BharatKosha
Back to the archive

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished1,098 pages

२३८- राजाकी मृत्यु तथा देशके विनाश-सूचक लक्षण और उनकी शान्ति

Page 920Permalink

९१० * मत्स्यपुराण *

| ऋतुस्वभावेन विनाद्भुतस्य<br>जातस्य दृष्टस्य तु शीघ्रमेव।<br>यथागमं शान्तिरनन्तरं तु<br>कार्या यथोक्ता वसुधाधिपेन॥ २६॥ | विकारोंका हो जाना—ये उत्पात शिशिर-ऋतुमें शुभदायी माने गये हैं। इन ऋतु-स्वभावके अतिरिक्त अन्य उत्पन्न हुए अद्भुत उत्पातके देखे जानेके बाद राजाको शीघ्र ही शास्त्रानुकूल कही गयी शान्तिका विधान करना चाहिये॥ १४—२६॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तिकोत्पत्तिर्नामैकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अद्भुत उत्पातोंकी शान्ति नामक दो सौ उनतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२९॥


दो सौ तीसवाँ अध्याय

अद्भुत उत्पातके लक्षण तथा उनकी शान्तिके उपाय

| गर्ग उवाच<br>देवतार्चाः प्रनृत्यन्ति वेपन्ते प्रज्वलन्ति च।<br>वमन्त्यग्निं तथा धूमं स्नेहं रक्तं तथा वसाम्॥ १<br>आरटन्ति रुदन्त्येताः प्रस्विद्यन्ति हसन्ति च।<br>उत्तिष्ठन्ति निषीदन्ति प्रधावन्ति धमन्ति च॥ २<br>भुञ्जते विक्षिपन्ते वा कोशप्रहरणध्वजान्।<br>अवाङ्मुखा वा तिष्ठन्ति स्थानात् स्थानं भ्रमन्ति च॥ ३<br>एवमाद्या हि दृश्यन्ते विकाराः सहसोत्थिताः।<br>लिङ्गायतनविप्रेषु तत्र वासं न रोचयेत्॥ ४<br>राज्ञो वा व्यसनं तत्र स च देशो विनश्यति।<br>देवयात्रासु चोत्पातान् दृष्ट्वा देशभयं वदेत्॥ ५ | गर्गजी बोले— जब देव-मूर्तियाँ नाचने लगती हैं, काँपती हैं, जल उठती हैं, अग्नि, धुआँ, तेल, रक्त और चर्बी उगलने लगती हैं, जोर-जोरसे चिल्लाती हैं, रोती हैं, पसीना बहाने लगती हैं, हँसती हैं, उठती हैं, बैठती हैं, दौड़ने लगती हैं, मुँह बजाने लगती हैं, खाती हैं, कोश, अस्त्र और ध्वजाओंको फेंकने लगती हैं, नीचे मुख किये बैठी रहती हैं अथवा एक स्थानसे दूसरे स्थानपर भ्रमण करने लगती हैं—इस प्रकारके सहसा उत्पन्न हुए उत्पात यदि शिव-लिङ्ग, देवमन्दिर तथा ब्राह्मणोंके पुरमें दिखायी पड़ें तो उस स्थानपर निवास नहीं करना चाहिये। ऐसे उत्पातोंके होनेपर या तो राजापर कोई बड़ी आपत्ति आती है अथवा उस देशका विनाश होता है। देवताके दर्शनके लिये जाते समय यदि उपर्युक्त उत्पात दिखायी पड़ें तो उस देशको भय बतलाना चाहिये॥ १—५॥ | | पितामहस्य हर्म्येषु तत्र वासं न रोचयेत्।<br>पशूनां रुद्रजं ज्ञेयं नृपाणां लोकपालजम्॥ ६<br>ज्ञेयं सेनापतीनां तु यत् स्यात् स्कन्दविशाखजम्।<br>लोकानां विष्णुवस्विन्द्रविश्वकर्मसमुद्भवम्॥ ७<br>विनायकोद्भवं ज्ञेयं गणानां ये तु नायकाः।<br>देवप्रेष्यान् नृपप्रेष्या देवस्त्रीभिर्नृपस्त्रियः॥ ८<br>वासुदेवोद्भवं ज्ञेयं ग्रहाणामेव नान्यथा।<br>देवतानां विकारेषु श्रुतिवेत्ता पुरोहितः॥ ९ | गृहसम्बन्धी उत्पातोंको ब्रह्मासे सम्बद्ध जानना चाहिये, अतः वहाँ निवास न करे। पशुओंके उत्पातोंको रुद्रसे उत्पन्न और राजाओंके उत्पातोंको लोकपालसे उत्पन्न जानना चाहिये। सेनापतियोंके उत्पातोंको स्कन्द तथा विशाखसे उत्पन्न तथा लोकोंके उत्पातोंको विष्णु, वसु, इन्द्र और विश्वकर्मासे उद्भूत समझना चाहिये। जो गणोंके नायक हैं, उनपर घटित होनेवाला उत्पात विनायकसे उद्भूत जानना चाहिये। देवदूतोंकी अप्रसन्नतासे राजदूतोंपर तथा देवाङ्गनाओंके द्वारा राजपत्नियोंपर उत्पात घटित होते हैं। ग्रहोंके उपद्रवको भगवान् वासुदेवसे उत्पन्न हुआ समझना चाहिये। महाभाग! देवताओंमें |

२३९- ग्रहयागका विधान

Page 921Permalink
* अध्याय २३१ *९११

| देवतार्चां तु गत्वा वै स्नानमाच्छाद्य भूषयेत्।<br>पूजयेच्च महाभाग गन्धमाल्यान्नसम्पदा॥ १०<br>मधुपर्केण विधिवदुपतिष्ठेदनन्तरम्।<br>तल्लिङ्गेन च मन्त्रेण स्थालीपाकं यथाविधि।<br>पुरोधा जुहुयाद् वह्नौ सप्तरात्रमतन्द्रितः॥ ११<br>विप्रांश्च पूज्या मधुरान्नपानैः<br>सदक्षिणं सप्तदिनं नरेन्द्र।<br>प्राप्तेऽष्टमेऽह्नि क्षितिगोप्रदानैः<br>सकाञ्चनैः शान्तिमुपैति पापम्॥ १२ | उपर्युक्त विकारोंके उत्पन्न होनेपर वेदज्ञ पुरोहित देवमूर्तिके पास जाकर उसे स्नान कराये, वस्त्रादिसे अलंकृत करे तथा चन्दन, पुष्पमाला और भक्ष्यपदार्थसे उसकी पूजा करे। तदनन्तर विधिपूर्वक मधुपर्क निवेदन करे। फिर वह पुरोहित ब्राह्मण सावधानीपूर्वक उक्त प्रतिमाके मन्त्रसे स्थालीपाकद्वारा सात दिनोंतक विधिपूर्वक अग्निमें आहुति डाले। नरेन्द्र! उक्त सातों दिनोंतक मधुर अन्न-पानादि सामग्रियोंद्वारा तथा उत्तम दक्षिणा देकर ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। आठवें दिन पृथ्वी, सुवर्ण तथा गौका दान करनेसे पाप शान्त हो जाता है॥ ६—१२ ॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तावर्चवाधिकारो नाम त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अद्भुत-शान्तिके प्रसङ्गमें पूजाधिकार नामक दो सौ तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २३० ॥


दो सौ इकतीसवाँ अध्याय

अग्निसम्बन्धी उत्पातके लक्षण तथा उनकी शान्तिके उपाय

गर्ग उवाचगर्गजीने कहा—
अनग्निर्ददीप्यते यत्र राष्ट्रे यस्य निरिन्धनः।<br>न दीप्यते चेन्धनवांस्तद्राष्ट्रं पीड्यते नृपैः॥ १जिस देशमें ईंधनके बिना ही अग्नि जल उठती है और ईंधन लगानेपर भी अग्नि प्रज्वलित नहीं होती, वह देश राजाओंसे पीड़ित होता है।
प्रज्वलेदप्सु मांसं वा तदर्थं वापि किञ्चन।<br>प्राकारं तोरणं द्वारं नृपवेश्म सुरालयम्॥ २<br>एतानि यत्र दीप्यन्ते तत्र राज्ञो भयं भवेत्।<br>विद्युता वा प्रदह्यन्ते तदापि नृपतेर्भयम्॥ ३जहाँ जलमें मांस जलने लगता है या उसका कोई भाग जल जाता है, किलेकी चहारदीवारी, प्रवेशद्वार, तोरण, राजभवन और देवालय—ये अकस्मात् जल उठते हैं वहाँ राजाको भय प्राप्त होता है। यदि ये उपर्युक्त वस्तुएँ बिजली गिरनेसे जल जाती हैं तब भी राजाको भय प्राप्त होता है।
अनैशानि तमांसि स्युर्विना पांसुरजांसि च।<br>धूमश्चानग्निजो यत्र तत्र विन्द्यान्महाभयम्॥ ४जहाँ रात्रि तथा धूलि एवं रजःकणोंके बिना ही अन्धकार छा जाय और अग्निके बिना धुआँ दिखायी पड़े, वहाँ महाभयकी प्राप्ति जाननी चाहिये।
तडित् त्वनभ्रे गगने भयं स्यादृक्षवर्जिते।<br>दिवा सतारे गगने तथैव भयमादिशेत्॥ ५बादल और नक्षत्रोंसे रहित आकाशमें बिजली कौंधने लगे तो भय प्राप्त होता है। इसी प्रकार दिनमें गगनमण्डल तारायुक्त हो जाय तो भी उसी प्रकारका भय कहना चाहिये॥१—५॥
Page 922Permalink

९१२ * मत्स्यपुराण *


| ग्रहनक्षत्रवैकृत्ये ताराविषमदर्शने।<br>पुरवाहनयानेषु चतुष्पान्मृगपक्षिषु॥ ६<br>आयुधेषु च दीप्तेषु धूमायत्सु तथैव च।<br>निगमत्सु च कोशाच्च संग्रामस्तुमुलो भवेत्॥ ७<br>विनाग्निं विस्फुलिङ्गाश्च दृश्यन्ते यत्र कुत्रचित्।<br>स्वभावाच्चापि पूर्यन्ते धनूंषि विकृतानि च॥ ८<br>विकारश्चायुधानां स्यात् तत्र संग्राममादिशेत्।<br>त्रिरात्रोपोषितश्चात्र पुरोधाः सुसमाहितः॥ ९<br>समिद्भिः क्षीरवृक्षाणां सर्षपैश्च घृतेन च।<br>होमं कुर्यादग्निमन्त्रैर्ब्राह्मणांश्चैव भोजयेत्॥ १०<br>दद्यात् सुवर्णं च तथा द्विजेभ्यो<br>गाश्चैव वस्त्राणि तथा भुवं च।<br>एवं कृते पापमुपैति नाशं<br>यदग्निवैकृत्यभवं द्विजेन्द्र॥ ११ | ग्रहों और नक्षत्रोंमें विकारका हो जाना, ताराओंमें विषमताका दिखायी पड़ना, ग्राम, वाहन, रथ, चौपाये, मृग, पक्षी तथा शस्त्रास्त्रोंका अपने-आप प्रज्वलित हो उठना अथवा धूमिल हो जाना और कोशसे अस्त्रादिका निकलना तुमुल संग्रामका सूचक है। जहाँ-कहीं भी अग्निके बिना चिनगारियाँ दिखायी पड़ने लगें, स्वाभाविक ढंगसे ही धनुषकी डोरियाँ चढ़ जायें या विकृत हो जायें तथा शस्त्रास्त्रोंमें विकार उत्पन्न हो जाय तो वहाँ संग्राम बतलाना चाहिये। ऐसी दशामें वहाँका पुरोहित तीन रात्रितक उपवासकर अत्यन्त समाहित-चित्तसे दूधवाले वृक्षोंकी लकड़ियों, सरसों तथा घीसे अग्नि-मन्त्रोंद्वारा हवन करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन कराये तथा उन्हें सुवर्ण, गौएँ, वस्त्र और पृथिवीका दान दे। द्विजेन्द्र! ऐसा करनेसे अग्नि-विकार-सम्बन्धी पाप नष्ट हो जाता है॥ ६—११॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तावग्निवैकृत्यं नामैकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २३१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अद्भुत-शान्तिके प्रसंगमें अग्निविकार नामक दो सौ इकतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३१॥


