मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
५- दक्ष-कन्याओंकी उत्पत्ति, कुमार कार्तिकेयका जन्म तथा दक्ष-कन्याओंद्वारा देवयोनियोंका प्रादुर्भाव
| * अध्याय ५ * | २७ |
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| दक्षादनन्तरं वृक्षानौषधानि च सर्वशः।<br>अजीजनत् सोमकन्या नदीं चन्द्रवतीं तथा॥ ५०<br>सोमांशस्य च तस्यापि दक्षस्याशीतिकोटयः।<br>तासां तु विस्तरं वक्ष्ये लोके यः सुप्रतिष्ठितः॥ ५१<br>द्विपदश्चाभवन् केचित् केचिद् बहुपदा नराः।<br>वलीमुखाः शङ्कुकर्णाः कर्णप्रावरणास्तथा॥ ५२<br>अश्वऋक्षमुखाः केचित् केचित् सिंहाननास्तथा।<br>श्वसूकरमुखाः केचित् केचिदुष्ट्रमुखास्तथा॥ ५३<br>जनयामास धर्मात्मा म्लेच्छान् सर्वाननेकंशः।<br>स सृष्ट्वा मनसा दक्षः स्त्रियः पश्चादजीजनत्॥ ५४<br>ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।<br>सप्तविंशति सोमाय ददौ नक्षत्रसंज्ञिताः।<br>देवासुरमनुष्यादि ताभ्यः सर्वमभूज्जगत्॥ ५५ | दक्षकी उत्पत्तिके पश्चात् उस सोमकन्याने समस्त वृक्षों और ओषधियोंको तथा चन्द्रवती नामकी नदीको उत्पन्न किया। चन्द्रमाके अंशसे उत्पन्न हुए उस दक्ष प्रजापतिकी अस्सी करोड़ संतानें हुईं, जो इस समय लोकमें सर्वत्र फैली हुई हैं और जिनका विस्तार मैं आगे वर्णन करूँगा। उनमेंसे किन्हींके दो पैर थे तो किन्हींके अनेकों पैर थे। किन्हींके मुख टेढ़े-मेढ़े थे तो किन्हींके कान खूँटे-जैसे थे तथा किन्हींके कान (बालोंसे) आच्छादित थे। किन्हींके मुख घोड़े और रीछके सदृश थे तथा कोई सिंहके समान मुखवाले थे। कुछ लोग कुत्ते और सूअरके सदृश मुखवाले थे तो किन्हींका मुख ऊँटके समान था। इस प्रकार धर्मात्मा दक्षने अपने मनसे अनेकों प्रकारके सभी म्लेच्छोंकी सृष्टि की, तत्पश्चात् स्त्रियोंको उत्पन्न किया। उनमेंसे उन्होंने दस धर्मको, तेरह कश्यपको तथा नक्षत्र नामवाली सत्ताईस स्त्रियोंको चन्द्रमाको प्रदान किया। उन्हीं कन्याओंसे देवता, असुर और मानव आदिसे परिपूर्ण यह सारा जगत् प्रादुर्भूत हुआ है॥ ५०—५५॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे आदिसर्गे चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके आदिसर्गमें चौथा अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४॥
पाँचवाँ अध्याय
दक्ष-कन्याओंकी उत्पत्ति, कुमार कार्तिकेयका जन्म तथा दक्ष-कन्याओंद्धारा देवयोनियोंका प्रादुर्भाव
| ऋषय ऊचुः<br>देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम्।<br>उत्पत्तिं विस्तरेणैव सूत ब्रूहि यथातथम्॥ १<br><br>सूत उवाच<br>संकल्पाद दर्शनात् स्पर्शात् पूर्वेषां सृष्टिरुच्यते।<br>दक्षात् प्राचेतसादूर्ध्वं सृष्टिर्मैथुनसम्भवा॥ २<br>प्रजाः सृजेति व्यादिष्टः पूर्वं दक्षः स्वयम्भुवा।<br>यथा ससर्ज चैवादौ तथैव शृणुत द्विजाः॥ ३<br>यदा तु सृजतस्तस्य देवर्षिगणपन्नगान्।<br>न वृद्धिमगमल्लोकस्तदा मैथुनयोगतः।<br>दक्षः पुत्रसहस्राणि पाञ्चजन्यामजीजनत्॥ ४ | **(शौनक आदि) ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! देवता, दानव, गन्धर्व, नाग और राक्षस—इन सबकी उत्पत्ति कैसे हुई? इसका यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये॥ १॥<br><br>**सूतजी कहते हैं—**द्विजवरो! प्रचेता-पुत्र दक्षसे पूर्व उत्पन्न हुए लोगोंकी सृष्टि संकल्प, दर्शन और स्पर्शमात्रसे हुई है, ऐसा कहा जाता है; किंतु दक्षके पश्चात् स्त्री-पुरुषके संयोगद्वारा सृष्टि प्रचलित हुई है। पूर्वकालमें जब ब्रह्मा प्रजाकी आज्ञा दी कि तुम प्रजाओंकी सृष्टि करो, तब दक्षने पहले-पहल जैसी सृष्टि-रचना की, उसे (मैं) उसी प्रकार (वर्णन करता हूँ, आपलोग) श्रवण करें। जब (संकल्प, दर्शन और स्पर्शद्वारा) देव, ऋषि और नागोंकी सृष्टि करनेपर जीव-लोकका विस्तार नहीं हुआ, तब दक्षने पाञ्चजनीके गर्भसे एक हजार |
| २८ | * मत्स्यपुराण * |
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| श्लोक | अर्थ |
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| तांस्तु दृष्ट्वा महाभागः सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः।<br>नारदः प्राह हर्यश्वान् दक्षपुत्रान् समागतान्॥ ५<br><br>भुवः प्रमाणं सर्वत्र ज्ञात्वोर्ध्वमध एव च।<br>ततः सृष्टिं विशेषेण कुरुध्वमृषिसत्तमाः॥ ६<br><br>ते तु तद्वचनं श्रुत्वा प्रयाताः सर्वतो दिशम्।<br>अद्यापि न निवर्तन्ते समुद्रादिव सिन्धवः॥ ७<br><br>हर्यश्वेषु प्रणष्टेषु पुनर्दक्षः प्रजापतिः।<br>वीरिण्यामेव पुत्राणां सहस्रमसृजत् प्रभुः॥ ८<br><br>शबला नाम ते विप्राः समेताः सृष्टिहेतवः।<br>नारदोऽनुगतान् प्राह पुनस्तान् पूर्ववत् स तान्॥ ९<br><br>भुवः प्रमाणं सर्वत्र ज्ञात्वा भ्रातृनथो पुनः।<br>आगत्य चाथ सृष्टिं च करिष्यथ विशेषतः॥ १०<br><br>तेऽपि तेनैव मार्गेण जग्मुर्भ्रातृपथा तदा।<br>ततः प्रभृति न भ्रातुः कनीयान् मार्गमिच्छति।<br>अन्विष्यन् दुःखमाप्नोति तेन तत् परिवर्जयेत्॥ ११ | पुत्रोंको पैदा किया, जो 'हर्यश्व' नामसे विख्यात हुए। उन हर्यश्वनामक दक्ष-पुत्रोंको नाना प्रकारके जीवोंकी सृष्टि करनेके लिये उत्सुक देखकर महाभाग नारदने निकट आये हुए उन लोगोंसे कहा—'श्रेष्ठ ऋषियो! पहले आपलोग सर्वत्र घूमकर पृथ्वीके विस्तार तथा उसके ऊपर और नीचेके भागको जान लें, तब विशेषरूपसे सृष्टि-रचना कीजिये।' नारदजीकी बात सुनकर वे लोग विभिन्न दिशाओंकी ओर चले गये और आजतक भी वे उसी प्रकार नहीं लौटे, जैसे नदियाँ समुद्रमें मिलकर पुनः वापस नहीं आतीं। इस प्रकार हर्यश्व नामक पुत्रोंके नष्ट हो जानेपर प्रभावशाली प्रजापति दक्षने वीरिणीके गर्भसे पुनः एक हजार पुत्रोंको उत्पन्न किया, जो शबल नामसे प्रसिद्ध हुए। जब ये द्विजवर सृष्टि-रचनाके लिये एकत्र होकर नारदजीके निकट पहुँचे, तब उन्होंने उन अनुगतोंसे भी पुनः वही पूर्ववत् बात कही—'ऋषियो! आपलोग पहले सब ओर घूमकर पृथ्वीके विस्तारको समझिये और अपने भाइयोंका पता लगाकर लौटिये, तत्पश्चात् विशेषरूपसे सृष्टि-रचना कीजिये।' तब जिस मार्गसे भाई लोग गये थे, उसी मार्गसे वे लोग भी चले, उसी मार्गसे चले गये (और पुनः वापस नहीं आये)। तभीसे छोटा भाई बड़े भाईको ढूँढ़ने नहीं जाता। यदि जाता है तो वह दुःखभागी होता है। इसलिये ऐसा कार्य नहीं करना चाहिये॥२—११॥* |
