भारतकोश
संग्रह पर लौटें

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

प्रथमोऽध्यायः । ५५

प्रथमोऽध्यायः । ५५

माने गये हैं परन्तु उनका कोई विशेष उपयोग ऐसा नहीं प्रतीत होता है कि जिनका आधिक्य से विचार किया जाना आवश्यक हो । भूमिज, गिरिज, वारिज जो दोष माने हैं वे सरलता से समझ में आ सकते हैं । जिस भूमि से पारद निकला उसके संसर्गज दोष, जिस स्रोत के जल में घुल कर ऊपर आकर हिङ्गुल के रूप में बना उसके दोष भी पारद में रहना सम्भव है। इस लिये शुद्धि के समय जहां से खनिज पारद एकत्रित किया गया हो वहां के स्थान के संसर्ग से होने वाले सब दोषों का परिहार अवश्य कर लेना चाहिये । कितना सूक्ष्म विचार है । किन्तु दुःख है कि आजकल हम लोगों को यह भी पता लगाने की इच्छा नहीं कि बाजार में जो वर्तमान पारद आता है उसका उद्गम देश कहां पर है और उस देश में पारद के साथ सहयोगी धातु कौन २ निकलते हैं तथा उनका पारद पर क्या प्रभाव पड़ता है, अथवा उस की शुद्धि क्यों की जाती है और शुद्धि के द्रव्यों का पारद के ऊपर क्या प्रभाव पड़ता है । हम पारद के सब कृत्य केवल इस लिये करते हैं कि शास्त्र की आज्ञा है । इस प्रकार की उदासी का फल यह हो रहा है कि अन्धकार में प्रयत्न किया जा रहा है । करने वाले को बिना ज्ञान के काम करते रहने से उद्देश्य हीन की तरह श्रान्ति हो जाती है और वह उस प्रयत्न से विरत हो जाता है। यही कारण है कि वैद्य समाज पारद के बचे हुए अष्टकर्म को भी यथाविधि करने में उदासीन सा हो गया है। हमारे पूर्वाचार्यों ने पारद पर अथक परिश्रम कर उसके अनेक अद्भुत गुणों का ज्ञान प्राप्त किया और वह ज्ञान ऐसा स्थिर तथा व्यापक है कि प्रत्यक्षवादी आधुनिक पाश्चात्य वैज्ञानिक भी अनेक परीक्षाएं कर प्रायः उसी फल पर पहुंचे हैं । इस समय पौर्वात्य और पाश्चात्य ज्ञान को एकत्रित करके आगे बढ़ने के लिये प्रयत्न करना परमावश्यक है । जापान इसी कारण उन्नत हो रहा है तथा सारा संसार उसका मान करके उसके आविष्कारों से लाभ उठा रहा है । अभी हाल ही में उसने मोती को शीघ्र पैदा करने की क्रिया के आविष्कार से संसार में नवयुग उत्पन्न कर दिया है तथा “स्वात्तौ सागरशुक्तिकुक्षिपतितं तज्जायते मौक्तिकम्” की युक्ति का प्रायशः खण्डन कर अरबों का लाभ प्राप्त कर रहा है ।

पारद के भेद

रसो रसेन्द्रः सूतश्च पारदो मिश्रकस्तथा ।
इति पञ्चविधो जातः क्षेत्रभेदेन शम्भुजः ॥

इस प्रकार पारद के ५ भेद माने गये हैं। रस नामक पारद रक्त वर्ण का होता है इस को रेड आक्साइड आफ् मर्करी ( Red oxide of Mercury ) कह सकते हैं । रसेन्द्र नामक पारद रूक्ष तथा श्याव वर्ण का होता है इसको इम्प्प्योर ( Impure ) कह सकते हैं । सूत नामक पारद रूक्ष तथा कुछ पीतवर्ण की आभा से युक्त होता है

५६ रसरत्नसमुच्चये—

इसको यलो आक्साइड आफ मर्करी (yellow oxide of Mercury) कहना चाहिए। पारद नामक चौथे प्रकार का पारा चञ्चल तथा श्वेत वर्ण वाला होता है अर्थात् इसका वर्ण गली हुई चांदी के समान होता है यह अल्प प्राप्य है। इसको नेटिव मर्करी (Native Mercry) कहना चाहिए। मिश्रक नामक पारद अन्य धातुओं के साथ मिला रहता है तथा मोर के पङ्ख की चन्द्रिका के समान चमकदार होता है इसको मिश्रक कहते हैं अर्थात् Mix with Lead zinc and Tin इनके साथ मिश्रिक रूप में प्राप्त होता है।

शुद्ध पारद के लक्षण ।

शुद्ध पारद चांदी के समान श्वेत वर्ण का होता है। साधारण तापक्रम पर यह द्रवरूप में रहता है। हिलाने से इसके गोल कण बनते हैं। तथा पृथ्वी पर पात्र से गिरा देने पर छोटे २ कणों में विभक्त होकर फैल (बिखर) जाता है। इन बिखरे हुए कणों को फिर मार्जनी या वस्त्र से एकत्रित करके पात्र में भर सकते हैं। पारद अत्यन्त शीतांश पर सफेद रांगे (Tin) का सा ठोस हो जाता है और वह चाकू से काटा जा सकता है। द्रवावस्था में पारद की पतली तह (सतह) पारदर्शक (ट्रान्स पेरेण्ट Transparent) या पारभासक (ट्रान्स ल्यू सेण्ट Translucent) होती है तथा उसमें नीले रङ्ग को आभा दिखाई देती है। रस शास्त्रों में शुद्ध पारद के ये ही लक्षण बताये हैं।

यथा—"अन्तः सुनीलो बहिरुज्ज्वलो यो,
मध्याह्न सूर्यप्रतिमप्रकाशः
शस्तः................(र० सा० सं०)

थोड़ा सा पारद एक कांच या चीनी के बर्तन में रख कर उस पर ऊपर की ओर से पानी की तेज़ धार गिराई जाय तो पारद के बुलबुले (Bubbles) पानी की सतह पर तैरते हुए दिखाई देते हैं और इन में नीली आभा दिखाई देती है तथा वे शीघ्र फूट कर ठोस पारद कण के रूप में बदल जाते हैं।

पारद का आपेक्षिक घनत्व (Relative Density) जल की अपेक्षा १३६ है। पारद ३५७ से ३८९ डिग्री की उष्णता पर उड़ने लगता। पारद की वाष्प रङ्ग रहित होती है। रसायन शास्त्र के नियमानुसार यद्यपि पारद बहुत ऊंची डिग्री के तापक्रम पर उड़ता है तथापि साधारण तापक्रम (Normal Temperature) पर अत्यन्त स्वल्प मात्रा में उड़ता देखा गया है। एक चीनी के बर्तन में पारद रखकर ऊपर सुवर्ण के पत्र के ढकने या लटकाने से दो तीन मास में इसकी मन्द उड़न शीलता की परीक्षा हो जाती है। इतने समय में सुवर्ण के पत्र पर पारद लगा दिखाई देगा। पारद द्रव होते हुए भी शकर, गन्धक, और खड़िया आदि चूर्ण द्रव्यों के साथ

प्रथमोऽध्यायः । | ५७

घोटने से अत्यन्त सूक्ष्म कणों में विभक्त हो जाता है । इसे पारद की मूर्छना या मरण ( Extinction or Deadning ) कहते हैं ।

