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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१३२- त्रिपुरवासी दैत्योंका अत्याचार, देवताओंका ब्रह्माकी शरणमें जाना और ब्रह्मसहित शिवजीके पास जाकर उनकी स्तुति करना

* अध्याय १२९ *४५७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दुर्गं व्यवसितः कर्तुमिति चाचिन्तयत् तदा।<br>कथं नाम भवेद् दुर्गं तन्मया त्रिपुरं कृतम्॥ २८<br>वत्स्यते तत्पुरं दिव्यं मत्तो नान्यैर्न संशयः।<br>यथा चैकेषुणा तेन तत्पुरं न हि हन्यते॥ २९<br>देवैस्तथा विधातव्यं मया मतिविचारणम्।<br>विस्तारो योजनशतमेकैकस्य पुरस्य तु॥ ३०<br>कार्यस्तेषां च विष्कम्भश्चैकैकशतयोजनम्।<br>पुष्ययोगेण निर्माणं पुराणां च भविष्यति॥ ३१<br>पुष्ययोगेण च दिवि समेष्यन्ति परस्परम्।<br>पुष्ययोगेण युक्तानि यस्तान्यासादयिष्यति॥ ३२<br>पुराण्येकप्रहारेण स तानि निहनिष्यति।<br>आयसं तु क्षितितले रजतं तु नभस्तले॥ ३३<br>राजतस्योपरिष्टात् तु सौवर्णं भविता पुरम्।<br>एवं त्रिभिः पुरैर्युक्तं त्रिपुरं तद् भविष्यति।<br>शतयोजनविष्कम्भैरन्तरैस्तद् दुरासदम्॥ ३४<br>अट्टालकैर्यन्त्रशतघ्निभिश्च<br>सचक्रशूलोपलकम्पन्नैश्च ।<br>द्वारैर्महामन्दरमेरुकल्पैः प्राकार-<br>शृङ्गैः सुविराजमानम्॥ ३५<br>सतारकाख्येन मयेन गुप्तं<br>स्वस्थं च गुप्तं तडिमालिनापि।<br>को नाम हन्तुं त्रिपुरं समर्थो<br>मुक्त्वा त्रिनेत्रं भगवन्तमेकम्॥ ३६दानव दुर्गकी रचना करनेके लिये उद्यत हो विचार करने लगा। मेरे द्वारा निर्मित होनेवाला यह त्रिपुर दुर्ग कैसा बनाया जाय, जिससे उस दिव्य पुरमें निस्संदेह मेरे अतिरिक्त अन्य कोई निवास न कर सके तथा उसके द्वारा छोड़े गये एक बाणसे यह पुर बींधा न जा सके। देवगण उसे नष्ट करनेकी चेष्टा करेंगे ही, किंतु मुझे तो अपनी बुद्धिसे विचार कर लेना चाहिये। उनमें एक-एक पुरका विस्तार सौ योजनका करना है तथा उनके विष्कम्भ (स्तम्भ या शहतीर) भी एक-एक सौ योजनके बनाने हैं॥ २९–३१½॥<br><br>इन पुरोंका निर्माण पुष्य नक्षत्रके योगमें होगा। इसी पुष्य नक्षत्रके योगमें ये तीनों पुर आकाशमण्डलमें परस्पर मिल जायँगे। जो मनुष्य पुष्य नक्षत्रके योगमें इन तीनों पुरोंको परस्पर मिला हुआ पा लेगा, वही एक बाणके प्रहारसे इन्हें नष्ट कर सकेगा। उनमेंसे एक पुर भूतलपर लौहमय, दूसरा गगनतलमें रजतमय और तीसरा रजतमय पुरसे ऊपर सुवर्णमय होगा। इस प्रकार तीनों पुरोंसे युक्त होनेके कारण वह त्रिपुर नामसे विख्यात होगा। इनके अन्तर्भागमें सौ योजन विस्तारवाले विष्कम्भ (बाधक स्तम्भ) रहेंगे, जिससे यह दूसरोंद्वारा दुष्प्राप्य होगा। वह त्रिपुर अट्टालिकाओं, एक ही बारमें सौ मनुष्योंका वध करनेवाले यन्त्रों, चक्र, त्रिशूल, उपल और ध्वजाओं, मन्दराचल और सुमेरु गिरि-सरीखे द्वारों और शिखर-सदृश परकोटोंसे सुशोभित होगा। उनमें तारक लौहमय पुरकी और मय सुवर्णमय पुरकी रक्षा करेंगे तथा आकाशस्थित रजतमय पुरकी रक्षामें विद्युन्माली नियुक्त रहेगा। ऐसी दशामें एकमात्र भगवान् शंकरको छोड़कर दूसरा कौन इस त्रिपुरका विनाश करनेमें समर्थ हो सकेगा॥ ३१–३६॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरोपाख्याने एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १२९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरोपाख्यानमें एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२९॥

४५८ | * मत्स्यपुराण *


एक सौ तीसवाँ अध्याय

दानवश्रेष्ठ मयद्वारा त्रिपुरकी रचना

सूत उवाच**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इस प्रकार सोच-विचारकर (महाशिल्पी) मयदानव दिव्य उपायोंके प्रभावसे बननेवाले तथा मनके संकल्पानुसार चलनेवाले त्रिपुर नामक दुर्गकी रचना करनेको उद्यत हुआ। उसने सोचा कि इस मार्गमें परकोटा बनेगा, यहाँ अथवा वहाँ गोपुर (नगरका फाटक) रहेगा, यहाँ अट्टालिकाका दरवाजा तथा यहाँ महलका मुख्य द्वार रखना उचित है। इधर विशाल राजमार्ग होना चाहिये, यहाँ दोनों ओर पगडंडियोंसे युक्त सड़कें और गलियाँ होनी चाहिये, यहाँ चबूतरा रखना ठीक है, यह स्थान अन्तःपुरके योग्य है, यहाँ शिव-मन्दिर रखना अच्छा होगा, यहाँ वट-वृक्षसहित तड़ागों, बावलियों और सरोवरोंका निर्माण उचित होगा। यहाँ बगीचे, सभाभवन और वाटिकाएँ रहेंगी तथा यहाँ दानवोंके निकलनेके लिये मनोहर मार्ग रहेगा। इस प्रकार नगर-रचनामें निपुण मयने केवल मनःसंकल्पमात्रसे उस दिव्य त्रिपुर नगरकी रचना कर डाली थी, ऐसा हमने सुना है। मयने जो काले लोहेका पुर निर्मित किया था, उसका अधिपति तारकासुर हुआ। वह उसपर अपना आधिपत्य जमाकर वहाँ निवास करने लगा। दूसरा जो पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान कान्तिमान् रजतमय पुर निर्मित हुआ, उसका स्वामी विद्युन्माली हुआ। यह विद्युत्समूहोंसे युक्त बादलकी तरह जान पड़ता था। मयद्वारा जिस तीसरे स्वर्णमय पुरकी रचना हुई, उसमें सामर्थ्यशाली मय स्वयं गया और उसका अधिपति हुआ। जिस प्रकार तारकासुरके पुरसे विद्युन्मालीका पुर सौ योजनकी दूरीपर था, उसी प्रकार विद्युन्माली और मयके पुरोंमें भी सौ योजनका अन्तर था। मयदानवका विशाल पुर मेरुपर्वतके समान दीख पड़ता था॥ १—१०½॥
इति चिन्तायुतो दैत्यो दिव्योपायप्रभावजम्।<br>चकार त्रिपुरं दुर्गं मनःसंचारचारितम्॥ १
प्राकारोऽनेन मार्गेण इह वामुत्र गोपुरम्।<br>इह चाट्टालकद्वारमिह चाट्टालगोपुरम्॥ २
राजमार्ग इतश्चापि विपुलो भवतामिति।<br>रथ्योपरथ्याः सदृशा इह चत्वर एव च॥ ३
इदमन्तःपुरस्थानं रुद्रायतनमत्र च।<br>सवटानि तडागानि ह्यत्र वाप्यः सरांसि च॥ ४
आरामाश्च सभाश्चात्र उद्यानान्यत्र वा तथा।<br>उपनिर्गमो दानवानां भवत्यत्र मनोहरः॥ ५
इत्येवं मानसं तत्राकल्पयत् पुरकल्पवित्।<br>मयेन तत्पुरं सृष्टं त्रिपुरं त्विति नः श्रुतम्॥ ६
कार्ष्णायसमयं यत्तु मयेन विहितं पुरम्।<br>तारकाख्योऽधिपस्तत्र कृतस्थानाधिपोऽवसत्॥ ७
यत्तु पूर्णेन्दुसंकाशं राजतं निर्मितं पुरम्।<br>विद्युन्माली प्रभुस्तत्र विद्युन्माली त्विवाम्बुदः॥ ८
सुवर्णाधिकृतं यच्च मयेन विहितं पुरम्।<br>स्वयमेव मयस्तत्र गतस्तदधिपः प्रभुः॥ ९
तारकस्य पुरं तत्र शतयोजनमन्तरम्।<br>विद्युन्मालिपुरं चापि शतयोजनकेऽन्तरे॥ १०
* अध्याय १३० *४५९

| मेरुपर्वतसंकाशं मयस्यापि पुरं महत्।<br>पुष्यसंयोगमात्रेण कालेन स मयः पुरा॥ ११<br><br>कृतवांस्त्रिपुरं दैत्यस्त्रिनेत्रः पुष्यकं यथा।<br>येन येन मयो याति प्रकुर्वाणः पुरं पुरात्॥ १२<br><br>प्रशस्तास्तत्र तत्रैव वारुण्या मालया स्वयम्।<br>रुक्मरूप्यायसानां च शतशोऽथ सहस्रशः॥ १३<br><br>रत्नाचितानि शोभन्ते पुराण्यमरविद्विषाम्।<br>प्रासादशतजुष्टानि कूटागारोत्कटानि च॥ १४<br><br>सर्वेषां कामगानि स्युः सर्वलोकातिगानि च।<br>सोद्यानवापीकूपानि सपद्मसरवन्ति च॥ १५<br><br>अशोकवनभूतानि कोकिलारुतवन्ति च।<br>चित्रशालविशालानि चतुःशालोत्तमानि च॥ १६<br><br>सप्ताष्टदशभौमानि सत्कृतानि मयेन च।<br>बहुध्वजपताकानि स्रग्दामालङ्कृतानि च॥ १७<br><br>किङ्किणीजालशब्दानि गन्धवन्ति महान्ति च।<br>सुसंयुक्तोपलिप्तानि पुष्यनैवेद्यवन्ति च॥ १८<br><br>यज्ञधूमान्धकाराणि सम्पूर्णकलशानि च।<br>गगनावरणाभानि हंसपङ्क्तिनिभानि च॥ १९<br><br>पङ्क्तीकृतानि राजन्ते गृहाणि त्रिपुरे पुरे।<br>मुक्ताकलापैर्लम्बद्भिर्हसन्तीव शशिश्रियम्॥ २० | जिस प्रकार पूर्वकालमें त्रिलोचन भगवान् शंकरने पुष्यककी रचना की थी, उसी प्रकार मयदानवने केवल पुष्यनक्षत्रके संयोगसे कालकी व्यवस्था करके त्रिपुरका निर्माण किया। पुरकी रचना करता हुआ मय जिस-जिस मार्गसे एक पुरसे दूसरे पुरमें जाता था, वहाँ-वहाँ वरुणकी दी हुई मालाद्वारा उत्पन्न चमत्कारसे सोने, चाँदी और लोहेके सैकड़ों-हजारों भवन स्वयं ही बनते जाते थे। उन देव-शत्रुओंके पुर रत्नखचित होनेके कारण विशेष शोभा पा रहे थे। वे सैकड़ों महलोंसे युक्त थे। उनमें ऊँचे-ऊँचे कूटागार (छतके ऊपरकी कोठरियाँ) बने थे। उनमें सभी लोग स्वच्छन्द विचरण करते थे। वे (सुन्दरतामें) सभी लोकोंका अतिक्रमण करनेवाले थे। उनमें उद्यान, बावली, कुआँ और कमलोंसे युक्त सरोवर शोभा पा रहे थे। उनमें अशोक वृक्षके बहुतेरे वन थे, जिनमें कोयलें कूकती रहती थीं। उनमें बड़ी-बड़ी चित्रशालाएँ और उत्तम अटारियाँ बनी थीं। मयने क्रमशः सात, आठ और दस तल्लेवाले भवनोंका बड़ी सुन्दरताके साथ निर्माण किया था। उनपर बहुसंख्यक ध्वज और पताकाएँ फहरा रही थीं। वे मालाकी लड़ियोंसे अलंकृत थे। उनमें लगी हुई क्षुद्र घण्टिकाओंके शब्द हो रहे थे। वे उत्कृष्ट गन्धयुक्त पदार्थोंसे सुवासित थे। उन्हें समुचितरूपसे उपलिप्त किया गया था। उनमें पुष्प, नैवेद्य आदि पूजन-सामग्री सँजोयी गयी थी और जलपूर्ण कलश स्थापित थे। वे यज्ञजन्य धुएँसे अन्धकारित हो रहे थे। उस त्रिपुर नामक पुरमें आकाशसरीखे नीले तथा हंसोंकी पङ्क्तिके समान उज्ज्वल भवन कतारोंमें सुशोभित हो रहे थे। उनमें लटकती हुई मोतियोंकी झालरें ऐसी प्रतीत होती थीं, मानो चन्द्रमाकी शोभाका उपहास कर रही हैं॥ ११-२०॥ | | मल्लिकाजातिपुष्पाद्यैर्गन्धधूपाधिवासितैः ।<br>पञ्चेन्द्रियसुखैर्नित्यं समैः सत्पुरुषैरिव॥ २१ | वे नित्य मल्लिका, चमेली आदि सुगन्धित पुष्पों तथा गन्ध, धूप आदिसे अधिवासित होनेसे पाँचों इन्द्रियोंके सुखोंसे समन्वित सत्पुरुषोंकी तरह सुशोभित हो रहे थे। | | हैमराजतलौहाद्यमणिरत्नाञ्जनाङ्किताः ।<br>प्राकारास्त्रिपुरे तस्मिन् गिरिप्राकारसंनिभाः॥ २२ | उस त्रिपुरमें सोने, चाँदी और लोहेके प्राचीर बने हुए थे, जिनमें मणि, रत्न और अंजन (काले पत्थर) जड़े हुए |