| ततस्तेषु विनष्टेषु षष्टिं कन्याः प्रजापतिः।<br>वीरिण्यां जनयामास दक्षः प्राचेतसस्तथा॥ १२<br><br>प्रादात् स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश।<br>सप्तविंशति सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमये॥ १३<br><br>द्वे चैव भृगुपुत्राय द्वे कृशाश्वाय धीमते।<br>द्वे चैवाङ्गिरसे तद्वत्तासां नामानि विस्तरात्॥ १४<br><br>शृणुध्वं देवमातॄणां प्रजाविस्तरमादितः।<br>मरुत्वतो वसुर्यामी लम्बा भानुरुरुन्धती॥ १५<br><br>संकल्पा च मुहूर्ता च साध्या विश्वा च भामिनी।<br>धर्मपत्न्यः समाख्यातास्तासां पुत्रान् निबोधत॥ १६<br><br>विश्वेदेवास्तु विश्वायाः साध्या साध्यान्जीजनत्।<br>मरुत्वत्यां मरुत्वन्तो वसोस्तु वसवस्तथा॥ १७<br><br>भानोस्तु भानवस्तद्वन्मुहूर्तायां मुहूर्त्तकाः।<br>लम्बायां घोषनामानो नागवीथी तु यामिजा॥ १८ | तदनन्तर उन पुत्रोंके भी विनष्ट हो जानेपर प्रचेतानन्दन प्रजापति दक्षने वीरिणीके गर्भसे साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं। उनमेंसे दक्षने दस धर्मको, तेरह कश्यपको, सत्ताईस चन्द्रमाको, चार अरिष्टनेमिको, दो भृगुनन्दन शुक्रको, दो बुद्धिमान् कृशाश्वको और दो कन्याएँ अङ्गिराको प्रदान कर दीं। अब आपलोग इन देवमाताओंके नाम तथा जिस प्रकार इनकी संतानोंका विस्तार हुआ, वह सब आदिसे ही विस्तारपूर्वक सुनिये। इनमेंसे मरुत्वती, वसु, यामी, लम्बा, भानु, अरुंधती, संकल्पा, मुहूर्ता, साध्या और सुन्दरी विश्वा—ये दस धर्मकी पत्नियाँ बतलायी गयी हैं। अब इनके पुत्रोंके भी नाम सुनिये—विश्वाने (दस) विश्वेदेवोंको, साध्याने (बारह) साध्योंको, मरुत्वतीने (उनचास) मरुतोंको, वसुने आठ वसुओंको, भानुने (बारह) सूर्योंको, मुहूर्ताने मुहूर्त्तकको, लम्बाने घोषको, यामीने नागवीथीको |
* विष्णुपुराण १।१५।१०१, ब्रह्म० २।८०, वायु० ६५ आदिमें ऐसा ही है, पर भागवत० ६।५ में इसके विपरीत सम्मति है।
| * अध्याय ५ * | २९ |
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| पृथिवीतलसम्भूतमरुन्धत्यामजायत ।<br>संकल्पायास्तु संकल्पो वसुसृष्टिं निबोधत ॥ १९<br>ज्योतिष्मन्तस्तु ये देवा व्यापकाः सर्वतो दिशम्।<br>वसवस्ते समाख्यातास्तेषां सर्गे निबोधत ॥ २०<br>आपो ध्रुवश्च सोमश्च धरश्चैवानिलोऽनलः।<br>प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ २१<br>आपस्य पुत्राश्चत्वारः शान्तो वै दण्ड एव च।<br>शाम्बोऽथ मणिवक्त्रश्च यज्ञरक्षाधिकारिणः ॥ २२<br>ध्रुवस्य कालः पुत्रस्तु वर्चः सोमादजायत।<br>द्रविणो हव्यवाहश्च धरपुत्रावुभौ स्मृतौ ॥ २३<br>कल्याणियां ततः प्राणो रमणः शिशिरोऽपि च।<br>मनोहरा धरात् पुत्रानवापाथ हरेः सुता ॥ २४<br>शिवा मनोजवं पुत्रमविज्ञातगतिं तथा।<br>अवाप चानलात् पुत्रावग्निप्रायगुणौ पुनः ॥ २५<br>अग्निपुत्रः कुमारस्तु शरस्तम्बे व्यजायत।<br>तस्य शाखो विशाखश्च नैगमेयश्च पृष्ठजाः ॥ २६<br>अपत्यं कृत्तिकानां तु कार्त्तिकेयस्ततः स्मृतः।<br>प्रत्यूषस्य ऋषेः पुत्रो विभुर्नाम्नाथ देवलः।<br>विश्वकर्मा प्रभासस्य पुत्रः शिल्पी प्रजापतिः ॥ २७<br>प्रासादभवनोद्यानप्रतिमाभूषणादिषु ।<br>तडागारामकूपेषु स्मृतः सोऽमरवर्धकिः ॥ २८ | और संकल्पाने संकल्पको जन्म दिया। अरुन्धतीके गर्भसे भूतलपर होनेवाले समस्त जीव-जन्तुओंकी उत्पत्ति हुई। अब वसुओंकी सृष्टिके विषयमें सुनिये—ये जो प्रभाशाली देवता सम्पूर्ण दिशाओंमें व्याप्त हैं, वे सभी 'वसु' नामसे विख्यात हैं। अब इनके सृष्टि-विस्तारका वर्णन सुनिये। आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—ये आठ वसु कहे गये हैं। इनमें आप नामक वसुके शान्त, दण्ड, शाम्ब और मणिवक्त्र नामक चार पुत्र हुए, जो सब-के-सब यज्ञ-रक्षाके अधिकारी हैं। (शेष वसुओंमें) ध्रुवका पुत्र काल हुआ। सोमसे वर्चाकी उत्पत्ति हुई। धरके कल्याणिनीके गर्भसे द्रविण और हव्यवाह नामके दो पुत्र बतलाये जाते हैं तथा हरिकी कन्या मनोहराने उन्हीं धरके संयोगसे प्राण, रमण और शिशिर नामक तीन पुत्र प्राप्त किये। शिवाने अनलसे मनोजव तथा अविज्ञातगति नामक दो पुत्रोंको प्राप्त किया, जो प्रायः अग्निके सदृश ही गुणवाले थे। अग्निपुत्र कुमार (कार्त्तिकेय) सरकंडेके झुरमुटमें पैदा हुए थे। इनके अनुज शाख, विशाख और नैगमेय नामसे प्रसिद्ध हैं। कृत्तिकाकी संतति होनेके कारण ये कार्त्तिकेय नामसे भी विख्यात हैं। प्रत्यूष वसुके विभु तथा देवल* नामके दो पुत्र हुए, जो आगे चलकर महान् ऋषि हुए। प्रभासका पुत्र विश्वकर्मा हुआ, जो शिल्पविद्यामें निपुण और प्रजापति हुआ। वह प्रासाद (अट्टालिका) भवन, उद्यान, प्रतिमा, आभूषण, वापी, सरोवर, बगीचा और कुएँ आदिके निर्माणकार्यमें देवताओंके बढ़ईरूपसे विख्यात हुआ॥ १२—२८॥ | | अजैकपादहिर्बुध्न्यो विरूपाक्षोऽथ रैवतः।<br>हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्च सुरेश्वरः ॥ २९<br>सावित्रश्च जयन्तश्च पिनाकी चापराजितः।<br>एते रुद्राः समाख्याता एकादश गणेश्वराः ॥ ३०<br>एतेषां मानसानां तु त्रिशूलवरधारिणाम्।<br>कोटयश्चतुराशीतिस्तत्पुत्राश्चाक्षया मताः ॥ ३१<br>दिक्षु सर्वासु ये रक्षां प्रकुर्वन्ति गणेश्वराः।<br>पुत्रपौत्रसुताश्चैते सुरभीगर्भसम्भवाः ॥ ३२ | अजैकपाद्, अहिर्बुध्न्य, विरूपाक्ष, रैवत, हर, बहुरूप, सुरराजत्र्यम्बक, सावित्र, जयन्त, पिनाकी और अपराजित—ये एकादश रुद्र गणेश्वर नामसे प्रख्यात हैं। श्रेष्ठ त्रिशूल धारण करनेवाले इन ब्रह्माके मानस पुत्ररूप गणेश्वरोंके चौरासी करोड़ पुत्र उत्पन्न हुए, जो सब-के-सब अक्षय माने गये हैं। सुरभीके गर्भसे उद्भूत ये एकादश रुद्रोंके पुत्र-पौत्र आदि, जो गणेश्वर कहे जाते हैं, सभी दिशाओंमें (चराचर जगत्की) रक्षा करते हैं॥ २९—३२॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे आदिसर्गे वसुरुद्रान्वयवायो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके आदिसर्गमें वसुओं और रुद्रोंके वंशका वर्णन नामक पाँचवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ५ ॥
