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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

तृतीयोऽध्यायः । ११३

तृतीयोऽध्यायः । ११३

अथ शोधनान्तरम्—

कासीसं शुद्धिमाप्नोति पित्तैश्च रजसा स्त्रियाः ॥ ५७ ॥

कासीस को पञ्चपित्त ( वराह, छाग, महिष, मत्स्य, मयूरपित्त, ) और स्त्री के मासिक धर्म कालीन शोणित से भिगो देने पर शुद्धि होती है ॥ ५७ ॥

कासीसप्रयोगः—

बलिना हतकासीसं क्रान्तं कासीसमारितम् ।
उभयं समभागं हि त्रिफलावेल्लसंयुतम् ॥ ५८ ॥
विषमांशघृतक्षौद्रप्लुतं शाणमितं प्रगे ।
सेवितं हन्ति वेगेन श्वित्रं पाण्डुक्षयामयम् ॥ ५९ ॥
गुल्मप्लीहगदं शूलं मूलरोगं विशेषतः ।
रसायनविधानेन सेवितं वत्सरावधि ॥ ६० ॥
आमसंशोषणं श्रेष्ठं मन्दाग्निपरदीपनम् ।
पलितं वलिभिः सार्धं विनाशयति निश्चितम् ॥ ६१ ॥

इति कासीसाधिकारः ।

गन्धक से मारण की हुई कासीस भस्म और कासीस से मारण की हुई लौह भस्म या वैक्रान्तभस्म इन दोनों को समान भाग लेकर खरल में घोट लें इसमें से एक शाण (चोअन्नी) भर लेकर त्रिफला चूर्ण और वायविडङ्गचूर्ण विषम मात्रा से घृत तथा मधु मिलाकर प्रातःकाल नित्य सेवन करने से श्वेत कुष्ठ, पाण्डु, क्षयरोग, पञ्चप्रकार के गुल्म, प्लीहवृद्धि, शूल, अर्श नष्ट होते हैं । इस योग को रसायन-विधि से एकवर्ष पर्यन्त सेवन करने से आंवरोग सूख जाता है, मन्दाग्नि दीप्त हो जाती है, बालों का श्वेत होना तथा गिरना दोनों रोग निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं ॥ ५८-६१ ॥

अथ तुवरीनिरूपणम्—

तुवरीपरिचयः—

सौराष्ट्राश्मनि सम्भूता मृत्स्ना सा तुवरी मता ।
वस्त्रेषु लिप्यते यासौ मञ्जिष्ठारागबन्धिनी ॥ ६२ ॥

सोराष्ट्रदेश के पत्थरों की खान से पैदा होने वाली मृत्तिका को तुवरी

रस० ८

११४ रसरत्नसमुच्चये—

( फिटकरी ) कहते हैं । यह वस्त्रों को रंग देती है तथा मंजीठ के रंग को पक्का बनाती है ॥ ६२ ॥
विमर्शः— तुवरी वह मृत्तिका है कि जिस का शुद्ध करके फिटकरी बनाते हैं । बङ्गाल केमिकल और फार्मास्यूटिकल कम्पनी कलकत्ता आदि स्थान इसका अधिक निर्माण करते हैं ।

तुवरीभेदा:—

फटकी फुल्लिका चेति द्वितीया परिकीर्तिता ॥ ६३ ॥
इसी का द्वितीय भेद फुल्लिका या फूलफिटकरी कहलाता ॥ ६३ ॥

तुवरीलक्षणगुणा:—

ईषत्पीता गुरुः स्निग्धा पीतिकाविषनाशिनी ।
व्रणकुष्ठहरा सर्वकुष्ठघ्नी च विशेषतः ॥ ६४ ॥
निर्भारा शुभ्रवर्णा च स्निग्धा साम्लाऽपरा मता ।
सा फुल्ला तुवरी प्रोक्ता लेपात्ताम्रं चरेद्यः ॥ ६५ ॥
काङ्क्षी कषाया कटुकाम्लकण्ठ्या केश्या व्रणघ्नी विषनाशिनी च ।
श्वित्रापहा नेत्रहिता त्रिदोषशान्तिप्रदा पारदजारणी च ॥ ६६ ॥

फिटकरी कुछ पीत, स्निग्ध और भारी होती है तथा विष, व्रण, कुष्ठ को नष्ट करती है । जो फिटकरी श्वेत होती है वह भार में हलकी, स्निग्ध और खट्टी होती है, इसे फूल फिटकरी कहते हैं । ताम्र पर इसका लेप करने से शीघ्र भस्म हो जाती है । फिटकरी कषाय, कटु तथा अम्ल स्वादवाली होती है । यह कण्ठ और केशों को लाभ पहुंचाती है । व्रणविष, श्वेतकुष्ठ को नष्ट करती है तथा त्रिदोष को साम्यावस्था में रखती है । इससे पारद का जारण हो जाता है ॥ ६४–६६ ॥

अथ तुवरीशोधनम्—

तुवरी काञ्जिके क्षिप्ता त्रिदिनाच्छुद्धिमृच्छति ॥ ६७ ॥
फिटकरी को तीन दिन तक काञ्जी में डालकर रखने से शुद्ध हो जाती है॥६७॥

तुवरीसत्त्वपातनविधिः—

क्षाराम्लैर्मर्दिता ध्माता सत्त्वं मुञ्चति निश्चितम् ॥ ६८ ॥
गोपित्तेन शतं वारान् सौराष्ट्रीं भावयेत्ततः ।
धमित्वा पातयेत्सत्त्वं क्रामणं चातिगुह्यकम् ॥ ६९ ॥

इति तुवर्याधिकारः ।

तृतीयोऽध्यायः। [११५]

इसको क्षार और अम्ल पदार्थों के साथ घोटकर फूंकने से औषधोपयोगी सत्त्व निकलता है। अथवा गोपित्त (गोरोचन) से सौ भावना देकर फूंक कर सत्त्वपातन करना चाहिए। यह सत्त्व रस तथा उपरसों के बन्धन करने में श्रेष्ठ है तथा गोपनीय है ॥ ६८-६९ ॥

अथ तालकसन्निरूपणम्—

तालकभेदाः—

हरतालं द्विधा प्रोक्तं पत्राद्यं पिण्डसंज्ञकम् ॥ ७० ॥

हरताल दो तरह की होती है, एक पत्र हरताल और दूसरी पिण्डहरताल कहलाती है ॥ ७० ॥

पत्रतालकलक्षणम्—

स्वर्णवर्णं गुरु स्निग्धं तनुपत्रञ्च भासुरम् ।
तत्पत्रतालकं प्रोक्तं बहुपुत्रं रसायनम् ॥ ७१ ॥

जो हरताल सुवर्ण के समान पीतवर्ण, भारी, स्निग्ध और छोटे २ पत्रों की रचना वाली तथा चमकती हुई होती है उसे पत्रहरताल कहते हैं। यह पुत्र देने वाली और रसायन गुणदायक होती है ॥ ७१ ॥

पिण्डतालकलक्षणम्—

निष्पत्रं पिण्डसदृशं स्वल्पसत्त्वं तथा गुरु ।
स्त्रीपुष्पहरं तच्च गुणालपं पिण्डतालकम् ॥ ७२ ॥

जो हरताल पत्ररचनारहित, पिण्डसदृश, अल्पसार और भारी होती है उसे पिण्डहरताल कहते हैं। यह स्त्रियों के मासिक धर्म को नष्ट करती है तथा पत्रहरताल से अल्प गुणों वाली होती हैं ॥ ७२ ॥