अशुद्ध पारद के लक्षण—

साधारणतया बाजार का पारद किसी विशेषांश में अन्य धातुओं से संयुक्त रहता है । इस लिये यदि किसी साफ़ चीनी या कांच के बर्तन में थोड़ा सा पारद रख कर उसे तिरछा करें तो पारद के कण पुच्छयुक्त दिखाई देंगे । अशुद्ध पारद को यदि वायु में हिलावें तो पारद के ऊपरी भाग में काले से चूर्ण की सतह जम जावेगी जिससे पारद के छोटे २ कण आवृत्त हो जावेंगे । यह रजत पारद के साथ मिले हुए धातुओं के आतञ्जन ( आक्सिडेशन Oxidation ) होने से उत्पन्न होती है । यही कञ्चुक दोष माना गया है । प्रायः अशुद्ध पारद का स्वरूप धूएं के समान पाण्डु और चित्र विचित्र होता है जैसा कि कहा भी है ।

“अथ धूम्रः परिपाण्डुरश्च चित्रो न योज्यो रसकर्मसिद्धौ” इस लिये इस प्रकार के पारद को औषध या रसकर्म में अच्छी प्रकार से शुद्ध किये बिना प्रयुक्त न करें ।

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनो वाग्भट्टाचार्यस्य कृतरसरत्नसमुच्चये
पण्डितप्रवरेण श्रीकृष्णान्मजेन अम्बिकादत्तशास्त्रिणा विरचित-
रत्नोज्ज्वलाख्यभाषाटीकान्तर्गतः खनिजविज्ञानाद्यनेक-
रसग्रन्थसङ्गृहीतः पारदीयविमर्शः समाप्तः ॥


५८

रसरत्नसमुच्चये-

अथ द्वितीयोऽध्यायः ।

अथ महारसाः—

अभ्रवैक्रान्तमाक्षीकविमलाद्रिजसस्यकम् ।
चपलो रसकश्चेति ज्ञात्वाऽष्टौ संग्रहेद्रसान् ॥ १ ॥

चार प्रकार का अभ्रक ( श्वेत, अरुण, श्याम, पीत ) तीन प्रकारका ( श्वेत रक्त, नील, ) वैक्रान्त, दो प्रकार का माक्षिक ( स्वर्ण और रौप्य ) विमल ( माक्षिक विशेष ) या मतान्तर से सोनामाखी ( माक्षिक ), रूपामाखी ( विमल ) शिलाजीत, तुत्थ, चपल ( विस्मथ ) खर्पर, ये आठ महारस हैं । इन्हें अच्छी तरह से लक्षणों से पहचान कर वैद्य संग्रह करे ॥ १ ॥

अथ गन्धाभ्रयोः स्वरूपम्—

देव्या रजो भवेद्गन्धो धातुः शुक्रं तथाऽभ्रकम् ।

पार्वती देवी का आर्तव शोणित गन्धक है और ब्रह्मा जी का वीर्य अभ्रक है ।

अथ अभ्रकगुणाः—

गौरीतेजः परमममृतं वातपित्तक्षयघ्नं
प्रज्ञाबोधि प्रशमितरुजं वृष्यमायुष्यमग्र्यम् ।
बल्यं स्निग्धं रुचिरुदमकफं दीपनं शीतवीर्यं
तत्तद्योगैः सकलगदहृद्व्योम सूतेन्द्रबन्धि ॥ २ ॥
राजहस्तादधस्ताद्यत्समानीतं घनं खनेः ।
भवेत्तदुक्तफलदं निःसत्वं निष्फलं परम् ॥ ३ ॥

अभ्रक वात, पित्त ओर क्षय को नष्ट करता है, बुद्धि को बढ़ाता है, सम्पूर्ण व्याधियों को नष्ट करता है, अमृत तुल्य गुण कारक है, वृष्य है, आयु के लिये हित कर है, बल दायक और रुचिवर्धक है, स्निग्ध है तथा पाचक वह्नि को बढ़ाता है, शीतवीर्य है, कफ को नष्ट करता है, भिन्न २ योगों में मिला कर देने से समस्त व्याधियों को नष्ट करता है । अभ्रक पारद का नियमन करता है । जो अभ्रक आठ हस्त से भी गहरी खोदी हुई खान से निकलता है वही उत्तम सर्व गुणों को करता है, किन्तु सार रहित और राजहस्त प्रमाण से रहित खान से ( उपर से ) निकला हुआ ठीक नहीं है ॥ २-३ ॥

द्वितीयोऽध्यायः। ५९

द्वितीयोऽध्यायः। ५९

**विमर्शः—**अभ्रक को लैटिन में मायका (Mica) तथा अंग्रेजी में टाल्क (Talk) और ग्लिमर ( Glimmer ) कहते हैं। यह भी खानों से निकलता है। उपलब्धि-यह विहार प्रान्त में हजारीबाग और गिरडो तथा बङ्गाल में रानीगञ्ज के आसपास की कोयले की खानों के अन्दर मिलता है। तथा मद्रास के निलोर जिले में भी कहीं २ मिलता है और सिन्ध, तथा बम्बई प्रेसीडेन्सी के धारवाड़ जिले में भी प्राप्त होता है। पञ्जाब में कांगड़ा जिले के नूरपुर तहसील की खानों में से भस्म करने योग्य अच्छा कृष्णाभ्रक मिलता है। राजपूताना में किशनगढ तथा अजमेर के नजदीक वाले पहाड़ों में भी इसकी कहीं कहीं खाने हैं। यू० पी० में अल्मोड़ा तथा बाघेश्वर में भी कहीं २ मिलता है। अभ्रक के पिनाक, नाग, मण्डूक और वज्राभ्रक इन चार भेदों में वज्राभ्रक को लोहाभ्रक का अपर पर्याय समझना चाहिए क्यों कि वज्राभ्रक के इन

सुप्रशस्तं कठोराङ्गं गुरु कज्जलसन्निभम्।
यन्न शब्दायते वह्नौ नैवोच्छूनं भवेदपि ॥
सदाकरसमुद्भूतं वज्रेति प्रथितं घनम् ॥ ( इति र० सा० सं० )

तथा—यदञ्जननिभं क्षिप्तं न वह्नौ विकृतिं व्रजेत् ।
वज्रसंज्ञं हि तद् योज्यमभ्रं सर्वत्र नेतरत् ॥ ( इति र० चि०

लक्षणों से स्पष्ट प्रतीत होता है कि जो अभ्रक कठोर (अधिक वजनी) तथा कज्जल या काले अञ्जन के समान वर्ण का हो वह वज्राभ्रक औषध में प्रशस्त माना गया है तथा आजकल यह निश्चित हो गया है कि जिस अभ्रक में लोह का अंश अधिक होता है वही अधिक वजनी तथा काले वर्ण का होता है। इस प्रकार के अभ्रक को बायो टाईट ( Bio Tite ) कहते हैं। और भी अभ्रक की अनेक जातियां मिलती हैं किन्तु रसग्रन्थों में औषध के लिये वज्राभ्रक (लोहाभ्रक) से बढकर उनकी मह- त्वता नहीं है इस लिये यहाँ पर वर्णन नहीं किया गया है।

उत्पत्ति—“देव्या रजो भवेद्गन्धो धातुः शुक्रं तथाऽभ्रकम्”

