मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
२६८ मनुस्मृति । यदधीते यद्यजते यद्ददाति यदर्चति । तस्य षड्भागभाद्राजा सम्यग्भवति रक्षणात्॥३०५॥ रक्षन् धर्मेण भूतानि राजा वध्यांश्च घातयन् । यजतेऽहरहर्यज्ञैः सहस्रशतदक्षिणैः॥ ३०६ ॥ योऽरक्षन् बलिमादत्ते करं शुल्कं च पार्थिवः । प्रतिभा गं च दण्डं च स सद्यो नरकं व्रजेत् ॥ ३०७ ॥ अरक्षितारं राजानं बलिषड्भागहारिणम् । तमाहुः सर्वलोकस्य समग्रमलहारकम् ॥ ३०८ ॥ जो राजा अभय देता है वह सदा पूज्य है। उस अभय-दक्षिणा देनेवाले का राज्य खूब बढ़ता है । जो रक्षा करता है उस राजा का सब के धर्म से छठा भाग होता है और जो रक्षा नहीं करता उसका सबके अधर्म में से छठा भाग होता है । जो रक्षाशील है वह प्रजा मैं जो वेद पढ़ता है, यज्ञ करता है, दान देता है, पूजा- पाठ करता है, सब के छठे भाग का फल पाता है । प्रतिदिन प्रा- णियों की धर्म से रक्षा और दुष्टों को दण्ड देने से मानो राजा लाखों रुपया की दक्षिणा का यज्ञ कर रहा है और जो राजा प्रजापालन न करके भेंट कर आदि लेता है वह शीघ्रही नरक- गामी होता है । इस प्रकार का राजा अन्न का छठा भाग जो लेता है वह सब लोगों का पाप लेनेवाला कहलाता है ॥ ३०५-३०८ ॥ अनपेक्षितमर्यादं नास्तिकं विप्रलुम्पकम् । अरक्षितारमत्तारं नृपं विद्यादधोगतिम् ॥ ३०६ ॥ अधार्मिकं त्रिभिर्न्यायैर्निगृह्णीयात्प्रयत्नतः । निरोधनेन बन्धेन विविधेन वधेन च ॥ ३१० ॥ धर्ममर्यादा से रहित, नास्तिक, प्रजा धन ठगनेवाला और विना प्रजापालन कर लेनेवाला राजा नरकगामी होता है ।
आठवां अध्याय । २६६
आठवां अध्याय । २६६ अधर्मों को तीन उपायों से सदा वश में रक्खे-नज़रबंद, क़ैद और बैंत आदि से मारकर ॥ ३०६-३१० ॥ निग्रहेण हि पापानां साधूनां संग्रहेण च । द्विजातय इवेज्याभिः पूयन्ते सततं नृपाः ॥ ३११ ॥ क्षन्तव्यं प्रभुणा नित्यं क्षिपतां कार्थिणां नृणाम् । बालवृद्धातुराणां च कुर्वता हितमात्मनः ॥ ३१२ ॥ यः क्षिप्तो मर्षयत्यार्त्तैस्तेन स्वर्गे महीयते । यस्त्वैश्वर्यान्न क्षमते नरकं तेन गच्छति ॥ ३१३ ॥ राजा स्तेनेन गन्तव्यो मुक्तकेशेन धावता । आचक्षाणेन तत्स्तेयमेवं कर्मास्मि शाधि माम् ॥ ३१४॥ स्कन्धेनादाय मुसलं लगुडं वापि खादिरम् । शक्तिं चोभयतस्तीक्ष्णामायसं दण्डमेव वा ॥ ३१५ ॥ शासनाद्वा विमोक्षाद्वा स्तेनः स्तेयाद्विमुच्यते । अशासित्वात्तु तं राजा स्तेनस्याप्नोतिकिल्बिषम् ॥ ३१६॥ पापियों को दण्ड देने से और साधु पुरुषों का संग्रह करने से राजा पवित्र होता है, जैसे यज्ञ करने से ब्राह्मण पवित्र होता है। कोई वादी-प्रतिवादी और बालक, वृद्ध और पीड़ित मनुष्य अपने दुःख से दुखी होकर कोई कुवचन कह दें तो राजा उनको क्षमा करे। जो आक्षेप वचनों को सहन कर लेता है वह राजा स्वर्ग- गामी होता है और जो ऐश्वर्य के मद से नहीं सहता, वह नरक- गामी होता है। चोर शिर के बाल खोले दौड़कर राजा के पास अपने अपराध को निवेदन करे, खैर की लकड़ी का मूसल या लट्ठ अथवा जिसमें दोनों तरफ़ धार हो ऐसी बरछी या लोह का दण्डा कंधे पर रखकर दण्ड के लिए प्रार्थना करे। उस हालत में राजा के दण्ड देने वा छोड़ देने से चोर को चोरी का पाप नहीं
३०० | मनुस्मृति ।
लगता । पर उसको दण्ड न करने से उसका पाप राजा को लगता है ॥ ३११-३१६ ॥ अन्नादे भ्रूणहा मार्ष्टि पत्यौ भार्यापचारिणी । गुरौ शिष्यश्च याज्यश्च स्तेनो राजनि किल्बिषम्॥३१७॥ राजनिर्धूतदण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः । निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा॥३१८॥ गर्भघाती का पाप उसके अन्न खानेवाले को, व्यभिचारिणी स्त्री का पाप उसके पति को, शिष्य का पाप गुरु को और यज्ञ करनेवाले का करानेवाले को क्षमा करने से लगता है। वैसेही छोड़ने से राजा को पाप होता है। पाप करके भी राजदण्ड पाये हुए मनुष्य स्वर्ग को जाते हैं जैसे पुण्य करने से साधु पुरुष जाते हैं ॥ ३१७-३१८ ॥ यस्तु रज्जुं घटं कूपाद्धरेद्भिंद्याच्च यः प्रपाम् । स दण्डं प्राप्नुयान्माषं तच्चैत्तस्मिन् समाहरेत् ॥३१६॥ धान्यं दशभ्यः कुम्भेभ्यो हरतोऽभ्यधिकं वधः । शेषेऽप्येकादशगुणं दाप्यस्तस्य च तद्धनम् ॥ ३२० ॥ तथा धरिमेमेयानां शतादभ्यधिके वधः । सुवर्णरजतादीनामुत्तमानां च वाससाम् ॥ ३२१ ॥ पञ्चाशतस्त्वभ्यधिके हस्तच्छेदनमिष्यते । शेषे त्वेकादशगुणं मूल्याद्दण्डं प्रकल्पयेत् ॥ ३२२ ॥ पुरुषाणां कुलीनानां नारीणां च विशेषतः । मुख्यानां चैव रत्नानां हरणे वधमर्हति ॥ ३२३ ॥ जो पुरुष कूप पर से रस्सी और घड़ा चुरावे या जो पोशाला
आठवां अध्याय। ३०१
आठवां अध्याय। ३०१ को तोड़े उसपर एकमासिक दण्ड करे और वह उस चीज़ को वहीं लाकर रखदे। बीस द्रोण का एक कुम्भ-ऐसे दश कुम्भ अन्न चुराने वाले को खूब पीटे और इससे कम हो तो ग्यारहगुना जुर्माना करे और चोरी का माल उसके मालिक को दिलावे। ऐसेही तराजू से तोलने क़ाबिल सोना, चांदी या वस्त्रादि चुराने पर यदि पदार्थ सौ १०० पल से अधिक हो तो चोर को मारडाले। और पचास पल से अधिक हो तो चोर के हाथ कटवा डाले। इससे कम हो तो माल से ग्यारहगुना जुर्माना करे। किसी कुलीन पुरुष या स्त्री के बहुमूल्य जेवर, जवाहिरात चुरानेवाले का कोई अङ्ग काट डालना चाहिए ॥ ३१६-३२३ ॥ महापशूनां हरणे शस्त्राणामौषधस्य च। कालमासाद्य कार्यं च दण्डं राजा प्रकल्पयेत् ॥ ३२४ ॥ गोषु ब्राह्मणसंस्थासु छुरिकायाश्च भेदने। पशूनां हरणे चैव सद्यः कार्योऽर्धपादिकः ॥ ३२५ ॥ सूत्रकार्पासकिण्वानां गोमयस्य गुडस्य च। दध्नः क्षीरस्य तक्रस्य पानीयस्य तृणस्य च ॥३२६॥ बड़े पशु, शस्त्र और औषध चुराने पर समय और अपराध के अनुसार राजा दण्ड करे। ब्राह्मणों की और गौओं की चोरी या छुरी से मारने पर तुरन्त आधा पैर कटवा देना चाहिए। सूत, कपास, मदिरा की गाद, गोबर, गुड़, दही, दूध, माठा, जल और तृण-घास चुराने पर मूल्य से दूना दण्ड करे ॥ ३२४-३२६॥ वेणुवैदलभाण्डानां लवणानां तथैव च। मृण्मयानां च हरणे मृदो भस्मन एव च ॥ ३२७ ॥ मत्स्यानां पक्षिणां चैव तैलस्य च घृतस्य च। मांसस्य मधुनश्चैव यच्चान्यत्पशुसम्भवम् ॥ ३२८ ॥
३०२ मनुस्मृति । अन्येषां चैवमादीनां मद्यानामाोदनस्य च । पक्वान्नानां च सर्वेषां तन्मूल्याद्द्विगुणो दमः ॥३२६॥ पुष्पेषु हरिते धान्ये गुल्मवल्लीनगेषु च । अन्येष्वपरिपूतेषु दण्डः स्यात्पञ्चकृष्णलः ॥ ३३० ॥ परिपूतेषु धान्येषु शाकमूलफलेषु च । निरन्वये शतं दण्डः सान्वयेऽर्धशतं दमः ॥ ३३१ ॥ स्यात्साहसं त्वन्वयवत् प्रसभं कर्म यत्कृतम् । निरन्वयं भवेत्स्तेयं हृत्वापह्नूयते च यत् ॥ ३३२ ॥ यस्त्वेतान्युपक्लृप्तानि द्रव्याणि स्तेनयेन्नरः । तमाद्यं दण्डयेद्राजा यश्चाग्निं चोरयेद् गृहात् ॥३३३॥ येन येन यथाङ्गेन स्तेनो नृषु विचेष्टते । तत्तदेव हरेत्तस्य प्रत्यादेशाय पार्थिवः ॥ ३३४ ॥ बांस के पात्र, निमक, मट्टी के पात्र, मट्टी, राख, मछली, चि- ड़िया, तेल, घी, मांस, मधु, पशुओं के सींग आदि और ऐसेही दूसरे पदार्थ, मदिरा, भात और सब भांति के पक्वान्न चुराने पर माल के दाम से दूना दाम दण्ड करे । फूल, खेत का हरा अन्न, गुल्म, लता, वृक्ष और धान वगैरह चुराने पर, पाँच 'कृष्णल' दण्ड करे । सफ़ा अन्न, शाक, मूल और फलों का चोर यदि कुटुम्बी न हो तो सौ पण और हो तो पचास पण दण्ड करे । जो पदार्थ जबरन् स्वामी के सामने छीना हो वह साहस-लूट है और जो पदार्थ स्वामी के पीछे लिया हो और क़बूल न करे तो वह चोरी है । ऊपर कहे पदार्थों को जो चुरावै और जो घर से आग चुरावै उन पर प्रथम-साहस, राजा दण्ड करे । चोर, जिस जिस अङ्ग से मनुष्यों की चोरी या मार-काट वगैरह करे, उसका वही अङ्ग शिक्षा देने के लिए राजा कटवा देवे ॥ ३२७-३३४ ॥
