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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages
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( ३१ ) है, किन्तु अभी उसमें आणव मल विद्यमान है। उसमें ज्ञान और इच्छा होती है, किन्तु क्रिया नहीं होती । विज्ञानाकल के ऊपर मंत्र, मंत्रेश्वर, मंत्रमहेश्वर और शिवप्रमाता होते हैं जिनमें उत्तरोत्तर उत्कर्ष होता है। ये सभी मलों से मुक्त होते हैं, किन्तु इनमें एकत्वचेतना का न्यूनाधिक मात्रा में अनुभव रहता है। (विशेष विवरण के लिए टि० सं० ३६ में दी हुई सारणी देखिए) केवल शिवप्रमाता को प्रत्येक वस्तु शिव ही प्रतीत होती है । शुद्ध अहं-चेतना अथवा विमर्श ही सारी सृष्टि-प्रक्रिया का मूल अथवा उद्गम स्थल है। शिव की शुद्ध अहं-चेतना ही से निमेष अथवा तिरोभाव प्रारम्भ होता है। उन्मेष अथवा आविर्भाव पुनः उसी शुद्ध अहं-चेतना की ओर पहुँचता है । अब जीवन-पथिक स्वदेश को लौट आता है, किन्तु मार्ग में शिव के अद्भुत वैभव के अनुभव से समृद्ध होकर । एक एक करके आव- रण हटता जाता है और अन्ततः वह परमतत्त्व के हृदय में स्थित हो जाता है। अब उसके मुख से अभिनवगुप्त के शब्दों में यह उद्गार निकल पड़ता है स्वतंत्रः स्वच्छातमा स्फुरति सततं चेतसि शिवः पराशक्तिश्चेयं करणसरणिप्रान्तमुदिता । तदा भोगात्मा स्फुरति च समस्तं जगदिदम् न जाने कुत्राथं ध्वनिरनुपतेत् संसृतिरिति ॥ (महेश्वरानन्द द्वारा महार्थमंजरी में उद्धृत, पृ० २५) "स्वातंत्र्य से परिपूर्ण स्वच्छस्वरूप शिव ही मेरी चेतना में सदा स्फुरित होता रहता है। परा शक्ति ही मेरे इन्द्रियों के प्रान्त में क्रीड़ा करती रहती है । तो फिर यह समस्त जगत् शुद्ध अहं-चेतना के चमत्कार से स्फुरित होता रहता है। न जाने कहां से संस्कृति (संसार) की ध्वनि मेरे कानों पर पड़ती है।"

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संक्षिप्त सार

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प्रतिपादित विषयों का संक्षिप्त सार सूत्र १—'स्वतंत्र चिति ही विश्व की सिद्धि का हेतु है' । इस संदर्भ में 'विश्व' का अर्थ है सदाशिव से लेकर पृथिवी तक सब कुछ । 'सिद्धि' का अर्थ है सृष्टि, स्थिति और संहार । चिति ही सृष्टि करती है । माया या प्रकृति सृष्टि का कारण नहीं है । यतः चिति ही प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण तीनों का उत्स या मूल हैं, अतः कोई प्रमाण अपने मूल को जिसके द्वारा वह स्वयं जन्य है सिद्ध नहीं कर सकता । सिद्धि का अर्थ भोग या मोक्ष भी हो सकता है । इनका भी हेतु स्वतंत्र चिति ही है । हेतु का अर्थ केवल कारण नहीं है, साधन भी है । चिति ही वह साधन है जिसके द्वारा व्यक्ति परम चेतना की ओर आरोहण करता है जहां कि उसकी चेतना का भागवती चेतना से तादात्म्य हो जाता है । चिति का एकवचन में प्रयोग यह दर्शाने के लिए हुआ है कि वह देश और काल से अपरिच्छिन्न है । इसे 'स्वतंत्र' यह बतलाने के लिए कहा गया है कि यह बिना माया इत्यादि की सहायता के स्वयं विश्व की सृष्टि में समर्थ है । इस प्रकार चिति ही विश्व का हेतु शिवत्व-योजना का उपाय और परमार्थ है । इस सूत्र में समस्त ग्रन्थ का सार निहित है । सूत्र २- अपनी ही इच्छा से, अपनी ही भित्ति ( आधार ) पर वह (चिति) विश्व को व्यक्त करती है । वह अपनी ही इच्छा से विश्व को प्रकट करती है, किसी बाहरी कारण या प्रेरणा से नहीं । विश्व उसमें अव्यक्त रूप से रहता ही है, वह उसे व्यक्त करती है । सूत्र ३-विश्व ( परस्पर ) अनुरूप ग्राह्य और ग्राहक के भेद से नाना प्रकार का है । प्रमाता और प्रमेय के भेद से विश्व में नानात्व है । संक्षेप में यह भेद निम्नप्रकार का है :—