१३३- त्रिपुर-विध्वंसार्थ शिवजीके विचित्र रथका निर्माण और देवताओंके साथ उनका युद्धके लिये प्रस्थान

४६० * मत्स्यपुराण *


एकैकस्मिन् पुरे तस्मिन् गोपुराणां शतं शतम्।<br>सपताकाध्वजवतां दृश्यन्ते गिरिशृङ्गवत्॥ २३<br>नूपुरारावरम्याणि त्रिपुरे तत्पुराण्यपि।<br>स्वर्गातिरिक्तश्रीकाणि तत्र कन्यापुराणि च॥ २४<br>आरामैश्च विहारैश्च तडागवटचत्वरैः।<br>सरोभिश्च सरिद्भिश्च वनैश्चोपवनैरपि॥ २५<br>दिव्यभोगोपभोगानि नानारत्नयुतानि च।<br>पुष्पोत्करैश्च सुभगास्त्रिपुरस्योपनिर्गमाः।<br>परिखाशतगम्भीराः कृता मायानिवारणैः॥ २६<br>निशम्य तद्दुर्गविधानमुत्तमं<br>कृतं मयेनाद्भुतवीर्यकर्मणा।<br>दितेः सुता दैववराजवैरिणः<br>सहस्रशः प्रापुरनन्तविक्रमाः॥ २७<br>तदा सुरैर्दर्पितवैरीमर्दनै-<br>र्जनार्दनैः शैलकरीन्द्रसंनिभैः।<br>बभूव पूर्णं त्रिपुरं तथा पुरा<br>यथाम्बरं भूरिजलैर्जलप्रदैः॥ २८थे। वे ऐसे प्रतीत होते थे मानो पर्वतोंकी चहारदीवारी हो। उस एक-एक पुरमें सैकड़ों गोपुर बने थे, जिनपर ध्वजा और पताकाएँ फहरा रही थीं। वे पर्वत-शिखरके समान दीख रहे थे। उस त्रिपुरमें नूपुरोंकी झनकार होती थी, जिससे वे अत्यन्त रमणीय लग रहे थे। उन पुरोंका सौन्दर्य स्वर्गसे भी बढ़कर था। उनमें कन्यापुर भी बने हुए थे। वे बगीचों, विहारस्थलों, तड़ागों, वटवृक्षके नीचे बने चबूतरों, सरोवरों, नदियों, वनों और उपवनोंसे सम्पन्न थे। वे दिव्य भोगकी सामग्रियों और नाना प्रकारके रत्नोंसे परिपूर्ण थे। उस त्रिपुरके बाहर निकलनेवाले मार्गोंपर पुष्प बिखेरे गये थे, जिससे वे बड़े सुन्दर लग रहे थे। उनमें मायाको निवारण करनेवाले उपकरणोंद्वारा सैकड़ों गहरी खाइयाँ बनायी गयी थीं। अद्भुत पराक्रमयुक्त कर्म करनेवाले मयके द्वारा निर्मित उस उत्तम दुर्गकी रचनाका वृत्तान्त सुनकर देवराज इन्द्रके शत्रु अनन्त पराक्रमी हजारों दैत्य वहाँ आ पहुँचे। उस समय वह त्रिपुर गर्वीले शत्रुओंका मान मर्दन करनेवाले, जनताके लिये कष्टदायक तथा पर्वतीय गजेन्द्रोंके समान विशालकाय असुरोंसे उसी प्रकार खचाखच भर गया, जैसे अधिक जलवाले बादलोंसे आकाश आच्छादित हो जाता है॥ २१—२८॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरोपाख्याने त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरोपाख्यानमें एक सौ तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३०॥


एक सौ इकतीसवाँ अध्याय

त्रिपुरमें दैत्योंका सुखपूर्वक निवास, मयका स्वप्न-दर्शन और दैत्योंका अत्याचार

सूत उवाच<br>निर्मिते त्रिपुरे दुर्गे मयेनासुरशिल्पिना।<br>तद् दुर्गं दुर्गतां प्राप बद्धवैरैः सुरासुरैः॥ १<br>सकलत्राः सपुत्राश्च शस्त्रवन्तोऽन्तकोपमाः।<br>मयादिष्टानि विविशुर्गृहाणि हृषिताश्च ते॥ २**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इस प्रकार असुरशिल्पी मयने त्रिपुर नामक दुर्गका निर्माण किया, परंतु अन्ततोगत्वा परस्पर बँधे हुए वैरवाले देवताओं और असुरोंके लिये वह दुर्ग दुर्गम हो गया। उस समय वे सभी शस्त्रधारी दैत्य जो यमराजके समान भयंकर थे, मयके आदेशसे अपनी स्त्रियों और पुत्रोंके साथ हर्षपूर्वक उन गृहोंमें

* अध्याय १३१ * । ४६१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सिंहा वनमिवानेके मकरा इव सागरम्।<br>रोषैश्चैवातिपारुष्यैः शरीरमिव संहतैः॥ ३<br>तद्वद् बलिभिरध्यस्तं तत्पुरं देवतारिभिः।<br>त्रिपुरं संकुलं जातं दैत्यकोटिशताकुलम्॥ ४<br>सुतलादपि निष्पत्य पातालाद् दानवालयात्।<br>उपतस्थुः पयोदाभा ये च गिर्युपजीविनः॥ ५<br>यो यं प्रार्थयते कामं सम्प्राप्तस्त्रिपुराश्रयात्।<br>तस्य तस्य मयस्तत्र मायया विदधाति सः॥ ६<br>सचन्द्रेषु प्रदोषेषु साम्बुजेषु सरःसु च।<br>आरामेषु सचूतेषु तपोधनवनेषु च॥ ७<br>स्वङ्गाश्चन्दनदिग्धाङ्गा मातङ्गाः समदा इव।<br>मृष्टाभरणवस्त्राश्च मृष्टस्रगनुलेपनाः॥ ८<br>प्रियाभिः प्रियकामाभिर्भावभावप्रसूतिभिः।<br>नारीभिः सततं रेमुर्मुदिताश्चैव दानवाः॥ ९प्रविष्ट हुए। जैसे अनेकों सिंह वनको, अनेकों मगरमच्छ सागरको और क्रोध एवं अत्यन्त कठोरता परस्पर सम्मिलित होकर शरीरको अपने अधिकारमें कर लेते हैं, वैसे ही उन महाबली देव-शत्रुओंद्धारा वह पुर व्याप्त हो गया। इस प्रकार वह त्रिपुर असंख्य (अरबों) दैत्योंसे भर गया। उस समय सुतल और पाताल (दानवोंके निवासस्थान)-से निकलकर आये हुए दानव तथा (देवताओंके भयसे छिपकर) पर्वतोंपर जीवन-निर्वाह करनेवाले दैत्य भी, जो काले बादलकी-सी कान्तिवाले थे, (शरणार्थीके रूपमें) वहाँ उपस्थित हुए। त्रिपुरमें आश्रय लेनेके कारण जो असुर जिस वस्तुकी कामना करता था, उसकी उस कामनाको मयदानव मायाद्वारा पूर्ण कर देता था। जिनके सुडौल शरीरपर चन्दनका अनुलेप लगा था, जो निर्मल आभूषण, वस्त्र, माला और अङ्गरागसे अलंकृत थे तथा मतवाले गजेन्द्रसरीखे दीख रहे थे, ऐसे दानव चाँदनी रातोंमें एवं सायंकालके समय कमलसे सुशोभित सरोवरोंके तटपर, आमके बगीचों और तपोवनोंमें अपनी पत्नियोंके साथ निरन्तर हर्षपूर्वक विहार करते थे॥ १—९॥
मयेन निर्मिते स्थाने मोदमाना महासुराः।<br>अर्थे धर्मे च कामे च निदधुस्ते मतीः स्वयम्॥ १०<br>तेषां त्रिपुरयुक्तानां त्रिपुरे त्रिदशारिणाम्।<br>व्रजति स्म सुखं कालः स्वर्गस्थानां यथा तथा॥ ११<br>शुश्रूषन्ते पितॄन् पुत्राः पत्न्यश्चापि पतींस्तथा।<br>विमुक्तकलहाश्चापि प्रीतयः प्रचुराभवन्॥ १२<br>नाधर्मस्त्रिपुरस्थानां बाधते वीर्यवानपि।<br>अर्चयन्तो दितेः पुत्रास्त्रिपुरायतने हरम्॥ १३<br>पुण्याहशब्दानुच्चैरुराशीर्वादांश्च वेदगान्।<br>स्वनूपुररवन्मिश्रान् वेणुवीणारवानपि॥ १४<br>हासश्च वरनारीणां चित्तव्याकुलकारकः।<br>त्रिपुरे दानवेन्द्राणां रमतां श्रूयते सदा॥ १५इस प्रकार मयद्वारा निर्मित उस स्थानपर निवास करते हुए वे महासुर आनन्दका उपभोग कर रहे थे। उन्होंने स्वयं ही धर्म, अर्थ और कामके सम्पादनमें अपनी बुद्धि लगायी। त्रिपुरमें निवास करनेवाले उन देव-शत्रुओंका समय ऐसा सुखमय व्यतीत हो रहा था, जैसे स्वर्गवासियोंका व्यतीत होता है। वहाँ पुत्र पितृगणोंकी तथा पत्नियाँ पतियोंकी सेवा करती थीं। वे परस्पर कलह नहीं करते थे। उनमें परम प्रेम था। किसी प्रकारका अधर्म प्रबल होनेपर भी त्रिपुर-निवासियोंको बाधा नहीं पहुँचाता था। वे दैत्य शिव-मन्दिरमें शङ्करजीकी अर्चना करते हुए वेदोक्त माङ्गलिक शब्दों एवं आशीर्वादोंका उच्चारण करते थे। त्रिपुरमें आनन्द मनानेवाले दानवेन्द्रोंके अपने नूपुरकी झनकारसे मिश्रित वेणु एवं वीणाके शब्द तथा सुन्दरी नारियोंके चित्तको व्याकुल कर देनेवाले हास सदा सुनायी पड़ते थे।

