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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

by महर्षि यास्क मुनि

DevanagariHindipublished1,282 pages
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११६ अ० १ पा० ४ ख० ४ इसके अतिरिक्त यह भी है कि—केवल निरुक्त ही में रूढि शब्दोंको प्रतीतक्रिय.बनानेका अभ्यास नहीं किन्तु व्याकरणमें भी कुछ ऐसे शब्द कृदन्त आदि स्थलमें साधन किये गये हैं, जैसे— व्रतति, दमूनाः, जाट्यः, आटणारः जागरूकः, दर्विहोमी । व्रतति नाम वल्ली या लता । दमूनाः, दममनाः या दमनशील । जाट्य अटावान् । आटणार अटनशील । जागरूक जागरणशील । दर्वि- होमी दर्वी या चाटूसे होम करनेवाला । इसी प्रकारसे रूढि शब्द प्रतीतार्थ भी हो जाते हैं, यह शाकटायनका अभिप्राय है। इससे “सब नाम आख्यातज नहीं” यह पक्ष अयुक्त है। ५म प्रतिसमाधान—शब्दके प्रयोगके अनन्तर उसके धातु आदिके विचारका प्रश्न भी ठीक नहीं है, क्योंकि—सिद्ध पदके उच्चारणमें ही योग या शास्त्रके लक्षणकी परीक्षा होती है। क्योंकि-लक्षणके सामने जबतक लक्ष्य न हो कैसे उसकी परीक्षा हो सकती है। भाव यह है कि--जो लक्षण, शब्दोंको देखकर बने है, वे उनके होने पर ही अपना काम करेंगे, शब्दके व्याहरणसे पहिले उनका कोई व्यापार नहीं होता । जोकि-यह प्रश्न है कि—“यदि प्रथनसे ‘पृथिवी’ है तो इसे किसने प्रथन किया और किस आधार पर स्थित होकर ?” हम इसका यही उत्तर देते हैं, किसीने इसका प्रथन किया है, इससे यह पृथिवी है । दूसरा यह प्रश्न कि—“जब यह प्रथित नहीं थी, तो यह पृथिवी कैसे हुई ?” यद्यपि किसीने भी इसका प्रथन नहीं किया, किन्तु देखनेमे यह फैली हुई है, इसीसे यह पृथिवी है। तीसरा यह प्रश्न कि– किसने इसका प्रथन किया और किस आधार पर स्थित होकर ? यह भी ठीक नहीं, क्योंकि-अन्य प्रकारसे धातुका अर्थ संघटित नहीं होता, हम वैसाही निर्वचन करेंगे जैसे

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विरोध न हो । इससे शाकटायनका अभिप्राय अविरुद्ध है यह सिद्ध हुआ । यदि पृथिवीके पृथुत्वको प्रत्यक्ष होने पर हमारा उपालम्भ किया जाता है, तो इसमें मेरा ही उपालम्भ नहीं बल्कि—सम्पूर्ण प्रत्यक्षवादोकी ही निन्दा हो जाती है । गार्ग्य मुनि प्रत्यक्षमें भी दोषारोप करते हैं, इस लिये यह अयुक्त है क्योंकि—इससे प्रत्यक्ष- की हानि है जोकि—सर्वथा अनिष्ट है अतः पृथुत्वके प्रत्यक्ष दर्शन से 'पृथिवी' कही जाती है यह ठीक है । ६ठा प्रतिसमाधान । अन्य पदोंके खण्डो (टुकड़ों) को लेकर अन्य पदोंकी व्युत्पत्ति आदिका आक्षेप भी ठीक नहीं है, क्योंकि— जो पुरुष अनन्वित अर्थमें असम्बद्ध संस्कारसे शब्दोंका संस्कार करता है, वही पुरुष निन्दनीय है किन्तु शाकटायन आचार्य ऐसा नही करते, बल्कि—एक अभिधान (नाम) में जितने अर्थ होते है, उनके अनुकूल अनेक धातुओसे एक एक नामका संस्कार करते हैं, किन्तु मूढतासे नहीं । इस लिये गार्ग्य मुनिने जो शाकटायन की निन्दा की है वह उनके अभिप्रायको न समझकर की है। यह भी उनको जानना चाहिये था कि—कोई पुरुष अशिक्षित होनेके कारण एक धातुसे होनेवाले नामको भी नहीं जान सकता, बहुत धातुओंसे होनेवालेका जानना तो उसके लिये असंभव ही है । अपिच लोकमे ऐसे भी पुरुष हैं, जो 'कारक', 'हारक' आदि स्पष्टक्रिय शब्दोको भी नहीं जान सकते कि—ये किन धातुओंसे बने हुए हे किन्तु यह पुरुषका दोष है, शास्त्रका नहीं, जाकि—वह शब्दोंको अर्थके पीछे नहीं चला सकता । शाकटायनने 'सत्य' शब्दकी भी व्याख्या ठीक ही की है, वह 'सत् अर्थको ही प्रतीत कराता है।' इससे शाकटायनमत युक्त है। गार्ग्य मुनि जिन रूढि शब्दोंको अधातुज मानते हैं, यह भी