आठवाँ अध्याय । ३०३
आठवाँ अध्याय । ३०३ पिताचार्यः सुहृन्माता भार्यापुत्रः पुरोहितः । नादण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्ति यः स्वधर्मे न तिष्ठति॥३३५॥ कार्षापणं भवेद्दण्ड्यो यत्रान्यः प्राकृतो जनः । तत्र राजा भवेद्दण्ड्यः सहस्रमिति धारणा ॥ ३३६॥ अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्बिषम् । षोडशैव तु वैश्यस्य द्वात्रिंशत्क्षत्रियस्य च ॥ ३३७ ॥ ब्राह्मणस्य चतुःषष्टिः पूर्णं वापि शतं भवेत् । द्विगुणा वा चतुःषष्टिस्तद्दोषगुणविद्धि सः॥ ३३८॥ पिता, आचार्य, मित्र, माता, स्त्री, पुत्र और पुरोहित भी यदि अपने धर्म से न चलें तो राजा इनको भी शिक्षा देवे। साधारण मनुष्य को जिस अपराध के लिए एक पण दण्ड करे, उस अपराध में राजा अपने लिए हज़ार पण दण्ड करे, यह मर्यादा है । चोरी करने में शूद्र को आठगुना, वैश्य को सोलह गुना और क्षत्रिय को बीसगुना पाप लगता है । ब्राह्मण को चौंसठगुना वा पूरा सौगुना पाप लगता है । अथवा एकसौ-अट्ठा- इस गुना पाप लगता है, क्योंकि ब्राह्मण चोरी के दोष गुण को जानता है ॥ ३३५-३३८ ॥ वानस्पत्यं मूलफलं दार्वग्न्यर्थं तथैव च । तृणं च गोभ्यो ग्रासार्थमस्तेयं मनुरब्रवीत् ॥ ३३६ ॥ योऽदत्तादायिनो हस्ताल्लिप्सेत ब्राह्मणो धनम् । याजनाध्यापनेनापि यथास्तेनस्तथैव सः ॥ ३४० ॥ द्विजोऽध्वगः क्षीणवृत्तिर्द्वाविक्षू द्वे च मूलके । आददानः परक्षेत्रान्न दण्डं दातुमर्हति ॥ ३४१ ॥
३०४ मनुस्मृति। असंधितानां संधाता संधितानां च मोक्षकः । दासाश्वरथहर्ता च प्राप्तः स्याच्चौरकिल्विषम् ॥ ३४२॥ बिना बांड़ा के खेतों से फल, मूल, अग्निहोत्र के लिए काष्ठ, गौओं के लिए घास कोई लेवे तो वह चोरी नहीं कहाती—मनुजी कहते हैं। जो ब्राह्मण परधन हरण करनेवाले को यज्ञ कराकर या शास्त्र पढ़ाकर उससे धन लेना चाहता है, वह ब्राह्मण भी चोर के समान ही है। जीविकाहीन द्विज मार्ग में जाता हुआ किसी के खेत से दो ऊख या दो मूली ले लेय तो दण्ड योग्य नहीं है। दूसरे के खुले पशुओं को बाँधनेवाला और बंधों को खोलनेवाला, दास, घोड़ा, और रथ को हरनेवाला चोरी का अपराधी होता है ॥ ३३६-३४२ ॥ अनेन विधिना राजा कुर्वाणःस्तेननिग्रहम् । यशोस्मिन् प्राप्नुयाल्लोके प्रेत्य चानुत्तमं सुखम् ॥ ३४३ ॥ ऐन्द्रं स्थानमभिप्रेप्सुर्यशश्चाक्षयमव्ययम् । नोपेक्षेत क्षणमपि राजा साहसिकं नरम् ॥ ३४४ ॥ वाग्दुष्टात्तस्कराच्चैव दण्डेनैव च हिंसतः । साहसस्य नरः कर्ता विज्ञेयः पापकृत्तमः ॥ ३४५ ॥ साहसे वर्तमानं तु यो मर्षयति पार्थिवः । स विनाशं व्रजत्याशु विद्वेषं चाधिगच्छति ॥ ३४६ ॥ न मित्रकारणाद्राजा विपुलाद्वा धनागमात् । समुत्सृजेत साहसिकान् सर्वभूतभयावहान् ॥ ३४७ ॥ इस प्रकार उक्त विधि से चोरों का निग्रह करने से राजा इस लोक में सुयश और अन्त में अक्षय सुख पाता है। इन्द्रासन और सुयश चाहनेवाला राजा लुटेरे मनुष्यों के निग्रह में क्षणमात्र भी
आठवा अध्याय। ३०५
आठवा अध्याय। ३०५ देरी न करे। कुवाच्य कहनेवाले, चोर और मार-पीट करने वालों की अपेक्षा लुटेरों को अधिक अपराधी जानना चाहिए। जो राजा लुटेरों को क्षमा करता है वह शीघ्रही नष्ट होकर प्रजा का वैरी होजाता है। राजा, किसी मित्र के कहने से वा धन मिलने से भयदायी लुटेरों को कभी न छोड़े ॥ ३४३-३४७ ॥ शस्त्रं द्विजातिभिर्ग्राह्यं धर्मो यत्रोपरुध्यते । द्विजातीनां च वर्णानां विप्लवे कालकारिते ॥ ३४८ ॥ आत्मनश्च परित्राणे दक्षिणानां च संगरे । स्त्रीविप्राभ्युपपत्तौ च घ्नन् धर्मेण न दुष्यति ॥ ३४६ ॥ गुरुं वा बालवृद्धौ वा ब्राह्मणं वा बहुश्रुतम् । आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन् ॥ ३५० ॥ जिस समय यज्ञादि धर्म-कर्म रोका जाता हो, वर्णाश्रम-धर्म का नाश होता हो, उस समय द्विजोंको अस्त्र ग्रहण करना चाहिए। अपनी रक्षा करने में, दक्षिणा की रक्षा में, स्त्री और ब्राह्मणों की विपत्ति में धर्म युद्ध से मारनेवाला पापभागी नहीं, होता । गुरु, बालक, बूढ़ा वेदज्ञ ब्राह्मण भी आततायीपन से मारने आवें तो बिना विचार उनके ऊपर प्रहार करे ॥ ३४८-३५० ॥ नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन । प्रकाशं वाऽप्रकाशं वा मन्युस्तं मन्युमृच्छति ॥ ३५१ ॥ परदाराभिमर्शेषु प्रवृत्तान्नॄन्महीपतिः । उद्वेजनकरैर्दण्डैश्चिह्नयित्वा प्रवासयेत् ॥ ३५२ ॥ तत्समुत्थो हि लोकस्य जायते वर्णसंकरः । येन मूलहरो धर्मः सर्वनाशाय कल्प्यते ॥ ३५३ ॥ परस्य पत्न्या पुरुषः संभाषां योजयन् रहः । ३६
३०६ मनुस्मृति । पूर्वमाक्षारितो दोषैः प्राप्नुयात् पूर्वसाहसम् ॥ ३५४ ॥ यस्त्वनाक्षारितः पूर्वमभिभाषेत कारणात् । न दोषं प्राप्नुयात् किञ्चिन्न हि तस्य व्यतिक्रमः॥ ३५५॥ परस्त्रियं योभिभवेत्तीर्थेऽरण्ये वनेऽपि वा । नदीनां वापि संभेदे स संग्रहणामाप्नुयात् ॥ ३५६ ॥ उपचारक्रिया केलिः स्पर्शो भूषणवाससाम् । सहखट्टाशनं चैव सर्वं संग्रहणं स्मृतम् ॥ ३५७ ॥ स्त्रियं स्पृशेददेशे यः स्पृष्टो वा मर्षयेत्तया । परस्परस्यानुमते सर्वं संग्रहणं स्मृतम् ॥ ३५८ ॥ परस्त्रीगमन आदि । प्रकट या परोक्ष में मारनेवाले आततायी को मारने से कोई दोष नहीं होता, क्योंकि मारनेवाले का क्रोध दूसरे के क्रोध को बढ़ाता है। परस्त्रीसंभोग में लगे मनुष्यों की नाक वगैरह काट कर देश से निकाल देवे । संसार में वर्णसङ्करता उसीसे पैदा होती है, क्योंकि अधर्म जड़ काटता है, सर्वनाश कर डालता है । व्यभिचारी पुरुष परस्त्री से एकान्त में बातचीत करता हुआ, प्रथम साहस दण्ड के योग्य होता है । पर साधारण पुरुष किसी परस्त्री से बातें करे तो वह अपराधी नहीं होता न दण्ड ही होता है । जो पुरुष तीर्थ, जङ्गल, वन और नदियों के संगमस्थान में परस्त्री से बातें करता है उसको संभोग-दूषण ही लगता है । परस्त्री को पुष्पमाला, तेल आदि भेजना, हँसी करना, उसके गहने-वस्त्र छूना, एक पलंग पर बैठना, इन सब कामों को स्त्री- संग्रहण जानना चाहिए जो आपस की सलाह से स्त्री के स्तनादि, उसका गुप्त स्थान छुवे यह सब संग्रहण कहलाता है ॥३५१-३५८॥ अब्राह्मणः संग्रहेणे प्राणान्तं दण्डमर्हति ।
आठवां अध्याय। ३०७
आठवां अध्याय। ३०७ चतुर्णामपि वर्णानां दारा रक्ष्यतमाः सदा ॥ ३५६ ॥ भिक्षुका वन्दिनश्चैव दीक्षिताः कारवस्तथा । संभाषणं सह स्त्रीभिः कुर्युंरप्रतिवारिताः ॥ ३६० ॥ न संभाशां परस्त्रीभिः प्रतिषिद्धः समाचरेत् । निषिद्धो भाषमाणस्तु सुवर्णदण्डमर्हति ॥ ३६१ ॥ नैष चारणदारेषु विधिर्नात्मोपजीविषु । सज्जायन्ति हि ते नारीर्निगूढाश्चारयन्ति च ॥ ३६२ ॥ किञ्चिदेव तु दाप्यः स्यात्संभाषां ताभिराचरन् । प्रैष्यासु चैकभक्तासु रहः प्रव्रजितासु च ॥ ३६३ ॥ शूद्र ब्राह्मणी के साथ व्यभिचार करे तो मार डालने लायक होता है। चारों वर्णवालों को सदा अपनी स्त्रियों की रक्षा करनी चाहिए। भिक्षुक, भाट, यज्ञ में दीक्षित, रसोइँया और कारीगर स्त्रियों के साथ बातें बिना रोक कर सकते हैं । जिसको निषेध है वह परस्त्री के साथ बातें न करे। करनेवाला एक सुवर्ण दण्ड के योग्य होता है। यह निषेध-मनादी नट, गवैय्या आदि की स्त्रियों के लिए नहीं है, क्योंकि वे आपही अपनी स्त्रियों को सजाकर परपुरुषों से मिलाते हैं । परन्तु उनके साथ भी निर्जन में बातें करना दण्डकारक है और एकभक्ता या विरक्ता स्त्री के साथ भी बोलचाल करने से कुछ दण्ड करे ॥ ३५६-३६३ ॥ योऽकामां दूषयेत्कन्यां स सद्यो वधमर्हति । सकामां दूषयंस्तुल्यो न वधं प्राप्नुयान्नरः ॥ ३६४ ॥ कन्यां भजन्तीमुत्कृष्टं न किञ्चिदपि दापयेत् । जघन्यं सेवमानां तु संयतां वासयेद् गृहे ॥ ३६५ ॥ उत्तमां सेवमानस्तु जघन्यो वधमर्हति ।