विमर्शः— हरताल गन्धक और सङ्खिया का यौगिक है। मनःशिला भी गन्धक और सङ्खिया का यौगिक है किन्तु इनके अणुओं के सङ्गठन के कारण गुणों में भेद हो जाता है और इसी लिये ये दोनों पदार्थ पृथक् २ लिखे गये हैं। आजकल प्रायः ये दोनों पदार्थ कृत्रिम ही बाजार में मिलते हैं किन्तु भारतवर्ष के अल्मोड़ा के पहाड़ों की खानों में तथा अन्य देशों में प्राकृतिक भी मिलते हैं। हरताल को आर्पिमेण्ट ( Arpiment ) कहते हैं। इसके शास्त्रों में जो भेद हैं उनका वर्णन मूल में देखिये।

अथ गुणाः—

श्लेष्मरक्तविषवातभूतनुत्केवलञ्च खलु पुष्पहारिस्त्रियाः ।

११६ रसरत्नसमुच्चये—

स्निग्धमुष्णकटुकञ्च दीपनं कुष्ठहारि हरितालमुच्यते ॥ ७३ ॥

हरताल दूषित कफ, रक्तविकार, विष, भूतवाधा (कृमियों का आक्रमण) और वायु के विकारों को दूर करती है। स्त्रियों के मासिकधर्म को नष्ट करती है और स्निग्ध, उष्ण, कड़वी तथा अग्निदीपक और कुष्ठ को नष्ट करती है ॥ ७३ ॥

अथ हरतालशुद्धिः—

स्विन्नं कूष्माण्डतोये वा तिलक्षारजलेऽपि वा ।
तोये वा चूर्णसंयुक्ते दोलायन्त्रेण शुद्ध्यति ॥ ७४ ॥

हरताल को दोलायन्त्रद्वारा कुष्माण्डस्वरस, तिलक्षारोदक या चूने के जल में स्वेदन करने से शुद्ध हो जाती है ॥ ७४ ॥

अशुद्धतालसेवनदोषाः—

अशुद्धं तालमायुर्घ्नं कफमारुतमेहकृत् ।
तापस्फोटाङ्गसङ्कोचं कुरुते तेन शोधयेत् ॥ ७५ ॥

अशुद्ध हरताल आयु को नष्ट करती है, कफ तथा वायु के रोग और प्रमेह उत्पन्न करती है। शरीर में जलन, सङ्कोच और फोड़ा फुन्सी उत्पन्न करती है, इस कारण इसका शोधन करना चाहिये ॥ ७५ ॥

मतान्तरेण तालशोधनम् ।

तालकं कणशः कृत्वा दशांशेन च टङ्कणम् ।
जम्बीरोत्थद्रवैः क्षाल्यं काञ्जिकैः क्षालयेत्ततः ॥ ७६ ॥
वस्त्रे चतुर्गुणे बद्ध्वा दोलायन्त्रे दिनं पचेत् ।
सचूर्णेनारनालेन दिनं कूष्माण्डजे रसे ।
स्वेद्यं वा शाल्मलीतोयैस्तालकं शुद्धिमाप्नुयात् ॥ ७७ ॥

हरताल के टुकड़े २ कर के उसमें दशमांश सुहागा मिलाकर निम्बूरस से सात वार और काञ्जी से भी सातवार घोट के धोकर चारपर्त किए वस्त्र में बांध कर दोलायन्त्र द्वारा एक दिन तक चूनामली हुई काञ्जी में स्वेदन करें अथवा कुष्माण्ड जल में या शाल्मली रस में स्वेदन करें इस तरह ताल शुद्ध हो जाती है ॥ ७६–७७ ॥

अथ मतान्तरेण शोधनमारणनिरूपणम्—

मधुतुल्ये घनीभूते कषाये ब्रह्ममूलजे ।
त्रिवारं तालकं भाव्यं पिष्ट्वा मूत्रेऽथ माहिषे ॥ ७८ ॥

तृतीयोऽध्यायः । ११७

तृतीयोऽध्यायः । ११७

उपलेर्दशभिर्देयं पुटं रुद्ध्वाथ पेषयेत् । एवं द्वादशधा पाच्यं शुद्धं योगेषु योजयेत् ॥ ७९ ॥

ढाक ( पलाश ) की जड़ का शहद के समान गाढा क्वाथ बनाकर इससे तीन वार शुद्ध हरताल को भावित कर पश्चात् भैंस के मूत्र में घोटकर गोला बना-कर सम्पुट में रख कर कपड़ मिट्टी द्वारा बन्दकर दस जङ्गली उपलों से पुट देना चाहिए । इस तरह द्वादश पुट देने से हरताल शुद्ध तथा मृत हो जाती है । इसको योग बनाने में लेना चाहिये ॥ ७८-७९ ॥

सत्त्वपातनम्—

कुलित्थक्वाथसौभाग्यमहिष्याज्यमधुप्लुतम् । स्थाल्यां क्षिप्त्वा विदध्याच्च मल्लेन छिद्रयोगिना ॥ ८० ॥ सम्यङ् निरुध्य शिखिनं ज्वालयेत्क्रमवर्धितम् । एकप्रहरमात्रं हि रन्ध्रमाच्छाद्य गोमयैः ॥ ८१ ॥ यामान्ते छिद्रमुद्घाट्य दृष्टे धूमे च पाण्डुरे । शीतां स्थालीं समुत्तार्य सत्त्वमुत्कृष्य चाहरेत् ॥ ८२ ॥ सर्वपाषाणसत्त्वानां प्रकाराः सन्ति कोटिशः । ग्रन्थविस्तरभीत्याऽत्र लिखिता न मया खलु ॥ ८३ ॥

शुद्ध हरताल तथा सुहागा समान भाग लेकर कुलत्थ क्वाथ, भैंस का घी और शहद के साथ घोटकर गोला बना लें, उस गोले को एक हण्डिका में रख कर मध्यछिद्र युक्त सकोरे से हण्डिका ढक दें । पश्चात् अच्छी प्रकार सन्धि बन्धन कर अग्नि जलानी चाहिए । एक प्रहर तक अग्नि मन्द मध्य तथा तीव्र देनी चाहिये तथा शराव के मध्य छिद्र को आर्द्र गोबर से ढक देनी चाहिए । एक प्रहर के अन्त में गोबर को हटाकर छिद्र से देखना चाहिए, यदि देखने से श्वेत ( पाण्डुर ) धूम दिखाई दें तब अग्नि बन्दकर स्वाङ्ग शीत होने पर स्थाली उतारना चाहिए ( एक प्रहर अग्नि देना साधारण कहा है ) फिर सन्धि तोड़कर हण्डिका में लगे हुए सत्त्व को ग्रहण करें । इसी तरह अन्य खनिज पाषाणपदार्थों के सत्त्व निकालने के अनेक प्रकार हैं उन्हें यहां ग्रन्थ विस्तार के भय से नहीं लिखे हैं ॥ ८०-८३ ॥