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११८ अ० १ पा० ४ ख० ४ । ठीक नहीं है। क्योंकि—रूढि शब्दोंकी व्युत्पत्ति तथा कहीं एक धातु और कहीं अनेक धातुओंसे एक नामकी व्युत्पत्ति मन्त्र और ब्राह्मणमें देखी जाती है जोकि—हमारे सबसे बड़े या पूजनीय प्रमाण हैं। जैसे—“सर्पिः” शब्दकी व्युत्पत्ति “यदसर्पत् १ तत्सपिः” इस मन्त्रमें और “नवनीत” शब्दकी व्युत्पत्ति २ “यन्नवनीतमभवन्” इस मन्त्रमें की है। इसी प्रकार ब्राह्मणमें ‘हृदय’ शब्दकी व्युत्पत्ति तीन धातुओंसे की है। ‘हृ’ हृञ् हरणे (हरति) धातु, ‘द’ अक्षर डुदाञ् दानेके ‘ददति’ रूपसे, तथा ‘य’ अक्षर इण् गतौके इकारके स्थानमें यकार आदेश करके लिया है। यही नहीं किया, बल्कि—इन तीनों अक्षरोंकी उत्पत्तिको जानने वालेके लिये तीन फल भी बताये हैं। तदेतत् त्र्यक्षरं हृदयमिति, हृ इत्येक- मक्षरं † मभिहरन्त्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद, द इत्येकमक्षरं ददत्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद, यमित्येकमक्षरमेति स्वर्गं लोके य एवं वेद। (श० ब्रा० १४,८,४,१) ७म प्रतिसमाधान। “पूर्वकालीन नामकी व्युत्पत्ति अपर कालीन क्रियासे होना अयुक्त है” यह आक्षेप भी मानने योग्य नहीं है। १—जो किसी द्रव्यपर पडते ही फैल जाता है। १—जो भोजनमे नवीन निकाला हुआ हो उपयुक्त होता है। सर्पि और नवनीत यह दोनों नाम घृतके ही हैं। दूसरा मन्त्र भी सर्पि नामकी व्युत्पत्तिके लिये हो सकता है। † हृदय नाममे ‘हृ’ अक्षर इस लिये है कि—जो कुछ प्राणी नाना पदार्थों को हरण करते हैं, वह इस हृदयके लिये ही करते हैं, जो देते हैं वह इसीके तावार्थ देते हैं इसलिये (द) अक्षर है, और हृदय या अन्तःकरण ही स्वर्गको जाता है क्योंकि—विभु आत्माका गमन संभव नहीं इसलिये यकार अक्षर है। (ऐसा अर्थ भी प्रतीत होता है)

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हिन्दी निरुक्त । ११६ क्योंकि-हम देखते हैं कि-पूर्वोत्पन्न द्रव्योंका नाम अपर कालीन क्रियाओंसे होता भी है और द्रव्योंका नहीं भी होता । जैसे कि—“बिल्वादः” यह नाम सत्वकी भाविनी विल्वभक्षण क्रिया की कल्पना करके भी हो जाता है । तथा पश्चात् कालमें होनेवाली चूड़ालम्बन क्रियासे भी किसी सत्वका “लम्बचूडक” यह नाम पड़ जाता है । “बिल्व” शब्द भरण अथवा भेदन क्रियासे होता है । क्यो- कि—उसमें बीज भरे रहते हैं, तथा दुर्भिक्ष आदिके समय खानेवाले- का भरण (पालन) करता है । अथवा खानेके लिये वह अवश्य भेदन किया (फोड़ा) जाता है । यहां ऐसी आपत्ति भी उठाई जा सकती है कि—अति मधुर जैसा पूर्व-उत्तर पक्षोंकी रचनापूर्वक नामके आख्यातजत्वको लेकर किस लिये यह व्याख्यान किया है ? यह विस्तृत व्याख्यान शिष्योकी बुद्धिके वर्द्धनार्थ किया गया है, जिससे कि --वे व्युत्पन्नबुद्धि होकर अप्रतिबन्ध (बेरोक टोक) से सब ओर चलनेवाले लौकिक तथा वैदिक शब्दोंका निर्वचन कर सकें । किन्तु यह प्रयोजन नहीं कि—“कोई व्याकरण तथा निरुक्त अप्रमाण है”, बल्कि वेदाङ्ग होनेसे सभी प्रमाण हैं । कोई यह नही कह सकता कि—उन्हींका फल साधु है, औरोंका नहीं । भाव यह है कि-गार्ग्य व शाकटायन आदि सभी आचा- योंके विचार युक्तिसम्पन्न और प्रमाण हैं । वक्ता व श्रोताकी बुद्धि वा इच्छाके विशेषसे एक पक्षकी गौणता और दूसरेकी मुख्यता प्रतीत होने लगती है । वास्तवमे सभी युक्तियां माननीय हैं । समाप्तश्चतुर्थः पादः ।

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अ० १ पा० ५ खं० १ । पञ्चमः पादः । ( १ खं० ) अथापि इदमन्तरेण मन्त्रेष्वर्थप्रत्ययो न विद्यते । अर्थमप्रतियतो न अत्यन्तं स्वरसंस्का- रोद्देशः । तदिदं विद्यास्थानं, व्याकरणस्य कार्त्स्न्यं स्वार्थसाधकं च । यदि मन्त्रार्थप्रत्ययाय, अन- र्थकं भवति,—इति कौत्सः । अनर्थका हि मन्त्राः, तदेतेन उपेक्षितव्यम् । नियतवाचो युक्तयो निय- तानुपूर्व्या भवन्ति । अथापि ब्राह्मणेन रूपसम्पन्ना विधीयन्ते । “उरु प्रथस्व” इति प्रथयति । “प्रोहाणि”-इति “प्रोहति ।” अथापि अनुपप- न्नार्था भवन्ति । “ओषधे त्रायस्वैनम्” “स्वधिते मैनं हिंसीः” इत्याह हिंसन् । अथापि विप्रति- षिद्धार्था भवन्ति । “एक एव रुद्रोऽवतस्थे न द्वितीयः ।” “असंख्याता सहस्राणि ये रुद्रा अधि- भूम्याम्” । “अशत्रुरिन्द्र जज्ञिषे” “शतं सेना अजयत् साकमिन्द्रः” इति । अथापि जानन्तं सम्प्रेष्यति—‘ अग्नये समिध्यमानायानुब्रूहि”-इति । अथापि आह “अदितिः सर्वम्” इति । “अदिति-

