जो हवन किया जाता है वह कभी गिर जाता है, कभी सूख जाता है, कभी नष्ट होजाता है; पर गुरु- कुल से आये ब्राह्मण के मुख में जो हवन किया जाता है वह अग्नि- होत्रादि से भी श्रेष्ठ है। ब्राह्मण के सिवा दूसरी जाति को दिया दान, मध्यम फलदायक होता है। जो अपने को ब्राह्मण कहता है उसको दिया दान दोगुना फल, पठित ब्राह्मण को दिया लाखगुना, और वेदविशारद ब्राह्मण को दिया दान अनन्त फलदायक होता है। पात्र की योग्यता और श्रद्धा की न्यूनाधिकता के अनुसार दाता को दान का फल मिलता है ॥ ८४-८६ ॥ समोत्तमाधमै राजा त्वाहूतः पालयन् प्रजाः । न निवर्तेत संग्रामात्क्षात्रं धर्ममनुस्मरन् ॥ ८७ ॥ संग्रामेष्वनिवर्तित्वं प्रजानां चैव पालनम् । शुश्रूषा ब्राह्मणानां च राज्ञां श्रेयस्करं परम् ॥ ८८ ॥ आहवेषु मिथोऽन्योन्यं जिघांसन्तो महीक्षितः ।

२२२ मनुस्मृति । युध्यमानाः परं शक्त्या स्वर्गं यान्त्यपराङ्मुखाः ॥ ८९ ॥ न कूटैरायुधैर्हन्याद्युध्यमानो रणे रिपून् । न कर्णिभिर्नापि दिग्धैर्नाग्निज्वलिततेजनैः ॥ ९० ॥ न च हन्यात्स्थलारूढं न क्लीबं न कृताञ्जलिम् । न मुक्तकेशं नासीनं न तवास्मीति वादिनम् ॥ ९१ ॥ न सुप्तं न विसन्नाहं न नग्नं न निरायुधम् । नायुध्यमानं पश्यन्तं न परेण समागतम् ॥ ९२ ॥ अपने समान, उत्तम, या अधम राजा यदि रण-निमन्त्रण देवे तो क्षत्रियधर्म के अनुसार राजा को पीछे पैर न रखना चाहिए । संग्राम से न हटना, प्रजापालन, ब्राह्मणों की सेवा ये सब राजाओं का परम कल्याण करनेवाला है। जो राजा संग्राम में आपस में खूब युद्ध करते हैं, वे स्वर्ग को जाते हैं। रण में, कूट-छिपे अस्त्रों से, कर्णी बाण जो चुभ जानेपर नहीं निकलता, ज़हर के बुझे और आग के जले अस्त्रों से शत्रु को न मारे। ज़मीन में खड़े हुए शत्रु को, नपुंसक को, हाथ जोड़ने वाले को न मारे । खुले बालोंवाले को, बैठे को, और जो कहे-' मैं तुम्हारा हूं' उसको न मारे । सोते हुए को, टूटे कवचवाले को, नंगे को, शस्त्रहीन को, युद्ध न करनेवाले को, संग्राम देखते हुए को और दूसरे शत्रु से लड़ते हुए को न मारे ॥ ८७-९२ ॥ नायुधव्यसनप्राप्तं नार्तं नातिपरिक्षतम् । न भीतं न परावृत्तं सतां धर्ममनुस्मरन् ॥ ९३ ॥ यस्तु भीतः परावृत्तः संग्रामे हन्यते परैः । भर्तुर्यद्दुष्कृतं किञ्चित्तत्सर्वं प्रतिपद्यते ॥ ९४ ॥ टूटे शस्त्रवाले को, पुत्रादि शोक से दुःखी को, बहुत घाववाले को डरपोक को, भागनेवाले को भी न मारना । जो युद्ध से डरकर