अर्थात् ब्रह्माजी का शुक्र अथवा पार्वती देवी का धातुस्वरूप जो शुक्र है वही अभ्रक है। इससे यह दिखाया गया कि अभ्रक की उत्पत्ति का सम्बन्ध पार्वती देवी से है। इस आशय का पार्वती अर्थात् पर्वते भवा या पर्वतस्य इयं पार्वती (पर्वत सम्बन्धिनी पृथिवी या पर्वतसन्निकट पृथिवी अर्थात् पर्वत (पहाड़) की खान का धातु अर्थात् परम तत्त्व (रासायनिक परिवर्तनादिक विधियों से बना हुआ) ही अभ्रक है। इस प्रकार के अर्थ की सत्यता में प्रथम कारण तो “सदाकरसमुद्भूतं वज्रेति प्रथितं घनम्, यह तथा राजहस्तादधस्ताद्यत् समानीतं घने खनेः” आदि अपने दूर- दर्शी, त्रिकाल विज्ञानी रसशास्त्र के आचार्य की सूत्रबद्धकृति ही प्रमाण है। तथा दूसरा कारण आधुनिक युग के वैज्ञानिकों की प्रत्यक्ष करके दिखाई हुई विज्ञान चर्चा को समझना चाहिए।

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रसरत्नसमुच्चये—

अथाभ्रभेदाः— पिनाकं नागमण्डूकं वज्रमित्यभ्रकं मतम् । श्वेतादिवर्णभेदेन प्रत्येकं तच्चतुर्विधम् ॥ ४ ॥

अभ्रक पिनाक, नाग, मण्डूक और वज्र इन भेदों से चार प्रकार का है, और ये हरेक चारों भेद चार २ प्रकार के हैं । जैसे श्वेत, अरुण, श्याम और पीत । कुछ लोगों का मत है कि अभ्रक श्वेतादि भेद से चार तरह का है किन्तु श्याम (कृष्ण) अभ्रक पिनाकादि चार भेदों वाला होता है ॥ ४ ॥

अथ पिनाकादीनां लक्षणानि— पिनाकं पावकोत्तप्तं विमुञ्चति दलोच्चयम् । तत्सेवितं मलं बद्ध्वा मारयत्येव मानवम् ॥ ५ ॥ नागाभ्रं नागवत्कुर्याद्ध्वनिं पावकसंस्थितम् । तद्भुक्तं कुरुते कुष्ठं मण्डलाख्यं न संशयः ॥ ६ ॥ उत्प्लुत्योत्प्लुत्य मण्डूकं ध्मातं पतति चाभ्रकम् । तत्कुर्यादश्मरीरोगमसाध्यं शस्त्रतोऽन्यथा ॥ ७ ॥ वज्राभ्रं वह्निसन्तप्तं निर्मुक्ताशेषवैकृतम् । देहलोहकरं तच्च सर्वरोगहरं परम् ॥ ८ ॥

पिनाक अभ्रक अग्नि में तपाने से पत्ररूप में पृथक हो जाता है । उस को सेवन करने से मल का अवरोध होता है । इससे मृत्यु भी हो जाती है । नागाभ्रक अग्नि पर रखने से सर्प की तरह शब्द (फूं फूं) करता है । उसके सेवन से मण्डलाकार कुष्ठ उत्पन्न होता है । मण्डूक संज्ञक अभ्रक अग्नि में तपाने पर मण्डूक के समान उछल २ कर भागता है । उसके सेवन करने से दवासे असाध्य परन्तु शस्त्रादि कर्म से साध्य अश्मरी रोग उत्पन्न होता है । वज्र संज्ञक अभ्रक अग्नि में तपाने पर भी किसी भी विकृति को प्राप्त नहीं होता है । वह शरीर को अत्यन्त दृढ बनाता है तथा सब रोगों का नाशक है ॥ ५-८ ॥

अथ वर्णभेदेनाभ्रकस्य भेदास्तेषां क्रियाविषयश्च— श्वेतं रक्तं च पीतं च कृष्णमेवं चतुर्विधम् । श्वेतं श्वेतक्रियासूक्तं रक्ताभं रक्तकर्मणि ॥ पीताभमभ्रकं यत्तु श्रेष्ठं तत्पीतकर्मणि ॥ ९ ॥

द्वितीयोऽध्यायः। ६१

चतुर्विधं वरं व्योम यद्यप्युक्तं रसायने ।
तथाऽपि कृष्णवर्णाभ्रं कोटिकोटिगुणाधिकम् ॥ १० ॥

अभ्रक श्वेत, पीत, रक्त और कृष्ण इन चार भेदों में प्राप्त होता है । श्वेत अभ्रक चांदी बनाने या उसके मारण में और श्वित्र कुष्ठों को दूर करने में या अग्नि से जलने पर श्वेत चर्म को दूर करने में प्रयुक्त होता है । रक्त अभ्रक हिङ्गुलादि लाल वस्तुओं के शोधन अथवा रक्त की वृद्धि और शुद्धि में प्रयुक्त होता है । पीला अभ्रक स्वर्णादि पीत वस्तुओं के मारण में या पाण्डु रोग से पीत देह को सुधारने में प्रयुक्त होता है । यद्यपि चारों प्रकार का अभ्रक रसायन के लिये श्रेष्ठ है तथापि कृष्ण वर्ण का अभ्रक करोड़ों फल देने वाला होता है ॥ ९-१० ॥

स्निग्धं पृथुदलं वर्णसंयुक्तं भारत्तोऽधिकम् ।
सुखनिर्मोच्यपत्रं च तदभ्रं शस्तमीरितम् ॥ ११ ॥

स्निग्ध, बड़े २ पत्रवाला, श्रेष्ठ वर्णयुक्त, वजन में भारी और जिसके पत्र सुख से अलग हो जांय वह अभ्रक श्रेष्ठ है ॥ ११ ॥

अथ ग्रासयोग्याभ्रम्—

सचन्द्रिकं च किट्टाभं व्योम न ग्रासयेद्रसः ।
ग्रसितश्च नियोज्योऽसौ लोहे चैव रसायने ॥ १२ ॥

जो अभ्रक चमकदार हो और लोह के किट्ट सदृश हो वह पारद में नहीं मिल सकता है । और यदि पारे से ग्रसित हो जाय तब उसे लोहादि योगों में और रसायन कर्म में ग्रहण करना चाहिए ॥ १२ ॥

निश्चन्द्रसचन्द्राभ्रयोर्गुणदोषौ—

निश्चन्द्रिकं मृतं व्योम सेव्यं सर्वगदेषु च ।
सेवितं चन्द्रसंयुक्तं मेहं मन्दानलं चरेत् ॥ १३ ॥

चमक से रहित अभ्रक की भस्म सेवन करानी चाहिए । निश्चन्द्रीकरण किया रहित अभ्रक भस्म का सेवन करने से मनुष्य प्रमेह और मन्दाग्नि को प्राप्त होता है ॥ १३ ॥

अथाशुद्धाभ्रस्य दोषाः—

यैरुक्तं युक्तिनिर्मुक्तैः पत्राभ्रकरसायनम् ।
तैर्दृष्टं कालकूटाख्यं विषं जीवनहेतवे ॥ १४ ॥

६२ रसरत्नसमुच्चये—

सत्त्वार्थं सेवनार्थं च योजयेच्छोधिताभ्रकम् ।
अन्यथा त्वगुणं कृत्वा विकरोत्येव निश्चितम् ॥ १५ ॥

युक्तियों से हीन जिन मनुष्यों ने पत्राभ्रक सेवन करने को कहा है उन्होंने जीवन की रक्षा के लिये कालकूट नामक विष खाने को कहा है। सत्व निकालने के लिये और औषध रूप में सेवन करने के लिये शोधन किये हुए अभ्रक का प्रयोग करना चाहिए। ऐसा न करने से गुणों के बदले निश्चय करके विकार ही पैदा करता है ॥ १४–१५ ॥