अथ मतान्तरम्—

पलालकं रवेर्दुग्धैर्दिनमेकं विमर्दयेत् ।

२१८ | रसरत्नसमुच्चये—

क्षिप्तवा षोडशिकातैले मिश्रयित्वां ततः पचेत् ॥ ८४ ॥
ऽनावृतप्रदेशे च सप्तयामावधि ध्रुवम् ।
स्वाङ्गशीतमधःस्थञ्च सत्त्वं श्वेतं समाहरेत् ॥ ८५ ॥
छागलस्याथ बालेन बलिना च समन्वितम् ।
तालकं दिवसद्वन्द्वं मर्दयित्वाऽतियत्नतः ॥ ८६ ॥
युक्तं द्रावणवर्गेण काचकूप्यां विनिःक्षिपेत् ।
त्रिधा ताञ्च मृदा लिप्त्वा परिशोष्य खरातपे ॥ ८७ ॥
ततः खर्परकच्छिद्रे तामूर्ध्वां चैव कूपिकाम् ।
प्रवेश्य ज्वालयेदग्निं द्वादशप्रहरावधि ॥
कूपिकण्ठस्थितं शीतं शुद्धं सत्त्वं समाहरेत् ॥ ८८ ॥
पलार्धप्रमितं तालं बद्ध्वां वस्त्रे सिते दृढे ।
बलिनाऽऽलिप्य यत्नेन त्रिवारं परिशोष्य च ॥ ८९ ॥
द्राविते त्रिपले ताम्रे क्षिपेत्तालकपोटलीम् ।
भस्मनाच्छादयेच्छीघ्रं ताम्रेणाऽऽवेष्टितं सितम् ॥
मृदुलं सत्त्वमादद्यात्प्रोक्तं रसरसायने ॥ ९० ॥

इति तालकाधिकारः—

एक पल (चार तोले) भर शुद्ध हरताल को मदार के दुग्ध से एक दिन तक घोटकर एक पल तिल के तैल में मिश्रण कर खुले स्थान में वालुका यन्त्र द्वारा सात प्रहर तक पाक करना चाहिए । स्वाङ्ग शीत होने पर नीचे निकले हुए श्वेत सत्त्व को ग्रहण करें अथवा छाग के पुच्छ के बाल और गन्धक को हरताल के साथ दो दिन तक घोटकर उसमें द्रावक वर्ग के पदार्थ (शहद्, घी, सुहागा) मिलाकर काच कूपी ( आतसी शीशी ) में भर कर तीन कपड़ मिट्टी करके धूप में सुखालें फिर मध्यछिद्र युक्त मिट्टी के कुण्डे में बालु भर कर आतसी शीशी रख दें ( आधी शीशी बालु से ढकी रहनी चाहिए ) पश्चात्, २ प्रहर तक अग्नि देना चाहिये । स्वाङ्ग शीत होने पर कूपिकण्ठ में लगे हुए श्वेत सत्त्व को ग्रहण करे । अथवा आधे पल ( २ तोला ) शुद्ध हरताल को श्वेत मजबूत वस्त्र में बांधकर पोटली बनालें । उस पोटली को तीन वार गोमूत्र में पिसे हुए गन्धक से लेपकर धूप में सुखाले । फिर तीन पल द्रव हुए ताम्र में पोटली रखकर

तृतीयोऽध्यायः । ११९

तृतीयोऽध्यायः । ११९

राख से अच्छी प्रकार पोटली को ढक दें कुछ काल के बाद ताम्र पर निकली हुई । श्वेत और मृदु सत्त्व को रस और रसायन के लिये ग्रहण करे ।॥ ८४-९० ॥

अथ मनःशिलानिरूपणम्—

मनःशिलाया भेदाः— मनःशिला त्रिधा प्रोक्ता श्यामाङ्गी कणवीरका ।
खण्डाख्या चेति तद्रूपं विविच्य परिकथ्यते ॥ ९१ ॥

मनःशिला तीन प्रकार की होती है । (१) श्यामाङ्गी, (२) कणवीरका, (३) खण्डाख्या, ॥ ९१ ॥

त्रिविधमनःशिलालक्षणानि— श्यामा रक्ता सगौरा च भाराढ्या श्यामिका मता ।
तेजस्विनी च निर्गौरा ताम्राभा कणवीरका ॥ ९२ ॥
चूर्णीभूताऽतिरक्ताङ्गी सभारा खण्डपूर्विका ।
उत्तरोत्तरतः श्रेष्ठा भूरिसत्त्वा प्रकीर्तिता ॥ ९३ ॥

जो काली, लाल तथा गौर (सर्षपवर्ण) वर्ण मिश्रित और भारी होती है उसको श्यामाङ्गी कहते हैं। जो तेज युक्त तथा ताम्र समान चमकदार हो और गौर-वर्ण रहित हो उसको कणवीरका कहते हैं और जो चूर्ण के रूप में हो तथा अत्यन्त रक्त तथा भारयुक्त हो उसको खण्डाख्य मैन शील कहते हैं। इन तीनों में उत्तरोत्तर श्रेष्ठ तथा ज्यादा सत्त्ववाली होती हैं ॥ ९२-९३ ॥

अथ गुणाः— मनःशिला सर्वरसायनाग्र्या तिक्ता कटूष्णा कफवातहन्त्री ।
सत्त्वात्मिका भूतविषाग्निमान्द्यकण्डूतिकासाक्षयहारिणी च ॥ ९४ ॥

मनःशिला सब रसायनों में श्रेष्ठ तथा तिक्त, कटु, उष्ण और कफ, वात को नष्ट करती है तथा अधिक सत्त्व वाली शिला भूत, विष, अग्निमांद्य, कण्डू, कास और क्षय रोग को नष्ट करती है ॥ ९४ ॥

अशुद्धशुद्धदोषगुणाः— अश्मरीं मूत्रकृच्छ्रञ्च अशुद्धा कुरुते शिला ।
मन्दाग्निं मलबन्धं च शुद्धा सर्वरुजापहा ॥ ९५ ॥

अशुद्ध मनःशिला अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र, मन्दाग्नि और मलबन्ध करती है, किन्तु शुद्ध करने पर सकल व्याधियों को नष्ट करती है ॥ ९५ ॥

१२० रसरत्नसमुच्चये—

अथ शोधनम्— अगस्त्यपत्रतोयेन भाविता सप्तवारकम् । शृङ्गवेररसैर्वाऽपि विशुद्ध्यति मनःशिला ॥ ९६ ॥ मैन शील को अगस्त्य वृक्ष के पत्र के स्वरस से या अदरक (आदी) स्वरस से सात वार भावना देने से शुद्ध हो जाती है ॥ ९६ ॥

मतान्तरम्— जयन्तीभृङ्गराजोत्थरक्तागस्त्यरसैः शिलाम् । दोलायन्त्रे पचेद्यामं यामं छागोत्थमूत्रकैः । क्षालयेदारनालेन सर्वरोगेषु योजयेत् ॥ ९७ ॥ अथवा जयन्ती, भृङ्गराज, रक्त अगस्त्य इन में से किसी एक के रस से दोलायन्त्र में एक प्रहर स्वेदन करके पश्चात् उसी प्रकार बकरी के मूत्र में पकावे फिर काञ्जी से धोकर सब रोगों में प्रयोग करे ॥ ९७ ॥

अथ सत्त्वपातनम्— अष्टमांशेन किट्टेन गुडगुग्गुलुसर्पिषा । कोष्ठ्यां रुद्ध्वा दृढं ध्माता सत्त्वं मुञ्चेन्मनःशिला ॥ ९८ ॥ शुद्ध मैनशील में अष्टमांश किट्ट ( मण्डूर ) और गुड़ गुग्गुल तथा घृत मिलाकर मूषायन्त्र में बन्दकर खूब फूंकने से सत्त्व निकल जाता है ॥ ९८ ॥