दो सौ बत्तीसवाँ अध्याय

वृक्षजन्य उत्पातके लक्षण और उनकी शान्तिके उपाय

| गर्ग उवाच<br>पुरेषु येषु दृश्यन्ते पादपा देवचोदिताः।<br>रुदन्तो वा हसन्तो वा स्रवन्तो वा रसान् बहून्॥ १<br>अरोगा वा विना वातं शाखां मुञ्चन्त्यथ द्रुमाः।<br>फलं पुष्पं तथाकाले दर्शयन्ति त्रिहायनाः॥ २<br>पूर्ववत् स्वं दर्शयन्ति फलं पुष्पं तथान्तरे।<br>क्षीरं स्नेहं तथा रक्तं मधु तोयं स्रवन्ति च॥ ३<br>शुष्यन्त्यरोगाः सहसा शुष्का रोहन्ति वा पुनः।<br>उत्तिष्ठन्तीह पतिताः पतन्ति च तथोत्थिताः॥ ४<br>तत्र वक्ष्यामि ते ब्रह्मन् विपाकं फलमेव च। | गर्गजीने कहा—ब्रह्मन्! जिन ग्रामोंमें दैव-प्रेरित वृक्ष अपने-आप रोते, हँसते, प्रचुर परिमाणमें रस बहाते हुए किसी रोग अथवा वायुके बिना डालियाँ गिराते हैं, तीन ही वर्षके वृक्ष असमयमें फलने-फूलने लगते हैं, अन्यत्र कोई-कोई वृक्ष ऋतुकालकी भाँति अपनेको फलों और पुष्पोंसे लदे हुए दिखलाते हैं तथा दुग्ध, तैल, रक्त, मधु और जल बहाते हैं, किसी रोगके बिना ही सहसा सूख जाते हैं अथवा सूखे हुए पुनः अङ्कुरित हो जाते हैं, गिरे हुए उठकर खड़े हो जाते हैं तथा खड़े हुए गिर पड़ते हैं, वहाँ होनेवाला परिणाम और फल मैं आपको बतला रहा हूँ, सुनिये॥ १—४ ½ ॥ |

Page 923Permalink
* अध्याय २३२ *९१३
रोदने व्याधिमभ्येति हसने देशविभ्रमम् ॥ ५<br>शाखाप्रपतनं कुर्यात् संग्रामे योधपातनम् ।<br>बालानां मरणं कुर्युरकाले पुष्पिता द्रुमाः ॥ ६<br>स्वराष्ट्रभेदं कुरुते फलपुष्पमथान्तरे ।<br>क्षयः सर्वत्र गोक्षीरे स्नेहे दुर्भिक्षलक्षणम् ॥ ७<br>वाहनापचयं मद्ये रक्ते संग्राममादिशेत् ।<br>मधुस्रावे भवेद् व्याधिर्जंलस्रावे न वर्षति ॥ ८<br>अरोगशोषणं ज्ञेयं ब्रह्मन् दुर्भिक्षलक्षणम् ।<br>शुष्केषु सम्प्ररोहस्तु वीर्यमन्नं च हीयते ॥ ९<br>उत्थाने पतितानां च भयं भेदकरं भवेत् ।<br>स्थानात् स्थानं तु गमने देशभङ्गस्तथा भवेत् ॥ १०<br>ज्वलत्स्वपि च वृक्षेषु रुदत्स्वपि धनक्षयम् ।<br>एतत्पूजितवृक्षेषु सर्वं राज्ञो विपद्यते ॥ ११<br>पुष्पे फले वा विकृते राज्ञो मृत्युं तथाऽऽदिशेत् ।<br>अन्येषु चैव वृक्षेषु वृक्षोत्पातेष्वतन्द्रितः ॥ १२<br>आच्छादयित्वा तं वृक्षं गन्धमाल्यैर्विभूषयेत् ।<br>वृक्षोपरि तथा च्छत्रं कुर्यात् पापप्रशान्तये ॥ १३<br>शिवमभ्यर्चयेद् देवं पशुं चास्मै निवेदयेत् ।<br>रुद्रेभ्य इति वृक्षेषु हुत्वा रुद्रं जपेत् ततः ॥ १४<br>मध्वाज्ययुक्तेन तु पायसेन<br>  सम्पूज्य विप्रांश्च भुवं च दद्यात् ।<br>गीतेन नृत्येन तथार्चयेत्तु<br>  देवं हरं पापविनाशहेतोः ॥ १५ब्रह्मन्! वृक्षोंके रुदन करनेपर व्याधियाँ फैलती हैं, हँसनेपर देशमें संकटकी वृद्धि होती है, शाखाओंके गिरनेसे संग्राममें योद्धाओंका विनाश होता है, असमयमें फूले हुए वृक्ष बालकोंकी मृत्यु सूचित करते हैं, वृक्षसमूहोंमेंसे किसी-किसीके फलने-फूलनेपर अपने राष्ट्रमें भेद उत्पन्न होता है, गायके दूध गिरनेसे चारों ओर विनाश उपस्थित होता है, तेलका गिरना दुर्भिक्षका लक्षण है, मदिराके गिरनेसे वाहनोंका विनाश होता है, रक्त गिरनेपर संग्राम बतलाना चाहिये, मधु चूनेसे व्याधियाँ फैलती हैं, जल गिरनेसे वृष्टि नहीं होती। किसी रोगके बिना वृक्षोंका सूख जाना दुर्भिक्षका लक्षण जानना चाहिये। सूखे हुए वृक्षसे अंकुर फूटनेपर वीर्य (पराक्रम) और अन्नकी हानि होती है। गिरे हुए वृक्षोंके उठनेपर भेदकारी भय होता है तथा एक स्थानसे दूसरे स्थानपर जानेसे देश-भङ्ग होता है, वृक्षोंके अकस्मात् जलने तथा रुदन करनेपर सम्पत्तिका विनाश होता है। ये उपद्रव यदि पूजित वृक्षोंमें होते हैं तो अवश्य ही राजापर विपत्तियाँ आती हैं। वृक्षोंके फलों तथा फूलोंमें विकार होनेपर राजाकी मृत्यु कहनी चाहिये। इसी प्रकार अन्यान्य वृक्षोंमें भी उपद्रवके लक्षणोंके दिखायी पड़नेपर उत्साही ब्राह्मण उस वृक्षको ऊपरसे ढककर चन्दन और पुष्पमालासे भूषित करे और पापकी शान्तिके लिये वृक्षके ऊपर छत्र लगाये। तदनन्तर शिवकी पूजा करे और पशुको 'रुद्रेभ्यः०' इस संकल्पसे निवेदित कर वृक्षोंके नीचे हवन करनेके पश्चात् शिवका जप करे। फिर मधु तथा घृतयुक्त खीरसे ब्राह्मणोंको संतुष्ट कर उन्हें पृथ्वीका दान दे और उस पापकी शान्तिके लिये गीत तथा नृत्यका आयोजन कराकर भगवान् शंकरकी अर्चना करे॥ ५–१५॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तौ वृक्षोत्पातप्रशमनं नाम द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३२ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अद्भुत-शान्ति-प्रकरणमें वृक्षोत्पात-प्रशमन नामक दो सौ बत्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २३२ ॥

२४०- राजाओंकी विजयर्थ यात्राका विधान

Page 924Permalink
९९४* मत्स्यपुराण *

दो सौ तैंतीसवाँ अध्याय

वृष्टिजन्य उत्पातके लक्षण और उनकी शान्तिके उपाय

गर्ग उवाचगर्गजीने कहा—
अतिवृष्टिरनावृष्टिर्दुर्भिक्षादि भयं मतम्।<br>अनृतौ तु दिवानन्ता वृष्टिर्ज्ञेया भयानका॥ १मुने! अतिवृष्टि और अनावृष्टि—ये दोनों दुर्भिक्षादिजन्य भयका कारण मानी गयी हैं। वर्षा-ऋतुके बिना दिनमें अनन्त वृष्टिका होना अत्यन्त भयानक है।
अनभ्रे वैकृता चैव विज्ञेया राजमृत्यवे।<br>शीतोष्णानां विपर्यासे नृपाणां रिपुजं भयम्॥ २बादलरहित आकाशमें विकृत हुई वृष्टिको राजाकी मृत्युका कारण जानना चाहिये। शीतकालमें गर्मी एवं ग्रीष्ममें सर्दी पड़नेसे राजाओंपर शत्रुपक्षसे भय होता है।
शोणितं वर्षते यत्र तत्र शस्त्रभयं भवेत्।<br>अङ्गारपांशुवर्षेषु नगरं तद् विनश्यति॥ ३जिस स्थानपर आकाशसे रक्तकी वर्षा होती है वहाँ शस्त्रभय प्राप्त होता है। अङ्गार और धूलिकी वृष्टि होनेपर वह नगर विनष्ट हो जाता है।
मज्जास्थिस्नेहमांसानां जनमारभयं भवेत्।<br>फलं पुष्पं तथा धान्यं परेणातिभयाय तु॥ ४मज्जा, हड्डी, तेल और मांसकी वृष्टि होनेपर प्रजावर्गमें मृत्युका भय उपस्थित होता है। आकाशसे फल, पुष्प तथा अन्नकी वृष्टि शत्रुपक्षसे अत्यन्त भयका द्योतन करती है।
पांशुजन्तूपलानां च वर्षतो रोगजं भयम्।<br>छिद्रे चान्नप्रवर्षेण सस्यानां भीतिवर्धनम्॥ ५धूलि, जन्तु और उपलोंके गिरनेसे रोगजन्य भय प्राप्त होता है। रुक-रुककर अन्नकी वृष्टि होनेसे फसलके भयकी वृद्धि होती है।
विरजस्के रवौ व्यभ्रे यदा छाया न दृश्यते।<br>दृश्यते तु प्रतीपा वा तत्र देशभयं भवेत्॥ ६सूर्यके बादल एवं धूलिसे रहित रहनेपर जब परछाई नहीं दीखती अथवा विपरीत दिखायी पड़ती है, तब सारे देशको भय प्राप्त होता है।
निरभ्रे वाथ रात्रौ वा श्वेतं याम्योत्तरेण तु।<br>इन्द्रायुधं तथा दृष्ट्वा उल्कापातं तथैव च॥ ७बादलरहित रात्रिमें दक्षिण अथवा उत्तर दिशामें श्वेत रंगका इन्द्रधनुष, उल्कापात,
दिग्दाहपरिवेषौ च गन्धर्वनगरं तथा।<br>परचक्रभयं ब्रूयाद् देशोपद्रवमेव च॥ ८दिशाओंमें दाह, सूर्य तथा चन्द्रमामें मण्डल तथा गन्धर्वनगर दिखायी पड़े तो उस समय देशपर शत्रु-पक्षकी सेनाका आक्रमण और देशमें विविध उपद्रवोंके संघटित होनेकी सम्भावना कहनी चाहिये।
सूर्येन्दुपर्जन्यसमीरणानां<br>यागस्तु कार्यो विधिवद् द्विजेन्द्र।<br>धनानि गौः काञ्चनदक्षिणा च<br>देया द्विजानामघनाशहेतोः॥ ९द्विजेन्द्र! ऐसे अवसरपर सूर्य, चन्द्रमा, मेघ और वायुके उद्देश्यसे विधिपूर्वक यज्ञ करना चाहिये और इस पापके विनाशके लिये ब्राह्मणोंको धन, गौ तथा सुवर्णकी दक्षिणा देनी चाहिये॥ १—९॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तौ वृष्टिवैकृतिप्रशमनं नाम त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २३३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अद्भुतशान्ति-प्रसंगमें वृष्टि-विकारशमन नामक दो सौ तैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३३॥

Page 925Permalink
* अध्याय २३५ *९९५

दो सौ चौंतीसवाँ अध्याय

जलाशयजनित विकृतियाँ और उनकी शान्तिके उपाय

SanskritHindi
गर्ग उवाच<br><br>नगरादपसर्पन्ते समीपमुपयान्ति च।<br>नद्यो ह्रदप्रस्रवाणि विरसाश्च भवन्ति च॥ १<br><br>विवर्णं कलुषं तप्तं फेनवज्जन्तुसंकुलम्।<br>स्नेहं क्षीरं सुरां रक्तं वहन्ते व्याकुलोदकाः॥ २<br><br>षण्मासाभ्यन्तरे तत्र परचक्रभयं भवेत्।<br>जलाशया नदन्ते वा प्रज्वलन्ति कथञ्चन॥ ३<br><br>विमुञ्चन्ति तथा ब्रह्मन् ज्वालाधूमरजांसि च।<br>अखाते वा जलोत्पत्तिः सुसत्त्वा वा जलाशयाः॥ ४<br><br>संगीतशब्दाः श्रूयन्ते जनमारभयं भवेत्।<br>दिव्यमम्भोमयं सर्पिर्मधुतेलावेसेचनम्॥ ५<br><br>जप्तव्या वारुणा मन्त्रास्तैश्च होमो जले भवेत्॥ ६<br><br>मध्वाज्ययुक्तं परमान्नमत्र<br>देयं द्विजानां द्विजभोजनार्थम्।<br><br>गावश्च देयाः सितवस्त्रयुक्ता-<br>स्तथोदकुम्भाः सलिलाघशान्त्यै॥ ७**गर्गजीने कहा—**ब्रह्मन्! जब नदियाँ, सरोवर या झरने नगरसे दूर हट जाते हैं या अत्यन्त समीप चले आते हैं, सूख जाते हैं, मलिन, कलुषित, संतप्त तथा फेनके समान जन्तुओंसे व्याप्त हो जाते हैं, तेल, दूध, मदिरा और रक्त बहाने लगते हैं अथवा उनका जल विक्षुब्ध हो उठता है, तब छः महीनेके भीतर उस देशपर शत्रुपक्षकी सेनासे भय प्राप्त होनेकी सम्भावना होती है। जब किसी प्रकारसे जलाशय शब्द करने लगते हैं या जलने लगते हैं तथा लपटें, धुआँ एवं धूलि फेंकने लगते हैं, बिना खोदे ही जल निकलने लगता है, जलाशय बड़े-बड़े जन्तुओंसे भर जाते हैं और उनमेंसे संगीतकी ध्वनियाँ सुनायी पड़ने लगती हैं, तब प्रजावर्गके मरणका भय उपस्थित होता है। ऐसे अवसरपर घी, मधु और तैलसे जलाशयोंका अभिषेक कर वरुणके मन्त्रोंका जप करना चाहिये और उन्हीं मन्त्रोंका उच्चारण कर जलमें हवन करना चाहिये। तदनन्तर ब्राह्मणोंको भोजनार्थ मधु तथा घृत मिलाकर श्रेष्ठ अन्न देना चाहिये और जलके महापापकी शान्तिके लिये श्वेत वस्त्रोंसे युक्त गौएँ और जल रखनेके घड़े दान करने चाहिये॥ १-७॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तौ सलिलाशयवैकृत्यं नाम चतुस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २३४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अद्भुतशान्ति-प्रकरणमें जलाशय-विकार-शान्ति नामक दो सौ चौंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३४॥