सातवां अध्याय । २२३

सातवां अध्याय । २२३ पीछे भगता है और शत्रु उसको मार डालते हैं, वह अपने राजा का सब पाप पाता है ॥ ९३-९४ ॥ यच्चास्य सुकृतं किंचिदमुत्रार्थमुपार्जितम् । भर्त्ता तत्सर्वमादत्ते परावृत्तहतस्य तु ॥ ९५ ॥ रथाश्वं हस्तिनं छत्रं धनं धान्यं पशून् स्त्रियः । सर्वद्रव्याणि कुप्यं च यो यज्जयति तस्य तत् ॥ ९६ ॥ राज्ञश्च दद्युरुद्धारमित्येषा वैदिकी श्रुतिः । राज्ञा च सर्वयोधेभ्यो दातव्यमपृथग्जितम् ॥ ९७ ॥ एषोऽनुपस्कृतः प्रोक्तो योधधर्मः सनातनः । अस्माद्धर्मान्न च्यवेत क्षत्रियो घ्नन् रणे रिपून् ॥ ९८ ॥ जो लड़ाई से भगा हुआ मारा जाता है, उसके पुण्य का भाग सब स्वामी को मिलता है । युद्ध में रथ, घोड़ा, हाथी, छत्र, धन, धान्य, पशु, स्त्री और सब भांति के पदार्थ जो जिसको जीते, वह उसका है । जीते पदार्थों में सोना, चांदी आदि उत्तम पदार्थ राजा को अर्पण करे-ऐसी वेद की श्रुति है । और साथ में जीती वस्तु, हिस्सा माफ़िक, राजा सब योद्धाओं को बांट देवे । यह सनातन, अनिन्दित, शुद्ध योद्धाओं का धर्म कहा गया है । संग्राम में क्षत्रिय को इन धर्मों से च्युत न होना चाहिए ॥ ९५-९८ ॥ अलब्धं चैव लिप्सेत लब्धं रक्षेत्प्रयत्नतः । रक्षितं वर्धयेच्चैव वृद्धं पात्रेषु निःक्षिपेत् ॥ ९९ ॥ एतच्चतुर्विधं विद्यात्पुरुषार्थप्रयोजनम् । अस्य नित्यमनुष्ठानं सम्यक्कुर्यादतन्द्रितः ॥ १०० ॥ अलब्धमिच्छेदण्डेन लब्धं रक्षेद्दवेक्षया ।

२२४ · मनुस्मृति । रक्षितं वर्धयेद्वृद्ध्या वृद्धं दानेन निक्षिपेत् ॥ १०१ ॥ नित्यमुद्यतदण्डः स्यान्नित्यं विवृतपौरुषः । नित्यं संवृतसर्वार्थो नित्यं छिद्रानुसार्थरेः ॥ १०२ ॥ जो पदार्थ नहीं मिला है उसके लेने की इच्छा, मिले हुए की रक्षा करे। जो रक्षित है, उसको बढ़ावे और बढ़े पदार्थ सुपात्रों को देवे । यह चार प्रकार का पुरुषार्थ है । आलस्य छोड़ कर, नित्य भली भांति इसका अनुष्ठान किया करे । जो नहीं प्राप्त है, उसको दण्ड- सेना से जीतने की इच्छा करे, प्राप्त वस्तु की देख भाल से रक्षा करे, रक्षित का व्यापार-उद्यम से वृद्धि करे और बढ़ी वस्तु शास्त्रा- नुसार, सुपात्र को देवे । राजा अपराधियों के लिए दण्ड उद्यत रक्खे, पुरुषार्थ को ठीक रक्खे, अपने अर्थों को गुप्त रक्खे और शत्रु के छिद्रों को देखा करे ॥ ६६-१०२ ॥ नित्यमुद्यतदण्डस्य कृत्स्नमुद्विजते जगत् । तस्मात्सर्वाणि भूतानि दण्डेनैव प्रसाधयेत् ॥ १०३ ॥ अमाययैव वर्तेत न कथंचन मायया । बुध्येतारिप्रयुक्तां च मायां नित्यं स्वसंवृतः ॥ १०४ ॥ नास्यच्छिद्रं परो विद्याद्विद्याच्छिद्रं परस्य तु । गूहेत्कूर्म इवाङ्गानि रक्षेद्विवरमात्मनः ॥ १०५ ॥ बकवच्चिन्तयेदर्थान् सिंहवच्च पराक्रमेत् । वृकवच्चावलुम्पेत शशवच्च विनिष्पतेत् ॥ १०६ ॥ सदा उद्यत दण्डवाले राजा से, सारा जगत् डरता है । इसलिए दण्ड ही से सब प्राणियों को स्वाधीन रक्खे। छल से कोई व्यवहार न करे । अपनी रक्षा करता रहे और शत्रु के छलों को जानता रहे । ऐसा उपाय करे जिसमें अपना छिद्र-दोष शत्रु न जाने । परन्तु शत्रु