* असित और एकपर्णाके पुत्र महर्षि देवल, जो 'देवलस्मृति' के रचयिता हैं, इनसे भिन्न हैं।
६- कश्यप-वंशका विस्तृत वर्णन
३० * मत्स्यपुराण *
छठा अध्याय
कश्यप-वंशका विस्तृत वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— (शौनकादि ऋषियो!) अब मैं कश्यपकी पत्नियोंसे उत्पन्न हुए पुत्र-पौत्रोंका वर्णन करता हूँ। अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुरसा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा, कद्रू, विश्वा और मुनि— ये तेरह कश्यपकी पत्नियाँ थीं। अब इनके पुत्रोंका वर्णन सुनिये। चाक्षुष मनुके कार्यकालमें जो तुषित नामके देवगण थे, वे ही वैवस्वत मन्वन्तरमें द्वादश आदित्यके नामसे प्रख्यात हुए। इनके नाम हैं—इन्द्र, धाता, भग, त्वष्टा, मित्र, वरुण, यम, विवस्वान्, सविता, पूषा, अंशुमान् और विष्णु। ये सभी सहस्र किरणोंसे सम्पन्न हैं और द्वादश आदित्य कहे जाते हैं। अदितिने मरीचि-नन्दन कश्यपके संयोगसे इन श्रेष्ठ पुत्रोंको प्राप्त किया था। महर्षि कृशाश्वके पुत्र देवप्रहरण नामसे विख्यात हुए। द्विजवरो! ये देवगण प्रत्येक मन्वन्तर तथा प्रत्येक कल्पमें उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं। हमने सुना है कि दितिने महर्षि कश्यपके सम्पर्कसे हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्रोंको प्राप्त किया था। हिरण्यकशिपुके उसीके समान पराक्रमी प्रह्लाद, अनुह्लाद, संह्लाद और ह्लाद नामक चार पुत्र उत्पन्न हुए। उनमेंसे प्रह्लादके चार पुत्र हुए—आयुष्मान्, शिबि, बाष्कल और चौथा विरोचन। उस विरोचनने बलिको पुत्ररूपमें प्राप्त किया। विप्रवरो! बलिके सौ पुत्र उत्पन्न हुए, जिनमें बाण ज्येष्ठ था। इसके अतिरिक्त, धृतराष्ट्र, सूर्य, चन्द्र, चन्द्रांशुतापन, निकुम्भनाभ, गुर्वक्ष, कुक्षिभीम, विभीषण तथा इसी प्रकारके और भी बहुत-से पुत्र थे, जो बाणसे छोटे, परंतु सभी श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न थे। उनमें बाणके सहस्र भुजाएँ थीं और वह समस्त अस्त्रसमूहोंका ज्ञाता था। उसकी तपस्यासे संतुष्ट होकर त्रिशूलधारी भगवान् शंकर उसके नगरमें निवास करते थे। उसने (अपनी तपस्याके प्रभावसे) पिनाकधारी शंकरजीकी समतावाले महाकालपदको प्राप्त कर लिया था। (दितिके द्वितीय पुत्र) हिरण्याक्षके उलूक, शकुनि, भूतसंतापन और महानाभनामक पुत्र हुए। इनसे उत्पन्न हुए पुत्र-पौत्रोंकी संख्या सतहत्तर करोड़ थी। वे सभी महान् बलशाली, विशाल शरीरवाले, नाना प्रकारका रूप धारण करनेमें समर्थ और महान् ओजस्वी थे॥१-१५॥ |
|---|---|
| कश्यपस्य प्रवक्ष्यामि पत्नीभ्यः पुत्रपौत्रकान्।<br>अदितिर्दितिर्दनुश्चैव अरिष्टा सुरसा तथा॥ १<br>सुरभिर्विनता तद्वत्ताम्रा क्रोधवशा इरा।<br>कद्रूर्विश्वा मुनिस्तद्वत्तासां पुत्रान् निबोधत॥ २<br>तुषिता नाम ये देवाश्चाक्षुषस्यान्तरे मनोः।<br>वैवस्वतेऽन्तरे चैते ह्यादित्या द्वादश स्मृताः॥ ३<br>इन्द्रो धाता भगस्त्वष्टा मित्रोऽथ वरुणो यमः।<br>विवस्वान् सविता पूषा अंशुमान् विष्णुरेव च॥ ४<br>एते सहस्त्रकिरणा आदित्या द्वादश स्मृताः।<br>मारीचात् कश्यपादाप पुत्रानदितिरुत्तमान्॥ ५<br>कृशाश्वस्य ऋषेः पुत्रा देवप्रहरणाः स्मृताः।<br>एते देवगणा विप्राः प्रतिमन्वन्तरेषु च॥ ६<br>उत्पद्यन्ते प्रलीयन्ते कल्पे कल्पे तथैव च।<br>दितिः पुत्रद्वयं लेभे कश्यपादिति नः श्रुतम्॥ ७<br>हिरण्यकशिपुं चैव हिरण्याक्षं तथैव च।<br>हिरण्यकशिपोस्तद्वज्जातं पुत्रचतुष्टयम्॥ ८<br>प्रह्लादश्चानुह्लादश्च संह्लादो ह्राद एव च।<br>प्रह्लादपुत्र आयुष्माञ्शिबिर्बाष्कल एव च॥ ९<br>विरोचनश्चतुर्थश्च स बलिं पुत्रमाप्तवान्।<br>बलेः पुत्रशतं त्वासीद् बाणज्येष्ठं ततो द्विजाः॥ १०<br>धृतराष्ट्रस्तथा सूर्यश्चन्द्रश्चन्द्रांशुतापनः।<br>निकुम्भनाभो गुर्वक्षः कुक्षिभीमो विभीषणः॥ ११<br>एवमाद्यास्तु बहवो बाणज्येष्ठा गुणाधिकाः।<br>बाणः सहस्त्रबाहुश्च सर्वास्त्रगणसंयुतः॥ १२<br>तपसा तोषितो यस्य पुरे वसति शूलभृत्।<br>महाकालत्वमगमत् साम्यं यश्च पिनाकिनः॥ १३<br>हिरण्याक्षस्य पुत्रोऽभूदुलूकः शकुनिस्तथा।<br>भूतसंतापनश्चैव महानाभस्तथैव च॥ १४<br>एतेभ्यः पुत्रपौत्राणां कोटयः सप्तसप्ततिः।<br>महाबला महाकाया नानारूपा महौजसः॥ १५ |
| * अध्याय ६ * | ३१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दनुः पुत्रशतं लेभे कश्यपाद् बलदर्पितम्।<br>विप्रचित्तिः प्रधानोऽभूद् येषां मध्ये महाबलः ॥ १६<br>द्विमूर्धा शकुनिश्चैव तथा शङ्कुशिरोधरः।<br>अयोमुखः शम्बरश्च कपिशो वामनस्तथा ॥ १७<br>मारीचिर्मेघवांश्चैव इरागर्भशिरास्तथा।<br>विद्रावणश्च केतुश्च केतुवीर्यः शतह्रदः ॥ १८<br>इन्द्रजित् सप्तजिच्चैव वज्रनाभस्तथैव च।<br>एकचक्रो महाबाहुर्वज्राक्षस्तारकस्तथा ॥ १९<br>असिलोमा पुलोमा च बिन्दुबार्णो महासुरः।<br>स्वर्भानुर्वृषपर्वा च एवमाद्या दनोः सुताः ॥ २० | इसी प्रकार दनुने भी कश्यपके संयोगसे सौ बलशाली पुत्रोंको प्राप्त किया, जिनमें महाबली विप्रचित्ति प्रधान था। इसके अतिरिक्त द्विमूर्धा, शकुनि, शंकुशिरोधर, अयोमुख, शम्बर, कपिश, वामन, मारीचि, मेघवान्, इरागर्भशिरा, विद्रावण, केतु, केतुवीर्य, शतह्रद, इन्द्रजित्, सप्तजित्, वज्रनाभ, एकचक्र, महाबाहु, वज्राक्ष, तारक, असिलोमा, पुलोमा, बिन्दु, महासुर बाण, स्वर्भानु और वृषपर्वा—ये तथा इसी प्रकारके और भी दनुके पुत्र थे। |
| स्वर्भानोस्तु प्रभा कन्या शची चैव पुलोमजा।<br>उपदानवी मयस्यासीत्तथा मन्दोदरी कुहूः ॥ २१<br>शर्मिष्ठा सुन्दरी चैव चन्द्रा च वृषपर्वणः।<br>पुलोमा कालका चैव वैश्वानरसुते हि ते ॥ २२ | इनमें स्वर्भानुकी प्रभा, पुलोमाकी शची, मयकी उपदानवी, मन्दोदरी और कुहू, वृषपर्वाकी शर्मिष्ठा, सुन्दरी और चन्द्रा तथा वैश्वानरकी पुलोमा और कालका नामकी कन्याएँ थीं। |