मतान्तरम्— भूनागधौतसौभाग्यमदनैश्च विमर्दितैः । कारवल्लीदलाम्भोभिर्मूषां कृत्वाऽत्र निक्षिपेत् ॥ ९९ ॥ शिलां क्षाराम्लनिष्पिष्टां प्रधमेत्तदनन्तरम् । कोकिलाद्वयमात्रं हि ध्मानात्सत्त्वं त्यजत्यसौ ॥ १०० ॥ इति मनःशिलाधिकारः । अथवा केञ्चुए (भूनाग) का सत्त्व, सुहागा, मैनफल इनका चूर्ण कर करेले के रस से मूषा का निर्माण कर उसमें क्षार और अम्ल रस में पिसी हुई मनः शिला रख कर कोयलों की आग में फूंकने से सत्त्व निकल जाता है ॥ ९९–१०० ॥

अथाञ्जनानां सन्निरूपणम्— अञ्जनभेदाः— सौवीरमञ्जनं प्रोक्तं रसाञ्जनमतः परम् ।

तृतीयोऽध्यायः। १२१

तृतीयोऽध्यायः। १२१

स्रोतोऽञ्जनं तदन्यच्च पुष्पाञ्जनकमेव च ।
नीलाञ्जनं च तेषां हि स्वरूपमिह वर्ण्यते ॥ १०१ ॥

अञ्जन पांच प्रकार के होते हैं, जैसे १ सौवीराञ्जन, २ रसाञ्जन (रसौंत), ३ स्रोतोऽञ्जन (कालासुरमा), ४ पुष्पाञ्जन (श्वेतसुरमा), ५ नीलाञ्जन (नील सुरमा) ये पांच भेद हैं ॥ १०१ ॥

विमर्श:— आजकल प्रायः बाजारों में असली अञ्जन नहीं मिलते हैं। इसका कारण प्रथम तो हमारा ही है, क्योंकि हम अच्छी प्रकार से परीक्षा नहीं करते हैं और सिर्फ अज्ञ पंसारी के भरोसे ही पर निर्भर रहते हैं। इसका नतीजा (परिणाम) यह निकलता है कि हमारी औषध शास्त्रोक्त फल नहीं करती है। इस लिये हम नीचे सब प्रकार के अञ्जनों के आधुनिक मत से लक्षण तथा गुण आदि लिख देते हैं। इन लक्षणों से उस द्रव्य की परीक्षा अच्छी प्रकार कर लेनी चाहिए तथा विश्वस्त स्थानों से ही मंगवाने चाहिए। शास्त्र में इनके निम्न पांच भेद किये गये हैं।

"सौवीरमञ्जनं प्रोक्तं रसाञ्जनमतः परम् ।
स्रोतोऽञ्जनं तदन्यच्च पुष्पाञ्जनकमेव च ।
नीलाञ्जनञ्च तेषां हि पञ्च भेदाः प्रकीर्तिताः ॥

१ सौवीराञ्जन-स्टिबनाइटिस (Stybnitis)
२ रसाञ्जन (यलो अक्साइड आफ़मर्करी Yellow, oxide of mercury)
३ स्रोतोऽञ्जन (अन्टीमनी सल्फाइड Antimony sulphide या वरनाग सुरमा)
४ पुष्पाञ्जन (जिन्क आक्साइड Zinc oxide)
५ नीलाञ्जन (गेलेना या लेड सल्फाइड Lead sulphide)

सौवीराञ्जन— यह नेत्र के लिये अच्छा है तथा यह अन्टिमनी (Antimony) और गन्धक (Sulphur) का यौगिक है। यह सुरमा बेली आसाम से आता है।

शास्त्र में इसका लक्षण यह है वल्मीकशिखराकारं भङ्गे नीलोत्पलद्युति। सौवीराञ्जनमित्याहुरायुर्वेद विदो जनाः ॥

रसाञ्जन— इसको यलो आकसाइड आफ मर्करी (Yellow oxide of Mercury) कहते हैं। आजकल प्रायः चिकित्सक रसाञ्जन शब्द से

"दार्वीक्वाथसमं क्षीरं पाद पक्त्वा यदा घनम् ।
तदा रसाञ्जनं ख्यातं………………इति ॥

इस भावप्रकाशोक्त लक्षण विधि से बने हुए द्रव्य ही को सर्वत्र ग्रहण करते हैं। किन्तु यह उचित नहीं है। जहां रसनिर्माण की प्रक्रिया हो वहां रसाञ्जन शब्द से "रसगर्भं रसाञ्जनम्, अर्थात् यलो आक्साइड आफ् मर्करी Yellow oxide of Mercury के नाम से जो खनिज आता

१२२ रसरत्नसमुच्चये—

है उसे लेना चाहिए तथा क्वाथ और चूर्णादि प्रक्रिया में भावप्रकाशोक्त रसाञ्जन का ग्रहण करें।

स्रोतोऽञ्जन— यह अन्टीमनी सल्फाइड (Antimony Sulphide) है। बर्मा और मैसूर में थोड़ा अन्टीमनी सल्फाइड प्राप्त होता है। आजकल सफेद सुरमे के नाम से बाजारों में जो द्रव्य मिलता है वह केलसाइट है उसे नहीं लेना चाहिए। वह चूने की जाति का एक पत्थर है स्रोतोऽञ्जन नहीं है।

पुष्पाञ्जन— यह Zinc oxide जिन्क आक्साइड है। इसे सफेदा भी कहते हैं। यह जैपुर में बहुत बनता है तथा आजकल पाश्चात्य चिकित्सक नेत्र के लिये यशद के योगों का अत्यन्त प्रयोग करते हैं।

नीलाञ्जन— यह लेड सल्फाइड (Lead sulphide) या गेलेना है। यह भी नेत्र के लिये हितकर है तथा बर्मा से अधिक आता है।

सौवीराञ्जनगुणाः— सौवीरमञ्जनं धूम्रं रक्तपित्तहरं हिमम् । विषहिध्माक्षिरोगघ्नं व्रणशोधनरोपणम् ॥ १०२ ॥

अब प्रत्येक का वर्णन करते हैं—सौवीराञ्जन धूम्र वर्ण का होता है। यह रक्तपित्त, विष, हिचकी और नेत्र के रोगों को नष्ट करता है तथा शीतल होता है, व्रण का शोधन करके भर देता है ॥ १०२ ॥

रसाञ्जनगुणाः— रसाञ्जनञ्च पीताभं विषवक्त्रगदापहम् । श्वासहिध्मापहं वर्ण्यं वातपित्तास्रनाशनम् ॥ १०३ ॥

रसाञ्जन कुछ पीले वर्ण का होता है। यह विषवाधा, मुखरोग, श्वास, हिचकी वातरक्त तथा रक्तपित्त को नष्ट करता है और वर्ण बढ़ाता है ॥ १०३ ॥

स्रोतोऽञ्जनगुणाः— स्रोतोऽञ्जनं हिमं स्निग्धं कषायं स्वादु लेखनम् । नेत्र्यं हिध्माविषच्छर्दिकफपित्तास्ररोगनुत् ॥ १०४ ॥

स्रोतोऽञ्जन शीत, स्निग्ध, कषाय, स्वादु तथा लेखन होता है। नेत्रों का हितकारक है और हिचकी, विषबाधा, वमन, कफ, रक्तपित्त इन रोगों को नष्ट करता है ॥ १०४ ॥