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( ३६ ) १. सदाशिव तत्त्व—इसमें 'अहं' परामर्श प्रधान रहता है, 'इदं' या विश्व का परामर्श एक प्रारम्भिक अवस्था में रहता है। जिस साधक की चेतना इस स्तर पर पहुँच जाती है वह मंत्रमहेश्वर कहलाता है। वह सदाशिव द्वारा निदेशित होता है। उसने सदाशिव तत्व का साक्षात्कार कर लिया है। उसका परामर्श होता है 'अहमिदम्'। इस अवस्था में 'इदं' 'अहं' से पूर्णतः भिन्न नहीं होता। २ ईश्वरतत्त्व—इसमें 'अहं' और 'इदं' दोनों का परामर्श तुल्यरूप से स्पष्ट होता है। जिस साधक की चेतना इस स्तर पर पहुँच जाती है वह मंत्रेश्वर कहलाता है। इस अवस्था में विश्व का परामर्श स्पष्ट होता है, किन्तु उसका अहं से तादात्म्य रहता है। मंत्रेश्वर ईश्वर द्वारा निदेशित होता है। ३. विद्यातत्त्व—इसमें 'इदं' और 'अहं' दोनों तुल्यरूप से भिन्न प्रतीत होते हैं। इसमें नानात्व का अनुभव होता है किन्तु उसमें एकत्व की भावना विद्यमान रहती है। जिस साधक की चेतना इस स्तर पर पहुँच जाती है वह 'मंत्र' कहलाता है। उसका निदेशक अनन्तभट्टारक होता है। ४. विज्ञानाकल—इसका स्तर शुद्धविद्या से नीचे और माया से ऊपर है। सकल और प्रलयाकल उसके अनुभव के क्षेत्र हैं। ५. प्रलयकेवली या प्रलयाकल—माया में स्थित प्रमाता प्रलयाकल कह- लाता है। न तो उसे 'अहं' की ही स्पष्ट चेतना होती है, न 'इदं' की ही। उसकी चेतना शून्यप्राय की होती है। ६. सकल—माया से लेकर पृथ्वी तक के प्रमाता सकल कहलाते हैं। सकल का अनुभव नानात्व का रहता है। साधारण जीव सब सकल होते हैं। शिव इन सबसे परे है। उसमें शाश्वत आनन्द है। उसका सदाशिव से लेकर पृथ्वी तक सबसे तादात्म्य है। वस्तुतः शिव ही इन सब अवस्थाओं में स्फुरित होता है। सूत्र ४—वह जीव भी जिसमें चिति संकुचित हो गई है संकुचित रूप में विश्वमय ही है। चित् या शिव ही संकोच को धारण कर संकुचित प्रमाता और संकुचित विश्व बन जाता है। सूत्र ५—चिति चेतनपद से उतरकर चित्त बन जाती है, क्योंकि चेत्य के अनुकूल वह संकुचित हो जाती है।

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( ३७ ) संकोच के द्वारा चिति ( समष्टि चेतना ) ही चित्त ( व्यष्टिचेतना ) बन जाती है । जब चिति संकोच ग्रहण करती है तो उसमें या तो (१) चित् का प्राधान्य अथवा (२) संकोच का प्राधान्य होता है । पहली अवस्था में भी जब केवल प्रकाश प्रधान रहता है तब 'विज्ञाना- कल' का पद होता है और जब प्रकाश और विमर्श दोनों प्रधान रहता है तब शुद्धविद्याप्रमाता का पद होता है अथवा ईश, सदाशिव, अनाश्रित शिव का पद होता है । दूसरी अवस्था में शून्य प्रमाता इत्यादि का पद होता है । समष्टि चेतना ही संकोच ग्रहण करके चित्त बन जाती है । समष्टि चेतना के ज्ञान, क्रिया और माया व्यष्टि चेतना में सत्व, रजस् और तमस् का रूप धारण कर लेते हैं । सूत्र ६—माया प्रमाता चित्तमय होता है । चित्त ही माया प्रमाता का स्वरूप है । सूत्र ७—यद्यपि वह ( आत्मा ) एक है, तथापि द्विरूप, त्रिमय, चतुर्मय और सात पंचक स्वभाव वाला है । चित् स्वयं शिव है । चैतन्य देश और काल से परिच्छिन्न नहीं हो सकता । संकोच के द्वारा चैतन्य ग्राहक और ग्राह्य बन जाता है । इस प्रकार वह द्विरूप हो जाता है । आणव, मायीय और कार्म्म मल से आच्छन्न होने के कारण वह त्रिमय हो जाता है । (१) शून्य (२) प्राण (३) पुर्यष्टक और (४) स्थूल शरीर ग्रहण करने से वह चतुर्मय हो जाता है । सात पंचक अर्थात् शिव से नीचे पैंतीस तत्त्व हो जाने का भी उसका स्वभाव है । शिव से लेकर सकल तक वह सात प्रकार का प्रमाता बनता है और कला से लेकर नियति तक पांच आवरणों को ग्रहण कर वह पांच स्वरूप वाला ( जीव ) भी हो जाता है । सूत्र ८—सब दर्शनों की स्थितियां उसकी ( आत्मा की ) भिन्न-भिन्न भूमिकाएं हैं । भिन्न-भिन्न दर्शनों की मान्यताएं एक प्रकार से आत्मा द्वारा कल्पित भूमिकाएं हैं । (१) चार्वाक यह मानते हैं कि चैतन्य-विशिष्ट देह ही आत्मा है ।

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( ३८ ) (२) नैयायिक सांसारिक दशा में बुद्धि को ही प्रायः आत्मा मान बैठते हैं । मोक्ष के अनन्तर उनका आत्मा शून्यवत् ही हो जाता है । (३) मीमांसक भी बुद्धि को ही आत्मा मान बैठते हैं, क्योंकि वह अहंप्रत्यय को ही आत्मा समझते हैं । (४) बौद्ध ज्ञानसन्तति को आत्मा समझते हैं । अतः उनके दर्शन के अनुसार भी बुद्धि ही आत्मा है । (५) कुछ वेदान्ती प्राण को ही आत्मा समझते है । (६) कुछ अन्य वेदान्ती और माध्यमिक असत् या शून्य को ही आत्मतत्त्व समझते हैं । (७) पांचरात्र के अनुयायी वासुदेव को ही उत्कृष्ट तत्त्व मानते है । (८) सांख्य के अनुयायी विज्ञानाकल की स्थिति को ही परमतत्त्व समझते हैं । (६) कुछ वेदान्ती ईश्वरतत्त्व को ही परमतत्त्व समझते हैं । (१०) वैयाकरण पश्यन्ती या सदाशिव को ही परमतत्त्व मानते हैं । (११) तांत्रिक विश्वोत्तीर्ण आत्मा को परमतत्त्व समझते हैं । (१२) कौल आत्मतत्त्व को विश्वमय मानते हैं । (१३) त्रिक दर्शन के अनुयायी यह मानते हैं कि आत्मतत्त्व विश्वोत्तीर्ण और विश्वमय दोनों है । कुछ लोग इस सूत्र का अर्थ दूसरे ढंग से करते हैं । उनके अनुसार दर्शन का अर्थ ज्ञानसरणि नहीं, ज्ञान है । स्थिति का अर्थ अन्तर्मुखी विश्रान्ति है । 'तद् भूमिकाः' का अर्थ 'चिदानन्दघन की अभिव्यक्ति के उपाय' है । इस अर्थ के अनुसार नील सुखादि का अनुभव शिव या परमतत्त्व के स्वरूप की अभिव्यक्ति का उपाय है । सूत्र ६—जो चित्स्वरूप है वह शक्ति के संकोच से मलावृत होकर संसारी बन जाता है । इच्छा शक्ति के संकुचित होने पर आणव मल का अविर्भाव होता है जिससे आत्मा जीव होकर अपने को अपूर्ण मानता है । ज्ञानशक्ति के संकोच से मायीय मल का आविर्भाव होता है जिसके कारण भेद-बुद्धि उत्पन्न होती है । क्रिया शक्ति के संकोच से कार्म मल का आविर्भाव होता है । इस प्रकार शक्ति के संकोच से सर्वकर्तृत्व किंचित्कर्तृत्व ग्रहण कर कला बन जाता है, सर्वज्ञत्व किंचित्ज्ञत्व ग्रहण कर विद्या बन