| बह्वपत्ये महासत्त्वे मारीचस्य परिग्रहे।<br>तयोः षष्टिसहस्राणि दानवानामभूत् पुरा ॥ २३<br>पौलोमान् कालकेयांश्च मारीचोऽजनयत् पुरा।<br>अवध्या येऽमराणां वै हिरण्यपुरवासिनः ॥ २४<br>चतुर्मुखाल्लब्धवरास्ते हता विजयेन तु। | इनमें महान् बलशालिनी एवं बहुत-सी संतानोंवाली पुलोमा और कालका मरीचि-पुत्र कश्यपकी पत्नियाँ थीं। इन दोनोंसे पूर्वकालमें साठ हजार दानवोंकी उत्पत्ति हुई थी। पूर्वकालमें मरीचिनन्दन कश्यपने* (इन्हीं पुलोमा और कालकाके गर्भसे) पौलोम और कालकेय संज्ञक दानवोंको पैदा किया था, जो हिरण्यपुरमें निवास करते थे तथा ब्रह्मासे वरदान प्राप्त होनेके कारण वे देवताओंके लिये भी अवध्य थे; परंतु विजय (अर्जुन)—ने उनका संहार कर डाला। |
| विप्रचित्तिः सैंहिकेयान् सिंहिकायामजीजनत् ॥ २५<br>हिरण्यकशिपोर्ये वै भागिनेयास्त्रयोदश।<br>व्यंसः कल्पश्च राजेन्द्र नलो वातापिरेव च ॥ २६<br>इल्वलो नमुचिश्चैव श्वसृपश्राजनस्तथा।<br>नरकः कालनाभश्च सरमाणस्तथैव च ॥ २७<br>कालवीर्यश्च विख्यातो दनुवंशविवर्धनाः। | विप्रचित्तिने सिंहिकाके गर्भसे सैंहिकेय-संज्ञक पुत्रोंको जन्म दिया, जिनकी संख्या तेरह थी। ये हिरण्यकशिपुके भानजे थे। उनके नाम ये हैं—व्यंस, कल्प, राजेन्द्र, नल, वातापि, इल्वल, नमुचि, श्वसृप, अजन, नरक, कालनाभ, सरमाण तथा प्रसिद्ध कालवीर्य। ये सभी दनु-वंशको बढ़ानेवाले थे। |
| संह्रादस्य तु दैत्यस्य निवातकवचाः स्मृताः ॥ २८<br>अवध्याः सर्वदेवानां गन्धर्वोरगरक्षसाम्।<br>ये हता भर्गमाश्रित्य त्वर्जुनेन रणाजिरे ॥ २९ | दैत्य संह्रादके पुत्र निवातकवचके नामसे विख्यात हुए। वे सम्पूर्ण देवताओं, गन्धर्वों, नागों और राक्षसोंद्वारा अवध्य थे; किंतु अर्जुनने शिवजीका आश्रय ग्रहण करके रणभूमिमें उन्हें यमलोकका पथिक बना दिया। |
| षट् कन्या जनयामास ताम्रा मारीचबीजतः।<br>शुकी श्येनी च भासी च सुग्रीवी गृधिका शुचिः ॥ ३० | ताम्राने कश्यपसे शुकी, श्येनी, भासी, सुग्रीवी, गृध्रिका और शुचि नामक छः कन्याओंको जन्म दिया। |
* वाल्मी० रामा० १।१।२० आदि, भागवत० १।६।३१, ३।१२।३२, ४।१।१३, ९।१।१०, विष्णुपुराण १।१५।१३१, २१।८, मत्स्य० ३।६, ४।२६, ११५।९, वायु० ५०।१६८, ५२।२५, १०१।३५, ४९, ब्रह्माण्ड० २।३२।९६, २।२१।४३-४४ आदिके अनुसार मरीचि ऋषिके एकमात्र पुत्र कश्यप ही हैं। किसी-किसी पुराणमें उनका एक दूसरा पुत्र 'पौर्णमास' भी निर्दिष्ट है।
३२ * मत्स्यपुराण *
| शुकी शुकानुलूकांश्च जनयामास धर्मतः।<br>श्येनी श्येनांस्तथा भासी कुररानप्यजीजनत्॥ ३१<br>गृध्री गृध्रान् कपोतांश्च पारावतविहङ्गमान्।<br>हंससारसक्रौञ्चांश्च प्लवाञ्छुचिरजीजनत्॥ ३२<br>अजाश्वमेषोष्ट्रखरान् सुग्रीवी चाप्यजीजनत्।<br>एष ताम्रान्वयः प्रोक्तो विनतायां निबोधत॥ ३३ | इनमें शुकीने धर्मके संयोगसे शुक और उलूकोंको उत्पन्न किया। श्येनीसे श्येन (बाज) तथा भासीसे कुरर(चकवा)-की उत्पत्ति हुई। गृध्रीने गीधों, पँडुत्रियों और कबूतरोंको पैदा किया। शुचिके गर्भसे हंस, सारस, क्रौंच और प्लव (कारण्डव या विशेष जलपक्षी) प्रादुर्भूत हुए। सुग्रीवीने बकरा, घोड़ा, भेंडा, ऊँट और गधोंको जन्म दिया। इस प्रकार यह ताम्राके वंशका वर्णन किया, अब विनताकी वंश-परम्पराके विषयमें सुनिये॥ १६—३३॥ |
| गरुडः पततां नाथो अरुणश्च पतत्रिणाम्।<br>सौदामिनी तथा कन्या येयं नभसि विश्रुता॥ ३४<br>सम्पातिश्च जटायुश्च अरुणस्य सुतावुभौ।<br>सम्पातिपुत्रो बभ्रुश्च शीघ्रगश्चापि विश्रुतः॥ ३५<br>जटायुषः कर्णिकारः शतगामी च विश्रुतौ।<br>सारसो रज्जुबालश्च भेरुण्डश्चापि तत्सुताः॥ ३६<br>तेषामनन्तमभवत् पक्षिणां पुत्रपौत्रकम्।<br>सुरसायाः सहस्रं तु सर्पाणामभवत् पुरा॥ ३७<br>सहस्रशिरसां कद्रूः सहस्रं चापि सुव्रत।<br>प्रधानास्तेषु विख्याताः षड्विंशतिररिंदम॥ ३८<br>शेषवासुकिकर्कोटशङ्खैरावतकम्बलाः।<br>धनञ्जयमहानीलपद्माश्वतरतक्षकाः॥ ३९<br>एलापत्रमहापद्मधृतराष्ट्रबलाहकाः।<br>शङ्खपालमहाशङ्खपुष्पदंष्ट्रशुभाननाः॥ ४०<br>शङ्कुरोमा च बहुलो वामनः पाणिनस्तथा।<br>कपिलो दुर्मुखश्चापि पतञ्जलिरिति स्मृताः॥ ४१<br>एषामनन्तमभवत् सर्वेषां पुत्रपौत्रकम्।<br>प्रायशो यत् पुरा दग्धं जनमेजयमन्दिरे॥ ४२<br>रक्षोगणं क्रोधवशा स्वनामानमजीजनत्।<br>दंष्ट्रिणां नियुतं तेषां भीमसेनादगात् क्षयम्॥ ४३<br>रुद्राणां च गणं तद्वद् गोमहिष्यो वराङ्गनाः।<br>सुरभिर्जनयामास कश्यपात् संयतव्रता॥ ४४<br>मुनिर्मुनीनां च गणं गणमप्सरसां तथा।<br>तथा किन्नरगन्धर्वानरिष्टाजनयद् बहून्॥ ४५<br>तृणवृक्षलतागुल्ममिरा सर्वमजीजनत्।<br>विश्वा तु यक्षरक्षांसि जनयामास कोटिशः॥ ४६<br>तत एकोनपञ्चाशन्मरुतः कश्यपाद् दितिः।<br>जनयामास धर्मज्ञान् सर्वानमरवल्लभान्॥ ४७ | (विनताके दो पुत्र) गरुड़ और अरुण आकाशचारी छोटे-बड़े समस्त पक्षियोंके स्वामी हैं। (उसकी तीसरी संतान) सौदामिनी नामकी कन्या है, जो गगन-मण्डलमें विख्यात है। अरुणके सम्पाति और जटायु नामके दो पुत्र हुए। उनमें सम्पातिके पुत्र बभ्रु और शीघ्रग नामसे विख्यात हुए। जटायुके दो पुत्र कर्णिकार और शतगामी नामसे प्रसिद्ध हुए। इनके अतिरिक्त जटायुके सारस, रज्जुबाल और भेरुण्डनामक पुत्र भी थे। इन पक्षियोंके पुत्र-पौत्रोंकी संख्या अनन्त है। सुव्रत! सुरसा तथा कद्रूके गर्भसे सहस्र फणोंवाले एक-एक हजार सर्पोंकी उत्पत्ति हुई। परन्तप! उनमें छब्बीस प्रधान हैं। उनके नाम ये हैं—शेष, वासुकि, कर्कोटक, शङ्ख, ऐरावत, कम्बल, धनञ्जय, महानील, पद्म, अश्वतर, तक्षक, एलापत्र, महापद्म, धृतराष्ट्र, बलाहक, शंखपाल, महाशंख, पुष्पदंष्ट्र, शुभानन, शंकुरोमा, बहुल, वामन, पाणिन, कपिल, दुर्मुख और पतञ्जलि। इन सभी सर्पोंके पुत्र-पौत्रोंकी संख्या अगणित थी, परंतु प्राचीनकालमें जनमेजयके सर्पयज्ञमें (इनमेंसे) प्रायः अधिकांश जला दिये गये। क्रोधवशाने अपने ही नामवाले (क्रोधवश नामक) दंष्ट्रधारी एक लाख राक्षसोंको जन्म दिया, जो भीमसेनद्वारा नष्ट कर दिये गये। संयत व्रतवाली सुरभिने महर्षि कश्यपके संयोगसे रुद्रगणों तथा सुन्दर अङ्गोंवाली गायों और भैंसोंको उत्पन्न किया। मुनिने मुनि-समुदाय तथा अप्सरा-समूहको पैदा किया, उसी प्रकार अरिष्टाने बहुत-से किन्नर और गन्धर्वोंको जन्म दिया। इरासे समस्त तृण, वृक्ष, लता और झाड़ी आदिकी उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार विश्वाने करोड़ों यक्षों और राक्षसोंको पैदा किया तथा दितिने कश्यपके सम्पर्कसे उनचास मरुतोंको उत्पन्न किया, जो सभी धर्मज्ञ और देवप्रिय थे॥ ३४—४७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे आदिसर्गे कश्यपान्वयो नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके आदिसर्गमें कश्यप-वंश-वर्णन नामक छठा अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६॥