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हिन्दी निरुक्तः । १२१. द्यौरदितिरन्तरिक्षम्” इति । तदुपरिष्टाद् व्याख्या- स्यामः । अथापि अविस्पष्टार्था भवन्ति । अम्यक्, यादृश्मिसम्, जारयायि काणुकाः इति ॥ अर्थवन्तः शब्दसामान्यात् । “एतद्वै यज्ञस्य समृद्धं यद्रूपसमृद्धं यत्कर्म क्रियमाणम्-ऋग् यजुर्वा- अभिवदति” इति च ब्राह्मणम् ॥ १ ॥ • ( ख० २ ) “क्रीलन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिः”-इति । यथो एतत् ‘नियत वाचोयुक्तयो नियतानुपूर्व्या भवन्तिः-इति । लौकिकेष्वपि एतत् । यथा ‘इन्द्राग्नी’ ‘पितापुत्रौ’- इति । यथो एतत् -‘ब्राह्मणेन रूपसम्पन्ना विधी- यन्ते’-इति । उदितानुवादः स भवति । यथो एतत्-‘अनुपपन्नार्था भवन्ति’-इति । आम्नायवच- नात्-अहिंसा प्रतीयेत । यथो एतत्-विप्रतिषि- द्धार्था भवन्ति’ इति । लौकिकेष्वयि एतत् । यथा- ‘असपत्नोऽयं ब्राह्मणः’ अनमित्रो राजा’ ,इति । यथो एतत्—‘जानन्तं संप्रैष्यतिः इति । जानन्त- मभिवादयते । जानते मधुपर्कं प्राह । यथो एतत् ‘अदिति सर्वम्’-इति । लौकिकेष्वपि एतत् यथा- १६

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३२२ अ० १ पा० ५ ख० १ । 'सुवरचा अनुष्मात्राः पानीयम्'- इति । यथौ एतत्-अविस्पष्टार्था भवन्ति' इति । नैष स्थाणोरप- राधः, यदेन मन्धो न पश्यति, पुरुषापराधः स भवति । यथा जानपदीषु विद्यातः पुरुषविशेषो भवति, पारो वर्यवित्सु तु खलु वेदितृषु भूयोविद्यः प्रशस्यो भवति ॥ २ ॥ इति प्रथमाध्यायस्य पञ्चमः पादः ॥ १, ५ ॥ पञ्चमः पादः । निरुक्तका प्रयोजनान्तर । ( व्याकरण और निरुक्त ) इस प्रकारसे आरम्भसे चतुर्थपाद-पर्य्यन्त विभागसे अवस्थित जो नाम, आख्यात, उपसर्ग तथा निपात उनका लक्षण सामान्य व विशेषरूपसे निरूपण किया गया । यह पदज्ञानरूप, निरुक्त शास्त्रका पहिला प्रयोजन है, उसी प्रकार पदार्थज्ञान भी दूसरा प्रयोजन है। अर्थात् जिस प्रकार पदज्ञानके विना मन्त्रोंमें अर्थ की प्रतीति नहीं हो सकती, उसी प्रकार पदार्थज्ञानके विना भी नहीं। इसीलिये शास्त्रारम्भके द्वितीय प्रयोजनको दिखानेके अर्थ यहांसे आरम्भ होता है। भाव यह है कि—इस निरुक्त शास्त्रके बिना लोक तथा वेदमें पृथक् पृथक् पद रूपसे एवम् मन्त्रोंमें वाक्यरूपसे रहते हुए नाम आदिकोंके ज्ञान हो जाने पर भी वहां जो उनका समस्त मिलित अर्थ है, जिसको जानकर

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कि—मनुष्यकी प्रवृत्ति तथा निवृत्ति होती है, उसका विशेष रूपसे निश्चय नहीं होता । सुतराम् इस शास्त्रके विना पदा- र्थकी प्रतीति अथवा वाक्यार्थकी प्रतीति नहीं होती । पूछें कि-पदार्थ और वाक्यार्थका क्या विशेष है ? ता कहेंगे कि-पदार्थ साकाङ्क्ष और वाक्यार्थ निराकाङ्क्ष होता है। एक पदार्थ के ज्ञान हो जानेपर दूसरे पदार्थ के ज्ञानकी अपेक्षा बनी रहती है, यही पदार्थ साकाङ्क्षता है। और वाक्यार्थ के ज्ञान हो जानेपर फिर अन्य अर्थ के जाननेकी कोई आकाङ्क्षा नहीं रहती, सुतराम् वाक्यार्थ के ज्ञान होते ही पुरुषकी प्रवृत्ति तथा निवृत्ति हो जाती है। यही वाक्यार्थकी निराकाङ्क्षता है। जैसे—किसोने “गौः” ऐसा पद कहा तो फिर आकाङ्क्षा होती है कि—क्या ? उसके अनन्तर “गच्छति” ऐसा कहते ही उसको आकाङ्क्षा शान्त हो जाती है। इसी प्रकार “गच्छति” कहने पर “कः” यह आकाङ्क्षा होती है, वैसे ही “गौः” ऐसा कहते ही निराकाङ्क्षता हो जाती है। प्रयोजन यह निकला कि—“गौर्गच्छति” ( “गौ जाती है” ) ऐसा वाक्य बोलनेसे 'गौ' वहन-दोहन आदि क्रियाओंसे पृथक् होकर गमन क्रियामें अवस्थित प्रतीत होती है। और गमन क्रिया भी अन्य अश्व आदिकोंसे अलग होकर गौमें ही अवस्थित हुई प्रतीत होती है। अर्थात् “गौः” ऐसा कहनेसे गौका बोध तो हो जाता है, किन्तु वह जाती है, या चरती है अथवा वहन-दोहन आदि क्रिया करती है, कुछ पता नहीं चलता ? जब “गच्छति” ( जाती है ) कह देते हैं, तो अन्य सब क्रियाओंके सन्देह निवृत्त हो जाते हैं और गमनमें ही निश्चय हो जाता है, एवम् “गच्छति ( जाता है ) ऐसा कहनेसे घोड़ा जाता है या गौ जाती है अथवा मनुष्यादि कुछ निश्चय नहीं होता, किन्तु उसके साथ “गौः” यह पद बोलते ही जानेवालों