दो सौ पैंतीसवाँ अध्याय

प्रसवजनित विकारका वर्णन और उसकी शान्ति

SanskritHindi
गर्ग उवाच<br><br>अकालप्रसवा नार्यः कालातीतप्रजास्तथा।<br>विकृतप्रसवाश्चैव युग्मसम्प्रसवास्तथा॥ १<br><br>अमानुषा ह्यतुण्डाश्च संजातव्यसनास्तथा।<br>हीनाङ्गा अधिकाङ्गाश्च जायन्ते यदि वा स्त्रियः॥ २**गर्गजीने कहा—**ब्रह्मन्! जब स्त्रियाँ बिना समय पूरा हुए अथवा पूरे समयके बहुत बाद प्रसव करती हैं, विकृत एवं जुड़वीं संतान पैदा करती हैं तथा मानवसे भिन्न, मुखहीन, जन्मते ही मर जानेवाले, अङ्गहीन और अधिक अङ्गवाले बच्चोंको जन्म देती हैं,

२४१- अङ्गस्फुरणके शुभाशुभ फल

Page 926Permalink

९१६ * मत्स्यपुराण *


| पशवः पक्षिणश्चैव तथैव च सरीसृपाः।<br>विनाशं तस्य देशस्य कुलस्य च विनिर्दिशेत्॥ ३<br>विवासयेत् तान् नृपतिः स्वराष्ट्रात्<br>स्त्रियश्च पूज्याश्च ततो द्विजेन्द्राः।<br>किमिच्छकैर्ब्राह्मणतर्पणैश्च<br>लोके ततः शान्तिमुपैति पापम्॥ ४ | उसी प्रकार वहाँके पशु, पक्षी और रेंगनेवाले जन्तु भी बच्चे देने लगते हैं, तब उस देश और कुलका विनाश कहना चाहिये। ऐसे उपद्रवोंके घटित होनेपर राजा अपने राष्ट्रसे उन पैदा होनेवाली संतानों और स्त्रियोंको निर्वासित कर दे। तदनन्तर ब्राह्मणोंकी विधिवत् पूजा करे। इस प्रकार इच्छानुसार ब्राह्मणोंको संतुष्ट करनेसे लोकमें पाप शान्तिको प्राप्त होता है॥१—४॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तौ प्रसववैकृत्यं नाम पञ्चत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २३५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अद्भुतशान्तिप्रसङ्गमें प्रसववैकृत्य नामक दो सौ पैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३५॥


दो सौ छत्तीसवाँ अध्याय

उपस्कर-विकृतिके लक्षण और उनकी शान्ति

| गर्ग उवाच<br>यान्ति यानान्ययुक्तानि युक्तान्यपि न यान्ति च।<br>चोद्यमानानि तत्र स्यान्महद्भयमुपस्थितम्॥ १<br>वाद्यमाना न वाद्यन्ते वाद्यन्ते चाप्यनाहताः।<br>अचलाश्च चलन्त्येव न चलन्ति चलानि च॥ २<br>आकाशे तूर्यनादाश्च गीतगन्धर्वनिःस्वनाः।<br>काष्ठदर्वीकुठारादि विकारं कुरुते यदि॥ ३<br>गावो लाङ्गूलसङ्घैश्च स्त्रियः स्त्री च विघातयेत्।<br>उपस्कारादिविकृतौ घोरं शस्त्रभयं भवेत्॥ ४<br>वायोस्तु पूजां द्विज सक्तुभिश्च<br>कृत्वा नियुक्तांश्च जपेच्च मन्त्रान्।<br>दद्यात् प्रभूतं परमान्नमत्र<br>सदक्षिणं तेन शमोऽस्य भूयात्॥ ५ | **गर्गजीने कहा—**ब्रह्मन्! जिस देशमें रथादि घोड़ोंके बिना जोते ही चलने लगते हैं और घोड़ोंके जोतनेपर एवं उन्हें हाँकनेपर भी नहीं चलते, वहाँ महान् भय उपस्थित होनेवाला है। बिना बजाये ही बाजे बजने लगते हैं और बजानेपर नहीं बजते, अचल वस्तुएँ चलने लगती हैं और चल अचल हो जाती हैं, आकाशमें तुरुहीकी ध्वनि और गन्धर्वोंकी गीतोंका शब्द सुनायी पड़ने लगता है, काष्ठ, करछुल एवं फावड़े आदिमें विकार उत्पन्न हो जाते हैं, गौएँ पूँछसे एक-दूसरेको मारने लगती हैं, स्त्रियाँ एक-दूसरेकी हत्या करने लगती हैं और घरेलू वस्तुओंमें भी विकार उत्पन्न हो जाते हैं, उस देशमें शस्त्रास्त्रोंसे घोर भय उत्पन्न होता है। ऐसे उत्पातोंके घटित होनेपर सत्तूसे वायुदेवकी पूजा करके उनके मन्त्रोंका जप करना चाहिये और प्रचुरपरिमाणमें दक्षिणासहित परमोत्तम अन्नका दान देना चाहिये। इसीसे उस उत्पातका शमन होता है॥१—५॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तावुपस्करवैकृत्यं नाम षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २३६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अद्भुतशान्ति-प्रकरणमें उपस्करशान्ति नामक दो सौ छत्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३६॥

Page 927Permalink
* अध्याय २३७ *१९७

दो सौ सैंतीसवाँ अध्याय

पशु-पक्षीसम्बन्धी उत्पात और उनकी शान्ति

गर्ग उवाच
प्रविशन्ति यदा ग्राममारण्या मृगपक्षिणः।<br>अरण्यं यान्ति वा ग्राम्याः स्थलं यान्ति जलोद्भवाः॥ १<br>स्थलजाश्च जलं यान्ति घोरं वाशन्ति निर्भयाः।<br>राजद्वारे पुरद्वारे शिवाश्चाप्यशिवप्रदाः॥ २<br>दिवा रात्रिंचरा वापि रात्रावपि दिवाचराः।<br>ग्राम्यास्त्यजन्ति ग्रामं च शून्यतां तस्य निर्दिशेत्॥ ३<br>दीप्ता वाशन्ति संध्यासु मण्डलानि च कुर्वते।<br>वाशन्ति विस्वरं यत्र तदाप्येतत्फलं लभेत्॥ ४<br>प्रदोषे कुक्कुटो वाशेद्धेमन्ते वापि कोकिलः।<br>अर्कोदयेऽर्काभिमुखी शिवा रौति भयं वदेत्॥ ५<br>गृहं कपोतः प्रविशेत् क्रव्यादो मूर्ध्नि लीयते।<br>मधु वा मक्षिकाः कुर्युर्मृत्युर्गृहपतेर्भवेत्॥ ६<br>प्राकारद्वारगेहेषु तोरणापणवीथिषु।<br>केतुच्छत्रायुधाद्येषु क्रव्यादं प्रपतेद् यदि॥ ७<br>जायन्ते वाथ वल्मीका मधु वा स्यन्दते यदि।<br>स देशो नाशमायाति राजा वा म्रियते तथा॥ ८गर्गजीने कहा— ब्रह्मन्! जब जंगली पशु-पक्षी ग्रामोंमें प्रवेश करने लगें या ग्रामीण पशु-पक्षी जंगलोंमें चले जायँ, जलमें रहनेवाले जीव-जन्तु भूमिपर रेंगने लगें या भूमिके जीव जलमें चले जायँ, अमङ्गलदायक शृगाल राजद्वार या नगरद्वारपर निर्भय होकर बोलना आरम्भ कर दें, दिनमें घूमनेवाले रात्रिमें और रात्रिमें घूमनेवाले दिनमें घूमने लगें तथा ग्राममें रहनेवाले जीव ग्रामको छोड़ दें, तब उस ग्रामकी शून्यताका निर्देश करना चाहिये। जब ग्रामोंमें पशु आदि जीवगण क्रोधोन्मत्त हो मण्डल बनाकर क्रूर स्वरमें चिल्लाने लगें, तब भी यही फल प्राप्त होता है। सायंकालमें मुर्गा बाँग देने लगे, हेमन्त-ऋतुमें कोकिल बोले और सूर्योदयके समय सूर्याभिमुखी हो शृगाली चिल्लाये तो भयका आगमन कहना चाहिये। घरमें कबूतर घुस आये, मस्तकपर मांसभक्षी पक्षी बैठ जाय और घरके भीतर मधुमक्खियाँ छत्ते लगायें तो उस घरके स्वामीकी मृत्यु होती है। यदि दुर्गादिके परकोटे, प्रवेशद्वार, राजभवन, तोरण (सिंहद्वार), बाजार, गली, पताका, ध्वज और अस्त्र-शस्त्रादिपर मांसभक्षी पक्षी बैठ जाय अथवा घरमें बिमवट हो जाय या छत्तेसे मधु चूने लगे तो उस देशका विनाश हो जाता है तथा राजाकी मृत्यु हो जाती है॥ १—८॥
मूषकाञ्शलभान् दृष्ट्वा प्रभूतं क्षुद्रयं भवेत्।<br>काष्ठोल्मुकास्थिशृङ्गाढ्याः श्वानो मर्कटवेदनाः॥ ९<br>दुर्भिक्षं वेदना ज्ञेया काका धान्यमुखा यदि।<br>जनानभिभवन्तीह निर्भया रणवेदिनः॥ १०<br>काको मैथुनसक्तश्च श्वेतस्तु यदि दृश्यते।<br>राजा वा म्रियते तत्र स च देशो विनश्यति॥ ११<br>उलूको वाशते यत्र नृपद्वारे तथा गृहे।<br>ज्ञेयो गृहपतेर्मृत्युर्धननाशस्तथैव च॥ १२चूहे और शलभ अधिक परिमाणमें दिखायी पड़ें तो दुर्भिक्ष पड़ता है। लकड़ीके लुआठे, हड्डियाँ, सींगवाले जानवर, कुत्ते और बन्दरोंकी अधिकता होनेपर देशमें व्याधियाँ फैलनेका भय रहता है। यदि कौए चोंचमें अन्न लेकर निर्भयतापूर्वक लोगोंपर टूट पड़ते हों तो दुर्भिक्ष और रण छिड़नेकी सम्भावना समझनी चाहिये। यदि श्वेत कौआ मैथुन करते हुए दिखलायी पड़ जाय तो उस देशका राजा मर जाता है अथवा वह देश विनष्ट हो जाता है। जहाँ राजाके द्वार तथा घरपर उल्लू बोलता हो, वहाँ उस घरके स्वामीकी मृत्यु तथा सम्पत्तिका विनाश जानना चाहिये।

२४२- शुभाशुभ स्वप्नोंके लक्षण

Page 928Permalink
९१८* मत्स्यपुराण *

| मृगपक्षिविकारेषु कुर्याद्धोमं सदक्षिणम्।<br>देवाः कपोता इति वा जप्तव्याः पञ्चभिर्द्विजैः ॥ १३<br>गावश्च देया विधिवद् द्विजानां<br>सकाञ्चना वस्त्रयुगोत्तरीयाः ।<br>एवं कृते शान्तिमुपैति पापं<br>मृगैर्द्विजैर्वा विनिवेदितं यत् ॥ १४ | इस प्रकार पशु-पक्षीसम्बन्धी उत्पातोंके होनेपर दक्षिणासहित हवन करना चाहिये या पाँच ब्राह्मणोंको ‘देवाः कपोता’—इस मन्त्रका जप करना चाहिये। ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक सुवर्ण तथा दुपट्टेसहित दो वस्त्रोंसे युक्त गौओंका दान करना चाहिये। ऐसा करनेसे पशुओं एवं पक्षियोंद्वारा सूचित किया गया पाप शान्त हो जाता है॥ ९—१४॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तौ मृगपक्षिवैकृत्यं नाम सप्तत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अद्भुतशान्ति-प्रसंगमें पशु-पक्षी-विकार-शान्ति नामक दो सौ सैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३७॥