उत्पत्ति
गीताप्रेस, गोरखपुर
J.N.Prasad 1984
भगवान् मत्स्यरुपमें
भगवान् नृसिंह
भगवान् वराह
गीताप्रेस, गोरखपुर
हलाहल विषका पान
गीताप्रेस, गोरखपुर
भगवान् शंकरद्वारा पार्वतीको उपदेश
८- प्रत्येक सर्गके अधिपतियोंका अभिषेचन तथा पृथुका राज्याभिषेक
गीताप्रेस, गोरखपुर
वज्राङ्गको ब्रह्माजीद्वारा वरप्रदान
गीताप्रेस, गोरखपुर
दशावतार
९- मन्वन्तरोंके चौदह देवताओं और सप्तर्षियोंका विवरण
चित्र १
सप्तर्षिगण और पार्वतीजी
(गीताप्रेस, गोरखपुर)
चित्र २
पार्वतीजीकी कठोर तपस्या
(गीताप्रेस, गोरखपुर)
गीताप्रेस, गोरखपुर
भगवान् मत्स्य
| * अध्याय ७ * | ३३ |
|---|
सातवाँ अध्याय
मरुतोंकी उत्पत्तिके प्रसङ्गमें दितिकी तपस्या, मदनद्वादशी-व्रतका वर्णन, कश्यपद्वारा दितिको वरदान, गर्भिणी स्त्रियोंके लिये नियम तथा मरुतोंकी उत्पत्ति
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>दितेः पुत्राः कथं जाता मरुतो देववल्लभाः।<br>देवैर्जग्मुश्च सापत्नैः कस्मात्ते सख्यमुत्तमम्॥ १ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! (दैत्योंकी जननी) दितिके पुत्र उनचास मरुत देवताओंके प्रिय कैसे बन गये? तथा अपने सौतेले भाई देवताओंके साथ उनकी प्रगाढ़ मैत्री कैसे हो गयी?॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>पुरा देवासुरे युद्धे हतेषु हरिणा सुरैः।<br>पुत्रपौत्रेषु शोकार्ता गत्वा भूर्लोकमप्युत्तमम्॥ २<br>स्यमन्तपञ्चके क्षेत्रे सरस्वत्यास्तटे शुभे।<br>भर्तुराराधनपरा तप उग्रं चचार ह॥ ३<br>तदा दितिर्दैत्यमाता ऋषिरूपेण सुव्रत।<br>फलाहारा तपस्तेपे कृच्छ्रं चान्द्रायणादिकम्॥ ४<br>यावद् वर्षशतं साग्रं जराशोकसमाकुला।<br>ततः सा तपसा तप्ता वसिष्ठादीनपृच्छत॥ ५<br>कथयन्तु भवन्तो मे पुत्रशोकविनाशनम्।<br>व्रतं सौभाग्यफलदमिह लोके परत्र च॥ ६<br>ऊचुर्वसिष्ठप्रमुखा मदनद्वादशीव्रतम्।<br>यस्याः प्रभावादभवत् सुतशोकविवर्जिता॥ ७ | **सूतजी कहते हैं—**सुव्रत मुनियो! प्राचीनकालकी बात है, देवासुर-संग्राममें भगवान् विष्णु तथा देवगणोंद्वारा अपने पुत्र-पौत्रोंका संहार हो जानेपर दैत्यमाता दिति शोकसे विह्वल हो गयी। वह उत्तम भूलोकमें जाकर स्यमन्तपञ्चकक्षेत्रमें सरस्वतीके मङ्गलमय तटपर अपने पतिदेव महर्षि कश्यपकी आराधनामें तत्पर रहती हुई घोर तपमें निरत हो गयी। उस समय उसने ऋषियोंके समान फलाहारपर निर्भर रहकर कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि व्रतोंका पालन किया। इस प्रकार बुढ़ापा और शोकसे अत्यन्त आकुल हुई दिति सौ वर्षोंतक उस कठोर तपका अनुष्ठान करती रही। तदनन्तर उस तपस्यासे सन्तप्त हुई दितिन्ने वसिष्ठ आदि महर्षियोंसे पूछा— 'ऋषियो! आप लोग मुझे ऐसा व्रत बतलाइये, जो पुत्र-शोकका विनाशक तथा इहलोक एवं परलोकमें सौभाग्यरूपी फलका प्रदाता हो।' तब वसिष्ठ आदि ऋषियोंने उसे मदनद्वादशी-व्रतका विधान बतलाया, जिसके प्रभावसे वह पुत्रशोकसे उन्मुक्त हो गयी॥ २—७॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>श्रोतुमिच्छामहे सूत मदनद्वादशीव्रतम्।<br>सुतानेकोनपञ्चाशद् येन लेभे दितिः पुनः॥ ८ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! जिसका अनुष्ठान करनेसे दितिको पुनः उनचास पुत्रोंकी प्राप्ति हुई, उस मदन-द्वादशीव्रतके विषयमें हमलोग भी सुनना चाहते हैं॥ ८॥ |
| सूत उवाच<br>यद् वसिष्ठादिभिः पूर्वं दितेः कथितमुत्तमम्।<br>विस्तरेण तदेवेदं मत्सकाशात्रिबोधत॥ ९<br>चैत्रे मासि सिते पक्षे द्वादश्यां नियतव्रतः।<br>स्थापयेदव्रणं कुम्भं सिततण्डुलपूरितम्॥ १०<br>नानाफलयुतं तद्वदिक्षुदण्डसमन्वितम्।<br>सितवस्त्रयुगच्छन्नं सितचन्दनचर्चितम्॥ ११<br>नानाभक्ष्यसमोपेतं सहिरण्यं तु शक्तितः।<br>ताम्रपात्रं गुडोपेतं तस्योपरि निवेशयेत्॥ १२ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पूर्वकालमें वसिष्ठ आदि महर्षियोंने दितिके प्रति जिस उत्तम मदनद्वादशी-व्रतका वर्णन किया था, उसीको आपलोग मुझसे विस्तारपूर्वक सुनिये। व्रतधारीको चाहिये कि वह चैत्रमासमें शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिको श्वेत चावलोंसे परिपूर्ण एवं छिद्ररहित एक घट स्थापित करे। उसपर श्वेत चन्दनका अनुलेप लगा हो तथा वह श्वेत वस्त्रके दो टुकड़ोंसे आच्छादित हो। उसके निकट विभिन्न प्रकारके ऋतुफल और गन्नेके टुकड़े रखे जायें। वह विविध प्रकारकी खाद्य-सामग्रीसे युक्त हो तथा उसमें यथाशक्ति सुवर्ण-खण्ड भी डाला जाय। तत्पश्चात् उसके ऊपर गुड़से भरा हुआ ताँबेका पात्र स्थापित करना चाहिये। |
१०- महाराज पृथुका चरित्र और पृथ्वी-दोहनका वृत्तान्त