४६२ * मत्स्यपुराण *


Sanskrit ShlokasHindi Translation
तेषामर्चयतां देवान् ब्राह्मणांश्च नमस्यताम्।<br>धर्मार्थकामतन्त्राणां महान् कालोऽभ्यवर्तत॥ १६<br><br>अथालक्ष्मीरसूया च तृड्बुभुक्षे तथैव च।<br>कलिश्च कलहश्चैव त्रिपुरं विविशुः सह॥ १७<br><br>संध्याकालं प्रविष्टास्ते त्रिपुरं च भयावहाः।<br>समध्यासुः समं घोराः शरीराणि यथाऽऽमयाः॥ १८<br><br>सर्व एते विशन्तस्तु मयेन त्रिपुरान्तरम्।<br>स्वप्ने भयावहा दृष्टा आविशन्तस्तु दानवान्॥ १९<br><br>उदिते च सहस्रांशौ शुभभासाकरे रवौ।<br>मयः सभामाविवेश भास्कराभ्यामिवाम्बुदः॥ २०<br><br>मेरूकूटनिभे रम्ये आसने स्वर्णमण्डिते।<br>आसीनाः काञ्चनगिरेः शृङ्गे तोयमुचो यथा॥ २१<br><br>पार्श्वयोस्तारकाख्यश्च विद्युन्माली च दानवः।<br>उपविष्टौ मयस्यान्ते हस्तिनः कलभाविव॥ २२इस प्रकार देवताओंकी अर्चना और ब्राह्मणोंको नमस्कार करनेवाले तथा धर्म, अर्थ एवं कामके साधक उन दैत्योंका महान् समय व्यतीत होता गया। तदनन्तर अलक्ष्मी (दरिद्रता), असूया (गुणोंमें दोष निकालना), तृष्णा, बुभुक्षा (भूख), कलि और कलह—ये सब एक साथ मिलकर त्रिपुरमें प्रविष्ट हुए। इन भयदायक दुर्गुणोंने सायंकाल त्रिपुरमें प्रवेश किया था। इन्होंने राक्षसोंपर ऐसा अधिकार जनाया, जैसे भयंकर व्याधियाँ शरीरोंको काबूमें कर लेती हैं। त्रिपुरके भीतर प्रवेश करते हुए इन दुर्गुणोंको मयने स्वप्नमें दानवोंके शरीरमें भयानक रूपसे प्रविष्ट होते हुए देख लिया। तब सहस्र किरणधारी एवं उज्ज्वल प्रकाश करनेवाले सूर्यके उदय होनेपर मयने (तारक और विद्युन्मालीके साथ) दो सूर्योंसे युक्त बादलकी तरह सभाभवनमें प्रवेश किया। वहाँ वे मेरुगिरिके शिखरके समान सुन्दर स्वर्णमण्डित रमणीय आसनपर आसीन हो गये। उस समय वे ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो सुमेरुगिरिके शिखरपर बादल उमड़ आये हों। मयदानवके निकट एक ओर तारकासुर और दूसरी ओर दानवश्रेष्ठ विद्युन्माली बैठे हुए थे, जो हाथीके बच्चेकी तरह दीख रहे थे॥ १६—२२॥
ततः सुरारयः सर्वेऽशेषकोपा रणाजिरे।<br>उपविष्टा दृढं विद्धा दानवा देवशत्रवः॥ २३<br><br>तेष्वासीनेषु सर्वेषु सुखासनगतेषु च।<br>मयो मायाविजनक इत्युवाच स दानवान्॥ २४<br><br>खेचराः खेचरारावा भो भो दाक्षायणीसुताः *।<br>निशामयध्वं स्वप्नोऽयं मया दृष्टो भयावहः॥ २५<br><br>चतस्रः प्रमदास्तत्र त्रयो मर्त्या भयावहाः।<br>कोपानलादीप्तमुखाः प्रविष्टास्त्रिपुरार्दिनः॥ २६तत्पश्चात् युद्धस्थलमें अत्यन्त घायल होनेके कारण जिनके क्रोध शेष रह गये थे, वे सभी देवशत्रु दानव वहाँ आकर यथास्थान बैठ गये। इस प्रकार उन सबके सुखपूर्वक आसनपर बैठ जानेके पश्चात् मायाके उत्पादक मयने उन दानवोंसे इस प्रकार कहा—'अरे दाक्षायणीके पुत्रो! तुमलोग आकाशमें विचरण करनेवाले तथा आकाशचारियोंमें विशेषरूपसे गर्जना करनेवाले हो। मैंने यह एक भयानक स्वप्न देखा है, उसे तुमलोग ध्यानपूर्वक सुनो। मैंने स्वप्नमें चार स्त्रियों और तीन पुरुषोंको पुरमें प्रवेश करते हुए देखा है। उनके रूप भयानक थे तथा

* दक्षकी कन्या दनुको ही यहाँ दाक्षायणी कहा गया है। सभी दानव कश्यपजीके द्वारा उत्पन्न इन्हीं दनुके पुत्र थे। दैत्यगण दितिके पुत्र थे।

* अध्याय १३१ * ४६३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रविश्य रुषितास्ते च पुराण्यतुलविक्रमाः ।<br>प्रविष्टाः स्म शरीराणि भूत्वा बहुशरीरिणः ॥ २७<br><br>नगरं त्रिपुरं चेदं तमसा समवस्थितम् ।<br>सगृहं सह युष्माभिः सागराम्भसि मज्जितम् ॥ २८<br><br>उलूकं रुचिरा नारी नग्नाऽऽरूढा खरं तथा।<br>पुरुषः सिन्दुतिलकश्चतुरङ्घ्रिस्त्रिलोचनः ॥ २९<br><br>येन सा प्रमदा नुन्ना अहं चैव विबोधितः।<br>ईदृशी प्रमदा दृष्टा मया चातिभयावहा ॥ ३०<br><br>एष ईदृशिकः स्वप्नो दृष्टो वै दितिनन्दनाः।<br>दृष्टः कथं हि कष्टाय असुराणां भविष्यति ॥ ३१<br><br>यदि वोऽहं क्षमो राजा यदिदं वेत्थ चेद्धितम् ।<br>निबोधध्वं सुमनसो न चासूयितुमर्हथ ॥ ३२<br><br>कामं चेष्र्याँ च कोपं च असूयां संविहाय च।<br>सत्ये दमे च धर्मे च मुनिवादे च तिष्ठत ॥ ३३<br><br>शान्तयश्च प्रयुज्यन्तां पूज्यतां च महेश्वरः ।<br>यदि नामास्य स्वप्नस्य ह्येवं चोपरमो भवेत् ॥ ३४<br><br>कुप्यते नो ध्रुवं रुद्रो देवदेवस्त्रिलोचनः ।<br>भविष्याणि च दृश्यन्ते यतो नस्त्रिपुरेऽसुराः ॥ ३५<br><br>कलहं वर्जयन्तश्च अर्जयन्तस्तथाऽऽर्जवम् ।<br>स्वप्नोदयं प्रतीक्षध्वं कालोदयमथापि च ॥ ३६मुख क्रोधाग्निसे उद्दीप्त हो रहे थे, जिससे ऐसा लगता था मानो वे त्रिपुरके विनाशक हैं। वे अतुल पराक्रमशाली प्राणी क्रोधसे भरे हुए थे और पुरोंमें प्रवेश करके अनेकों शरीर धारणकर दानवोंके शरीरोंमें भी घुस गये हैं। यह त्रिपुर नगर अन्धकारसे आच्छन्न हो गया है और गृह तथा तुमलोगोंके साथ ही सागरके जलमें डूब गया है। एक सुन्दरी स्त्री नंगी होकर उलूकपर सवार थी तथा उसके साथ एक पुरुष था, जिसके ललाटमें लाल तिलक लगा था। उसके चार पैर और तीन नेत्र थे। वह गधेपर चढ़ा हुआ था। उसने उस स्त्रीको प्रेरित किया, तब उसने मुझे नींदसे जगा दिया। इस प्रकारकी अत्यन्त भयावनी नारीको मैंने स्वप्नमें देखा है। दितिपुत्रो! मैंने इस प्रकारका स्वप्न देखा है और यह भी देखा है कि यह स्वप्न असुरोंके लिये किस प्रकार कष्टदायक होगा। इसलिये यदि तुमलोग हमें अपना उचितरूपसे राजा मानते हो और यह समझते हो कि इनका कथन हितकारक होगा तो मन लगाकर मेरी बात सुनो। तुमलोग किसीकी असूया (झूठी निन्दा) मत करो। काम, क्रोध, ईर्ष्या, असूया आदि दुर्गुणोंको एकदम छोड़कर सत्य, दम, धर्म और मुनिमार्गका आश्रय लो। शान्तिदायक अनुष्ठानोंका प्रयोग करो और महेश्वरकी पूजा करो। सम्भवतः ऐसा करनेसे स्वप्नकी शान्ति हो जाय। असुरो! (ऐसा प्रतीत हो रहा है कि) त्रिनेत्रधारी देवाधिदेव भगवान् रुद्र निश्चय ही हमलोगोंपर कुपित हो गये हैं; क्योंकि हमारे त्रिपुरमें भविष्यमें घटित होनेवाली घटनाएँ अभीसे दीख पड़ रही हैं। अतः तुमलोग कलहका परित्याग तथा सरलताका आश्रय लेकर इस दुःस्वप्नके परिणामस्वरूप आनेवाले कालकी प्रतीक्षा करो'॥ २३—३६॥
श्रुत्वा दाक्षायणीपुत्रा इत्येवं मयभाषितम् ।<br>क्रोधेष्र्यावस्थया युक्ता दृश्यन्ते च विनाशगाः ॥ ३७इस प्रकार मयदानवका भाषण सुनकर सभी दानव क्रोध और ईर्ष्याके वशीभूत हो गये तथा विनाशकी ओर जाते हुए-से दीखने लगे। अलक्ष्मीद्वारा प्रभावित हुए वे
विनाशमुपपश्यन्तो ह्यलक्ष्म्याध्यापितासुराः ।<br>तत्रैव दृष्ट्वा तेऽन्योन्यं संक्रोधापूरितेक्षणाः ॥ ३८असुर अपने भावी विनाशको संनिकट देखते हुए भी परस्पर एक-दूसरेकी ओर देखकर वहीं क्रोधसे भर गये।

४६४ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अथ दैवपरिव्ध्वस्ता दानवास्त्रिपुरालयाः।<br>हित्वा सत्यं च धर्मं च अकार्याण्युपचक्रमुः॥ ३९उनकी आँखें लाल हो गयीं। तदनन्तर दैव (भाग्य)-से परिच्युत हुए त्रिपुरनिवासी दानव सत्य और धर्मका परित्याग कर निन्द्य कर्मोंमें प्रवृत्त हो गये।
द्विषन्ति ब्राह्मणान् पुण्यान्न चार्चन्ति हि देवताः।<br>गुरुं चैव न मन्यन्ते ह्यन्योन्यं चापि चुक्रुधुः॥ ४०वे पवित्र ब्राह्मणोंसे द्वेष करने लगे। उन्होंने देवताओंकी अर्चना छोड़ दी। वे गुरुजनोंका मान नहीं करते थे और परस्पर क्रोधपूर्ण व्यवहार करने लगे।
कलहेषु च सज्जन्ते स्वधर्मेषु हसन्ति च।<br>परस्परं च निन्दन्ति अहमित्येव वादिनः॥ ४१वे कलहमें प्रवृत्त होकर अपने धर्मका उपहास करने लगे और 'मैं ही सब कुछ हूँ' ऐसा कहते हुए परस्पर एक-दूसरेकी निन्दा करने लगे।
उच्चैर्गुरून् प्रभाषन्ते नाभिभाषन्ति पूजिताः।<br>अकस्मात् साश्रुनयना जायन्ते च समुत्सुकाः॥ ४२वे गुरुजनोंसे कड़े शब्दोंमें बोलते थे। स्वयं सत्कृत होनेपर भी उन्होंने अपनेसे नीची कोटिवालोंसे बोलना भी छोड़ दिया। उनकी आँखोंमें अकस्मात् आँसू उमड़ आते थे और वे उत्कण्ठित-से जो जाते थे।
दधिसक्तून् पयश्चैव कपित्थानि च रात्रिषु।<br>भक्षयन्ति च शेरन्त उच्छिष्टाः संवृतास्तथा॥ ४३वे रातमें दही, सत्तू, दूध और कैथका फल खाने लगे। जूठे मुँह रहकर घिरे हुए स्थानमें शयन करने लगे।
मूत्रं कृत्वोपस्पृशन्ति चाकृत्वा पादधावनम्।<br>संविशन्ति च शय्यासु शौचाचारविवर्जिताः॥ ४४उनका शौचाचार ऐसा विनष्ट हो गया कि वे मूत्र-त्यागकर जलका स्पर्श तो करते, परंतु बिना पैर धोये ही बिछौनोंपर शयन करने लगे।
संकुचन्ति भयाच्चैव मार्जाराणां यथाऽऽखुकः।<br>भार्यां गत्वा न शुध्यन्ति रहोवृत्तिषु निस्त्रपाः॥ ४५वे अकस्मात् भयसे इस प्रकार संकुचित हो जाते थे, जैसे बिलावको देखकर चूहे हो जाते हैं। उन्होंने स्त्री-सहवासके बाद शरीरकी शुद्धि करना छोड़ दिया और गोपनीय कार्योंमें भी निर्लज्ज हो गये।
पुरा सुशीला भूत्वा च दुःशीलत्वमुपागताः।<br>देवांस्तपोधनांश्चैव बाधन्ते त्रिपुरालयाः॥ ४६वे त्रिपुरनिवासी दैत्य पहले सुशील थे, पर अब बड़े क्रूर हो गये तथा देवताओं और तपस्वियोंको कष्ट देने लगे।
मयेन वार्यमाणापि ते विनाशमुपस्थिताः।<br>विप्रियाण्येव विप्राणां कुर्वाणाः कलहैषिणः॥ ४७मयके मना करनेपर भी वे विनाशकी ओर बढ़ने लगे। उनके मनमें कलहकी इच्छा जाग उठी, जिससे वे ब्राह्मणोंका अपकार ही करते थे।
वैभ्राजं नन्दनं चैव तथा चैत्ररथं वनम्।<br>अशोकं च वराशोकं सर्वर्तुकमथापि च॥ ४८<br><br>स्वर्गं च देवतावासं पूर्वदेववशानुगाः।<br>विध्वंसयन्ति संक्रुद्धास्तपोधनवनानि च॥ ४९इस प्रकार जो पहले देवताओंके वशीभूत थे, वे दानवगण सम्प्रति त्रिपुरका आश्रय पानेसे संक्रुद्ध होकर वैभ्राजके नन्दन, चैत्ररथ, अशोक, वराशोक, सर्वर्तुक आदि वनों, देवताओंके निवास-स्थान स्वर्ग तथा तपस्वियोंके वनोंका विध्वंस करने लगे। उस समय देव-मन्दिर और आश्रम नष्ट कर दिये गये। देवताओं और ब्राह्मणोंके उपासक मार

१३४- देवताओंसहित शङ्करजीका त्रिपुरपर आक्रमण, त्रिपुरमें देवर्षि नारदका आगमन तथा युद्धार्थ असुरोंकी तैयारी