के छिद्रों को खुद जाने । राजा, कछुवे के समान राजकीय अङ्गों को छिपा रक्खे, जिससे अपना छिद्र न ज़ाहिर होवे। बगला की भांति एकचित्त होकर, राजकार्यों का विचार करे। सिंह के समान शत्रुओं से पराक्रम रक्खे, भेड़िये के समान मौक़ा पाकर शत्रुक्षय करे। और खरगोश के समान, आपत्तियों से भग जावे ॥ १०३-१०६॥ एवं विजयमानस्य येऽस्य स्युः परिपन्थिनः । तानानयेद्वशं सर्वान्सामदिभिरुपक्रमैः ॥ १०७ ॥ यदि ते तु न तिष्ठेयुरुपायैः प्रथमैनिभिः । दण्डेनैव प्रसह्यैतांञ्छनकैर्वशमानयेत् ॥ १०८ ॥ सामादीनामुपायानां चतुर्णामपि पण्डिताः । सामदण्डौ प्रशंसन्ति नित्यं राष्ट्राभिवृद्धये ॥ १०६ ॥ यथोद्धरति निर्दाता कक्षं धान्यं च रक्षति । तथा रक्षेन्नृपो राष्ट्रं हन्याच्च परिपन्थिनः ॥ ११० ॥ इस प्रकार विजय करनेवाले राजा के जो शत्रु हों उनको साम- दाम-भेद से अपने वश में करे। यदि पहले तीन उपायों से शत्रु वश में न हो तो, उनको दण्ड द्वारा, धीरे धीरे अधीन करे। विचार- वान् पुरुष साम, दाम, भेद, दण्ड इन चार उपायों में, राज्यवृद्धि के लिए साम और दण्ड की प्रशंसा करते हैं। जैसे खेत निराने वाला घास उखाड़ कर अन्न की रक्षा करता है, वैसे, राजा चोर, लुटेरों का नाश करे, राष्ट्र की रक्षा करे ॥ १०७-११० ॥ मोहाद्राजा स्वराष्ट्रं यः कर्षयत्यनवेक्षया । सोऽचिराद्भ्रश्यते राज्याज्जीविताच्च सबान्धवः॥१११॥ शरीरकर्षणात्प्राणाः क्षीयन्ते प्राणिनां यथा । तथा राज्ञामपि प्राणाः क्षीयन्ते राष्ट्रकर्षणात् ॥११२॥ २६

