भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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पित्तं वातेन सह मूर्च्छितम् । प्रच्यावयति रोमाणि ततः श्लेष्मा सशोणितः। रुणद्धि रोमकूपांस्तु ततोऽन्येषामसम्भवः । तदिन्द्रलुप्तं खालित्यं रुह्येति च विभाव्यते॥” इत्यु- क्तलक्षणः । अवबाहुकः अंसदेशगतः सिराकुञ्चनजो वातव्याधिविशेषः॥४५४-४५६॥ भा.टी.—गुञ्जाबीजों को एक सिल या खरल में जल के साथ बारीक पीस लेप करने से सन्धिस्थान में दबाव पड़ने या रगड़ पड़नेके कारण होनेवाली भयं- कर शोथवेदना शान्त हो जाती है । इसी तरह इसको इन्द्रलुप्त (बालों का उड़ना) तत्तत् अङ्गों में होनेवाले पक्षाघात, भयंकर गृध्रसीपीड़ा तथा तीव्र प्रकार का अव- बाहुक वातव्याधि रोग में इसके प्रयोग से शीघ्र आराम आता है । यदि गुञ्जा- बीजों को समभाग चित्रकमूलत्वक् में मिलाकर जल से बारीक पीसकर श्वेत कुष्ठ के दानों पर लेप किया जाय तो वे कुछ दिनों में नष्ट हो जाते हैं ॥४५४-४५६॥ प्रथमं गुञ्जाद्यतैलम् गुञ्जाबीजं शिलापिष्टं कल्कीकृतमनुत्तमम् । तिलतैलं भृङ्गराजपत्रनिर्यासकं तथा ॥४५७॥ चतुर्गुणोत्तरं चैव मानमेषां प्रकल्पयेत् । तैलपाकविधानेन तैलमेभिस्तु साधितम् ॥४५८॥ निहन्त्यभ्यङ्गयोगेन कण्डूकुष्ठादिकामयान् । तथा दारुणकं हन्ति विविधां वातवेदनाम् ॥४५६॥ गुञ्जाद्यं तैलमाद्यम् । गुञ्जाबीजानि शिलापिष्टानि पलैकमितानि, तिलतैलस्य चत्वारि पलानि, भृङ्गपत्रस्य षोडशपलानि । यथाविधि पाचितं कण्डूकुष्ठादिहारि । दारुणकं केशभूमिरोगविशेषः “दारुणा कण्डुरा रूक्षा केशभूमिः प्रपाट्यते । कफमारुतकोपेन विद्याद्दारुणकं तु तम्” इत्युक्तलक्षणः ॥४५७-४५६॥ भा.टी.—एक भाग गुञ्जाबीज लेकर इनको सिल पर जल के साथ पीस कर कल्क (लुगदी-सी) बना लें । तिलतैल चार भाग लें, भांगरे के पत्तों का स्वरस सोलह भाग लें । अब इन तीनों को एक बड़े चौड़े मुख के पात्र में एकत्र मिला चूल्हे के ऊपर रखकर स्नेह-साधन-विधान के अनुसार पकाकर तैल सिद्ध कर लें । इसको गुञ्जादि तैल कहते हैं । यह तैल शरीर पर मलने से कण्डू कुष्ठ आदि त्वग्रोगों तथा शिर के दारुणक (गंज) रोग और विविध प्रकार की वातिक पीड़ाओं को शान्त करती है ॥४५७-४५६॥ द्वितीयं गुञ्जाद्यतैलम् गुञ्जाबीजशिफाभिस्तु तैलं द्विगुणवारिणा ।