३४ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्मादुपरि कामं तु कदलीदलसंस्थितम्।<br>कुर्याच्छर्करयोपेतां रतिं तस्य च वामतः ॥ १३<br>गन्धं धूपं ततो दद्याद् गीतं वाद्यं च कारयेत्।<br>तदभावे कथां कुर्यात् कामकेशवयोनरः ॥ १४<br>कामनाम्नो हरेरर्चां स्नापयेद् गन्धवारिणा।<br>शुक्लपुष्पाक्षततिलैरर्चयेन्मधुसूदनम् ॥ १५<br>कामाय पादौ सम्पूज्य जङ्घे सौभाग्यदाय च।<br>ऊरू स्मरायेति पुनर्मन्मथायेति वै कटिम्॥ १६<br>स्वच्छोदरायेत्युदरमनङ्गायेत्युरो हरेः।<br>मुखं पद्ममुखायेति बाहू पञ्चशराय वै॥ १७<br>नमः सर्वात्मने मौलिमर्चयेदिति केशवम्।<br>ततः प्रभाते तं कुम्भं ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ १८<br>ब्राह्मणान् भोजयेद् भक्त्या स्वयं च लवणादृते।<br>भुक्त्वा तु दक्षिणां दद्यादिमं मन्त्रमुदीरयेत्॥ १९<br>प्रीयतामत्र भगवान् कामरूपी जनार्दनः।<br>हृदये सर्वभूतानां य आनन्दोऽभिधीयते॥ २० | उसके ऊपर केलेके पत्तेपर काम तथा उसके वाम भागमें शक्करसमन्वित रतिकी स्थापना करे। फिर गन्ध, धूप आदि उपचारोंसे उनकी पूजा करे और गीत, वाद्य आदिका भी प्रबन्ध करे। (अर्थाभावके कारण) गीत-वाद्य आदिका प्रबन्ध न हो सकनेपर मनुष्यको कामदेव और भगवान् विष्णुकी कथाका आयोजन करना चाहिये। पुनः कामदेव नामक भगवान् विष्णुकी अर्चना करते समय उन्हें सुगन्धित जलसे स्नान कराना चाहिये। श्वेत पुष्प, अक्षत और तिलोंद्वारा उन मधुसूदनकी विधिवत् पूजा करे। उस समय उन 'विष्णुके पैरोंमें कामदेव, जङ्घाओंमें सौभाग्यदाता, ऊरुओंमें स्मर, कटिभागमें मन्मथ, उदरमें स्वच्छोदर, वक्षःस्थलमें अनङ्ग, मुखमें पद्ममुख, बाहुओंमें पञ्चशर और मस्तकमें सर्वात्माको नमस्कार है'—यों कहकर भगवान् केशवका साङ्गोपाङ्ग पूजन करे। तदनन्तर प्रातःकाल वह घट ब्राह्मणको दान कर दे। पुनः भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भी नमकरहित भोजन करे और ब्राह्मणोंको दक्षिणा देकर इस मन्त्रका उच्चारण करे—'जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित रहकर आनन्द नामसे कहे जाते हैं, वे कामरूपी भगवान् जनार्दन मेरे इस अनुष्ठानसे प्रसन्न हों'॥ ९—२०॥ |
| अनेन विधिना सर्वं मासि मासि व्रतं चरेत्।<br>उपवासी त्रयोदश्यामर्चयेद् विष्णुमव्ययम्॥ २१<br>फलमेकं च सम्प्राश्य द्वादश्यां भूतले स्वपेत्।<br>ततस्त्रयोदशे मासि घृतधेनुसमन्विताम्॥ २२<br>शय्यां दद्यादनङ्गाय सर्वोपस्करसंयुताम्।<br>काञ्चनं कामदेवं च शुक्लां गां च पयस्विनीम्॥ २३<br>वासोभिर्द्विजदाम्पत्यं पूज्यं शक्त्या विभूषणैः।<br>शय्यागन्धादिकं दद्यात् प्रीयतामित्युदीरयेत्॥ २४<br>होमः शुक्लतिलैः कार्यः कामनामानि कीर्तयेत्।<br>गव्येन हविषा तद्वत् पायसेन च धर्मवित्॥ २५<br>विप्रेभ्यो भोजनं दद्याद् वित्तशाठ्यं विवर्जयेत्।<br>इक्षुदण्डानथो दद्यात् पुष्पमालाश्च शक्तितः ॥ २६ | इसी विधिसे प्रत्येक मासमें मदनद्वादशीव्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। व्रतीको चाहिये कि वह द्वादशीके दिन एक फल खाकर भूतलपर शयन करे और त्रयोदशीके दिन अविनाशी भगवान् विष्णुका पूजन करे। तेरहवाँ महीना आनेपर घृतधेनुसहित एवं समस्त सामग्रियोंसे सम्पन्न शय्या, कामदेवकी स्वर्ण-निर्मित प्रतिमा और श्वेत रंगकी दुधारू गौ अनङ्ग (कामदेव)-को समर्पित करे (अर्थात् अनङ्गके उद्देश्यसे ब्राह्मणको दान दे)। उस समय शक्तिके अनुसार वस्त्र एवं आभूषण आदिद्वारा सपत्नीक ब्राह्मणकी पूजा करके उन्हें शय्या और सुगन्ध आदि प्रदान करते हुए ऐसा कहना चाहिये कि 'आप प्रसन्न हों।' तत्पश्चात् उस धर्मज्ञ व्रतीको गोदुग्धसे बनी हुई हवि, खीर और श्वेत तिलोंसे कामदेवके नामोंका कीर्तन करते हुए हवन करना चाहिये। पुनः कृपणता छोड़कर ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये और उन्हें यथाशक्ति गन्ना और पुष्पमाला प्रदानकर संतुष्ट करना चाहिये। |
| * अध्याय ७ * | ३५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यः कुर्याद् विधिनानेन मदनद्वादशीमिमाम्।<br>स सर्वपापनिर्मुक्तः प्राप्नोति हरिसाम्यताम्॥ २७<br><br>इह लोके वरान् पुत्रान् सौभाग्यफलमश्नुते।<br>यः स्मरः संस्मृतो विष्णुरानन्दात्मा महेश्वरः॥ २८<br><br>सुखार्थी कामरूपेण स्मरेदङ्गेशमीश्वरम्।<br>एतच्छ्रुत्वा चकारासौ दितिः सर्वमशेषतः॥ २९ | जो इस विधिके अनुसार इस मदनद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर भगवान् विष्णुकी समताको प्राप्त हो जाता है तथा इस लोकमें श्रेष्ठ पुत्रोंको प्राप्तकर सौभाग्य-फलका उपभोग करता है। जो स्मर, आनन्दात्मा, विष्णु और महेश्वरनामसे कहे गये हैं, उन्हीं अङ्गेश भगवान् विष्णुका सुखार्थीको स्मरण करना चाहिये। यह सुनकर दितिने सारा कार्य यथावत्-रूपसे सम्पन्न किया (अर्थात् मदनद्वादशीव्रतका अनुष्ठान किया)॥ २१—२९॥ |
| कश्यपो व्रतमाहात्म्यादागत्य परया मुदा।<br>चकार कर्कशां भूयो रूपयौवनशालिनीम्॥ ३०<br><br>वरेणच्छन्दयामास सा तु वव्रे ततो वरम्।<br>पुत्रं शक्रवधार्थाय समर्थममितौजसम्॥ ३१<br><br>वरयामि महात्मानं सर्वामरनिषूदनम्।<br>उवाच कश्यपो वाक्यमिन्द्रहन्तारमूर्जितम्॥ ३२<br><br>प्रदास्याम्यहमेवेह किंत्वेतत् क्रियतां शुभे।<br>आपस्तम्बः करोत्विष्टिं पुत्रीयामद्य सुव्रते॥ ३३<br><br>विधास्यामि ततो गर्भमिन्द्रशत्रुनिषूदनम्।<br>आपस्तम्बस्ततश्चक्रे पुत्रेष्टिं द्रविणाधिकाम्॥ ३४<br><br>इन्द्रशत्रुर्भवस्वेति जुहाव च सविस्तरम्।<br>देवा मुमुदिरे दैत्या विमुखाः स्युश्च दानवाः॥ ३५ | दितिके उस व्रतानुष्ठानके प्रभावसे प्रभावित होकर महर्षि कश्यप उसके निकट पधारे और परम प्रसन्नता-पूर्वक उन्होंने उसे पुनः रूप-यौवनसे सम्पन्न नवयुवती बना दिया तथा वर माँगनेको कहा। तब वर माँगनेके लिये उद्यत हुई दितिने कहा—'पतिदेव! मैं आपसे एक ऐसे पुत्रका वरदान चाहती हूँ, जो इन्द्रका वध करनेमें समर्थ, अमित पराक्रमी, महान् आत्मबलसे सम्पन्न और समस्त देवताओंका विनाशक हो।' यह सुनकर महर्षि कश्यपने उससे ऐसी बात कही—'शुभे! मैं तुम्हें अत्यन्त ऊर्जस्वी एवं इन्द्रका वध करनेवाला पुत्र प्रदान करूँगा, किंतु इस विषयमें तुम यह काम करो कि आपस्तम्ब ऋषिसे प्रार्थना करके उनके द्वारा आज ही पुत्रेष्टि-यज्ञका अनुष्ठान कराओ। सुव्रते! यज्ञकी समाप्ति होनेपर मैं (तुम्हारे उदरमें) इन्द्ररूपी शत्रुके विनाशक पुत्रका गर्भाधान करूँगा।' तत्पश्चात् महर्षि आपस्तम्बने उस अत्यन्त खर्चीले पुत्रेष्टि-यज्ञका अनुष्ठान किया। उस समय उन्होंने 'इन्द्रशत्रुर्भवस्व—इन्द्रका शत्रु उत्पन्न हो'—इस मन्त्रसे विस्तारपूर्वक अग्निमें आहुति दी। (इस यज्ञसे देवताओंको रुष्ट होना चाहता था, परंतु) वे यह जानकर प्रसन्न हुए कि दैत्यों और दानवोंको इस यज्ञफलसे विमुख होना पड़ेगा॥ ३०—३५॥ |