३०८ । मनुस्मृति । शुल्कं दद्यात्सेवमानः समामिच्छेत् पिता यदि ॥३६६॥ जो इच्छा न करनेवाली कन्या से गमन करे, वह उसी समय वध के योग्य है। पर चाहनेवाली के साथ गमन करे और वह पुरुष सजातीय हो तो वध योग्य नहीं होता। उत्तम जाति के पुरुष को सेवन करनेवाली कन्या पर कुछ भी दण्ड न करे। परन्तु नीच जाति के साथ गमन करती हो तो उसको घर में बंद रक्खे। नीच जाति का पुरुष उत्तम जाति की कन्या से भोग करे तो वध के योग्य है और समान जाति की कन्या को भोगता हो तो वह पुरुष कन्या के पिता की आज्ञा से मूल्य देकर विवाह भी कर सकता है ॥ ३६४-३६६ ॥ अभिषह्य तु यः कन्यां कुर्याद्दर्पेण मानवः । तस्याशुकर्त्ये अङ्गुल्यौ दण्डं चार्हति षट्शतम् ॥ ३६७॥ सकामां दूषयंस्तुल्यो नाङ्गुलिच्छेदमाप्नुयात् । द्विशतं तु दमो दाप्यः प्रसङ्गविनिवृत्तये ॥ ३६८ ॥ कन्यैव कन्यां या कुर्यात्तस्याः स्याद् द्विशतो दमः । शुल्कं च द्विगुणं दद्याच्छिफाश्चैवाप्नुयाद्दश ॥ ३६६ । या तु कन्यां प्रकुर्यात्स्त्री सा सद्यो मौण्ड्यमर्हति । अङ्गुल्योरेव वा छेदं खरेणोद्वहनं तथा ॥ ३७० ॥ भर्तारं लङ्घयेद् या तु स्त्री ज्ञातिगुणदर्पिता । तां श्वभिः खादयेद्राजा संस्थाने बहुसंस्थिते ॥३७१। पुमांसं दाहयेत्पापं शयने तप्त आयसे । अभ्यादध्युश्च काष्ठानि तत्र दह्येत पापकृत् ॥ ३७२ । जो मनुष्य अभिमान और बलात्कार से कन्या को अङ्गुलियों से बिगाड़े उसकी दोनों अङ्गुलियां कटवा दें और छः सौ पण दण्ड
करे। समान जाति और सकामा कन्या को दूषित करनेवाले की अङ्गुलियां न कटावे, सिर्फ दो सौ पण दण्ड करे। कन्या ही कन्या को अङ्गुलियों से बिगाड़े तो उस पर दो सौ पण दण्ड करे और उस कन्या के पिता से कहकर दूना मूल्य दिलवाये और दस कोड़े लग- वावे । यदि कोई स्त्री कन्या को अङ्गुलियों से बिगाड़े तो उसका शिर मुड़वा कर वा दो अङ्गुलियां काटकर, गधेपर चढ़ाकर घु- मावे। जो स्त्री अपने रूप, गुण के घमंड से पति का तिरस्कार करके व्यभिचार करे, उसको राजा सब के सामने कुत्तों से नोच- वावे और जो व्यभिचारी पापी हो उसको तपाये लोह के पलंग पर सुलाकर ऊपर से काठ रखकर जलवादे ॥ ३६७-३७२ ॥ संवत्सराभिशस्तस्य दुष्टस्य द्विगुणो दमः । व्रात्यया सह संवासे चाण्डाल्या तावदेव तु ॥ ३७३॥ शूद्रो गुप्तमगुप्तं वा द्वैजातं वर्णमावसन् । अगुप्तमङ्गसर्वस्वैर्गुप्तं सर्वेण हीयते ॥ ३७४ ॥ एक वर्ष तक व्यभिचार करता रहे तो उस दुष्ट को उक्त दण्ड दूना होना चाहिए । हीन जाति या चाण्डाली के साथ व्यभिचार करे तो भी वही दण्ड करे । शूद्र, ब्राह्मणस्त्री से गुप्त या प्रकट व्यभि- चार करे तो उसका अंग काटडाले, सर्वस्वहरण करे ॥ ३७३-३७४॥ वैश्यः सर्वस्वदण्डः स्यात्संवत्सरनिरोधतः । सहस्त्रं क्षत्रियो दण्ड्यो मौण्ड्यं मूत्रेण चार्हति ॥ ३७५॥ ब्राह्मणीं यद्यगुप्तां तु गच्छेतां वैश्यपार्थिवौ । वैश्यं पञ्चशतं कुर्यात्क्षत्रियं तु सहस्रिणम् ॥ ३७६ ॥ उभावपि तु तावेव ब्राह्मण्या गुप्तया सह । विप्लुतौ शूद्रवद्दण्ड्यौ दग्धव्यौ वा कटाग्निना ॥ ३७७॥ सहस्रं ब्राह्मणो दण्ड्यो गुप्तां विप्रां बलाद्व्रजन् ।