* अध्याय १३२ *४६५

| विध्वस्तदेवायतनाश्रमं च<br>सम्भग्नदेवद्विजपूजकं तु।<br>जगद्वभूवामरराजदुष्टै-<br>रभिद्रुतं सस्यमिवालिवृन्दैः॥ ५०॥ | डाले गये। इस प्रकार देवराज इन्द्रके शत्रुओंद्वारा विध्वस्त किया हुआ जगत् ऐसा लगने लगा, जैसे टिड्डीदलोंद्वारा नष्ट की हुई अन्नकी फसल हो॥ ३७—५०॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे त्रिपुरोपाख्याने दुःस्वप्नदर्शनं नामैकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरोपाख्यानमें दुःस्वप्न-दर्शन नामक एक सौ इकतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३१॥


एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय

त्रिपुरवासी दैत्योंका अत्याचार, देवताओंका ब्रह्माकी शरणमें जाना और ब्रह्मासहित शिवजीके पास जाकर उनकी स्तुति करना

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
अशीलेषु प्रदुष्टेषु दानवेषु दुरात्मसु।<br>लोकेषूत्साद्यमानेषु तपोधनवनेषु च॥ १॥<br><br>सिंहनादे व्योमगानां तेषु भीतेषु जन्तुषु।<br>त्रैलोक्ये भयसम्मूढे तमोऽन्धत्वमुपागते॥ २॥<br><br>आदित्या वसवः साध्याः पितरो मरुतां गणाः।<br>भीताः शरणमाजग्मुर्ब्रह्माणं प्रपितामहम्॥ ३॥<br><br>ते तं स्वर्णोत्पलासीनं ब्रह्माणं समुपागताः।<br>नेमुरूचुश्च सहिताः पञ्चास्यं चतुराननम्॥ ४॥<br><br>वरगुप्तास्तवैवेह दानवास्त्रिपुरालयाः।<br>बाधन्तेऽस्मान् यथा प्रेष्याननुशाधि ततोऽनघ॥ ५॥<br><br>मेघागमे यथा हंसा मृगाः सिंहभयादिव।<br>दानवानां भयात् तद्वद् भ्रमामो हि पितामह॥ ६॥<br><br>पुत्राणां नामधेयानि कलत्राणां तथैव च।<br>दानवैर्भ्राम्यमाणानां विस्मृतानि ततोऽनघ॥ ७॥<br><br>देववेश्मप्रभङ्गाश्च आश्रमभ्रंशनानि च।<br>दानवैर्लोभमोहान्धैः क्रियन्ते च भ्रमन्ति च॥ ८॥ऋषियो! त्रिपुरनिवासी दानवोंका शील तो भ्रष्ट ही हो गया था, उनमें दुष्टता भी कूट-कूटकर भर गयी थी। उन दुरात्माओंने लोकों एवं तपोवनोंका विनाश करना आरम्भ किया। वे आकाशमें जाकर सिंहनाद करते, जिसे सुनकर सारे जीव-जन्तु भयभीत हो जाते थे। इस प्रकार जब सारी त्रिलोकी भयके कारण किंकर्तव्यविमूढ़ हो गयी और सर्वत्र अन्धकार-सा छा गया, तब भयसे डरे हुए आदित्य, वसु, साध्य, पितृ-गण और मरुद्गण—ये सभी संगठित होकर प्रपितामह ब्रह्माकी शरणमें पहुँचे। वहाँ पञ्चमुख ब्रह्मा स्वर्णमय कमलासनपर आसीन थे। ये देवगण उनके निकट जाकर उन्हें नमस्कार कर (दानवोंके अत्याचारका) वर्णन करने लगे—'निष्पाप पितामह! त्रिपुरनिवासी दानव आपके ही वरदानसे सुरक्षित होकर हमलोगोंको सेवकोंकी तरह कष्ट दे रहे हैं, अतः आप उन्हें मना कीजिये। पितामह! जैसे बादलोंके उमड़नेपर हंस और सिंहकी दहाड़से मृग भयभीत होकर भागने लगते हैं, उसी प्रकार दानवोंके भयसे हमलोग इधर-उधर लुक-छिप रहे हैं। पापरहित ब्रह्मन्! यहाँतक कि दानवोंद्वारा खदेड़े जानेके कारण हमलोगोंको अपने पुत्रों तथा पत्नियोंके नामतक भूल गये हैं। लोभ एवं मोहसे अंधे हुए दानवगण देवताओंके निवासस्थानोंको तोड़ते-फोड़ते तथा ऋषियोंके आश्रमोंको विध्वस्त करते हुए
४६६* मत्स्यपुराण *

| यदि न त्रायसे लोकं दानवैर्विद्रुतं द्रुतम्।<br>धर्षेणानेन निर्देवं निर्मनुष्याश्रमं जगत्॥ ९<br>इत्येवं त्रिदशैरुक्तः पद्मयोनिः पितामहः।<br>प्रत्याह त्रिदशान् सेन्द्रानिन्दुत्तुल्याननः प्रभुः॥ १०<br>मयस्य यो वरो दत्तो मया मतिमतां वराः।<br>तस्यान्त एष सम्प्राप्तो यः पुरोक्तो मया सुराः॥ ११<br>तच्च तेषामधिष्ठानं त्रिपुरं त्रिदशर्षभाः।<br>एकेषुपातमोक्षेण हन्तव्यं नेषुवृष्टिभिः॥ १२<br>भवतां च न पश्यामि कमप्यत्र सुरर्षभाः।<br>यस्तु चैकप्रहारेण पुरं हन्यात् सदानवम्॥ १३<br>त्रिपुरं नाल्पवीर्येण शक्यं हन्तुं शरेण तु।<br>एकं मुक्त्वा महादेवं महेशानं प्रजापतिम्॥ १४<br>ते यूयं यदि अन्ये च क्रतुविध्वंसकं हरम्।<br>याचामः सहिता देवं त्रिपुरं स हनिष्यति॥ १५<br>कृतः पुराणां विष्कम्भो योजनानां शतं शतम्।<br>यथा चैकप्रहारेण हन्यते वै भवेन तु।<br>पुष्ययोगेन युक्तानि तानि चैकक्षणेन तु॥ १६<br>ततो देवैश्च सम्प्रोक्तो यास्याम इति दुःखितैः।<br>पितामहश्च तैः सार्धं भवसंसदमागतः॥ १७<br>तं भवं भूतभव्येशं गिरिशं शूलपाणिनम्।<br>पश्यन्ति चोमया सार्धं नन्दिना च महात्मना॥ १८<br>अग्निवर्णमजं देवमग्निकुण्डनिभेक्षणम्।<br>अग्न्यादित्यसहस्राभमग्निवर्णविभूषितम् ॥ १९<br>चन्द्रावयवलक्ष्माणं चन्द्रसौम्यतराननम्।<br>आगम्य तमजं देवमथ तं नीललोहितम्॥ २०<br>स्तुवन्तो वरदं शम्भुं गोपतिं पार्वतीपतिम्॥ २१ | घूम रहे हैं। यदि आप शीघ्र ही दानवोंद्वारा विध्वंस किये जाते हुए लोककी रक्षा नहीं करेंगे तो सारा जगत् देवता, मनुष्य और आश्रमसे रहित हो जायगा'॥ १—९॥<br>जब देवताओंने पद्मयोनि ब्रह्मासे इस प्रकार निवेदन किया, तब चन्द्रमाके समान गौरवर्ण मुखवाले सामर्थ्यशाली ब्रह्माने इन्द्रादि देवताओंसे कहा—'बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ देवगण! मैंने मयको जो वर दिया था, उसका यह अन्त समय आ पहुँचा है, जिसे मैंने पहले ही उन लोगोंसे कह दिया था। श्रेष्ठ देवताओ! उनका निवासस्थान वह त्रिपुर तो एक ही बाणके प्रहारसे नष्ट हो जानेवाला है। उसपर बाण-वृष्टिकी आवश्यकता नहीं है, किंतु श्रेष्ठ देवगण! मैं यहाँ तुमलोगोंमेंसे किसीको भी ऐसा नहीं देख रहा हूँ, जो एक ही बाणके आघातसे दानवोंसहित त्रिपुरको नष्ट कर सके। देवाधिदेव प्रजापति शङ्करके अतिरिक्त अन्य कोई अल्प पराक्रमी वीर एक ही बाणसे त्रिपुरका विनाश नहीं कर सकता। इसलिये यदि तुमलोग तथा अन्यान्य देवगण भी एक साथ होकर दक्ष-यज्ञके विध्वंसक भगवान् शङ्करके पास चलकर उनसे याचना करें तो वे त्रिपुरका विनाश कर देंगे। इन पुरोंका विष्कम्भ सौ-सौ योजनोंका बना हुआ है, अतः पुष्य नक्षत्रके योगमें जब ये तीनों एक साथ सम्मिलित होंगे, उसी क्षण भगवान् शङ्कर एक ही बाणके आघातसे इसका विध्वंस कर सकते हैं।' यह सुनकर दुःखित देवताओंने कहा कि 'हमलोग चलेंगे।' तब ब्रह्मा उन्हें साथ लेकर शङ्करजीकी सभामें आये। वहाँ उन्होंने देखा कि भूत एवं भविष्यके स्वामी तथा गिरिपर शयन करनेवाले त्रिशूलपाणि शङ्कर पार्वतीदेवी तथा महात्मा नन्दीके साथ विराजमान हैं। उन अजन्मा महादेवके शरीरका वर्ण अग्निके समान उद्दीप्त था। उनके नेत्र अग्निकुण्डके सदृश लाल थे। उनके शरीरसे सहस्रों अग्नियों और सूर्योंके समान प्रभा छिटक रही थी। वे अग्निके-से रंगवाली विभूतिसे विभूषित थे। उनके ललाटपर बालचन्द्र शोभा पा रहा था और मुख (पूर्णिमाके) चन्द्रमासे भी अधिक सुन्दर दीख रहा था। तब देवगण उन अजन्मा नीललोहित महादेवके निकट गये और पशुपति, पार्वती-प्राणवल्लभ, वरदायक शम्भुकी इस प्रकार स्तुति करने लगे—॥ १०—२१॥ |

* अध्याय १३२ * ४६७


देवा ऊचुःदेवताओंने कहा—
नमो भवाय शर्वाय रुद्राय वरदाय च।<br>पशूनां पतये नित्यमुग्राय च कपर्दिने॥ २२<br><br>महादेवाय भीमाय त्र्यम्बकाय च शान्तये।<br>ईशानाय भयघ्नाय नमस्त्वन्धकघातिने॥ २३<br><br>नीलग्रीवाय भीमाय वेधसे वेधसा स्तुते।<br>कुमारशत्रुनिघ्नाय कुमारजनकाय च॥ २४<br><br>विलोहिताय धूम्राय वराय क्रथनाय च।<br>नित्यं नीलशिखण्डाय शूलिने दिव्यशायिने॥ २५<br><br>उरगाय त्रिनेत्राय हिरण्यवसुरेतसे।<br>अचिन्त्यायाम्बिकाभर्त्रे सर्वदेवस्तुताय च॥ २६<br><br>वृषध्वजाय मुण्डाय जटिने ब्रह्मचारिणे।<br>तप्यमानाय सलिले ब्रह्मण्यायाजिताय च॥ २७<br><br>विश्वात्मने विश्वसृजे विश्वमावृत्य तिष्ठते।<br>नमोऽस्तु दिव्यरूपाय प्रभवे दिव्यशम्भवे॥ २८<br><br>अभिगम्याय काम्याय स्तुत्यायार्च्याय सर्वदा।<br>भक्तानुकम्पिने नित्यं दिशते यन्मनोगतम्॥ २९भगवन्! आप भव—सृष्टिके उत्पादक और पालक, शर्व—प्रलयकालमें सबके संहारक, रुद्र—समस्त प्राणियोंके प्राणस्वरूप, वरद—वरप्रदाता, पशुपति*—समस्त जीवोंके स्वामी, उग्र—बहुत ऊँचे, एकादश रुद्रोंमेंसे एक और कपर्दी—जटाजूटधारी हैं, आपको नमस्कार है। आप महादेव—देवताओंके भी पूज्य, भीम—भयंकर, त्र्यम्बक—त्रिनेत्रधारी, एकादश रुद्रोंमें अन्यतम, शान्त—शान्तस्वरूप, ईशान—नियन्ता, भयघ्न—भयके विनाशक और अन्धकघाती—अन्धकासुरके वधकर्ताको प्रणाम है। नीलग्रीव—ग्रीवामें नील चिह्न धारण करनेवाले, भीम—भयदायक, वेधाः—ब्रह्मस्वरूप, वेधसा स्तुतः—ब्रह्माजीके द्वारा स्तुत, कुमारशत्रुनिघ्न—कुमार कार्तिकेयके शत्रुओंको मारनेवाले, कुमारजनक—स्वामी कार्तिकेयके पिता, विलोहित—लाल रंगवाले, धूम्र—धूम्रवर्ण, वर—जगत्‌को ढकनेवाले, क्रथन—प्रलयकारी, नीलशिखण्ड—नीली जटावाले, शूली—त्रिशूलधारी, दिव्यशायी—दिव्य समाधिमें लीन रहनेवाले, उरग—सर्पधारी, त्रिनेत्र—तीन नेत्रोंवाले, हिरण्यवसुरेता—सुवर्ण आदि धनके उद्गम-स्थान, अचिन्त्य—अतर्क्य, अम्बिकाभर्ता—पार्वतीपति, सर्वदेवस्तुत—सम्पूर्ण देवोंद्वारा स्तुत, वृषध्वज—बैल-चिह्नसे युक्त ध्वजावाले, मुण्ड—मुण्डधारी, जटी—जटाधारी, ब्रह्मचारी—ब्रह्मचर्यसम्पन्न, सलिले तप्यमान—जलमें तपस्या करनेवाले, ब्रह्मण्य—ब्राह्मण-भक्त, अजित—अजेय, विश्वात्मा—विश्वके आत्मस्वरूप, विश्वसृक्—विश्वके स्रष्टा, विश्वमावृत्य तिष्ठते—संसारमें व्याप्त रहनेवाले, दिव्यरूप—दिव्यरूपवाले, प्रभु—सामर्थ्यशाली, दिव्यशम्भु—अत्यन्त मङ्गलमय, अभिगम्य—शरण लेने योग्य, काम्य—अत्यन्त सुन्दर, स्तुत्य—स्तवन करनेयोग्य, सर्वदा अर्च्य—सदा पूजनीय, भक्तानुकम्पी—भक्तोंपर दया करनेवाले और यन्मनोगतं नित्यं दिशते—मनकी अभिलाषा पूर्ण करनेवालेको अभिवादन है॥ २२—२९॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरदाहे ब्रह्मादिसर्वदेवकृतमहेश्वरस्तवो नाम द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरदाह-प्रसङ्गमें ब्रह्मादि-सर्वदेवकृत महेश्वरस्तव नामक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३२॥