| दित्यां गर्भमथाधत्त कश्यपः प्राह तां पुनः।<br>त्वया यत्नो विधातव्यो ह्यस्मिन् गर्भे वरानने॥ ३६<br><br>संवत्सरशतं त्वेकमस्मिन्नेव तपोवने।<br>संध्यायां नैव भोक्तव्यं गर्भिण्या वरवर्णिनि॥ ३७<br><br>न स्थातव्यं न गन्तव्यं वृक्षमूलेषु सर्वदा।<br>नोपस्करेषूपविशेन्मुसलोलूखलादिषु ॥ ३८<br><br>जले च नावगाहेत शून्यागारं च वर्जयेत्।<br>वल्मीकायां न तिष्ठेत न चोद्विग्नमना भवेत्॥ ३९<br><br>विलिखेन्न नखैर्भूमिं नाङ्गारेण न भस्मना।<br>न शयालुः सदा तिष्ठेद् व्यायामं च विवर्जयेत्॥ ४०<br><br>न तुषाङ्गारभस्मास्थिकपालेषु समाविशेत्।<br>वर्जयेत् कलहं लोकैर्गात्रभङ्गं तथैव च॥ ४१ | (यज्ञकी समाप्तिके बाद) कश्यपने दितिके उदरमें गर्भाधान किया और पुनः उससे कहा—'वरानने! एक सौ वर्षोंतक तुम्हें इसी तपोवनमें रहना है और इस गर्भकी रक्षाके लिये प्रयत्न करना है। वरवर्णिनि! गर्भिणी स्त्रीको संध्याकालमें भोजन नहीं करना चाहिये। उसे न तो कभी वृक्षके मूलपर बैठना चाहिये, न उसके निकट ही जाना चाहिये। वह घरकी सामग्री मूसल, ओखली आदिपर न बैठे, जलमें घुसकर स्नान न करे, सुनसान घरमें न जाय, बिमवटपर न बैठे, मनको उद्विग्न न करे, नखसे, लुआठीसे अथवा राखसे पृथ्वीपर रेखा न खींचे, सदा नींदमें अलसायी हुई न रहे, कठिन परिश्रमका काम न करे, भूसी, लुआठी, भस्म, हड्डी और खोपड़ीपर न बैठे, लोगोंके साथ वाद-विवाद न करे |
| ३६ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत (श्लोक) | हिन्दी अनुवाद |
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| न मुक्तकेशा तिष्ठेत नाशुचिः स्यात् कदाचन।<br>न शयीतोत्तरशिरा न चापरेशिराः क्वचित् ॥ ४२<br>न वस्त्रहीना नोद्विग्ना न चार्द्रचरणा सती।<br>नामङ्गल्यां वदेद् वाचं न च हास्याधिका भवेत् ॥ ४३<br>कुर्यात्तु गुरुशुश्रूषां नित्यं माङ्गल्यतत्परा।<br>सर्वौषधीभिः कोष्णेन वारिणा स्नानमाचरेत् ॥ ४४<br>कृतरक्षा सुभूषा च वास्तुपूजनतत्परा।<br>तिष्ठेत् प्रसन्नवदना भर्तुः प्रियहिते रता ॥ ४५<br>दानशीला तृतीयायां पार्वण्यं नक्तमाचरेत्।<br>इतिवृत्ता भवेन्नारी विशेषेण तु गर्भिणी ॥ ४६<br>यस्तु तस्या भवेत् पुत्रः शीलायुर्वृद्धिसंयुतः।<br>अन्यथा गर्भपतनमवाप्नोति न संशयः ॥ ४७<br>तस्मात्त्वमनया वृत्त्या गर्भेऽस्मिन् यत्नमाचर।<br>स्वस्त्यस्तु ते गमिष्यामि तथेत्युक्तस्तया पुनः ॥ ४८<br>पश्यतां सर्वभूतानां तत्रैवान्तरधीयत।<br>ततः सा कश्यपोक्तेन विधिना समतिष्ठत ॥ ४९ | और शरीरको तोड़े-मरोड़े नहीं। वह बाल खोलकर न बैठे, कभी अपवित्र न रहे, उत्तर दिशामें सिरहाना करके एवं कहीं भी नीचे सिर करके न सोये, न नंगी होकर, न उद्विग्नचित्त होकर एवं न भीगे चरणोंसे ही कभी शयन करे, अमङ्गलसूचक वाणी न बोले, अधिक जोरसे हँसे नहीं, नित्य माङ्गलिक कार्योंमें तत्पर रहकर गुरुजनोंकी सेवा करे और (आयुर्वेदद्वारा गर्भिणीके स्वास्थ्यके लिये उपयुक्त बतलायी गयी) सम्पूर्ण ओषधियोंसे युक्त गुनगुने गरम जलसे स्नान करे। वह अपनी रक्षाका ध्यान रखे, स्वच्छ वेष-भूषासे युक्त रहे, वास्तु-पूजनमें तत्पर रहे, प्रसन्नमुखी होकर सदा पतिके हितमें संलग्न रहे, तृतीया तिथिको दान करे, पर्व-सम्बन्धी व्रत एवं नक्तव्रतका पालन करे। जो गर्भिणी स्त्री विशेषरूपसे इन नियमोंका पालन करती है, उसका उस गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न होता है, वह शीलवान् एवं दीर्घायु होता है। इन नियमोंका पालन न करनेपर निस्संदेह गर्भपातकी आशङ्का बनी रहती है। प्रिये! इसलिये तुम इन नियमोंका पालन करके इस गर्भकी रक्षाका प्रयत्न करो। तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं जा रहा हूँ।' दितिके द्वारा पतिकी आज्ञा स्वीकार कर लेनेपर महर्षि कश्यप वहीं सभी जीवोंके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये। तब दिति महर्षि कश्यपद्वारा बताये गये नियमोंका पालन करती हुई समय व्यतीत करने लगी॥ ३६–४९॥ |
| अथ भीतस्तथेन्द्रोऽपि दितेः पार्श्वमुपागतः।<br>विहाय देवसदनं तच्छुश्रूषुरवस्थितः ॥ ५०<br>दितिश्छिद्रान्तरप्रेप्सुरभवत् पाकशासनः।<br>विनीतोऽभवद्व्यग्रः प्रशान्तवदनो बहिः ॥ ५१<br>अजानन् किल तत्कार्यमात्मनः शुभमाचरन्।<br>ततो वर्षशतान्ते सा न्यूने तु दिवसैस्त्रिभिः ॥ ५२<br>मेने कृतार्थमात्मानं प्रीत्या विस्मितमानसा।<br>अकृत्वा पादयोः शौचं प्रसुप्ता मुक्तमूर्धजा ॥ ५३<br>निद्राभरसमाक्रान्ता दिवापरशिराः क्वचित्।<br>ततस्तदन्तरं लब्ध्वा प्रविष्टस्तु शचीपतिः ॥ ५४<br>वज्रेण सप्तधा चक्रे तं गर्भं त्रिदशाधिपः।<br>ततः सप्तैव ते जाताः कुमाराः सूर्यवर्चसः ॥ ५५<br>रुदन्तः सप्त ते बाला निषिद्धा गिरिदारिणा।<br>भूयोऽपि रुदतश्चैतानेकैकं सप्तधा हरिः ॥ ५६ | (इस कार्यकलापकी सूचना पानेपर) इन्द्र भयभीत हो उठे और तुरन्त देवलोकको छोड़कर दितिके निकट आ पहुँचे। वे दितिकी सेवा करनेकी इच्छासे उसके समीप ही रहने लगे। इन्द्र सदा दितिके छिद्रान्वेषणमें ही लगे रहे। ऊपरसे तो वे विनम्र, प्रशान्त और प्रसन्न मुखवाले दीखते थे, परंतु भीतरसे वे दितिके कार्योंकी कुछ परवाह न करके सदा अपने ही हित-साधनमें दत्तचित्त रहते थे। इस प्रकार सौ वर्षोंकी समाप्तिमें जब तीन दिन शेष रह गये, तब दिति प्रसन्नतापूर्वक अपनेको सफलमनोरथ मानने लगी। उस समय आश्चर्यसे युक्त मनवाली दिति नींदके आलस्यसे आक्रान्त होकर पैरोंको बिना धोये बाल खोलकर सिरको नीचे किये कहीं दिनमें ही सो गयी। तब दितिकी उस त्रुटिको पाकर शचीके प्राणपति देवराज इन्द्र उसके उदरमें प्रवेश कर गये और अपने वज्रसे उस गर्भके सात टुकड़े कर दिये। उन टुकड़ोंसे सूर्यके समान तेजस्वी सात शिशु उत्पन्न हो गये। वे रोने लगे। रोते हुए उन सातों शिशुओंको |
११- सूर्यवंश और चन्द्रवंशका वर्णन तथा इलाका वृत्तान्त
| * अध्याय ८ * | ३७ |