२२६ । मनुस्मृति । राष्ट्रस्य संग्रहे नित्यं विधानमिदमाचरेत् । सुसंगहीतराष्ट्रो हि पार्थिवः सुखमेधते ॥ ११३ ॥ जो राजा, अज्ञानवश बिना विचार, अपने राज्य को दुःख देता है वह शीघ्र ही राज्य, जीवन और बान्धवों से भ्रष्ट होजाता है। जैसे शरीर के शोषण से प्राणियों के प्राण घटते हैं, वैसे, राष्ट्र को दुःख देने से, राजाओं के भी प्राण घटते हैं। राजा देश की रक्षा के लिए, ऊपर कहे उपायों को करे क्योंकि-राज्यरक्षा से राजा की सुखवृद्धि होती है ॥ १११-११३ ॥ द्वयोस्त्रयाणां पञ्चानां मध्ये गुल्ममधिष्ठितम् । तथा ग्रामशतानां च कुर्याद्राष्ट्रस्य संग्रहम् ॥ ११४ ॥ ग्रामस्याधिपतिं कुर्याद्दशग्रामपतिं तथा । विंशतीशं शतेशं च सहस्रपतिमेव च ॥ ११५ ॥ ग्रामदोषान् समुत्पन्नान् ग्रामिकः शनकैः स्वयम् । शंसेद्ग्रामदशेशाय दशेशो विंशतीशिने ॥ ११६ ॥ विंशतीशस्तु तत्सर्वं शतेशाय निवेदयेत् । शंसेद्ग्रामशतेशस्तु सहस्रपतये स्वयम् ॥ ११७॥ यानि राजप्रदेयानि प्रत्यहं ग्रामवासिभिः । अन्नपानेन्धनादीनि ग्रामिकस्तान्यवाप्नुयात् ॥ ११८॥ दो, तीन, पांच या सौ ग्रामों के बीच में, रक्षा करनेवाले पुरुषों का एक महकमा क़ायम करे। एक गाँव का, दश का, बीस का, सौ का और हज़ार गांव का एक-एक अधिपति नियत करे। गाँव का मालिक गाँव के बखेड़ों को धीरे से जानकर उसका फ़ैसला करदे, या दश गाँव के मालिक को सूचित करदे, या वह बीस गाँव के मालिक को इत्तला करदे इत्यादि। जो अन्न, ईंधन वगैरह राजा को देनेवाले

सातवां अध्याय । २२७

सातवां अध्याय । २२७ पदार्थ हैं उनको वहां नियुक्त राजपुरुष ग्रहण करे । अर्थात् सब वस्तुओं का संग्रह करके राजस्थान को पहुँचाया करे ॥ ११४-११८॥ दशी कुलं तु भुञ्जीत विंशी पञ्चकुलानि च । ग्रामं ग्रामशताध्यक्षः सहस्राधिपतिःपुरम् ॥ ११९ ॥ तेषां ग्राम्याणि कार्याणि पृथक्कार्याणि चैव हि । राज्ञोऽन्यः सचिवः स्निग्धस्तानि पश्येदतन्द्रितः॥१२०॥ नगरे नगरे चैकं कुर्यात्सर्वार्थचिन्तकम् । उच्चैः स्थानं घोररूपं नक्षत्राणामिव ग्रहम् ॥ १२१ ॥ स ताननुपरिक्रामेत्सर्वानैव सदा स्वयम् । तेषां वृत्तं परिणयेत्सम्यग्राष्ट्रेषु तच्चरैः ॥ १२२ ॥ राज्ञो हि रक्षाधिकृताः परस्वादायिनः शठाः । भृत्या भवन्ति प्रायेण तेभ्यो रक्षेदिमाः प्रजाः॥ १२३ । दश गाँव का अधिपति एक कुल-दो हल से जोतने योग्य ज़मीन, अपने निर्वाह के लिए काम में लावे । बीस गाँव का पाँच कुल, सौ गाँव का एक साधारण गाँव और हज़ार गाँव का मालिक एक नगर को अपनी जीविका में भोगे । राजा के गाँवों के कार्य और दूसरे कार्यों को भी, एक मन्त्री, जो सर्वप्रिय हो, वह निरालस होकर देखे । प्रत्येक नगर में एक एक अध्यक्ष जो बड़े पद पर हो, तेजस्वी हो, उसको क़ायम करे । वह सदा ग्रामाधिपतियों के कार्यों को जाँचे और दूतों से उनके आचरणों को भी जान रखे । क्योंकि रक्षाधिकारी राजपुरुष, प्रायः दूसरों के धन हरनेवाले, वञ्चक होते हैं । राजा उनसे प्रजा की रक्षा करे ॥ ११९-१२३ ॥ ये कार्यिकेभ्योऽर्थमेव गृह्णीयुः पापचेतसः । तेषां सर्वस्वमादाय राजा कुर्यात्प्रवासनम् ॥ १२४ ॥