दो सौ अड़तीसवाँ अध्याय

राजाकी मृत्यु तथा देशके विनाशसूचक लक्षण और उनकी शान्ति

गर्ग उवाचगर्गजीने कहा—
प्रासादतोरणाट्टालद्वारप्राकारवेश्मनाम् ।<br>निर्निमित्तं तु पतनं दृढानां राजमृत्युवे ॥ १ब्रह्मन्! सुदृढ़ राजभवन, तोरण, अट्टालिका, प्रवेशद्वार, परकोटा और घरका अकारण गिरना राजाकी मृत्युका कारण होता है।
रजसा वाथ धूमेन दिशो यत्र समाकुलाः ।<br>आदित्यचन्द्रताराश्च विवर्णा भयवृद्धये ॥ २जहाँ दिशाएँ धूलि अथवा धूएँसे व्याप्त दिखायी पड़ती हैं तथा सूर्य, चन्द्रमा और ताराओंका रंग बदल जाता है तो यह भी भय-वृद्धिका सूचक है।
राक्षसा यत्र दृश्यन्ते ब्राह्मणाश्च विधर्मिणः ।<br>ऋतवश्च विपर्यस्ता अपूज्यः पूज्यते जनैः ॥ ३जहाँ राक्षस दिखायी पड़ते हों, ब्राह्मण विधर्मी हों, ऋतुओंका विपर्यय हो, लोग अपूज्यकी पूजा करते हों
नक्षत्राणि वियोगीनि तन्महद्भयलक्षणम् ।<br>केतूदयोपरागो च छिद्रं वा शशिसूर्ययोः ॥ ४और नक्षत्रगण आकाशसे नीचे गिरने लगें तो यह महान् भयका लक्षण है। जहाँ केतुका उदय, ग्रहण, चन्द्र-सूर्यके बिम्बमें छिद्र
ग्रहर्क्षविकृतिर्यत्र तत्रापि भयमादिशेत् ।<br>स्त्रियश्च कलहायन्ते बाला निघ्नन्ति बालकान् ॥ ५तथा ग्रह और नक्षत्रोंमें विकार दिखायी दे, वहाँ भी भयकी सम्भावना कहनी चाहिये। जहाँ स्त्रियाँ आपसमें झगड़ने लगें, बालक बच्चोंको मारने लगें,
क्रियाणामुचितानां च विच्छित्तिर्यत्र जायते ।<br>हूयमानस्तु यत्राग्निर्नोद्दीप्यते न च शान्तिषु ॥ ६उचित कार्योंका विनाश होने लगे, शान्तिकर्मोंमें आहुति देनेपर भी अग्नि उद्दीप्त न हो,
पिपीलिकाश्च क्रव्यादा यान्ति चोत्तरतस्तथा ।<br>पूर्णकुम्भाः स्रवन्ते च हविर्वा विप्रलुप्यते ॥ ७पिपीलिका और मांसभक्षी पक्षी उत्तर दिशा होकर जायें, भरे हुए घटोंमें रखी हुई वस्तुओंका चूना, हविका नष्ट हो जाना,
मङ्गल्याश्च गिरो यत्र न श्रूयन्ते समंततः ।<br>क्षवथुर्बाधते वाथ प्रहसन्ति नदन्ति च ॥ ८चारों ओरसे माङ्गलिक वाणियोंका न सुना जाना, लोगोंमें कास-रोगकी पीड़ा, जनतामें अकारण हँसी और गानेकी अभिरुचि,
न च देवेषु वर्तन्ते यथावद् ब्राह्मणेषु च ।<br>मन्दघोषाणि वाद्यानि वाद्यन्ते विस्वराणि च ॥ ९देवता और ब्राह्मणोंके प्रति उचित बर्तावका अभाव, बाजोंका मन्द एवं विकृत स्वरमें बजना,
गुरुमित्रद्विषो यत्र शत्रुपूजारता नराः ।<br>ब्राह्मणान् सुहृदो मान्यान् जनो यत्रावमन्यते ॥ १०लोगोंमें गुरु एवं मित्रोंसे द्वेष तथा शत्रु की पूजामें अभिरुचि, ब्राह्मण, मित्र और माननीय लोगोंका अपमान तथा
Page 929Permalink

* अध्याय २३९ * ९९९

शान्तिमङ्गलहोमेषु नास्तिक्यं यत्र जायते।<br>राजा वा म्रियते तत्र स देशो वा विनश्यति॥ ११<br>राज्ञो विनाशे सम्प्राप्ते निमित्तानि निबोध मे।<br>ब्राह्मणान् प्रथमं द्वेष्टि ब्राह्मणैश्च विरुध्यते॥ १२<br>ब्राह्मणस्वानि चादत्ते ब्राह्मणांश्च जिघांसति।<br>न च स्मरति कृत्येषु याचितश्च प्रकुप्यति॥ १३<br>रमते निन्दया तेषां प्रशंसां नाभिनन्दति।<br>अपूर्वं तु करं लोभात् तथा पातयते जने॥ १४<br>एतेष्वभ्यर्चयेच्छक्रं सपत्नीकं द्विजोत्तम।<br>भोज्यानि चैव कार्याणि सुराणां बलयस्तथा।<br>सन्तो विप्राश्च पूज्याः स्युस्तेभ्यो दानं च दीयताम्॥ १५<br>गावश्च देया द्विजपुङ्गवेभ्यो<br>भुवस्तथा काञ्चनमम्बराणि।<br>होमश्च कार्योऽमरपूजनं च<br>एवं कृते पापमुपैति शान्तिम्॥ १६शान्तिपाठ, माङ्गलिक कार्य और हवनादिमें नास्तिकताका प्रभाव दिखायी पड़े, वहाँका राजा मर जाता है अथवा वह देश विनष्ट हो जाता है॥ ९—११॥<br>द्विजोत्तम! अब मैं राजाका विनाश उपस्थित होनेपर उत्पन्न होनेवाले निमित्तोंको बतला रहा हूँ, सुनिये। वह राजा सर्वप्रथम ब्राह्मणोंसे द्वेष करने लगता है, ब्राह्मणोंसे विरोध करता है, ब्राह्मणोंकी सम्पत्तिको हड़प लेता है, ब्राह्मणोंके मारनेका उपक्रम करता है, उसे सत्कार्योंके सम्पादनका स्मरण नहीं होता, वह माँगनेपर क्रुद्ध होता है, ब्राह्मणोंकी निन्दामें विशेष रुचि रखता है और प्रशंसाका अभिनन्दन नहीं करता, लोभवश लोगोंपर नया-नया कर लगाता है—ऐसे अवसरपर शचीसहित इन्द्रकी पूजा करनी चाहिये तथा ब्राह्मणोंको भोजन और अन्य देवताओंके उद्देश्यसे बलि प्रदान करना चाहिये। सत्पुरुषों एवं ब्राह्मणोंकी पूजा कर उन्हें दान देना चाहिये। श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको गौएँ, पृथ्वी, सुवर्ण और वस्त्रादिका दान, देवताओंकी पूजा तथा हवन करना चाहिये। ऐसा करनेसे पाप शान्त हो जाता है॥ १२—१६॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तावुत्पातप्रशमनं नामाष्टात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २३८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अद्भुतशान्ति-प्रसङ्गमें उत्पात-प्रशमन नामक दो सौ अड़तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३८॥


दो सौ उन्तालीसवाँ अध्याय

ग्रहयागका विधान

मनुरुवाचमनुजीने पूछा—
ग्रहयज्ञः कथं कार्यो लक्षहोमः कथं नृपैः।<br>कोटिहोमोऽपि वा देव सर्वपापप्रणाशनः॥ १<br>क्रियते विधिना येन यद् दृष्टं शान्तिचिन्तकैः।<br>तत् सर्वं विस्तराद् देव कथयस्व जनार्दन॥ २देव! राजाओंको ग्रहयज्ञ किस प्रकार करना चाहिये? सभी पापोंको नष्ट करनेवाले लक्षहोम तथा कोटिहोम करनेकी क्या विधि है? जनार्दन! यह जिस विधिसे किया जाता है तथा शान्तिका चिन्तन करनेवाले जिस विधिसे सम्पन्न किये हों, वह सब विस्तारपूर्वक बतलाइये॥ १-२॥
मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
इदानीं कथयिष्यामि प्रसङ्गादेव ते नृप।<br>राज्ञा धर्मप्रसक्तेन प्रजानां च हितेप्सुना॥ ३<br>ग्रहयज्ञः सदा कार्यो लक्षहोमसमन्वितः।<br>नदीनां संगमे चैव सुराणामग्रतस्तथा॥ ४राजन्! इस समय प्रसंगवश मैं तुम्हें उसे बतला रहा हूँ। धर्मपरायण एवं प्रजाओंके हितेच्छु राजाको लक्षहोमसहित ग्रहयज्ञ सदा करना चाहिये। इस ग्रहयज्ञको नदियोंके संगम तथा देवताओंके समक्ष

२४३- शुभाशुभ शकुनोंका निरूपण

Page 930Permalink

९२० * मत्स्यपुराण *


| सुसमे भूमिभागे च दैवज्ञाधिष्ठितो नृपः।<br>गुरुणा चैव ऋत्विग्भिः सार्धं भूमिं परीक्षयेत्॥ ५<br>खनेत् कुण्डं च तत्रैव सुसमं हस्तमात्रकम्।<br>द्विगुणं लक्षहोमे तु कोटिहोमे चतुर्गुणम्॥ ६<br>युग्मास्तु ऋत्विजः प्रोक्ता अष्टौ वै वेदपारगाः।<br>कन्दमूलफलाहारा दधिक्षीराशिनोऽपि वा॥ ७<br>वेद्यां निधापयेच्चैव रत्नानि विविधानि च।<br>सिकतापरिवेषान्च ततोऽग्निं च समिन्धयेत्॥ ८<br>गायत्र्या दशसाहस्रं मानस्तोकेन षड्गुणः।<br>त्रिंशद् ग्रहाणां मन्त्रैश्च चत्वारो विष्णुदैवतैः॥ ९<br>कूष्माण्डैर्जुहुयात् पञ्च कुसुमाद्यैस्तु षोडश।<br>होतव्या दशसाहस्रं बादरैर्जातवेदसि॥ १०<br>श्रियो मन्त्रेण होतव्याः सहस्राणि चतुर्दश।<br>शेषाः पञ्चसहस्त्रास्तु होतव्यास्त्विन्द्रदैवतैः॥ ११<br>हुत्वा शतसहस्रं तु पुण्यस्नानं समाचरेत्।<br>कुम्भैः षोडशसंख्यैश्च सहिरण्यैः सुमङ्गलैः॥ १२<br>स्नापयेद् यजमानं तु ततः शान्तिर्भविष्यति।<br>एवं कृते तु यत्किंचिद् ग्रहपीडासमुद्भवम्॥ १३<br>तत् सर्वं नाशमायाति दत्त्वा वै दक्षिणां नृप।<br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन प्रधाना दक्षिणा स्मृता॥ १४<br>हस्त्यश्वरथयानानि भूमिवस्त्रयुगानि च।<br>अनुडुद्गोशतं दद्याद् ऋत्विग्जां चैव दक्षिणाम्॥ १५<br>यथाविभवसारं तु वित्तशाठ्यं न कारयेत्।<br>मासे पूर्णे समाप्तस्तु लक्षहोमो नराधिप॥ १६<br>लक्षहोमस्य राजेन्द्र विधानं परिकीर्तितम्।<br>इदानीं कोटिहोमस्य शृणु त्वं कथयाम्यहम्॥ १७<br>गङ्गातटेऽथ यमुनासरस्वत्योर्न्ररेश्वर।<br>नर्मदादेविकायास्तु तटे होमो विधीयते॥ १८<br>तत्रापि ऋत्विजः कार्या रविनन्दन षोडश।<br>सर्वहोमे तु राजर्षे दद्याद् विप्रेऽथवा धनम्॥ १९<br>ऋत्विगाचार्यसहितो दीक्षां सांवत्सरीं स्थितः।<br>चैत्रे मासे तु सम्प्राप्ते कार्त्तिके वा विशेषतः॥ २०<br>प्रारम्भः करणीयो वा वत्सरं वत्सरं नृप। | समतल भूभागपर करना चाहिये। सर्वप्रथम राजा ज्योतिषीसे परामर्श कर गुरु और ऋत्विजोंके साथ भूमिकी परीक्षा करे। वहाँ एक हाथ गहरा चौकोर कुण्ड बनाये। लक्षहोममें यह कुण्ड दुगुना और कोटिहोममें चौगुना बड़ा बनाना चाहिये। इसके लिये सोलह ऋत्विज् बतलाये गये हैं, जो वेदोंके पारगामी विद्वान् कंद-मूल-फलका आहार करनेवाले अथवा दही-दूधका भोजन करनेवाले हों। यजमान राजा यज्ञवेदीपर विविध प्रकारके रत्न स्थापित करे। बालूद्वारा वेदीके चारों ओर मण्डल बनाकर अग्नि प्रज्वलित कराये। फिर गायत्रीमन्त्रद्वारा दस हजार, 'मानस्तोके०' (ऋ० ३।१३।६, वाजसनेयि १६।१६) आदि मन्त्रद्वारा छः हजार, ग्रहोंके मन्त्रोंसे तीस हजार, विष्णुसूक्तसे चार हजार, कोंहड़ेसे पाँच हजार, पुष्प-समूहसे सोलह हजार तथा बेरके फलोंसे दस हजार आहुतियाँ अग्निमें देनी चाहिये॥ ३-१०॥<br><br>इसी प्रकार श्रीसूक्तसे चौदह हजार आहुतियाँ देनी चाहिये और शेष पाँच हजार आहुतियाँ इन्द्र देवताके मन्त्रोंसे देनी चाहिये। फिर एक लाख आहुतियोंसे हवन कर पुण्यस्नान* सम्पन्न करे। तत्पश्चात् सुवर्णयुक्त सोलह मङ्गल-कलशोंसे यजमानको स्नान कराये, तब शान्तिकी प्राप्ति होती है। नृप! ऐसा करके दक्षिणा देनेपर ग्रहपीडासे उत्पन्न जो कुछ कष्ट होता है, वह सब नष्ट हो जाता है। इसीलिये सभी प्रकारसे दक्षिणाको ही प्रधान माना गया है। उस समय राजा अपनी सम्पत्तिके अनुकूल ऋत्विजोंको हाथी, घोड़े, रथ, वाहन, भूमि, जोड़े वस्त्र, बैल तथा सौ गौएँ दक्षिणारूपमें दे, कृपणता न करे। नराधिप! लक्षहोम एक मासमें समाप्त होता है। राजेन्द्र! इस प्रकार मैंने लक्षहोमका विधान आपको बतला दिया। अब मैं कोटिहोमका विधान बतला रहा हूँ, आप सुनिये। नरेश्वर! गङ्गा, यमुना और सरस्वतीके अथवा नर्मदा और देविका (सरयू)-के तटपर इस हवनके करनेका विधान है। रविनन्दन! इस कोटिहोममें भी सोलह ऋत्विजोंका वरण करना चाहिये। राजर्षे! सभी हवन-कार्योंमें ब्राह्मणोंको धन देना चाहिये। यजमान ऋत्विज् और आचार्यके साथ वर्षभरकी दीक्षा ग्रहण करे। राजन्! चैत्र अथवा विशेषतया कार्तिकका महीना आनेपर इस यज्ञको प्रारम्भ करना चाहिये। इसी प्रकार प्रतिवर्ष करनेका विधान है॥ ११-२०$\frac{१}{२}$॥ |