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( ३६ ) जाता है, पूर्णत्व अपूर्णत्व ग्रहण कर राग बन जाता है, नित्यत्व काल बन जाता है, व्यापकत्व नियति का रूप धारण कर लेता है। इस प्रकार आत्मा जीव बन जाता है, किन्तु अपनी शक्तियों के विकास होने पर वह शिवत्व लाभ करता है। सूत्र १०-संसारी की दशा में भी जीव पंचकृत्य करता रहता है । जैसे शिव विश्व के प्राकट्य में पंचकृत्य करते रहते हैं वैसे ही जीव रूपी संकुचित दशा में भी वह पंचकृत्य करते रहते हैं। किसी वस्तु का नियत देश-काल में आभासित होना सृष्टि क्रिया है। विषयों का अन्य देश-काल में आभासित होना संहार क्रिया है। किसी आभास का बना रहना स्थिति क्रिया है। भेद का आभास विलय क्रिया है। विषयों का चित्प्रकाश के तादात्म्य से प्रकासित होना अनुग्रह क्रिया है। सूत्र ११-वह प्रकाशन, आस्वादन, आत्मबोध, बीज का अवस्थापन, विलापन रूपी पंचकृत्य भी करता है। यह पंचकृत्य योगी के रहस्यमय दृष्टिकोण से होता है। जो कुछ प्रका- शित होता है, वह सृष्टि है। जब जीव उसका आस्वादन या आनन्द लेता है, तब वह स्थिति है। विमर्शन या चमत्कार के समय उस पदार्थ का संहार होता है। शंका इत्यादि के संस्कार खड़े हो जाते हैं, तो वह बीजरूप में संसार का कारण होता है। यह बीजावस्थापन विलय है। यदि अनुभूत विषय का चित् से तादात्म्य हो जाता है तो यह अनुग्रह की दशा है। सूत्र १२-संसार दशा पंचकृत्य के अज्ञान के कारण अपनी ही शक्तियों से मोहित हो जाना है। चित्प्रकाश से अभिन्न परावाक् शक्ति है। वह पूर्ण अहं ज्ञानरूपी है, 'अ' से लेकर 'क्ष' तक समस्त शक्ति-समूह को अपने गर्भ में धारण किये हुए है। वही पश्यन्ती इत्यादि क्रम से ग्राहक अवस्था की अवभासित करती है। ग्राहक भूमि में वह अपनी परा रूप का गोपन करके विशेष पदार्थों को अवभासित करती है जिसके कारण ग्राहक देह, प्राण इत्यादि को आत्मा मान बैठते हैं। ब्राह्मी इत्यादि शक्तियां पशुदशा में भेद उत्पन्न करती हैं और पतिदशा में अभेद का ज्ञान उत्पन्न करती हैं। क्रमशः वे शुद्ध विकल्प उत्पन्न कर देती हैं जिससे अभेद का ज्ञान सम्पन्न होता है। अभेद ज्ञान उत्पन्न करने का यह शाम्भवोपाय है।

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( ४० )