२२८ : मनुस्मृति । राजा कर्मसु युक्तानां स्त्रीणां प्रेष्यजनस्य च । प्रत्यहं कल्पयेद्वृत्तिं स्थानकर्मानुरूपतः ॥ १२५ ॥ पणो देयोऽवकृष्टस्य षडुत्कृष्टस्य वेतनम् । षाण्मासिकस्तथाच्छादो धान्यद्रोणस्तु मासिकः १२६॥ और जो पापी पुरुष, रिश्वत आदि ही लिया करते हैं उनको, सब कुछ छीनकर, राजा देश से निकाल देवे। कार्यों में लगे स्त्री और पुरुषों को उनके कर्म के अनुसार सदा वृत्ति नियत करे अर्थात् कभी तनख़्वाह बढ़ावे कभी घटावे। निकृष्ट नौकर को एक पण देवे और छ महीने में दो कपड़े और एक महीने में द्रोण भर अन्न देवे। उत्तम कार्यवालों को छ गुना देवे । मध्यम नौकर को मध्यम श्रेणी का सब पदार्थ देवे ॥ १२४-१२६ ॥ क्रयविक्रयमध्वानं भक्तं च सपरिव्ययम् । योगक्षेमं च संप्रेक्ष्य वणिजो दापयेत्करान् ॥ १२७ ॥ यथा फलेन युज्येत राजा कर्ता च कर्मणाम् । तथावेक्ष्य नृपो राष्ट्रे कल्पयेत्सततं करान् ॥ १२८ ॥ यथाल्पल्पमदन्त्याद्यं वार्योकोवत्सषट्पदाः । तथाल्याल्पो ग्रहीतव्यो राष्ट्राद्राज्ञाब्दिकः करः॥१२६॥ पञ्चाशद्भाग आदेयो राजा पशुहिरण्ययोः । धान्यानामष्टमो भागः षष्ठो द्वादश एव वा ॥ १३०॥ आददीताथ षड्भागं द्रुमांसमधुसर्पिषाम् । गन्धौषधिरसानां च पुष्पमूलफलस्य च ॥ १३१ ॥ पत्रशाकतृणानां च चर्मणो वै दलस्य च । मृन्मयानां च भाण्डानां सर्वस्याश्ममयस्य च ॥ १३२॥