लेखनस्वरूपं— धातून् मलान्वा देहस्य विशोष्योल्लेखयेच्च यत् । लेखनं तद्यथा क्षौद्रं नीर मुष्णं वचा यवाः ॥

तृतीयोऽध्यायः । १२३

तृतीयोऽध्यायः । १२३

पुष्पाञ्जनगुणाः—
पुष्पाञ्जनं सितं स्निग्धं हिमं सर्वाक्षिरोगनुत् ।
अतिदुर्धरहिध्माघ्नं विषज्वरगदापहम् ॥ १०५ ॥
पुष्पाञ्जन श्वेत, स्निग्ध और शीतल होता है। समग्र नेत्रके रोगों को नष्ट करता है। दुःसाध्य हिचकी, विषवाधा तथा ज्वर को नष्टकरता है ॥ १०५ ॥

नीलाञ्जनगुणाः—
नीलाञ्जनं गुरु स्निग्धं नेत्र्यं दोषत्रयापहम् ।
रसायनं सुवर्णघ्नं लोहमार्दवकारकम् ॥ १०६ ॥
नीलाञ्जन गुरु, स्निग्ध, नेत्रहितकारी, दोषत्रयनाशक, रसायन और सुवर्ण भस्म करने में श्रेष्ठ (सहायक) और लोहे को मृदु करता है ॥ १०६ ॥

अथ शोधनम्—
अञ्जनानि विशुध्यन्ति भृङ्गराजनिजद्रवैः ॥ १०७ ॥
सब प्रकार के अञ्जन भृङ्गराज के स्वरस में घोटने से शुद्ध हो जाते हैं ॥ १०७ ॥

अञ्जनसत्त्वाहरणम्—
मनोह्वासत्त्ववत्सत्त्वमञ्जनानां समाहरेत् ॥ १०८ ॥
प्रायः सब अञ्जनों का सत्त्व मनः शिला की सत्त्वपातनविधि से प्राप्त होता है ॥ १०८ ॥

स्रोतोऽञ्जनलक्षणम्—
वल्मीकशिखराकारं भङ्गे नीलोत्पलद्युति ।
घृष्टं तु गैरिकच्छायं स्रोतोऽजं लक्षयेद्बुधः ॥ १०९ ॥
जो अञ्जन दीमकगृह के शिखर के स्वरूप का हो और तोड़ने पर नील कमल की प्रभा समान ज्ञात हो तथा घिसने से गैरिक के समान लाल हो वह स्रोतोऽञ्जन कहलाता है ॥ १०९ ॥

अञ्जनरसबन्धनम्—
गोशकृद्रसमूत्रेषु घृतक्षौद्रवसासु च ।
भावितं बहुशस्तच्च शीघ्रं बध्नाति सूतकम् ॥ ११० ॥
अञ्जन को गोर्वर के रस, गोमूत्र, घृत, शहद, वसाइन द्रव्यों में क्रमशः बहुत बार भावना देकर शुद्ध करने से वह शीघ्र ही पारद का बन्धन करता है ॥ ११० ॥

रसाञ्जनस्य विशेषशोधनम्—
सूर्यावर्तादियोगेन शुद्धमेति रसाञ्जनम् ॥ १११ ॥

१२४ रसरत्नसमुच्चये—

रसाञ्जन आगे कहे हुए सूर्यावर्तादियोगों से शुद्ध होता है ॥ १११ ॥

स्रोतोऽञ्जनसत्त्वपातनविधिः—

राजावर्तकवत्सत्त्वं ग्राह्यं स्रोतोऽञ्जनादपि ॥ ११२ ॥ इत्यञ्जनाधिकारः।

स्रोतोऽञ्जन का सत्त्वपातन राजावर्त के सत्त्वपातन की विधि से निकालना चाहिए ॥ ११२ ॥

अथ कङ्कुष्ठनिरूपणम्—

कङ्कुष्ठोत्पत्तिवर्णनं भेदाश्च—

हिमवत्पादशिखरे कङ्कुष्ठमुपजायते । तत्रैकं नालिकाख्यं हि तदन्यद्रेणुकं मतम् ॥ ११३ ॥

कङ्कुष्ठ की उत्पत्ति हिमालय पर्वत के समीपवर्ति शिखरों से होती है। यह नालिकाख्य और रेणुक नाम से दो तरह का होता है ॥ ११३ ॥

द्विविधकङ्कुष्ठलक्षणम्—

पीतप्रभं गुरु स्निग्धं श्रेष्ठं कङ्कुष्ठमादिमम् । श्यामपीतं लघु त्यक्तसत्त्वं नेष्टं हि रेणुकम् ॥ ११४ ॥

प्रथम नालिक नामक कङ्कुष्ठ पीतवर्ण, भारयुक्त तथा स्निग्ध होता है और वह औषध कार्यमें श्रेष्ठ है। रेणुककङ्कुष्ठ कुछ कृष्ण और पीतवर्ण युक्त, लघु तथा सत्त्व-रहित होता है वह औषधकार्य में इष्ट नहीं है ॥ ११४ ॥

कङ्कुष्ठोत्पत्तौ मतान्तराणि—

केचिद्वदन्ति कङ्कुष्ठं सद्योजातस्य दन्तिनः । वर्चश्च श्यामपीताभं रेचनं परिकथ्यते ॥ ११५ ॥ कतिचित्तेजिवाहानां नालं कङ्कुष्ठसंज्ञकम् । वदन्ति श्वेतपीताभं तदतीव विरेचनम् ॥ ११६ ॥

कुछ लोग कङ्कुष्ठ को हस्ती के सद्य उत्पन्न हुए बच्चे का मल कहते हैं और वह कृष्ण तथा पीत दोनों रंग का होता है तथा दस्तकारक होता है। कुछ लोग तेजस्वी अश्त्वों से उत्पन्न हुए बच्चे के नाभि नाल को कङ्कुष्ठ मानते हैं, इसका वर्ण कुछ सफेद और पीत होता है और वह अत्यन्त विरेचक होता है॥११५-११६॥

विमर्श:— कङ्कुष्ठ खनिज द्रव्य नहीं है। यह हिमालय के ऊपर या सन्निकट प्रदेश में उत्पन्न हुइ वनस्पति के रस से बनाया जाता है। इस रस को धातु या बांस की

तृतीयोऽध्यायः। १२५

तृतीयोऽध्यायः। १२५

नलियों में सञ्चित करने से कङ्कुष्ठ नलिकाकार मिलता है तथा चूर्ण रूप में भी मिलता है। सम्भव है कि वजन अधिक होने हो के कारण खनिजों के साथ इसका वर्णन किया गया है। अन्य प्रकार से जो मूल में इसकी उत्पत्ति बताइ गई है इसकी सत्यता अभी तक प्रमाणित नहीं हुई है।

अथ गुणाः— रसे रसायनं श्रेष्ठं निःसत्त्वं बहु वैकृतम् ॥ ११७ ॥ कङ्कुष्ठं तिक्तकटुकं वीर्योष्णं चातिरेचनम् । व्रणोदावर्त्तशूलार्त्तिगुल्मप्लीहगुदार्त्तिनुत् ॥ ११८ ॥ कङ्कुष्ठ रस और रसायन कर्म में अत्यन्त श्रेष्ठ होता है परन्तु जो सत्त्वरहित होता है वह विकार उत्पन्न करता है। कङ्कुष्ठ तिक्त, कटु और उष्णवीर्य्य होता है तथा अत्यन्त रेचक भी होता है और व्रण, उदावर्त, शूल, गुल्म, प्लीहवृद्धि, अर्श इनका नाशक है ॥ ११७-११८ ॥

