रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७९२ रसतरङ्गिणी स्वप्ने विचित्राण्यानन्दजननानि रूपाणि पश्यति । शिश्नोत्थानं ध्वजहर्षः । वस्त्याक्षेपः मूत्राशये जायमानः आक्षेपः ॥३६६-४१३॥ आ.टी.—भांग क्षुधा बढ़ानेवाली और उत्तम ध्वजभंगरोगहर है । इसके सेवन से स्वप्नप्रमेह (Night-discharge) में आराम आता है और वीर्य की स्तम्भनशक्ति बढ़ जाती है। इसके सेवन से अच्छी नींद आती है और कामोद्दीपन होता है। यदि रोगी अधिक प्रलाप आदि करता हो तो इसके योग देने से वह निद्रा में बदल जाते हैं। धनुःस्तम्भ रोग में इसके सेवन से लाभ होता है। आन्त्रशूल तथा वृक्कों में शूल होने पर इसके योग को दिया जाता है। पित्तशोष के कारण होनेवाले शूल को यह नष्ट करती है और आमाशय के बल को बढ़ाती है। अजीर्ण के कारण होनेवाले अतीसार तथा अजीर्ण रोग को नष्ट करती है। इसके योगों को उन्माद रोग में दिया जाता है और इससे वृक्कशोथजन्य पीड़ा भी शान्त हो जाती है। यह मूत्र को अधिक मात्रा में लाती है और रक्तमिश्रित मूत्रस्राव को रोकती है। स्वस्थावस्था में इसके सेवन से विचित्र आनन्ददायक निद्रा की वृद्धि होती है। बाह्यप्रयोग में बवासीर के मस्सों का कष्ट दूर होता है। साधारण रूप से ज्वर को भी मिटाती है। सुजाक में होनेवाली मेढ़ेन्द्रिय-स्तब्धता की पीड़ा को इसके लेप आदि से शान्ति मिलती है। इसके सेवन से नाड़ियों की दुर्बलता के कारण आक्षेपयुक्त माहवारी की पीड़ा अति शीघ्र दूर हो जाती है। आमाशय में शोथ के कारण होनेवाले शूल तथा राजयक्ष्मा के कास में इसके सेवन से शीघ्र आराम आता है। यदि किसी कारण वस्ति में आक्षेप हो अथवा शरीर में आक्षेपयुक्त तमक श्वास हो तो इसके योगों से लाभ होता है। अत्यन्त कष्टदायक तथा तीव्र आक्षेपयुक्त संक्रामक कास (हूपिंग कफ) में इससे विशेष लाभ देखा जाता है। स्त्री की प्रौढावस्था के अन्त में जब उसकी माहवारी बन्द हो जाती है तो इसके कारण शिर में कभी-कभी या हर समय तीव्र वेदना होती है। इस वेदना के लिए भांग के योग लाभकारी होते हैं। गर्भस्राव या गर्भपात के कारण होनेवाली अधिक रक्तप्रवृत्ति अथवा मासिक स्राव के समय, या रक्त- प्रदरजन्य अधिक रक्तप्रवृत्ति में भी इसके योगों के सेवन से आराम आता है। इस प्रकार की मानसिक दुर्बलता में जब मनुष्य बात करते हुए अपनी पहलो बात को भूल जाय तो इसके कुछ काल तक बहुत अल्प मात्रा में सेवन करने से यह मानसिक दुर्बलता मिट जाती है। ऐसे अजीर्ण में जहाँ किसी प्रकार का खाना-पीना हजम न होता हो और भोजन में अरुचि के साथ भूख भी नहीं