सातवां अध्याय । २२६

सातवां अध्याय । २२६ बेचना, खरीदना, रास्ता का खर्च, रक्षा का खर्च और उनके नि- र्वाह को देखकर राजा, व्यापारियों से कर (टैक्स) लेवे। उद्यमियौँ को और राज्य को जिससे नफ़ा पहुँचे ऐसा विचारकर, कर लगाना उचित है। जैसे जोंक, बछड़ा और भौंरा धीरे धीरे अपनी, खुराक को खींचते हैं वैसे राजा भी राष्ट्र से थोड़ा थोड़ा सालाना कर लेय। पशु और सोना के लाभ का पचासवां भाग; अन्नों के लाभ से छठां, आठवाँ या बारहवाँ भाग कर लेवे। वृक्ष, मांस, शहद, घी, गन्ध, औषध, रस, फूल, मूल, फल, पत्र, शाक, तृण, चमड़ा, कांस, मिट्टी, पत्थर के पात्र, इन सबके लाभों में से छठा भाग कर लेय ॥ १२७-१३२॥ म्रियमाणोऽप्याददीत न राजा श्रोत्रियात्करम् । न च क्षुधास्य संसीदेच्छ्रोत्रियो विषये वसन् ॥ १३३ ॥ यस्य राज्ञस्तु विषये श्रोत्रियः सीदति क्षुधा । तस्यापि तत्क्षुधा राष्ट्रमचिरेणैव सीदति ॥ १३४ ॥ राजा धन की कमी से दुःखी भी हो तो भी श्रोत्रिय ब्राह्मण से कर न लेय और उसके राज्य में श्रोत्रिय ब्राह्मण भूखों न मरना चाहिए। अर्थात् उसकी परवरिश रहा करे। जिस राजा के राज्य में श्रोत्रिय ब्राह्मण क्षुधा से पीड़ित होता है, उस राजा का राज्य थोड़े ही दिनों में उसकी भूख से नष्ट होजाता है ॥ १३३-१३४ ॥ श्रुतवृत्ते विदित्वास्य वृत्तिं धर्म्यां प्रकल्पयेत् । संरक्षेत्सर्वतश्चैनं पिता पुत्रमिवौरसम् ॥ १३५ ॥ संरक्ष्यमाणो राज्ञा यं कुरुते धर्ममन्वहम् । तेनायुर्वर्धते राज्ञो द्रविणं राष्ट्रमेव च ॥ १३६ ॥ यत्किंचिदपि वर्षस्य दापयेत् करसंज्ञितम् । व्यवहारेण जीवन्तं राजा राष्ट्रे पृथग्जनम् ॥ १३७ ॥

२३० मनुस्मृति । कारूकांश्चिल्पिनश्चैव शूद्रांश्चात्मोपजीविनः । एकैकं कारयेत्कर्म मासि मासि महीपतिः ॥ १३८ ॥ नोच्छिन्द्यादात्मनो मूलं परेषां चातितृष्णया । उच्छिन्दन्ह्यात्मनोमूलमात्मानंतांश्चपीडयेत्॥१३६॥ तीक्ष्णश्चैव मृदुश्च स्यात्कार्यं वीक्ष्य महीपतिः । तीक्ष्णश्चैव मृदुश्चैव राजा भवति संमतः ॥ १४० ॥ राजा, इस श्रोत्रिय के वेदाध्ययन और सदाचार को जानकर कोई धर्मविषय की जीविका बाँध दे और पिता जैसे पुत्र की रक्षा करता है वैसे ही रक्षा करे। क्योंकि राजा से रक्षित श्रोत्रिय के धर्म- पालन से राजा का आयुर्बल, द्रव्य और राज्य बढ़ता है । अपने राज्य में, व्यापारवाले से भी कुछ सालाना कर दिलावे। लोहार, बढ़ई, आदि और दासों से महीने में एक एक दिन बेगार में काम करावे। प्रजा के स्नेह से अपना कर न लेना अपना मूलोच्छेद करना है और लोभ से ज्यादा कर लेना प्रजाको सताना है, इसलिए राजा ऐसा काम कभी न करे जिसमें राज्य और प्रजा दोनों को कष्ट उठाना पड़े। राजा को कभी तीखा और कभी सीधा स्वभाव रखने से उसको सब मानते हैं ॥ १३५-१४० ॥ अमात्यमुख्यं धर्मज्ञं प्राज्ञं दान्तं कुलोद्गतम् । स्थापयेदासने तस्मिन् खिन्नः कार्येक्षणे नृणाम् ॥ १४१ ॥ राजा खुद, राज्य के कार्यों को और दूसरे के कामों को देखने में किसी कारण से असमर्थ हो तो, चतुर, धर्मात्मा, कुलीन प्रधान मन्त्री को अपने न्यायासन पर, काम देखने के लिए नियुक्त कर देवे ॥ १४१ ॥ एवं सर्वं विधायेदमितिकर्त्तव्यमात्मनः । युक्तश्चैवाप्रमत्तश्च परिरक्षेदिमाः प्रजाः ॥ १४२ ॥