रसोपरसानां सामान्यशोधनं सत्त्वपातनविधिश्च— सूर्यावर्त्तकदली वन्ध्या कोशातकी च सुरदाली । शिग्रुश्च वज्रकन्दो नीरडूणाकाकमाची च ॥ ११९ ॥ आसामेकरसेन तु लवणक्षाराम्लभाविता बहुशः । शुद्ध्यन्ति रसोपरसा ध्माता मुञ्चन्ति सत्त्वानि ॥ १२० ॥ सम्पूर्ण रस तथा उपरसौं का शोधन और सत्त्वपातन सुवर्चला, केला, वन्ध्याककोड़ा, कोशातकी (घोषालतां), वन्दाल ( पीतघोषा ), जङ्गलीसूरणकन्द, सहजन, बालक या जलपीपल, मकोय इनमें से किसी एक के रस में और क्षार, लवण तथा अम्ल से भावना देकर रस तथा उपरसौं को शुद्ध करते हैं और इन्हीं की भावना देकर फूंकने से इनका सत्त्वपातन होता है ॥ ११९-१२० ॥

कङ्कुष्ठशोधनम्— कङ्कुष्ठं शुद्धिमायाति त्रिधा शुण्ठ्यम्बुभावितम् ॥ १२१ ॥ सत्त्वाकर्षोऽस्य न प्रोक्तो यस्मात्सत्त्वमयं हि तत् ॥ १२२ ॥ कङ्कुष्ठ को तीन वार सोंठ के क्वाथ से भवति कर देनेसे शुद्ध होजाता है। यह स्वयं सत्त्वस्वरूप होने से इसकी सत्त्वपातनविधि नहीं कही है ॥ १२१-१२२ ॥

रेचकयोगः— भजेदेनं विरेकार्थे ग्राहिभिर्यवमात्रया ।

१२६ रसरत्नसमुच्चये-

नाशयेदामपूर्तिं च विरेच्य क्षणमात्रतः ॥ १२३ ॥
कङ्कुष्ठ को एक यव के प्रमाण से मलरोधक जीरक सोंठ आदि के साथ विरेचन के लिये सेवन करना चाहिए। इससे दस्त होकर आमदोष नष्ट होजाता है॥ १२३ ॥

ताम्बूलानुपानवर्जनम्—
भक्षितः सह ताम्बूलैर्विरेच्यासून्विनाशयेत् ॥ १२४ ॥
इसको ताम्बूल के साथ सेवन करने से इतने दस्त आते हैं कि प्राणतक के निकलने का भय रहता है ॥ १२४ ॥

अथ विषनाशार्थं कङ्कुष्ठप्रयोगविधिः—
बर्बूरीमूलिकाक्वाथो जीरसौभाग्यकं समम् ।
कङ्कुष्ठविषनाशाय भूयो भूयः पिबेन्नरः ॥ १२५ ॥
इत्युपरसाः ।

अशुद्ध कंकुष्ठ के विष को नष्ट करने के लिये या ज्यादा होने वाली दस्तों को रोकने के लिये बबूर की जड़ के काथ में जीरा और टङ्कण समान २ डालकर बार २ पान करना चाहिए या बर्बुरी = वनतुलसी और मूलिका के काथ में समान भाग जीरा और सुहागा डालकर पान करना चाहिए ॥ १२५ ॥

अथ साधारणरसपरिगणनम्—
कम्पिल्लश्चपलो गौरीपाषाणो नवसारकः ।
कपर्दो वह्निजारश्च गिरिसिन्दूरहिङ्गुलौ ॥ १२६ ॥
मृद्दारशृङ्गमित्यष्टौ साधारणरसाः स्मृताः ।
रससिद्धिकराः प्रोक्ता नागार्जुनपुरःसरः ॥ १२७ ॥
कबीला, सखिया, नौसादर, कौड़ी, अम्बर, सिन्दूर, हिङ्गुल, मृदारशृङ्ग ये नागार्जुनादिग्रन्थकारों के मत से रससिद्धिप्रदान करने वाले आठ साधारण रस हैं॥ १२६-१२७॥

अथ कम्पिल्लः—
इष्टिकाचूर्णसङ्काशश्चन्द्रिकाढ्योऽतिरेचनः ।
सौराष्ट्रदेशे चोत्पन्नः स हि कम्पिल्लकः स्मृतः ॥ १२८ ॥
कबीला ईंट के चूर्ण की तरह लाल और चमकदार होता है । यह अत्यन्त रेचक होता है । यह सौराष्ट्रदेश में खानों से उत्पन्न होता है ॥ १२८ ॥

तृतीयोऽध्यायः । १२७

तृतीयोऽध्यायः । १२७

**विमर्शः—**यह भी आजकल के वैज्ञानिकों के मत से खनिज द्रव्य नहीं है । किन्तु हिमालय की वनस्पतियों के फलों पर जमने वाला ( होने वाला ) रज ( चूर्ण ) है ।

अथ गुणाः— पित्तव्रणाध्मानविबन्धहारी श्लेष्मोदरार्तिकृमिगुल्महारी ।
मूलामशोफज्वरशूलहारी कम्पिल्लको रेच्यगदापहारी ॥ १२६ ॥

यह पित्त, व्रण, आध्मान और मलावरोध को नष्ट करता है और कफ, उदररोग ( जलोदरादि ), कृमि, गुल्म, अर्श, आमदोष, सूजन, ज्वर, शूल इनको नष्ट करता है और विरेचन के योग्य रोगों को नष्ट करता है ॥ १२९ ॥

इति कम्पिल्लाधिकारः—

अथ गौरीपाषाणः । गौरीपाषाणकः पीतो विकटो हतचूर्णकः ।
स्फटिकाभश्च शङ्खाभो हरिद्राभस्त्रयः स्मृताः ॥ १३० ॥

गौरीपाषाण ( सङ्खिया ) के पीत, विकट और हतचूर्णक ये तीन पर्याय हैं । और यह तीन प्रकार का होता है । एक स्फटिक समान श्वेत, दूसरा शङ्खसमान धूसर, तीसरा हल्दी के समान पीला होता है ॥ १३० ॥

**विमर्शः-**गौरीपाषाण (सङ्खिया) को आर्सेनिक ( Arsenic ) कहते हैं । इसका सङ्केत As तथा परमाणुभार ७५ है । यह स्वतन्त्र रूप से कम मिलता है । प्रायः अन्य खनिजों के साथ मिलता है । यह रक्त सल्फाइड ( As 2 S 3 ) अर्थात् मैन्सील और पीत सल्फाइड ( As 2 S 3 ) अर्थात् हरताल के रूप में बहुत प्राचीन समय ही से ज्ञात था । पश्चिमोत्तर सीमाप्रान्त के चित्रल स्थान में खानों से बहुत हरिताल निकलता था । चीन के यूनान प्रान्त से बहुत सल्फाइड आता था और बर्मा वालों के द्वारा वार्निश बनाने में प्रयुक्त होता था । धातुओं के साथ आर्सेनाइड के रूप में यह बहुत फैला हुआ पाया जाता है । इसका सब से महत्त्व का खनिज आर्सेनिकल पायराइटीज़ ( Fe As S ) है जो आयर्न पायराइटीज़ और अन्य सल्फाइडू खनिजों के साथ मिला हुआ पाया जाता है । गन्धकाम्ल के निर्माण में जब आयर्न पायराइटीज् जलाया जाता है तब आर्सेनिक भी आक्सी कृत हो बाष्पशील आर्सेनिक आक्साइड बन कर भट्ठी से निकली उष्ण गैसों के साथ निकल कर नल में जो धूल इकट्ठी होती है उसमें वह विद्यमान रहता है । इस आक्साइड् को 'सोमल' कहते हैं इसी से आर्सेनिक के यौगिक तय्यार होते हैं ।