शाक्तोपाय निम्नलिखित है। इस सन्दर्भ में चितिशक्ति को वामेश्वरी कहते हैं। खेचरी, गोचरी, दिक्चरी और भूचरी वामेश्वरी के प्रकार हैं। खेचरी शक्ति के द्वारा समष्टिचेतना व्यष्टिचेतना के रूप में, परिमित प्रमाता के रूप में प्रकट होती है, गोचरी शक्ति के द्वारा परिमितप्रमाता अन्तःकरण से युक्त हो जाता है, दिक्चरी शक्ति के द्वारा वह इन्द्रियों से युक्त होता है और भूचरी के द्वारा वह बाह्य पदार्थों को पृथक्-पृथक् रूप में देखता है । साधना के द्वारा खेचरी द्वारा पूर्णकर्तृत्व, गोचरी द्वारा अभेद का निश्चय, दिक्चरी द्वारा अभेद का प्रत्यक्ष, भूचरी के द्वारा प्रमेयों का अपने अंग के समान बोध उत्पन्न होता है । आणवोपाय निम्नलिखित है। साधना द्वारा जब उदान शक्ति और व्यान शक्ति विकसित होती है, तो जीव को तुर्य और तुर्यातीत दशा का अनुभव होता है और वह जीवन्मुक्त हो जाता है । सूत्र १३–पंचकृत्य के पूर्ण ज्ञान होने पर चित्त ही अन्तर्मुखी भाव से चेतनपद पर पहुंच जाने ने चिति हो जाता है। जब पंचकृत्य का ज्ञान उदय होता है, तो अज्ञान निरस्त हो जाता है। चित्त अब अपनी शक्तियों से व्यामोहित नहीं होता और अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर चिति हो जाता है । सूत्र १४--चितिरूपी अग्नि अवरोह पद में (माया से) आच्छादित रहने पर भी प्रमेय रूपी इन्धन को कुछ अंश में जला देती है। यह शंका होती है कि यदि चिति का स्वभाव अभेद है तो व्यक्ति के पद में भेद की प्रतीति क्यों होती है ? इस सूत्र में इस शंका का उत्तर दिया गया है। व्यक्ति की अवस्था में भी चिति पूर्णतया अपने अभेद के स्वभाव को नहीं छोड़ती क्योंकि ज्ञात प्रमेयों को चिति उसी प्रकार आत्मसात् कर लेती है जैसे अग्नि इन्धन को अपने रूप में परिवर्तित कर लेती है। केवल माया से आच्छन्न होने के कारण चिति प्रमेयों को पूर्ण रूप से आत्मसात् नहीं कर पाती क्योंकि पूर्व संस्कारों के कारण वे पदार्थ पुनः उत्थापित हो जाते हैं। सूत्र १५–जब चिति अपने स्वभावसिद्ध बल को प्राप्त कर लेती है तब वह विश्व को आत्मसात् कर लेती है । यहां पर बल से तात्पर्य है अपने स्वरूप का उन्मेष । आत्मसात् करने का अर्थ है अपने स्वरूप से अभिन्न रूप में आभासित करना । चिति-बल को

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( ४१ ) प्राप्त करने का अभ्यास केवल देह, प्राण इत्यादि से जो मिथ्या तादात्म्य है उसको हटाने के लिए है । सूत्र १६-चिदानन्द लाभ होने पर देह इत्यादि का अनुभव होने पर भी चित् से एकात्मता का बोध दृढ़ हो जाता है । चित् से एकात्मता जीवनन्मुक्ति की अवस्था है । यह अवस्था अज्ञान के हट जाने और अपने वास्तविक स्वरूप के ज्ञान के उदय होने पर होती है । सूत्र १७-मध्य के विकास से चिदानन्द लाभ होता है । मध्य के विकास से चिदानन्द का लाभ होता है। संवित् या चित्-शक्ति ही मध्य है। संवित् इसलिए मध्य कहलाता है, क्योंकि यह सब कुछ का अन्तरतम तथ्य और आश्रय है । व्यक्ति में वह सुषुम्ना नाड़ी है । व्यक्ति में जब मध्य का विकास होता है अर्थात् उसमें जब सुषुम्ना का विकास होता है तब उसे समष्टि चेतना के चिदानन्द का लाभ होता है । सूत्र १८-मध्य के विकास के लिए निम्नलिखित उपाय हैं:— विकल्पक्षय ; शक्ति का संकोच और विकास; वाहों का ध्वंस; आदि और अन्त कोटियों का अभ्यास । विकल्पक्षय सर्वश्रेष्ठ उपाय है। इसमें साधक को चाहिए कि वह अपने चित्त को हृदय में एकाग्र करे, किसी विकल्प को न उठने दे । इस प्रकार चित्त को अविकल्प दशा में लाकर देह, प्राण इत्यादि से भिन्न आत्मा को वास्तविक प्रमाता के रूप में वह चेतना में केन्द्रीभूत करे, तो मध्य का विकास होगा और साधक तुर्य और तुर्यातीत दशा में पहुँच जायगा । मध्य- विकास के लिए प्रत्यभिज्ञा शास्त्र का यह मुख्य उपाय है । अन्य उपाय प्रत्यभिज्ञा शास्त्र के नहीं हैं, किन्तु उपयोगी होने के कारण बतलाये गये हैं । शक्ति का संकोच और विकास :—शक्ति का संकोच—इसका अर्थ इन्द्रियों के द्वारा जो चेतना बहिर्मुखी होती है उसे अन्तर्मुखी करके आत्मा पर केन्द्रित करना है। शक्ति का विकास—इसका अर्थ यह है कि इन्द्रियां पदार्थों की ओर प्रवृत्त हों, परन्तु चित्त भीतर की ओर केन्द्रित हो । शंवित के संकोच और विकास का दूसरा उपाय है ऊर्ध्वकुण्डलिनी में प्रसर और विश्रान्ति का अभ्यास । उत्थानदशा में भी समाधि के अनुभव को स्थिर रखना प्रसर या विकास है और पुनः समाधि में चला जाना और उस दशा में स्थिर रहता विश्रान्ति या संकोच है ।

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( ४२ ) तीसरा उपाय है बाह्यच्छेद । इसमें प्राण और अपान को हृदय में पहले रोक कर स्वररहित ककार, हकार वर्णों के उच्चारण से उनका निरोध किया जाता है। चौथा उपाय है आद्यन्तकोटिनिभालन । इसका अर्थ है प्राण का आदि अर्थात् हृदय से उठना और अन्त अर्थात् वहां से बाहर १२ अंगुल के अन्तर पर समाप्त होना—इन दोनों के अवधान का अभ्यास । सूत्र १६—समाधि के संस्कार से परिपूर्ण व्युत्थान में बराबर चित् (पार- मार्थिक चेतना) के साथ अपने ऐक्य का चिन्तन करते रहने से शाश्वत समाधि का लाभ होता है । व्युत्थानदशा में भी निमीलन समाधि के द्वारा योगी समस्त विश्व को चित् में निलीन कर लेता है और क्रममुद्रा द्वारा शाश्वत समाधि लाभ करता है। सूत्र २०—क्रममुद्रा सिद्धि के अनन्तर प्रकाश और आनन्द का सार महा- मंत्र का वीर्यरूप पूर्ण अहन्ता में समावेश होने से अपने उस संविद् देवता के समूह पर प्रभुत्व की प्राप्ति होती है जो सारे विश्व की सृष्टि और संहार करता रहता है। यह सब शिव का स्वभाव है । जब क्रममुद्रा सिद्ध हो जाती है तब साधक का पूर्ण अहन्ता में समावेश हो जाता है और वह संविद्देवता के समूह पर प्रभुत्व प्राप्त करलेता है जिससे सारे विश्व की सृष्टि और संहार होता है । पूर्ण अहन्ता प्रकाशानन्दमय है। इसमें समावेश होने पर जीव देह, प्राण, इन्द्रिय इत्यादि को अहं नहीं समझता । अब वह भागवती अन्तर्ज्योति को ही अहं मानता है। यह वास्तविक अहं संविद, सदाशिव और महेश्वर है । सभी वेद्य का अपने भीतर विश्रान्ति वास्तविक अहंभाव है। यही अहं सभी मंत्रों का सार है और परम वीर्यशाली है । यह समष्टि चित् ही है। इस पूर्णाहन्ता के लाभ होने पर उस संवित्देवतासमूह पर प्रभुत्व हो जाता है जिसके द्वारा सृष्टि और संहार होता रहता है ।