सातवां अध्याय। २३१

सातवां अध्याय। २३१ विक्रोशन्त्यो यस्य राष्ट्राद् ध्रियन्ते दस्युभिः प्रजाः । संपश्यतः सभृत्यस्य मृतः स न तु जीवति ॥ १४३ ॥ क्षत्रियस्य परोधर्मः प्रजानामेव पालनम् । निर्दिष्टफलभोक्ता हि राजा धर्मेण युज्यते ॥ १४४ ॥ अपने सब कर्त्तव्यों को इस तरह पूरा कर के, प्रमाद-रहित और कार्यपरायण होकर अपनी प्रजा की रक्षा करे । राजा और उसके कर्मचारियों के देखते यदि चोर, लुटेरे प्रजा को लूट पाट से दुःख पहुंचावें, तो वह राजा मरा सा है, जीता नहीं है। प्रजा का पालन करना ही क्षत्रिय का मुख्य धर्म है। इसलिए अपने धर्म ही से प्राप्त हो फल भोग करना उचित है ॥ १४२-१४४ ॥ उत्थाय पश्चिमे यामे कृतशौचः समाहितः । हुताग्निर्ब्राह्मणांश्चार्च्य प्रविशेत्सशुभां सभाम् ॥ १४५॥ तत्र स्थितः प्रजाः सर्वाः प्रतिनन्द्य विसर्जयेत् । विसृज्य च प्रजाः सर्वा मन्त्रयेत्सह मन्त्रिभिः ॥ १४६॥ गिरिपृष्ठं समारुह्य प्रासादं वा रहोगतः । अरण्ये निःशलाके वा मन्त्रयेदविभावितः ॥ १४७॥ यस्य मन्त्रं न जानन्ति समागम्य पृथग्जनाः । सकृत्स्नां पृथिवीं भुङ्क्ते कोशहीनोऽपि पार्थिवः ॥ १४८ ॥ जडमूकन्धबधिरान्तिर्यग्योनान्र्वयोऽतिगान् । स्त्रीम्लेच्छव्याधितव्यङ्गान् मन्त्रकालेऽपसारयेत् ॥ १४६॥ राजा बड़े तड़के उठकर, शौच से निपटकर, एकाग्र चित्त होकर अग्निहोत्र और ब्राह्मणसत्कार करके, राजसभा में प्रवेश करे । वहां दर्शकों को प्रीतिपूर्वक पहले बिदा करके फिर मन्त्रियों के साथ

२३२ : मनुस्मृतिः ।

राजकाज का विचार करे। पर्वत पर या महल में जाकर, एकान्त में वा वृक्षरहित वन में, जहाँ भेद लेनेवाले दूत न पहुँच सकें, वहाँ मन्त्रणा करे। जिस राजा के मन्त्र को दूसरे लोग मिले रहने पर भी नहीं जान सकते, वह धन-सम्पत्ति के न होते भी संपूर्ण पृथिवी को भोगता है। मूर्ख, गूँगा, अंधा, बहिरा, तोता-मैना आदि पक्षी, बूढ़े, स्त्री, म्लेच्छ, रोगी, और अङ्गहीनों को, सलाह के समय हटा देवे। प्रायः ये लोग गुप्त बातों को प्रकट कर दिया करते हैं॥ १४५-१४६ ॥