१२८ रसरत्नसमुच्चये—

आर्सेनिक की उपलब्धि—आर्सेनिक के आक्साइड् वा सल्फाइड् को लकड़ी के कोयलों के साथ गरम करने से आर्सेनिक प्राप्त होता है। प्राकृतिक खनिज को आक्सिजन के अभाव में गरम करने से भी आर्सेनिक उद्धनित हो ( Sublime ) इस्पात के समान भूरे रङ्ग के चूर्ण में प्राप्त होता है।

इस तरह से उद्धनित आर्सेनिक चमकीला इस्पात के सदृश भूरे रङ्ग का धातु सा देख पड़ने वाला पदार्थ है। इसके क्रिस्टल षट्फलकीय होते हैं। इनका विशिष्ट घनत्व ५. ६२ से ५. ९६ तक होता है। यह बहुत भङ्गुर होता है। यह ताप ( Heat ) और विद्युत् का सुचालक भी होता है। १००० से० पर यह उद्धनित होना आरम्भ करता और धुँधले रक्त ताप पर बहुत शीघ्रता से सीधे बाष्प में बाष्पीभूत होजाता है। इसके बाष्प के घनत्व से मालूम होता है कि इसके अणु चतुर्बन्धक परन्तु उच्च तापक्रम पर यह द्विबन्धक हो जाता है। इसके वाष्प का रङ्ग पीला ( Yellow ) होता है। इसमें लहसुन सी गन्ध होती है।

आर्सेनिक की पहचान—आर्सेनिक और इसके यौगिक बहुत विषाक्त होते हैं। अतः इसको अल्पमात्रा में पहचानना बहुत आवश्यक होता है। अनेक विधियों से आर्सेनिक अल्प मात्रा में पहचाना जाता है। आर्सेनिक को सल्फाइड के रूप में अवक्षिप्त कर उस अवक्षेप को सुखाकर पोटासियम् साइनाइड के साथ परख नली (टेस्ट-ट्यूब) में गरम करने से आर्सेनिक का कृष्णवर्ण का निक्षेप प्राप्त होता है। इस निक्षेप को वायु में गरम करने से आर्सेनियस् आक्साइड् का श्वेत क्रिस्टलीय उद्धनित ( Sublimate ) प्राप्त होता है। इसको जल में घोल कर उस में सिल्वर नाइट्रेट के विलयन को डालने से सिल्ब आर्सेनाइट् का पीत अवक्षेप (यलोडियो जिट) प्राप्त होता है। आर्सेनिक के दो आक्साइड् होते हैं।

१ आर्सेनियस् आक्साइड् वा आर्सेनिकू ट्राइ—आक्साइड् ( Asy 06 ) । २ आर्सेनिक आक्साइड् वा आर्सेनिक पेन्टाक् साइड् ( As2 o5 )

आर्सेनिकू के तीन सल्फाइड् होते हैं। दो प्राकृतिक हैं तथा तीनों कृत्रिम भी होते हैं।

१ आर्सेनिकू डाइ—सल्फाइड् ( मन्सील, रोअलगर् ) As 2 S 2 २ आर्सेनिकू ट्राइ—सल्फाइड् ( हरिताल, ओरपीमेण्ट ) As 2 S 3 ३ आर्सेनिकू पेण्टा—सल्फाइड् As 2 S 5

अथ शोधनम्—

पूर्वः पूर्वो गुणैः श्रेष्ठः कारवल्लीफले क्षिपेत्। स्वेदयेद्दण्डिकामध्ये शुद्धो भवति मूषकः॥ १३१ ॥

इन में पूर्व २ क्रम से श्रेष्ठ माने जाते हैं। सङ्खिया को छोटेछोटे टुकड़े कर

तृतीयोऽध्यायः। १२९

तृतीयोऽध्यायः। १२९

करेलेको चीर कर उस के बीच में रखदे या करेले के रस में दोलायन्त्रद्वारा स्वेदन करके शुद्धकरना चाहिए ॥ १३१ ॥

अथ सत्त्वग्रहणम्— तालवद्ग्राहयेत्सत्त्वं शुद्धं शुभ्रं प्रयोजयेत् ॥ १३२ ॥

इसका सत्त्व हरताल के समान निकालना चाहिए यह सत्त्व श्वेतवर्ण का होता है ॥१३२॥

अथ गुणाः— रसबन्धकरः स्निग्धो दोषघ्नो रसवीर्यकृत् ॥ १३३ ॥ इति गौरीपाषाणाधिकारः ।

संखिया का सत्त्व स्निग्ध, दोषत्रयनाशक होता है तथा पारद का बन्धन करता है और गुण बढांता है ॥ १३३ ॥

अथ नवसारनिरूपणम्— अथ नवसारोत्पत्तिः— करीरपीलुकाष्ठेषु पच्यमानेषु चोद्भवः । क्षारोऽसौ नवसारः स्याच्चुल्लिकालवणाभिधः ॥ १३४ ॥

करीर और पीलु काष्ठ की लकड़ियों को जलाकर भस्म को पानी में घोलकर छाने हुए पानी को क्षारनिर्माण विधि से जलाने पर जो श्वेत भाग कड़ाही में शेष रह जाता है उसे नौसादर कहते हैं, चुल्लिकालवण भी उसी का नाम है ॥ १३४ ॥

**विमर्शः—**नवसार को नौसादर कहते हैं। इसको सेल अमोनियक, Sal Ammoniac तथा अमोनियम् क्लोराइड Ammonium chloride कहते हैं । इसका सूत्र Nh₄cl है।

**परिचय-**नौसादर नमक के समान सफेद क्रिस्टलीय चूर्ण होता है। इसके क्रिस्टल का आकार आंखों से ठीक २ नहीं देखा जा सकता ह । साधारणतः ये क्रिस्टल बहुत छोटे और रेशेदार होते हैं। छूने से रूक्ष प्रतीत होते हैं तथा भङ्गुर होते हैं। इन में कोई गन्ध ( Odour ) नहीं होती है। नौसादर स्वाद में नमकीन होता है। यह जल में बहुत अधिक विलेय है। इसको गरम करने से सफेद धुआं निकलता है। यह पिघलने के पहिले ही उड़ जाता है जिस बर्तन में यह गरम किया जाता हो उस बर्तन पर यदि कोई बर्तन पेंदी की ओर से ढक दिया जाय और उसके अन्दर जल भर देने से नौसादर उड़कर उस ठन्डे बर्तन की पेंदी में लगकर जम जावेगा।

रस० ९

१३० रसरत्नसमुच्चये—

मतान्तरेणोत्पत्तिः— इष्टिकादहने जातं पाण्डुरं लवणं लघु ।
तदुक्तं नवसाराख्यं चूल्लिकालवणञ्च तत् ॥ १३५ ॥