* पुण्यस्नानकी विस्तृत विधि बृहत्संहितामें दी गयी है।

Page 931Permalink

* अध्याय २३१ * | ९२१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यजमानः पयोभक्षी फलाशी च तथानघ ॥ २१<br>यवादिव्रीहयो माषास्तिलाश्च सह सर्षपैः।<br>पालाशाः समिधः शस्ता वसोर्धारा तथोपरि ॥ २२<br>मासेऽथ प्रथमे दद्याद् ऋग्भ्यः क्षीरभोजनम्।<br>द्वितीये कृसरां दद्याद् धर्मकामार्थसाधनीम् ॥ २३<br>तृतीये मासि संयावो देयो वै रविनन्दन।<br>चतुर्थे मोदका देया विप्राणां प्रीतिमावहन् ॥ २४<br>पञ्चमे दधिभक्तं तु षष्ठे वै सक्तुभोजनम्।<br>पूपाश्च सप्तमे देया ह्यष्टमे घृतपूपकाः ॥ २५<br>षष्ट्योदनं च नवमे दशमे यवषष्टिका।<br>एकादशे समाषं तु भोजनं रविनन्दन ॥ २६<br>द्वादशे त्वथ सम्प्राप्ते मासे रविकुलोद्बह।<br>षड्रसैः सह भक्ष्यैश्च भोजनं सार्वकामिकम् ॥ २७<br>देया द्विजानां राजेन्द्र मासि मासि च दक्षिणाः।<br>अहतवासः संवीतो दिनार्धं होमयेच्छुचिः ॥ २८<br>तस्मात् सदोत्थितैर्भाव्यं यजमानैः सह द्विजैः।<br>इन्द्राद्यादिसुराणां च प्रीणनं सार्वकामिकम् ॥ २९<br>कृत्वा सुराणां राजेन्द्र पशुघातसमन्वितम्।<br>सर्वदानानि देवाना मग्निष्टोमं च कारयेत् ॥ ३०अनघ ! (अनुष्ठानके समय) यजमानको दुग्ध अथवा फलका आहार करना चाहिये। जौ आदि अन्न, उड़द, तिल, सरसों और पलाशकी लकड़ी इस होममें प्रशंसित हैं। इसके ऊपर वसुधारा छोड़नी चाहिये। पहले महीनेमें ऋत्विजोंको दुग्धका भोजन देना चाहिये। दूसरे महीनेमें धर्म, अर्थ और कामकी साधिका खिचड़ी खिलानी चाहिये। रविनन्दन ! तीसरे महीनेमें गोझिया देनी चाहिये। चौथे महीनेमें ब्राह्मणोंको प्रसन्न करते हुए लड्डू दे। पाँचवें महीनेमें दही और भात, छठे महीनेमें सत्तूका भोजन, सातवें महीनेमें मालपुआ और आठवें मासमें मालपुआ और घी दे। रविनन्दन ! नवें महीनेमें साठीका भात, दसवेंमें जौ-मिश्रित साठीका भात तथा ग्यारहवें महीनेमें उड़दयुक्त भोजन देना चाहिये। सूर्यकुलोत्पन्न ! बारहवें महीनेके आनेपर छहों रसोंसे युक्त सभी कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला भोजन दे। राजेन्द्र ! उन ब्राह्मणोंको प्रतिमास दक्षिणा भी देनी चाहिये। मध्याह्नके समय पवित्र वस्त्र धारण कर हवन करनेका विधान है। इसलिये यजमानको ब्राह्मणोंके साथ सर्वदा यज्ञ करनेके लिये उत्साहमयुक्त रहना चाहिये। इन्द्र आदि देवताओंको प्रसन्न करना चाहिये, यह सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला है। राजेन्द्र ! फिर देवताओंके उद्देश्यसे बलि देकर सभी प्रकारके दानकर्मोंको सम्पादित करे। साथ ही अग्निष्टोमका अनुष्ठान करे॥ २१—३०॥
एवं कृत्वा विधानेन पूर्णाहुतिः शते शते।<br>सहस्रे द्विगुणा देया यावच्छतसहस्रकम् ॥ ३१<br>पुरोडाशस्ततः साध्यो देवतार्थे च ऋत्विजैः।<br>युक्तो वसन् मानवैश्च पुनः प्राप्तार्चनान् द्विजान् ॥ ३२<br>प्रीणयित्वा सुरान् सर्वान् पितॄनेव ततः क्रमात्।<br>कृत्वा शास्त्रविधानेन पिण्डानां च समर्पणम् ॥ ३३<br>समाप्तौ तस्य होमस्य विप्राणामथ दक्षिणाम्।<br>समां चैव तुलां कृत्वा बध्वा शिक्यद्वयं पुनः ॥ ३४<br>आत्मानं तोलयेत् तत्र पत्नीं चैव द्वितीयाकाम्।<br>सुवर्णेन तथाऽऽत्मानं रजतेन तथा प्रियाम् ॥ ३५<br>तोलयित्वा ददेत् राजा वित्तशाठ्यविवर्जितः।<br>ददेच्छतसहस्रं तु रूप्यस्य कनकस्य च ॥ ३६इस प्रकार विधिपूर्वक ग्रहयाग सम्पन्न कर शत होममें सौ, हजार होममें हजारसे लेकर लक्ष होमतक दो सौ पूर्णाहुतियाँ देनी चाहिये। तत्पश्चात् ऋत्विजोंको देवताओंके लिये पुरोडाश देना चाहिये। उन्हें क्रमशः उन्हीं आगत मनुष्योंमें ही उपस्थित समझना चाहिये। फिर क्रमशः पूजित ब्राह्मणों और देवताओंको प्रसन्न करके सभी पितरोंको शास्त्रोक्त विधिके अनुसार पिण्ड समर्पित करे। इस होमके समाप्त होनेपर ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। तदुपरान्त राजाको चाहिये कि कृपणताको छोड़कर समान भागवाली तराजू बनवाकर उसमें दो पलड़े बाँध दे और उसपर पत्नीसहित अपनेको तौले। उस समय अपनेको सुवर्णसे तथा पत्नीको चाँदीसे तौलनेका विधान है। तौलनेके बाद उसे ब्राह्मणको दे देना चाहिये। पुनः चाँदी तथा सुवर्णकी बनी हुई एक लक्ष मुद्राका दान करे

२४४- वामन-प्रादुर्भाव-प्रसङ्गमें श्रीभगवान्‌-द्वारा अदितिको वरदान

Page 932Permalink

९२२ * मत्स्यपुराण *


सर्वस्वं वा ददेत् तत्र राजसूयफलं लभेत्।<br>एवं कृत्वा विधानेन विप्रांस्तांश्च विसर्जयेत्॥ ३७<br><br>प्रीयतां पुण्डरीकाक्षः सर्वयज्ञेश्वरो हरिः।<br>तस्मिंस्तुष्टे जगत् तुष्टं प्रीणिते प्रीणितं भवेत्॥ ३८<br><br>एवं सर्वोपघाते तु देवमानुषकारिते।<br>इयं शान्तिस्तवाख्याता यां कृत्वा सुकृती भवेत्॥ ३९<br><br>न शोचेज्जन्ममरणे कृताकृतविचारणे।<br>सर्वतीर्थेषु यत् स्नानं सर्वयज्ञेषु यत्फलम्।<br>तत्फलं समवाप्नोति कृत्वा यज्ञत्रयं नृप॥ ४०अथवा सर्वस्व दान कर दे। ऐसा करनेसे उसे राजसूय-यज्ञका फल प्राप्त होता है। इस प्रकार विधिपूर्वक यज्ञ करके उन ब्राह्मणोंको विदा करे और कहे—‘सभी यज्ञोंके स्वामी कमलनेत्र भगवान् विष्णु प्रसन्न हों; क्योंकि उनके संतुष्ट होनेपर समस्त जगत् संतुष्ट और प्रसन्न होनेपर प्रसन्न होता है।’ इस प्रकार देवताओं तथा मनुष्योंद्वारा की गयी सभी बाधाओंके लिये यह शान्ति कही गयी है, जिसे मैंने तुम्हें बताया है और जिसका अनुष्ठान करनेसे मनुष्य पुण्यवान् होता है और उसे जन्म-मृत्यु तथा उचित-अनुचितके विचारके समय चिन्ता नहीं करनी पड़ती। राजन्! सभी तीर्थोंमें स्नान करने और सभी यज्ञोंके अनुष्ठानसे जो फल प्राप्त होता है, वह फल इन तीनों यज्ञोंको करनेवाला मनुष्य प्राप्त कर लेता है॥ ३१—४०॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे ग्रहयज्ञविधानं नामैकोनचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २३९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें ग्रहयज्ञविधान नामक दो सौ उन्तालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३९॥