अथाभ्रशोधनमारणे—

प्रतप्तं सप्तवाराणि निक्षिप्तं काञ्जिकेऽभ्रकम् ।
निर्दोषं जायते नूनं प्रक्षिप्तं वाऽपि गोजले ॥ १६ ॥
त्रिफलाकथिते चापि गवां दुग्धे विशेषतः ।
ततो धान्याभ्रकं कृत्वा पिष्ट्वा मत्स्याक्षिकारसैः ॥ १७ ॥
चक्रीं कृत्वा विशोष्याथ पुटेदर्थेभके पुटे ।
पुटेदेवं हि षड्‌वारं पौनर्नवरसैः सह ॥ १८ ॥
कलांशटङ्कणेनापि सम्मर्द्य कृतचक्रिकम् ।
अर्धेभाख्यपुटैस्तद्वत्सप्तवारं पुटेत्खलु ॥ १९ ॥
एवं वासारसेनापि तण्डुलीयरसेन च ।
प्रपुटेत्सप्तवाराणि पूर्वप्रोक्तविधानतः ॥
एवं सिद्धं घनं सर्वयोगेषु विनियोजयेत् ॥ २० ॥

अभ्रक को वह्नि में अत्यन्त तप्त करके काञ्जी, गोमूत्र, त्रिफला क्वाथ, तथा विशेष कर गौ के दुग्ध, इन सब में सात २ वार निर्वापित करना चाहिए। ऐसी शुद्धि से सब दोषों से अभ्रक रहित हो जाता है। ध्यान रहे किं प्रत्येक निर्वापन में काञ्जी इत्यादि द्रव पदार्थ बदल दें और ये पदार्थ इतनी मात्रा में लें जितनी में तप्त अभ्रक अच्छी तरह डूब जाय। बाद में धान्याभ्रक करके मत्स्याक्षि (हिलमोचिका वा गण्ड दूर्वा) के रस में खूब पीस कर टिकिया बना कर सुखा ले बाद में अर्ध-गज पुट में पुट देना चाहिए। इसी तरह पुनर्नवा (साठी) के रस में घोट कर ६ पुट देना चाहिए। फिर इसी तरह अभ्रक की अपेक्षा सोलवें भाग टङ्कण के साथ घोट कर सात पुट देवें। इसी तरह अडूसे के रस में घोट कर सात पुट दें और

द्वितीयोऽध्यायः । ६३

द्वितीयोऽध्यायः । ६३

चोलाई के रस में भी घोट कर सात पुट दें। इस तरह भस्म रूप में सिद्ध हुआ अभ्रक सब कामों में गुणकर होता हैं ॥ १६-२० ॥

अथ धान्याभ्रकम्—

चूर्णाभ्रं शालिसंयुक्तं वस्त्रबद्धं हि काञ्जिके ।
निर्यातं मर्दनाद्वस्त्राद्धान्याभ्रमिति कथ्यते ॥ २१ ॥

शुद्ध अभ्रक का चूर्ण चतुर्थांश शाली ( धान ) में मिलाकर वस्त्र में बांधके पोटली बना लें। फिर उस पोटली को काञ्जी में डालकर मर्दन करने पर वस्त्र से निकला हुआ अभ्रक धान्याभ्रक कहलाता है ॥ २१ ॥

अथ धान्याभ्रमारणम्—

धान्याभ्रं कासमर्दस्य रसेन परिमर्दितम् ।
पुटितं दशवारेण म्रियते नात्र संशयः ॥
तद्वन्मुस्तारसेनापि तन्दुलीयरसेन च ॥ २२ ॥

धान्याभ्रक को कासमर्द ( कसोञ्जी ) के रस से घोट कर दश पुट देने से मृत ( भस्म रूप ) हो जाता है। इसी तरह मुस्ते के रस में घोट कर दस पुट देना चाहिए, तथा चोलाई के रस में घोट कर दस पुट देने से मृत हो जाता है ॥२२॥

अथाभ्रमारणम्—

पीतामलकसौभाग्यपिष्टं चक्रीकृताम्रकम् ।
पुटितं षष्ठीवाराणि सिन्दूराभं प्रजायते ॥
क्षयाद्यखिलरोगघ्नं भवेद्रोगानुपानतः ॥ २३ ॥

अभ्रक में सोलवां भाग की मात्रा में सोहागा मिला कर हल्दी तथा आंवले के रस में घोट कर चक्रिका बनाकर ६२ वार पुट देने से सिन्दूर के समान रक्त वर्ण वाली भस्म हो जाती है। यह भस्म क्षय वगैरे सब रोगों को यथानुपान में देने से नष्ट करती है ॥ २३ ॥

मतान्तर—

वटमूलत्वचः क्वाथैस्ताम्बूलीपत्रसारतः ।
वासामत्स्याक्षिकाभ्यां वा मीनाक्ष्या सकठिल्लया ॥ २४ ॥
पयसा वटवृक्षस्य मर्दितं पुटितं घनम् ।
भवेद्विंशतिवारेण सिन्दूरसदृशप्रभम् ॥ २५ ॥

पादांशटङ्कणोपेतं मुसलीरसमर्दितम् ।

६४ रसरत्नसमुच्चये—

धान्याभ्रक को वट के मूल को छाल के काढ़े में घोटकर अथवा ताम्बूल पत्र के स्वरस में घोटकर या अडूसा और हिलमोचिका के रस में घोटकर या करेला और गण्डदूर्वा (मत्स्याक्षी) के रस में घोटकर २० पुट देने से सिन्दूर सदृश भस्म हो जाती है। केवल वट के दुग्ध में भी घोट कर २० पुट देने से भस्म हो जाती है ॥ २४–२५ ॥

अथाभ्रकसत्वपातनम्—

पादांशटङ्कणोपेतं मुसलीरसमर्दितम् ।
रुन्ध्वात्कोष्ठ्यां दृढं ध्मातं सत्त्वरूपं भवेदभ्रम् ॥ २६ ॥

अभ्रक में चतुर्थांश रूप में टङ्कण मिलाकर ताल मूली (मुसली) के रस में घोट कर कोष्ठिका यन्त्र में रख कर फूंकने से सत्व निकल आता है।

कोष्ठिका यन्त्रल०
षोडशाङ्गुलविस्तीर्णं हस्तमात्रायतं समम् ।
धातुसत्वनिपातार्थं कोष्ठिकं परिकीर्तितम् ॥ २६ ॥

प्रकारान्तर—

कासमर्द्दघनध्वानवासानां च पुनर्भुवः ।
मत्स्याक्ष्याः काण्डवल्ल्याश्च हंसपाद्या रसैः पृथक् ॥ २७ ॥
पिष्ट्वा पिष्ट्वा प्रयत्नेन शोषयेद्धर्मयोगतः ।
पलं गोधूमचूर्णस्य क्षुद्रमत्स्याश्च टङ्कणम् ॥ २८ ॥
प्रत्येकमष्टमांशेन दत्त्वा दत्त्वा विमर्दयेत् ।
मर्दने मर्दने सम्यक्शोषयेद्रविरश्मिभिः ॥ २६ ॥
पञ्चाजं पञ्चगव्यं वा पञ्चमाहिषमेव च ।
क्षिप्त्वा गोलान्प्रकुर्वीत किञ्चित्तिन्दुकतोऽधिकान् ॥ ३० ॥
पयो दधि घृतं मूत्रं सविट्कं चाजमुच्यते ।
अधःपातनकोष्ठ्यां हि ध्मात्वा सत्त्वं निपातयेत् ॥ ३१ ॥