ईंटों के भट्टों में ईंटों के जलने के समय जो पाण्डुर और हलका लवण प्राप्त होता है उसको नौसादर या चूल्लिकालवण भी कहते हैं ॥ १३५ ॥

अथ गुणाः— रसेन्द्रजारणं लोहद्रावणं जठराग्निकृत् ।
गुल्मप्लीहास्यशोषघ्नं भुक्तमांसादिजारणम् ।
विडाख्यञ्च त्रिदोषघ्नं चूल्लिकालवणं मतम् ॥ १३६ ॥

नौसादर पारद के जारण और सम्पूर्ण धातुओं के द्रवण करने में उपयुक्त होता है। जठराग्नि को बढाता है तथा गुल्म, प्लीहावृद्धि और मुखशोष को नष्ट करता है, खाये हुए मांसादि गुरुपदार्थों को पचाता है। कुछ लोगों के मत से विड्नामक लवण भी नौसादर कहलाता है और वह त्रिदोषनाशक होता है ॥ १३६ ॥

अथ वराटिकावर्णनम्—
अथ वराटिकालक्षणम्—
पीताभा ग्रन्थिका पृष्ठे दीर्घवृत्ता वराटिका ।
रसवैद्यैर्विनिर्दिष्टा सा चराचरसंज्ञिका ॥ १३७ ॥

कौडी कुछ पीतवर्ण युक्त और पीठ पर गांठ युक्त और लम्बी तथा गोल आकार की होती है उसे वराटिका कहते हैं तथा उसे रसवैद्य चराचर नाम से भी पुकारते हैं ॥ १३७ ॥

उत्तमादिवराटिका—
सार्धनिष्कभरा श्रेष्ठा निष्कभारा च मध्यमा ।
पा दोननिष्कभारा च कनिष्ठा परिकीर्तिता ॥ १३८ ॥

डेढनिष्क ( ६ मासे ) वजन की कौड़ी श्रेष्ठ होती है और एक निष्क वजन की मध्यम होती है और तीन मासे वजन की कौड़ी कनिष्ठ मानी गई है ॥ १३८ ॥

अथ गुणाः—
परिणामादिशूलघ्नी ग्रहणीक्षयनाशिनी ।
कटूष्णा दीपनी वृष्या नेत्र्या वातकफापहा ।

-तृतीयोऽध्यायः। १३१

रसेन्द्रजारणे प्रोक्ता विडद्रव्येषु शस्यते ॥ १३९ ॥
तदन्ये तु वराटाः स्युर्गुरवः श्लेष्मपित्तलाः ॥ १४० ॥

भोजन पचने पर उत्पन्न शूल (परिणाम शूल) तथा ग्रहणी और क्षय को कौड़ी नष्ट करती है। यह कटु, उष्ण, दीपनी और वृष्य होती है। नेत्रों के लिये हितकर है, वात और कफ को नष्ट करती है, पारद के जारण में श्रेष्ठ है और विड् द्रव्यों में प्रशस्त है, इससे विपरीत लक्षण वाली वराट कौड़ी कहलाती है, वह वजन में भारी और वातपित्त को पैदा करती है ॥ १३९-१४० ॥

अथ शोधनम्—
वराटाः काञ्जिके स्विन्ना यामाच्छुद्धिमवाप्नुयुः ॥ १४१ ॥
इति वराटिकाधिकारः।

वराटों को काञ्जी में स्वेदन करने से शुद्ध हो जाती हैं ॥ १४१ ॥

अथाग्निजारनिरूपणम्—
अथाग्निजारपरिचयः—
समुद्रेणाग्निनक्रस्य जरायुर्बहिरुज्झितः ।
संशुष्को भानुतापेन सोऽग्निजार इति स्मृतः ॥ १४२ ॥

समुद्र ने अग्निनक्रनामक जलचर के जरायु (गर्भ कोष) को बाहर फेंक दिया, पश्चात् वह सूर्य की धूप से सूख गया उसी को अग्निजार या अम्बर कहते हैं ॥ १४२ ॥

अथ गुणाः—
अग्निजारस्त्रिदोषघ्नो धनुर्वातादिवातनुत् ।
वर्धनो रसवीर्यस्य दीपनो जारणस्तथा ॥ १४३ ॥

अग्निजार त्रिदोष को नष्ट करता है, धनुर्वात आदि वातरोगों को दूर करता है, रस वीर्य को बढ़ाता है, अग्नि दीपक और धातुओं का जारण करता है ॥ १४३ ॥

अथ तस्य स्वभावतः शुद्धत्वनिर्देशः—
यदन्धिक्षारसंशुद्धस्तस्माच्छुद्धिर्न हीष्यते ॥ १४४ ॥
इत्यग्निजाराधिकरः।

यह समुद्रक्षार के सम्पर्क में रहने से शुद्ध ही होता है अतः इसकी शुद्धि करना नहीं इष्ट है ॥ १४४ ॥

३३२ रसरत्नसमुच्चये—

अथ गिरिसिन्दूरनिरूपणम्—

महागिरिषु चाल्पीयः पाषाणान्तः स्थितो रसः ।
शुष्कशोणः स निर्दिष्टो गिरिसिन्दूरसंज्ञया ॥ १४५ ॥

हिमालय, विन्ध्याचल आदि बड़े २ पहाड़ों की चट्टानों के बीच में जो लाल चूर्ण का रस सूख जाता है उसको गिरि सिन्दूर नाम से कहते हैं ॥ १४५ ॥

गिरिसिन्दूरगुणाः—

त्रिदोषशमनं भेदी रसबन्धनमग्रिमम् ।
देहलोहकरं नेद्यं गिरिसिन्दूरमीरितम् ॥ १४६ ॥

यह त्रिदोष की शान्ति करता है, दस्तावर है और रसबन्धन करने वाले द्रव्यों में श्रेष्ठ है तथा देह को लौह सदृश दृढ़ करता है और नेत्र हितकर है ॥ १४६ ॥


अथ हिङ्गुलनिरूपणम्—

हिङ्गुलभेदाः—

हिङ्गुलः शुकतुण्डाख्यो हंसपादस्तथापरः ॥ १४७ ॥

हिङ्गुल दो तरह का होता है, एक को शुकतुण्ड और दूसरे को हंसपाद, कहते हैं ॥ १४७ ॥

शुकतुण्डकस्य परिचयः—

प्रथमोऽल्पगुणस्तत्र चर्मारः स निगद्यते ॥ १४८ ॥

इन दोनों में जो शुक तुण्ड हिङ्गुल होता है वह अल्प गुणप्रद होता है इसको चर्मार भी कहते हैं ॥ १४८ ॥

हंसपादलक्षणम्—

श्वेतरेखः प्रवालाभो हंसपादः स ईरितः ॥ १४९ ॥

जिस हिंगुल का रंग प्रवाल के समान होता है तथा श्वेत रेखाएं पड़ी होती हैं उसे हंसपाक (द) कहते हैं ॥ १४९ ॥

हिङ्गुलगुणाः—

हिङ्गुलः सर्वदोषघ्नो दीपनोऽतिरसायनः ।
सर्वरोगहरो वृष्यो जारणायातिशस्यते ॥ १५० ॥
एतस्मादाहृतः सूतो जीर्णगन्धसमो गुणैः ॥ १५१ ॥

हिङ्गुल सब दोषों को नष्ट करता है, अग्नि दीपक और रसायन गुण को करता