भिन्दन्त्यवमता मन्त्रं तिर्यग्योनास्तथैव च । स्त्रियश्चैव विशेषेण तस्मात्तत्रादृतो भवेत् ॥ १५० ॥ मध्यन्दिनेऽर्धरात्रे वा विश्रान्तो विगतक्लमः । चिन्तयेद्धर्मकामार्थान् सार्धं तैरैक एव वा ॥ १५१ ॥ परस्परविरुद्धानां तेषां च समुपाजर्नम् । कन्यानां संप्रदानं च कुमाराणां च रक्षणम् ॥ १५२ ॥ दूतसंप्रेषणं चैव कार्यशेषं तथैव च । अन्तःपुरप्रचारं च प्रणिधीनां च चेष्टितम् ॥ १५३ ॥ कृत्स्नं चाष्टविधं कर्म पञ्चवर्गं च तत्त्वतः । अनुरागापरागौ च प्रचारं मण्डलस्य च ॥ १५४ ॥ मध्यमस्य प्रचारं च विजिगीषोश्च चेष्टितम् । उदासीनप्रचारं च शत्रोश्चैव प्रयत्नतः ॥ १५५ ॥ एताः प्रकृतयो मूलं मण्डलस्य समासतः । अष्टौ चान्याः समाख्याता द्वादशैव तु ताः स्मृताः ॥ १५६ ॥ अमात्यं राष्ट्रदुर्गार्थदण्डाख्याः पञ्च चापराः ।

सातवां अध्याय। २३३

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प्रत्येकं कथिता ह्येताः संक्षेपेण द्विसप्ततिः ॥ १५७॥ मूर्ख वगैरह, तोता, मैना और स्त्रियाँ प्रायः गुप्त सम्मति को प्रकाशित कर देती हैं इसलिए इन लोगों को धीरे से हटा देना चा- हिए। दोपहर या आधी रात को विश्राम करके, मन्त्रियों के साथ या अकेला ही धर्म-अर्थ-काम का विचार करे। यदि धर्म, अर्थ, काम का परस्पर विरोध हो तो उनको मिटाकर अर्थोपार्जन, कन्यादान, पुत्रों को रक्षा और शिक्षा की चिन्ता करे। परराज्य में दूत भेजना, बाक़ी कामों का, अन्तःपुर का और प्रतिनिधियों के काम का विचार करे। आठ प्रकार के सब काम * और पञ्चवर्ग † का खूब विचार करे। मन्त्री आदि की प्रीति-अप्रीति, शत्रु, मित्र-उदासीन आदि राजमण्डल पर, विशेष ध्यान रक्खे । अपने से मध्यम बलवाले राजा के बर्ताव, जीतने की इच्छा रखनेवाले की चेष्टा, उदासीन और शत्रु राजा के वृत्तान्तों को यत्न से जानता रहे। ये मध्यम आदि चार प्रकृतियां मण्डल का मूल मानी जाती हैं और जो आठ हैं, वे सब मिलकर बारह ‡ होती हैं। मंत्री, देश, क़िला, धनभण्डार, और दण्ड ये पांच प्रकृतियां और भी हैं। ये बारहों की अलग अलग होती हैं, यों सब मिलाकर संक्षेप में बहत्तर प्रकृतियां हुईं॥१५०-१५७॥ अनन्तरमरिं विद्यादरिसेविनमेव च । अरेरनन्तरं मित्रमुदासीनं तयोः परम् ॥ १५८ ॥ तान् सर्वानभिसंदध्यात्सामादिभिरुपक्रमैः । व्यस्तैश्चैव समस्तैश्च पौरुषेण नयेन च ॥ १५६ ॥


  • कर आदि की आय, नौकरी में व्यय, नौकरों की चाल, विरुद्ध कार्यों को रोकना, मिथ्या व्यवहार रोकना, धर्मव्यवहार देखना, दण्ड देना, प्रायश्चित्त कराना, ये आठ कर्म हैं। † कापटिक, उदासीन, वैदेह, गृहपति, तापस, ये पाँच वर्ग हैं । ‡ विजिगीषु, अरि, अरिसेवित, अरिमित्र, पाष्णिग्राह, पार्ष्णिग्राहासार, मित्र, मित्र का मित्र, आक्रन्द, आक्रन्दासार, मध्यम और उदासीन । ३०