* पाशुपत—शैवागमानुसार जीवमात्र पाशबद्ध होनेसे पशु और पाशयुक्त शिव पशुपति कहे गये हैं।

१३५- शङ्करजीकी आज्ञासे इन्द्रका त्रिपुरपर आक्रमण, दोनों सेनाओंमें भीषण संग्राम, विद्युन्मालीका वध, देवताओंकी विजय और दानवोंका युद्धविमुख होकर त्रिपुरमें प्रवेश

४६८ * मत्स्यपुराण *


एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय

त्रिपुर-विध्वंसार्थ शिवजीके विचित्र रथका निर्माण और देवताओंके साथ उनका युद्धके लिये प्रस्थान

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सूत उवाच<br>ब्रह्माद्यैः स्तूयमानस्तु देवैर्देवो महेश्वरः।<br>प्रजापतिमुवाचेदं देवानां क्व भयं महत्॥ १सूतजी कहते हैं— ऋषियो! ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर देवाधिदेव महेश्वरने प्रजापति ब्रह्मासे यह कहा—'अरे! आप देवताओंको यह महान् भय कहाँसे आया?
भो देवाः स्वागतं वोऽस्तु ब्रूत यद् वो मनोगतम्।<br>तावदेव प्रयच्छामि नास्त्यदेयं मया हि वः॥ २देवगण! आपलोगोंका स्वागत है। आपलोगोंके मनमें जो अभिलाषा हो, उसे कहिये। मैं उसे अवश्य प्रदान करूँगा; क्योंकि आपलोगोंके लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है।
युष्माकं नितरां शं वै कर्ताहं विबुधर्षभाः।<br>चरामि महदत्युग्रं यच्चापि परमं तपः॥ ३श्रेष्ठ देवगण! मैं सदा आपलोगोंका कल्याण ही करता रहता हूँ। यहाँतक कि जो महान्, अत्यन्त उग्र एवं घोर तप करता हूँ, वह भी आपलोगोंके लिये ही करता हूँ।
विद्विष्टा वो मम द्विष्ठाः कष्टाः कष्टपराक्रमाः।<br>तेषामभावः सम्पाद्यो युष्माकं भव एव च॥ ४जो आपलोगोंसे विद्वेष करते हैं, वे मेरे भी घोर शत्रु हैं। इसलिये जो आपलोगोंको कष्ट देनेवाले हैं, वे कितने ही घोर पराक्रमी क्यों न हों, मुझे उनका अन्त और आपका श्रेयःसम्पादन करना है।'
एवमुक्तास्तु देवेन प्रेम्णा सब्रह्मकाः सुराः।<br>रुद्रमाहुर्महाभागं भागार्हाः सर्व एव ते॥ ५महादेवजीद्वारा प्रेमपूर्वक इस प्रकार कहे जानेपर ब्रह्मसहित समस्त भाग्यशाली देवताओंने महाभाग शङ्करजीसे कहा—
भगवंस्तैस्तपस्तप्तं रौद्रं रौद्रपराक्रमैः।<br>असुरैर्वध्यमानाः स्म वयं त्वां शरणं गताः॥ ६'भगवन्! भयंकर पराक्रमी उन असुरोंने अत्यन्त भीषण तप किया है, जिसके प्रभावसे वे हमें कष्ट दे रहे हैं। इसलिये हमलोग आपकी शरणमें आये हैं।
मयो नाम दितेः पुत्रस्त्रिनेत्र कलहप्रियः।<br>त्रिपुरं येन तद्दुर्गं कृतं पाण्डुरगोपुरम्॥ ७त्रिलोचन! (आप तो जानते ही हैं) दितिका पुत्र मय स्वभावतः कलहप्रिय है। उसने ही पीले रंगके फाटकवाले उस त्रिपुर नामक दुर्गका निर्माण किया है।
तदाश्रित्य पुरं दुर्गं दानवा वरनिर्भयाः।<br>बाधन्तेऽस्मान् महादेव प्रेष्यमस्वामिनं यथा॥ ८उस त्रिपुरदुर्गका आश्रय लेकर दानव वरदानके प्रभावसे निर्भय हो गये हैं। महादेव! वे हमलोगोंको इस प्रकार कष्ट दे रहे हैं, मानो अनाथ नौकर हों।
उद्यानानि च भग्नानि नन्दनादीनि यानि च।<br>वराश्चाप्सरसः सर्वा रम्भाद्या दनुजैर्हृताः॥ ९उन दानवोंने नन्दन आदि जितने उद्यान थे, उन सबको विनष्ट कर दिया तथा रम्भा आदि सभी श्रेष्ठ अप्सराओंका अपहरण कर लिया।
इन्द्रस्य वाह्याश्च गजाः कुमुदाञ्जनवामनाः।<br>ऐरावताद्यापहृता देवतानां महेश्वर॥ १०महेश्वर! वे इन्द्रके वाहन तथा दिशागज कुमुद, अञ्जन, वामन और ऐरावत आदि गजेन्द्रोंको भी छीन ले गये।
ये चेन्द्ररथमुख्याश्च हरयोऽपहृतासुरैः।<br>जाताश्च दानवानां ते रथयोग्यास्तुरङ्गमाः॥ ११इन्द्रके रथमें जुतनेवाले जो मुख्य अश्व थे, उन्हें भी वे असुर हरण कर ले गये और अब वे घोड़े दानवोंके रथमें जोते जाते हैं।
* अध्याय १३३ *४६९
ये रथा ये गजाश्चैव याः स्त्रियो वसु यच्च नः।<br>तन्नो व्यपहृतं दैत्यैः संशयो जीविते पुनः॥ १२(कहाँतक कहें) हमलोगोंके पास जितने रथ, जितने हाथी, जितनी स्त्रियाँ और जो कुछ भी धन था, हमारा वह सब दैत्योंने अपहरण कर लिया है और अब हमलोगोंके जीवनमें भी सन्देह उत्पन्न हो गया हैं'॥ १-१२॥
त्रिनेत्र एवमुक्तस्तु देवैः शक्रपुरोगमैः।<br>उवाच देवान् देवेशो वरदो वृषवाहनः॥ १३<br>व्यपगच्छतु वो देवा महत् दानवजं भयम्।<br>तदहं त्रिपुरं धक्ष्ये क्रियतां यद् ब्रवीमि तत्॥ १४<br>यदीच्छथ मया दग्धुं तत्पुरं सहदानवम्।<br>रथमौपयिकं मह्यं सज्जध्वं किमास्यते॥ १५<br>दिग्वाससा तथोक्तास्ते सपितामहकाः सुराः।<br>तथेत्युक्त्वा महादेवं चक्रुस्ते रथमुत्तमम्॥ १६<br>धरां कूबरकौ द्वौ तु रुद्रपार्श्वचरावुभौ।<br>अधिष्ठानं शिरो मेरोरक्षो मन्दर एव च॥ १७<br>चक्रुश्चन्द्रं च सूर्यं च चक्रं काञ्चनराजते।<br>कृष्णपक्षं शुक्लपक्षं पक्षद्वयमपीश्वराः॥ १८<br>रथनेमिद्वयं चक्रुर्देवा ब्रह्मपुरःसराः।<br>आदित्यं पक्षयन्त्रं यन्त्रमेताश्च देवताः॥ १९<br>कम्बलाश्वतराभ्यां च नागाभ्यां समवेष्टितम्।<br>भार्गवश्चाङ्गिराश्चैव बुधोऽङ्गारक एव च॥ २०<br>शनैश्चरस्तथा चात्र सर्वे ते देवसत्तमाः।<br>वरूथं गगनं चक्रुश्चारुरूपं रथस्य ते॥ २१<br>कृतं द्विजिह्ननयनं त्रिवेणुं शातकौम्भिकम्।<br>मणिमुक्तेन्द्रनीलैश्च वृतं ह्यष्टमुखैः सुरैः॥ २२इन्द्र आदि देवताओं द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर त्रिनेत्रधारी, वरदायक, वृषवाहन, देवेश्वर शङ्करने देवताओंसे कहा—'देवगण! अब आपलोगोंका दानवोंसे उत्पन्न हुआ महान् भय दूर हो जाना चाहिये। मैं उस त्रिपुरको जला डालूँगा, किंतु मैं जो कह रहा हूँ, वैसा उपाय कीजिये। यदि आपलोग मेरे द्वारा दानवोंसहित उस त्रिपुरको जला देनेकी इच्छा रखते हैं तो मेरे लिये समस्त साधनोंसे सम्पन्न एक रथ सुसज्जित कीजिये। अब देर मत कीजिये।' दिग्वासा शङ्करजीद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर ब्रह्मासहित उन देवताओंने महादेवजीसे 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। फिर तो वे एक उत्तम रथका निर्माण करनेमें लग गये। उन्होंने पृथ्वीको रथ, रुद्रके दो पार्श्वचरोंको, दोनों कूबर मेरुको रथका शिरः-स्थान और मन्दरको धुरा बनाया। सूर्य और चन्द्रमा रथके सोने-चाँदीके दोनों पहिये बनाये गये। ब्रह्मा आदि ऐश्वर्यशाली देवोंने शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष—दोनोंसे रथकी दोनों नेमियाँ बनायीं। देवताओंने कम्बल और अश्वतर नामक नागोंसे परिवेष्टित कर दोनों बगलके पक्ष-यन्त्र बनाये। शुक्र, बृहस्पति, बुध, मङ्गल तथा शनैश्चर ये—सभी देवश्रेष्ठ उसपर विराजित हुए। उन देवताओंने गगन-मण्डलको रथका सौन्दर्यशाली वरूथ बनाया। सर्पोंके नेत्रोंसे उसका त्रिवेणु बनाया गया, जो सुवर्ण-सा चमक रहा था। वह मणि, मुक्ता और इन्द्रनील मणिके समान आठ प्रधान देवताओंसे घिरा था॥ १३-२२॥
गङ्गा सिन्धुः शतद्रुश्च चन्द्रभागा इरावती।<br>वितस्ता च विपाशा च यमुना गण्डकी तथा॥ २३<br>सरस्वती देविका च तथा च सरयूरपि।<br>एताः सरिद्वराः सर्वा वेणुसंज्ञा कृता रथे॥ २४<br>धृतराष्ट्राश्च ये नागास्ते च रश्म्यात्मकाः कृताः।<br>वासुकेः कुलजा ये च ये च रैवतवंशजाः॥ २५<br>ते सर्पा दर्पसम्पूर्णाश्चापतूणेष्वनूगनाः।<br>अवतस्थुः शरा भूत्वा नानाजातिशुभाननाः॥ २६गङ्गा, सिन्धु, शतद्रु, चन्द्रभागा, इरावती, वितस्ता, विपाशा, यमुना, गण्डकी, सरस्वती, देविका तथा सरयू—इन सभी श्रेष्ठ नदियोंको उस रथमें वेणुस्थानपर नियुक्त किया गया। धृतराष्ट्रके वंशमें उत्पन्न होनेवाले जो नाग थे, वे बाँधनेके लिये रस्सी बने हुए थे। जो वासुकि और रैवतके वंशमें उत्पन्न होनेवाले नाग थे, वे सभी दर्पसे पूर्ण और शीघ्रगामी होनेके कारण नाना प्रकारके सुन्दर मुखवाले बाण बनकर धनुषके तरकसोंमें अवस्थित हुए।