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| चिच्छेद वृत्रहन्ता वै पुनस्तदुदरे स्थितः।<br>एवमेकोनपञ्चाशद् भूत्वा ते रुरुदुर्भृशम्॥ ५७<br>इन्द्रो निवारयामास मा रोदिष्टः पुनः पुनः।<br>ततः स चिन्तयामास किमेतदिति वृत्रहा॥ ५८<br>धर्मस्य कस्य माहात्म्यात् पुनः सञ्जीवितास्त्वमी।<br>विदित्वा ध्यानयोगेन मदनद्वादशीफलम्॥ ५९<br>नूनमेतत् परिणतमधुना कृष्णपूजनात्।<br>वज्रेणापि हताः सन्तो न विनाशमवाप्नुयुः॥ ६०<br>एकोऽप्यनेकतामाप यस्मादुदरगोऽप्यलम्।<br>अवध्या नूनमेते वै तस्माद् देवा भवन्त्विति॥ ६१<br>यस्मान्मा रुदतेत्युक्ता रुदन्तो गर्भसंस्थिताः।<br>मरुतो नाम ते नाम्ना भवन्तु मखभागिनः॥ ६२<br>ततः प्रसाद्य देवेशः क्षमस्वेति दितिं पुनः।<br>अर्थशास्त्रं समास्थाय मयैतद् दुष्कृतं कृतम्॥ ६३<br>कृत्वा मरुद्गणं देवैः समानममराधिपः।<br>दितिं विमानमारोप्य ससुतामनयद् दिवम्॥ ६४<br>यज्ञभागभुजो जाता मरुतस्ते ततो द्विजाः।<br>न जग्मुरैक्यमसुरैरतस्ते सुरवल्लभाः॥ ६५ | इन्द्रने मना किया, (परंतु जब वे चुप नहीं हुए, तब) इन्द्रने पुनः उन रोते हुए शिशुओंमें प्रत्येकके सात-सात टुकड़े कर दिये। उस समय भी इन्द्र दितिके उदरमें ही स्थित थे। इस प्रकार वे टुकड़े उनचास शिशुओंके रूपमें परिवर्तित होकर जोर-जोरसे रुदन करने लगे। इन्द्र उन्हें बारम्बार मना करते हुए कह रहे थे कि ‘मत रोओ।’ (परंतु वे जब चुप नहीं हुए, तब) इन्द्रने मनमें विचार किया कि इसका क्या रहस्य है? किस धर्मके माहात्म्यसे ये सभी (मेरे वज्रद्वारा काटे जानेपर भी) पुनः जीवित हैं? तत्पश्चात् ध्यानयोगके द्वारा इन्द्रको ज्ञात हो गया कि यह मदनद्वादशीव्रतका फल है। अवश्य ही श्रीकृष्णके पूजनके प्रभावसे इस समय यह घटना घटी है, जो वज्रद्वारा मारे जानेपर भी ये शिशु विनाशको नहीं प्राप्त हुए। इसी कारण उदरमें स्थित रहते हुए एकसे अनेक (उनचास) हो गये। इसलिये अवश्य ही ये अवध्य हैं और (मेरी इच्छा है कि ये) देवता हो जायँ। चूँकि गर्भमें स्थित रहकर रोते हुए इनको मैंने ‘मा रुदत’—मत रोओ—ऐसा कहा है, इसलिये ये ‘मरुत्’ नामसे प्रसिद्ध होंगे और इन्हें भी यज्ञोंमें भाग मिलेगा। ऐसा कहकर इन्द्र दितिके उदरसे बाहर निकल आये और दितिको प्रसन्न करके उससे क्षमा-याचना करने लगे—‘देवि! अर्थशास्त्रका आश्रय लेकर मैंने यह दुष्कर्म कर डाला है, मुझे क्षमा करो।’ इस प्रकार देवराजने मरुद्गणको देवताओंके समान बनाया और पुत्रोंसमेत दितिको विमानमें बैठाकर वे अपने साथ स्वर्गलोकको ले गये। विप्रवरो! इसी कारण मरुद्गण यज्ञोंमें भाग पानेके अधिकारी हुए। उन्होंने असुरोंके साथ एकता नहीं की; इसलिये वे देवताओंके प्रेमपात्र हो गये॥ ५०—६५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे आदिसर्गे मरुदुत्पत्तौ मदनद्वादशीव्रतं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणेके आदिसर्गमें मरुद्गणकी उत्पत्तिके प्रसङ्गमें मदनद्वादशीव्रत-वर्णन नामक सातवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥
आठवाँ अध्याय
प्रत्येक सर्गके अधिपतियोंका अभिषेचन तथा पृथुका राज्याभिषेक
| ऋषय ऊचुः<br>आदिसर्गश्च यः सूत कथितो विस्तरेण तु।<br>प्रतिसर्गे च ये येषामधिपास्तान् वदस्व नः॥ १ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! आपने हम लोगोंके प्रति जिस आदिसर्ग और प्रतिसर्गका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है, उन सर्गोंमें जो जिस वर्गके अधिपति हुए, उनके विषयमें अब हमें बतलाइये॥ १॥ |
३८ * मत्स्यपुराण *
| सूत उवाच<br>यदाभिषिक्तः सकलह्याधिराज्ये<br>पृथुर्धरित्र्यामधिपो बभूव।<br>तदौषधीनामधिपं चकार<br>यज्ञव्रतानां तपसां च चन्द्रम्॥ २<br>नक्षत्रताराद्विजवृक्षगुल्म-<br>लतावितानस्य च रुक्मगर्भः।<br>अपामधीशं वरुणं धनानां<br>राज्ञां प्रभुं वैश्रवणं च तद्वत्॥ ३<br>विष्णुं रवीणामधिपं वसूना-<br>मग्निं च लोकाधिपतिश्चकार।<br>प्रजापतीनामधिपं च दक्षं<br>चकार शक्रं मरुतामधीशम्॥ ४<br>दैत्याधिपानामथ दानवानां<br>प्रह्लादमीशं च यमं पितॄणाम्।<br>पिशाचरक्षःपशुभूतयक्ष-<br>वेतालराजं त्वथ शूलपाणिम्॥ ५<br>प्रालेयशैलं च पतिं गिरिणा-<br>मीशं समुद्रं ससरिन्नदानाम्।<br>गन्धर्वविद्याधरकिन्नराणा-<br>मीशं पुनश्चित्ररथं चकार॥ ६<br>नागाधिपं वासुकिमुग्रवीर्यं<br>सर्पाधिपं तक्षकमादिदेश।<br>दिशां गजानामधिपं चकार<br>गजेन्द्रमैरावतं¹ नामधेयम्॥ ७<br>सुपर्णमीशं पततामथाश्व-<br>राजानमुच्चैःश्रवसं चकार।<br>सिंहं मृगाणां वृषभं गवां च<br>प्लक्षं पुनः सर्ववनस्पतीनाम्॥ ८<br>पितामहः पूर्वमथाभ्यषिञ्च-<br>च्चैतान्पुनः सर्वदिशाधिनाथान्।<br>पूर्वेण दिक्पालमथाभ्यषिञ्च-<br>न्नाम्नासुधर्माणमरातिकेतुम् ॥ ९<br>ततोऽधिपं दक्षिणतश्चकार<br>सर्वेश्वरं शङ्खपदाभिधानम्।<br>सुकेतुमन्तं दिशि पश्चिमायां<br>चकार पश्चाद् भुवनाण्डगर्भः॥ १०॥ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! जब महाराज पृथु समस्त भूमण्डलके अधिनायक-पदपर अभिषिक्त होकर सबके अधिपति हुए, उस समय उन हिरण्यगर्भ ब्रह्माने चन्द्रमाको ओषधि, यज्ञ, व्रत, तप, नक्षत्र, तारा, द्विज, वृक्ष, गुल्म और लतासमूहका अध्यक्ष बनाया। उन्होंने वरुणको जलका, कुबेरको धन और राजाओंका,² विष्णुको आदित्योंका, अग्निको वसुओंका अधिपति बनाया। दक्षको प्रजापतियोंका, इन्द्रको मरुतोंका, प्रह्लादको दैत्यों और दानवोंका, यमराजको पितरोंका, शूलपाणि शिवको पिशाच, राक्षस, पशु, भूत, यक्ष और वेतालोंका, हिमालयको पर्वतोंका, समुद्रको छोटी-बड़ी नदियोंका, चित्ररथको गन्धर्व, विद्याधर और किन्नरोंका, प्रबल पराक्रमी वासुकिको नागोंका, तक्षकको, सर्पोंका, ऐरावत नामक गजेन्द्रको दिग्गजोंका, गरुड़को पक्षियोंका, उच्चैःश्रवाको घोड़ोंका, सिंहको वन्य जीवोंका, वृषभको गौओंका और पाकड़को समस्त वनस्पतियोंका अधिनायक नियुक्त किया। फिर ब्रह्माने सर्गारम्भके समय सम्पूर्ण दिशाओंके अधिनायकोंको भी अभिषिक्त किया। उन्होंने शत्रुओंके संहारक सुधर्माको पूर्व दिशाके दिक्पाल-पदपर स्थापित किया। इसके बाद सर्वेश्वर शङ्खपदको दक्षिण दिशाका स्वामी बनाया। सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको अपनेमें अन्तर्भूत करनेवाले ब्रह्माने सुकेतुमान्को पश्चिम दिशाका अध्यक्ष बनाया॥ २—१०॥ |
१. पाठान्तर — ऐरावण । २. इसीलिये वेदादिमें कुबेरको 'राजाधिराज वैश्रवण' कहा गया है।