कसौंदी, नागरमोथा, धनियां, अडूसा, और पुनर्नवा, हिलमोचिका, करेला, हंसपदी इन वस्तुओं के रस में अभ्रक को पृथक् पृथक् घोट कर सूर्य की गर्मी से सुखाले और गेहूं का चूर्ण १ पल तथा मत्स्याक्षी (गण्डदूर्वा) और सोहागा ये प्रत्येक अभ्रक से अष्टमांश लेकर घोटना चाहिए। फिर सूर्य की किरणों से सूख

द्वितीयोऽध्यायः । [६५]

जाने पर बकरी का दुग्ध, दही, घृत, मूत्र और मिंगनी (मल) ये पांच वस्तु मिलाकर या पञ्चगव्य अथवा भैंस की दुग्धादि पांच वस्तु मिलाकर एक कर्ष से अधिक मोटे गोले बनाकर अधःपातन कोष्ठिका यन्त्र में रख कर फूंकने से अभ्रक का सत्व निकल जाता है । दुग्ध, दही, घी, मूत्र और गोबर इनका मिश्रण पञ्चगव्य है ॥ २७–३१ ॥

अथ किट्टात्सत्वग्रहणम्—

कोष्ठ्यां किट्टं समाहृत्य विचूर्ण्य रवकान्हरेत् ।
तत्किट्टं स्वल्पटङ्केन गोमयेन विमर्द्य च ॥ ३२ ॥
गोलान्विधाय संशोष्य घर्मे भूयोऽपि पूर्ववत् ।
भूयः किट्टं समाहृत्य मृदित्वा सत्त्वमाहरेत् ॥ ३३ ॥

पश्चात् मूषा में से शेष अभ्रक के किट्ट को निकाल कर चूर्ण कर के उस में आठवां भाग टङ्कण और समभाग गौ का गोबर मिलाकर मर्दन करे और फिर घाम में शुष्क कर पूर्वानुसार सत्व निकाल ले, फिर भी किट्ट शेष रहे तो इसी रीति से टङ्कण और गोबर मिलाकर सत्व निकालना चाहिए ॥ ३२–३३ ॥

अथ सत्वशोधनम्—

अथ सत्त्वकणांस्तांस्तु काथयित्वाऽम्लकाञ्जिकैः ।
शोधनीयगणोपेतं मूषामध्ये निरुध्य च ॥ ३४ ॥
सम्यग्द्रुतं समाहृत्य द्विवारं प्रधमेद्द्धनम् ।
इति शुद्धं भवेत्सत्त्वं योज्यं रसरसायने ॥ ३५ ॥

बाद में अभ्रक के सत्व के कणों का खट्टी काञ्जी से क्वाथ करके फिर शोधन गण की वस्तुओं के रस में घोट कर गोले बना कर मूषा यन्त्र में बन्द कर के फूंके । इस तरह द्रुत हुए सत्व को द्वितीय वार शोधन गण की औषधियों से घोट कर गोले बनाले पश्चात् उन्हें मूषा यन्त्र में बन्द करके फूंकने से वह सत्व शुद्ध हो जाता है और रस तथा रसायन के काम में आता है ॥ ३४–३५ ॥

अथ सत्त्वानां मृदुकरणम्—

मधुतैलवसाज्येषु द्रावितं परिवापितम् ।
मृदु स्याद्दशवारेण सत्त्वं लोहादिकं खरम् ॥ ३६ ॥

अभ्रक सत्व को अग्नि संयोग से द्रवित कर के शहद, तैल, वसा और घृत में


रस० ५

६६ रसरत्नसमुच्चये—

दश वार निर्वापित करने से मृदु हो जाता है। इसी तरह कठिन लोहादि धातु भी मृदु होते हैं ॥ ३६ ॥

अथाभ्रमारणम्—

पट्टचूर्णं विधायाथ गोघृतेन परिप्लुतम् ।
भर्जयेत्सप्तवाराणि चुल्लीसंस्थितखर्परे ॥ ३७ ॥
अग्निवर्णं भवेद्यावद्वारं वारं विचूर्णयेत् ।
तृणं क्षिप्त्वा दहेद्यावत्तावद्वा भर्जनं चरेत् ॥ ३८ ॥
ततः सगन्धकं पिष्ट्वा वटमूलकषायतः ।
पुटेद्विंशति वारेण वाराहेण पुटेन हि ॥ ३९ ॥
पुनर्विंशतिवाराणि त्रिफलोत्थकषायतः ।
त्रिफलामुण्डिकाभृङ्गपत्रपथ्याक्षमूलकैः ॥ ४० ॥
भावयित्वा प्रयोक्तव्यं सर्वरोगेषु मात्रया ।
सत्त्वाभ्रात्किंचिदपरं निर्विकारं गुणाधिकम् ॥ ४१ ॥
एवं चेच्छुतवाराणि पुटपाकेन साधितम् ।
गुणवज्जायतेऽत्यर्थं परं पाचनदीपनम् ॥ ४२ ॥

अभ्रक सत्व को कपड़े से छान कर या पत्थर पर चूर्ण कर के गोघृत मिला कर चूल्हे पर स्थित कटाह इत्यादि पात्र में भूने । जब तक अग्नि के समान लाल वर्ण का न हो तब तक उस सत्व का कड़ाह में घोट कर चूर्ण करता जाय या कटाह में तृण डालने से वे जलने लगे तब तक घोट २ के चूर्ण करता जाय । इस तरह सात बार भूनना चाहिए । फिर उसमें समान मात्रा में शुद्ध गन्धक डाल कर वट के मूल के कषाय या क्वाथ से घोट कर वाराह संज्ञक पुट द्वारा २० पुट देवे । प्रत्येक पुट में गन्धक मिलाना चाहिए । फिर त्रिफले के क्वाथ या कषाय से घोट कर उसी तरह २० पुट देना चाहिए । पश्चात् त्रिफला, मुण्डी, भांगरे के पत्ते और हरीतकी तथा बहेड़ा और मूली इनके रस की क्रमशः भावनां देकर सब रोगों में मात्रानुसार प्रयोग करना चाहिए । इस सत्वाभ्रक से अन्य अधिक गुण करने वाली और कोई औषधि नहीं है । इसी प्रकार यदि १०० पुट दे कर अभ्रक सत्व का पुट पाक करें तो अत्यन्त गुण कारक तथा अग्निदीपक और पाचनशक्ति बढ़ाने वाली अभ्रक भस्म हो जाती है ॥ ३७-४२ ॥

द्वितीयोऽध्यायः । ६७

द्वितीयोऽध्यायः । ६७

मारणे प्रकारान्तरमाह—
गन्धर्वपत्रतोयेन गुडेन सह भावितम् ।
अधोध्वं वटपत्राणि निश्चन्द्रं त्रिपुटैः खगम् ॥ ४३ ॥
क्षुधं करोति चात्यर्थं गुञ्जार्धमितिसेवया ।
तत्तद्रोगहरैर्योगैः सर्वरोगहरं परम् ॥ ४४ ॥

यदि अभ्रक में गुड़ मिला कर एरण्ड (रेडी) के पत्तों के स्वरस की भावना देकर शराव में रख कर ऊपर से वट पत्र रख कर शराव को कपड़ मिट्टी कर फूंक दे । इस तरह तीन पुट देने से अभ्रक की निश्चन्द्र भस्म तय्यार होती है । इस भस्म को आधे रत्ती की मात्रा में सेवन करने से अत्यन्त क्षुधा लगती है और यह भस्म भिन्न २ दवाइयों या अनुपान के साथ देने से सर्व व्याधियों को दूर करती है ॥ ४३-४४ ॥