३१० मनुस्मृति। शतानि पञ्च दण्ड्यः स्यादिच्छन्त्या सह संगतः॥३७८॥ वैश्य रक्षित ब्राह्मणी से गमन करे तो एक वर्ष क़ैद करके उसका सर्वस्वहरण करे। क्षत्रिय करे तो एक हज़ार पण दण्ड करे और उसका शिर गधे के मूत से मुड़वा देयं । वैश्य और क्षत्रिय, यदि अरक्षित ब्राह्मणी से गमन करें तो वैश्य पर पांच सौ और क्षत्रिय पर हज़ार पण दण्ड करे। वोही दोनों यदि रक्षित ब्राह्मणी से गमन करें, शूद्र की भांति दण्ड पावें अथवा चटाई में लपेट कर जलवा दें। रक्षित ब्राह्मणी से ज़बरदस्ती व्यभिचार करनेवाले ब्राह्मण पर हज़ार पण दण्ड करे और इच्छावाली से गमन करे तो पाँच सौ पण दण्ड करे ॥ ३७५-३७८ ॥ मौण्ड्यं प्राणान्तिको दण्डो ब्राह्मणस्य विधीयते । इतरेषां तु वर्णानां दण्डः प्राणान्तिको भवेत् ॥ ३७६ ॥ न जातु ब्राह्मणं हन्यात्सर्वपापेष्वपि स्थितम् । राष्ट्रादेनं वहिः कुर्यात्समग्रधनमक्षतम् ॥ ३८० ॥ न ब्राह्मणवधाद्भूयानधर्मो विद्यते भुवि । तस्मादस्य वधं राजा मनसापि न चिन्तयेत् ॥ ३८१ ॥ वैश्यश्चेत्क्षत्रियां गुप्तां वैश्यां वा क्षत्रियो व्रजेत् । यो ब्राह्मण्यामगुप्तायां तावुभौ दण्डमर्हतः ॥ ३८२ ॥ ब्राह्मण का शिर मुड़ा देनाही प्राणान्त दण्ड देना है दूसरों को प्राणान्त दण्ड का विधान है। कैसा भी अपराध ब्राह्मण ने किया हो पर उसको प्राणान्त दण्ड कभी न देवे। किन्तु उसको धन स- हित देश से निकाल देवे। ब्राह्मण वध से अधिक कोई अधर्म नहीं है। राजा, ब्राह्मण वध का कभी मन में भी विचार न करे। वैश्य क्षत्रिया से और क्षत्रिय रक्षित वैश्या से व्यभिचार करे तो इन दोनों को अरक्षित ब्राह्मणी से व्यभिचारवाला दण्ड देना चाहिए ॥ ३७६-३८२ ॥
आठवां अध्याय। ३११
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सहस्रं ब्राह्मणो दण्डं दाप्यो गुप्ते तु ते व्रजन् । शूद्रायां क्षत्रियविशोः साहस्त्रो वै भवेद्दमः ॥ ३८३ ॥ क्षत्रियायामगुप्तायां वैश्ये पञ्चशतं दमः । मूत्रेण मौण्ड्यमिच्छेत्तु क्षत्रियो दण्डमेव वा ॥ ३८४ ॥ अगुप्ते क्षत्रिया वैश्ये शूद्रां वा ब्राह्मणो व्रजन् । शतानि पञ्च दण्ड्यःस्यात्सहस्रं त्वन्त्यजस्त्रियम्॥३८५॥ यदि ब्राह्मण रक्षित क्षत्रिया वा वैश्या से गमन करे तो उस पर हज़ार पण दण्ड करे और रक्षित शूद्रा में गमन करनेवाले क्षत्रिय और वैश्य पर भी हज़ार पण दण्ड करे। अरक्षित क्षत्रिया में ग- मन करने से वैश्य पर पाँच सौ पण और क्षत्रिय का मूत्र से मूंड़ मुड़ाकर, पाँच सौ पण दण्ड करे। यदि ब्राह्मण, अरक्षित क्षत्रिया, वैश्या और शूद्रा से व्यभिचार करे तो पाँच सौ पण दण्ड करे। और चाण्डाली-भंगिनसे गमन करने पर हज़ार पण दण्ड करे॥३८३-३८५॥ यस्य स्तेनः पुरे नास्ति नान्यस्त्रीगो न दुष्टवाक् । न साहसिकदण्डघ्नौ स राजा शक्रलोकभाक् ॥ ३८६ ॥ एतेषां निग्रहो राज्ञः पञ्चानां विषये स्वके । साम्राज्यकृत्सजात्येषु लोके चैव यशस्करः ॥ ३८७ ॥ ऋत्विजं यस्त्यजेद्याज्यो याज्यं चर्त्विक् त्यजेद्यदि । शक्तं कर्मण्यदुष्टं च तयोर्दण्डः शतं शतम् ॥ ३८८ ॥ न माता न पिता न स्त्री न पुत्रस्त्यागमर्हति । त्यजन्नपतितानेतानू राज्ञा दण्ड्यः शतानि षट्॥३८६॥ आश्रमेषु द्विजातीनां कार्ये विवदतां मिथः । न विब्रूयान्नृपो धर्मं चिकीर्षन् हितमात्मनः ॥ ३६० ॥
११२ मनुस्मृति । 'जिस राजा के नगर में न चोर हैं, न व्यभिचारी हैं, न कुवाच्य कहनेवाले हैं, न लुटेरे हैं, और न मार-पीट करनेवाले हैं वह राजा इन्द्रलोक को पाता है। इन पाँचों का अपने राज्य में निग्रह करने से राजा का राज्य और यश फैलता है। जो यजमान अपने कर्म करानेवाले निर्दोष ऋत्विज् को त्याग दे या जो ऋत्विज् योग्य यजमान को छोड़ दे उन दोनों पर राजा सौ सौ पण दण्ड करे। माता, पिता, स्त्री और पुत्र त्याग के योग्य नहीं होते। इनको पतित न हों तो त्यागनेवाले पर राजा छः सौ पण दण्ड करे। आश्रम- धर्म के लिए झगड़नेवाले द्विजों का राजा कोई फ़ैसला न करे। वे खुद कर लेंगे ॥ ३८६-३६० ॥ यथार्हमेतानभ्यर्च्य ब्राह्मणैः सह पार्थिवः । सान्त्वेन प्रशमय्यादौ स्वधर्मं प्रतिपादयेत् ॥ ३६१ ॥ प्रातिवेश्यानुवेश्यौ च कल्याणे विंशतिद्विजे । अर्हावभोजयन् विप्रो दण्डमर्हति माषकम् ॥ ३६२ ॥ श्रोत्रियः श्रोत्रियं साधुं भूतिकृत्येष्वभोजयन् । तदन्नं द्विगुणं दाप्यो हिरण्यं चैव माषकम् ॥ ३६३ ॥ अन्धो जडः पीठसर्पी सप्तत्या स्थविरश्च यः । श्रोत्रियेषूपकुर्वंश्च न दाप्याः केनचित्करम् ॥ ३६४ ॥ श्रोत्रियं व्याधितार्तौ च बालवृद्धावकिञ्चनम् । महाकुलीनमार्यं च राजा संपूजयेत् सदा ॥ ३६५ ॥ किन्तु अपने सभासदों के साथ इनकी यथोचित पूजा करके प्रथम समझावे फिर स्वधर्म का आदेश करे। यदि कोई उत्सव हो और बीस ब्राह्मणों के भोजन का प्रबन्ध हो तब पड़ोसी और आने जानेवाले हिती को न जिमावे तो उस पुरुष पर एक माषक दण्ड करे। किसी मङ्गलकार्य में वेदज्ञ ब्राह्मण, साधु आदि को भोजन न देने से उसको दूना अन्न और सोना का एक माषक देना होगा।
आठवां अध्याय । ३१३
आठवां अध्याय । ३१३ अन्धा, बहिरा, लूला, सत्तर वर्ष का वूढ़ा और श्रोत्रिय से राजा कोई कर न लेवे। श्रोत्रिय, रोगी, दुःखी, बालक, बूढ़ा, निर्धन, महाकुलीन, और महात्मा पुरुष की तरफ राजा सदा आदर- दृष्टि रक्खे ॥ ३६१-३६५ ॥ शाल्मलीफलके श्लक्ष्णे नेनिज्यान्नेजकः शनैः । न च वासांसि वासोभिर्निहरेन्न च वासयेत् ॥ ३६६ ॥ तन्तुवायेा दशपलं दद्यादेकपलाधिकम् । अतोऽन्यथा वर्तमानो दाप्यो द्वादशकं दमम् ॥ ३६७॥ शुल्कस्थानेषु कुशलाः सर्वपण्यविचक्षणाः । कुर्युर्घ यथापण्यं ततो विंशं नृपो हरेत् ॥ ३६८ ॥ धोबी सेमर के चिकने पाट पर धीरे धीरे कपड़े धोवे, कपड़ों को बदले, नहीं और न बहुत दिनों तक पड़ा रक्खे। जुलाहा दश पल सूत लेकर मांडी के संबध से ग्यारह पल कपड़ा देवे । यदि खिलाफ करे तो उस पर राजा बारह पण दण्ड दिलावे। जो पुरुष चुंगी वगैरह के कामों में चतुर और हर प्रकार के व्यापारों में प्र- वीण हों, उन सौदागरों के लाभ का बीसवाँ भाग राजा ग्रहण करे ॥ ३६६-३६८ ॥ राज्ञः प्रख्यातभाण्डानि प्रतिषिद्धानि यानि च । तानि निर्हरतो लोभात्सर्वहारं हरेन्नृपः ॥ ३६६ ॥ शुल्कस्थानं परिहरन्नकाले क्रयविक्रयी । मिथ्यावादी च संख्याने दाप्योऽष्टगुणमत्ययम् ॥४००॥ आगमं निर्गमं स्थानं तथा वृद्धिक्षयावुभौ । विचार्य सर्वपण्यानां कारयेत्क्रयविक्रयौ ॥ ४०१ ॥ पञ्चरात्रे पञ्चरात्रे पक्षे पक्षेऽथवा गते । ४०
३१४ मनुस्मृति। कुर्वीत चैषां प्रत्यक्षमर्घसंस्थापनं नृपः ॥ ४०२ ॥ तुलामानं प्रतीमानं सर्वं च स्यात्सुलक्षितम् । षट्सु षट्सु च मासेषु पुनरेव परीक्षयेत् ॥ ४०३ ॥ राजा अपने देश के जिन प्रसिद्ध वस्तुओं को परदेश में व्यापारार्थ जाने से रोके उनको लोभवश कोई लेजाय तो राजा उसका सर्वस्व छीन लेय । चुंगीघर से छिपानेवाला, असमय में खरीद-बेच करनेवाला, गिनती-तौल में झूठ बोलनेवाला वस्तु के मूल्य से आठ गुणा दण्ड के योग्य होता है। माल कहां से आया है, कहां जाता है, कितने दिन पड़ा रहा है, उसमें हानि वा लाभ क्या होगा, यह सब विचार कर खरीद-बेच का भाव तै करे । पाँच पाँच दिन अथवा पाँच पाँच पक्ष बीतने पर राजा माल का भाव व्यापारियों के सामने नियत करे । तराजू के बांट और गज़ वगैरह पर अपनी मोहर लगाकर ठीक रक्खे और छठे महीना उनकी जांच किया करे ॥ ३९९-४०३ ॥ पणं यानं तरेद्दाप्यं पौरुषोऽर्धपणं तरे । पादं पशुश्च योषित्च पादार्थं रिक्तकः पुमान् ॥ ४०४ ॥ भाण्डपूर्णानि यानानि तार्यं दाप्यानि सारतः । रिक्तभाण्डानि यत्किञ्चित्पुमांसश्चापरिच्छदाः ॥४०५॥ दीर्घाध्वनि यथादेशं यथाकालं तरो भवेत् । नदीतीरेषु तद्विद्यात्समुद्रे नास्ति लक्षणम् ॥ ४०६ ॥ पुल, नदी का महसूल । नदी पार करने में खाली गाड़ी का एक पण, भार सहित मनुष्यों का आधा पण, पशु और स्त्री का चौथाई पण और खाली मनुष्य से पणका आठवाँ भाग महसूल लेय । मालभरी गाड़ी पार उतरने का महसूल बोझा के अनुसार लेय और खाली सवारी
आठवां अध्याय । ३१५