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१२४ अ० १ पा० ५ ख० १ । में जो सन्देह होता है निवृत्त होकर गौका निश्चय हो जाता है। यही पदार्थ और वाक्यार्थका विशेष है। सो यह प्रकरणका अविरोधी वाक्यार्थ नियमसे पदार्थको लक्षित करता है, और पदार्थ पदके लक्षण को। क्योंकि—पदार्थके सामर्थ्यसे ही व्याकरणमें पदोंके प्रकृति प्रत्यय आदि लक्षण बताये जाते हैं। जब कि—ऐसा है, तो अर्थको निश्चय रूपसे नहीं जाननेवाला पुरुष स्वर तथा संस्कारोंका निश्चय नहीं कर सकता। क्योंकि— अर्थके अधीन ही शब्दके स्वर और संस्कार रहते हैं। ऐसी स्थितिमें "निरुक्त शास्त्र विद्याका स्थान है" यह सिद्ध हुआ, क्योंकि—अर्थका परिज्ञान इसीके अधीन है। इसीसे स्वर तथा संस्कारोंको अर्थके अधीन होनेके कारण यह शास्त्र व्याकरण को सम्पूर्ण बनाता है, क्योंकि—व्याकरणसे स्वर और संस्कारोंका ही विचार होता है, इससे वह अपरि समाप्त ही है जब तक निरुक्त शास्त्र नहीं पढा जाय, —इसका हेतु यह है कि—जो निरुक्त को नहीं पढा हुआ होता है, वह अर्थको निश्चय नहीं कर सकता और अनिश्चिताथ पुरुष स्वर-संस्कारोके तत्वको नहीं जान सकता। प्रश्न हो सकता है कि—जब यह शास्त्र व्याकरणको सम्पूर्ण करता है, तो यह व्याकरणका एक भाग या अङ्ग ही हुआ। जैसे कि—द्रव्यके गुण होते है। और इससे इसको विद्याका स्थान कहना भी विरुद्ध है ? नहीं। क्योकि—यह शास्त्र अपने प्रयोजनको स्वतन्त्रतासे करता हुआ ही व्याकरणकी सम्पूर्णता भी करदेता है, जैसे कि— लोंकमें कोई पुरुष अपने स्वार्थको साधन करनेके साथ दूसरेक अनुग्रह भी कर देता है।

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हिन्दी निरुक्त । १२५ यह प्रश्न, कि—गुणादिके समान अङ्गभूत है ? यह भी ठीक नहीं, क्योंकि—व्याकरणका अङ्ग होता, तो जैसे "उणादयो बहुलम्" यह सूत्र उणादि शब्दोंका संग्रह करता है; उसी प्रकार “निघण्टवो बहुलम्” ऐसा सूत्र बनाकर पाणिनि मुनि इस शास्त्रका भी संग्रह कर देते, किन्तु ऐसा नहीं किया, इससे यह शास्त्र व्याकरणका अङ्ग नहीं है। इसलिये "यह शास्त्र अर्थके निर्वचनमें स्वतन्त्र है, व्याकरण तो केवल लक्षण प्रधान है" यह दोनोंका विशेष या भेद है। लक्षण नाम प्रकृति-प्रत्यय आदिका है, यह सब शब्द तक गति रखते हैं। कौत्सके मतसे निरुक्तकी अनर्थकता । कौत्स ऋषि कहते हैं कि—“यदि मन्त्रोंके अर्थज्ञानके लिये निरुक्त शास्त्रका आरम्भ किया जाता है, तो अनर्थक ही है, क्योंकि—मन्त्रोंका वाच्य वाचक भाव—सम्बन्धसे कोई अर्थ नहीं है। इस लिये निरुक्त शास्त्रका आरम्भ नहीं करना चाहिये । किन्तु निरुक्त शास्त्रके पढ़नेवालोंको उनके ऐसे कथन पर ध्यान न देना चाहिये, प्रत्युत—वेद और शास्त्रोंको देखकर बातको व्यवस्थित करना चाहिये कि—वे सत्य कहते हैं या वृथा ? अथवा जिन हेतुओंको अब हम दिखायेंगे, उनको समझकर मन्त्रोंका अर्थवत्व देखना चाहिये । कौत्सके मतमें मन्त्रोंके अनर्थक होनेमें युक्तियां । ( १ ) मन्त्रोंमें जो शब्द पढ़े हुए हैं, पर्याय शब्द बदल कर नहीं पढ़े जाते, तथा जो शब्द पूर्व पढ़ा है, वह उत्तर नहीं पढ़ा जाता । जैसे कि—लोकमें "गामानय" गौकोलेआ ऐसाभी कहते हैं; और गो शब्दके पर्याय धेनु शब्दको लेकर “धेनुमानय" भी कहते हैं । किन्तु वेदमें 'अग्न आयाहि" ( सा० सं० १, १, १, . १ ) इस वाक्यके स्थानमें 'विभावसो ! आगच्छ' इत्यादि वाक्य