दो सौ चालीसवाँ अध्याय

राजाओंकी विजयर्थ यात्राका विधान

मनुरुवाच<br>इदानीं सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद।<br>यात्राकालविधानं मे कथयस्व महीक्षिताम्॥ १<br><br>मत्स्य उवाच<br>यदा मन्येत नृपतिराक्रन्देन बलीयसा।<br>पार्ष्णिग्राहाभिभूतोऽरिस्तदा यात्रां प्रयोजयेत्॥ २<br><br>योधान् मत्वा प्रभूतांश्च प्रभूतं च बलं मम।<br>मूलरक्षासमर्थोऽस्मि तदा यात्रां प्रयोजयेत्॥ ३<br><br>अशुद्धपार्ष्णिर्नृपतिर्न तु यात्रां प्रयोजयेत्।<br>पार्ष्णिग्राहाधिकं सैन्यं मूले निक्षिप्य च व्रजेत्॥ ४<br><br>चैत्र्यां वा मार्गशीर्ष्यां वा यात्रां यायान्नराधिपः।<br>चैत्र्यां पश्येच्च नैदाघं हन्ति पुष्टिं च शारदीम्॥ ५<br><br>एतदेव विपर्यस्तं मार्गशीर्ष्यां नराधिपः।<br>शत्रोर्वा व्यसने यायात् काल एव सुदुर्लभः॥ ६मनुजीने कहा— सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता एवं सर्वशास्त्रविशारद भगवन्! अब आप मुझसे राजाओंके यात्राकालिक विधानका वर्णन कीजिये॥ १॥<br><br>मत्स्यभगवान्ने कहा— जिस समय राजा अपनेको किसी भयंकर युद्धसे घिरा हुआ तथा सीमावर्ती शत्रुको पराजित समझ ले, उस समय उसे यात्रा कर देनी चाहिये। साथ ही जब वह यह समझ ले कि हमारे पास बहुसंख्यक योद्धा हैं, हमारी सेना बहुत बड़ी है और मैं अपने दुर्गकी रक्षा करनेमें समर्थ हूँ, उस समय उसके लिये यात्रा करना उचित है। सीमावर्ती राजाके शत्रु बन जानेपर राजाको यात्रा नहीं करनी चाहिये। उस समय वह पार्श्ववर्ती राजासे अधिक सेना प्राप्त कर यात्रा कर सकता है। राजाको चैत्र या मार्गशीर्षकी पूर्णिमाको दिवि-जयार्थ यात्रा करनी चाहिये। चैत्र-पूर्णिमाको यात्रा करनेवाला ग्रीष्म-ऋतुका दर्शन करेगा तथा शरत्कालीन शीत-भयसे रहित रहेगा। ठीक इसी प्रकारका परिवर्तन मार्गशीर्ष-पूर्णिमाको यात्रा करनेसे होता है। अथवा शत्रुके आपत्तिमें फँसनेपर यात्रा करे, पर ऐसा समय अत्यन्त दुर्लभ है।
Page 933Permalink
* अध्याय २४० *९२३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दिव्यान्तरिक्षक्षितिजैरुत्पातैः पीडितं परम्।<br>षडक्षपीडासंतप्तं पीडितं च तथा ग्रहैः॥ ७<br><br>ज्वलन्ती च तथैवोल्का दिशं यां च प्रपद्यते।<br>भूकम्पोल्कादि संयाति यां च केतुः प्रसूयते॥ ८<br><br>निर्घातश्च पतेद् यत्र तां यायाद् वसुधाधिपः।<br>स्वबलव्यसनोपेतं तथा दुर्भिक्षपीडितम्॥ ९<br><br>सम्भूतान्तरकोपं च क्षिप्रं प्रायादरिं नृपः।<br>यूकामाक्षीकबहुलं बहुपङ्कं तथाविलम्॥ १०<br><br>नास्तिकं भिन्नमर्यादं तथामङ्गलवादिनम्।<br>अपेतप्रकृतिं चैव निःसारं च तथा जयेत्॥ ११जो दिव्य, अन्तरिक्ष एवं पृथ्वीजन्य उत्पातोंसे पीड़ित, हाथ-पैर आदि छः इन्द्रियोंकी पीड़ासे संतप्त तथा ग्रहोंद्वारा पीड़ित हो, ऐसे शत्रु राजापर विजय-यात्रा करनी चाहिये। जिस दिशामें जलती हुई उल्का गिरती है, जिस दिशामें भूकम्पादि उत्पात अधिक होते हैं तथा पुच्छल तारा उदित होता है, उसी दिशामें राजाको विजयार्थ यात्रा करनी चाहिये। जो अपनी सेनाके विद्रोहसे युक्त, दुर्भिक्षसे पीड़ित तथा आन्तरिक विद्रोहसे प्रभावित हो, ऐसे शत्रुपर राजाको तुरंत आक्रमण कर देना चाहिये। जिसके देशमें ढील, मक्खी, कीचड़ और गंदगीकी बहुतायत हो, जो नास्तिक, मर्यादारहित, अमङ्गलवादी, दुश्चरित्र और पराक्रमहीन हो—ऐसे शत्रुको वशमें कर लेना उचित है॥ २—११॥
विद्विष्टनायकं सैन्यं तथा भिन्नं परस्परम्।<br>व्यसनासक्तनृपतिं बलं राजाभियोजयेत्॥ १२जिस राजाकी प्रजा या सेनानायक उसका शत्रु हो गया हो अथवा उसके मन्त्री-सेना आदिमें भी परस्पर विद्वेष हो, वह स्वयं किसी विपत्तिमें पड़ गया हो, ऐसे शत्रुपर अपनी सेनाको चढ़ाईका आदेश दे देना चाहिये।
सैनिकानां न शस्त्राणि स्फुरन्त्यङ्गानि यत्र च।<br>दुःस्वप्नानि च पश्यन्ति बलं तदभियोजयेत्॥ १३जिस राजाके सैनिकोंके अस्त्र एवं अङ्ग प्रस्फुरित न होते हों तथा उन्हें बुरे स्वप्न दीख पड़ते हों, उनपर धावा बोल देना चाहिये।
उत्साहबलसम्पन्नः स्वानुरक्तबलस्तथा।<br>तुष्टपुष्टबलो राजा परानभिमुखो व्रजेत्॥ १४उत्साह एवं पराक्रमसे संयुक्त तथा अपनेमें अनुराग करनेवाली, संतुष्ट एवं परिपुष्ट विशाल सेनासे सम्पन्न राजा शत्रुओंपर आक्रमण कर दे।
शरीरस्फुरणे धन्ये तथा दुःस्वप्ननाशने।<br>निमित्ते शकुने धन्ये जाते शत्रुपुरं व्रजेत्॥ १५जब शुभ अङ्ग फड़कते हों, दुःस्वप्न न दिखायी पड़ते हों तथा शुभ शकुन दिखायी पड़ रहे हों, उस समय शत्रुकी राजधानीपर चढ़ाई करनी चाहिये।
ऋक्षेषु षट्सु शुद्धेषु ग्रहेष्वनुगुणेषु च।<br>प्रश्नकाले शुभे जाते परान् यायान्नराधिपः॥ १६जन्म-नक्षत्र आदि छः नक्षत्रोंके शुद्ध होनेपर, शुभ ग्रहोंकी स्थिति अनुकूल होनेपर तथा प्रश्न करनेपर शुभदायक उत्तर मिलनेपर राजाको शत्रुओंपर आक्रमण करना चाहिये।
एवं तु दैवसम्पन्नस्तथा पौरुषसंयुतः।<br>देशकालोपपन्नां तु यात्रां कुर्यान्नराधिपः॥ १७<br><br>स्थले नक्रस्तु नागस्य तस्यापि सजले वशे।<br>उलूकस्य निशि ध्वाङ्क्षः स च तस्य दिवा वशे॥ १८इस प्रकार दैवबल तथा पराक्रमसे संयुक्त राजा देश एवं कालके अनुसार शत्रुपर चढ़ाई करे। स्थलपर मगर हाथीके वशमें होता है, किंतु जलमें हाथी नाकके वशमें हो जाता है। इसी प्रकार रात्रिमें काक उल्लूके अधीन हो जाता है, किंतु दिनमें उल्लू काकके वशमें होता है। इसी प्रकार राजाको देश एवं कालका विचारकर शत्रुपर विजय-यात्रा करनी चाहिये॥ १२—१८ १/२॥
एवं देशं च कालं च ज्ञात्वा यात्रां प्रयोजयेत्।<br>पदातिनागबहुलां सेनां प्रावृषि योजयेत्॥ १९राजाको वर्षा-ऋतुमें पैदल और हाथियोंकी सेनाको,
हेमन्ते शिशिरे चैव रथवाजिसमाकुलाम्।<br>खरोष्ट्रबहुलां सेनां तथा ग्रीष्मे नराधिपः॥ २०हेमन्त और शिशिर-ऋतुमें अधिक रथ और घोड़ोंसे सम्पन्न सेनाको ग्रीष्म-ऋतुमें गधे और ऊँटोंसे भरी हुई सेनाको तथा
Page 934Permalink
९२४* मत्स्यपुराण *
चतुरङ्गबलोपेतां वसन्ते वा शरद्यथ।<br>सेना पदातिबहुला यस्य स्यात् पृथिवीपतेः॥ २१<br>अभियोज्यो भवेत् तेन शत्रुग्विषममाश्रितः।<br>गम्ये वृक्षावृते देशे स्थितं शत्रुं तथैव च॥ २२<br>किञ्चित्पङ्के तथा यायाद् बहुनागो नराधिपः।<br>रथाश्वबहुलो यायाच्छत्रुं समपथस्थितम्॥ २३<br>तमाश्रयन्तो बहुलास्तांस्तु राजा प्रपूजयेत्।<br>खरोष्ट्रबहुलो राजा शत्रुर्वन्धेन संस्थितः॥ २४<br>बन्धनस्थोऽभियोज्योऽरिस्तथा प्रावृषि भूभुजा।<br>हिमपातयुते देशे स्थितं ग्रीष्मेऽभियोजयेत्॥ २५<br>यवसेन्धनसंयुक्तः कालः पार्थिव हैमनः।<br>शरद्वसन्तौ धर्मज्ञ कालौ साधारणौ स्मृतौ॥ २६<br>विज्ञाय राजा हितदेशकालौ<br>दैवं त्रिकालं च तथैव बुद्ध्वा।<br>यायात् परं कालविदां मतेन<br>संचिन्त्य सार्धं द्विजमन्त्रविद्भिः॥ २७वसन्त और शरद्-ऋतुमें चतुरंगिणी सेनाको यात्रामें लगाना उचित है। जिस राजाके पास पैदल सेना अधिक हो, उसे विषम स्थानपर स्थित शत्रुपर आक्रमण करना चाहिये। राजाको चाहिये कि जो शत्रु अधिक वृक्षोंसे युक्त देशमें या कुछ कीचड़वाले स्थानपर स्थित हो, उसपर हाथियोंकी सेनाके साथ चढ़ाई करे। समतल भूमिमें स्थित शत्रुपर रथ और घोड़ोंकी सेना साथ लेकर चढ़ाई करनी चाहिये। जिस शत्रुओंके पास बहुत बड़ी सेना हो, राजाको चाहिये कि उनका आदर-सत्कार करे, अर्थात् उनके साथ संधि कर ले। वर्षा-ऋतुमें अधिक संख्यामें गधे और ऊँटोंकी सेना रखनेवाला राजा यदि शत्रुके बन्धनमें पड़ गया हो तो उस अवस्थामें भी उसे वर्षा-ऋतुमें चढ़ाई करनी चाहिये। जिस देशमें बरफ गिरती हो, वहाँ राजा ग्रीष्म-ऋतुमें आक्रमण करे। पार्थिव! हेमन्त और शिशिर-ऋतुओंका समय काष्ठ तथा घास आदि साधनोंसे युक्त होनेसे यात्राके लिये बहुत अनुकूल रहता है। धर्मज्ञ! इसी प्रकार शरद् और वसन्त-ऋतुओंके काल भी अनुकूल माने गये हैं। राजाको देश-काल और त्रिकालज्ञ ज्योतिषीसे यात्राकी स्थितिको भलीभाँति समझकर उसी प्रकार पुरोहित और मन्त्रियोंके साथ परामर्श कर विजय-यात्रा करनी चाहिये॥ १९—२७॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे यात्रानिमित्तकालयोज्यचिन्ता नाम चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २४० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें यात्राकाल-विधान नामक दो सौ चालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २४०॥


दो सौ एकतालीसवाँ अध्याय

अङ्गस्फुरणके शुभाशुभ फल

मनुरुवाच<br>ब्रूहि मे त्वं निमित्तानि अशुभानि शुभानि च।<br>सर्वधर्मभृतां श्रेष्ठ त्वं हि सर्वविदुच्यसे॥ १<br>मत्स्य उवाच<br>अङ्गदक्षिणभागे तु शस्तं प्रस्फुरणं भवेत्।<br>अप्रशस्तं तथा वामे पृष्ठस्य हृदयस्य च॥ २<br>मनुरुवाच<br>अङ्गानां स्पन्दनं चैव शुभाशुभविचेष्टितम्।<br>तन्मे विस्तरतो ब्रूहि येन स्यां तद्विदो भुवि॥ ३**मनुजीने पूछा—**सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ भगवन्! चूँकि आप सर्वज्ञ कहे जाते हैं, इसलिये अब आप मुझे शुभाशुभसूचक शकुनोंके लक्षण बतलाइये॥ १॥<br>**मत्स्यभगवान्‌ने कहा—**राजन्! शरीरके दाहिने भागमें स्फुरण होना शुभ तथा पीठ, हृदय और बायें भागका स्फुरण अशुभ फलदायक होता है॥ २॥<br>**मनुजीने पूछा—**भगवन्! अङ्गोंका स्फुरण जिस शुभा-शुभकी सूचना देनेवाला होता है, उसे मुझे विस्तारपूर्वक बतलाइये, जिससे मैं भूतलपर उसका ज्ञाता हो जाऊँ॥ ३॥
Page 935Permalink