अथ सत्वस्य शोधनमारणे—
सत्त्वस्य गोलकं ध्मातं सस्यसंयुक्तकाञ्जिके ।
निर्वाप्य तत्क्षणेनैव कुट्टयेल्लोहपारया ॥ ४५ ॥
संप्रताप्य घनस्थूलकणान्क्षिप्त्वाऽथ काञ्जिके ।
तत्क्षणेन समाहृत्य कुट्टयित्वा रजश्चरेत् ॥ ४६ ॥
गोधृतेन च तच्चूर्णं भर्जयेत्पूर्ववत्त्रिधा ।
धात्रीफलरसैस्तद्वद्धात्रीपत्ररसेन वा ॥ ४७ ॥
भर्जने भर्जने कार्यं शिलापट्टे न पेषणम् ।
ततः पुनर्नवावासारसैः काञ्जिकमिश्रितैः ॥ ४८ ॥
प्रपुटेद्दशवाराणि दशवाराणि गन्धकैः ।
एवं संशोधितं व्योमसत्त्वं सर्वगुणोत्तरम् ।
यथेष्टं विनियोक्तव्यं जारणे च रसायने ॥ ४९ ॥
द्रुतयो नैव निर्दिष्टाः शास्त्रे दृष्टा अपि दृढम् ॥
विना शंभोः प्रसादेन न सिध्यन्ति कदाचन ॥ ५० ॥

अभ्रक सत्व का गोला बना कर उसे प्रतप्त करें और फिर बिना छानी काञ्जी में बुझावे और उसी समय लोह के मूसल से चूर्ण करता जाय । इस तरह अभ्रक सत्व के स्थूल कणों को बार २ प्रतप्त कर के काञ्जी में बुझा कर उसी समय निकाल

६८ | रसरत्नसमुच्चये—

कर चूर्ण करलें, फिर उस चूर्ण को पूर्वोक्त विधि से गोघृत से भूँजना चाहिए । अथवा इसी तरह आंवले के फल या पत्नों के स्वरस से भूनना चाहिए । प्रत्येक भर्जन के समय शिलापट्ट से चूर्ण करना आवश्यक है । बाद में पुनर्नवा और वासा के स्वरस में काञ्जी मिला कर घोट कर दश वार पुट देना चाहिए । इसी तरह गन्धक के साथ भी घोट कर दस पुट देना चाहिए । इस तरह शोधित किया हुआ अभ्रक सत्व सर्वगुण युक्त होता है और उस का पारद के जारण या रसायन में यथेष्ट प्रयोग कर सकते हैं। द्रुतियों का शास्त्र में वर्णन होने पर भी उपयोग ठीक विधि से नहीं बताया गया है और ये शिवजी की अनुकम्पा के बिना सिद्ध भी नहीं होती हैं ॥ ४५–५० ॥

अथाभ्रप्रयोगः—

वेल्लव्योषसमन्वितं घृतयुतं वल्लोन्मितं सेवितं
दिव्याभ्रं क्षयपाण्डुरुग्ग्रह णिकाशूलामकुष्ठामयम् ।
जूर्ति श्वासगदं प्रमेहमरुचिं कासामयं दुर्धरं
मन्दाग्निं जठरव्यथां विजयते योगैरशेषामयान् ॥ ५१ ॥

इत्यभ्रकाधिकारः ।

वायविडङ्ग, सोंठ, मिर्च, पिप्पल, प्रत्येक का दो दो रत्ती चूर्ण करले फिर उस चूर्ण में घृत मिलाकर दो रत्ती अभ्रक रस मिलाकर सेवन करे । इससे क्षय, पाण्डु, ग्रहणी, खांसी, शूल, आंव, और कुष्ठ रोग, ज्वर, श्वास, बीस प्रकार के प्रमेह, अरुचि, असाध्य कास रोग, मन्दाग्नि, उदर की समस्त व्याधियां और भिन्न २ अनुपानों से समग्र व्याधियां नष्ट हो जाती है ॥ ५१ ॥

अथ वैक्रान्तः—

अष्टास्रश्चाष्टफलकः षट्कोणो मसृणो गुरुः ।
शुद्धमिश्रितवर्णैश्च युक्तो वैक्रान्त उच्यते ॥ ५२ ॥

आठ कोनों तथा आठ फलकों से युक्त और षट्कोणवाला, स्निग्ध, भारी, शुद्ध और मिश्रित रङ्ग वाला उत्तम वैक्रान्त होता है ॥ ५२ ॥

अथ वैक्रान्तस्य वर्णभेदाः—

श्वेतो रक्तश्च पीतश्च नीलः पारावतच्छविः ।
श्यामलः कृष्णवर्णश्च कर्बुरश्चाष्टधा हि सः ॥ ५३ ॥

द्वितीयोऽध्यायः । ६९

श्वेत, रक्त, पीत, नील, धूमवर्ण, कृष्ण, श्याम तथा चित्रवर्ण या स्वर्णवर्ण इन वर्ण भेदों से वैक्रान्त आठ तरह का है ॥ ५३ ॥

अथ वैक्रान्तगुणाः—

आयुष्प्रदश्च बलवर्णकरोऽतिवृष्यः प्रज्ञाप्रदः सकलदोषगदापहारी । दीप्ताग्निकृत्पविसमानगुणस्तरस्वी वैक्रान्तकः खलु वपुर्बललोहकारी॥५४॥ रसायनेषु सर्वेषु पूर्वगण्यः प्रतापवान् । वज्रस्थाने नियोक्तव्यो वैक्रान्तः सर्वदोषहा ॥ ५५ ॥

वैक्रान्त अवस्था बढाता है, शरीर में बल तथा वर्ण पैदाकरता है, अत्यन्त वृष्य तथा बुद्धिप्रद है, सम्पूर्ण कुपित वातादि दोष और व्याधियों को नष्ट करता है, अग्नि को दीप्त करता है, वज्र (हीरक) के समान गुणकारी है, तथा शक्ति पैदा करता है, शरीर को बलयुक्त एवं लौह सदृश दृढ करता है । जितने भी रसायन हैं उनमें यह प्रधान और प्रभावसम्पन्न तथा सम्पूर्ण दोषों को नष्ट करने वाला है । इसका हीरे के स्थान में भी प्रयोग करते हैं ॥ ५४-५५ ॥

अथ वैक्रान्तोत्पत्तिः—

दैत्येन्द्रो माहिषः सिद्धः सहदेवसमुद्भवः । दुर्गा भगवती देवी तं शूलेन व्यमर्दयत् ॥ ५६ ॥ तस्य रक्तं तु पतितं यत्र यत्र स्थितं भुवि । तत्र तत्र तु वैक्रान्तं वज्राकारं महारसम् ॥ ५७ ॥

देवताओं ( अथवा सहदेव ) के साथ उत्पन्न तथा शङ्करजी से सिद्धिप्राप्त दैत्यों के राजा महिषासुर को भगवती दुर्गा ने जब अपने त्रिशूल से मारा था उस वक्त उसका रक्त जहां २ पृथ्वी पर पड़ा वहां २ वज्र के सदृश आकार वाले महारस वैक्रान्त की उत्पत्ति हुई ॥ ५६-५७ ॥

**विमर्शः—**वैक्रान्त को टर्मुली ( Turmuly ) कहते हैं ।
**परिचय—**यह एक । विशेष खनिज है जो कि अभ्रक के साथ २, तथा कभी २ स्वतन्त्र रूप से भी प्राप्त होता है । सम्भव है कि इसी कारण इसका अभ्रक के बाद पाठ रखा गया है । इसकी जो मूल में उत्पत्ति दिखाई गई है वह अलङ्कारिक भाषा से ओतप्रोत होती हुई भी समर्थ का प्रतिपादन करती है । किन्तु आजकल के जौहरियों के प्रयोग के आधार पर इसके विषय में जो दग्ध हीरक होने की धारण लोगों की बनी हुई यह भ्रम से परिपूर्ण है । यह स्वतन्त्र खनिज है ।