४७० * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सुरसा सरमा कद्रूर्विनता शुचिरेव च।<br>तृषा बुभुक्षा सर्वोग्रा मृत्युः सर्वशमस्तथा॥ २७<br><br>ब्रह्मवध्या च गोवध्या बालवध्या प्रजाभयाः।<br>गदा भूत्वा शक्तयश्च तदा देवरथेऽभ्ययुः॥ २८<br><br>युगं कृतयुगं चात्र चातुर्होत्रप्रयोजकाः।<br>चतुर्वर्णाः सलीलाश्च बभूवुः स्वर्णकुण्डलाः॥ २९<br><br>तद्युगं युगसंकाशं रथशीर्षे प्रतिष्ठितम्।<br>धृतराष्ट्रेण नागेन बद्धं बलवता महत्॥ ३०<br><br>ऋग्वेदः सामवेदश्च यजुर्वेदस्तथापरः।<br>वेदाश्चत्वार एवैते चत्वारस्तुरगाऽभवन्॥ ३१<br><br>अन्नदानपुरोगाणि यानि दानानि कानिचित्।<br>तान्यासन् वाजिनां तेषां भूषणानि सहस्रशः॥ ३२<br><br>पद्मद्वयं तक्षकश्च कर्कोटकधनञ्जयौ।<br>नागा बभूवुरेवैते हयानां वालबन्धनाः॥ ३३<br><br>ओङ्कारप्रभवास्ता वा मन्त्रयज्ञक्रतुक्रियाः।<br>उपद्रवाः प्रतीकाराः पशुबन्धेष्टयस्तथा॥ ३४<br><br>यज्ञोपवाहान्येतानि तस्मिँल्लोकरथे शुभे।<br>मणिमुक्ताप्रवालैस्तु भूषितानि सहस्रशः॥ ३५<br><br>प्रतोदोङ्कार एवासीत्तदग्रं च वषट्कृतम्।<br>सिनीवाली कुहू राका तथा चानुमतिः शुभा॥ ३६<br><br>योक्त्राण्यासंस्तुरङ्गाणामपसर्पणविग्रहाः ॥ ३७<br><br>कृष्णान्यथ च पीतानि श्वेतमाञ्जिष्ठकानि च।<br>अवदाताः पताकास्तु बभूवुः पवनेरिताः॥ ३८<br><br>ऋतुभिश्च कृतः षड्भिर्धनुः संवत्सरोऽभवत्।<br>अजरा ज्याभवच्चापि साम्बिका धनुषो दृढा ॥ ३९<br><br>कालो हि भगवान् रुद्रस्तं च संवत्सरं विदुः।<br>तस्मादुमा कालरात्रिर्धनुषो ज्याजराभवत्॥ ४०<br><br>सगर्भं त्रिपुरं येन दग्धवान् स त्रिलोचनः।<br>स इषुविष्णुसोमाग्नित्रिदैवतमयोऽभवत्॥ ४१<br><br>आननं ह्यग्निरभवच्छल्यं सोमस्तमोनुदः।<br>तेजसः समवायोऽथ चेषोस्तेजो रथाङ्गधृक्॥ ४२<br><br>तस्मिंश्च वीर्यवृद्ध्यर्थं वासुकिर्नागपार्थिवः।<br>तेजः संवसनार्थं वै मुमोचातिविषो विषम्॥ ४३सबसे उग्र स्वभाववाली सुरसा, देवशुनी, सरमा, कद्रू, विनता, शुचि, तृषा, बुभुक्षा तथा सबका शमन करनेवाली मृत्यु, ब्रह्महत्या, गोहत्या, बालहत्या और प्रजाभय—ये सभी उस समय गदा और शक्तिका रूप धारण कर उस देवरथमें उपस्थित हुईं। कृतयुगका जूआ बनाया गया। चातुर्होत्र यज्ञके प्रयोजक लीलासहित चारों वर्ण स्वर्णमय कुण्डल हुए। उस युग-सदृश जूएको रथके शीर्षस्थानपर रखा गया और उसे बलवान् धृतराष्ट्र नागद्वारा कसकर बाँध दिया गया। ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद—ये चारों वेद चार घोड़े हुए। अन्नदान आदि जितने प्रमुख दान हैं, वे सभी उन घोड़ोंके हजारों प्रकारके आभूषण बने। पद्मद्वय, तक्षक, कर्कोटक, धनञ्जय—ये नाग उन घोड़ोंके बाल बाँधनेके लिये रस्सी हुए। ओंकारसे उत्पन्न होनेवाली मन्त्र, यज्ञ और क्रतूरूप क्रियाएँ, उपद्रव, उनकी शान्तिके लिये प्रायश्चित्त, पशुबन्ध आदि इष्टियाँ, यज्ञोपवीत आदि संस्कार—ये सभी उस सुन्दर लोकरथमें शोभा-वृद्धिके लिये मणि, मुक्ता और मूँगेके रूपमें उपस्थित हुए। ओंकारका चाबुक बना और वषट्कार उसका अग्रभाग हुआ। सिनीवाली (चतुर्दशीय अमा), कुहू (अमावास्याकी अधिष्ठात्री देवी), राका (शुद्ध पूर्णिमा तिथि) तथा शुभदायिनी अनुमति (प्रतिपद्युक्ता पूर्णिमा)—ये सभी घोड़ोंको रथमें जोतनेके लिये रस्सियाँ और बागडोर बनीं। उसमें काले, पीले, श्वेत और लाल रंगकी निर्मल पताकाएँ लगी थीं, जो वायुके वेगसे फहरा रही थीं। छहों ऋतुओंसहित संवत्सरका धनुष बनाया गया। अम्बिकादेवी उस धनुषकी कभी जीर्ण न होनेवाली सुदृढ़ प्रत्यञ्चा हुईं। भगवान् रुद्र कालस्वरूप हैं। उन्हींको संवत्सर कहा जाता है, इसी कारण अम्बिकादेवी कालरात्रिरूपसे उस धनुषकी कभी न कटनेवाली प्रत्यञ्चा बनीं। त्रिलोचन भगवान् शङ्कर जिस बाणसे अन्तर्भागसहित त्रिपुरको जलानेवाले थे, वह श्रेष्ठ बाण विष्णु, सोम, अग्नि—इन तीनों देवताओंके संयुक्त तेजसे निर्मित हुआ था। उस बाणका मुख अग्नि और फाल अन्धकारविनाशक चन्द्रमा थे। चक्रधारी विष्णुका तेज समूचे बाणमें व्याप्त था। इस प्रकार वह बाण तेजका समन्वित रूप था। उस बाणपर नागराज वासुकिने उसके पराक्रमकी वृद्धि एवं तेजकी स्थिरताके लिये अत्यन्त उग्र विष उगल दिया था॥ २३—४३॥
* अध्याय १३३ *४७१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कृत्वा देवा रथं चापि दिव्यं दिव्यप्रभावतः।<br>लोकाधिपतिमभ्येत्य इदं वचनमब्रुवन्॥ ४४<br><br>संस्कृतोऽयं रथोऽस्माभिस्तव दानवशत्रुजित्।<br>इदमापत्यरित्राणं देवान् सेन्द्रपुरोगमान्॥ ४५<br><br>तं मेरुशिखराकारं त्रैलोक्यरथमुत्तमम्।<br>प्रशस्य देवान् साध्विति रथं पश्यति शङ्करः॥ ४६<br><br>मुहुर्दृष्ट्वा रथं साधु साध्वित्युक्त्वा मुहुर्मुहुः।<br>उवाच सेन्द्रानमरानमराधिपतिः स्वयंम्॥ ४७<br><br>यादृशोऽयं रथः कॢप्तो युष्माभिर्मम सत्तमाः।<br>ईदृशो रथसम्पत्त्या यन्ता शीघ्रं विधीयताम्॥ ४८<br><br>इत्युक्ता देवदेवेन देवा विद्धा इवेषुभिः।<br>अवापुर्महतीं चिन्तां कथं कार्यमिति ब्रुवन्॥ ४९<br><br>महादेवस्य देवोऽन्यः को नाम सदृशो भवेत्।<br>मुक्त्वा चक्रायुधं देवं सोऽप्यस्येषु समाश्रितः॥ ५०<br><br>धुरि युक्ता इवोक्षाणो घटन्त इव पर्वतैः।<br>निःश्वसन्तः सुराः सर्वे कथमेतदिति ब्रुवन्॥ ५१<br><br>देवेष्वाह देवदेवो लोकनाथस्य धूर्गतान्।<br>अहं सारथिरित्युक्त्वा जग्राहाश्वांस्ततोऽग्रजः॥ ५२<br><br>ततो देवैः सगन्धर्वैः सिंहनादो महान् कृतः।<br>प्रतोदहस्तं सम्प्रेक्ष्य ब्रह्माणं सूततां गतम्॥ ५३<br><br>भगवानपि विश्वेशो रथस्थे वै पितामहे।<br>सदृशः सूत इत्युक्त्वा चारुरोह रथं हरः॥ ५४<br><br>आरोहति रथं देवे ह्यश्वा हरभरातुराः।<br>जानुभिः पतिता भूमौ रजोग्रासश्च ग्रासितः॥ ५५<br><br>देवो दृष्ट्वाथ वेदांस्तानभीरुग्रहयान् भयात्।<br>उज्जहार पितॄनार्तान् सुपुत्र इव दुःखितान्॥ ५६<br><br>ततः सिंहरवो भूयो बभूव रथभैरवः।<br>जयशब्दश्च देवानां सम्बभूवार्णवोपमः॥ ५७इस प्रकार देवगण दिव्य प्रभावसे उस दिव्य रथका निर्माण कर लोकाधिपति शङ्करके निकट जाकर इस प्रकार बोले—'दानवरूप शत्रुओंके विजेता भगवन्! हमलोगोंने आपके लिये इस रथकी रचना की है। यह इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंकी आपत्तिसे रक्षा करेगा। सुमेरुगिरिके शिखरके समान उस उत्तम त्रैलोक्यरथको देखकर भगवान् शङ्करने उसकी प्रशंसा करके देवताओंकी प्रशंसा की और पुनः उस रथका निरीक्षण करने लगे। वे बार-बार रथके प्रत्येक भागको देखते और बार-बार उसकी प्रशंसा करते थे। तत्पश्चात् देवताओंके अधीश्वर स्वयं भगवान् शङ्करने इन्द्रसहित देवताओंसे कहा—'देवगण! आपलोगों ने जिस प्रकार मेरे लिये रथकी सारी सामग्रियोंसे युक्त इस रथका निर्माण किया है, इसीकी मर्यादाके अनुकूल शीघ्र ही किसी सारथिका भी विधान कीजिये।' देवाधिदेव शङ्करके ऐसा कहनेपर देवगण ऐसे व्याकुल हो गये, मानो वे बाणोंसे बींध दिये गये हों। उन्हें बड़ी चिन्ता हुई। वे कहने लगे कि अब क्या किया जाय। भला, चक्रधारी भगवान् विष्णुके अतिरिक्त दूसरा कौन देवता महादेवजीके सदृश हो सकता है, किंतु वे तो उनके बाणपर स्थित हो चुके हैं। यह सोचकर जैसे गाड़ीमें जुते हुए बैल पर्वतोंसे टकरा जानेपर हाँफने लगते हैं, वैसे ही सभी देवता लम्बी साँस लेने लगे और कहने लगे कि यह कार्य कैसे सिद्ध होगा? इतनेमें ही उन देवताओंके बीच देवदेव अग्रज ब्रह्मा बोल उठे—'सारथि मैं होऊँगा' ऐसा कहकर उन्होंने लोकनाथ शङ्करके रथमें जुते हुए घोड़ोंकी बागडोर पकड़ ली। उस समय ब्रह्माको हाथमें चाबुक लिये हुए सारथिके स्थानपर स्थित देखकर गन्धर्वोंसहित देवताओंने महान् सिंहनाद किया। तदनन्तर पितामह ब्रह्माको रथपर स्थित देखकर विश्वेश्वर भगवान् शङ्कर 'उपयुक्त सारथि मिला' ऐसा कहकर रथपर आरूढ़ हुए। भगवान् शंकरके रथपर चढ़ते ही घोड़े उनके भारसे व्याकुल हो गये। वे घुटनोंके बल पृथ्वीपर गिर पड़े और उनके मुखमें धूल भर गयी। इस प्रकार जब शङ्करजीने देखा कि अश्वरूपधारी वेद भयवश भूमिपर गिर पड़े हैं, तब उन्होंने उन्हें उसी प्रकार उठाया, जैसे सुपुत्र आर्त एवं दुःखी पितरोंका उद्धार करता है। तत्पश्चात् रथकी भयंकर घरघराहटके साथ सिंहनाद होने लगा। देवगण समुद्रकी गर्जनाके समान जय-जयकार करने लगे॥ ४४-५७ ॥