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जो मंगल की मूर्ति है उसे नमस्कार । अब (प्रारम्भ होता है) १ प्रत्यभिज्ञाहृदय नमः शिवाय सततं पञ्चकृत्यविधायिने । चिदानन्दघनस्वात्मपरमार्थविभासिने ॥१॥ शांकरोपनिषत्सारप्रत्यभिज्ञामहोदधेः । क्षेमेणोद्ध्रियते सारः संसारविषशान्तये ॥२॥ (स्वरूप को पहचानने के लिए रहस्यशास्त्र ) उस शिव २ को नमस्कार है जो सतत ३ या बराबर पंचकृत्यों ४ को करता रहता है, जो चिदानन्दघनस्वरूप ५ अपने आत्मा ६ रूपी परमार्थ ७ को (जो कि प्रत्येक का आत्मा है) अवभासित करता है । शंकर ८ सम्बन्धी जो उपनिषद् ९ या रहस्य है उसका सार प्रत्यभिज्ञा है । उस प्रत्यभिज्ञा रूपी महासमुद्र से संसार रूपी १० विष को शान्त करने के लिए सार (श्रेष्ठभाग) क्षेमराज ने निकाल कर (इस ग्रन्थ में) रख दिया है ।

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४४ प्रत्यभिज्ञाहृदय इह ये सुकुमारमतयोऽकृततीक्ष्णतर्कशास्त्रपरिश्रमाः शक्ति- पातोन्मिषित-पारमेश्वरसमावेशाभिलाषिणः कतिचित् भक्तिभाजः तेषाम् ईश्वरप्रत्यभिज्ञोपदेशतत्त्वं मनाक् उन्मील्यते तत्र स्वात्मदेवताया एव सर्वत्र कारणत्वं सुखोपायप्राप्यत्वं महाफलत्वं च अभिव्यङ्क्तुमाह चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धि हेतुः ॥१॥ ‘विश्वस्य’-सदाशिवादेः भूम्यन्तस्य ‘सिद्धौ’-निष्पत्तौ, प्रका- शने, स्थित्यात्मनि, परप्रमातृविश्रान्त्यात्मनि च संहारे, पराशक्ति- रूपा ‘चितिः’ भगवती ‘स्वतन्त्रा’-अनुत्तरविमर्शमयी शिवभट्टा- रकाभिन्ना ‘हेतुः’-कारणम् । अस्यां हि प्रसरन्त्यां जगत् उन्मिषति व्यवतिष्ठते च, निवृत्तप्रसरायां च निमिषति;-इति स्वानुभव एव अनु०- इस संसार में कुछ ऐसे भक्त लोग हैं जो सुकुमारमति के हैं (अर्थात् जिनकी मननशक्ति विकसित नहीं हुई है) जिन्होंने कठिन तर्कशास्त्र ११ में परिश्रम नहीं किया है, किन्तु जो परमेश्वर के साथ उस समावेश १२ की अभिलाषा करते है जो कि शक्तिपात से विकसित होता है, उनके लिए ईश्वर- प्रत्यभिज्ञा १३ में जो उपदेश हैं उसके तत्त्व को थोड़ा खोला जा रहा है । स्वात्म रूपी देवता ही सब का कारण है, वही (परमार्थ की) प्राप्ति का सरल उपाय है, वही (जीवन का) उत्कृष्ट फल है—यह स्पष्ट करने के लिए कहते हैं :- सूत्र १४ १-(अनु०) स्वतंत्र १५ चिति १६ ही विश्व की सिद्धि का हेतु है। भाष्य :- विश्वस्य-अर्थात् सदाशिव १८ से लेकर भूमि तक विश्व के सिद्धौ-सिद्धि में अर्थात् प्रकाशन या सृष्टि में, स्थिति में और पर (सर्वोच्च) प्रमाता १९ (ज्ञाता) में-विश्रान्ति रूपी संहार में, परा (सर्वोच्च) शक्ति २० रूपा चिति जो स्वतंत्र है, जो उत्तम विमर्शमयी २१ है, जो शिवभट्टारक २२ से अभिन्न है, हेतु अर्थात् कारण है ।