७० | रसरत्नसमुच्चये—

**उपलब्धि—**यह खनिज प्रथम सीलोन से निकलता था किन्तु आजकल विशेष कर अफ्रीका से निकलता है तथा वहीं से सर्वत्र वितरित होता है। इसके जो अनेक वर्ण के सुन्दर २ कण (क्रिस्टल्स् Crystals) आते हैं उनकी गणना रत्नों में होती है। इसी लिये इस ग्रन्थ में इसका आगे रत्नों के साथ भी उल्लेख किया गया है। इसके बहुमूल्य कणों को जौहरी अनेक प्रकार के आभूषणों में काम में लाते हैं।

इसके कृष्णवर्ण के खनिज में लोहे का अंश अधिक होता है इस लिये उसका ही विशेष कर के औषध कर्म में प्रयोग करना चाहिए।

वैक्रान्तस्य स्थानं निरुक्तिञ्चाह—

विन्ध्यस्य दक्षिणे भागे ह्युत्तरे वाऽस्ति सर्वतः।
विक्रन्तयति लोहानि तेन वैक्रान्तकः स्मृतः ॥ ५८ ॥

यह वैक्रान्त विन्ध्याचल पर्वत के उत्तर तथा दक्षिण भाग में सर्वत्र खानों में प्राप्त होता है तथा लौह ताम्रादिक समग्र धातुओं को काट डालने से वैक्रान्त कहा जाता है॥ ५८ ॥

मतान्तरेण वर्णभेदकथनम्—

श्वेतः पीतस्तथा रक्तो नीलः पारावतप्रभः।
मयूरकण्ठसदृशश्चान्यो मरकतप्रभः ॥ ५९ ॥

यह श्वेत, पीत, रक्त, नील और कबूतर के समान धूम्रवर्ण वाला तथा मयूर के कण्ठ के समान चित्रवर्ण युक्त और मरकतमणि के तुल्य वर्ण वाला सात रङ्ग का होता है॥ ५९ ॥

वर्णभेदेन कार्यभेदकथनम्—

देहसिद्धिकरं कृष्णं पीते पीतं सिते सितम्।
सर्वार्थसिद्धिदं रक्तं तथा मरकतप्रभम्॥
शेषे द्वे निष्फले वर्ज्ये वैक्रान्तमिति सप्तधा ॥ ६० ॥

कृष्णवर्ण वाला वैक्रान्त शरीर को सिद्धि प्रदान (अजरअमर) करता है। पीत वैक्रान्त को स्वर्ण के जारण मारण में प्रयोग करते हैं। इसी तरह श्वेत को चांदी के लिये या श्वेत कुष्ठादिरोगों में प्रयुक्त करते हैं। लाल तथा मरकत मणि समान वर्ण वाले वैक्रान्त को सेवन करने से सम्पूर्ण सिद्धियां प्राप्त होती हैं। शेष दो रंगवाला (नील तथा कबूतर वर्ण) वैक्रान्त विशेष फल नहीं करने से वर्जनीय है। इस तरह वैक्रान्त सात प्रकार का होता है॥ ६० ॥

द्वितीयोऽध्यायः। ७१

द्वितीयोऽध्यायः। ७१

: अथाऽऽहरणविधिः—

यत्र क्षेत्रे स्थितं चैव वैक्रान्तं तत्र भैरवम् ।
विनायकं च संपूज्य गृह्णीयाच्छुद्धमानसः ॥ ६१ ॥

जिस खान (क्षेत्र) में वैक्रान्त हो वहां पर भैरव तथा गणेशजी की पूजन कर शुद्धचित्त होकर उसे ग्रहण करें ॥ ६१ ॥

: अथ गुणान्तरम्—

वैक्रान्तो वज्रसदृशो देहलोहकरो मतः ।
विषघ्नो रसराजश्च ज्वरकुष्ठक्षयप्रणुत् ॥ ६२ ॥

वैक्रान्त हीरे के समान है तथा शरीर को लौह तुल्य बनाता है । विषों का प्रभाव नष्ट करता है । ज्वर, कुष्ठ और क्षय रोगों को नष्ट करता है । यह रसों का राजा कहलाता है ॥ ६२ ॥

अथ शोधनम्—

वैक्रान्तकाः स्युस्त्रिदिनं विशुद्धाः संस्वेदिताः क्षारपटूनि दत्त्वा ।
अम्लेषु मूत्रेषु कुलत्थरम्भानीरेऽथवा कोद्रववारिपक्वाः ॥ ६३ ॥

सर्व प्रकार के वैक्रान्त को काञ्जी में, गोमूत्र में, कुलत्थी के काढ़े में, या केले के स्वरस में क्षारवर्ग के क्षार डालकर दोला यन्त्र में तीन दिन स्वेदन करके शुद्ध करते हैं। अथवा कोदो धान के जल में पकाने से भी शुद्ध हो जाता है ॥ ६३ ॥

मतान्तरे शोधनमारणे—

कुलत्थक्वाथसंस्विन्नो वैक्रान्तः परिशुध्यति ।
म्रियतेऽष्टपुटैर्गन्धनिम्बुकद्रवसंयुतः ॥ ६४ ॥

कुलत्थी के काढ़े में एक प्रहर स्वेदन करने से वैक्रान्त शुद्ध हो जाता है । बाद में सम भाग शुद्ध गन्धक डाल कर निम्बूरस से घोट कर आठ पुट देने से भस्म हो जाती है ॥ ६४ ॥

मतान्तरम्—

वैक्रान्तेषु च तप्तेषु हयमूत्रं विनिक्षिपेत् ।
पौनःपुन्येन वा कुर्याद्द्रवं दत्त्वा पुटं त्वनु ॥
भस्मीभूतं तु वैक्रान्तं वज्रस्थाने नियोजयेत् ॥ ६५ ॥

वैक्रान्त को प्राप्त करके घोड़े के मूत्र में बुझावे ! इस तरह २१ बार प्रतप्त कर

७२ रसरत्नसमुच्चये—

नया मूत्र डाल २ कर बुझाना चाहिए । बाद में पुट देने पर वज्र के स्थान पर प्रयोग करने लायक भस्म हो जाती है ॥ ६५ ॥

अथ सत्त्वपातनम्—

मोचमोरटपालाशक्षारगोमूत्रभावितम् ।
वज्रकन्द निशाकल्क फलचूर्णसमन्वितम् ॥ ६६ ॥
तत्कल्कं टङ्कणं लाक्षाचूर्णं वैक्रान्तसम्भवम् ।
नरसारसमायुक्तं मेषशृङ्गीद्रवान्वितम् ॥ ६७ ॥
पिण्डितं मूकमूषस्थं ध्मापितं च हठाग्निना ।
तत्रैव पतते सत्त्वं वैक्रान्तस्य न संशयः ॥ ६८ ॥

कदली कन्द (केले की जड़) मोरट (इक्षुमूल) रस पलाश (ढाक) का क्षार और गोमूत्र इनसे वैक्रान्त को भावित करे। पश्चात् उसमें जङ्गली सूरण कन्द तथा हल्दी का कल्क और त्रिफला का चूर्ण, सोहागा, लाह चूर्ण और नोसादर मिलाकर मेंढासिङ्गी के स्वरस से घोट कर गोला बनावे । उस गोले को अन्धमूषा में रख कर धौंकनी (भस्त्रा) से अग्नि को दीप्त करके फूंके । इससे निश्चय ही सत्व निकल आता है ॥ ६६-६८ ॥