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१२६ अ० १ पा० ५ ख० १ । नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार लोकमें “आहर पात्रम्” ‘लेआ, पात्र’ ऐसा भी कहते हैं, और “पात्रमाहर” ‘पात्रको लेआ’ ऐसा भी। वेदमें “अग्न आयाहि” के स्थानमें ‘आयाह्यग्ने’ ऐसा नहीं कह सकते। प्रयोजन यह कि—जब अर्थ के लिये शब्द बोले जाते हैं, तो वह जिस प्रकार सिद्ध हो, वैसे ही वैसे शब्द बोले जा सकते हैं, शब्दोंके क्रम तथा विशेषको नियत करनेका कोई प्रयोजन नहीं। जब कि—मन्त्रोंमें उक्त दोनों बातें नहीं हैं तो अर्थवाले शब्दोंके विरुद्ध स्थितिके कारण वे अनर्थक ही कहे जा सकते हैं। (२) ब्राह्मण या विधि वाक्यसे जिन कर्मोंमें मन्त्र विनियोग किये जाते हैं स्वयम् उन कर्मोंको बोधन करनेकी शक्ति रखनेके कारण वे अपनेको उन कर्मोंमें विनियोग कर सकते हैं, तथापि मन्त्र ब्राह्मण वाक्यके द्वारा ही कर्मोंमें विनियुक्त होते हैं यदि ये मन्त्र अर्थवान् होते तो ब्राह्मण वाक्य इनका विनियोग नहीं करता। भाव यह है कि—जो अपने कर्त्तव्यको आप जानता है, उसे शिक्षककी आवश्यकता नहीं होती, सुतराम् मूढके लिये दूसरे विद्वान् प्रेरककी अपेक्षा होती है, इसी रीतिसे मन्त्र अर्थशून्य होनेसे मूढ़के समान है इसीसे वह दूसरे अर्थवान् ब्राह्मण शासक वाक्यके द्वारा कर्मोंमें विनियुक्त किया जाता है। जैसे— “उरुप्रथस्वेति प्रथयति” (श० ब्रा० १, १, ६, ८) इस ब्राह्मणका यह अर्थ है, कि “उरु प्रथस्व” इस मन्त्रसे (पुरोडाशका) प्रथन करे। अर्थात् इस विधिवाक्यने ‘उरुप्रथस्व” (य० वा० स० १, २२) इस यजुःको पुरोडाशके प्रथन कर्ममें विनियोग किया, तथा यह मन्त्र भी— “हे पुरोडाश ! तू फैल” अपने इस अर्थसे पुरोडाशके प्रथन कर्ममें सामर्थ्य रखता है,

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क्योंकि इसके अर्थ से यह बात प्रतीत होती है। इसी प्रकार "प्रोहाणोति प्रोहति" यह ब्राह्मण, द्रोणकलशके प्रोहण कर्ममें "प्रोहाणि" इस मन्त्रको विनियोग करता है। और मन्त्र भी स्पष्ट रूपसे प्रोहणक्रियाको बता रहा है। इससे लिङ्ग सम्पन्न मन्त्रोंके विधानके कारण हम देखते हैं कि--मन्त्र अनर्थक हैं। उपर्युक्त युक्तिसे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि--ब्राह्मण विनियोजक (प्रेरक) होनेसे अर्थवान् है और मन्त्र विनियोज्य (प्रेर्य्य) होनेसे अनर्थक। यदि कोई ऐसी कल्पना करे कि-- ब्राह्मण ही अनर्थक क्यों न हो, मन्त्र अपने अर्थ के सामर्थ्यसे ही विनियुक्त होता ? इसका उत्तर यह है कि ब्राह्मण केवल मन्त्रका ही विनियोग नहीं करता अपितु देश, काल, कर्त्ता और दक्षिणा आदि अन्य कर्मोंके अङ्गोंको भी बताता है, वे सब कहांसे जाने जावेंगे। अतः ब्राह्मणकी अनर्थकता नहीं हो सकती। यदि बलात् ब्राह्मणकी अनर्थकता मान भी लें तो वेदके एक देश रूप मन्त्रकी अत्यन्त ही अनर्थकता होगी। इसके अतिरिक्त यह भी है कि-यदि ब्राह्मणकी अनर्थकता मानें तो यह प्रश्न हो सकता है कि-ब्राह्मण फिर किस लिये है, जो विधि और कर्मको स्तुतिको नहीं करता ? किन्तु यदि मन्त्र- पर यह प्रश्न किया जाय कि यदि उसका कुछ अर्थ नहीं तो वह किस लिये है, तो उसका उत्तर यह दिया जा सकता है, उसका कर्मोंमें विनियोग होता है। अर्थात् ब्राह्मणका विधिके विना अन्य कोई प्रयोजन न रहनेसे उसको अर्थवान् मानना ही पड़ेगा और मन्त्रका अर्थ स्वीकार न भी किया जावे तो कोई हानि नहीं, इसलिये ब्राह्मण अर्थवान् और मन्त्र अनर्थक है यह सिद्ध हुआ । (३) मन्त्रोकी अनर्थकतामें यह भी कारण है कि-उनके जो