* अध्याय २४१ * ९२५

मत्स्य उवाच
पृथ्वीलाभो भवेन्मूर्ध्नि ललाटे रविनन्दन।<br>स्थानं विवृद्धिमायाति भ्रूनसोः प्रियसंगमः॥ ४<br>भृत्यलब्धिश्चाक्षिदेशे दृगुपान्ते धनागमः।<br>उत्कण्ठोपगमो मध्ये दृष्टं राजन् विचक्षणैः॥ ५<br>दृग्बन्धने सङ्गरे च जयं शीघ्रमवाप्नुयात्।<br>योषिद्भोगोऽपाङ्गदेशे श्रवणान्ते प्रियश्रुतिः॥ ६<br>नासिकायां प्रीतिसौख्यं प्रजाप्तिरधरोष्ठजे।<br>कण्ठे तु भोगलाभः स्याद् भोगवृद्धिस्तथांसयोः॥ ७<br>सुहृत्स्नेहश्च बाहुभ्यां हस्ते चैव धनागमः।<br>पृष्ठे पराजयः सद्यो जयो वक्षःस्थले भवेत्॥ ८मत्स्यभगवान् बोले— रविनन्दन! सिरके स्फुरणसे पृथ्वीका लाभ होता है, ललाटके स्फुरणसे स्थानकी वृद्धि होती है, भौंह और नासिकाके स्फुरणसे प्रियजनोंका समागम होता है। राजन्! नेत्रोंके फड़कनेसे सेवककी तथा नेत्रोंके समीप स्फुरण होनेसे धनकी प्राप्ति होती है। नेत्रोंके मध्य भागमें स्फुरण होनेसे उत्कण्ठा बढ़ती है, ऐसा विचक्षणोंने अनुभव किया है। नेत्र-पलकोंके फड़कनेसे संग्राममें शीघ्र ही विजय प्राप्त होती है। नेत्रापाङ्गोंके स्फुरणसे स्त्री-लाभ, कानके फड़कनेसे प्रियवार्ता-श्रवण, नासिका-स्फुरणसे प्रीति एवं सौख्य, निचले होंठके फड़कनेसे संतान-प्राप्ति, कण्ठ-स्फुरणसे भोग-लाभ तथा दोनों कंधोंके स्फुरणसे भोगकी वृद्धि होती है। बाहुओंके फड़कनेसे मित्र-स्नेहकी प्राप्ति, हाथके स्फुरणसे धनकी प्राप्ति, पीठके फड़कनेसे युद्धमें पराजय तथा छातीके स्फुरणसे विजय-प्राप्ति होती है॥ ४-८॥
कुक्षिभ्यां प्रीतिरुद्दिष्टा स्त्रियाः प्रजननं स्तने।<br>स्थानभ्रंशो नाभिदेशे अन्त्रे चैव धनागमः॥ ९<br>जानुसंधौ परैः संधिर्बलवद्भिर्भवेन्नृप।<br>देशैकदेशनाशोऽथ जङ्घाभ्यां रविनन्दन॥ १०<br>उत्तमं स्थानमाप्नोति पद्भ्यां प्रस्फुरणान्नृप।<br>सलाभं चाध्वगमनं भवेत् पादतले नृप॥ ११<br>लाञ्छनं पिटकं चैव ज्ञेयं स्फुरणवत् तथा।<br>विपर्ययेण विहितः सर्वः स्त्रीणां फलागमः॥ १२<br>अप्रशस्ते तदा वामे त्वप्रशस्तं विशेषतः।<br>दक्षिणेऽपि प्रशस्तेऽङ्गे प्रशस्तं स्याद् विशेषतः॥ १३<br>अतोऽन्यथा सिद्धिप्रजल्पनात् तु<br>फलस्य शस्तस्य च निन्दितस्य।<br>अनिष्टचिह्नोपगमे द्विजानां<br>कार्यं सुवर्णेन तु तर्पणं स्यात्॥ १४दोनों कुक्षियोंके फड़कनेसे प्रेमकी वृद्धि कही गयी है, स्तनके स्फुरणसे स्त्रीसे संतानोत्पत्ति होती है। राजन्! नाभिके स्फुरणसे स्थानसे च्युत होना पड़ता है, आँतके फड़कनेसे धनकी प्राप्ति तथा जानुके संधिभागके स्फुरणसे बलवान् शत्रुओंके साथ संधि हो जाती है। रविनन्दन! फिल्लियोंके फड़कनेसे राजाके देशके किसी भागका नाश होता है। नृप! दोनों पैरोंके स्फुरणसे उत्तम स्थानकी प्राप्ति होती है। राजन्! पैरोंके तलुओंके फड़कनेसे लाभदायिनी यात्रा होती है। अङ्गस्फुरणके समान ही लक्षण (कालेदाग) एवं पिटकों (छोटे मांसपिण्ड, जो जन्मसे ही बालकोंके अङ्गोंमें उत्पन्न होते हैं)-के भी फलाफलको जानना चाहिये। स्त्रियोंके लिये ये सभी फलागम विपरीत होते हैं। बायें भागके अप्रशस्त अङ्गोंके स्फुरणसे विशेष अशुभ होता है। इसी प्रकार दाहिने भागमें भी शुभ अङ्गोंके स्फुरणसे विशेष शुभ होता है। इस शुभ एवं अशुभ फलके सिद्धि-कथनके अतिरिक्त अनिष्ट चिह्नके प्रकट होनेपर ब्राह्मणोंको सुवर्णदान देकर संतुष्ट करना चाहिये॥ ९—१४॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे यात्रानिमित्तकदेहस्पन्दनं नामैकचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २४१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अङ्गस्फुरण नामक दो सौ एकतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २४१॥

२४५- बलिद्वारा विष्णुकी निन्दापर प्रह्लादका उन्हें शाप, बलिकी अनुनय, ब्रह्माजी-द्वारा वामनभगवान्‌का स्तवन, भगवान्‌ वामनका देवताओंको आश्वासन तथा उनका बलिके यज्ञके लिये प्रस्थान

Page 936Permalink
९२६* मत्स्यपुराण *

दो सौ बयालीसवाँ अध्याय

शुभाशुभ स्वप्नोंके लक्षण

मनुरुवाचमनुजीने पूछा—देव! यात्राके समयके स्वप्नका वृत्तान्त कैसा है? विविध प्रकारके वैसे यों भी स्वप्न अनेक दिखायी पड़ते हैं, उनका फल कैसा होता है (बतलायें)॥ १॥
स्वप्नाख्यानं कथं देव गमने प्रत्युपस्थिते।<br>दृश्यन्ते विविधाकाराः कथं तेषां फलं भवेत्॥ १
मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—मनो! अब मैं स्वप्नोंके शुभाशुभ लक्षणोंको बतला रहा हूँ! नाभिके अतिरिक्त अन्य अङ्गोंमें तृण एवं वृक्षका उगना, मस्तकपर कांसेका कूटा जाना, मुण्डन, नग्नता, मलिन वस्त्रोंका धारण करना, तेल लगाना, कीचमें धँसना, लेप, ऊँचे स्थानसे गिरना, झूलेपर चढ़ना, कीचड़ और लोहेको इकट्ठा करना, घोड़ोंको मारना, लाल पुष्पवाले वृक्षों, मण्डल, शूकर, रीछ, गधे और ऊँटोंपर चढ़ना, पक्षी, मछली, तेल और खिचड़ीका भोजन, नाचना, हँसना, विवाह, गायन, वीणाको छोड़कर अन्य वाद्योंका स्वागत करना, जलके सोतेमें स्नान करनेके लिये जाना, गोबर लगाकर जलमें स्नान करना, इसी प्रकार कीचड़युक्त जलमें तथा पृथ्वीके थोड़े जलमें नहाना, माताके उदरमें प्रवेश करना, चितापर चढ़ना, इन्द्रध्वजका गिरना, चन्द्रमा और सूर्यका पतन, दिव्य, अन्तरिक्ष तथा भौम उत्पातोंका दर्शन, देवता, द्विजाति, राजा और गुरुका क्रोध, कुमारी कन्याओंका आलिङ्गन, पुरुषोंके साथ सम्भोग, अपने ही शरीरका नाश, विरेचन, वमन, दक्षिण दिशाकी यात्रा, किसी व्याधिसे पीड़ित होना, फलों तथा पुष्पोंकी हानि, घरोंका गिरना, घरोंकी सफाई होना, पिशाच, मांसभक्षी जीव, वानर, रीछ और मनुष्यके साथ क्रीडा करना, शत्रुसे पराजित होना या उसकी ओरसे किसी प्रकारकी आपत्तिका प्रकट होना, काषाय वस्त्रको धारण करना अथवा वैसे वस्त्रवाली स्त्रीके साथ क्रीडा करना, तेल-पान या उसीमें स्नान करना, लाल पुष्प और लाल चन्दनको धारण करना तथा इनके अतिरिक्त अन्य भी बहुत-से दुःस्वप्न कहे गये हैं। इन्हें देखनेके बाद दूसरेसे कह देना तथा पुनः सो जाना कल्याणकारक है॥ २–१५॥
इदानीं कथयिष्यामि निमित्तं स्वप्नदर्शने।<br>नाभिं विनान्यगात्रेषु तृणवृक्षसमुद्भवः॥ २
चूर्णं मूर्ध्नि कांस्यानां मुण्डनं नग्नता तथा।<br>मलिनाम्बरधारित्वमभ्यङ्गः पङ्कदिग्धता॥ ३
उच्चात् प्रपतनं चैव दोलारोहणमेव च।<br>अर्जनं पङ्कलोहानां हयानामपि मारणम्॥ ४
रक्तपुष्पद्रुमाणां च मण्डलस्य तथैव च।<br>वराहर्क्षरक्षोष्ट्राणां तथा चारोहणक्रिया॥ ५
भक्षणं पक्षिमत्स्यानां तैलस्य कृसरस्य च।<br>नर्तनं हसनं चैव विवाहो गीतमेव च॥ ६
तन्त्रीवाद्यविहीनानां वाद्यानामभिवादनम्।<br>स्रोतोऽवगाहगमनं स्नानं गोमयवारिणा॥ ७
पङ्कोदकेन च तथा महीतोयेन चाप्यथ।<br>मातुः प्रवेशो जठरे चितारोहणमेव च॥ ८
शक्रध्वजाभिपतनं पतनं शशिसूर्ययोः।<br>दिव्यान्तरिक्षभौमानामुत्पातानां च दर्शनम्॥ ९
देवद्विजातिभूपालगुरूणां क्रोध एव च।<br>आलिङ्गनं कुमारीणां पुरुषाणां च मैथुनम्॥ १०
हानिश्चैव स्वगात्राणां विरेचवमनक्रिया।<br>दक्षिणाशाभिगमनं व्याधिनाभिभवस्तथा॥ ११
फलापहानिश्च तथा पुष्पहानिस्तथैव च।<br>गृहाणां चैव पातश्च गृहसम्मार्जनं तथा॥ १२
क्रीडा पिशाचक्रव्यादवानरर्क्षनरैरपि।<br>परादभिभवश्चैव तस्माच्च व्यसनोद्भवः॥ १३
काषायवस्त्रधारित्वं तद्वत् स्त्रीक्रीडनं तथा।<br>स्नेहपानावगाहौ च रक्तमाल्यानुलेपनम्॥ १४
एवमादीनि चान्यानि दुःस्वप्नानि विनिर्दिशेत्।<br>एषां संकथनं धन्यं भूयः प्रस्वापनं तथा॥ १५
Page 937Permalink
  • अध्याय २४२ * | ९२७ --- | ---

| कल्कस्नानं तिलैर्होमो ब्राह्मणानां च पूजनम्।<br>स्तुतिश्च वासुदेवस्य तथा तस्यैव पूजनम्॥ १६<br>नागेन्द्रमोक्षश्रवणं ज्ञेयं दुःस्वप्ननाशनम्।<br>स्वप्नास्तु प्रथमे यामे संवत्सरविपाकिनः॥ १७<br>षड्भिर्मासैर्द्वितीये तु त्रिभिर्मासैस्तृतीयेके।<br>चतुर्थे मासमात्रेण पश्यतो नात्र संशयः॥ १८<br>अरुणोदयवेलायां दशाहेन फलं भवेत्।<br>एकस्यां यदि वा रात्रौ शुभं वा यदि वाशुभम्॥ १९<br>पश्चाद् दृष्टस्तु यस्तत्र तस्य पाकं विनिर्दिशेत्।<br>तस्माच्छोभनके स्वप्ने पश्चात् स्वप्नो न शस्यते॥ २० | (ऐसे स्वप्न देखनेपर) खली लगाकर स्नान, तिलसे हवन और ब्राह्मणोंका पूजन करे। भगवान् वासुदेवकी स्तुति उनकी पूजा और गजेन्द्रमोक्षकी कथाका श्रवण आदिका दुःस्वप्नका नाशक समझना चाहिये। रात्रिके पहले पहरमें देखे गये स्वप्न देखनेवालेको निःसंदेह एक वर्षमें, दूसरे पहरमें देखे गये छः महीनेमें, तीसरे पहरमें देखे गये तीन महीनेमें तथा चतुर्थ पहरमें देखे गये एक महीनेमें फल देते हैं। सूर्योदयके समय देखे जानेपर दस दिनमें ही फल प्राप्त होता है। यदि एक ही रातमें शुभ और अशुभ—दोनों प्रकारके स्वप्न दिखायी पड़ें तो उनमें जो पीछे दीख पड़ा हो, उसीका फल कहना चाहिये। इसलिये शुभ स्वप्नके देखनेपर मनुष्यको पुनः नहीं सोना चाहिये॥ १६—२०॥ | | शैलप्रासादनागाश्ववृषभारोहणं हितम्।<br>द्रुमाणां श्वेतपुष्पाणां गमने च तथा द्विज॥ २१<br>द्रुमतृणोद्भवो नाभौ तथैव बहुबाहुता।<br>तथैव बहुशीर्षत्वं फलितोद्भव एव च॥ २२<br>सुशुक्लमाल्यधारित्वं सुशुक्लाम्बरधारिता।<br>चन्द्रार्कताराग्रहणं परिमार्जनमेव च॥ २३<br>शक्रध्वजालिङ्गनं च तदुच्छ्रायक्रिया तथा।<br>भूम्यम्बुधीनां ग्रसनं शत्रूणां च वधक्रिया॥ २४<br>जयो विवादे द्यूते च संग्रामे च तथा द्विज।<br>भक्षणं चार्द्रमांसानां मत्स्यानां पायसस्य च॥ २५<br>दर्शनं रुधिरस्यापि स्नानं वा रुधिरेण च।<br>सुरारुधिरमद्यानां पानं क्षीरस्य चाथ वा॥ २६<br>अन्त्रैर्वा वेष्टनं भूमौ निर्मलं गगनं तथा।<br>मुखेन दोहनं शस्तं महिषीणां तथा गवाम्॥ २७<br>सिंहीनां हस्तिनीनां च वडवानां तथैव च।<br>प्रसादो देवविप्रेभ्यो गुरुभ्यश्च तथा शुभः॥ २८ | द्विज! पर्वत, राजमहल, हाथी, घोड़ा, वृषभ—इनपर आरोहण करना हितकारक है तथा श्वेत पुष्पोंवाले वृक्षोंपर चढ़ना शुभप्रद है। नाभिमें वृक्ष और तृणका उत्पन्न होना, अनेक बाहुओंका होना, अनेक सिरोंका होना, फलदान, उद्भिद्जोंका दर्शन, सुन्दर श्वेत माला धारण करना, श्वेत वस्त्र पहनना, चन्द्रमा, सूर्य और ताराओंको हाथसे पकड़ना या उन्हें स्वच्छ करना, इन्द्रधनुषका आलिङ्गन करना या उसे ऊपर उठाना, पृथ्वी और समुद्रोंको निगलना, शत्रुओंका संहार करना, संग्राम, विवाद और जूएमें जीतना, कच्चा मांस, मछली और खीरका खाना, रक्तका दर्शन या रक्तसे स्नान, मदिरा, रक्त, मद्य अथवा दुग्धका पीना, अपनी आँतोंसे पृथ्वीको बाँधना, निर्मल आकाशको देखना, भैंस, गाय, सिंहिनी, हथिनी तथा घोड़ियोंको मुखसे दुहना, देवता, गुरु और ब्राह्मणोंकी प्रसन्नता—ये स्वप्न शुभदायक होते हैं॥ २१—२८॥ | | अम्भसा त्वभिषेकस्तु गवां शृङ्गस्रुतेन वा।<br>चन्द्राद् भ्रष्टेन वा राजन्ज्ञेयो राज्यप्रदोहि सः॥ २९<br>राज्याभिषेकश्च तथा छेदनं शिरसस्तथा।<br>मरणं वह्निदाहश्च वह्निदाहो गृहादिषु॥ ३०<br>लब्धिश्च राज्यलिङ्गानां तन्त्रीवाद्याभिवादनम्।<br>तथोदकानां तरणं तथा विषमल्लङ्घनम्॥ ३१ | राजन्! गौओंके सींगसे चूनेवाले अथवा चन्द्रमासे गिरे हुए जलसे अभिषेक होना राज्यप्रद समझना चाहिये। राज्याभिषेक, सिरका कटना, मृत्यु, अग्निका प्रज्वलित होना या घरमें आग लगना, राज्यचिह्नोंकी प्राप्ति, वीणाका स्वर सुनायी पड़ना, जलमें तैरना, दुर्गम स्थानोंको पार करना, |