४७२ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तदोङ्कारमयं गृह्य प्रतोदं वरदः प्रभुः।<br>स्वयम्भूः प्रययौ वाहनानुमन्त्र्य यथाजवम्॥ ५८तदनन्तर सामर्थ्यशाली वरदायक ब्रह्मा ओंकारमय चाबुकको हाथमें लेकर घोड़ोंको पुचकारते हुए पूर्ण वेगसे आगे बढ़े।
ग्रसमाना इवाकाशं मुष्णन्त इव मेदिनीम्<br>मुखेभ्यः ससृजुः श्वासानुच्छ्वसन्त इवोरगाः॥ ५९<br>स्वयम्भुवा चोद्यमानाश्चोदितेन कपर्दिना।<br>व्रजन्ति तेऽश्वा जवनाः क्षयकाल इवानिलाः॥ ६०फिर तो वे घोड़े पृथ्वीको अपने साथ समेटते तथा आकाशको ग्रसते हुएकी तरह बड़े वेगसे दौड़ने लगे। उनके मुखोंसे ऐसे दीर्घ निःश्वास निकल रहे थे, मानो फुफकारते हुए सर्प हों। शङ्करजीकी प्रेरणासे ब्रह्माद्वारा हाँके जाते हुए वे घोड़े प्रलयकालिक वायुकी तरह अत्यन्त वेगसे दौड़ रहे थे।
ध्वजोच्छ्रयविनिर्माणे ध्वजयष्टिममुत्तमाम्।<br>आक्रम्य नन्दीवृषभस्तस्थौ तस्मिञ्छिवेच्छया॥ ६१शिवजीकी इच्छासे उस रथमें ध्वजको ऊँचा उठानेमें निपुण नन्दी वृषभ उस अनुपम ध्वजयष्टिके ऊपर स्थित हुए।
भार्गवाङ्गिरसौ देवौ दण्डहस्तौ रविप्रभौ।<br>रथचक्रे तु रक्षेते रुद्रस्य प्रियकाङ्क्षिणौ॥ ६२सूर्यके समान प्रभावशाली शुक्र और बृहस्पति—ये दोनों देवता हाथमें दण्ड धारण करके रुद्रका प्रिय करनेकी इच्छासे रथके पहियोंकी रक्षा कर रहे थे।
शेषश्च भगवान् नागोऽनन्तोऽनन्तकरोऽरिणाम्।<br>शरहस्तो रथं पाति शयनं ब्रह्मणस्तदा॥ ६३उस समय शत्रुओंका समूल विनाश करनेवाले अनन्त भगवान् शेषनाग हाथमें बाण धारण कर रथकी तथा ब्रह्माके आसनकी रक्षामें जुटे हुए थे।
यमस्तूर्णं समास्थाय महिषं चातिदारुणम्।<br>द्रविणाधिपतिर्व्यालं सुराणामधिपो द्विपम्॥ ६४यमराज तुरंत अपने अत्यन्त भयंकर भैंसेपर, कुबेर साँपपर और देवराज इन्द्र ऐरावत हाथीपर चढ़कर आगे बढ़े।
मयूरं शतचन्द्रं च कूजन्तं किन्नरं यथा।<br>गुह आस्थाय वरदो जुगोप तं रथं पितुः॥ ६५वरदायक गुह कार्तिकेय सैकड़ों चन्द्रवाले तथा किंनरकी भाँति कूजते हुए अपने मयूरपर सवार होकर पिताके उस रथकी रक्षा कर रहे थे।
नन्दीश्वरश्च भगवान्छूलमादाय दीप्तिमान्।<br>पृष्ठतश्चापि पार्श्वाभ्यां लोकस्य क्षयकृद् यथा॥ ६६तेजस्वी भगवान् नन्दीश्वर शूल लेकर रथके पीछेसे दोनों पार्श्वभागोंकी रक्षा करते थे। उस समय वे ऐसा प्रतीत होते थे, मानो लोकका विनाश कर देना चाहते हों।
प्रमथाश्चाग्निवर्णाभाः साग्निज्वाला इवाचलाः।<br>अनुजग्मू रथं शार्वं नक्रा इव महार्णवम्॥ ६७अग्निके समान कान्तिमान् प्रमथगण, जो अग्निकी लपटोंसे युक्त पर्वत-सदृश दीख रहे थे, शङ्करजीके रथके पीछे चलते हुए ऐसे लगते थे जैसे महासागरमें नाकगण तैर रहे हों।
भृगुर्भरद्वाजवसिष्ठगौतमाः<br>क्रतुः पुलस्त्यः पुलहस्तपोधनाः।<br>मरीचिरत्रिर्भगवानथाङ्गिराः<br>पराशरागस्त्यमुखा महर्षयः॥ ६८<br>हरमजितमजं प्रतुष्टुवुर्वचन-<br>विशेषैर्विचित्रभूषणैः।<br>रथस्त्रिपुरे सकाञ्चनाचलो<br>व्रजति सपक्ष इवाद्रिरम्बरे॥ ६९भृगु, भरद्वाज, वसिष्ठ, गौतम, क्रतु, पुलस्त्य, पुलह, मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पराशर, अगस्त्य—ये सभी तपस्वी एवं ऐश्वर्यशाली महर्षि विचित्र छन्दानलंकारोंसे विभूषित उत्कृष्ट वचनोंद्वारा अजन्मा एवं अजेय शङ्करकी स्तुति कर रहे थे। सुमेरुगिरिके सहयोगसे सम्पन्न हुआ वह रथ आकाशमें विचरनेवाले पंखधारी पर्वतकी तरह त्रिपुरकी ओर बढ़ रहा था।
करिगिरिरविमेघसंनिभाः<br>सजलपयोदनिनादनादिनः।<br>प्रमथगणाः परिवार्य देवगुप्तं<br>रथमभितः प्रययुः स्वदर्पयुक्ताः॥ ७०हाथी, पर्वत, सूर्य और मेघके समान कान्तिवाले प्रमथगण जलधर बादलकी भाँति गर्जना करते हुए बड़े गर्वके साथ देवताओंद्वारा सब ओरसे सुरक्षित उस रथके पीछे-पीछे चल रहे थे।
* अध्याय १३४ *४७३

| मकरतिमितिमिङ्गिलावृतः<br>  प्रलय इवातिसमुद्धतोऽर्णवः।<br>व्रजति रथवरोऽतिभास्वरो<br>  ह्यशनिनिपातपयोदनिःस्वनः ॥ ७१ | वह अत्यन्त उद्दीप्त श्रेष्ठ रथ प्रलयकालमें मकर, तिमि (एक प्रकारके महामत्स्य) और तिमिंगिलों (उसे निगलनेवाले महामत्स्य)—से व्याप्त भयंकर रूपसे उमड़े हुए समुद्रकी तरह आगे बढ़ रहा था। उससे वज्रपातकी तरह गड़गड़ाहट और बादलकी गर्जनाके सदृश शब्द हो रहा था॥ ५८—७१ ॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरदाहे रथप्रयाणं नाम त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरदाह-प्रसङ्गमें रथप्रयाण नामक एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३३ ॥


एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय

देवताओंसहित शङ्करजीका त्रिपुरपर आक्रमण, त्रिपुरमें देवर्षि नारदका आगमन तथा युद्धार्थ असुरोंकी तैयारी

सूत उवाच
पूज्यमाने रथे तस्मिंल्लोकैर्देवे रथे स्थिते।<br>प्रमथेषु नदत्सूग्रं प्रवदत्सु च साध्विति ॥ १<br>ईश्वरस्वरघोषेण नर्दमाने महावृषे।<br>जयत्सु विप्रेषु तथा गर्जत्सु तुरगेषु च ॥ २<br>रणाङ्गणात् समुत्पत्य देवर्षिर्नारदः प्रभुः।<br>कान्त्या चन्द्रोपमस्तूर्णं त्रिपुरं पुरमागतः ॥ ३<br>औत्पातिकं तु दैत्यानां त्रिपुरे वर्तते ध्रुवम्।<br>नारदश्चात्र भगवान् प्रादुर्भूतस्तपोधनः ॥ ४<br>आगतं जलदाभासं समेताः सर्वदानवाः।<br>उत्तस्थुर्नारदं दृष्ट्वा अभिवादनवादिनः ॥ ५<br>तमर्घ्येण च पाद्येन मधुपर्केण चेश्वराः।<br>नारदं पूजयामासुर्ब्रह्माणमिव वासवः ॥ ६<br>तेषां स पूजां पूजार्हः प्रतिगृह्य तपोधनः।<br>नारदः सुखमासीनः काञ्चने परमासने ॥ ७<br>मयस्तु सुखमासीने नारदे नारदोद्भवे।<br>यथार्हं दानवैः सार्धमासीनो दानवाधिपः ॥ ८<br>आसीनं नारदं प्रेक्ष्य मयस्त्वथ महासुरः।<br>अब्रवीद् वचनं तुष्टो हृष्टरोमाननेक्षणः ॥ ९**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इस प्रकार उस लोकपूजित रथपर आरूढ़ होकर जब महादेवजी त्रिपुरपर आक्रमण करनेके लिये प्रस्थित हुए, उस समय प्रमथगण 'ठीक है, ठीक है' ऐसा कहते हुए उच्च स्वरसे सिंहनाद करने लगे। महान् वृषभ नन्दी भी शङ्करजीके सदृश स्वरमें गर्जना करने लगा। यूथ-के-यूथ विप्र जय-जयकार बोलने लगे तथा घोड़े हींसने लगे। इसी समय चन्द्रतुल्य कान्तिवाले सामर्थ्यशाली देवर्षि नारद युद्धस्थलसे उछलकर तुरंत त्रिपुर नामक नगरमें जा पहुँचे। दैत्योंके उस त्रिपुरमें निश्चितरूपसे उत्पात हो रहे थे। वहाँ तपस्वी भगवान् नारद सहसा प्रकट हो गये। श्वेत मेघकी-सी प्रभाववाले नारदजीको आया हुआ देखकर सभी दानव एक साथ अभिवादन करते हुए उठ खड़े हुए। तत्पश्चात् उन ऐश्वर्यशाली दानवोंने पाद्य, अर्घ्य और मधुपर्कद्वारा नारदजीकी उसी प्रकार पूजा की, जैसे इन्द्र ब्रह्माकी अर्चना करते हैं। तब पूजनीय तपस्वी नारदजी उनकी पूजा स्वीकार कर स्वर्णनिर्मित श्रेष्ठ आसनपर सुखपूर्वक विराजमान हुए। इस प्रकार ब्रह्मपुत्र नारदके सुखपूर्वक बैठ जानेपर दानवराज मय भी सभी दानवोंके साथ यथायोग्य आसनपर बैठ गया। इस तरह नारदजीको वहाँ सुखपूर्वक बैठे देखकर महासुर मयको बड़ी प्रसन्नता हुई। वह हर्षसे रोमाञ्चित हो उठा, उसके मुख एवं नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे, उसने नारदजीसे ये बातें कहीं॥ १—९॥

४७४ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
औत्पातिकं पुरेऽस्माकं यथा नान्यत्र कुत्रचित्।<br>वर्तते वर्तमानज्ञ वद त्वं हि च नारद॥ १०<br>दृश्यन्ते भयदाः स्वप्ना भज्यन्ते च ध्वजाः परम्।<br>विना च वायुना केतुः पतते च तथा भुवि॥ ११<br>अट्टालकाश्च नृत्यन्ते सपताकाः सगोपुराः।<br>हिंस हिंसेति श्रूयन्ते गिरश्च भयदाः पुरे॥ १२<br>नाहं बिभेमि देवानां सेन्द्राणामपि नारद।<br>मुक्त्वैकं वरदं स्थाणुं भक्ताभयकरं हरम्॥ १३<br>भगवन् नास्त्यविदितमुत्पातेषु तवानघ।<br>अनागतमतीतं च भवाञ्जानाति तत्त्वतः॥ १४<br>तदेतन्मे भयस्थानमुत्पाताभिनिवेदितम्।<br>कथयस्व मुनिश्रेष्ठ प्रपन्नस्य तु नारद॥ १५<br>इत्युक्तो नारदस्तेन मयेनामयवर्जितः॥ १६मयने नारदजीसे कहा—'नारदजी! आप तो (भूत-भव्य और) वर्तमानकी सारी बातोंके ज्ञाता हैं, अतः आप यह बतलाइये कि हमारे पुरमें जैसा उत्पात हो रहा है, वैसा सम्भवतः अन्यत्र कहीं भी नहीं होता होगा। (ऐसा क्यों हो रहा है?) यहाँ भयदायक स्वप्न दीख पड़ते हैं। ध्वजाएँ अकस्मात् टूटकर गिर रही हैं। वायुका स्पर्श न होनेपर भी पताकाएँ पृथ्वीपर गिर रही हैं। पताकाओं और फाटकोंसहित अट्टालिकाएँ नाचती-सी (काँपती-सी) दीखती हैं। नगरमें 'मार डालो, मार डालो' ऐसे भयावने शब्द सुननेमें आ रहे हैं। (इतना होनेपर भी) नारदजी! भक्तोंको अभय प्रदान करनेवाले स्थाणुस्वरूप वरदायक एकमात्र शङ्करजीको छोड़कर मुझे इन्द्रसहित समस्त देवताओंसे भी कुछ भय नहीं है। निष्पाप भगवन्! इन उपद्रवोंके विषयमें आपसे कुछ छिपा तो है नहीं; क्योंकि आप तो (पूर्वोक्त वर्तमानके अतिरिक्त) भूत और भविष्यके भी यथार्थ ज्ञाता हैं। मुनिश्रेष्ठ! ये उत्पात हमलोगोंके लिये भयके स्थान बन गये हैं, जिन्हें मैंने आपसे निवेदित कर दिया है। नारदजी! मैं आपके शरणागत हूँ, कृपया इसका कारण बतलाइये।' इस प्रकार मयदानवने अविनाशी नारदजीसे प्रार्थना की॥ १०–१६॥
नारद उवाच<br><br>शृणु दानव तत्त्वेन भवन्त्यौत्पातिका यथा।<br>धर्मेति धारणे धातुर्माहात्म्ये चैव पठ्यते।<br>धारणाच्च महत्त्वेन धर्म एष निरुच्यते॥ १७<br>स इष्टप्रापको धर्म आचार्यैरुपदिश्यते।<br>इतरश्चानिष्टफलं आचार्यैर्नोपदिश्यते॥ १८<br>उत्पथान्मार्गमागच्छेन्मार्गाच्चैव विमार्गताम्।<br>विनाशस्तस्य निर्देश्य इति वेदविदो विदुः॥ १९<br>स ह्यधर्म रथारूढः सहैभिर्मत्तदानवैः।<br>अपकारिषु देवानां कुरुषे त्वं सहायताम्॥ २०<br>तदेतान्येवमादीनि उत्पातावेदितानि च।<br>वैनाशिकानि दृश्यन्ते दानवानां तथैव च॥ २१<br>एष रुद्रः समास्थाय महालोकमयं रथम्।<br>आयाति त्रिपुरं हन्तुं मय त्वामसुरानपि॥ २२(तब) नारदजी बोले—दानवराज! जिस कारण ये उत्पात हो रहे हैं, उन्हें यथार्थरूपसे बतला रहा हूँ, सुनो! 'धृ' धातु धारण-पोषण और महत्त्वके अर्थमें प्रयुक्त होती है। इसी धातुसे धर्म शब्द निष्पन्न हुआ है, अतः महत्त्वपूर्वक धारण करनेसे यह शब्द धर्म कहलाता है। आचार्यगण इष्टकी प्राप्ति करानेवाले इसी धर्मका उपदेश करते हैं। इसके विपरीत अधर्म अनिष्ट फल देनेवाला है, अतः आचार्यगण उसे ग्रहण करनेका आदेश नहीं देते। वेदज्ञोंका कथन है कि मनुष्यको उन्मार्गसे सुमार्गपर आना चाहिये; क्योंकि जो सुमार्गसे उन्मार्गपर चलते हैं, उनका विनाश तो निश्चित ही है। तुम इन उन्मत्त दानवोंके साथ महान् अधर्मके रथपर आरूढ़ होकर देवताओंका अपकार करनेवालोंकी सहायता करते हो। इसलिये इन सभी उत्पातोंद्वारा सूचित अपशकुन दानवोंके विनाशके सूचक हैं। मय! भगवान् रुद्र महालोकमय रथपर सवार होकर त्रिपुरका, तुम्हारा और समस्त असुरोंका भी विनाश करनेके लिये आ रहे हैं।