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३२८ अ० १ पा० ५ ख० १ ।

  • अर्थ हैं, वे किसी युक्तिसे संगत नहीं होते। अर्थात् मन्त्रोंमे जैसा अर्थ लब्ध होता है कि- यह इनमें अर्थ होगा, वह घटता नहीं। जैसे- “ओषधेत्रायस्व” ( य० वा० सं० ४, १, ६, १५) 'हे ओषधे तू इस यजमानकी रक्षा कर।' अग्निष्टोम यज्ञमें यजमानके क्षौर कर्मके आरम्भमें उसके शिरपर कुशका अङ्कुर या पत्ता लगाया जाता है कि पहिले छुरा शिरपर न टिककर उसी पर टिके, उस तृणके धरनेका यह मन्त्र है। किन्तु इस मन्त्रके अर्थको स्वीकार करें तो यह प्रश्न होगा कि-जब ओषधि अपनी ही रक्षा नहीं कर सकती तो यजमानकी क्या करेगी ?” तथा दूसरा मन्त्र छुरेके चलानेके लिये हैं- “स्वधिते मैन≍हि≍सीः” ( य० वा० सं० ४, १-६, १५) इसका अर्थ है-हे क्षुर ! पैनीधारवाले ! तू इस यजमान की हिंसा न करना। अब देखते हैं, तो-जो छुरेसे स्वयम् यजमान के बालोंको काट रहा है, वही छुरेसे न काटनेको प्रार्थना कर रहा है। कौन ऐसा है जो ऐसा कह कर, ऐसा करेगा ? लोकमें जितने ऐसे वाक्य होते हैं, वे सब उन्मत्त लोगोंके जैसे अनर्थक ही माने जाते हैं। इस लिये ये मन्त्र वाक्य भी अनर्थक ही हैं। ४-मन्त्रोंकी अनर्थकतामें और हेतु यह है कि-एक मन्त्रके अर्थको दूसरे मन्त्रका अर्थ निषेध करता या मिथ्या ठहराता है। जैसे कि- “एक एव रुद्रोऽवतस्थे न द्वितीयः” “असं- ख्याताः सहस्राणि ये रुद्रा अधिभूम्याम् ( य० वा० सं० १६, ५४) “अशत्रुरिन्द्र जज्ञिषे” (ऋ० सं० ८, ७, २१, २) “शतं सेना अजयत्साकमिन्द्रः” (ऋ०
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हिन्दी निरुक्त । ४२६ सं० ८, ५, २२, १ ) ये उदाहरण हैं। एक मन्त्रमें कहा गया है कि—'संग्राममें शत्रुओंको मारनेवाला एक ही रुद्र उठा हुआ था, कोई दूसरा न था' दूसरे मन्त्रमें कहा है कि—'पृथिवी पर असंख्य रुद्र हैं' यहां दोनों मन्त्रोंका परस्पर यह विरोध है कि—'एक है तो असंख्य कैसे' ? और 'असंख्य हैं, तो एक कैसे ?' तथा एक मन्त्रमें कहा है कि—'इन्द्र अशत्रु था' एवम् दूसरे मन्त्रमें कहा है कि—'उसने एक साथ ही शत्रुओंकी सैकड़ों सेना- ओंको जीता।' यहां भी यह प्रश्न हो सकता है कि—यदि उसके कोई शत्रु न था, तो उसने शत्रुओंकी सेनाओंको नहीं जीता' और 'यदि शत्रुओंकी बहुत सेनाओंको जीता, तो वह अशत्रु न था।' लोकमें उन्मत्त आदिकोंके ऐसे वाक्य अनर्थक समझे जाते हैं। इसीसे वे भी अनर्थक हैं। ५—मन्त्रोंकी अनर्थकतामें और हेतु यह है कि—अध्वर्यु (ऋत्विज् विशेष) जानते हुए होता को प्रैष (प्रेरणा) करता है कि— “अग्नये समिध्यमानायानुब्रूहि” 'जलते हुए अग्निके लिये तू अनुवचनकर' किन्तु यह प्रैष निष्प्रयोजन है, क्योंकि—विधिमें विद्वान् हो होता लिया है, इस लिये वह स्वयम् जानता है कि— 'इस अवधि या समयमें मुझे यह अनुष्ठान करना चाहिये' अतः जाननेवालेको ऐसा प्रेषण अनर्थक ही होता है, फलित यह कि- 'जैसे यह अनर्थक है वैसे ही और मन्त्र भी अनर्थक होगे। - ६—कई ऐसे मन्त्र है, जो एक ही वस्तुको कभी कुछ और कभी कुछ कहते.हैं, अर्थात् जिन जिन वस्तुओंके रूपमें एक वस्तुकों बताया जाता है, वे प्रत्यक्षमें सदा ही परस्पर भिन्न हैं, जैसे— १७

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१३० अ० १ पा० ४ ख० १ । "अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्ष म दिति र्माता स पिता स पुत्रः । विश्वे देवा अदितिः पञ्चजना अदिति जातमदितिर्जनित्वम् ॥ (ऋ० सं० १, ६, १६, ५) इस मन्त्रमें 'जो ही अदिति द्युलोक (३ द्युलोक) है वही मध्यम लोक (अन्तरिक्ष) है। एवम् वही माता, पिता, तथा पुत्र है।' ऐसी ऐसी बहुत बातें परस्पर विरुद्ध कही हुई हैं, यदि ऐसे मन्त्रोंको अर्थवान् जाना जावे तो उनका उपपादन करना अशक्य हो जायगा, इसलिये उनका अनर्थक मानना ही ठीक है। ७—इस लिये भी मन्त्र अनर्थक कहे जा सकते हैं, कि—उनमें ऐसे शब्द भी आते हैं, कि—जिनका स्पष्ट रीतिसे कोई अर्थ ही प्रतीत नहीं होता। जैसे—"अम्यक्, यादृश्मिन्, जारयायि, काणुका" इत्यादि। क्योंकि—मन्त्रोंमें इनका कुछ स्पष्ट अर्थ जाना नहीं जा सकता। ऐसी कल्पना भी नहीं हो सकती कि— “मन्त्रोंमें कुछ शब्द अनर्थक हैं, और कुछ अर्थवान्”। क्योंकि— इसमे अर्द्धावशेष रह जायगा, इस लिये सारे ही अनर्थक हैं यह मानना अच्छा है। परिसमाप्तः पूर्वपक्षः । मन्त्रोंकी सार्थकताकी स्थापना । १—यास्क—"मन्त्र अर्थवान् ही हैं" किन्तु कौत्सके कथना- नुसार अनर्थक नहीं। क्योंकि—लोक और वेदमें समान ही शब्द हैं, अर्थात् जो 'गो' शब्द लोकमें स्वर-संस्कार युक्त है, वही मन्त्रोंमे भी है, ऐसी अवस्था में 'वही शब्द लोकमें अर्थवान् रहे और मन्त्रोंमें अनर्थक'—इसमें कोई विशेष हेतु नही है। जब