अथ मतान्तरम्—

सत्त्वपातनयोगेन मर्दितश्च वटीकृतः ।
मूषास्थो घटिकाध्मातो वैक्रान्तः सत्त्वमुत्सृजेत् ॥ ६९ ॥

सत्त्व निकालने में प्रयुक्त होने वाली औषधियों के साथ वैक्रान्त को घोट कर गोला बनाकर मूषायन्त्र में रख कर एक घण्टे तक तीव्र अग्नि से धमन करने से सत्त्व निकल जाता है ॥ ६९ ॥

अथ मृतवैक्रान्तस्य प्रयोगविधिर्गुणाश्च—

भस्मत्वं समुपागतो विक्रान्तको हेम्ना मृतेनान्वितः
पादांशेन कणाज्यवेल्लसहितो गुञ्जामितः सेवितः ।
यक्ष्माणं जरणं च पाण्डुगुदजं श्वासं च कासामयं
दुष्टां च ग्रहणीमुरःक्षतमुखान् रोगान्क्षयेद्देहकृत् ॥ ७० ॥

भस्म हुए एक रत्ती वैक्रान्त में चतुर्थभाग रूप में सुवर्ण भस्म मिलाकर विडङ्ग, छोटी पीपल और घृत मिला कर सेवन करने से राजयक्ष्मा, बुढापा,

द्वितीयोऽध्यायः। ७३

द्वितीयोऽध्यायः। ७३

पाण्डुरोग, अर्श, श्वास, कास, दुषित ग्रहणी, उरःक्षत तथा मुख के रोग नष्ट होते हैं तथा शरीर भी वलयुक्त होता है ॥ ७० ॥

अथ प्रयोगान्तरम्— सूतभस्मार्धसंयुक्तं नीलवैक्रान्तभस्मकम् मृताभ्रसत्त्वमुभयोस्तुलितं परिमर्दितम् ॥ ७१ ॥ क्षौद्राज्यसंयुक्तं प्रातर्गुञ्जामात्रं निषेवितम् । निहन्ति सकलान् रोगान् दुर्जयानन्यभेषजैः । त्रिःसप्तदिवसैर्नॄणां गङ्गांभ इव पातकम् ॥ ७२ ॥ इति वैक्रान्ताधिकारः ।

पारद भस्म ( रससिन्दूर ) आधा भाग, एक भाग नील वर्ण के वैक्रान्त की भस्म तथा दोनों के तुल्य मृत अभ्रक का सत्व मिला कर घोट कर शहद तथा घृत मिला कर प्रातःएक रत्ती भर ( १ गुञ्जा ) २१ दिन तक सेवन करने से अन्य औषधियों से असाध्य भी मनुष्यों के सकल रोग नष्ट हो जाते हैं जिस तरह गङ्गा जल पापों को नष्ट कर देता है ॥ ७१-७२ ॥

अथ माक्षिकम्— माक्षिकोत्पत्तिवर्णनम् सुवर्णशैलप्रभवो विष्णुना काञ्चनो रसः । ताप्यां किरातचीनेषु यवनेषु च निर्मितः ॥ ताप्यः सूर्य्यांशुसन्तप्तो माधवे मासि दृश्यते ॥ ७३ ॥ विष्णु भगवान की कृपा से सुमेरु पर्वत से उत्पन्न हुआ तथा सुवर्ण के समान चमकने वाला माक्षिक धातु तापी नदी और किरात, चीन इत्यादि यवन देशों में निर्मित हुआ है और यह तापी नदी से उत्पन्न माक्षिक वैशाखमास में सूर्य की प्रखर किरणों से तप्त होने पर दिखाई देता है ॥ ७३ ॥

अथ माक्षिकस्य गुणाः— मधुरः काञ्चनाभासः साम्लो रजतसन्निभः । किञ्चित् कषायमधुरः शीतः पाके कटुर्लघुः । तत्सेवनाज्जरायाधिविषैर्न परिभूयते ॥ ७४ ॥ सुवर्ण के समान चमकदार माक्षिक मधुररसवाला होता है और रजतवर्ण

५४ रसरत्नसमुच्चये—

माक्षिक अम्ल तथा कुछ कसैला और मधुर, पाक में शीतवीर्य कटु और लघु होता है। इन दोनों प्रकार के माक्षिक का सेवन करने से मनुष्य जरा व्याधि और विष से आक्रान्त नहीं होता है ॥ ७४ ॥

अथ माक्षिकभेदाः—

माक्षिको द्विविधो हेममाक्षिकस्तारमाक्षिकः ।
तत्राऽऽद्यं माक्षिकं कान्यकुब्जोत्थं स्वर्णसन्निभम् ॥ ७५ ॥
तपतीतीरसम्भूतं पञ्चवर्णसुवर्णवत् ।
पाषाणबहुलः प्रोक्तस्ताराख्योऽल्पगुणात्मकः ॥ ७६ ॥

माक्षिक धातु सुवर्ण और रजत का भाग मिलने से दो तरह का होता है। इनमें प्रथम सुवर्ण माक्षिक जो कि कान्यकुब्ज ( कन्नोज या कानपुर ) देश की खानों से निकलता है सुवर्ण के समान होता है। किन्तु तापी नदी के तट के पास की खानों से निकाला हुआ सोनामाखी धातु पांच रङ्ग वाला तथा सुवर्ण सदृश होता है, रौप्यमाक्षिक में पत्थर का भाग ज्यादा होता है तथा वह अल्प गुणदायक है ॥७५-७६॥

**विमर्शः—**भारतवर्ष में माक्षिक कोयलों की खानों में मिलता है। आचार्यों ने इसके तीन भेद बताये हैं किन्तु इस पन्थ में इसके दो ही भेद हैं। तथा आगे विमल ( रौप्यमाक्षिक ) के तीन भेद किए हैं किन्तु यह अन्य रसग्रन्थों से विरुद्ध है।

"माक्षिको द्विविधो हेममाक्षिकस्तारमाक्षिकः” ( इति० र० र० स० )
१ स्वर्णमाक्षिक—कापरं पेराइटिज़् ( Copperpyritis Cu,fes 2 )
२ रोप्यमाक्षिक ( विमल )—आयर्न पेराइटिज़् ( Iron pyritis )
३ कांस्यमाक्षिक ( आर्सेनो पेराइटिज़् Arsano pyritis )

ये तीनों खनिज ताम्र, लौह, और संखिये के गन्धित हैं। इनमें से गन्धक निकाल देने से उक्त तीनों पदार्थों की प्राप्ति होती है। यद्यपि इनमें अन्य खनिज भी रहते हैं किन्तु प्रधान रूप में उपर्युक्त ही होते हैं। इस लिये इनकी भस्म बनाने में बड़ी सावधानी की आवश्यकता है। यद्यपि बजार में आने वाले स्वर्ण तथा रौप्य माक्षिक में दोनों ( स्वर्णरजत ) की मात्रा नहीं होती है। किन्तु विदेशों से कुछ इनके अधिक मूल्य खनिज आते हैं उनमें दोनों धातुओं का कुछ अंश रहता है इसलिये रस शास्त्रों में जहां २ स्वर्ण और चांदी के भस्म के अभाव में इन दोनों का ग्रहण करना हो तब उक्त अधिक मूल्यवान माक्षिक खनिजों की भस्म बनाकर प्रयोग करना चाहिये।