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प्रत्यभिज्ञाहृदय ४५ अत्र साक्षी । अन्यस्य तु मायाप्रकृत्यादेः चित्प्रकाशभिन्नस्य अप्रकाश- मानत्वेन असत्त्वात् न क्वचिदपि हेतुत्वम्; प्रकाशमानत्वे तु प्रकाशै- कात्म्यात् प्रकाशरूपा चितिरेव हेतुः; न त्वसौ कश्चित् । अत एव देशकालाकारा एतत्स्सृष्टा एतदनुप्राणिताश्च नैतत्स्वरूपं भेत्तुमलम्;- इति व्यापक-नित्योदित-परिपूर्णरूपा इयम्-इत्यर्थलभ्यमेव एतत् । ननु जगदपि चितो भिन्नं नैव किञ्चित्; अभेदे च कथं हेतुहेतुमद्भावः ? उच्यते । चिदेव भगवती स्वच्छस्वतन्त्ररूपा तत्तदनन्तजगदात्मना स्फुरति,-इत्येतावत्परमार्थोऽयं कार्यकार- रणभावः । यतश्च इयमेव प्रमातृ-प्रमाण-प्रमेयमयस्य विश्वस्य इस पराचिति के ही प्रसरण से जगत् का अस्तित्व और स्थिति होती है इसका प्रसरण जब समाप्त हो जाता है तब जगत् का संहार हो जाता है । इसमें अपना अनुभव ही साक्षी है । अन्य किसी वस्तु का, माया, प्रकृति इत्यादि का जो चित्प्रकाश से भिन्न है, अतः अप्रकाशित होने के कारण जिसका अस्तित्व ही नहीं है, कभी भी विश्व की सिद्धि में कारणत्व नहीं हो सकता । यदि कहो कि माया, प्रकृति इत्यादि भी तो प्रकाशित है, तो वे प्रकाश से अभिन्न हो जायँगी । अतः प्रकाशरूपी चिति (विश्वसिद्धि में) हेतु है, न कि माया इत्यादि कोई वस्तु । अतएव देश, काल और आकार जिनकी सृष्टि इसी (चिति) से ही हुई है और जो इसी (चिति) से अनुप्राणित हैं इसके स्वरूप के भेदन करने में समर्थ नहीं हैं, क्योंकि यह (चिति) व्यापक, नित्य उदित है और (अपने आप में) परिपूर्ण है । (सब सूत्र के) अर्थ से यही समझना चाहिए । यह शंका की जा सकती है (ननु) कि (यदि चित् ही सब कुछ है तब जगत् तो चित् से भिन्न होने के कारण कुछ नहीं है (अर्थात् इसका कोई अस्तित्व नहीं है) यदि (चित् और जगत् में) अभेद माना जाय, तो कार्य-कारण-भाव कैसे बन सकता है ? *

  • कार्य-कारण-भाव में कार्य कारण से भिन्न समझा जाता है । चित् जगत् का कारण माना गया है, किन्तु यदि चित् और जगत् में अभेद है, तो जगत् चित् का कार्य कैसे हो सकता है, क्योंकि कार्य को तो कारण से भिन्न होना चाहिए ।
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४६ प्रत्यभिज्ञाहृदय सिद्धौ-प्रकाशने हेतुः, ततोऽस्याः स्वतन्त्रापरिच्छिन्नस्वप्रकाशरूपायाः सिद्धौ अभिनवार्थप्रकाशनरूपं न प्रमाणवराकमुपयुक्तम् उपपन्नं वा। तदुक्तं त्रिकसारे 'स्वपदा स्वशिरश्छायां यद्वल्लङ्घितुमीहते । पादोद्देशे शिरो न स्यात्तथेयं बैन्दवी कला ॥' इति । यतश्च इयं विश्वस्य सिद्धौ पराद्वयसामरस्यापादनात्मनि च संहारे हेतुः, तत एव स्वतन्त्रा। प्रत्यभिज्ञातस्वातन्त्र्या सती, भोग- (उत्तर में कहा जाता है कि) स्वच्छ और स्वतंत्र होने के कारण भगवती चित् ही नाना प्रकार के अनन्त जगत् के रूप में उल्लसित होती है। कार्य कारण भाव यहाँ पर परमार्थ ❊ में प्रयुक्त हुआ है और केवल इतना ही उसका यहाँ तात्पर्य है। यतः चित् ही प्रमातृ २४-प्रमाण २५-प्रमेय २६-मय विश्व की सिद्धि अर्थात् प्रकाशन में हेतु है अतः इस स्वतंत्र अपरिच्छिन्न (असीम), स्वप्रका- शरूप चित् को सिद्ध करने में बेचारा प्रमाण जिसका नये नये अर्थों के प्रकाशन करने का स्वभाव है न तो उपयुक्त ही है, न उपपन्न ही † यह बात त्रिकसार में (इस प्रकार) कही गयी है । जैसे जब कोई अपने सिर की छाया को अपने पैर से लांघना चाहता है, तो सिर कभी भी पैर के स्थान पर नहीं होता, वैसे ही ( वैसा ही तथ्य ) इस वैन्दवी कला २७ (के विषय में है) यह (चिति) विश्व की सिद्धि में तथा परम अद्वय (चित्) से समरस २८ कर देने वाले संहार में भी हेतु है, इसलिए यह स्वतंत्र है २९ है। [यतः चिति विश्व की सृष्टि, स्थिति और संहार तीनों का हेतु है अतः वह स्वतंत्र है।] जब इसके स्वातन्त्र्य की पहचान हो जाती है, तो यह चित शक्ति भोगमोक्ष- ❊ परमार्थ में कार्य-कारण भाव में क्रम नहीं है। क्रम में ही कार्य कारण से भिन्न होता है। चित् का स्फुरण ही जगत् का उन्मेष है। दोनों का यौगपद्य (एक साथ होना) है। क्रम नहीं है। † कहने का तात्पर्य यह है कि प्रमाण का तो कार्य है किसी नये अर्थ को सिद्ध करना। जो सदा वर्तमान है उसे प्रमाण क्या सिद्ध करेगा ?