Page 938Permalink
९२८* मत्स्यपुराण *
हस्तिनीवडवानां च गवां च प्रसवो गृहे।<br>आरोहणमथाश्वानां रोदनं च तथा शुभम्॥ ३२<br>वरस्त्रीणां तथा लाभस्तथालिङ्गनमेव च।<br>निगडैर्बन्धनं धन्यं तथा विष्ठानुलेपनम्॥ ३३<br>जीवतां भूमिपालानां सुहृदामपि दर्शनम्।<br>दर्शनं देवतानां च विमलानां तथाम्भसाम्॥ ३४<br>शुभान्यथैतानि नरस्तु दृष्ट्वा<br>प्राप्नोत्ययत्नाद् ध्रुवमर्थलाभम्।<br>स्वप्नानि वै धर्मभृतां वरिष्ठ<br>व्याधेर्विमोक्षं च तथातुरोऽपि॥ ३५घरमें हथिनी, घोड़ी तथा गायोंका बच्चा देना, घोड़ेपर सवार होना तथा रोना—ये स्वप्न शुभदायक होते हैं। सुन्दरी स्त्रियोंकी प्राप्ति तथा उनका आलिङ्गन, जंजीरोंद्वारा बन्धन, मलका लेपन, जीवित राजाओं तथा मित्रोंका दर्शन, देवताओं तथा निर्मल जलका दर्शन—ये स्वप्न शुभ कहे गये हैं। धर्मधारियोंमें श्रेष्ठ राजन्! मनुष्य इन शुभदायक स्वप्नोंको देखकर बिना प्रयासके ही निश्चितरूपमें धन प्राप्त कर लेता है तथा रोगग्रस्त व्यक्ति भी रोगसे मुक्त हो जाता है॥ २९—३५॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे यात्रानिमित्ते स्वप्नाध्यायोनाम द्विचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २४२ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें यात्राप्रसंगमें स्वप्नविवेक नामक दो सौ बयालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २४२ ॥


दो सौ तैंतालीसवाँ अध्याय

शुभाशुभ शकुनोंका निरूपण

मनुरुवाच<br>गमनं प्रति राज्ञां तु सम्मुखादर्शने च किम्।<br>प्रशस्तांश्चैव सम्भाष्य सर्वनेतांश्च कीर्तय॥ १मनुजीने पूछा—भगवन्! राजाओंके लिये यात्राके अवसरपर सम्मुख देखने या न देखने योग्य कौन-कौन-सी वस्तुएँ प्रशस्त मानी गयी हैं, उन सबका वर्णन कीजिये॥ १॥
मत्स्य उवाच<br>औषधानि त्वयुक्तानि धान्यं कृष्णं च यद् भवेत्।<br>कार्पासश्च तृणं राजञ्छुष्कं गोमयमेव च॥ २<br>इन्धनं च तथाङ्गारं गुडं तैलं तथाशुभम्।<br>अभ्यक्तं मलिनं मुण्डं तथा नग्नं च मानवम्॥ ३<br>मुक्तकेशं रुजार्तं च काषायाम्बरधारिणम्।<br>उन्मत्तकं तथा सत्त्वं दीनं चाथ नपुंसकम्॥ ४<br>अयः पङ्कस्तथा चर्म केशबन्धनमेव च।<br>तथैवोद्धृतसाराणि पिण्याकादीनि यानि च॥ ५<br>चण्डालश्वपचाश्चैव राजबन्धनपालकाः।<br>वधकाः पापकर्माणो गर्भिणी स्त्री तथैव च॥ ६<br>तुषभस्मकपालास्थि भिन्नभाण्डानि यानि च।<br>रिक्तानि चैव भाण्डानि मृतं शार्ङ्गिकमेव च॥ ७मत्स्यभगवान्ने कहा—राजन्! अनुपयुक्त ओषधियाँ, काला अन्न, कपास, तृण, सूखा गोबर, ईंधन, अङ्गार, गुड़, तेल—ये सब अशुभ वस्तुएँ हैं। तेल लगाया हुआ, मलिन, मुण्डन कराया हुआ, नंगा, खुले बालोंवाला, रोगपीड़ित, काषाय वस्त्रधारी, पागल, दीन तथा नपुंसक व्यक्ति, लोहा, कीचड़, चमड़ा, केशका बन्धन, खली आदि सभी सारहीन वस्तुएँ, चाण्डाल, श्वपच, बन्धनमें डालनेवाले राजाके कर्मचारी, जल्लाद, पापी, गर्भिणी स्त्री, भूसी, राख, खोपड़ी, हड्डी, टूटे हुए सभी पात्र, खाली पात्र, लाश, सींगोंवाले पशु—
Page 939Permalink

* अध्याय २४३ * | ९२९

| एवमादीनि चान्यानि अशस्तान्यभिदर्शने।<br>अशस्तो वाद्यशब्दश्च भिन्नभैरवजर्जरः ॥ ८<br>पुरतः शब्द एहीति शस्यते न तु पृष्ठतः।<br>गच्छेति पश्चाद् धर्मज्ञ पुरस्तात् तु विगर्हितः ॥ ९<br>क्व यासि तिष्ठ मा गच्छ किं ते तत्र गतस्य तु।<br>अन्ये शब्दाश्च येऽनिष्टास्ते विपत्तिकरा अपि ॥ १०<br>ध्वजादिषु तथा स्थानं क्रव्यादानां विगर्हितम्।<br>स्खलनं वाहनानां च वस्त्रसङ्गस्तथैव च ॥ ११<br>निर्गतस्य तु द्वारादौ शिरसश्चाभिघातिता।<br>छत्रध्वजानां वस्त्राणां पतनं च तथाशुभम् ॥ १२<br>दृष्टे निमित्ते प्रथमममङ्गल्यविनाशनम्।<br>केशवं पूजयेद् विद्वान् स्तवेन मधुसूदनम् ॥ १३<br>द्वितीये तु ततो दृष्टे प्रतीपे प्रविशेद् गृहम्।<br>अथेष्टानि प्रवक्ष्यामि मङ्गल्यानि तथानघ ॥ १४<br>श्वेताः सुमनसः श्रेष्ठाः पूर्णकुम्भास्तथैव च।<br>जलजाः पक्षिणश्चैव मांसमत्स्याश्च पार्थिव ॥ १५<br>गावस्तुरंगमा नागा बद्ध एकः पशुस्त्वजः।<br>त्रिदशाः सुहृदो विप्रा ज्वलितश्च हुताशनः ॥ १६<br>गणिका च महाभाग दूर्वा चार्द्रं च गोमयम्।<br>रुक्मं रूप्यं तथा ताम्रं सर्वरत्नानि चाप्यथ ॥ १७<br>औषधानि च धर्मज्ञ यवाः सिद्धार्थकास्तथा।<br>नृवाह्यमानं यानं च भद्रपीठं तथैव च ॥ १८<br>खड्गं छत्रं पताका च मृदश्चायुधमेव च।<br>राजलिङ्गानि सर्वाणि शवं रुदितवर्जितम् ॥ १९<br>घृतं दधि पयश्चैव फलानि विविधानि च।<br>स्वस्तिकं वर्धमानं च नन्द्यावर्तं सकौस्तुभम् ॥ २०<br>वादित्राणां सुखः शब्दो गम्भीरः सुमनोहरः।<br>गान्धारषड्जऋषभा ये च शास्तास्तथा स्वराः ॥ २१<br>वायुः सशर्करो रूक्षः सर्वत्र समुपस्थितः।<br>प्रतिलोमस्तथा नीचो विज्ञेयो भयकृद् द्विज ॥ २२<br>अनुकूलो मृदुः स्निग्धः सुखस्पर्शः सुखावहः।<br>रूक्षा रूक्षस्वरा भद्राः क्रव्यादाः परिगच्छताम् ॥ २३ | ये तथा इनके अतिरिक्त और भी वस्तुएँ देखनेमें अशुभ मानी गयी हैं। वाद्योंके भयानक तथा बिना तालके रूखे स्वर भी अशुभ कहे गये हैं। धर्मज्ञ! सामनेसे 'आओ'—ऐसा शब्द कहना शुभ है, किंतु पीछेसे नहीं। इसी तरह पीछेसे 'जाओ' यह कहना शुभ है, किंतु वही आगेसे कहना अशुभ है। 'कहाँ जा रहे हो, रुको, मत जाओ; तुम्हारे वहाँ जानेसे क्या लाभ?'—इस प्रकारके जो दूसरे अनिष्ट शब्द हैं, वे सभी विपत्तिकारक हैं। ध्वजा, पताका आदिपर मांसभक्षी पक्षियोंका बैठना, वाहनोंका फिसलना तथा वस्त्रका अटक जाना निन्दित माना गया है। द्वारसे निकलते समय सिरमें चोट लगना तथा छत्र, ध्वजा और वस्त्रादिका गिरना अशुभकारक है। प्रथम बार अपशकुन दीखनेपर विद्वान् राजाको चाहिये कि वह अशुभविनाशक एवं मधुहन्ता भगवान् केशवकी स्तोत्रोंद्वारा पूजा¹ करे। दूसरी बार पुनः अपशकुन दिखायी पड़नेपर उसे घरमें लौट जाना चाहिये ॥ २—१३ १/२ ॥<br><br>अनघ! अब मैं शुभ-सूचक अभीष्ट शकुनोंका वर्णन कर रहा हूँ। राजन्! श्वेत फूल, भरा हुआ घट, जलजन्तु, पक्षी, मांस, मछलियाँ, गौएँ, घोड़े, हाथी, अकेला बँधा हुआ पशु, बकरा, देवता, मित्र, ब्राह्मण, जलती हुई अग्नि, वेश्या, दूर्वा, गीला गोबर, सुवर्ण, चाँदी, ताँबा, सभी प्रकारके रत्न, ओषधियाँ, जौ, पीली सरसों, मनुष्योंको ढोता हुआ वाहन, सुन्दर सिंहासन, तलवार, छत्र, पताका, मिट्टी, हथियार, सभी प्रकारके राजचिह्न, रुदनरहित मुर्दा, घी, दही, दूध, विविध प्रकारके फल, स्वस्तिक², वर्धमान³, नन्द्यावर्त⁴, कौस्तुभमणि, वाद्योंके सुखदायक, मनोहर एवं गम्भीर शब्द, गान्धार, षड्ज तथा ऋषभ आदि स्वर शुभदायक माने गये हैं। द्विज! यदि बालूके कणोंसे युक्त रूखी वायु सर्वत्र प्रतिकूल दिशामें पृथ्वीका स्पर्श करके बह रही हो तो उसे भयकारी जानना चाहिये। अनुकूल दिशामें बहनेवाली मृदु, शीतल एवं सुखस्पर्शी वायु सुखदायिनी होती है। निष्ठुर एवं रूखे स्वरमें बोलनेवाले मांसभक्षी जीव यात्रियोंके लिये कल्याणकारक होते हैं। |


१. ऐसे स्तोत्रोंमें विष्णुसहस्रनाम, गजेन्द्रमोक्ष, (महापुरुषविद्या) 'जितं ते पुण्डरीकाक्ष' आदि श्रेष्ठ हैं।
२. ऐसा प्रासाद जिसमें पूर्वकी ओर द्वार न हो। (बृहत्संहिता ५३। ३४)
३. वह प्रासाद जिसमें दक्षिणकी ओर दरवाजा न हो। (बृहत्संहिता ५३। ३३)
४. एक प्रकारका मकान, जिसमें पश्चिमकी ओर द्वार न हो। (बृहत्संहिता ५३। ३२)