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हिन्दी निरुक्त । १३१

कि—'विशेष हेतु नहीं है' तो शब्दोंकी समानतासे मन्त्र अर्थवान् हीं हैं । २—कौत्सने कहा है कि—"लोकमें शब्दोंको अनियमसे प्रयोग करनेके कारण शब्द अर्थवान् हैं" और वेदमें शब्दोंके प्रयोगके नियम होनेके कारण मन्त्र अनर्थक हैं"—यह अयुक्त है । क्योंकि—लोकमें 'जो दो शब्द हैं' उनके पौर्वापर्यका परिवर्त्तन नहीं हो सकता । ३—ब्राह्मण ग्रन्थ भी स्पष्ट रूपसे मन्त्रोंकी अर्थवत्ताको कह रहा है कि— “एतद्वै यज्ञस्य समृद्धं यद्रूपसमृद्धं यत्कर्मक्रिय- माणमृग्यजुर्वाऽभिवदति” इति च । [ब्राह्मणम्] 'यह यज्ञकर्मका समृद्ध है, वह क्या ? जो रूप समृद्ध या मन्त्रलिङ्गोंसे कहा गया हों, अर्थात् किये जाते हुए कर्मको ऋचा अथवा यजू रूप मन्त्र अनुवाद करता हो । अब देखें कि—यदि मन्त्र अनर्थक हैं, तो कैसे कर्मको अनु- वाद करेंगे ? यदि अनुवाद नहीं करते तो कर्मका समर्थन कैसे करेंगे ? सर्वथा इस ब्राह्मण वाक्यसे मन्त्रोंकी अर्थवत्ता स्पष्ट उक्त होती है । ब्राह्मणको अनर्थकता स्वीकार करके तुम इस प्रमाणको निष्फल कर सकते हो, किन्तु तुम्हारा यह साध्य नहीं, क्योंकि—तुम पहिले ही ब्राह्मणको “ब्राह्मणेन रूपसम्पन्ना विधीयन्ते” इस वाक्यसे अर्थवान् स्वीकार कर चुके हो । इससे यह दिखाया जा चुका कि—मन्त्र अर्थवान् हैं । “इहैव स्त॑ मा वियौष्टं॒ विश्वमायु॒र्व्यश्नुतस् । क्रीळ॑न्तौ पु॒त्रैर्नप्तृ॑भि॒र्मोद॑मानौ स्वे गृ॒हे”

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१३२ अ० १ पा० ५ ख० १ । सूर्य ऋषि । अनुष्टुप् छन्दः । विवाहमें विनियोग ॥ इसी अपने घरमें तुम दोनों स्त्री-पुरुष मोद या हर्षयुक्त हो। तुम कभी वियुक्त न हो। बेटे और पोतोंके साथ क्रीड़ा करते हुए, पूर्ण आयुको भोगों। यह आशीर्वाद है। विवाह कर्मका समस्त प्रयोजन इस मंत्रमें स्पष्ट वर्णन किया है। (पूर्वपक्षका खण्डन) सिद्धान्तीने मन्त्रोंकी अर्थवत्ताको स्थापना कर दी, अब पर पक्षमें जो हेतु हैं, उनका खण्डन करते हैं। १—मन्त्रोंकी अनर्थकतामें पहिला हेतु यह दिया है कि—उनमें शब्द तथा उनका क्रम नियत रहता है, हम कहते हैं कि—अर्थवाले लौकिक शब्दोंमें भी ऐसा देखा गया है, जैसे कि—"इन्द्राग्नी” "पितापुत्रौ”। जबकि—लौकिक शब्दोंमें भी नियत प्रयोग होते हुए कोई शब्द अर्थवान् है, तो मन्त्रोंको अनर्थकताके लिये वही हेतु अनैकान्तिक अथवा व्यभिचारी है। इससे मन्त्र अर्थवान् ही हैं। २—दूसरा हेतु यह कि--‘ब्राह्मणसे रूपसम्पन्न या अर्थके बोधक होते हुए भी मन्त्र विधान किये जाते हैं’ ठीक नहीं। क्योंकि- उसका यह प्रयोजन नहीं कि—'मन्त्र अपने स्वरूपसे अपनेको ही विधान करनेमें समर्थ है, इस लिये उसको ब्राह्मण विधान करता है,’ बल्कि—मन्त्रके कहे हुए अर्थको ही, उसकी विस्तारसे प्रशंसा या अनुमोदन करनेकी इच्छासे अनुवाद करता है। अर्थात् लोक, एकवार, संक्षेप तथा बिना प्रशंसाके कहे हुए अर्थको ग्रहण नहीं करता, इसीसे मन्त्र जिस अर्थको एकवार संक्षेपसे प्रशंसाके बिना कहा जाता है, उसीको ब्राह्मण दुबारा विस्तारसे प्रशंसा पूर्वक कह देता है, और यह भी है कि—जबतक कोई बात कही हुई न हो, अचानक उसकी प्रशंसा नहीं होसकती, इसलिये जिस अर्थकी

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हिन्दी निरुक्त । १३३ ब्राह्मण प्रशंसा करे, वह अर्थ पहिले किसोका कहा हुआ होना चाहिये, किन्तु ऐसी आकांक्षाको सहजन्मा मन्त्रके अतिरिक्त और कौन पूरीकर सकता है। फल यह निकला कि—'मन्त्र अर्थवान् होकर भी ब्राह्मणसे विहित होता है, इससे वह अनर्थक नहीं होना चाहिये, प्रत्युत ब्राह्मणकी अर्थवत्ताके लिये उसे अर्थवान् होनेकी बड़ी आवश्यकता है। इस निर्णयके अनुसार कौत्सके मतमें, 'जो ब्राह्मणका अर्थवत्ता मन्त्रको अनर्थक बनाती थी,स्वयम् वही अब मन्त्रकीअर्थवत्ताके अनर्थक बनाती थी, स्वयम् वही अब मन्त्रकी अर्थवत्ताके बिना अपने ठहरनेका कोई आधार नहीं पाती। इस प्रकार ब्राह्मणकी अर्थवत्ताकी सहचरी बनकर मन्त्रकी अर्थवत्ता निर्विशङ्क विराजती है। इसके अतिरिक्त ब्राह्मणकी अर्थवत्ता यो भी है कि—किसी किसी प्रकरणमें समानलिङ्ग अनेक मन्त्र होते है,जो सब समानरूपसे एकही कर्मको बोधन करते हैं, इससे या तो वे सभी कबूतरोंके समान एकदम उस कर्ममें आवें, या उनका विकल्प हो ? वैसे स्थलमें किसी अभिमत एक मन्त्रका नियम कर देता है कि—इस कर्ममें यही मन्त्र लिया जाय। इस प्रकार ब्राह्मणकी स्वतन्त्र आवश्यकता है, उसके कारण मन्त्र अनर्थक नहीं हो सकते। इससे सिद्ध हुआ कि—"मन्त्र और ब्राह्मण दोनों ही अर्थवान् हैं। ३—जोकि--यह कहा कि—"ओषधे त्रायस्वैनम्” “स्वधिते मै॒नं॒ हिं॑सीः” इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ उत्पन्न नहीं होता इस लिये मन्त्र अनर्थक है' ? ठीक नहीं है। क्योंकि—जहां केश या वृक्ष आदिके छेदनमें यह मन्त्र विनियुक्त है, वहां इस मन्त्रके द्वारा ओषधिके अधिदेवताको स्तुति की जाती है और उसीसे जजमान और वृक्ष आदिकोंके प्राणकी प्रार्थना है। जिससे कि—देवताकी