आठवां अध्याय । ३१५ और गरीबों से थोड़ा सा लेय । लम्बी उतराई का महसूल देश- काल के अनुसार होगा। यह नदीतट का नियम है। समुद्र के लिए कोई निश्चय नहीं हो सकता ॥ ४०४-४०६ ॥ गर्भिणी तु द्विमासादिस्तथा प्रव्रजितो मुनिः । ब्राह्मणा लिङ्गिनश्चैव न दाप्यास्तारिकं तरे ॥ ४०७ ॥ यन्नाविकिञ्चिद्दासानां विशीर्येतापराधतः । तद्दा सैरेवदातव्यं समागम्य स्वतोंऽशतः ॥ ४०८ ॥ एष नौयायिनामुक्तो व्यवहारस्य निर्णयः । दाशापराधतस्तोये दैविके नास्ति निग्रहः ॥ ४०६ ॥ दो महीना से अधिक की गर्भिणी, वानप्रस्थ, संन्यासी और ब्राह्मण, ब्रह्मचारी नदी पार जाने की उतराई न दें। नाव में मल्लाहों के दोष से जो कुछ हानि हो, वह मल्लाह लोग इकट्ठा होकर अपने भाग में से देवें । यह नौका से नदी पार होने का निर्णय और जल में मल्लाहों के व्यवहार का निर्णय कहा है । यदि कोई दैवी वि- पत्ति आपड़े तो उस में कोई दण्डविधान नहीं है ॥ ४०७-४०६ ॥ वाणिज्यं कारयेद् वैश्यं कुसीदं कृषिमेव च । पशूनां रक्षणं चैव दास्यं शूद्रं द्विजन्मनाम् ॥ ४१० ॥ क्षत्रियं चैव वैश्यं च ब्राह्मणो वृत्तिकर्शितौ । विभृयादानृशंस्येन स्वानि कर्माणि कारयन् ॥ ४११ ॥ दास्यं तु कारयंल्लोभाद् ब्राह्मणः संस्कृतान् द्विजान् । अनिच्छतः प्राभवत्याद्राज्ञा दण्ड्यः शतानि षट् ॥४१२॥ शूद्रं तु कारयेद्दास्यं क्रीतमक्रीतमेव वा । दास्यायैव हि सृष्टोऽसौ ब्राह्मणस्य स्वयम्भुवा ॥४१३॥
३१६ : मनुस्मृति। न स्वामिना निसृष्टोपि शूद्रो दास्याद्विमुच्यते । निसर्गजं हि तत्तस्य कस्तस्मात्तदपोहति ॥ ४१४ ॥ राजा वैश्यों से व्यापार, ब्याज, खेती और पशुरक्षा का उद्यम करावे। और शूद्रों से द्विजोंकी सेवा करावे। जीविका से रहित क्षत्रिय और वैश्यों से ब्राह्मण अपना कर्म करावे और उनका पा- लन करे। यदि धनी ब्राह्मण लोभवश उत्तम द्विजों से सेवाकर्म करावे तो उसपर राजा छ सौ पण दण्ड करे । खरीदे वा बिना खरीदे शूद्रों से सेवाही करावे क्योंकि ब्रह्मा ने शूद्रों को दासकर्म के लिए ही पैदा किया है। स्वामी से छुड़ाया हुआ भी शूद्र दास- कर्म को नहीं छोड़ सकता क्योंकि वह उसका स्वाभाविक धर्म है ॥ ४१०-४१४ ॥ ध्वजाहृतो भक्तदासो गृहजः क्रीतदत्रिमौ । पौत्रिको दण्डदासश्च सप्तैते दासयोनयः ॥ ४१५ ॥ भार्या पुत्रश्च दासश्च त्रय एवाधनाः स्मृताः । यत्ते समधिगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद्धनम् ॥ ४१६ ॥ विश्रब्धं ब्राह्मणः शूद्राद् द्रव्योपादानमाचरेत् । न हि तस्यास्ति किञ्चित्स्वं भर्तृहार्यधनो हि सः॥४१७॥ युद्ध में जीतकर लाया हुआ, भक्त दास, दासीपुत्र, खरीदा हुआ, किसी का दिया हुआ, परंपरा से प्राप्त और दण्ड-शुद्धि के लिए जिसने दासपना किया हो; ये सात प्रकार के दास होते हैं। भार्या, पुत्र और दास इन तीनों को मनुने निर्धन कहा है, ये जो धन पाते हैं, वह उसका है जिसके ये होते हैं। ब्राह्मण को अपने दास शूद्र से बिना विचार धन ले लेना चाहिए उसका धन कुछ नहीं है क्योंकि दास के धन का मालिक उसका मालिक ही है ॥ ४१५-४१७ ॥ वैश्यशूद्रौ प्रयत्नेन स्वानि कर्माणि कारयेत् ।
आठवां अध्याय । ३१७
आठवां अध्याय । ३१७ तौ हि च्युतौ स्वकर्मभ्यः क्षोभयेतामिदं जगत्॥४१८॥ अह्न्यहन्यवेक्षेत कर्मान् तान् वाहनानि च । आयव्ययौ च नियतावाकरान् कोशमेव च ॥ ४१९ ॥ एवं सर्वानिमान् राजा व्यवहारान् समापयन् । व्यपोह्य किल्बिषं सर्वं प्राप्नोति परमां गतिम्॥ ४२० ॥ इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहिताया- मष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ राजा यत्नपूर्वक वैश्य और शूद्रसे उनके कर्मों को करावे क्योंकि वे अपने कर्म से हटकर संसार को उपद्रवों से दुखी करेंगे। राजा प्रतिदिन आरम्भ किये कार्यों का, सवारियों का, नियत आय-व्यय, खान और धन-भण्डार का अवलोकन करे। इस प्रकार राजा इन सब व्यवहारों का निर्णय करता हुआ सब पापों का नाश करके परम गति को पाता है ॥ ४१८-४२० ॥ आठवां अध्याय पूरा हुआ।