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प्रत्यभिज्ञाहृदय ४७ मोक्षस्वरूपाणां विश्वसिद्धीनां हेतुः ।-इति आवृत्त्या व्याख्येयम् । अपि च 'विश्वं'-नील-सुख-देह-प्राणादि; तस्य या 'सिद्धिः'- प्रमाणोपारोहक्रमेण विमर्शमयप्रमात्रावेशः, सैव 'हेतुः'-परिज्ञाने उपायो यस्याः । अनेन च सुखोपायत्वमुक्तम् । यदुक्तं श्रीविज्ञान- भट्टारके 'ग्राह्यग्राहकसंवित्तिः सामान्या सर्वदेहिनाम् । योगिनां तु विशेषोऽयं संबन्धे सावधानता ॥' इति । 'चितिः'-इति एकवचनं देशकालाद्यनवच्छिन्नताम् अभिदधत् समस्तभेदवादानाम् अवास्तवतां व्यनक्ति । 'स्वतन्त्र'-शब्दो रूपी १० विश्वसिद्धि का भी हेतु होती है। इस दूसरे प्रकार से भी इसकी व्याख्या कर लेनी चाहिए । ( अब हेतु शब्द को उपाय के अर्थ में लेकर व्याख्या करते हैं ) विश्व का अर्थ नील (इत्यादि बाह्य पदार्थ), सुख (इत्यादि आन्तरिक संवेदन ), देह, प्राण ( इत्यादि परिमित प्रमाता ) उसकी जो सिद्धि अर्थात् प्रमाण के आरोहक्रम ११ से विमर्शमय प्रमाता में आवेश है, वही सिद्धि उस चिति शक्ति के पहिचान में हेतु अर्थात् उपाय है । उपाय यहां आसान उपाय के अर्थ में कहा गया है जैसा कि श्री विज्ञानभट्टारक में कहा गया है । (विज्ञान भैरव श्लोक १०६ ) “ज्ञेय और ज्ञाता का ज्ञान सभी देहधारियों के लिए सामान्य है, किन्तु योगियों की विशेषता यह है कि वह इस संबंध के विषय में सजग रहता है ।” ( अर्थात् वह यह समझता है कि ग्राह्य या ज्ञेय सर्वदा ग्राहक या ज्ञाता से सम्बद्ध रहता है । बिना ज्ञाता से सम्बद्ध हुए कोई ज्ञेय हो ही नहीं सकता जहां से ज्ञाता का उदय होता है और जिसमें उसकी विश्रान्ति होती है उसका योगी को सदा भान रहता है ) (सूत्र में) चिति जो एकवचन में है यह बतलाते हुए कि वह देश, काल इत्यादि से परिसीमित नहीं है समस्त भेदवादों की अवास्तविकता को व्यक्त करती है ।

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४८ प्रत्यभिज्ञाहृदय ब्रह्मवादवैलक्षण्यम् आचक्षाणः चितो माहैश्वर्यसारतां ब्रूते । ‘विश्व’- इत्यादिपदम् अशेषशक्तित्वं, सर्वकारणत्वं, सुखोपायत्वं महाफलं च आह ॥ १ ॥ ननु विश्वस्य यदि चितिः हेतुः, तत् अस्या उपादानाद्यपेक्षायां भेदवादापरित्यागः स्यात्-इत्याशङ्क्य आह स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति ॥ २ ॥ ‘स्वेच्छया’ न तु ब्रह्मादिवत् अन्येच्छया तयैव च, न तु उपादानाद्यपेक्षया,-एवं हि प्रागुक्तस्वातन्त्र्यहान्या चित्त्वमेव न घटेत-‘स्व भित्तौ’, न तु अन्यत्र क्वापि, प्राक् निर्णीतं ‘विश्वं’ दर्पणे नगरवत् अभिन्नमपि भिन्नमिव ‘उन्मीलयति’ । उन्मीलनं च अव- (सूत्र में) स्वतंत्र शब्द ब्रह्मवाद३२ से विलक्षणता बतलाते हुए यह भी बतलाता है कि चित् का सार है महान् ऐश्वर्य । (सूत्र में) विश्व इत्यादि पद यह बतलाते हैं कि चिति की शक्ति अपरि- सीमित है, वही सबका कारण है, वही (उसी का परिज्ञान) (मोक्ष का) सरल उपाय है, और वही जीवन का परम फल है । यहाँ यह शंका उठती है (ननु) कि यदि चिति विश्व सिद्धि का हेतु है तो उसको उपादान इत्यादि की आवश्यकता होने से भेदवाद का परित्याग नहीं हो सकता । ऐसी शंका करके (उत्तर में) कहते हैं । सूत्र २-(अनुवाद) अपनी ही इच्छा से, अपनी ही भित्ति (आधार) पर वह (चिति) विश्व को व्यक्त करती है । भाष्य (अनु०) स्वेच्छया अपनी ही इच्छा से, दूसरे (मायाइ०) की इच्छा से नहीं जैसा कि ब्रह्मवादी (वेदान्ती) मानता है, उसी (इच्छा ही) के द्वारा, न कि उपादान (वस्तु तैयार करने की सामग्री) आदि के भरोसे । ऐसा होने पर (अर्थात् उपादान कारण आदि के भरोसा करने पर) पहले कहे हुए (प्रथम सूत्र में कहे हुए) स्वातंत्र्य के अभावके कारण उसका चित् होना ही (चित्त्वं) नहीं सम्भव हो सकता (अर्थात् चित् और स्वातंत्र्य अवियोज्य हैं ।) 'स्वभित्तौ' अपनी ही भित्ति पर, अपने ही आधार पर और कहीं नहीं । पहले (प्रथम सूत्र में) निश्चित रूप से बतलाये हुए विश्व को दर्पण में नगर के समान अभिन्न होते हुए भी भिन्न के समान व्यक्त करती है ।३३