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१३४ अ० १ पा० ५ सू० १ । कृपा से निर्विघ्न पीड़ारहित संस्कृत होकर वे यज्ञकर्ममें विनियुक्त हों। इसलिये मंत्रोंके अर्थोंमें कोई अनुपपत्ति नहीं है। ४-जोकि—यह कहा कि—हिंसा करता हुआ भी कहता है कि—“स्वधिते मैन ्र ति ्र सीः” इसपर कहना यह है कि-वेद- वाक्यसे यह अहिंसा प्रतीत होगी। प्रश्न होता है कि—प्रत्यक्षमें छेदन कर्म हिंसा है वह कैसे अहिंसा होसकती हैं ? सुनो;—‘यह अहिंसा है’ और यह हिंसा’ यह आगमसे प्रतीत होता है। और सम्पूर्ण आगमोंमें वेद ही प्रतिष्ठित आगम है, क्योंकि—सब अंग वेदसे ही निकले हैं। इसलिये वेदमें जिस छेदनादि क्रियाका विधान है, वह हिंसा नहीं कही जासकती। इन सबका यह अभिप्राय है कि—वेदवाक्य, जो धर्मका प्रथम बतानेवाला है, उसीसे हिंसा और अहिंसाका पता चलेगा, जिसको वह हिंसा कहे वह हिंसा है,और जिसको अहिंसा कहे,वह अहिंसा। जबकि—हिंसा-अहिंसाका निर्णता वेदही छेदनादि क्रियाका विधान करता है तो उसको हिंसा नहीं समझना चाहिये। जैसे कि कहा है,— “या वेदविहिता हिंसा न सा हिंसा प्रकीर्त्तिता” अर्थ—‘जो हिंसा वेदमें विहित है वह हिंसा नहीं है।’ क्योंकि— वैदिक आगम सारे ही जगत्के किसी एक उत्तम कल्याणके लिये उद्यत हुआ है, वह कैसे किसी प्राणीके अनिष्टके लिये विधान करता, इसलिये उसने जो कुछ किसी प्राणीके लिये छेदनादि कहा है, वह उसकी उत्तम गतिके लिये ही है। किञ्च ओषधि, वनस्पति, पशु, मृग, पक्षी, तथा सरीसृप सब, यज्ञमें भले प्रकार उपयुक्त होकर उत्कर्ष को प्राप्त होते हैं। वह उनकी हिंसा नहीं, लाभ है।

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हिन्दी निरुक्त। १३५ हम समझते हैं कि-ठीक यही अभिप्राय निम्न लिखित मार्क- ण्डेयपुराणके सप्तशती स्तोत्रमें भी दिखाया है । "एभिर्हतैर्जगदुपैति सुखं तथैते कुर्वन्तु नाम नरकाय चिराय पापम् । संग्राम मृत्यु मधि- गम्य दिवं प्रयान्तु मत्वेतिनून महिमान्विति- हंसि देवि !" (४,१८) । अर्थ:-"हे देवि ! संसारमें अशान्तिके उत्पन्न करनेवाले इन राक्षसोंको तुम समदर्शिनी होकर भी इसलिये मारती हो कि- 'इनके मरनेसे सब जगत् सुखी हो, तथा ये (दैत्य) नरकमें जानेके लिये बहुत कालतक पाप करें, इसकी अपेक्षा संग्राममें मृत्युको प्राप्त होकर, स्वर्गमें जावें, अच्छा होगा ।” अर्थात् भगवती उनके अनिष्टके लिये नहीं प्रत्युत उनके अभ्युदयके लक्ष्यसे उनका वध करती है इसी तात्पर्यके साथमें भगवान् वेद भी वृक्षादिकोंकी हिंसाका विधान करता है। इस रीतिसे मंत्रोंमें ऐसा कोई अर्थ नहीं जो अनुपपन्न हो, अतः मंत्र अर्थवान् हैं। (५) परस्पर विरुद्ध अर्थके उदाहरणसे भी मंत्रोंकी अन- र्थकता नहीं है, क्योंकि-यह बात दैवतकाण्ड (७, १, ४) में स्पष्ट कही जायगी कि-'देवता महाभाग्यके योगसे एक भी अनेक होजाती है और अनेक होती हुई एक । इस कारण एक रुद्र अनेक रूप होसकतो और अनेक एक, इसलिये मंत्रोंमें कोई ऐसा विरोध न होनेसे मंत्र अर्थवान् हैं । (६) इन्द्रके शत्रुरहित होने और उसके सैकड़ों शत्रुसेनाओंके जीतनेका प्रश्न भी युक्त नहीं, क्योंकि-लोकमें भी “असपत्नोऽयं ब्राह्मणः” 'यह ब्राह्मण शत्रु रहित है' “अनमित्रोऽयं राजा” 'यह