भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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७१२ रसतरङ्गिणी भा.टी.—धतूरा रस में कटु, गुणों में गरम प्रकृति का होता है। यह बाह्याभ्यन्तर द्विविध शोथ को नष्ट करता है। उदरकृमि तथा बाह्यकृमियों को नष्ट करता है। कुष्ठ रोगों को शान्त करता और विशेषतः ज्वर को नष्ट करता है। त्वचा के रोगों को शान्त करने में उत्तम औषधि है और शरीर की कण्डू को मिटाता है। इसको कुछ अधिक मात्रा में खाने से शिर में चक्कर आते हैं और बेचैनी होने लगती है ॥३५०, ३५१॥ धत्तूरस्य विशिष्टा गुणाः धत्तूरः श्वासशमनः कफसंशोषणः परम् । आक्षेपोन्मादहरणः स्तम्भनो हर्षवर्द्धनः ॥३५२॥ अभिष्यन्दप्रशमनः कर्णशूलनिबर्हणः । सवेदनार्बुदहरो लसीकाग्रन्थिशोथहृत् ॥३५३॥ कृमिदन्तव्यथाहारी त्वामवातव्यथाहरः । स्तनशोथप्रशमनः प्रलापपरिकृन्तनः ॥३५४॥ भूतापहस्तथोन्मत्तसारमेयविषापहः । कटिव्यथाहरः कान्ताकामोन्मादविनाशनः ॥३५५॥ निम्ननिर्दिष्टरोगेषु धत्तूरोऽत्यल्पमात्रया । विशेषेण प्रयोक्तव्य इति सद्भिषजां मतम् ॥३५६॥ विविधस्थानसम्भूतां खलु शोथसमुत्थिताम् । वेदनां विविधाकारां विनिहन्ति विशेषतः ॥३५७॥ प्रासूतिकाज्वरोत्थं वा सन्निपातसमुत्थितम् । भृशदुर्गन्धपीताभकृष्णावर्णमलान्वितम् ॥३५८॥ सलिनाभं विशेषेण विनिहन्त्यतिसारकम् । कण्ठशुण्डीञ्च हन्त्याशु भृशदारुणवेदनाम् ॥३५६॥ मसूरिकादौ स्फोटानामस्फुटोद्गमहेतुजम् । आक्षेपं च प्रलापं च शमयत्यविकल्पतः ॥३६०॥ विसर्पोत्थं ज्वरोत्थं वा सन्निपातसमुत्थितम् । विनिहन्ति विशेषेण प्रलापादीनुपद्रवान् ॥३६१॥ सन्निपातसमुद्भूतां शय्यातः खलु रोगिणाम् । पलायनात्मिकां चेष्टां विनिवारयति द्रुतम् ॥३६२॥