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प्रत्यभिज्ञाहृदय ४६ स्थितस्यैव प्रकटीकरणम् ।-इत्यनेन जगतः प्रकाशैकात्म्येन अवस्था- नम् उक्तम् ॥ २ ॥ अथ विश्वस्य स्वरूपं विभागेन प्रतिपादयितुमाह । तन्नाना अनुरूपग्राह्यग्राहकभेदात् ॥ ३ ॥ 'तत्' विश्वं 'नाना'-अनेकप्रकारम् । कथं ? 'अनुरूपाणां'- परस्परोचित्यावस्थितीनां 'ग्राह्याणां ग्राहकाणां' च 'भेदात्'-वैचि- त्र्यात् । तथा च सदाशिवतत्त्वे अहन्ताच्छादित-अस्फुटेदन्तामयं यादृशं परापररूपं विश्वं ग्राह्यं, तादृगेव श्रीसदाशिवभट्टारकाधिष्ठितो मन्त्र- महेश्वराख्यः प्रमातृवर्गः परमेश्वरेच्छावकल्पिततथावस्थानः । ईश्वर- सूत्र में जो उन्मीलन शब्द आया है वह (चिति में पहले से ही अव्यक्त रूप में) जो स्थित है उसको प्रकट या व्यक्त करने के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । इस सूत्र से जगत् का (सृष्टि से पूर्व) प्रकाश रूप में ही स्थित रहना बतलाया गया है । अब विश्व का स्वरूप विभाग द्वारा स्पष्ट करने के लिए कहते हैं । सूत्र ३—विश्व (परस्पर) अनुरूप ग्राह्य (प्रमेय) और ग्राहक (प्रमाता) के भेद से नाना प्रकार का है । भाष्य—(सूत्र में जो) 'तत्' (वह) शब्द है, वह विश्व के लिए प्रयुक्त है । जो 'नाना' शब्द है वह 'अनेक प्रकार' के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । कैसे ? परस्पर उपयुक्त रूप में स्थित ग्राह्य (प्रमेय) और गाहक (प्रमाता) के भेद अर्थात् वैचित्र्य से । (ग्राह्य और ग्राहक की अनुरूपता निम्नलिखित है) सदाशिवतत्त्व में जिस प्रकार परापर रूप विश्व जो कि 'मैं' के भाव (अहन्ता) से आच्छादित है और जिसमें 'इस' का भाव (इदन्ता) अस्फुट है ग्राह्य (प्रमेय या विषय) है उसी के अनुरूप मंत्रमहेश्वर नाम के (वहाँ) प्रमाता भी हैं जिनके अधिष्ठाता पूज्य सदा शिव हैं और जिनकी उस दशा में स्थिति परमेश्वर की इच्छा से होती है ।

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५० प्रत्यभिज्ञाहृदय तत्त्वे स्फुटेदन्ताहन्तासामानाधिकरण्यात्म यादृक् विश्वं ग्राह्यं, तथाविध एव ईश्वरभट्टारकाधिष्ठितो मन्त्रेश्वरवर्गः । विद्यापदे श्रीमदनन्तभट्टार- काधिष्ठिता बहुशाखावान्तरभेदभिन्ना यथाभूता मन्त्राः प्रमातारः, तथाभूतमेव भेदैकसारं विश्वमपि प्रमेयम् । मायोध्वे यादृशा विज्ञाना- कलाः कर्तृताशून्यशुद्धबोधात्मानः, तादृगेव तदभेदसारं सकल-प्रलया- कलात्मक-पूर्वावस्थापरिमितम् एषां प्रमेयम् । मायायां शून्यप्रमातृणां प्रलयकेवलिनां स्वोचितं प्रलीनकलं प्रमेयम् । क्षितिपर्यन्तावस्थितानां तु सकलानां सर्वतो भिन्नानां परिमितानां तथाभूतमेव प्रमेयम् । तदुत्तीर्णशिवभट्टारकस्य प्रकाशैकवपुषः प्रकाशैकरूपा एव भावाः । ईश्वर तत्व³⁷ में जिस प्रकार का विश्व ग्राह्य या विषय है जिसमें कि 'मैं' (अहन्ता) और 'यह' (इदन्ता) समान रूप से स्फुट या स्पष्ट हैं उसी प्रकार उसमें मन्त्रेश्वर वर्ग ग्राहक या प्रमाता है (जिसको 'मैं' और 'यह' एक साथ समान रूप से स्पष्ट है) । उस मंत्रेश्वर वर्ग का अधिष्ठाता पूज्य ईश्वर है । विद्या अर्थात् शुद्ध विद्या पद में जैसे भिन्न-भिन्न 'मंत्र' प्रमाता (ज्ञाता) होते हैं वैसे ही उनके द्वारा प्रमेय (ज्ञेय) विश्व भी ऐसा है जिसका भेद ही एक सार है । इन मंत्रों की बहुत सी शाखाएँ हैं और वे अन्यान्य भेद के कारण परस्पर भिन्न हैं । उनका अधिष्ठाता अनन्त भट्टारक है । माया से ऊपर (और शुद्ध विद्या से नीचे) जिस प्रकार विज्ञानाकल प्रमाता हैं जो कर्तृता से शून्य हैं और शुद्ध बोधरूप हैं उसी प्रकार उनसे अभिन्न और पूर्व अवस्था में परिचित सकल और प्रलयाकल उनके प्रमेय हैं । माया के स्तर पर शून्य प्रमाता या प्रलयकेवली³⁸ होते हैं जिनका प्रमेय अर्थात् ज्ञेय विषय शून्यप्राय होता है जो कि उनकी दशा के लिए उचित ही है । (प्रलयाकल के अनन्तर) (माया से लेकर) पृथ्वो तक सकल³⁹ अवस्थित हैं जो कि परिमित होते हैं और सबसे भिन्न होते हैं । जैसे ये परि- मित और भिन्न होते हैं वैसे ही ( तथाभूतम् ) इनका प्रमेय भी परिमित और भिन्न होता है । इन सबसे (अर्थात् मंत्रमहेश्वर से लेकर सकल तक जो प्रमाता हैं) परे शिव भट्टारक (पूज्य, आदरणीयशिव) है जो कि केवल प्रकाशरूप⁴⁰ है और जिसकी सभी अवस्थाएँ भी प्रकाशरूप ही हैं। श्रीमत्परमशिव की