१३६- मयका चिन्तित होकर अद्भुत बावलीका निर्माण करना, नन्दिकेश्वर और तारकासुरका भीषण युद्ध तथा प्रमथगणोंकी मारसे विमुख होकर दानवोंका त्रिपुर-प्रवेश

* अध्याय १३४ *४७५

| स त्वं महौजसं नित्यं प्रपद्यस्व महेश्वरम्।<br>यास्यसे सह पुत्रेण दानवैः सह मानद॥ २३<br>इत्येवमावेद्य भयं दानवोपस्थितं महत्।<br>दानवानां पुनर्देवो देवेशपद्मागतः॥ २४ | इसलिये मानद! (तुम्हारे लिये यही अच्छा होगा कि) तुम महान् ओजस्वी एवं अविनाशी महेश्वरकी शरण ग्रहण कर लो, अन्यथा तुम पुत्रों और दानवोंके साथ यमलोकके पथिक बन जाओगे। इस प्रकार देवर्षि नारद दानवोंको उनके ऊपर आये हुए महान् भयकी सूचना देकर पुनः देवेश्वर शङ्करजीके पास लौट आये॥ १७—२४॥ | | नारदे तु मुनौ याते मयो दानवनायकः।<br>शूरसम्मतमित्येवं दानवानाह दानवः॥ २५<br>शूराः स्थ जातपुत्राः स्थ कृतकृत्याः स्थ दानवाः।<br>युध्यध्वं दैवतैः सार्धं कर्त्तव्यं चापि नो भयम्॥ २६<br>जित्वा वयं भविष्यामः सर्वेऽमरसभासदः।<br>देवांश्च सेन्द्रकान् हत्वा लोकान् भोक्ष्यामहेऽसुराः॥ २७<br>अट्टालकेषु च तथा तिष्ठध्वं शस्त्रपाणयः।<br>दंशिता युद्धसज्जाश्च तिष्ठध्वं प्रोद्यतायुधाः॥ २८<br>पुराणि त्रीणि चैतानि यथास्थानेषु दानवाः।<br>तिष्ठध्वं लङ्घनीयानि भविष्यन्ति पुराणि च॥ २९<br>नभोगतास्तथा शूरा देवता विदिता हि वः।<br>ताः प्रयत्नेन वार्याश्च विदार्याश्चैव सायकैः॥ ३०<br>इति दनुतनयानम्यस्तथोक्त्वा<br>सुरगणवारणवारणे वचांसि।<br>युवतिजनविषण्णमानसं तत्-<br>त्रिपुरपुरं सहसा विवेश राजा॥ ३१<br>अथ रजतविशुद्धभावभावो<br>भवमभिपूज्य दिगम्बरं सुगीर्भिः।<br>शरणमुपजगाम देवदेवं<br>मदनार्यन्धकयज्ञदेहघातम् ॥ ३२<br>मयमभयपदैषिणं प्रपन्नं<br>न किल बुबोध तृतीयदीप्तनेत्रः।<br>तदभिमतमदात् ततः शशाङ्की<br>स च किल निर्भय एव दानवोऽभूत्॥ ३३ | इधर नारद मुनिके चले जानेपर दानवराज मयदानवने (वहाँ उपस्थित) सभी दानवोंसे इस प्रकार शूरसम्मत वचन कहना आरम्भ किया—'दानवो! तुमलोग शूर-वीर हो, पुत्रवान् हो और (जीवनमें सुखका उपभोग करके) कृतकृत्य हो चुके हो, अतः देवताओंके साथ डटकर युद्ध करो। इसमें तुमलोगोंको किसी प्रकारका भय नहीं मानना चाहिये। असुरो! देवताओंको जीतकर हमलोग देवसभाके सभासद हो जायेंगे, अर्थात् देवसभा अपने अधिकारमें आ जायगी। तब इन्द्रसहित देवताओंका वध करके हमलोग लोकोंका उपभोग करेंगे। तुमलोग युद्धकी साज-सज्जासे विभूषित हो कवच धारण कर लो और हथियार लेकर तैयार हो जाओ तथा हाथमें शस्त्र धारण कर अट्टालिकाओंपर चढ़ जाओ। दानवो! तुमलोग इन तीनों पुरोंपर यथास्थान (सजग होकर) बैठ जाओ; क्योंकि देवगण इन तीनों पुरोंपर आक्रमण करेंगे। शूरवीरो! यदि देवता आकाशमार्गसे धावा करें तो तुमलोग तो उन्हें पहचानते ही हो, तुरंत उन्हें प्रयत्नपूर्वक रोक दो और बाणोंके प्रहारसे विदीर्ण कर दो।' इस प्रकार दानवराज मय दनु-पुत्रोंसे सुरगणरूपी हाथियोंको रोकनेके लिये बातें बताकर सहसा उस त्रिपुर-पुरमें प्रविष्ट हुआ, जहाँकी स्त्रियोंका मन भयके कारण उद्विग्न हो उठा था। तदनन्तर वह चाँदीके समान निर्मल भावसे भावित होकर सुन्दर वाणीद्वारा दिगम्बर भगवान् शङ्करकी पूजा कर उन कामदेवके शत्रु तथा अन्धक और दक्ष-यज्ञके विनाशक देवदेवेश्वरकी शरणमें गया। यद्यपि शङ्करजीके तृतीय नेत्रमें उद्दीप्त अग्निका वास है, तथापि उन चन्द्रशेखरके ध्यानमें यह बात न आयी कि यह मयदानव शरणागत होकर अभयपद प्राप्त करना चाहता है, अतः उन्होंने उसे अभीष्ट वरदान दे दिया, जिससे वह दानव निर्भय हो गया और आगसे भी सुरक्षित रहकर जीवित बच गया॥२५—३३॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरदाहे नारदागमनं नाम चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १३४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरदाह-प्रसङ्गमें नारदागमन नामक एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १३४॥

४७६ * मत्स्यपुराण *


एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय

शङ्करजीकी आज्ञासे इन्द्रका त्रिपुरपर आक्रमण, दोनों सेनाओंमें भीषण संग्राम, विद्युन्मालीका वध, देवताओंकी विजय और दानवोंका युद्ध-विमुख होकर त्रिपुरमें प्रवेश

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ऋषियो! तदनन्तर नारदजी त्रिपुरसे लौटकर पुनः युद्धस्थलमें देवताओंकी सेनामें सम्मिलित हो गये। वे स्वयं देव-सभामें उपस्थित हुए। इलावृत्त नामसे विख्यात विस्तृत वर्ष, जहाँ बलिकायज्ञ सम्पन्न हुआ था तथा जहाँ बलि बाँधे गये थे, तीनों लोकोंमें देवताओंकी जन्मभूमिके रूपमें प्रसिद्ध है। उसी इलावृत्तमें देवताओंके जातकर्म आदि संस्कार तथा यज्ञ और कन्यादान आदि कर्म सम्पन्न हुए हैं। यहाँ भगवान् शङ्कर अपने पार्षदगणोंको साथ लेकर नित्य विहार करते हैं। यहाँ लोकपालगण मेरुगिरिकी तरह सदा निवास करते हैं। इसी स्थानपर जिनके नेत्र मधुके समान पीले रंगके हैं तथा जो द्वितीयाके चन्द्रमाको भूषणरूपमें धारण करते हैं, उन्हीं भगवान् महेश्वरने देवराज इन्द्र और अपने गणेश्वरोंसे इस प्रकार कहा—'इन्द्र! तुम्हारे शत्रुओंका यह त्रिपुर दिखायी पड़ रहा है। यह विमानों, पताकाओं और ध्वजोंसे सुशोभित है। यह सुदृढ़ है तथा इसके विषयमें ऐसी प्रसिद्धि है कि यह अग्निकी तरह अत्यन्त तापदायक है। इसके निवासी दानव किरीट-कुण्डल धारण किये उन्हीं पर्वतके समान दीख रहे हैं। इन दानवोंकी अङ्ग-कान्ति बादलकी-सी है और इनके मुख टेढ़े-मेढ़े हैं। ये सभी परकोटों, फाटकों और अट्टालिकाओंपर तथा कक्षान्तमें स्थित हैं। (वह देखो) वे सभी दैत्य विजयकी अभिलाषासे हथियारोंसे सुसज्जित हो नगरसे बाहर निकल रहे हैं। इसलिये तुम सहायकोंसहित अपना श्रेष्ठ अस्त्र वज्र लेकर सैकड़ों देवताओं तथा मेरे भृत्योंके साथ आगे बढ़कर इन महासुरोंका संहार करो। मैं इस श्रेष्ठ रथपर निश्चल पर्वतकी तरह स्थित रहकर तुमलोगोंकी विजयके लिये त्रिपुरके सम्मुख उसके छिद्रकी खोजमें खड़ा रहूँगा। वासव! जब पुष्य-नक्षत्रके योगके साथ ये तीनों पुर एक स्थानपर स्थित होंगे, तब मैं एक ही बाणसे इन्हें दग्ध कर डालूँगा'॥ १—१२॥
ततो रणे देवबलं नारदोऽभ्यगमत् पुनः।<br>आगत्य चैव त्रिपुरात् सभायामास्थितः स्वयं॥ १<br>इलावृतमिति ख्यातं तद्वर्षं विस्तृतायतम्।<br>यत्र यज्ञो बलेर्वृत्तो बलिर्यत्र च संयतः॥ २<br>देवानां जन्मभूमिर्या त्रिषु लोकेषु विश्रुता।<br>विवाहाः क्रतवश्चैव जातकर्मादिकाः क्रियाः॥ ३<br>देवानां यत्र वृत्तानि कन्यादानानि यानि च।<br>रेमे नित्यं भवो यत्र सहायैः पार्षदैर्गणैः॥ ४<br>लोकपालाः सदा यत्र तस्थुर्मेरुगिरौ यथा।<br>मधुपिङ्गलनेत्रस्तु चन्द्रावयवभूषणः।<br>देवानामधिपं प्राह गणपांश्च महेश्वरः॥ ५<br>वासवैतदरीणां ते त्रिपुरं परिदृश्यते।<br>विमानैश्च पताकाभिर्ध्वजैश्च समलङ्कृतम्॥ ६<br>इदं वृत्तमिदं ख्यातं वह्निवद् भृशतापनम्।<br>एते जना गिरिप्रख्याः सकुण्डलकिरीटिनः॥ ७<br>प्राकारगोपुराट्टेषु कक्षान्ते दानवाः स्थिताः।<br>इमे च तोयदाभासा दनुजा विकृताननाः॥ ८<br>निर्गच्छन्ति पुरो दैत्याः सायुधा विजयैषिणः॥ ९<br>स त्वं सुरशतैः सार्धं ससहायो वरायुधः।<br>सुहृद्भिर्मामकैर्भृत्यैर्व्यापादय महासुरान्॥ १०<br>अहं च रथवर्येण निश्चलाचलवत्स्थितः।<br>पुरः पुरस्य रन्ध्रार्थी स्थास्यामि विजयाय वः॥ ११<br>यदा तु पुष्ययोगेने एकत्वं स्थास्यते परम्।<br>तदेतन्निर्धहिष्यामि शरेणैकेन वासव॥ १२